अमेरिकी सेना के हवाई हमले में 42 लोगों की मौत, अधिकतर बच्चे और महिलाएं

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रक्का। सीरिया के रक्का शहर में लंबे समय से आईएसआईएस के खिलाफ तमाम देशों ने जंग छेड़ रखी है. यहां आईएस के खिलाफ जंग की अमेरिका अगुवाई कर रहा है. अमेरिका की ओर से जारी हवाई हमले में मंगलवार को रक्का शहर में तकरीबन 42 लोगों की मौत हो गई है. जानकारी के अनुसार रक्का में कुल 42 नागरिकों की अमेरिकी हवाई हमलों में मौत हुई है, जिसमें मरने वाले अधिकतर महिलाएं और बच्चें हैं.

सीरियन ऑब्जरवेटरी ने बताया कि इस हवाई हमलों में कम से कम 42 लोगों की मौत हुई है, जिसमें 19 बच्चे और 12 महिलाएं शामिल हैं. हालांकि, अमेरिका के नेतृत्व में अब इस शहर का 60 प्रतिशत हिस्सा आईएस के कब्जे से छुड़ा लिया गया है. अमेरिका के विशेष दूत ब्रैट मैकगर्क का कहना है कि अभी भी इस क्षेत्र में 2 हजार आईएस लड़ाके मौजूद हैं. आपको बता दें कि आईएस के खिलाफ यहां लड़ रही एसडीएफ को अमेरिकी सेना भारी समर्थन दे रही है, जिसके चलते लगातार जिहादियों पर हवाई हमले जारी हैं.

पिछले कुछ दिनों से संयुक्त सेना ने रक्का शहर में अपने हमलों को तेज किया है. सेना की कार्रवाई में कई लोगों की जानें गई हैं. आईएस को यहां से खदेड़ने के लिए यहां के कुर्दों के नेतृत्व वाले सीरियन डेमोक्रेटिक फोर्सेस यानि एसडीएफ ने अपनी कार्रवाई को तेज कर दिया है. इस कार्रवाई में अभी तक सीरिया में कुल 3,30,000 लोग मारे जा चुके हैं. सीरिया में यह संघर्ष मार्च 2011 में शुरू हुआ था, यह संघर्ष सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन से शुरू हुआ था.

शिक्षामित्रों ने नहीं मानी बात, कल से करेंगे आमरण अनशन

यूपी की राजधानी लखनऊ के लक्ष्मण मेला मैदान में अपनी मांगों को लेकर डटे शिक्षा मित्रों के तेवर कड़े हैं. मंगलवार(22 अगस्त) को शिक्षा मित्रों ने सरकार के फैसले को मानने से इनकार करते हुए आंदोलन और तेज करने का ऐलान किया. उन्होंने कहा कि रणनीति में परिवर्तन करते हुए बुधवार से हम आमरण अनशन करेंगे. सड़कों पर उतरेंगे.

इस बीच मंगलवार दूसरे दिन प्रदेश के अन्य जिलों से भी तमाम शिक्षा मित्रों के आंदोलन स्थल पर पहुंचने से प्रशासन और सतर्क हो उठा है. सुरक्षा व्यवस्था के मद्देनजर लक्ष्मण मेला मैदान के आसपास पुलिस बल बढ़ा दिया गया है. शिक्षा मित्रों के भारी जमावड़े के कारण लक्ष्मण मेला मैदान और निशातगंज के इर्द-गिर्द जाम की स्थिति है.

आदर्श शिक्षा मित्र वेलफेयर एसोसिएशन के प्रदेश अध्यक्ष जितेंद्र शाही ने कहा कि ‘समान कार्य, समान वेतन से कम पर कुछ भी मंजूर नहीं. सरकार ने हमारे साथ धोखा किया है. शिक्षा मित्र समान कार्य, समान वेतन की मांग रख चुके हैं. वहीं हम टीईटी से छूट के लिए केंद्र सरकार से अध्यादेश लाने की मांग कर रहे हैं. शिक्षा मित्र नेताओं का कहना है कि राज्य सरकार केंद्र पर दबाव बना कर इस संबंध में अध्यादेश लाए और शिक्षा मित्रों को शिक्षकों के तौर पर समायोजित करें. उन्होंने कल से आमरण अनशन करने की चेतावनी दी है.

सोमवार को राज्य सरकार ने शिक्षा मित्रों के संबंध में फैसला लिया है कि एक अगस्त से उन्हें शिक्षा मित्र मानते हुए 10 हजार रुपये मानदेय दिया जाएगा. वहीं उनके लिए शिक्षक की सेवा संबंधी नियमावली में संशोधन की कार्यवाही भी शुरू कर दी गई है. उन्हें प्रतिवर्ष ढाई अंक वेटेज देने का नियम बनाया है. यह वेटेज अधिकतम 25 अंकों का हो सकता है. शिक्षा मित्रों ने चेतावनी दी है और कहा है यदि सरकार ने फैसला वापस नहीं लिया तो शिक्षा मित्र सड़कों पर उतर आएंगे.

ध्यान रहे प्रदेश में आंदोलनरत शिक्षा मित्र अपने ऐलान के मुताबिक सोमवार को लखनऊ पहुंच गए थे. उन्होंने लक्ष्मण मेला मैदान पर डेरा डाल दिया था. हालांकि उनकी कोशिश विधानसभा तक पहुंचने की थी, पर पुलिस प्रशासन की तैयारियों के कारण इसमें वे सफल नहीं हो सके थे. इसके बावजूद उनके भारी जमावड़े के चलते पूरे दिन जाम की स्थिति बनी रही.

जानिए, बॉलीवुड में तीन तलाक का सफ़र

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लखनऊ। एक बार में तीन तलाक मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने आज अपना फैसला सुनाते हुए केंद्र सरकार को संसद में तीन तलाक पर नियम बनाने का आदेश भले ही दे दिया हो लेकिन तीन तलाक के मामले में आज से 35 साल पहले ही मशहूर लेखिका अचला नागर ने अपनी कहानी के माध्यम से मुस्लिम समाज में फैली इस प्रथा का विरोध किया था.

1982 में आई फिल्म निकाह में तीन तलाक के मामले को उठाया जा चुका है. निर्देशक बीआर चोपड़ा के कहने पर अचला नागर ने ये पटकथा लिखी थी. इस फिल्म की खास बात ये थी कि रिलीज से पहले इस फिल्म का नाम तलाक, तलाक, तलाक रखा गया था लेकिन बाद में किन्हीं कारणों से फिल्म का नाम निकाह रखा गया. सिर्फ निकाह ही नहीं और भी बॉलीवुड फिल्मों में तीन तलाक का जिक्र किया गया है.

1960 में आई गुरूदत्त और वहीदा रहमान की फिल्म चौदहवीं का चांद भी तलाक के मुद्दे को लेकर ही बनी थी. फिल्म को लोगों ने पसंद भी किया था. साल 1958 में फिल्म तलाक में राजेंद्र कुमार के जबर्दस्त अभिनय लोगों के दिलों पर छाप छोड़ गया. इस फिल्म में भी तीन तलाक का जिक्र किया गया था. इस फिल्म के लिये निर्देशक महेश कौल को फिल्मफेयर अवार्ड के लिये नामांकित भी किया गया था.

तलाक के मामले को लेकर 29 सितंबर 2017 को फिल्म हलाल भी रिलीज की जायेगी. फिल्म राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता शिवाजी लोटन पटेल बना रहे हैं. ये फिल्म रिलीज होने के पहले ही कई पुरस्कार अपने नाम कर चुकी है. तलाक जैसे संवेदन शील मुद्दों पर बनी ये फिल्म 53 वें महाराष्ट्र फिल्म समारोह में भी 6 पुरस्कार जीत चुकी है. वहीं एक शार्ट फिल्म जुल्म में भी तलाक जैसे मुद्ददे को उठाया गया है.

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में तीन तलाक के मामले पर 6 महीने की रोक लगाते हुए संसद में तीन तलाक पर नियम बनाने का आदेश दिया है. वहीं तीन न्यायाधीशों ने तीन तलाक को असंवैधानिक घोषित किया है. तो न्यायमूर्ति जेएस खेहर और अब्दुल नजीर असंवैधानिक घोषित होने के पक्ष में नहीं है.

तीन तलाकः मायावती ने किया फैसले का स्वागत, केंद्र से तय समय में कानून बनाने की मांग

लखनऊ। बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत किया है. लेकिन उन्होंने केंद्र सरकार को नसीहत दी है कि बिना कोई संकीर्ण और आरएसएस के एजेंडे की राजनीति किए सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार समय सीमा में ही तीन तलाक पर कानून बनाए.

बसपा सुप्रीमो ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ ने 3-2 के बहुमत के फैसले से तीन तलाक को असंवैधानिक करार दिया है. उन्होंने आगे कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र सरकार से इस संबंध में छह महीने के भीतर कानून बनाने के लिये कहा है, जिसका समय से अनुपालन किया जाना चाहिये.

मायावती ने कहा कि यह अच्छा होता, यदि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड खुद ही तीन तलाक के मामले में कार्यवाही करता. उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि इस बुराई की रोकथाम के लिये जितनी तत्परता से इस पर कार्रवाई की जानी चाहिए थी वह नहीं की गई. इस कारण ही सुप्रीम कोर्ट को इस मुद्द पर हस्तक्षेप करना पड़ा है. इस फैसले का सभी मुस्लिम महिलाओं के हित में स्वागत किया जाना चाहिए.

मायावती ने कहा कि देश में तीन तलाक के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने जो फैसला किया है, उसका बसपा दिल से स्वागत करती है.

पत्नी का दो कदम आगे चलना नहीं हुआ बर्दाश्त, सड़क पर ही पति ने दिया तलाक

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रियाद। सऊदी अरब के एक आदमी ने अपनी पत्नी को इसलिए तलाक दे दिया क्योंकि वह उसके आगे चल रही थी. पति ने उसे कई बार चेतावनी भी दी थी.

सऊदी अरब में पिछले कुछ वक्त में ऐसी अजीबोगरीब वजहों से तलाक के अधिक मामले सामने आए हैं. मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, जिस शख्स ने हाल में तलाक दिया है, उसकी पहचान सामने नहीं आई है, लेकिन उसने पत्नी को कई बार पीछे चलने को कहा.

कुछ वक्त पहले एक पुरुष ने पत्नी को इसलिए तलाक दे दिया था क्योंकि उसने डिनर के वक्त एक आइटम नहीं परोसा था. डिनर उसके पति ने अपने दोस्तों के लिए आयोजित किया था. दोस्तों के जाने के बाद पति, पत्नी पर गुस्सा हो गया और तलाक दे दिया.

एक अन्य मामले में पति ने इसलिए तलाक दे दिया था क्योंकि उसकी पत्नी हनीमून के वक्त पायल पहनना भूल गई थी. शादी कराने वाले हुमूद अल शिम्मरी के मुताबिक, पिछले दो सालों में तलाक के मामलों में बढ़ोतरी हुई है. उनके मुताबिक, तलाक कराने में मॉडर्न तकनीक की भी काफी भूमिका सामने आ रही है.

सऊदी अरब की एक सोशल कंसल्टेंट लतीफा हामिद के मुताबिक, परिवारों को अपने बच्चों को अच्छी तरह एजुकेट करना चाहिए. ताकि उनके भीतर साइकोलॉजिकल, सोशल और धार्मिक जागरुकता हो. इससे परिवार में होने वाले दिक्कतें कम होंगी.

अयोध्या मंदिर विवाद में जमीन मिले तो बनेगी ‘मस्जिद-ए-अमन’

लखनऊ। शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष वसीम रिजवी ने अयोध्या मामले एक और नया बयान दिया है. उन्होंने कहा कि अयोध्या में राम मंदिर को तोड़कर बाबरी मस्जिद बनी थी. शरीयत इजाजत नहीं देता कि मंदिर तोड़कर मस्जिद बनायी जाए. हमने विवादित परिसर से अलग जमीन मांगी है ताकि वहां मस्जिद बनायी जा सके.

वसीम रिजवी ने लखनऊ में प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित कर कहा कि हम मानते हैं कि वहां मंदिर था उसे तोड़कर मस्जिद बनाई गई. पुरातत्व विभाग ने भी अपनी रिपोर्ट में यही कहा है. उन्होंने कहा कि वक्फ बोर्ड के नियमों के अनुसार मस्जिद की जमीन किसी और को ट्रांसफर नहीं की जा सकती. मौजूदा समय में वहां मस्जिद नहीं है. उस परिसर में राम की मूर्ति स्थापित है. वहां पूजा पाठ भी हो रहा है. वहां मूर्ति स्थापित हो गई तो उस जगह पर अब मस्जिद कैसे हो सकती है.

वसीम ने कहा कि मुगलों ने जबरन वहां मस्जिद बनाई थी. मीर बाकी ने बल प्रयोग करके मस्जिद बनायी और बाबर का नाम दे दिया. उन्होंने कहा कि हम जो नई जमीन पर मस्जिद बनाएंगे उसे ‘मस्जिद-ए-अमन’ नाम देंगे. सुप्रीम कोर्ट ने अगर हमारे सुझावों पर ध्यान दिया और हमें नई जमीन मिली तो हम मस्जिद का नाम किसी आक्रांताओं के नाम पर नहीं रखेंगे.

रिजवी ने कहा कि हम और फसाद नहीं चाहते मस्जिद शिया है या सुन्नी इस पर इस पर वसीम बोले जब सुन्नी वक्फ बोर्ड ने पंजीकरण को ही चुनौती दी है तो मस्जिद उनकी कैसे. मीर बाकी शिया था इसलिए भी यह शिया मस्जिद है.

अपहरणकर्ताओं से लोहा लेने वाले दलितों पर सवर्णों ने किया हमला

सागर। बीना के बसाहरा गांव में एक दलित किशोरी का किडनैप करने का मामला सामने आया है. सवर्ण जाति के तीन लड़के 20 अगस्त की रात किशोरी का अपहरण कर ले जा रहे थे. जब लड़की शोर मचाने लगी तो गांव के लोगों ने उन अपहरण करने वालों को धर दबौचा और पुलिस को सूचित किया. लेकिन पुलिस ने गाड़ी में डीजल कम होने की बात कहकर आने से मना कर दिया.

जब घटना की जानकारी किडनैपर्स के घर तक पहुंची तो सवर्ण जाति के लोग इकट्ठा होकर उन्हें छुड़ाने पहुंचे. सवर्णों ने किडनैपर्स को पकड़ने वाले दलित ग्रामीणों पर रॉड और लाठी से हमला कर दिया और किडनैपर्स को छुड़ा कर ले गए. हमले में एक महिला सहित चार लोग घायल हुए हैं. इस घटना से गांव के दलितों में आक्रोश है. उनका कहना है कि समय पर पुलिस पहुंच जाती तो मारपीट नहीं हो पाती. इधर पुलिस का कहना है कि मामले की जांच की जा रही है.

सोमवार (21 अगस्त) को बसाहरा गांव के करीब 100 लोग बीना पहुंचे. उन्होंने बीना थाना प्रभारी को लिखित शिकायत करते हुए बताया कि रविवार रात करीब 10 बजे गांव के तीन सवर्ण जाति के युवक महेंद्र राजपूत, दिब्बू राजपूत और विजय कुशवाहा घर में अकेली सो रही किशोरी का अपहरण कर घर के बाहर ले जा रहे थे.

चीख पुकार सुनकर मुहल्ले वालों ने तीनों युवकों को पकड़कर किशोरी को मुक्त कराया. इसके बाद उन्होंने 100 डायल को सूचना दी. लेकिन व्यस्त होने की बात कहकर 100 डायल मौके पर नहीं पहुंची. फिर खिमलासा थाने फोन किया तो पुलिस ने गाड़ी में डीजल कम होने की बात कहकर आने से इनकार कर दिया.

ग्रामीणों का आरोप है कि जब पुलिस नहीं पहुंची तो तीनों अपहरणकर्ता के परिजन पप्पू ठाकुर, नवल ठाकुर, सुरेंद्र और कमल सिंह ने किशोरी को बचाने वाले लोगों पर रॉड और डंडों से हमला कर दिया और तीनों युवकों को छुड़ा ले गए. हमले से एक महिला सहित चार लोगों को चोटें आई है.

एक की गर्दन तथा पैर में गंभीर चोटें आने पर उसे बीना के सिविल अस्पताल में भर्ती किया गया है. ग्रामीणों ने बीना पुलिस से शीघ्र कार्रवाई करने की मांग की है. इधर बीना थाना प्रभारी ने पीड़ित लड़की तथा परिजनों के बयान लेकर डायरी खिमलासा पुलिस थाना भेजने की बात कही है. ग्रामीणों का कहना है कि अगर समय पर पुलिस पहुंच जाती तो किशोरी की मदद करने वालों के साथ जातिवादी गुंडे मारपीट नहीं कर पाते.

बीना के एएसपी पीएल कुर्बे ने कहा कि पूरी घटना की जांच की जाएगी. पीड़ित परिवार के बयानों के आधार पर आरोपियों के खिलाफ उचित कार्रवाई होगी. दोषियों को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा.

सरकारी बैंकों के 10 लाख से ज्यादा कर्मचारी हड़ताल पर

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मुंबई। श्रम कानूनों में परिवर्तन और बैंकों का विलय करने के खिलाफ देशभर के बैंक कर्मचारी आज हड़ताल पर हैं. हड़ताल के चलते देश के सभी सरकारी बैंक आज बंद रहेंगे. जानकारी के मुताबिक आज 10 लाख से ज्यादा बैंक कर्मचारी हड़ताल पर हैं.

हालांकि प्राइवेट बैंकों में इस हड़ताल का कोई असर देखने को नहीं मिलेगा. हड़ताल में उनके तीन मुद्दों पर विरोध और छह मांगे शामिल हैं. यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियन (यूएफबीयू) के आह्वान पर देश के 10 लाख बैंक कर्मचारी हड़ताल पर हैं.

यूनाईटेड फोरम की मांग है कि सरकार बैंकिंग सुधारों को वापस ले और बैंकों में पर्याप्त भर्ती शुरू करे. साथ ही एनपीए वसूली के लिए प्रभावी कदम उठाए जाएं. अगर सरकार न चेती तो 15 सितंबर को दिल्ली कूच होगा.

भारतीय मजदूर संघ बीएमएस से सम्बद्ध नेशनल ऑर्गनाइजेशन ऑफ बैंक वर्कर्स एनओबीडब्ल्यू के अनुसार सरकार ने हड़ताल को टालने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए हैं. इसलिए हड़ताल के कारण बैंक ग्राहकों को होने वाली किसी भी दिक्कत के लिए सीधे सरकार ही जिम्मेदार होगी.

बैंक कर्मचारियों का कहना है कि सरकार सुधारों के नाम पर भारतीय बैंकिंग क्षेत्र का निजीकरण और एकीकरण करना चाहती है. कर्मचारियों का कहना है कि सरकार बैंक बोर्ड ब्यूरो (बीबीबी) का गठन करके सार्वजनिक क्षेत्र के सभी बैंकों को एक बैंकिंग निवेश कंपनी के तहत लाने का काम करने जा रही है, जिसका कर्मचारी विरोध कर रहे हैं.

इसके अलावा सरकार बैंकों में अपनी हिस्सेदारी को घटाकर के 49 फीसदी से कम करने जा रही है. सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का एनपीए 6.83 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया हैं, जो प्रमुख चिंता का विषय है.

जयंती विशेषः ब्राह्मणवाद के विध्वंसक थे रामस्वरूप वर्मा

भारत के सबसे बडे़ प्रान्त उत्तर प्रदेश के जनपद कानपुर देहात के गौरी करन गाँव में 22 अगस्त 1923 को एक साधारण किसान परिवार में रामस्वरूप वर्मा का जन्म हुआ. उनके पिता वंशगोपाल और माता का नाम सुखिया था. मा-बाप अपने बेटे रामस्वरूप को उच्च शिक्षा ग्रहण करवाना चाहते थे. वो पढ़ने में मेधावी भी थे. उन्होंने उस जमाने में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एम०ए॰ और आगरा विश्विद्यालय से एल॰एल॰बी॰ की डिग्री प्राप्त की, जब शूद्रों के लिए शिक्षा का दरवाजा बन्द था. किन्तु ब्रिटिश हुकूमत के कारण शूद्रों और महिलाओं की शिक्षा का रास्ता प्रशस्त हो रहा था जिसका लाभ माननीय रामस्वरूप वर्मा को मिला. उन्होंने उर्दू, अंग्रेजी, हिन्दी और संस्कृत भाषा की शिक्षा ग्रहण की. पढ़ाई पूरी करने के बाद उनके सामने तीन विकल्प थे. पहला विकल्प प्रशासनिक सेवा में जाना, दूसरा वकालत करना तथा तीसरा विकल्प था राजनीति के द्वारा मूलनिवासी बहुजनों व देश की सेवा करना.

वर्मा जी ने आई॰ए॰एस॰ की लिखित परीक्षा भी उर्त्तीण कर ली थी किन्तु साक्षात्कार के पूर्व ही वे निर्णय ले चुके थे कि प्रशासनिक सेवा में रहकर वे ऐशो आराम की जिन्दगी तो व्यतीत कर सकते हैं पर उन ब्राह्मणवाद से आच्छादित मूलनिवासी बहुजन समाज में व्याप्त भाग्यवाद, पुर्नजन्म, अन्धविश्वास, पाखण्ड, चमत्कार जैसी धारणा से निजात नहीं दिला सकते. इसलिए सामाजिक चेतना और जागृति पैदा करने के लिए उन्होंने 1 जून 1968 को सामाजिक संगठन ‘अर्जक संघ’ की स्थापना की. मा॰ रामस्वरूप वर्मा में राजनैतिक चेतना का प्रार्दुभाव डॉ॰ अम्बेडकर के उस भाषण से हुआ, जिसे उन्होंने मद्रास के पार्क टाउन मैदान में 1944 में शिड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन द्वारा आयोजित कार्यकर्ता सम्मेलन में दिया था.

रामस्वरूप वर्मा पर डॉ॰ अम्बेडकर के उस भाषण का भी बहुत ही प्रभाव पड़ा जिसे उन्होंने 25 अप्रैल 1948 को बेगम हजरत महल पार्क में दिया था. डॉ॰ अम्बेडकर ने कहा था, ‘जिस दिन अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछड़े वर्ग के लोग एक मंच पर होंगे उस दिन वे सरदार बल्लभ भाई पटेल और पंडित जवाहर लाल नेहरू का स्थान ग्रहण कर सकते हैं.’ रामस्वरूप वर्मा ने एस॰सी॰, एस॰टी॰ एवं ओ॰बी॰सी॰ के सामाजिक ध्रुवीकरण के लिए ही अर्जक संघ की स्थापना की. आजाद भारत का प्रमुख दल कांग्रेस थी. विरोधी दल के रूप में डॉ॰ राममनोहर लोहिया की समाजवादी पार्टी थी. डॉ॰ लोहिया कांग्रेस के विरोधी दल के रूप में उभार पर थे. मूलनिवासी बहुजन समाज कांग्रेस के साथ था. 52 प्रतिशत अन्य पिछडे़ वर्ग का वोट हासिल करने के लिये डॉ॰ लोहिया ने नारा दिया, ‘संसोपा ने बाँधी गाँठ सौ में पावें पिछड़े साठ’ इस नारे ने पिछड़ों को समाजवादी आन्दोलन से जुड़ने का रास्ता साफ किया. मा॰ रामस्वरूप वर्मा संसोपा से जुड़ गये. वर्मा जी गांव में पैदा हुए थे. गांव की हर तस्वीर उनके सामने रह़ती थी. समाजवादी प्रचार करते रहे हैं जो समाजवादी होता है वह जातिवादी नहीं हो सकता और जो जातिवादी होता है वह समाजवादी नहीं हो सकता.

माननीय रामस्वरूप वर्मा सम्पूर्ण क्रान्ति के पक्षधर थे. उनकी सम्पूर्ण क्रान्ति में भ्रान्ति को कोई स्थान नहीं था. वर्मा जी के अनुसार- जीवन के चार क्षेत्र होते हैं. राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक. इस चारो क्षेत्रों में गैरबराबरी समाप्त करके ही हम सच्ची और वास्तविक क्रान्ति निरूपित कर सकते हैं. रामस्वरूप वर्मा निःसन्देह डॉ॰ राम मनोहर लोहिया के राजनैतिक दल संसोपा से जुड़े थे, किन्तु लोहिया जी के साथ वर्मा जी का वैचारिक मतभेद था. लोहिया गान्धीवादी थे, वर्मा जी अम्बेडकर वादी. लोहिया के आर्दश मर्यादा पुरूषोत्तम राम और मोहन दास करमचन्द गांधी थे, जबकि रामस्वरूप वर्मा के आदर्श भगवान बुद्ध, फूले, अम्बेडकर और पेरियार थे. रामस्वरूप वर्मा ने अर्जक संघ के कार्यकर्ताओं को निर्देश दिया कि पूरे देश में जहां-जहां अर्जक संघ के कार्यकर्ता हैं वे बाबा साहेब डॉ॰ अम्बेडकर के जन्मदिन को चेतना दिवस के रूप में मनायें और मूल निवासी बहुजनों को चैतन्य करने के लिए 14 अप्रैल 1978 से 30 अप्रैल तक पूरे महीने रामायण और मनुस्मृति का दहन करें. अर्जक संघ के कार्यकर्ताओं ने रामस्वरूप वर्मा के आदेशों का पालन करते हुए रामायण और मनुस्मृति को घोषणा के साथ जलाया.

रामस्वरूप वर्मा संसोपा से सन् 1957 में कानपुर के रामपुर क्षेत्र से चुनाव लड़े और विधान सभा के सदस्य चुने गये. इसके बाद 1967, 1969,1980,1989, और 1991 में सदस्य विधान सभा के चुनाव में विजयी रहे. माननीय वर्मा जी के तर्क के सामने विधान सभा में शासक जातियों की घीघी बंध जाती थी. सन 1967 की संबिदा सरकार में वर्मा जी डॉ॰ लोहिया की पार्टी संसोपा से जीतकर उ॰प्र॰ विधान सभा में पहुंचे. वर्मा जी ने उ॰प्र॰ विधानसभा में एक ऐसा बिल पेश किया कि धर्म के नाम पर सार्वजनिक भूमि पर मन्दिर और मजार बनाकर सरकारी भूमि का अधिग्रहण किया जा रहा है. सड़कों के किनारे व बीच में धर्म स्थल बनाया जा रहा है. इसे रोकने की आवश्यकता है.

मूलनिवासी बहुजन समाज के विधायक जहां एक तरफ बिल का समर्थन कर रहे थे तो ब्राह्मण विधायक परेशान थे. वर्मा जी रामायण जलाने को लेकर भी चर्चा में रहें. 1978 में 14 अप्रैल से 30 अप्रैल तक रामायण जलाने का काम हुआ. चेतना जागृति के नाम पर पर्चे बांट कर रामायण और मनुस्मृति जलाई गई थी.

उन्होंने कहा कि आगे जब फिर अवसर आयेगा तो फिर जलायेंगें. तर्क दिया गया कि गांधी जी ने जब असहयोग आन्दोलन किया तो उन्होंने कहा था विदेशी कपड़ों का विरोध करो तो मान्यवर कपड़े तो सभी को हानि नहीं करते. रामस्वरूप वर्मा के तर्क सुनकर उनके विरोधी भी बंगले झांकने लगते थे. उनके समर्थक विधान सभा के अन्दर और बाहर यत्र तत्र सर्वत्र निडर और निर्भीक थे. उनके अनुयायियों ने ही उत्तर प्रदेश विधान सभा में रामायण के पन्ने फाड़े. बाहर रामायण और मनुस्मति को जलाकर राख कर दिया.

इतना ही नहीं वर्मा जी ने उत्तर प्रदेश के सरकारी और गैरसरकारी पुस्तकालयों में बाबा साहेब डॉ॰ अम्बेडकर का साहित्य रखवाया, जिसके कारण मूलनिवासी बहुजनों में स्वाभिमान जागने लगा. तत्पश्चात शासक जातियों ने बाबा साहेब द्वारा लिखित- ‘जातिभेद का उच्छेद’ और ‘धर्म परिवर्तन करें’ दोनों पुस्तकों को जप्त करने का आदेश जारी कर दिया. शासनादेश के विरोध में माननीय रामस्वरूप वर्मा ने मा॰ ललई सिंह यादव से हाईकोर्ट इलाहाबाद में याचिका दायर की. ललई सिंह यादव ने इलाहाबाद हाईकोर्ट से दोनों पुस्तकों को बहाल करवाया.

वर्मा जी ने नारा दिया था, ‘मारेंगे मर जायेंगे हिन्दू नहीं कहलायेंगे.’ लोहिया से मतभेद होने के बाद उन्होंने संसोपा को छोड़ दिया और चौ॰ महाराज सिंह भारती, बाबू जगदेव प्रसाद, प्रो॰ जयराम प्रसाद सिंह जैसे बहुजन समाज के शुभचिंतकों से सम्पर्क कर 7 अगस्त 1972 को शोषित समाज दल की स्थापना की और नारा दिया- ”देश का शासन नब्बे पर नहीं चलेगा नहीं चलेगा. सौ में नब्बे शोषित हैं नब्बे भाग हमारा है.“ शोषितों का राज, शोषितों के लिए शोषितों के द्वारा होगा.

मा॰ रामस्वरूप वर्मा का मानना था सामाजिक चेतना से ही सामाजिक परिवर्तन होगा और सामाजिक परिवर्तन के बगैर राजनैतिक परिवर्तन सम्भव नहीं. अगर येन केन प्रकारेण राजनैतिक परिवर्तन हो भी गया तो वह ज्यादा दिनों तक टिकने वाला नहीं होगा. रामस्वरूप वर्मा सामाजिक सुधार के पक्षधर नहीं थे. वे सामाजिक परिवर्तन चाहते थे.

माननीय रामस्वरूप वर्मा ने कभी भी सिद्धान्तो से समझौता नहीं किया. उन्होंने सिद्धान्तहीन राजनीति नहीं की. 19-8-1998 को उनका परिनिर्वाण हो गया.

सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक को बताया असंवैधानिक, कहा- संसद बनाए कानून

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए तीन तलाक पर अगले छह महीने तक के लिए रोक लगा दी है. सुप्रीम कोर्ट ने ट्रिपल तलाक के मुद्दे पर अपना फैसला सुना दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संसद जब तक इस पर कानून नहीं लाती तब तक ट्रिपल तलाक पर रोक रहेगी.

इस मामले पर पांच जजों की बेंच ने सुनवाई की थी. जिसका नेतृत्व जस्टिस जेएस खेहर करेंगे, जिन्होंने इस केस में 18 मई को अपना फैसला सुरक्षित रख दिया था. इस खंड पीठ में सभी धर्मों के जस्टिस शामिल हैं जिनमें चीफ जस्टिस जेएस खेहर (सिख), जस्टिस कुरियन जोसफ (क्रिश्चिएन), जस्टिस रोहिंग्टन एफ नरीमन (पारसी), जस्टिस यूयू ललित (हिंदू) और जस्टिस अब्दुल नजीर (मुस्लिम) शामिल हैं.

कोर्ट में जजों ने क्या कहा

सुनवाई के दौरान जस्टिस आरएफ नरिमन, जस्टिस कुरियन जोसेफ और जस्टिस यूयू ललित तीन तलाक को असंवैधानिक घोषित करने के पक्ष में थे. वहीं चीफ जस्टिस जेएस खेहर और जस्टिस अब्दुल नजीर इसके पक्ष में थे. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में तीन तलाक को खत्म कर दिया है, कोर्ट ने इसे अंसवैधानिक बताया दिया है. हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि तीन तलाक अनुच्छेद 14, 15 और 21 का उल्लंघन नहीं है.

इससे पहले 11 से 18 मई तक रोजाना सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रखते हुए आज का दिन मुकर्रर किया था. सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा था कि मुस्लिम समुदाय में शादी तोड़ने के लिए यह सबसे खराब तरीका है. ये गैर-ज़रूरी है.

दरअसल, शायरा बानो ने तीन तलाक के खिलाफ कोर्ट में एक अर्जी दाखिल की थी. इस पर शायरा का तर्क था कि तीन तलाक न तो इस्लाम का हिस्सा है और न ही आस्था. उन्होंने कहा कि उनकी आस्था ये है कि तीन तलाक मेरे और ईश्वर के बीच में पाप है. मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड भी कहता है कि ये बुरा है, पाप है और अवांछनीय है.

क्या है मामला मार्च, 2016 में उतराखंड की शायरा बानो नामक महिला ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करके तीन तलाक, हलाला निकाह और बहु-विवाह की व्यवस्था को असंवैधानिक घोषित किए जाने की मांग की थी. बानो ने मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन कानून 1937 की धारा 2 की संवैधानिकता को चुनौती दी है. कोर्ट में दाखिल याचिका में शायरा ने कहा है कि मुस्लिम महिलाओं के हाथ बंधे होते हैं और उन पर तलाक की तलवार लटकती रहती है. वहीं पति के पास निर्विवाद रूप से अधिकार होते हैं. यह भेदभाव और असमानता एकतरफा तीन बार तलाक के तौर पर सामने आती है.

शर्मनाकः बुंदेलखंड में भूख से बिलख कर मर गया मजदूर

महोबा। बुंदेलखंड के महोबा में गरीबी के चलते एक मजदूर की भूख से मौत हो गई. वह डायबिटीज (मधुमेह) से पीड़ित था. पत्नी ने बताया कि आर्थिक तंगी के चलते इलाज तो दूर, घर में हफ्ते भर से खाना भी नहीं बना था. मजदूर के घर 7 दिन से चूल्हा नहीं जला था. मनरेगा में कई दिन से उसे काम नहीं मिल रहा था, इस वजह से परिवार आर्थिक तंगी से गुजर रहा था. उसके बच्चे कई दिन से भीख मांगकर अपना पेट भर रहे थे. हालात ऐसे थे कि परिवार के पास मृतक का अंतिम संस्कार करने के पैसे नहीं थे.

मामला महोबा जिले के खन्ना एरिया के घंडुआ गांव की है. जानकारी के मुताबिक, गांव में रहने वाले दलित मजदूर छुट्टन के पास कुछ बीघा जमीन थी, लेकिन आर्थिक तंगी की वजह से वो इस साल अपना खेत नहीं जोत सका. छुट्टन और उसकी पत्नी ऊषा अपने 3 बच्चों और बूढ़ी मां के पालन-पोषण के लिए मनरेगा में मजदूरी करते थे. दोनों ने मनरेगा में मजदूरी की थी, लेकिन उन्हें इसका न ही भुगतान मिला. इस वजह से छुट्टन बुरी तरह आर्थिक तंगी की चपेट में आ गया.

बीमार छुट्टन ने 5 दिन से कुछ भी नहीं खाया था और न ही उसका इलाज हो सका. इस कारण बीमारी के 15 दिन के अंदर ही उसकी मौत हो गई. पत्नी ऊषा ने बताया कि दो लाख रुपये कर्ज था, जो परिवार के लोगों से धीरे-धीरे लिया जा रहा था. परिवार के पास मजदूर के अंतिम संस्कार के लिए भी रुपए नहीं थे. इस कारण 24 घंटे तक उसका अंतिम संस्कार नहीं हो सका. इसी बीच भूख से मौत की खबर पता चलने पर प्रशासन हरकत में आया.

घटना के सामने आने के बाद प्रशासनिक अफसर मौके पर पहुंचे. उन्होंने अंतिम संस्कार के लिए 5 हजार रुपए और अनाज का इंतजाम करने के साथ ही पोस्टमार्टम के निर्देश दिए. जहां प्रशासन मौत की वजह बीमारी बता रहा है, वहीं मृतक के परिजन भूख से मौत होने की बात कह रहे हैं.

एडीएम ने बताया कि मृतक बीमारी से ग्रस्त था. परिवार की आर्थिक स्थिति जरूर खराब है, लेकिन मौत बीमारी के चलते ही हुई है. फिर भी मौत के सही कारणों का पता लगाने के लिए मृतक का पोस्टमार्टम कराया जा रहा है. मनरेगा की मजदूरी के रुपए नहीं मिलने की जांच कराई जा रही है.

दिल्ली के 449 प्राइवेट स्कूलों काे टेकओवर करेगी केजरीवाल सरकार

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नई दिल्ली। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल राजधानी के 449 प्राइवेट स्कूल को टेकओवर करेंगे. इसके लिए दिल्ली के उपराज्यपाल अनिल बैजल ने भी मंजूरी दे दी है. दिल्ली सरकार ने इसके लिए एलजी के पास एक प्रस्ताव भेजा था. प्रस्ताव के मंजूर हो जाने के बाद अब अभिभावकों से वसूली गयी फीस न लौटाने पर दिल्‍ली सरकार इन स्‍कूलों पर कार्रवाई कर सकेगी.

एलजी बैजल ने मंजूरी देते हुए कहा कि दिल्‍ली सरकार का यह अच्‍छा फैसला है. इससे छात्रों का भविष्य बेहतर बनेगा. वहीं, उन बच्‍चों को भी इन स्‍कूलों में पढ़ने का मौका मिलेगा जो फीस ज्‍यादा होने के कारण इन स्‍कूलों में शिक्षा नहीं ले पा रहे थे.

मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने 18 अगस्त को नियमों के खिलाफ जाकर फीस बढ़ानेवाले प्रावेट स्कूलों से दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेश का पालन करते हुए बढ़ी हुई फीस अभिभावाकों को वापस करने की अपील की थी. केजरीवाल ने कहा था कि स्कूल अगर अदालत के आदेश का पालन नहीं करते हैं तो सरकार को अंतिम विकल्प के तौर पर इन स्कूलों का प्रबंधन और संचालन अपने हाथों में लेना पड़ेगा.

गौरतलब है कि दिल्‍ली के 449 निजी स्‍कूलों पर मनमानी फीस वसूलने का आरोप था. शिक्षा निदेशालय के निर्देश के बाद भी उन्होंने स्कूली बच्चों के परिजनों से ली गयी फीस वापस नहीं की थी. इन स्कूलों में डीपीएस, स्प्रिंग डेल, संस्कृति स्कूल, एमिटी इंटरनेशनल स्कूल समेत मार्डन पब्लिक स्कूल भी शामिल हैं. वहीं, हाईकोर्ट में भी इसे लेकर याचिका डाली गयी है. अभिभावकों की शिकायत के बाद दिल्ली सरकार में शिक्षामंत्री मनीष सिसोदिया ने स्कूलों के टेकओवर की अनुमति मांगी थी.

साथ आए AIADMK के दोनों धड़े, पनीरसेल्वम बने डिप्टी सीएम

चेन्नई। कई दिनों की ऊहापोह के बाद तमिलनाडु के मुख्यमंत्री के. पलानीस्वामी और पनीरसेल्वम के नेतृत्व वाले अन्नाद्रमुक के दोनों धड़ों का विलय हो गया. AIADMK के दफ्तर में ई. पलानीस्वामी और ओ. पन्नीरसेल्वम ने इसका ऐलान किया. पन्नीरसेल्वम पार्टी के संयोजक होंगे, वहीं पलानीस्वामी को सह-संयोजक बनाया गया है. इस विलय के साथ ही पनीरसेल्वम को उप-मुख्यमंत्री बनाया गया है. पनीरसेल्वम ने सोमवार की शाम उप-मुख्यमंत्री पद की शपथ भी ले ली. उन्हें वित्त मंत्रालय और शहरी विकास मंत्रालय सौंपा गया है.

इस बीच खबर यह भी है कि पलानीस्वामी शशिकला को पार्टी से निकालने की घोषणा कर सकते हैं. संभव है कि पलानीस्वामी के नेतृत्व वाला धड़ा पार्टी प्रमुख वीके शशिकला के संबंध में कुछ घोषणा करें, क्योंकि पनीरसेल्वम समूह उन्हें पार्टी से निकाले जाने पर अड़ा हुआ है.

गौरतलब है कि शशिकला और जयललिता दोनों अच्छी दोस्त थीं और जयललिता की मौत के बाद शशिकला ने दिसंबर में पार्टी का नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया था. इस दौरान पनीरसेल्वम ने विद्रोह कर दिया. शशिकला की योजनाओं पर उस समय पानी फिर गया जब उन्हें भ्रष्टाचार के मामले में कोर्ट द्वारा चार साल की सजा सुना दी गई. जेल जाने से पहले उन्होंने नए मुख्यमंत्री के तौर पलानीस्वामी को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बिठा दिया था.

अब नहीं मिलेगा McDonald बर्गर

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दिल्ली। अमेरिकी बर्गर रेस्तरा कंपनी मैकडोनाल्ड्स की भारतीय इकाई ने अपने लोकल पार्टनर कंपनी क्नॉट प्लाजा रेस्टॉरेंट लि (सीपीआरएल) के साथ अपना व्यवसायिक करार खत्म कर दिया है. अब देश में दिल्ली समेत उत्तर और ईस्ट भारत में लगभग 169 रेस्तरां बंद हो जाएंगे क्योंकि भारतीय पार्टनर को मैकडोनाल्ड्स रेस्तरां चलाने की अनुमति नहीं रह गई है.

यह समझौता दिल्ली सहित उत्तर और पूर्वी क्षेत्र के 169 रेस्त्रां के लिए है. उद्यमी विक्रम बख्शी की अगुवाई वाली सीपीआरएल का मैकडोनाल्ड्स इंडिया से विवाद चल रहा था. इस निर्णय से कुछ सप्ताह पहले सीपीआरएल ने दिल्ली के अपने 43 मैकडोनाल्ड्स रेस्त्रां बंद कर दिए थे क्योंकि स्थानीय नगर निकाय ने मैकडोनाल्ड्स के नाम से चल रही इन दुकानों का लाइसेंस का नवीनीकरण करने से मना कर दिया था.

सीपीआरएल में बक्शी और मैकडोनाल्ड्स इंडिया आधे-आधे की भागीदार हैं. फ्रैंचाइजी समझौता खत्म किए जाने के बाद अब सीपीआरएल को अमेरिकी कंपनी के नाम, उसके व्यावसायिक प्रतीक चिन्ह, डिजाइन और उससे जुड़ी बौद्धिक संपदा का इस्तेमाल करने का अधिकार नहीं रहेगा. ये शर्तें करार खत्म किए जाने के नोटिस के 15 दिन के अंदर लागू हो जाएंगी. इस फैसले से जहां अगले कुछ समय तक भारत के बड़े हिस्से से बर्गर और फ्रेंच फ्राई की चेन बंद हो जाएगी वहीं बड़ी संख्या में लोग बेरोजगार भी हो जाएंगे.

गौरतलब है कि बीते एक दशक से अधिक समय से इस भारतीय कंपनी के साथ करार में अमेरिकी कंपनी ने बर्गर और फ्रेंच फ्राइज मार्केट में अपनी साख बना ली थी. इस ब्रांड के टक्कर में जहां कोई भारतीय ब्रांड मौजूद नहीं था.

योगी सरकार के खिलाफ सड़क पर उतरे हजारों शिक्षामित्र

लखनऊ। यूपी के शिक्षामित्रों ने प्रदेश की योगी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. सोमवार को राजधानी लखनऊ में लक्ष्मण मेला मैदान में इन्होंने जोरदार प्रदर्शन किया. प्रदेश के कई जिलों से हजारों की तादाद में शिक्षा मित्र 21 अगस्त को लक्ष्मण मेला मैदान पर पहुंचे. ये शिक्षा मित्र उच्चतम न्यायालय के निर्णय के विपरीत सहायक शिक्षक पद देने की मांग पर अड़े हुए हैं.

प्रदेश भर से आने वाले शिक्षामित्रों को उनके जिलों में ही रोकने के लिए लखनऊ के डीएम द्वारा सभी जिलों के जिलाधिकारियों और पुलिस अधिकारियों को पत्र भेजा गया था. शिक्षामित्रों की मौजूदगी के मद्देनजर मुख्यमंत्री आवास, विधान भवन, राजभवन, एनेक्सी के आसपास कड़ी सुरक्षा का इंतजाम किया गया था.

जुड़वा 2 का ट्रेलर लॉन्च, जम रहे हैं वरुण धवन

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मुंबई। बॉलीवुड एक्‍टर वरुण धवन स्‍टारर ‘जुड़वा 2’ का ट्रेलर रिलीज हो गया है. फिल्म में वरुण ने सलमान के स्‍टाइल को कॉपी करने की अच्‍छी कोशिश की है और वे शानदार लग रहे हैं. ट्रेलर में वरुण प्रेम और राजा के डबल रोल में नजर आ रहे हैं. एक टपोरी राजा है तो दूसरा प्रेम बहुत ही विनम्र. वरुण के अलावा फिल्‍म में जैकलीन फर्नांडीज और तापसी पन्‍नू भी मुख्‍य भूमिका में नजर आ रहे हैं. दोनों वरुण धवन से इश्‍क फरमाती नजर आ रही हैं. फिल्‍म में अनुपम खेर भी है. वरुण आजकल ऐसी फिल्‍मों में फोकस कर रहे हैं जो आज के यूथ को इम्‍प्रेस कर सकें.

फिल्‍म की एक और खास बात यह है कि स्‍टार्स ‘ऊंची है बिल्डिंग…’ और ‘टन टना टन…’ जैसे गानों पर थिरकते दिख रहे हैं. यह फिल्‍म साल 1997 की फिल्‍म ‘जुड़वां’ की सीक्‍वल है. ‘जुड़वा’ बॉक्‍स ऑफिस पर बड़ी हिट हुई थी. 20 साल बाद साजिद और डेविड धवन की जोड़ी ने एकबार फिर जादू बिखेरने के लिए दोबारा मोर्चा संभाला है. वरुण ने ‘जुड़वा’ फिल्म के फैन्स को निराश नहीं किया है क्योंकि कॉमेडी स्टाइल में उनका भी एक अपना ही सिग्नेचर स्टाइल है जिसे लोग खूब पसंद करते हैं.

जैकलीन फर्नांडिस ‘जुड़वा 2′ में करिश्मा कपूर वाला किरदार निभाने जा रही हैं और उन्‍होंने करिश्मा जैसा अभिनय करने के लिए उनकी कई फिल्में देखी थी. उनसे यह पूछे जाने पर कि क्या करिश्मा से उसे भूमिका निभाने के लिए कोई सलाह मिली है तो जैकलीन ने बताया था, ‘नहीं, करिश्मा से मुझे कोई सलाह नहीं दी. लेकिन मैंने उनकी कई फिल्में देखी थी. वह एक बहुत ही अच्छी अभिनेत्री हैं.’

नीतीश के गले की हड्डी बना सृजन घोटाला, लालू यादव ने मोर्चा खोला

पटना। बिहार में महागठबंधन को छोड़कर भाजपा के साथ सरकार बनाने वाले नीतीश कुमार कठघरे में हैं. लालू यादव और उनके परिवार पर भ्रष्टाचार के आरोपों के बाद महागठबंधन तोड़ देने वाले नीतीश का नाम तकरीबन 900 करोड़ रुपये के सृजन घोटाले में आ रहा है. इसने नीतीश कुमार की परेशानी बढ़ा दी है. इसके बाद लालू यादव और तेजस्वी यादव सहित विपक्षी दलों को नीतीश को घेरने का मौका मिल गया है. लालू यादव ने यह भी आरोप लगाया है कि सृजन घोटाले की आंच से बचने के लिए ही नीतीश कुमार महागठबंधन को छोड़कर भाजपा की शरण में चले गए. हाल ही में सामने आए इस घोटाले में एक एनजीओ, बैंक और कुछ बड़े सरकारी अधिकारियों की मिली भगत है. इसमें जदयू- भाजपा गठबंधन की सरकार का नाम भी आ रहा है. असल में यह मामला सरकारी खाते से गलत निकासी का है. सृजन महिला सहयोग समिति ने सरकारी विभाग और दो बैंकों के कर्मचारियों और अधिकारियों की सांठगांठ से फर्जीवाड़ा कर 884 करोड़ रुपए का चूना सरकारी खाते को लगाया था. मामला 2008 में खुला जब यहां विपिन कुमार जिलाधिकारी बनकर आएं. विपिन कुमार ने सरकारी पैसों का सृजन के खातों में ट्रांसफर को देखकर हैरत जताई थी और फौरन इस काम को रोकने की हिदायत दी थी. लेकिन इस फर्जीवाड़े को रोकने की बजाय नीतीश सरकार ने डीएम विपिन कुमार का तबादला कर दिया. इस तबादले ने साफ कर दिया कि इस मामले में बड़े लोग शामिल हैं. नीतीश कुमार का नाम आने के बाद कल रात इस मामले में गिरफ्तार मुख्य अभियुक्त कल्याण विभाग के नाजिर महेश मंडल की जेल में अचानक हुई मौत से बवाल और बढ़ गया है. इस मौत को लेकर तमाम तरह की बातें हो रही हैं. इस मौत के बाद बिहार के पूर्व उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने ट्वीट कर सृजन घोटाले की तुलना मध्य प्रदेश के व्यापमं घोटाले से की है. साथ ही ये भी आशंका जताई है कि सृजन घोटाला व्यापमं से भी ज्यादा व्यापक है. सृजन घोटाले में अब तक 18 लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है. इनमें से 11 सरकारी अधिकारी और कर्मचारी हैं, जबकि 4 लोग सृजन महिला विकास सहयोग समिति लिमिटेड के और 3 बैंककर्मी हैं. नीतीश कुमार और सुशील मोदी के कार्यकाल के दौरान हुए इस घोटाले को लेकर लालू यादव का पूरा कुनबा इन दोनों पर हमलावर है और इस्तीफे की मांग की है. लालू यादव और राबड़ी देवी ने नीतीश और सुशील मोदी का इस्तीफा देने तक संघर्ष जारी रखने का ऐलान कर दिया है. आज से बिहार विधानसभा का मानसून सत्र शुरु हो गया है और राजद ने नीतीश और सुशील मोदी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है.

दिल्ली विविः पत्रकारिता में दाखिले के लिए 23 से आवेदन शुरू

नई दिल्ली। दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) के दिल्ली पत्रकारिता विद्यालय में प्रवेश के लिए 23 अगस्त से आवेदन की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी, जो 8 सितंबर तक चलेगी. इसके लिए 17 सितंबर को ऑल इंडिया स्तर पर प्रवेश परीक्षा होगी. आवेदन के लिए एक शुल्क निर्धारित किया गया है, जो सामान्य और ओबीसी वर्ग के उम्मीदवारों के लिए 500 रुपए और अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति व दिव्यांग वर्ग के उम्मीदवारों के लिए 250 रुपए है.

दिल्ली पत्रकारिता विद्यालय में विशेष कार्य अधिकारी डॉ. एमएम योगी के मुताबिक, डीयू साल 2022 में अपनी स्थापना  के 100 वर्ष पूरे करने जा रहा है. ऐसे में विश्वविद्यालय चाहता है कि शताब्दी वर्ष समारोह को दिल्ली पत्रकारिता विद्यालय में पढ़े छात्र भी कवर करें. इस पत्रकारिता विद्यालय में बैचलर ऑफ जर्नलिज्म और मास्टर ऑफ जर्नलिज्म के हिंदी व अंग्रेजी पाठ्यक्रम आयोजित किए जाएंगे. दोनों भाषाओं के लिए 60-60 सीटें उपलब्ध हैं.

पाठ्यक्रम के दौरान चार विदेशी भाषाएं (फ्रेंच, स्पेनिश, चीनी और अरबी) और दो क्षेत्रीय भाषाएं (तमिल और बंगाली) भी पढ़ाई जाएंगी. इसमें हर विद्यार्थी को एक विदेशी और एक क्षेत्रीय भाषा पढ़ना अनिवार्य होगा. यह च्वाइस बेस्ड क्रेडिट सिस्टम (सीबीसीएस) पर आधारित है. पांच साल के इंटीग्रेटिड पाठ्यक्रम में 28 कोर पाठ्यक्रम होंगे. विद्यार्थियों को कक्षाओं के लेक्चर के लिए 50 क्रेडिट और प्रोजेक्ट व इंटर्नशिप के लिए भी 50 क्रेडिट दिए जाएंगे.

कक्षा 12 में 50 फीसद अंक लाने वाले उम्मीदवार इस पाठ्यक्रम के लिए आवेदन कर सकते हैं. वहीं मास्टर ऑफ जर्नलिज्म में आवेदन करने के लिए उम्मीदवार के स्नातक स्तर पर 60 फीसद अंक होने चाहिए. ऑल इंडिया लेवल पर आयोजित होने वाली प्रवेश परीक्षा के आधार पर दाखिला दिया जाएगा. परीक्षा में सामान्य ज्ञान, समसामयिक और विश्लेषण क्षमता आंकने से संबंधित प्रश्न पूछे जाएंगे. दिल्ली पत्रकारिता विद्यालय की कक्षाएं विश्वविद्यालय स्टेडियम में स्थित सीआइसी बिल्डिंग में होंगी.