नई दिल्ली। आरजेडी सुप्रीमों लालू प्रसाद यादव और उनके परिवार की मुश्किलें थमने का नाम नहीं ले रहीं हैं. लालू को जेल गए 15 दिन भी पूरे नहीं हुए थे कि उनके दूसरे दामाद को प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने नोटिस जारी कर दिया. ईडी ने उन पर पटना की विवादित जमीन को खरीदने के लिए बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी को 1 करोड़ रुपये का लोन देने को आरोप लगाया है.
इस मामले में आगे की कार्यवाही में ईडी राहुल से जानने की कोशिश करेगी कि राहुल यादव के पास अपनी सास को देने के लिए इतने रूपये कहा से आए. आरोपों के मुताबिक यह मामला मनी लॉंडरिंग का है जिसमें मिस मिशैल पैकर्स एंड प्रिंटर्स प्रईवेट लिमिटेड नाम की फर्म का इस्तेमाल किया गया था. आपको बता दें कि इस कंपनी में लालू यादव की बेटी मीसा भारती और उनके पति शैलेश कुमार का नाम भी जुड़ा है और ईडी पहले भी इस मामले में इन दोनो से पूछताछ कर चुकी है.
नासिक। महाराष्ट्र के अहमद नगर जिले में तीहरे हत्याकांड का मामला सुलझ गया है. नासिक की अदालत ने इस मामले में 6 व्यक्तियों को दोषी करार दिया है. कोर्ट ने सभी अपराधियों को हत्या, सबूत मिटाने, आपराधिक साजिश,अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत अपराधी धोषित किया है. सजा का ऐलान 18 जनवरी 2018 को विशेष जज आर आर वैश्नव करेंगे. तीनों युवकों के हत्या की वजह उनकी जाति थी. मामला अंतरजातीय प्रेम प्रसंग से जुड़ा हुआ था.
मामला 2013 का है, जिसमें 22 वर्षीय सचिन घारू नाम के छात्र के साथ 26 वर्षीय संदीप थनवर और 20 वर्षीय राहुल खंड़रे की हत्या कर दी गई थी. इस छात्र का गुनाह सिर्फ इतना था कि उसे मराठा समुदाय की एक लड़की से प्यार हो गया था. 2015 में संदीप थनवर के छोटे भाई पंकज ने कोर्ट में इस मामले पर दलील की. पंकज ने बताया कि उनको कई बार इस मामले को दबाने के लिए धमकी दी गई. इतना ही नहीं दबाव के चलते उनकी माँ को राज्य छोड़ कर मध्य प्रदेश में जाकर रहना पड़ा. और अब वे न्याय चाहते हैं.
पंकज के वकील उज्जवल निकम के मुताबिक सचिन घारू और उसकी प्रेमिका एक ही संस्थान में साथ पढ़ते थे. इस दौरान उन्हें एक दूसरे से प्यार हो गया लेकिन लड़की के घरवालों को उनका ये रिश्ता मंजूर नहीं था. लड़की के पिता ने अन्य अपराधियों के साथ मिलकर अपनी बेटी के प्रेमी को उसके साथियों संग बहाने से बुलाकर उनकी हत्या कर दी. इसके बाद उन्होंने थनवर के शव को सड़े हुए नाले में फेक दिया और उसके साथियों के शरीर के टुकड़े कर बोरवेल में डाल दिया था. हालांकि इस मामले में कोई चश्मदीद गवाह तो नहीं था लेकिन कोर्ट ने अन्य सुबूतों और बयानो के मद्देनज़र लड़की के पिता सहित 5 अन्य व्यक्तियों को अपराधी घोषित किया है.
नागपुर। रामदास अठावले जब से भारतीय जनता पार्टी के साथ आए हैं, अम्बेडकरवादी संगठन से जुड़े कार्यकर्ता उनसे नाराज चल रहे हैं. पिछले दिनों उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में अठावले को विरोध के कारण एक कार्यक्रम से बैरंग वापस लौटना पड़ा था, तो अब उन्हें महाराष्ट्र में विरोध का सामना करना पड़ा है.
महाराष्ट्र में मराठावाड़ा यूनिवर्सिटी के नामांतर दिवस की सालगिरह के अवसर पर दलित कार्यकर्ताओं ने अठावले का विरोध किया. अठावले विश्वविद्यालय परिषद में एक समारोह को संबोधित कर रहे थे. इसी दौरान कुछ दलित कार्यकर्ता उनके खिलाफ प्रदर्शन करने लगे. दरअसल अठावले द्वारा संचालित रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया के कर्मियों ने उनके भाषण के लिए एक अलग मंच तैयार किया था, जिससे नाराज़ दलित कार्यकर्ताओं ने विरोध में कुर्सियां उछालनी शुरू कर दी और उनके खिलाफ जमकर नारेबाज़ी करने लगे.
हालांकि हंगामे के बावजूद भी अठावले ने अपना भाषण जारी रखा और उनके समर्थक बचाव में उनके चारों तरफ घेरा बनाकर खड़े रहे. इससे पहले गाजियाबाद में भी भाजपा नेता द्वारा संविधान के खिलाफ दिए गए बयान से गुस्साए दलित समाज के युवकों ने एक कार्यक्रम से भाजपा सरकार में मंत्री रामदास अठावले को वापस लौटने पर मजबूर कर दिया था.
नई दिल्ली। विश्व हिंदू परिषद के कार्यकारी अध्यक्ष प्रवीण तोगड़िया घंटों तक लापता रहने के बाद सामने आ गए हैं. सामने आते ही अहमदाबाद में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर तोगड़िया ने केंद्र सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया. तोगड़िया ने आरोप लगाया कि केंद्रीय जांच एजेंसी इंटेलिजेंस ब्यूरो लगातार उन्हें डराने की कोशिश कर रही है.
प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान रोते हुए तोगड़िया ने कई ऐसे दावे किए जो सीधे तौर पर केंद्र की मोदी सरकार को कठघरे में खड़ा करती है. साथ ही उन्होंने राम मंदिर और हिंदुओं की आवाज उठाने के लिए परेशान किए जाने की साजिश का भी आरोप लगाया. तोगड़िया ने कहा कि कुछ समय से मेरी आवाज दबाने की कोशिश की जा रही है. उन्होंने इशारों में पीएम मोदी और अमित शाह को कठघरे में खड़ा करते हुए आरोप लगाया कि मुझे डराने का काम गुजरात से शुरू हुआ.
आपबीती सुनाते हुए तोगड़िया ने कहा-
“कल (सोमवार) मैं कार्यालय में था और मेरे मोबाइल पर फोन आया कि 16 पुलिस स्टेशन से राजस्थान पुलिस का काफिला आ रहा है और गुजरात पुलिस भी उन्हें सहयोग कर रही है. मैंने राजस्थान की सीएम और गृह मंत्री को फोन किया तो उन्होंने कहा ऐसी कोई जानकारी नहीं है, जबकि आज सुबह क्राइम के चीफ ने मुझे बताया कि राजस्थान पुलिस ही उनकी गिरफ्तारी के लिए आई थी. राजस्थान की मुख्यमंत्री, गृह मंत्री और आईजी को पुलिस आने की जानकारी नहीं थी. इसका मतलब ये सब किसके इशारे पर हो रहा है.
पूरे प्रेस कांफ्रेंस के दौरान हिन्दू नेता प्रवीण तोगड़िया के चेहरे पर मौजूद डर साफ देखा जा सकता था. उन्होंने कहा कि वो समय आने पर सबूतों के साथ इसका खुलासा करेंगे. हालांकि यहां सवाल यह उठ रहा है कि राम मंदिर की वकालत करने वाले एक हिन्दू नेता को हिन्दू राष्ट्र बनाने का दम भरने वाली भाजपा की सरकार में ही जान का खतरा क्यों है?
नई दिल्ली। बहुजन समाज पार्टी सुप्रीमों मायावती का 62वां जन्मदिन आज लखनऊ में धूमधाम से मनाया गया. इस दौरान लखनऊ में बसपा मुख्यालय में केक काटने के बाद उन्होने अपनी किताब बीएसपी की ब्लू बुक ‘मेरे संघर्षमय जीवन और बीएसपी मूवमेंट का सफरनामा भाग-13 का विमोचन भी किया. यह पुस्तक हिंदी और अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित की गई है। जन कल्याण में उनका योगदान देखते हुए पार्टी उनका जन्मदिन जन कल्याणकारी दिवस के रुप में मनाती है.
अपने जन्मदिन के अवसर पर मीडिया को संबोधित करते हुए मायावती ने कांग्रेस तथा भारतीय जनता पार्टी पर जमकर निशाना साधा, उन्होंने कहा कि नरेंद्र मोदी जी इस बार तो गुजरात में बेघर होने से बच गए लेकिन अब उन्हे सतर्क रहना होगा, कांग्रेस तथा भाजपा दोनों ही सांप्रदायिकता तथा जातिवाद को बढ़ावा देकर समाज को बांटने का काम कर रही हैं। औऱ बसपा ही एक ऐसी अकेली पार्टी जो बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर के रास्ते पर पूरी तरह चलती आ रही है। इतना ही नहीं अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं की सराहना करते बहन जी ने कहा कि बसपा ने हमेशा गरीबों, दलित, पिछड़ों के लिए काम किया है औऱ इसके लिए पार्टी कुर्बान होने के लिए हमेशा तैयार रहती है.
इसके साथ ही गुजरात में जिगनेश मेवाणी की जीत पर उन्होने कहा कि एक दलित समाज के व्यक्ति श्री जिग्नेश मेवाणी ने अाज़ाद उम्मीदवार के रूप में जो यह चुनाव जीता है तो यह चुनाव उसने केवल अकेले दलितों के वोटों से नहीं बल्कि कांग्रेस पार्टी व श्री हार्दिक पटेल के समर्थन से ही जीता है और इनकी इस सीट पर कांग्रेस पार्टी ने एक सोची समझी रणनीति के तहत ही अपनी पार्टी का उम्मीदवार भी खड़ा नहीं किया था. अब यह पार्टी पर्दे के पीछे से फायदे उठाना चाहती है जिससे दलित वर्ग के लोगों को सावधान रहना होगा.
बलिया। उत्तर प्रदेश के बलिया में एक पंडित के नेतृत्व में 2 दलित युवकों को गाय चोरी के आरोप में पहले उनका सर मुंडवाया गया और फिर उनके गले में “मैं गाय चोर हूँ” की तख्ती टांगकर गाँव में भर में घुमाया और पीटा गया. ये घटना सुबह 5 बजे की है, जब स्थानीय पंडित ने दलित युवकों उमा और सोनू को दो बछड़े ले जाते हुए देखा. पंडित ने तुरंत ही गाँव वालों इकठ्ठा कर लिया. इसके बाद सबने मिलकर दोनों दलित युवकों को जमकर पीटा और उनका सर भी मुंडवा दिया.
गाँव वालो की क्रूरता यहीं नहीं रुकी, इसके बाद दोनों युवकों को “मैं गाय चोर हूँ” की तख्ती टांगकर गाँव भर में घुमाया गया और इस पूरे वाकये का विडियो बनाकर सोशल मीडिया पर शेयर भी करा गया. दोनों युवकों के खिलाफ गाय चोरी का मामला दर्ज़ करवाया गया और गिरफ्तार भी कर लिया गया. पुलिस के मुताबिक गाज़ीपुर की सड़क पर हुई इस घटना में 15 लोगों के खिलाफ SC/ST Act के अंतर्गत मामला दर्ज़ हुआ है जिनकी तलाश जारी है .
इनमें से एक युवक के पिता सुभाष राम ने बताया कि वो अपने रिश्देतार के यहां जा रहे थे. मठ के आदमियों ने उन्हें पकड़ा और पीट दिया. पुलिस ने वहां पहुंचकर दोनों को भीड़ के हाथों से बचाया. मठ के लोगों ने हमारी जात पूछी और जब उन्हें पता चला कि हम दलित हैं तो फिर बुरी तरह पीटा और हमारे पैसे, मोबाइल और अन्य सामान को छीन लिया.
अमेठी। राहुल गांधी के दो दिवसीय अमेठी दौरे से एक दिन पहले पीएम मोदी का एक विवादित पोस्टर सामने आया है. इस पोस्टर में राहुल गाँधी को ‘भगवान राम’ और पीएम मोदी को ‘रावण’ दिखाया गया है. यह पोस्टर राहुल गाँधी के दौरे से ठीक पहले गौरीगंज रेलवे स्टेशन पर लगा हुआ दिखाई दिया.
इस पोस्टर में राहुल गांधी हाथों में तीर-कमान लिए पीएम मोदी पर निशाना साधे खड़े हैं, वहीं देश के प्रधानमंत्री मोदी को दस सिर वाला रावण बनाया गया है. पोस्टर पर लिखा है, ‘’राहुल के रूप में भगवान राम का अवतार. 2019 में आएगा राहुल राज (रामराज)’’. अपने अध्यक्ष के दौरे से अति उत्साहित कांग्रेसी कार्यकर्ता इस तरह के पोस्टर लगाकर राहुल गांधी का स्वागत कर रहे हैं.
जिले के कांग्रेसी दौरे को विराट बनाने में लगे हुए हैं. वहां वे एक रोड शो भी करने वाले हैं. उनका क़ाफ़िला शहर में सात प्रमुख जगहों पर रुकेगा. वरिष्ठ कांग्रेस नेता अखिलेश सिंह ने बताया कि अमेठी से पहले राहुल गांधी रायबरेली भी जाएंगे. अपनी मां सोनिया गांधी के इस संसदीय क्षेत्र में वे कुछ कार्यक्रमों में हिस्सा ले रहे हैं. यहां वे सालोन में एक जनसभा को भी संबोधित करेंगे. मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक यह पोस्टर अभय शुक्ला नामक एक स्थानीय निवासी ने लगाया है.
शुक्ला का कहना है कि ‘पीएम ने हम लोगों से विदेश में जमा काले धन को वापस लाने का वादा किया था जबकि ऐसा कुछ नहीं हुआ. उन्होंने किए सारे वादे झूठे साबित हुए। हमें भरोसा है कि राहुल गांधी देश के अगले प्रधानमंत्री होंगे. वे सभी वादे पूरे करेंगे’.
गोरखपुर: मकर संक्राति के मौके पर गोरखपुर के गोरक्षनाथ पीठ में महंत की भूमिका निभा रहे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने विपक्षी नेता राहुल गांधी तथा अखिलेश यादव को सकारात्मक राजनीति करने की सलाह दी। साथ ही उन्होने बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष मायावती को उनके 62वें जन्मदिन पर बधाई दी.
विपक्ष पर सीधा निशाना साधते हुए योगी आदित्यनाथ ने कहा कि मकर संक्रांति के अवसर पर मैं विपक्ष को यह सलाह देना चाहता हूं कि वे सुख संकल्प के साथ सकरात्मक राजनीति करें, अगर उन्होने ऐसा नहीं किया तो आने वाले समय में उनको खुद जनता बेनकाब करेगी. इतना ही नहीं राहुल गांधी के दो दिवसिय अमेठी दौरे पर भी तंज कसते हुए उन्होने कहा कि कांग्रेस का अध्यक्ष बनने के बाद आज पहली बार राहुल गांधी उत्तर प्रदेश में आ रहे हैं और मैं उन्हे सलाह दुंगा कि वे बड़ी-बड़ी बातें छोड़कर पहले अपने संसदीय क्षेत्र के विकास पर ध्यान दें. भगवा रंग पर सियासत करने के अलावा विपक्ष के पास कोई और काम नहीं है.
इसी दौरान योगी आदित्यनाथ ने आज बसपा की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती को उनके जन्मदिन की बधाई भी दी और साथ ही यह भी कहा कि मैं उम्मीद करता हूं कि प्रदेश के विकास के लिए वह बसपा के अंदर एक सकारात्मक रवैया अपनाएगीं।
पीयूष शर्मा
सेना दिवस मना रहे भारतीय जवानों ने जम्मू-कश्मीर के उरी सेक्टर में बड़ी कामयाबी हासिल करते हुए जैश-ए-मोहम्मद के 5 दहशतगर्दों को ढेर कर दिया है. आतंकियों की सुचना मिलते ही जम्मू-कश्मीर पुलिस और सीआरपीएफ ने संयुक्त अभियान चलाया. 5 फिदायीनों की मारे जाने की पुष्टि जम्मू कश्मीर पुलिस के डीजीपी एस पी वैद ने की है.
कश्मीर के आईजीपी ने बताया की, आतंकियों का एक गुट रात को उरी सेक्टर के दुलांजा छेत्र में घुसपैठ की कोशिश कर रहा था. सुरक्षाबलों ने उन्हें रुकने की चेतावनी भी दी लेकिन वो नहीं माने जिसके बाद सुरक्षाबलों ने उनकी घेराबंदी कर ली. अपने आप को घिरा देख आंतकवादियों ने सुरक्षाबलों पर फायरिंग करनी शुरू कर दी. मुठभेड़ में सुरक्षाबलों ने 5 आतंकीयों को मार गिराया. अभी भी वहां कुछ आतंकियों के छुप्पे होने की आशंका है जिनसे मुठभेड़ जारी है.
एसपी वैद ने इस कामयाबी के लिए सुरक्षा बलों को को बधाई दी है. जानकारी के मुताबिक अब तक छः में से कुल पांच आतंकियों के शव को बरामद कर लिया गया है. जबकि अन्य की तलाश जारी है. गृहमंत्री ने सुरक्षा बलों को इस कामयाबी के लिए बधाई दी है.
सुरक्षा बल अभी इस इलाके में खोजी अभियान चला रहे हैं. इस ऑपरेशन में भारतीय सुरक्षा बलों को किसी तरह के नुकसान की खबर नहीं है.
पटना: लंबे समय तक शिवहर जिले के अंबा गांव से विधायक और पूर्व केंद्रीय मंत्री रह चुके रघुनाथ झा का दिल्ली में निधन हो गया है. उनके निधन से शिवहर सहित पूरे बिहार में शोक की लहर दौड़ गई है. उनका निधन किडनी की बीमारी के चलते हुआ. उनका पार्थिव शरीर आज दोपहर 2.30 बजे दिल्ली से पटना लाया जाएगा , जहां उनके जिले शिवहर में अंतिम संस्कार किया जाएगा.
82 साल के रघुनाथ झा लालू प्रसाद यादव के करीबी माने जाते थे. उन्होने शिवहर में कई विकास कार्य किए जिसके कारण उन्हे शिवहर जिले का निर्माता कहा जाता था. उनके लिए कहा जाता है कि वे न केवल एक कुशल नेता बल्कि एक कर्मठ समाजसेवी भी थे. अपने कार्यकाल के दौरान वे गोपालगंज एवं बेतिया से सांसद भी चुने गए थे.
रघुनाथ झा के निधन पर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, पूर्र्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी, तेजस्वी यादव, तेजप्रताप यादव एंव श्रीमती मीसा भारती ने पूर्व केंद्रीय मंत्री रघुनाथ झा के निधन पर गहरा शोक वयक्त किया. उनके निधन पर तेजस्वी प्रसाद यादव ने कहा कि ईश्वर दिवंगत आत्मा की चिर शान्ति तथा उनके परिजनों अनुयायियों एवं प्रशंसकों को दुख की इस घड़ी में धैर्य धारण करने की शक्ति प्रदान करे.
पीयूष शर्मा
बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती (फाइल फोटो)
15 जनवरी को बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती का जन्मदिन है. इस मौके पर दलित दस्तक आपके लिए उन 136 दिनों का इतिहास लेकर आया है, जब मायावती पहली बार मुख्यमंत्री बनी थीं.
जब प्रधानमंत्री नरसिंह राव ने सुना कि मायावती उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बन गईं, तब उनकी प्रतिक्रिया थी, यह लोकतंत्र में चमत्कार है. मायावती ने मुख्यमंत्री के रूप में जो सबसे पहला भाषण दिया, उसे सुनने के लिए दर्शकों के गलियारे में उनके निर्माता कांशीराम उपस्थित थे. बसपा नेता की उस समय की एक तस्वीर है, जब लखनऊ पहुंच कर देर से बधाई देते हुए उन्होंने अपनी आश्रिता को फूलों का गुलदस्ता भेंट किया था. उन दोनों के चेहरों पर दिखायी दे रहे भाव एक-दूसरे के प्रति उनकी भावनाओं की गहराई की दास्तान कह रहे थे.
मायावती के पहले सिर्फ तीन दलित मुख्यमंत्री बने थे. आंध्र प्रदेश में डी. संजीवैया, बिहार में राम सुंदर दास औऱ राजस्थान में जगन्नाथ पहाड़िया. इनमें से किसी एक में भी इतनी हिम्मत नहीं थी कि वे उस ऊंची जाति-व्यवस्था का विरोध कर सकें. अपने लिए इस मौके को मायावती ने दोनों हाथों से जकड़ लिया.
सुश्री मायावती और कांशीराम जी
नयी मुख्यमंत्री ने अपने अभियान की शुरुआत नये सिरे से नाम रखने के बड़े अनुष्ठान से की. दलित बहुजन समाज से नाम चुन कर उत्तर प्रदेश में चारों तरफ संस्थाओं, जिलों और इमारतो पर चिपका दिए गये. मायावती का सबसे महत्वकांक्षी और साहसिक काम था, राज्य की राजधानी के बीचों-बीच दलित बहुजन नेताओं के सम्मान में 28 एकड़ का एक विशाल अम्बेडकर पार्क और परिवर्तन चौक बनवाना.
यह सिर्फ एक किस्म की जिद का नतीजा नहीं था, बल्कि यह दलितों को इस बात का विश्वास दिलाने की सोच-समझ कर की गई चेष्टा थी कि भारतीय समाज की नीची श्रेणियों के लिए ऊंचे वर्ग को सबक सिखाना भी मुमकिन था. इससे दलितों के लिए एक बात साफ हो गई कि वे पहली बार शासन प्रणाली में हिस्सेदार थे. उदाहरण के लिए अनुसूचित जाति के अफसरों को आधे जिलों में मजिस्ट्रेट के पद पर बैठाने से और उत्तर प्रदेश में एक चौथाई से ज्यादा पुलिस चौकियों का चार्ज देने के फैसले ने राज्य के दलितों को एक ऐसी सुरक्षा का अहसास कराया. जो उन्होंने कभी पहले कभी महसूस नहीं किया था.
1990 में बसपा के समर्थन से सत्ता में आने पर मुलायम सिंह ने अम्बेडकर ग्रामीण योजना शुरू की थी, वह योजना निर्जीव पड़ी थी. मायावती ने उसी निर्जीव योजना को फिर से चालू किया. उन गांवों में जिनमें अनुसूचित जातियों की जनसंख्या तीस प्रतिशत या ऐसे इलाके जिनमें इससे भी कम यानी बाईस प्रतिशत थी, उन्होंने ढेर सारे सरकारी संसाधन भेजे. इससे दलित प्रधान गांव जो अब तक सबसे खराब हालत में थे, एकदम से सबसे ज्यादा सुविधा प्राप्त इलाके हो गए. जो इलाके परंपरा से धनराशि के लिए तरसते थे, वहां अचानक पक्की सड़कें, हैण्ड पम्प, दवाखाने औऱ पक्के घर दिखायी देने लगे. काफी जगह तो सड़कें उन्हीं हिस्सों में पक्की की गयीं जो दलितों के गांवों से गुजर रहीं थी, और जहां दूसरी जातियों के लोग रहते थे, वहां ऊबड़-खाबड़ कच्चे रास्ते छोड़ दिए गए. आश्चर्य नहीं कि ऊंची और मध्यवर्ती जातियों ने बहुत शोरगुल मचाया. मगर यह शोर-गुल अपने आप में उस समुदाय के लिए एक सुरीले गीत सरीखा था, जिसे सदियों से सुखों से वंचित रखा गया था.
अनुसूचित जातियों की उपजाति वाल्मीकि समाज के बच्चों को उदारतापूर्वक शैक्षिक अनुदान दिये गए. साथ ही एक पुनर्वास योजना की घोषणा की गयी, जिसके माध्यम से उनके पुश्तैनी व्यवसाय से अलग उन्हें अन्य रोजगारों के लिए प्रशिक्षण दिया जाना था. नाविकों और कुम्हार समुदायों के लिए विशेष ढंग के काम किए गये जिनसे उन्हें अपने व्यवसाय और कला में लाभ मिले. मायावती ने मुस्लिम बच्चों को वे सारे शैक्षिक अनुदान देने का प्रस्ताव किया जो उन्होंने अनुसूचित जातियों को दिए थे.
मुसलमानों ने मायावती सरकार के इन भावों की सराहना तो की ही, परंतु जिस बात ने वास्तव में उनका दिल जीत लिया था वह थी, सितंबर 1995 में विश्व हिन्दू परिषद के एक कार्यक्रम को मायावती द्वारा रोक दिया जाना.
मथुरा में विश्व हिन्दू परिषद एक कृष्ण मंदिर के साथ जुड़ी मस्जिद को हटाने के लिए आंदोलन कर रही थी. लखनऊ में मायावती की सरकार को भाजपा समर्थन दे रही थी, जिस कारण उसे यकीन था कि कृष्ण जन्मोत्सव के दिन हिन्दुओं की उग्र भीड़ मस्जिद वाली जगह पर कब्जा कर लेगी. स्थिति भयानक हो चुकी थी, वहां अयोध्या की बाबरी मस्जिद जैसा माहौल बन जाने का डर दिखायी पर रहा था. लेकिन मायावती ने आगे बढ़ कर उस स्थिति को संभाला.
अपनी सरकार की भाजपा के समर्थन पर निर्भरता के बावजूद सबसे पहले उन्होंने विश्व हिन्दू परिषद की धमकियों के सामने डर कर झुकने से इंकार कर दिया. और विश्व हिन्दू परिषद को विवादग्रस्त स्थल से तीन किलोमीटर पीछे रह कर कृष्ण जन्मोत्सव को मनाने को मजबूर कर दिया. लेकिन इसी मथुरा कांड ने मुख्यमंत्री के रूप में मायावती के शासन का अंत होने की पटकथा लिख दी. स्थानीय भाजपा नेता कल्याण सिंह शुरू से ही मायावती के विरोधी थे. उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी अब ऐसे नेता और पार्टी का समर्थन नहीं करेगी जो खुले आम संघ परिवार के हित की विरोधी हो. तो दूसरी ओर गुजरात के भाजपा नेता शंकर सिंह वघेला ने भाजपा द्वारा मायावती सरकार को समर्थन देने का विरोध कर दिया. पार्टी के शीर्ष नेता पार्टी के अंदर के इस विरोध को अनदेखा नहीं कर पाएं और 18 अक्टूबर 1995 को जब मायावती ने सत्ता में अपने 136 दिन पूरे कर लिए थे, भाजपा ने समर्थन वापसी की घोषणा कर दी.
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट में जजों के साथ हो रहे भेदभाव को लेकर इसके चार जजों के सामने आने के बाद जहां देश में बड़ी बहस छिड़ गई है तो वहीं, न्यायपालिका में दलित औऱ पिछड़े समाज के न्यायधीशों की गैरमौजूदगी और न्यायपालिका में भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाने पर दलित समाज से आने वाले जस्टिस कर्णन को जेल भेजे जाने पर बहस छिड़ गई है.
खासकर देश के चीफ जस्टिस के विरोध में सामने आए चार में से दो जजों के यह कहने पर कि वो जस्टिस कर्णन पर दिए फैसले में नियुक्ति फैसले को फिर से देखने के पक्ष में थे, जस्टिस कर्णन को मिली सजा पर विवाद शुरू हो गया है. इस फैसले के बाद सोशल मीडिया पर भी न्यायपालिका और जस्टिस कर्णन को मिली सजा पर बहस छिड़ गई है.
संजय कुमार ने जस्टिस कर्णन की एक फोटो शेयर करते हुए लिखा है-
जस्टिस कर्णन अपनी बेदाग कमीज दिखाते हुए. लेकिन भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाना इन्हें भारी पड़ा और छः महीने की सजा भुगतनी पड़ी और कमीज को दाग लगाने की कोशिश हुई. सुना कि कल जस्टिस कर्णन प्रेस कांफ्रेंस देखकर मुस्करा रहे थे क्योंकि उनके खिलाफ निर्णय लेने में ये 4 जस्टिस महोदय भी थे.
तो लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रोफेसर काली चरण स्नेही ने लिखा है-
जस्टिस कर्णन को क्या दलित होकर न्याय की बात कहने की सजा मिली थी? क्या दलितों की बात कहीं भी नहीं सुनी जाएगी?
न्यायपालिका में जजों की भर्ती और जस्टिस कर्णन और फिर लालू प्रसाद यादव को लेकर दिए गए फैसले पर लगातार टिप्पणी करने वाले वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल ने न्यायपालिका में जातिवाद का मुद्दा उठाते हुए लिखा है-
जस्टिस दीपक मिश्रा ने जस्टिस अरुण मिश्रा से कहा कि लालू यादव का फ़ैसला आप कीजिए. मिश्रा जी ने मिश्रा जी के मन का फ़ैसला दे दिया. हर केस की अलग अलग सुनवाई और 9 महीने में केस निपटाने का आदेश. नीचे की अदालत ने सुप्रीम कोर्ट का मूड भांप लिया. अब नीचे के मनचाहे फ़ैसले आने लगे.
इस तरह भारत में हो रहा है न्याय.
बीजेपी को दीपक मिश्रा पसंद है.
नई दिल्ली: दशकों पहले कानूनी तौर पर आपराधिक धोषित की जा चुकी छुआछूत की प्रथा के आकड़े देखकर आप दंग रह जाएंगे. हाल ही में सोशल एटिट्यूड रिसर्च ऑफ इंडिया द्वार किए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार शहरी राजस्थान में 50%, शहरी उत्तर प्रदेश में 48% और दिल्ली में 39% तक छुआछूत का चलन है. इसके अलावा राजस्थान और उत्तर प्रदेश के दो तिहाई हिस्सों में यह कुप्रथा आज भी कायम है.
यह सर्वे यूनिवर्सिटी ऑफ टैक्सेस और जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी द्वारा किया गया था. इस दौरान फोन के ज़रिए दिल्ली, मुंबई, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के लगभग 8,065 लोगो का इंटरव्यू लिया गया, जिसमे छुआछूत, दलित उत्पीड़न, और अंतरजातीय विवाह पर सवाल किये गये. जिसके बाद इसकी रिपोर्ट इकोनॉमिक एंड़ पॉलिटिकल वीकली में प्रकाशित की गई.
सर्वेक्षण करने वाले अमित थोराट का कहना है कि यह प्रवृत्ति देश के सामाजिक और आर्थिक विकास के लिए बड़ी चुनौती है और इससे समाज की मानसिकता और भी बदतर होती दिख रही है.
बरहाल, इस सर्वेक्षण से जो आंकड़े सामने आए हैं वह शर्मनाक है. आज भी ऐसी कुरीतियां हमारे समाज को जकड़े हुई हैं. और हम विकसित देश बनने का सपना देख रहे हैं. समझ में यह नहीं आता कि जब संविधान छुआछूत जैसी कुप्रथा को आपराधिक करार देता हैं तो ये लोग जो इन कुरीतेयों को बढ़ावा देते हैं उनके उपर ज़मीनी स्तर पर आखिर कोई कार्यवाही क्यों नहीं की जाती.
पीयूष शर्मा
छत्तीसगढ़ में आदिवासियों की मुहिम आखिरकार रंग लाई है. संगठित आदिवासियों के भाजपा सरकार के खिलाफ सड़क पर उतरने के फैसले से घबराई रमन सिंह सरकार ने आखिरकार भू-राजस्व संशोधन विधेयक को वापस लेने का फैसला लिया है. इस संशोधन विधेयक के जरिए राज्य सरकार ने आदिवासियों की जमीन विकास कार्यों के लिए अधिग्रहित और खरीद फरोख्त करने का फैसला लिया था. जिसके बाद आदिवासी समाज ने इसे भारतीय संविधान का उल्लंघन करार देते हुए विरोध शुरू कर दिया था.
इस बिल में संसोधन को लेकर राज्य के आदिवासी मंत्रियों समेत प्रदेश के कई कद्दावर मंत्रियों ने आदिवासी समाज को समझाने की कोशिश की, लेकिन सर्व आदिवासी समुदाय ने राज्य सरकार के तमाम दावों को खारिज कर आंदोलन का रुख अख्तियार करने का फैसला कर लिया था.
राज्य में इस संशोधन के भारी विरोध के बीच आखिरकार मजबूरी में छत्तीसगढ़ सरकार ने गुरुवार 11 जनवरी को कैबिनेट की बैठक बुलाकर इसे वापस ले लिया. भू- राजस्व संहिता संशोधन विधेयक में आदिवासियों की जमीन लिये जाने का कानून पिछले शीतकालीन सत्र में पारित किया गया था. इसके बाद से ही आदिवासी समुदाय लगातार इस कानून का विरोध कर रहा था.
आदिवासी समाज के साथ-साथ मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस भी सरकार के खिलाफ लामबंद हो गई थी, तो वहीं बीजेपी के कई नेता भी इस बिल का लगातार विरोध कर रहे थे. कांग्रेस ने तो इसे आदिवासियों के लिए काला कानून तक करार दे दिया था. छत्तीसगढ़ में इस साल के अंत में ही चुनाव होने हैं, ऐसे में राज्य की बीजेपी सरकार कोई भी जोखिम लेने को तैयार नहीं है. तो वहीं सरकार के पास आदिवासियों की एकजुटता के आगे झुकने के अलावा कोई और विकल्प भी नहीं था.
इस बिल की वापसी से प्रदेश में आदिवासी समाज ने जहां एक बार फिर अपनी ताकत का अहसास करा दिया है तो यह भी साफ संदेश दे दिया है कि आदिवासी समाज के खिलाफ जाकर कोई भी राजनीतिक दल छत्तीसगढ़ की राजनीति में सफल नहीं हो सकती.
अकसर देखा जाता है कि यौन उत्पीड़न के मामलों में पीड़ित महिलाओं पर ही आरोप लगा दिए जाते हैं. कह दिया जाता है कि अपने साथ हुए यौन उत्पीड़न के लिए वो खुद भी ज़िम्मेदार हैं. बलात्कार या यौन हिंसा के पीछे कई बार उनके ‘भड़काऊ’ कपड़ों को वजह बता दिया जाता है. इस धारणा को तोड़ने के लिए बेल्जियम में एक अनोखी प्रदर्शनी का आयोजन किया गया. यहां वे कपड़े प्रदर्शित किए गए जो बलात्कार के वक़्त पीड़िताओं ने पहन रखे थे.
ब्रसेल्स के मोलेनबीक ज़िले में लगाई गई इस प्रदर्शनी को ‘इज़ इट माय फॉल्ट?’ यानी ‘क्या ये मेरी गलती थी?’ नाम दिया गया है. इन कपड़ों में कई ट्रैकसूट बॉटम, पजामे और ड्रेस शामिल थीं, जो पीड़िताओं ने आयोजकों को दी थीं. इस प्रदर्शनी का आयोजन पीड़ित सहायता समूह सीएडब्ल्यू ईस्ट ब्राबेंट की ओर से किया गया था. इस प्रदर्शनी में साफ देखा जा रहा है कि वो कपड़े बहुत हीसाधारण है, और उसे हर कोई पहनता है.
रिपोर्ट के मुताबिक बेल्जियम में होने वाले बलात्कारों के केवल 10 फीसदी मामले ही पुलिस में रिपोर्ट किए जाते हैं और 10 में से एक में ही आरोपी को सज़ा होती है. सीएडब्ल्यू की लिसवेथ केन्स का कहना है कि हमारा समाज ही पीड़िताओं को अपने साथ हुए ग़लत बर्ताव को बताने से रोकता है. केन्स कहती हैं, “पीड़िताओं पर ही उत्तेजक कपड़े पहनने, फ्लर्ट करने या देर रात घर आने का आरोप लगा दिया जाता है, जबकि उस अपराध का ज़िम्मेदार सिर्फ वो अपराधी होता है.” फिलहाल ये अनोखी प्रदर्शनी बलात्कार पीड़िताओं के दर्द की कहानी बयां कर रहा है.
नई दिल्ली । दिल्ली में ज़्यादा तर लोग दफतर या कॉलेज जाने के लिए मेट्रो का इस्तेमाल करते हैं. लेकिन यात्रियों के लिए दिल्ली मैट्रो के नियम और कानून काफी सख्त हैं. हालहीं में नियम और कानून का उलंघन करने वाले यात्रियों से मोटी रकम वसूली गई है. बता दें कि ये रकम जुर्माने के तौर पर वसूली गई है.
दरअसल, दिल्ली मेट्रो के महिला कोच में जाने-अनजाने पुरुष घुस जाते हैं, जिनका उन्हें भारी जुरमाना देना पड़ता है. दिल्ली पुलिस के मुताबिक साल 2017 के अंत तक 9000 चालान काटे गए हैं. ये चालान राष्ट्रीय राजधानी में 153 मेट्रो स्टेशनों पर काटे गए.
एक रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली मैट्रो में रोज़ाना सफर करने वाले यात्रियों की संख्या 27 लाख के आस-पास है. अपकी जानकारी के लिए बता दें कि पिछले दिनों मैट्रो किराये में हुई भारी बढ़ोतरी के बाद रोज़ाना सफर करने वालों कि संख्या में कमी देखी गई है. लेकिन अब भी तकरीबन 24 लाख लोग रोज मैट्रो का सफर करते हैं.
दिल्ली पुलिस के आंकड़ों के मुताबिक, महिला डिब्बों में यात्रा करने वाले 9003 लोगों का चालान काटा गया और मेट्रो में नशे की हालत में यात्रा करने पर 2,399 लोगों के खिलाफ मामला चलाया गया. ऐसी परिस्थितियों से निपटने के लिए मेट्रो पुलिस के लिए आठ नए पुलिस स्टेशन भी बनाए गए हैं.
उत्तर प्रदेश:गुजरात में मेहसाणा नगरपालिका सीट और पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की पूर्व विधायक मंजू बसु का विशवास हारने के बाद अब उत्तर प्रदेश में भाजपा को भारी झटका लगा है. गोरखपुर से सटे कुशीनगर जिले के बीजेपी के दो पूर्व विधायकों ने आज समाजवादी पार्टी का दामन थाम लिया है.
इसमें यूपी के सेवरही विधान सभा क्षेत्र के पूर्व विधायक नंद किशोर मिश्र और नौरंगिया विधानसभा क्षेत्र से विधायक रहे शंभू चौधरी, बीजेपी छोड़कर सपा में शामिल हो चुके हैं. इन दोनों नेताओं को खुद सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने पार्टी की सदस्यता दिलाई. वहीं बसपा के पूर्व विधायक ताहिर हुसैन की भी सपा में जुड़ने की खबर है. इसके अलावा 2017 में बीजेपी से विधानसभा चुनाव लड़ने वाले आरके चौधरी, जिन्होने अखिलेश यादव की मौजूदगी में अपनी पार्टी डीएस-4 बनाई थी, सपा में विलय कर चुके हैं.
इस सबके बीच उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने योगी सरकार पर निशाना साधते हुए कहा है कि यूपी में अपराध बड़ता जा रहा है, लोगों पर अत्याचार हो रहे हैं और पुलिस कुछ नहीं कर रही है.
ऐसे में उत्तर प्रदेश की राजनीति में जो उथल पुथल हुई है 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव में भाजपा को बड़ा झटका लग सकता है.
पीयूष शर्मा
नई दिल्ली : जेल होने के बाद भी लालू प्रसाद यादव पर राजनीति खत्म होने का नाम नहीं ले रही है. लालू के बाद अब निशाना लालू को बचाने वालों पर है. इसमें सबसे पहला नाम उत्तर प्रदेश के जालौन के कलैक्टर डा. मन्नान अख्तर का है. जिन्होने लालू प्रसाद यादव का केस देख रहे सीबीआइ के स्पेशल जज शिवपाल सिंह को फोन किया था. शिवपाल सिंह के मुताबिक डीएम डा. मन्नान अख्तर ने उन्हे फोन करके कहा था कि ‘आप लालू का केस देख रहे हैं, जरा देख लीजिएगा.’ इस मामले में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जांच के आदेश दे दिए हैं और जल्द से जल्द रिपोर्ट सौंपने को कहा है.
शिवपाल सिंह खुद उत्तर प्रदेश स्थित जालौन जिले के शेखपुर खुर्द गांव से हैं. इससे पहले गांव में ज़मीनी विवाद के चलते जज ने डीएम से मदद मांगी थी, लेकिन उन्हें न्याय नहीं मिला था. इतना ही नहीं 12 दिसंबर, 2017 को डीएम और एसपी से शिकायत करने पर डीएम ने कहा, ‘आप झारखंड में जज हैं न, आप कानून पढ़कर आएं. उन्होंने यह भी कहा कि वे एसडीएम के आदेश को नहीं मानेंगे.’
बरहाल, जालौन के डीएम डा. मन्नान अख्तर ने जज से लालू प्रसाद यादव की सिफारिश करने की बात से साफ इंकार कर दिया है. उन्होने यह भी बताया कि जिस तारीख पर फोन करने का जिक्र किया गया है, वे उस वक्त छुट्टी पर थे. मीडिया को संबोधित करते हुए मन्नान अख्तर ने साफ किया उन्होंने किसी की सिफारिश नहीं की है.
पीयूष शर्मा
नई दिल्ली। देश में प्लास्टिक से बनाए जाने वाले राष्ट्रीय झंडे का इस्तेमाल, खरीद या बिक्री कि तो आपको कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ा सकता है और आपको जेल भी हो सकती है. गृहमंत्रालय ने इस संबंध में सभी राज्यों एवं केन्द्र शासित प्रदेशों को फ्लैग कोड का कड़ाई से पालन करने का आदेश दिया है.
गृहमंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, ‘‘हम जल्दी ही प्लास्टिक से बने राष्ट्रीय ध्वजों पर प्रतिबंध का आदेश जारी करेंगे’’. मंत्रालय ने सभी लोगों से आग्रह भी किया कि वह प्लास्टिक के बने राष्ट्रीय झंडे का उपयोग न करें. इतना ही नहीं एडवाजरी भी जारी की है राष्ट्रीय ध्वज देश के लोगों की उम्मीदों और आकांक्षाओं को दर्शाता है और इसलिए इसे सम्मान प्राप्त होना चाहिए.
मंत्रालय ने ध्यान दिलाते हुए कहा के महत्वपूर्ण अवसरों पर कागज के तिरंगे की बजाय प्लास्टिक के तिरंगे का इस्तेमाल किया जा रहा है. परामर्श के मुताबिक, चूंकि प्लास्टिक से बने झंडे लंबे समय तक नष्ट नहीं होते हैं और ये वातावरण के लिए हानिकारक होते हैं. प्लास्टिक से बने राष्ट्रीय झंडों का सम्मानपूर्वक उचित निपटान सुनिश्चित करना एक समस्या है. इसके अलावा, गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस के बाद अक्सर प्लास्टिक से बने ध्वजों के सड़कों और गटरों पर पड़े पाए जाने की शिकायतें आती हैं.
ऐसे में झंडों का निपटारा उनकी मर्यादा के अनुरूप एकांत में किया जाए. प्लास्टिक से बने झंडे का उपयोग ना करने के बारे में व्यापक प्रचार इलेक्ट्रॉनिक एवं प्रिंट मीडिया में विज्ञापन के साथ किया जाए.
नई दिल्ली। 30 नवंबर 2016 को मध्य प्रदेश के रहने वाले श्याम नारायण चौकसे की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सिनेमाहॉल में फिल्म से पहले राष्ट्रगान अनिवार्य कर दिया था. सुप्रीम कोर्ट ने कहा था ‘राष्ट्रगान को लोगों में देशभक्ति जगाने का एक अहम ज़रिया है’. लेकिन कल 09 जनवरी 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में बदलाव किया है, जिसके तहत अगर हॉल मालिक चाहें तो राष्ट्रगान बजा सकते हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने अपने रुख में बदलाव करते हुए ये भी कहा, “लोगों में देशभक्ति जगाना कोर्ट का काम नहीं है. सरकार अगर हमारे आदेश को सही मानती है तो खुद नियम बनाए. कोर्ट के कंधे का इस्तेमाल न करे.”
चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर और न्यायमूर्ति धनन्जय वाई चन्द्रचूड की तीन सदस्यीय बेंच ने उस हलफनामे को स्वीकार किया जिसमे केंद्र सरकार ने राष्ट्रगान से जुड़े सभी पहलुओं को देखने के लिए 12 सदस्यों की कमिटी का गठन करने को कहा है. कमिटी में कई मंत्रालयों के आला अधिकारी शामिल हैं. ये कमेटी छह महीने में राष्ट्रगान को लेकर नियमों में बदलाव पर रिपोर्ट देगी.
केंद्र की तरफ से एटॉर्नी जनरल के के वेणुगोपाल ने सुझाव दिया कि इस दौरान हॉल में राष्ट्रगान बजाने की अनिवार्यता को खत्म कर दे. इस सुझाव को स्वीकार कोर्ट ने कहा, “थिएटर चलाने वाले चाहें तो फ़िल्म से पहले राष्ट्रगान चला सकते हैं. अगर वो ऐसा करते हैं तो हॉल में मौजूद लोगों को उस दौरान खड़ा होना होगा. दिव्यांग लोगों को इससे छूट हासिल होगी.”
कोर्ट ने ये भी कहा कि वो मामले से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई बंद कर रहा है. इससे साफ है कि अब ये सरकार को ही तय करना है कि भविष्य में सिनेमा हॉल या दूसरी जगहों में राष्ट्रगान अनिवार्य होगा या नहीं.