हमें भारत में छुआछूत, दंगा और बाबासाहेब म्यूजियम चाहिए

जर्मनी और रवांडा जैसे कुछ अफ्रीकी देशों में कई सारे होलोकॉस्ट म्यूजियम हैं स्कूल कॉलेज के बच्चों को वहां दिखाया जाता है कि हिटलर के दौर में या हुतु तुत्सी जातीय हिंसा के दौर में किस नंगाई का नाच हुआ था, कैसे पढ़े लिखे समझदार लोग जानवर बन गए थे और एकदूसरे की खाल नोचने लगे थे.

मरे हुए लोगों को खोपड़ियां, कंकाल, जूते, कपड़े, उनके बर्तन, फर्नीचर इत्यादि सब सजाकर रखे गए हैं ताकि अगली पीढ़ी देख सके कि वहशीपन क्या होता है और धार्मिक नस्लीय जातीय हिंसा से क्या क्या संभव है.

भारत मे भी हर जिले में भी ऐसा ही कम से कम एक “दंगा, छुआछूत और बाबा म्यूजियम” होना चाहिए जिसमें उस इलाके में हुए धार्मिक जातीय दंगों का विवरण और फोटो इत्यादि रखे गए हों. छुआछूत के आधार पर उस इलाके के पाखण्डी सवर्ण द्विजों ने सालों साल तक कैसे अपनी ही स्त्रियों और दलितों, यादवों, अहीरों, कुर्मियों, कुम्हारों, किसानों, मजदूरों, शिल्पियों को जानवर सी जिंदगी में कैद रखा, कैसे मूर्ख बनाकर गरीबों की जमीनों और औरतों को लूटा- ये सब बताया जाना चाहिए.

कैसे यज्ञ हवन और पूजा पाठ करने वालों, ज्योतिषियों, गुणियों कान फूंकने वाले ओझाओं ने औरतों और शूद्रों दलितों को शिक्षा और रोजगार सहित पोष्टिक भोजन और जीवन के अधिकार से वंचित रखा ये दिखाया जाना चाहिए.

कितने बाबाजन, योगियों, रजिस्टर्ड भगवानों और धर्मगुरुओं ने कितने बलात्कार किये, कितने मर्डर किये, कितनी जमीने दबाई कब कोर्ट ने उन्हें दबोचा, वे कितने साल जेल में रहे- ये सब विस्तार से बताना चाहिए.

अगली पीढ़ी अगर इन सब मूर्खताओं को करीब से देख समझ ले तो उसे कावड़ यात्रा, कार सेवा, देवी देवता के पंडालों, धार्मिक दंगों, बाबाओ के बलात्कार और जातीय धार्मिक दंगों सहित छुआछूत भेदभाव और अंधविश्वास से बचाया जा सकता है.

लेकिन दुर्भाग्य की बात ये है कि ये सब बताने की बजाय भारतीय परिवार अपने बच्चों को अपने मूर्ख पारिवारिक गुरुओं, देवी देवताओं के पंडालों और आत्मा परमात्मा की बकवास सिखाने वाले शास्त्रों की गुलामी सिखाते हैं. हर पीढ़ी बार बार उसी अंध्विश्वास, छुआछूत और कायरता में फंसती जाती है.

भारत मे व्यक्ति और समाज की चेतना का एक सीधी दिशा में रेखीय क्रमविकास नहीं होता बल्कि यहां सब कुछ गोलाई में घूम फिरकर वहीं का वहीं पुराने दलदली गड्ढे में वापस आ जाता है. इसीलिए ये मुल्क और इसकी सभ्यता कभी आगे बढ़ ही नहीं पाती, हर पीढ़ी उन्हीं बीमारियों में बार बार फसती है जिन्हें यूरोप अमेरिका के समाज पीछे छोड़ चुके हैं.

भारत के धर्म और संस्कृति को इतना सक्षम तो होना ही चाहिए कि अपने लिए नए समाधान न सही कम से कम नई समस्याएं ही पैदा कर ले. बार बार उन्हीं गड्ढों में गिरना भी कोई बात हुई?

Sanjay Jothe M.A.Development Studies, (I.D.S. University of Sussex U.K.) PhD. Scholar, Tata Institute of Social Sciences (TISS), Mumbai, India.

जब बसपा के एक दिग्गज नेता पार्टी छोड़ गए तो कांशीराम जी ने कहा…

बहुजन समाज पार्टी के लिए पिछले कुछ साल ठीक नहीं रहे हैं. उसे पहले लोकसभा चुनाव में हार मिली, फिर उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में भी पार्टी जीत नहीं सकी. पार्टी से जुड़े कुछ पुराने नेता भी पार्टी छोड़ कर चले गए. उन्होंने बसपा पर तमाम आरोप भी लगाएं. पार्टी छोड़ कर गए नेता बसपा में रहने के दौरान अम्बेडकरवाद की कसमें खाते थे और खुद को मान्यवर कांशीराम का अनुयायी बताते थे. लेकिन जब वो बहुजन समाज पार्टी को छोड़कर दूसरे दलों में चले गए तो उनका चोला ही बदल चुका है. बात करते हैं बहुजन नायक मान्यवर कांशीराम से जुड़े एक और किस्से की. और आपको बताते हैं कि जब कांशीराम जी के समय में कोई नेता पार्टी छोड़ जाता था तो मान्यवर क्या कहते थे? बात उन दिनों की है, जब मान्यवर कांशीराम बहुजन समाज पार्टी को देश भर में बढ़ाने में लगे हुए थे. उस दौरान एक बार एक बड़ा आदिवासी चेहरा अरविन्द नेताम पार्टी से अलग हो गए. नेताम बसपा छोड़कर कांग्रेस में चले गए. आमतौर पर किसी बड़े चेहरे के पार्टी से अलग हो जाने के बाद कुछ दिनों तक पार्टी में हलचल रहती है. लेकिन नेताम के कांग्रेस से अलग हो जाने के बावजूद भी कांशीराम जी को कोई फर्क नहीं पड़ा. पार्टी में भी सबकुछ सामान्य तौर पर चलता रहा. पत्रकार जो इसे मुद्दा बनाने में लगे थे, उन्हें बड़ी निराशा हुई. उन्हें चटपटी खबरें बनाने को नहीं मिल रही थी, क्योंकि कांशीराम जी उस नेता पर कोई भड़ास नहीं निकाल रहे थे. पत्रकारों से नहीं रहा गया. कांशीराम जी से पत्रकारों ने पूछा- साहब आपकी पार्टी का दिग्गज नेता पार्टी छोड़कर चला गया, लेकिन आपको चिंता ही नहीं है. आप उसको मना क्यों नहीं लेते? साहब ने जवाब में कहा- भाई पहली बात तो वो माना हुआ होता तो पार्टी छोड़ता ही नहीं. दूसरी बात अब आप लोगों ने उसको दिग्गज़ बना दिया तो अब उसको मनाने की रेट भी दिग्गज़ हो गयी है जो कि मेरे पास है नहीं. इसीलिए मैं इसके जाने की विदाई पार्टी देता हूं ताकि किसी दूसरी पार्टी में रहकर मेरी सिखाई बातों पर थोड़ा बहुत तो अमल करेगा. वो भी मेरे मिशन का ही हिस्सा है. कांशीराम जी ने कहा कि बसपा में किसी को लालची रस्सी से बांधकर नहीं रखा जाता और ना ही किसी नेता को नोट की कोर दिखाकर बुलाया जाता है. इसीलिए जिस किसी को बसपा समझ में आये वो यहां काम करे. यहां आने जाने वालों के लिए दरवाज़े हमेशा खुले रहते हैं. असल में कांशीराम हमेशा इस बात पर जोर देते थे कि बहुजन समाज पार्टी एक मिशन है और मिशन में किसी को जबरदस्ती बांध कर नहीं रखा जा सकता. बहुजन समाज पार्टी के बनने से लेकर अब तक तमाम नेता पार्टी छोड़ कर गए तमाम नेताओं को निकाल दिया गया, लेकिन यह राजनैतिक आंदोलन आज भी चल रहा है. क्योंकि मान्यवर कांशीराम ने बहुजन समाज पार्टी को ऐसे तैयार किया था कि इसमें बहुजन समाज हमेशा सबसे ऊपर रहे.

शायद यही वजह है कि नेता बदलते रहते हैं और राजनैतिक दल चलता रहता है. मान्यवर कांशीराम यह भी कहा करते थे कि कोई किसी को नेता बना नहीं सकता, नेता खुद अपनी प्रतिभा से सामने आता है.

राम रहीम के अलावा इन बाबाओं पर भी चल रहे हैं केस

0

बाबा गुरमीत राम रहीम पर फैसला आया जिसमें उन्हें बलात्कार जैसे घिनौने कृत्य के लिए दोषी पाया गया है. भारत में ऐसे बाबाओं का इतिहास कोई नया नहीं है बल्कि ये काफी पहले से चलते आ रहा है. बाबा राम रहीम पर पंचकुला कोर्ट ने हाल ही में फैसला सुनाया जिसमें वे बलात्कार को लेकर दोषी पाए गए. बाबा राम रहीम के अलावा भी कई ऐसे बाबा हैं जिन पर गंभीर आरोप लग चुके हैं. आइए आपको इनके बारे में बताते हैं…

आसाराम बापू आसाराम बापू अपने भक्तों के लिए भगवान से भी ज्यादा बड़कर माने जाते थे. आसाराम बापू का पूरा नाम आसूमल थाऊमल हरपलानी है. इनका जन्म 17 अप्रैल 1941, नवाबशाह जिला, सिंध प्रान्त में हुआ था. आसाराम बापू फिलहाल तो जेल मे हैं लेकिन पहले ये एक कथावाचक और आध्यात्मिक गुरू थे जो अपने शिष्यों को एक सच्चिदानन्द ईश्वर के अस्तित्व का उपदेश देते हैं. उन्हें उनके भक्त प्रायः बापू के नाम से सम्बोधित करते हैं.

आसाराम 400 से अधिक छोटे-बड़े आश्रमों के मालिक हैं. उनके शिष्यों की संख्या करोड़ों में है. आसाराम बापू सामान्यतः विवादों से जुड़े रहे हैं जैसे आपराधिक मामलों में उनके खिलाफ दायर याचिकाएँ, उनके आश्रम द्वारा अतिक्रमण, 2012 दिल्ली दुष्कर्म पर उनकी टिप्पणी एवं 2013 में नाबालिग लड़की का कथित यौन शोषण. उन पर लगे आरोपों की पर्त एक के बाद एक खुलती जा रही है. आरोपों की आँच उनके बेटे नारायण साईं तक पहुँच चुकी है जो अभी भी फरार है. न्यायालय ने उन्हें न्यायिक हिरासत में रखने का निर्णय लिया है. फ़िलहाल आसाराम जोधपुर जेल की सलाखों के पीछे कैद हैं.

बाबा रामपाल बाबा रामपाल अपने आप को 445 साल बाद प्रकट होनेवाल वो हिंदू संत करार देते थे जिसका जिक्र सन 1555 में प्रसिद्ध भविष्यवक्ता नास्त्रेदमस ने किया था. इन्होने कहा था कि एक ऐसा हिंदू संत प्रकट होगा, जो पूरी दुनिया में भारत को विश्व गुरू के तौर पर स्थापित करेगा और साल 2006 ये उरूज में आए. रामपाल अपने आप को वही संत बताते थे. बाबा रामपाल अपनी अय्याशी और अपने हाईटेक आश्रम को लेकर सुर्खियों में आएं.

इन्होने अपने आश्रम में हर जगह कैमरे लगा रखे थे. और इनके आश्रम में अय्याशी के लिए हर चीज थी, जैसे बुलेटप्रुफ सिंहासन, फाइवस्टार बेडरूम और आश्रम, हाईटेक तहखाना. इन्हे भी जेल की हवा खानी पड़ी.

निर्मल बाबा भक्तों पर कृपा बरसाने वाले निर्मल बाबा लोगों के बीच बहुत जल्दी ही अपनी जगह बना पाएं थे. ये लोगों के दुख कम करते उनकी गरीबी भी दूर करते थे और उन पर कृपा बरसाते थे. निर्मल बाबा का पूरा और वास्तविक नाम निर्मलजीतसिंह नरूला हैं. इनके खिलाफ भी शिकायत दर्ज की गई थी कि इनके दो खातों करोड़ों रूपयें जमा है.

इस कमाई का जरिया भी उनके भक्त ही थे. उनके समागम में भक्तों के आने का शुल्क और दसवंत के जरिए उन्होने करोड़ो रूपयें का कारोबार किया. निर्मल बाबा के लिए ये सब एक बिजनेस जैसा ही था. कई लोगो को उनके द्वारा बताएं टिप्स से फायदा नही हुआ तो उन्होने इसकी शिकायत की. इससे पहले भी वे कई बिजनेस कर चुके है लेकिन उन्हे कोई सफलता हासिल नही हुई. एक भक्त ने आस्था और विश्वास के साथ खिलवाड़ को लेकर इन पर आरोप लगाएं तभी से ये सुर्खियों में हैं.

नित्यानंद नित्यानंद बाबा 2010 में एक सेक्स सीडी के कारण सुर्खियों में आएं. जो 32 साल की उम्र में ही दक्षिण भारत के गुरुओं के बीच बहुत ऊंचा रुतबा हासिल कर चुका था. हम बात कर रहे हैं स्वामी नित्यानंद की. इन आरोप लगे कि सीडी में नित्यानंद एक मशहूर अदाकारा के साथ थे-साथ ही ये सवाल उठने लगे कि नित्यानंद योगी हैं या ढोंगी.

स्वामी नित्यानंद सेक्स स्कैंडल के वक्त महज 32 साल की उम्रवाले स्वंयभू तांत्रिक, अद्वैत गुरु, जिसका बैंगलुरु से 50 किलोमीटर दूर 29 एकड़ में फैला विशाल आश्रम था. वो मदुरै के 1500 साल पुराने शैव मठ मदुरै अधीनम का उत्तराधिकारी भी था. बाद में उसे इस पद से हटा दिया गया. देश-विदेश में उनके लाखों भक्त थे. सेक्स सीडी सामने आते ही स्वामी नित्यानंद का सिंहासन डोल गया. नित्यानंद के आश्रम ने वेबसाइट पर भी बयान जारी किया कि सीडी साजिश और अफवाहों का घालमेल है. नित्यानंद अब करीब 34 साल के हैं. स्वंय भू तांत्रिक बनने से पहले वो तमिलनाडु के थिरुनामलाई के रहने वाले राजशेखर थे, लेकिन 22 साल की उम्र में नित्यानंद ने आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने का दावा किया. धीरे-धीरे वो एक बड़े आश्रम के मालिक बन गए. अदालत में वो आज भी ऐसे तमाम आरोपों से घिरे हुए हैं, जिनकी वहज से वो योगी की बजाय ढोंगी नजर आने लगे हैं.

 सारथी बाबा सारथी बाबा जिनका वास्तविक नाम संतोष राउल हैं. ये स्वयंभू साधू है. 2015 में सोशल मीडिया पर इनकी तस्वीरें वायरल हुई थी. इन तस्वीरों में एक आदमी जींस और टी-शर्ट पहने हुए है. एक स्थानीय न्यूज चैनल का दावा था कि सारथी बाबा और एक महिला ने चार सितारा होटल में एक साथ तीन दिन बिताए हैं.

चैनल ने सारथी बाबा की आईडी कार्ड को सबूत के तौर पर पेश किया था. इसके बाद उन्हे उड़ीसा से धोखाधड़ी और कई दूसरें आरोपों को लेकर गिरफ्तार किया गया. उन्होंने कहा कि मैंने सिर्फ शांति का संदेश दिया है और कोई अपराध नहीं किया. उल्लेखनीय है कि संतोष राउल से बाबा बनने के बाद इस धर्मगुरु ने खुद को कृष्ण का अवतार कहना शुरू कर दिया.

इच्छाधारी संत बाबा भीमानंद पैसे ब्याज पर देने के धंधे से भीमानंद ने कई सौ करोड़ रुपए की जायदाद और काला खजाना जुटाया. सांप का साथ होना स्वामी भीमानंद की पहचान बन गया. ये शख्स भगवा चोला ओढ़कर दुनिया को अच्छा बनने का प्रवचन देता था. जब ये गेरुआ वस्त्र पहन कर प्रवचन देता था तो इसका नाम होता था- इच्छाधारी संत स्वामी भीमानंद महाराज चित्रकूटवाले.

लेकिन सांप वाला ये इच्छाधारी बाबा रात ढलते ही अपने असली रूप में आ जाता था. गेरुआ वस्त्र उतर जाता था, पैरों पर टाइट जींस, जिस्म पर नए फैशन की टीशर्ट. हाथों में मोबाइल और महंगी कार से रात के अंधेरे में जिस्म के धंधे का संचालन. ये 600 कॉलगर्ल के साथ जिस्मफरोशी का धंधा चलाते थे. इनका सेक्स रेकेट पकड़ा गया और आज ये जेल की सलाखों के पीछे है.

राधे मां राधें मां अश्लीलता फैलाने के आरोप में प्रतिबंधित किए जाने को लेकर हाल ही में चर्चा में आई थी. इन पर दहेज उत्पीड़न का भी आरोप हैं. राधे मां ग्लैमरस धर्मगुरू है. इनका वास्तविक नाम सुखविंदर कौर है. इनका जन्म 1965 में पंजाब जिले के गुरूदासपुर के दोरंगला गांव में हुआ था. सुखविदंर की शादी सत्रह साल की उम्र में हुई थी. 22 साल की उम्र में उनके छह बच्चे थे.

इनके घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी तो पति कतर काम करने के लिए चले गए. जिसके बाद इन्होने अध्यात्म की तरफ रूख किया और महंत रामदीन की शिष्या बन गई. यही पर इन्हे राधे नाम मिला. वे उनके साथ सत्संग में जाने लगीं और लोगों से अपनी जान-पहचान बनाने लगीं. कुछ दिनों में उनके खुद के शिष्यों की संख्या बड़ गई और उन्हे राधें मां कहा जाने लगा. राधे मां पर हाल ही में दहेज उत्पीड़न और अश्लीलता फैलाने का आरोप है. जिसकी वजह से ये सुर्खियों में बनी हुई है.

 

‘आजादी के 70 साल बाद भी दलितों पर हो रहे जुल्म’

0

कपूरथला। देश में जमींदारों की ओर से दलित समाज को बार-बार निशाना बनाया जा रहा है, आए दिन ऐसी घटनाएं हो रही है जिससे दलित समाज का जीना दूभर हो रहा है. आजादी के 70 साल बीत जाने के बाद भी दलितों की बस्तियों को आगजनी के हवाले कर देना और तबाह कर देना कोई नई बात नहीं है.

यह बात बाबासाहेब डॉ. बीआर अम्बेडकर सोसायटी के प्रधान कृष्ण लाल जस्सैल और महासचिव धर्मपाल पैंथर ने अमृतसर के गांव टपियाला में घटित गोली कांड घटना की निंदा करते हुए कही. टपियाला के दलित भाईचारे को इन प्लाटों की मालकी सरकार की ओर से 5-5 मरले अलॉट किए गए थे. गरीब परिवारों ने मेहनत करके अपने घरों को बनाया था. जिन्हें जमीदारों ने तबाह कर दिया. दलितों के साथ यह धक्का सरकारी तंत्र की शह पर गुंडों की साजिश के तहत किया गया.

घटना की कड़े शब्दों में निंदा करते हुए एससी/एसटी कर्मचारी एसोसिएशन के जोनल प्रधान जीत सिंह, जोनल वर्किंग प्रधान रणजीत सिंह, डॉ. अंबेडकर सोसायटी के सीनियर उप प्रधान संतोख राम जनागल, निरवैर सिंह कश्मीर सिंह आदि ने सांझे तौर पर कहा कि गुंडो द्वारा चलाई गई गोलियों में दलित सरदार सुखेदव सिंह शहीद हो गया.

सरदार सुखदेव सिंह की शहीदी टपियाला के लोगों के लिए क्रांति का पथ बनेगी. आज देश में लोकतंत्र की जगह गुंडातंत्र ने ली है. सरकार दलित समाज पर हो रहे जुल्मों के प्रति गंभीर नजर नहीं रही. जिस करके अपराधियों के हौसले बुलंद होते जा रहे हैं. एक तरफ पंजाब सरकार दलित हितैशी होने का ढिंढोरा पीट रही है और दूसरी तरफ सरकारी सरपरस्ती के नीचे दलित समाज को लूटा और कूटा जा रहा है.

उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार से पहले भी कई बार मांग की जा चुकी है कि एससी/एसटी लोगों पर बढ़ रहे जुल्मों को ध्यान में रखते हुए विशेष अदालतों (फास्ट ट्रैक कोर्ट) का गठन किया जाए ताकि गुंडों को भारतीय संविधान की धाराओं के तहत सजा का प्रावधान हो सके और पीड़ित परिवारों को शीघ्र न्यास मिल सके.

उन्होंने पंजाब सरकार से अपील की है कि गोली का शिकार हुए सुखदेव सिंह के वारिसों को 25 लाख रुपए की आर्थिक सहायता प्रदान की जाए और बेघर लोगों को मकान बनाकर दिए जाए.

साभारः दैनिक भास्कर

रामपाल दो मामले में हुआ बरी, लेकिन अब भी रहना होगा जेल में

0

हिसार। बाबा रामपाल के लिए बड़ी खबर आई है. बाबा को दो केसों में बरी कर दिया गया है. रामपाल पर दो क्रिमिनल केस थे. पहले केस लोगों को बंधक बनाने का था. दूसरा केस पुलिस पर हमला करने का था. लेकिन देशद्रोह और हत्या का मुकदमा उनपर चलता रहेगा. सतलोक आश्रम में जब रामपाल को पुलिस पकड़ने आई थी तब वहां पुलिस पर हमला हुआ था. उसके बाद जिन लोगों को बाहर निकाला गया था उन्होंने रामपाल पर बंधक बनाने का आरोप लगाया था.

बाबा के खिलाफ दर्ज FIR नंबर 426 और 427 पर जज मुकेश कुमार सुनवाई कर रहे थे. रामपाल हिसार सेंट्रल जेल नंबर-1 में मौजूद थे. वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए कोर्ट की कार्यवाही हुई है. इस फैसले के मद्देनजर हिसार में धारा 144 लगाई गई थी. बीते बुधवार को रामपाल के खिलाफ दर्ज FIR नंबर 201, 426, 427 और 443 के तहत पेशी हुई थी.

जानकारी के मुताबिक, रामपाल पर FIR नंबर 426 में सरकारी कार्य में बाधा डालने और 427 में आश्रम में जबरन लोगों को बंधक बनाने का केस दर्ज है. FIR नंबर 426 IPC की धारा 323 (1 साल कैद), धारा 353 (3 साल कैद), धारा 186 (3 साल कैद) और धारा 426 (3 माह कैद) के तहत दर्ज है. वहीं, FIR नंबर 427 धारा 147 (1 साल कैद), धारा 149 (1 साल कैद), धारा 188 (1 साल कैद) और धारा 342 (1 साल कैद) के तहत दर्ज है. इन दोनों मामलों में प्रीतम सिंह, राजेंद्र, रामफल, वीरेंद्र, पुरुषोत्तम, बलजीत, राजकपूर ढाका, राजकपूर और राजेंद्र को भी आरोपी बनाया गया है.

क्या है हत्या का मामला 2006 में शुरू हुआ था. तब रामपाल ने सत्यार्थ प्रकाश (आर्य समाज की किताब) के कुछ हिस्से पर आपत्ति जताई थी. इसकी वजह से रामपाल और आर्य समाज को मानने वाले कुछ लोगों में झड़प हो गई. आर्य समाज के लोगों ने रोहतक में मौजूद रामपाल के आश्रम को बंद करने की कोशिश की. फिर कथित रूप से रामपाल के समर्थकों ने गोलियां चला दी. जिसमें तीन लोगों की जान गई और 160 जख्मी हो गए.

राम रहीम के मामले में तो उसके दोषी घोषित होने के बाद हिंसा हुई लेकिन रामपाल को तो पकड़ना भी पुलिस के लिए आसान नहीं था. बात 2014 की है. एक क्रिमिनल केस में रामपाल को 43 बार कोर्ट में हाजिर होने के लिए कहा जा चुका था लेकिन वह नहीं आया. इसके बाद उसे गिरफ्तार करने के लिए पुलिस हिसार के बरवाला वाले आश्रम पहुंची थी. वह जगह चंडीगढ़ से 200 किलोमीटर दूर है. वहां बाबा के 15,000 समर्थक मौजूद थे जिन्होंने पुलिस पर हमला कर दिया. पुलिस अंदर नहीं जा पा रही थी.

लगभग दो हफ्ते तक बड़े से गेट से बंद आश्रम के पीछे लोग छिपे रहे. फिर पुलिस ने वहां बिजली और पानी की सप्लाई काट दी. उसके बाद जब खाना खत्म होने लगा तब लोग धीरे-धीरे बाहर आने लगे. कई लोगों का तो कहना था कि उनको अंदर कैद कर लिया गया था और मानव ढाल की तरह इस्तेमाल किया गया था. पूरी घटना में 200 लोग जख्मी हुए थे. छह लोग मारे गए थे. जिसमें पांच महिलाएं और एक बच्चा भी शामिल था. रामपाल के समर्थकों ने अंदर से पुलिस पर गोलियां, पत्थर सब चलाए थे. पेट्रोल बम और एसिड बम भी फेंके गए थे.

रामपाल फिलहाल जेल में है. उसे 2014 में गिरफ्तार किया गया था. 67 साल के रामपाल पर मर्डर का भी एक केस है. रामपाल पर 11 साल पहले एक साजिश रचने का आरोप है. जिसमें उसके एक समर्थक ने रोहतक में गांववालों पर गोलियां चला दी थीं. जिसमें एक की मौत हो गई थी और कई जख्मी हो गए थे. खट्टर सरकार आने के बाद पहली बार राज्य में ऐसी घटना हुई थी. इसपर बीजेपी की काफी किरकिरी हुई थी.

जयप्रकाश लीलवानः असमय चला गया अपने समय से आगे का कवि

23 अगस्त 2017 को दलित लेखक संघ के अध्यक्ष कर्मशील भारती का मेरे पास फोन आया कि लीलवान जी को क्या हो गया, उनकी तबियत ख़राब थी क्या? कुछ बहकी-बहकी सी बातें कर रहे थे. मैंने कहा– नहीं तो अभी कुछ दिन पहले तो मेरी मुलाकात हुई थी. बिलकुल ठीक ठाक थे. मैंने उनके सेल फ़ोन पर फोन मिलाया तो नोट रीचेबल था. दूसरा स्विच ऑफ था. लगातार प्रयास के बाद भी उनसे संपर्क नहीं हो पाया. मैंने दिलीप कठेरिया और फिर सूरज बडत्या को संपर्क किया. दिलीप ने भी कुछ बहकी-बहकी बातों का जिक्र किया. फिर तो दिन भर उनके गाँव-घर, दोस्त, ऑफिस, पत्नी इत्यादि जहाँ भी मेरे संपर्क हो सकते थे, मैंने प्रयास किया लेकिन उनका कोई पता नहीं चला. अंततः उनके ऑफिस और पत्नी से संपर्क से पता चला कि उनकी तबीयत पिछले कई दिनों से ठीक नहीं थी. उनकी पत्नी ने बताया कि वे आज सुबह लगभग चार बजे अपनी माँ से मिलने गाँव जाने के लिए मुझसे जिद करके निकले थे.

अजीब-अजीब से ख्यालों में मुझे रात भर लगभग नींद नहीं आयी. मेरी पत्नी और बच्चे भी चिंतित थे. रात के लगभग पौने तीन बजे मेरे फोन की घंटी बजी और मैंने दूसरी-तीसरी घंटी में ही फोन उठाया तो किसी पुलिस वाले का फोन था. उन्होंने बताया कि आप लीलवान जी को जानते हैं? हाँ, मेरे मित्र हैं. उनका एक्सीडेंट हो गया है, वे सड़क पर रोड के किनारे बेहोशी की हालत में हमें मिले थे. हमने उन्हें गुड़गाँव के सिविल अस्पताल में भर्ती कराया है. उन्होंने अपना नाम एस एच ओ अजय वीर सिंह बताया. मैंने उनसे पूछा – आपको मेरा फ़ोन कहाँ से मिला. लीलवान जी के फ़ोन से मैंने आपका नंबर लिया है. उनका फोन टूट गया है. उसकी सिम से मैंने ये नंबर लिया है और हमने बहुत सारे लोगों को इसी तरह संपर्क किया है.

ये सुनकर मानों मेरे पैरों से ज़मीन किसक गयी. मैंने तुरंत अपनी पत्नी और बच्चों को बताया और उनकी पत्नी, दिलीप जी, उनके बड़े भाई के घर पर इस हादसे की खबर दी. मैं सिविल अस्पताल के लिए तैयार ही हो रहा था कि मैंने दोबारा उनके भाई के घर फोन किया तो पता चल कि वे यहाँ तो नहीं हैं. यहाँ के डॉक्टर उन्हें एम्स के ट्रामा सेंटर लेकर गए हैं. मैंने कहा – आप लोग वहीँ पहुंचें मैं वहीँ पहुँचता हूँ. लगभग आधे घंटे के अन्दर मैं ट्रामा सेंटर पहुँच गया. मैंने देखा लीलवान जी बेहोशी की हालत में थे. उनका सी टी स्कैन कराया गया. डॉक्टरों से पता चला कि उनकी हालत बेहद चिंताजनक है. इस बीच उनके घर के लोग पहुँच गए, दिलीप जी भी आ गए. उस दिन के बाद वे कभी होश में नहीं आये. ये एक हादसा था या इसके पीछे कोई गहरी साजिश है यह कहना मुश्किल है. अगर ये साजिश है तो इसके पीछे निश्चित ही उन ताकतों का हाथ हो सकता है जिनके विरोध में उनका पूरा कविता कर्म हो रहा था. लीलवान जी से मेरी मुलाकात मेरे गाँव में 2 जून 2002 को मेरे गाँव राजोकरी में बाबासाहेब की प्रतिमा की स्थापना के समय हुई थी और मुझे याद है कि उन्होंने अपना वक्तव्य अंग्रेजी में दिया था. संभवतया उन्हें उस समय प्रोफ़ेसर तुलसी राम लेकर आये थे जो उस कार्यक्रम के मुख्य वक्ता के तौर पर शामिल हुए थे. गाँव के लोगों को भले ही उनकी बात भले ही समझ में नहीं आयी हो लेकिन उनकी बातों में व्यवस्था के प्रति जो गुस्सा और समाज के प्रति चिंता थी वह आसानी से समझी जा सकती थी. यद्यपि उनकी पोस्टिंग ज्यादातर दिल्ली से बाहर ही रही लेकिन जब भी वे दिल्ली आते तो अक्सर उनकी कविताओं में व्यवस्था के प्रति व्याप्त असंतोष लगातार और गहरा होता गया.

इधर, 2014 के बाद जब से नयी सरकार का गठन हुआ, उनकी कविता प्रखर से प्रखरतर होती चली गयी. समस्त हिन्दीलोक में लीलवान को मैंने जहाँ एक बेहद शांत व्यक्ति के रूप में पाया वहीँ कवि और आलोचक के रूप में उनकी कविता और आलोचना अपने उस उत्कर्ष पर पहुँच रही थी जो अब तक न केवल सम्पूर्ण दलित साहित्य बल्कि गैर-दलित साहित्य में भी दूर-दूर तक उनका कोई सानी नहीं था. संभवतया अन्दर ही अन्दर लोगों को इस बात पर यकीन नहीं हो पा रहा था कि हिंदी जगत और समस्त भारतीय भाषाओं के लिए दिए जाने वाले हिंदी, साहित्य अकादमी और ज्ञानपीठ के पुरस्कारों के लिए भले वे नामित नहीं हुए हों पर इन सबसे उपर अन्तर्राष्ट्रीय सम्मान के लिए उनका नामित होना कम अचरज की बात नहीं थी. और वे इसके लिए खासे उत्साहित थे. क्यों न हो, किसी दलित लेखक का वहां पहुंचना, इस बीहड़ सामाजिक-सांस्कृतिक भारतीय व्यवस्था में एक दु:स्वप्न जैसा था.

11 नवम्बर 1966 को दिल्ली के बेर सराय में जन्मे जय प्रकाश लीलवान मूलतः हरियाणा के बहादुरगढ़ के पास निलोठी गाँव (जिला झज्जर) के थे. उनकी शिक्षा-दीक्षा दिल्ली में और एमए, एमफिल जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय से हुई. उनकी कविताओं में ‘अब हमें ही चलना है’ (2002), ‘नए क्षितिजों की ओर’ (2009), ‘समय की आदमखोर धुन’ (2009), ‘ओ भारत माता! हमारा इंतजार करना’ (2013), ‘लबालब प्यास’ (2017), ‘कविता के कारखाने में’ (2017), ‘धरती के गीतों का गणित’ (2017), ‘गरिमा के गीतों का गणित’ (2017), ‘मेरे देश के गुलामों के गीत’ तथा ‘हमारी सहस्राब्दी के समयों की आदमखोर धुन’ (जिसका उन्होंने अंग्रेजी में स्वयं अनुवाद किया– Songs of Slaves from My Country and the Man-Eater Tune of Times of Our Millennium) प्रमुख है. 26 अगस्त, 2017 को गुडगाँव के मेदंता अस्पताल में वे जिन्दगी से लड़ते लड़ते हार गये.

निश्चित तौर पर लीलवान जी की कविता अपने समय से बहुत आगे की कविता है. मेरा विश्वास है कि जब उनके सम्पूर्ण रचना कर्म का मुल्यांकन होगा निश्चित ही वे अब तक के सारे स्थापित मानदंड धाराशाई हो जायेंगे. उनकी कविताओं पर कुछ महत्वपूर्ण रचनाकारों, आलोचकों की बानगी देखिये – एक और वर्तमान के लगभग पूरी दुनिया फासीवादी-भजन, जातिवादी-दमन और पूंजीवादी-पतन तथा शोषण के नए-नए संस्करण देने में मगन और संलग्न है तो दूसरी और लगभग अकेला खड़ा कवि उपरोक्त के पूरा झूट-झाठ और तामझाम की आचार-संहिताओं के समानांतर नयी दुनिया के लिए नए आचरण का पूरा व्याकरण और सद्ज्ञान के विज्ञान का महाकाव्यात्मक उपहार लेकर आया है (प्रो. नित्यानंद तिवारी). भौतिकी के क्षेत्र में डायनामाईट का आविष्कार अल्फ्रेड नोबेल ने किया था मगर साहित्यिक-अभिव्यक्तियों के भाषिक-डायनामाईट का आविष्कार निश्चिय ही लीलवान के जीनियस कवि द्वारा घटित हुआ है. जय प्रकाश कर्दम ने उनके साहित्य को भविष्य का घोषणापत्र कहा है. सूरज बडत्या उन्हें भरी-पूरी कविता के अपवाद और उस्ताद दोनों मानते हैं. प्रो. अजमेर सिंह काजल के शब्दों में वे असाधारण और अद्भुत कविता के धनी है. प्रो. चौथी राम यादव के शब्द्रों में वे जाति-प्रथा का दमनात्मक तथ्यों और सत्यों को अद्भुत और असरदार रूप से उजागर करनेवाले बेजोड़ कवि हैं.

जय प्रकाश लीलवान की सम्पूर्ण कविता व्यवस्था के प्रति न केवल व्यापक विद्रोह की कविता है बल्कि वे कविता के माध्यम से एक नया संसार रचते हैं जो बहुजन संघर्ष से और आगे सीधे-सीधे सम्पूर्ण श्रमण संस्कृति के पक्ष में खड़ा दिखाई देते हैं. वे अपना आदर्श जहाँ बाबासाहेब अम्बेडकर को मानते हैं वहीँ वे बुद्ध तक की यात्रा करते हैं. लेकिन ये यात्रा केवल भावुक और आस्थावान यात्रा नहीं, बल्कि नई स्थापनाओं की यात्रा है. एक और उनका रचनाकर्म दुनिया में अश्वेत आन्दोलन की याद दिलाता है वहीँ भारतीय समाज में फैले जाति और तमाम तरह के भेदभाव से एक कवि के रूप में निरंतर लड़ते योधा के रूप में उन्हें याद किया जाएगा.

सुदेश तनवर द्वारा लिखित

इस नर्स ने की 90 मरीजों की हत्या…

0

बर्लिन। जर्मन के एक पुरूष नर्स को दो मरीजों की हत्या के अपराध में गिरफ्तार किया गया है. हालांकि पुलिस को इस बात का शक है कि इस नर्स ने 88 और मर्डर किए है. कुल मिलकर मर्डर की संख्‍या 90 है.

आपको बता दें कि नर्स का नाम नील्स एच है और इसे यदि 90 लोगों की हत्‍या के मामले में सजा सुनाया जाता है तो वह जर्मनी का सबसे खूंखार सीरियल किलर्स में से एक होगा. वो मरीजों को जानबूझ कर ड्रग्स का ओवरडोज देता था जिससे उनकी मौत हो जाती थी. जानकारी के मुताबिक 40 वर्षीय नील्स एच को उत्तरी शहर ओलेनबर्ग में दो हत्याओं की कोशिश और साल 2015 में दो हत्या करने के आरोप में सजा सुनाई गई है.

मामला 2015 का था और सजा अब सुनाई गई इसके पीछे का कारण ये था कि जांचकर्ताओं को इस बात की आशंका थी कि इस मामले में मरने वालों की संख्या और अधिक हो सकती है इसीलिए इस मामले में छानबीन जारी थी. नई जांच में सामने आया है कि नील्स ने लगभग 84 और लोगों की हत्याएं की हैं. नील्स मरीजों को जानबूझ कर ड्रग्स की अधिक मात्रा देता था. इससे या तो मरीजों को हार्ट अटैक हो जाता था या उनके शरीर के दूसरे अंग काम करना बंद कर देते थे. मरीजों को मरने की स्थिति पर लाकर नील्स उनका दुबारा उपचार करता था

जांचकर्ताओं का कहना है कि इसके पीछे उसका मकसद अपने साथियों के बीच इस हुनर को साबित करना था कि वह मरे हुए को फिर से जिंदा कर सकता है.

DU के M.Phil/Phd प्रवेश में आरक्षण सम्बन्धी असंवैधानिक प्रक्रिया के विरोध में प्रदर्शन

दिल्ली विश्वविद्यालय के कई विभागों में पिछले कुछ वर्षों से एम.फ़िल./पीएच.डी. प्रवेश-प्रक्रिया में आरक्षण की संवैधानिक प्रक्रिया का खुलेआम उल्लंघन किया जा रहा है. जिसके खिलाफ़ प्रभावित अभ्यर्थियों ने आज दिल्ली विश्वविद्यालय के नॉर्थ कैम्पस में विरोध प्रदर्शन करके वीसी और हिंदी विभाग के विभागाध्यक्ष के सामने विरोध करके ज्ञापन सौंपा. पीड़ित अभ्यर्थियों ने मांग की है कि हिंदी विभाग द्वारा लिखित परीक्षा सूची को वापस किया जाय और संवैधानिक आरक्षण प्रक्रिया का पालन करके एडमिशन किया जाय.

हिंदी विभाग में एम.फ़िल./पीएच.डी. प्रवेश की लिखित परीक्षा की परिणाम सूची जारी की गई है. इस सूची में अनारक्षित श्रेणी की 50% सीटें सामान्य श्रेणी के अभ्यर्थियों के लिए आरक्षित कर दी गईं, जो असंवैधानिक है. आरक्षित श्रेणी के जो अभ्यर्थी अनारक्षित श्रेणी की मेरिट कटऑफ में सफल हुए, उन्हें अनारक्षित श्रेणी में शामिल न करके आरक्षित श्रेणी में ही शामिल किया गया. जिससे अनारक्षित श्रेणी की कटऑफ़ 263 तक चली गई है. और ओबीसी की कटऑफ़ इससे बहुत ऊपर 290 तक चली गई है? अफ्रीकन स्टडीज़ विभाग ने अभी पीएचडी प्रवेश में सफल अभ्यर्थियों की अंतिम सूची जारी की है. इसमें कुल 15 अभ्यर्थियों को प्रवेश दिया गया है. जिसमें 1 0UR, 2 OBC, 2 SC और 1 ST के अभ्यर्थियों को जगह दी गई है. दर्शनशास्त्र विभाग में 23 सफल अभ्यर्थियों में 13 UR, 3 OBC, 4 SC, 2 ST और1 PWD संवर्ग से हैं. जबकि नियमतः यहाँ आरक्षित वर्ग की और सीटें होनी चाहिए थीं. भौतिकी विभाग की पीएच.डी प्रवेश प्रक्रिया की जारी अंतिम सूची में आरक्षित सीटें पूरी नहीं भरी गई हैं. साथ ही अनारक्षित संवर्ग में सामान्य वर्ग के अभ्यर्थियों को ही प्रवेश दिया गया और आरक्षित संवर्ग की कई सीटें ‘नॉन फाइंड सुटेबल (NFS) कर दी गई हैं.

भूगर्भशास्त्र विभाग में एम.फ़िल./ पीएच.डी के साक्षात्कार के लिए बुलाए गए अभ्यर्थियों में पहली रैंक पाने वाले आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थी को उसके आरक्षित श्रेणी में ही साक्षात्कार के लिए बुलाया गया. जबकि मेरिट के आधार पर अनारक्षित श्रेणी में आने वाले अभ्यर्थी को अनारक्षित वर्ग में ही बुलाया जाना चाहिए.

इस सत्र के पीड़ित अभ्यर्थी सामने आये हैं और विश्वविद्यालय प्रशासन से मांग किये कि विश्वविद्यालय प्रशासन व तत्संबंधी अनुभाग आरक्षण सम्बन्धी प्रवेश प्रक्रिया में किस नियम का पालन करता है, उसे सरल भाषा में सार्वजनिक करे और वंचितों को न्याय दे. इस विरोध प्रदर्शन में सैकड़ों छात्र व शिक्षक शामिल हुए. आन्दोलनकारियों ने कहा है कि अगर उनकी मांग न मानी गई तो वे और व्यापक स्तर पर आन्दोलन करेंगे.

जन्मदिवस विशेषः जब हॉकी के जादूगर ने ठुकरा दिया हिटलर का ऑफर

जब दलितों के साथ निरन्तर हो रहे अत्याचार, शोषण और तिरस्कार की बात चलती है तो हम हॉकी के महान जादूगर मेजर ध्यान चन्द को कैसे भूल सकते हैं. ध्यान चन्द का जन्म 29 अगस्त, 1905 को इलाहाबाद में हुआ था. वह भारतीय फ़ौज में नौकरी करते थे और हॉकी के बहुत ही बढ़िया खिलाड़ी थे. उनको तीन बार ओलिंपिक खेलों में भाग लेने का अवसर मिला– 1928, 1932 और 1936 में.

अपने पूरे खेल जीवन के दौरान उन्होंने 400 से ज़्यादा गोल किये और हमेशा अपनी टीम को जीत दिलाई. ख़ेल के दौरान ध्यान चन्द इतनी चुस्ती फुर्ती, स्फ़ूर्ति और कुशलता के साथ खेलते थे और उनके इतने ज्यादा गोल करने के क्षमता की वजह से ऐसा कहा जाने लग गया कि- हॉकी एक खेल नहीं है, बल्कि एक जादू है और ध्यान चन्द इसके महान जादूगर.

1936 ओलिंपिक खेलों में भारत का फाइनल मैच जर्मनी के साथ होना था और यह मैच देखने के लिए उस वक़्त के जर्मनी के चांसलर अडोल्फ़ हिटलर भी स्टेडियम में मौजूद थे और वह चाहते थे कि किसी भी तरह जर्मनी यह फाइनल मैच जीत जाए. मगर ध्यान चन्द के होते हुए यह कहां सम्भव था, और अन्तत: भारत ने जर्मनी को 8-1 के अंतर से हरा दिया.

इस मैच में अकेले ध्यान चन्द ने 6 गोल दागे और जर्मनी का चांसलर हिटलर ध्यान चन्द की खेल कुशलता और शैली से इतना प्रभावित हुआ कि उसने ध्यान चन्द को अपने घर खाने पर बुलाया. खाने के दौरान हिटलर ने ध्यान चन्द से पूछा कि वह हॉकी खेलने के इलावा क्या करते है? ध्यानचन्द ने जवाब दिया कि यह आर्मी में लान्स नायक हैं. फिर हिटलर ने ध्यान चन्द को इंडिया छोड़कर जर्मनी में आकर बसने का निमंत्रण दिया और यह भी लालच दिया कि वह ध्यानचन्द को जर्मनी की सेना में जनरल बना देगा, एक बहुत बड़ी कोठी भी उसे दी जाएगी, बस वह आकर वहीं बस जाये और जर्मनी की टीम को हॉकी खेलना सिखाये. मगर ध्यान चन्द ने हिटलर का प्रस्ताव यह कहकर ठुकरा दिया कि वह अपने देश को बहुत प्यार करता है और अपना देश छोड़ने के बारे में सोच भी नहीं सकता.

मगर अपने देश में अन्य दलित लोगों की तरह, ध्यान चन्द के साथ भी जाति आधारित भेदभाव अकसर होते रहते थे. जैसे कि खिलाड़ियों को जीतने के बाद जो इनाम में दी जाने वाली धन राशि को घोषणा होती है, वह भी उस खिलाड़ी की जाति जानकर ही होती है. सारी उम्र ध्यानचन्द का हॉकी के प्रति समर्पण, उसकी अपने देश को जीत दिलाने की लगन व कार्य-कुशलता को देखते हुए उसको बहुत पहले खेलों में भारत रतन मिल जाना चाहिए था. मगर ऐसा हरगिज़ नहीं हो सका, क्योंकि किस-किस खिलाड़ी को क्या-क्या इनाम और मान सम्मान देना है, इसका निर्णय तो सत्ता में शिखर पर बैठे बड़े अधिकारी और नेतागण ही करते हैं और यह निर्णय लेते समय वह खिलाड़ी की जाति देखना कभी नहीं भूलते.

अंत में जब 2014 में यह निर्णय लिया गया कि भारत रत्न के लिए खेलों को भी शामिल किया जाना चाहिए, उस वक़्त भी ध्यान चन्द के साथ चार पांच दशकों से होते रहे अन्याय को समाप्त करने की बजाय, एक बड़े दलित उम्मीदवार को छोड़कर एक ब्राह्मण (सचिन तेंदुलकर) को यह सम्मान दे दिया गया. और इस तरह ध्यानचन्द के साथ हो रहा तिरस्कार का सिलसिला उसके मरणोप्रांत अब भी जारी है. उनकी मृत्यु में 3 दिसंबर, 1979 को दिल्ली में हुई.

डी भारद्वाज “नूरपुरी” की रिपोर्ट

सेक्स रैकेट चलाने वाला इच्छाधारी बाबा अब धोखाधड़ी में गिरफ्तार

नई दिल्ली। हमारे देश के लोग बाबाओं को इतना मानते है कि उनपर आंख मुंद कर विश्वास करने लगते है. राम रहीम, आसाराम, रामपाल का हाल तो देख ही चुके हैं. अब दिल्ली में एक इच्छादारी भीमानंद बाबा को 30 लाख रूपए की ठगी करने के आरोप में पुलिस ने गिरफ्तार किया है.

यही नहीं, इच्छाधारी बाबा पर सेक्स रैकिट चलाने के आरोप में मकोका का केस भी चल रहा है. इच्छाधारी बाबा कई नाम से जाना जाता है. उसको राजीव रंजन उर्फ शिवा कहा जाता है. पुलिस ने इस ठगी में उसकी मदद करने के आरोप में कंकना देब उर्फ कोकना को भी गिरफ्तार कर लिया. रोहिणी में रहने वाली एक लड़की के अलावा उनकी बहन और भाई को सरकारी जॉब दिलाने के नाम पर 30 लाख रुपये की ऐंठने का आरोप है. गिरोह में शामिल तीन अन्य आरोपियों श्रीकांत, आर्यन और अनिकेत की तलाश जारी है.

गिरोह ने रोहिणी निवासी युवती को इंडियन रेलवे कैटरिंग एंड टूरिज्म निगम (आईआरसीटीसी) में सहायक मैनेजर की नौकरी लगवाने के नाम पर ठगा था. उसके दो अन्य रिश्तेदारों को भी फूड इंस्पेक्टर की नौकरी दिलवाने के नाम पर चूना लगाया था.

दक्षिणी पूर्वी जिला पुलिस उपायुक्त रोमिल बानिया ने बताया कि 24 अगस्त को युवती ने शिकायत दर्ज करवाई थी. इसके आधार पर पुलिस ने शिवा और कनकना को गिरफ्तार किया. पुलिस ने इनकी निशानदेही पर फर्जी मेडिकल सर्टिफिकेट, बैंक खाता, फर्जी ऑफर लेटर, चरित्र प्रमाण पत्र, आईआरसीसीटी का पहचान पत्र, कई अपॉइंटमेंट लेटर (असम राइफल्स, उत्तर रेलवे, भारतीय वायु सेना, दिल्ली नगर निगम, लोक निर्माण विभाग) व अन्य विभागों के फर्जी लेटर भी बरामद किए.

पुलिस अफसरों ने बताया कि इच्छाधारी बाबा सेक्स रैकिट बाबा के नाम से जाना जाता है. वह नागों के साथ घूमने और नागिन डांस को लेकर हमेशा चर्चा में रहता था. साल 2010 में उसे दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार किया था. तफ्तीश में पुलिस को पता चला कि बाबा हाई प्रोफाइल सेक्स रैकिट चलाता है. उसके सेक्स रैकिट में 600 के करीब हाई प्रोफाइल लड़कियां शामिल थीं. पुलिस को उसकी दिल्ली सहित दूसरे शहरों में भारी प्रॉपर्टी का पता चला था. पुलिस ने इनकी कीमत 2,500 करोड़ रुपये के करीब आंकी थी. नेता से लेकर सीनियर अधिकारी बाबा के पास आते थे.

पुलिस अफसरों ने यह भी बताया कि इच्छाधारी बाबा चित्रकूट के चमरौहा गांव का रहने वाला है. वह 1988 में नेहरू प्लेस स्थित एक फाइव स्टार होटल में गार्ड की नौकरी करता था. वह खुद को साईं बाबा का अवतार बताता था. खानपुर के जिस मकान में वह रहता था उसने उस मकान को मंदिर में बदलकर वहां बाबा बनकर बैठ गया था. वह बाबा का चोला पहनकर सेक्स रैकिट का धंधा करने लगा था. 12 साल के अंदर वह मामूली गार्ड से करोड़ों का मालिक बन गया था.

10 दिनों में तीसरा रेल हादसा

0
मुंबई। नागपुर-मुंबई दूरंतो एक्सप्रेस के 9 डिब्बे और इंजन मंगलवार सुबह पटरी से उतर गए. महाराष्ट्र में टिटवाला के पास ये हादसा हुआ. इलाके में दो दिन से भारी बारिश हो रही है. इसके चलते रेस्क्यू में दिक्कत आ रही है. बता दें कि 10 दिन में देश में ये तीसरा ट्रेन हादसा है. कुछ दिनों पहले ही उत्कल एक्सप्रेस और कैफियत एक्सप्रेस हादसे का शिकार हुई थी. आसनगांव-वासिंद स्टेशन के बीच सुबह 6 बजकर 35 मिनट पर ये हादसा हुआ. रेलवे की ओर से राहत और बचाव कार्य शुरू कर दिया गया है. कल्याण से रेस्क्यू टीम हादसे वाली जगह भेजी गई है. दुर्घटना के बाद आसपास के लोग भी मदद के लिए पहुंच गए. डिब्बों में फंसे लोगों को बाहर निकालने की कोशिश की जा रही है. सेंट्रल रेलवे के स्पोक्सपर्सन अनिल सक्सेना ने कहा, “शुरुआती रिपोर्ट में बताया गया था कि 7 डिब्बे और इंजन पटरी से उतरे हैं, लेकिन बाद में रिपोर्ट आई कि कुल 9 डिब्बे और इंजन पटरी से उतरे हैं. रेलवे ने यात्रियों को उनके गंतव्य तक पहुंचाने के लिए स्टेट ट्रांसपोर्ट की बसों का इंतजाम किया है. “सेंट्रल रेलवे के पीआरओ सुनील उदेसी ने कहा कि अभी तक की जानकारी के मुताबिक किसी भी तरह के जानमाल के नुकसान और किसी के जख्मी होने की खबर नहीं है. लैंडस्लाइड के चलते हुआ हादसा सेंट्रल रेलवे के सोर्सेज के मुताबिक शुरुआती जांच में पाया गया है कि लैंडस्लाइड की वजह से यह दुर्घटना हुई. इलाके में भारी बारिश के चलते ट्रैक के नीचे की मिट्टी बह गई. दूरंतो एक्सप्रेस के जो डिब्बे पटरी से उतरे हैं, उनमें A1, A2, A3 और अन्य कोच शामिल हैं. दुर्घटना के बाद कल्याण से मुंबई के बीच का रेल रूट तीन से चार घंटे तक बाधित हो गया. 19 अगस्त को यूपी के मुजफ्फरनगर में पुरी-हरिद्वार उत्कल एक्सप्रेस के 12 ड‍िब्बे पटरी से उतर गए थे. दुर्घटना में 23 लोगों की मौत हुई थी जबकि 60 से ज्यादा घायल हुए थे. आजमगढ़ से दिल्ली जा रही कैफियत एक्सप्रेस 23 अगस्त को तड़के यूपी के औरेया जिले में दिल्ली-हावड़ा रेल ट्रैक पर एक डंपर से टकरा गई. इस हादसे में ट्रेन के इंजन समेत 10 डिब्बे पलट गए थे. 80 से ज्यादा लोग जख्मी हुए थे.

जेल में 20 साल झाड़ू-पोछा और माली का काम करेगा बलात्कारी बाबा

रोहतक। दो साध्वियों से यौन शोषण के दोषी डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह को सीबीआई कोर्ट से दोनों मामलों में 10-10 साल की सजा मिलने के बाद, उन्हें जेल में कैदी नंबर 1997 दिया गया है. 20 साल जेल की सजा पाए बलात्कारी बाबा की जेल में सोमवार को पहली रात गुजारी है. यौन शोषण के मामले में मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक रामरहीम पूरी रात बैरक में जागता रहा. बैरक में इधर से उधर टहलता रहा और सो नहीं पाया. गुरमीत को खाने में 4 रोटी और सब्जी दी गई थी लेकिन उसने सिर्फ आधी रोटी और सब्जी खाई. राम रहीम को जेल प्रशासन ने नया कैदी नंबर 8647 दिया है. अबतक विलासिता की जिंदगी जीने वाला राम रहीम अब जेल में आम कैदियों की तरह काम कर रहे हैं. बलात्कारी बाबा अब सुबह जल्दी उठता है और और लाइन में लगकर खाना लेना पड़ रहा है. वहीं रात में जमीन पर सोने के लिए राम रहीम को एक कंबल दिया गया है. इतना ही नहीं राम रहीम को जेल और अपनी बैरक में झाड़ू लगाने के अलावा बैरक में पौछा भी लगाना काम सौंपा गया है. सुबह के समय आम कैदियों की तरह डेरा प्रमुख को भी चाय और ब्रेड मिलेगी. दोपहर को खाने में पांच रोटी और एक दाल देने का प्रावधान है. दिन में 250 ग्राम दूध मिलेगा. शाम को चाय और रात को पांच रोटी व एक सब्जी खाने में मिलेगी. बाकी किसी भी समय दूध या चाय देने की कोई व्यवस्था नहीं है. डेरा प्रमुख चूंकि कम पढ़ा लिखा है, इसलिए उससे लेबर वर्क (मजदूरी) कराई जाएगी. लेबर वर्क के लिए वह फिट है या नहीं, इसके लिए मेडिकल जांच होगी. डाक्टरों ने उसे फिट करार दिया तो जेल प्रबंधन फैक्ट्री में बढ़ई का काम, चारपाई और कुर्सी बुनने, बागवानी करने अथवा बेकरी में बिस्कुट बनाने का काम दे सकता है. काम करने के उसका ड्यूटी टाइम सुबह आठ बजे से शाम चार बजे तक होगा. राम रहीम ने नौवीं तक पढ़ाई की है. जेल मैनुअल के अनुसार आम कैदी की तरह डेरा प्रमुख को भी सफेद रंग के कपड़े पहनने होंगे. अपने साथ वह जो कपड़े लेकर गया है, उसे जेल में ले जाने की इजाजत नहीं होगी. अमूमन प्रभावशाली कैदी अपने खुद के सफेद कपड़े जेल में पहनते रहे हैं, लेकिन मीडिया ट्रायल से बचने के लिए जेल प्रबंधन डेरा मुखी को उसके अपने कपड़े पहनने की इजाजत नहीं देगा. डेरा प्रमुख के वकीलों ने अपनी जेल बदले जाने की अर्जी लगाई है, इसलिए देर सबेर उसकी जेल भी बदली जा सकती है.

अधर्म पर संविधान की जीत

गुरमीत राम रहीम को मिली सजा असल में अधर्म पर संविधान की जीत है. क्योंकि अगर देश में संविधान का राज नहीं होता तो अरबों की संपत्ति के मालिक और राजनीतिक रसूख वाला राम रहीम जेल की सलाखों के पीछे नहीं गया होगा. मैं तो यही सोच रहा हूं कि जब देश का संविधान नहीं बना था और यह देश मनुस्मृति के हिसाब से चलता था तो यहां क्या होता होगा?

फिर देश की गरीब और बहुसंख्यक आबादी को ‘भगवान के भक्त’ और ‘भगवान के दूत’ किस तरह कुचलते होंगे. केरल का इतिहास आपके सामने है. वहां की निम्न वर्ग की महिलाओं को शरीर का ऊपरी भाग ढकने का अधिकार नहीं था. आप सोचिए कि किसी औरत के लिए यह कितने शर्मिंदगी की बात रहती होगी. दक्षिण में देवदासी प्रथा की प्रथा की आहट गाहे-बिगाहे अब भी सुनाई देती रहती है. लेकिन बाबासाहेब के बनाए संविधान ने और आईपीसी बनाने वाले लार्ड मैकाले की दखल होने के बाद इन कुप्रथाओं पर काफी हद तक रोक लगी है.

हालांकि घोड़ी पर नहीं चढ़ने देना, मंदिर में नहीं घुसने देना, चारपाई पर बैठने पर मारपीट करने जैसी घटनाएं ढलते मनुवाद की ही निशानी है. लेकिन देश का कानून और संविधान अब वंचित तबके को संबल देने लगा है. संविधान और कानून की बदौलत ही गरीब से गरीब आदमी किसी भी ताकतवर इंसान से टकरा जाने की हिम्मत रखता है. जैसा की राम रहीम के विरोध में दो साध्वियां आई. और संविधान और कानून की मदद से उसके नर्क का साम्राज्य खत्म कर दिया. उम्मीद है कि कानून और अदलात की मदद से राम रहीम के डेरा सच्चा सौदा में कैद अन्य लड़कियों को भी जल्दी ही मुक्ति मिल जाएगी.

10 महीने से कोमा में हैं ‘फिर हेरा फेरी’ का निर्देशक नीरज वोरा

0

विरासत, रंगीला और मन जैसी फिल्‍मों में नजर आने वाले कॉमेडी एक्‍टर नीरज वोरा गंभीर बीमारी से जूझ रहे हैं. वे पिछले 10 महीने से कोमा में हैं. नीरज वोरा 19 अक्टूबर, 2016 को ब्रेन स्ट्रोक के शिकार हुए थे. इसके बाद उन्‍हें दिल्ली स्थित एम्स में एडमिट कराया गया था. उन्हें वेंटिलेटर पर रखा गया था. बाद में हालत में कुछ सुधार के बाद उनके दोस्त फिरोज नाडियाडवाला मार्च, 2017 में उन्हें मुंबई वापस लाए. उसी समय से नीरज अपने दोस्‍त के यहां रह रहे हैं.

बताया जा रहा है कि उनके दोस्त फिरोज नाडियाडवाला उनकी सारी जिम्‍मेदारी उठा रहे हैं. फिरोज ने जुहू स्थित अपने घर ‘बरकत विला’ के एक कमरे को आईसीयू में बदल दिया है. फिरोज के अनुसार, मार्च 2017 से ही 24 घंटे एक नर्स, वॉर्ड ब्वॉय और कुक नीरज के साथ रहता है. इसके अलावा फिजियोथेरेपिस्ट, न्यूरो सर्जन, एक्यूपंक्चर थेरेपिस्ट और जनरल फिजिशियन हर हफ्ते विजिट पर आते हैं. नीरज का पूरा ख्‍याल रखा जा रहा है.

बता दें कि नीरज ने फिर हेराफेरी, खिलाड़ी 420 जैसी फिल्‍म निर्देशित की है. वे थिएटर में भी सक्रिय हैं. वे गुजराती प्‍ले आफ्टरनून कर चुके हैं. इसके अलावा नीरज वोरा राइटर भी हैं. उन्‍होंने रंगीला, अकेले हम अकेले तुम, ताल, जोश, बदमाश, चोरी चोरी चुपके चुपके, अवारा पागल दीवाना जैसी फिल्‍मों के संवाद लिखे हैं.

नीरज हेराफेरी 3 पर काम कर रहे थे, लेकिन बीमारी के चलते इसमें रुकावट आ गई. बताया जा रहा है कि नीरज पैसों की तंगी से भी जूझ रहे हैं.

UPTET 2017 के लिए ऑनलाइन आवेदन शुरू

लखनऊ। उत्तर प्रदेश टीचर एलिजिबिलटी टेस्ट (UPTET) के लिए एप्लीकेशन प्रोसेस शुरू हो चुकी है. इसके लिए ऑनलाइन आवेदन 8 सितंबर 2017 तक किया जा सकता है. इसके बाद 15 अक्टूबर 2017 को परीक्षा आयोजित की जाएगी. परीक्षा में दो पेपर होंगे, जिसमें से पेपर एक कक्षा 1 से लेकर 5वीं तक के शिक्षकों के लिए और दूसरा कक्षा 6 से लेकर 8वीं तक के शिक्षकों के लिए होगा. आवेदनकर्ता अपनी योग्यता अनुसार दोनों पेपरों के लिए भी आवेदन कर सकते हैं. इसके लिए आयोजित परीक्षा में वैकल्पिक प्रश्न पूछे जाएंगे.

महत्वपूर्ण तारीखें ऑनलाइन एप्लिकेशन शुरू होने की तारीख: 25 अगस्त, 2017 एप्लीकेशन के लिए फीस जमा करना शुरू होगा: 26 अगस्त, 2017 ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन की आखिरी तारीख: 8 सितंबर, 2017 फीस जमा कराने की आखिरी तारीख: 11 सितंबर, 2017 ऑनलाइन एप्लिकेशन प्रोसेस पूरी करने की आखिरी तारीख: 13 सितंबर, 2017 एप्लिकेशन फॉर्म में करेक्शन (सुधार) की आखिरी तारीख: 15 सितंबर, 2017 12 बजे से लेकर 19 सितंबर 2017 को शाम 6 बजे तक

ऐसे करें आवेदन आवेदन करने के लिए UPTET की आधिकारिक वेबसाइट (http://upbasiceduboard.gov.in) पर जाकर ऑनलाइन एप्लिकेशन भरनी होगी. इससे पहले आवेदनकर्ताओं को वेबसाइट के होमपेज पर मौजूद लिंक से खुद को रजिस्टर करना होगा.

रजिस्ट्रेशन के बाद आवेदनकर्ताओं को एप्लिकेशन फीस जमा करवानी होगी. इसे ऑनलाइन जमा करवा सकते हैं या फिर पास के किसी एसबीआई बैंक की ब्रांच से ई-चालान लगाकर एप्लिकेशन फीस भर सकते हैं. इसके बाद जारी डीयू नंबर को आप ट्रांजेक्शन आईडी या जर्नल नंबर के तौर पर इस्तेमाल कर सकते हैं. फीस जमा कराने के बाद अगले दिन पूरी एप्लिकेशन प्रक्रिया पूरी कर सकते हैं.

अफगानिस्तान में हुआ आत्मघाती हमला, 13 की मौत और 22 घायल

0

हेलमंड। अफगानिस्तान के दक्षिणी हेलमंड प्रांत के नावा जिले में हुए एक आत्मघाती बम हमले में 13 लोगों की मौत और 22 अन्य घायल हो गए. स्थानीय अधिकारियों के मुताबिक नावा जिले के डोपुल इलाके में एक आत्मघाती हमलावर ने एक हथियारबंद वाहन के सामने विस्फोट कर दिया. टोलो समाचार ने गवर्नर उमर जवाक के प्रवक्ता का हवाला देते हुए कहा कि विस्फोट में 22 नागरिक और सैन्य कर्मचारी घायल हो गए.

हमला एक सैन्य वाहन के पास किया गाय. हालांकि, टोलो समाचार के मुताबिक पहले 2 लोगों की मौत बताई गई थी जो बाद में बढ़कर 13 हो गई. हमले की तालिबान समेत कोई समूह ने अभी तक जिम्मेदारी नहीं ली है.

इससे गुस्साए कई आतंकवादी संगठनों ने अमेरिकी सरकार के इस फैसले का विरोध किया था और अंजाम भुगतने की धमकी दी थी. हाल ही में हेलमंद के ही लश्कर गाह में पुलिस हेडक्वार्टर पर हुए सुसाइड ब्लास्ट में 5 लोगों की मौत हो गई थी और बच्चों समेत कई घायल हो गए थे. 2 अगस्त को अफगानिस्तान के हेरात शहर में भी एक मस्जिद में हुए बम धमाके में 29 लोग मारे गए थे. अगस्त महीने में अफगानिस्तान में ये तीसरा बड़ा बम धमाका है.

सुसाइड ब्लास्ट में काफी तादाद में अफगान जवान मारे जाते हैं. यूएस वॉचडॉह SIGAR के मुताबिक, 2016 में 6800 सेना और पुलिस के जवान मारे गए थे. ये धमाकों में मारे गए लोगों का 35% है. इस साल एक जनवरी से 8 मई तक अफगान सेना और पुलिस के 2500 जवान मारे जा चुके हैं.

यूनाइटेड नेशन्स असिस्टेंस मिशन इन अफगानिस्तान (UNAMA) की रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले साल अफगानिस्तान में हमलों में 3498 आम लोगों की मौत हुई थी. 7920 लोग घायल हुए. यानी 11418 लोग हताहत हुए. पिछले आठ सालों में यह आंकड़ा सबसे ज्यादा था. 2015 की तुलना में इसमें 2% का इजाफा हुआ था. UNAMA की रिपोर्ट के मुताबिक, इस साल मार्च तक अफगानिस्तान में एयर स्ट्राइक और आतंकी हमलों में 715 लोगों की मौत हुई थी. 1466 लोग घायल हुए थे.