कासगंज हिंसा में जलाईं मुसलमानों की दुकानें, हिंदु मुलाजिम हुए बेरोज़गार

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कासगंज। कासगंज सांप्रदायिक हिंसा के चलते 27 जनवरी को घंटाघर चौक पर मुस्लिमों की पांच दुकानें जला दी गाईं जिसमें लगभग 20 हिन्दु काम करते थे. दुकाने जलने के बाद अब ये सभी कर्मचारी बेरोज़गार हो गए हैं. इन्ही में से एक दुकान ‘बाबा शू कंपनी’ के मालिक सरदार अली खान ने बताया कि दुकान जलने से उनका करीब आठ लाख रुपये का नुकसान हो गया, यहां छह लोग काम करते थे जिनमें से चार हिंदु थे. सारा कारोबार ठप्प हो गया, अब फिर से शुरुआत करने में पीढ़ियां लग जाएंगी. सरदार ने कहा कि “जब मेरी दुकान जलाई जा रही थी तब मैने उन्हे रोकने की लेकिन उन्होंने मुझे दुकान से बाहर निकाल कर मारपीट शुरू कर दी.

इसी दुकान पर काम करने वाले वीर बहादुर ने निराशा जताते हुए कहा कि वह पिछले सात सालों से बाबा शू कंपनी में काम कर रहा था. उसे रोजाना 180रुपए मिलते थे लेकिन अब उसे नहीं पता कि वह क्या करेगा. इसी तरह मंसूर अहमद की भी दुकान जला दी गई जिसकी दुकान में छह हिंदू काम करते थे. मंसूर अहमद के अनुसार जिन लोगों ने दुकानें जलाईं उनको पता ही नहीं इस दुकान के ज्यादातर कर्मचारी हिंदू हैं.”

आपको बता दें कि यह मामला कासगंज हिंसा से जुड़ा है जिसमें 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के मौके पर तिरंगा यात्रा को लेकर हिंसा भड़की थी. जिसमें चंदन नाम के एक लड़के की गोली मारकर हत्या करने के बाद हिंसा ने और भयानक रूप ले लिया. और गुस्साए लोगो ने मुस्लिम समुदाय के लोगों की दुकानें जला दी गई और कई वाहनों को आग के हवाले कर दिया गया था.

पीयूष शर्मा

रविदास जयंती मनाने पर पुलिस ने किया लाठीचार्ज

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खजुराहो। हाल ही में संत शिरोमणि रविदास जी की 641वी जयंती देश भर में हर्षोल्लास के साथ मनाई गई. इस दौरान मध्यप्रदेश के छतरपुर जिले के राजनगर फौजदार मोहल्ले में पुलिस द्वारा दलितों के साथ मारपीट किए जाने की खबर है. जयंती मना रहे स्थानीय लोगों का कहना है कि रविदास जयंती दलित समाज के लोगों द्वारा मनाई जा रही थी. इसी दौरान कुछ असमाजिक तत्व जयंती के कार्यक्रम में जबरन घुसकर लोगों को परेशान करने लगे. इस पर जब लोगों ने 100 नंबर पर डायल किया तो वहां पहुंची पुलिस ने जयंती मना रहे दलितों पर ही लाठी चार्ज कर दिया.

आरोप यह भी है कि पुलिस कुछ लोगों को पकड़ कर थाने ले गई. महिलाओं ने आरोप लगाया कि पुलिस वाले अक्सर उनके घरों में घुस जाते हैं और उन्हें तंग करते हैं. रविदास जयंती की घटना के बाद गांव के तमाम लोग पुलिस स्टेशन गए लेकिन पुलिस ने उनकी एक न सुनी.

दूसरी ओर पुलिस इस मामले में दूसरी ही कहानी गढ़ रही है. पुलिस वाले अपना पल्ला झाड़ने के लिए दलित बस्ती के लोगों पर ही आऱोप मढ़ रही हैं. औऱ दलितों को किसी भी तरह प्रताड़ित करने से इंकार कर रही है. हालांकि लोगों का आऱोप है कि पुलिस हमारे यहां केवल छोटे लोगों पर ही दबाव बनाती है और बड़े अपराधियों से प्यार से बात करती है. तो वहीं पुलिस का यह भी कहना है कि दलित बस्ती में अवैध शराब की बिक्री होती है, बवाल होता है इसलिए हमें जाना पड़ता है तो ऐसे में सवाल यह उठता है कि अवैध शराब बिक्री पर पुलिस औऱ प्रशासन आखिर क्यों मौन हैं? दलित दस्तक के लिए खजुराहो से कालीचरण अग्रवाल की रिपोर्ट

डॉ. अम्बेडकर को महापुरुष बनाने वाली महानायिका रमाबाई अम्बेडकर

प्रत्येक महापुरुष के पीछे उसकी जीवन-संगिनी का बड़ा हाथ होता है। जीवन साथी का त्याग और सहयोग अगर न हो तो व्यक्ति का महापुरुष बनना आसान नहीं है। रमाताई अम्बेडकर इसी त्याग और समर्पण की प्रतिमूर्ति थीं, जिसके आधार पर डॉ. अम्बेडकर देश के वंचित तबके का उद्धार कर सकें. आज रमाबाई अम्बेडकर की जयंती है। रमाबाई का जन्म महाराष्ट्र के दापोली के निकट वणंद गांव में 7 फरवरी 1898 में हुआ था। इनके पिता का नाम भीकू धूत्रे (वणंदकर) और मां का नाम रुक्मणी था। वह कुलीगिरी का काम करते थे और परिवार का पालन-पोषण बड़ी मुश्किल से कर पाते थे। रमाबाई के बचपन का नाम रामी था। बचपन में ही माता-पिता की मृत्यु हो जाने के कारण रामी और उसके भाई-बहन अपने मामा और चाचा के साथ मुंबई आ गए जहां वो लोग भायखला की चाल में रहते थे। सन् 1906 में रामी का विवाह भीमराव अम्बेडकर से हुआ।

डॉ. अम्बेडकर रमा को ‘रामू ‘ कह कर पुकारा करते थे जबकि रमा ताई बाबा साहब को ‘साहब ‘ कहती थी। बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर जब अमेरिका में थे, उस समय रमाबाई ने बहुत कठिन दिन व्यतीत किये. बाबासाहेब जब विदेश में थे, तब भारत में रमाबाई को काफी आर्थिक दिक्कतों को झेलना पड़ा, लेकिन उन्होंने बाबासाहेब को इसकी भनक नहीं लगने दी। एक समय जब बाबासाहेब पढ़ाई के लिए इंग्लैंड में थे तो धनाभाव के कारण रमाबाई को उपले बेचकर गुजारा करना पड़ा था। लेकिन उन्होंने कभी भी इसकी फिक्र नहीं की और सीमित खर्च में घर चलाती रहीं।

दोनों की गृहस्थी शुरू होने पर सन् 1924 तक दोनों की पांच संताने हुई। किसी भी मां के लिए अपने पुत्रों की मृत्यु देखना सबसे ज्यादा दुख की घड़ी होती है। रमाबाई को यह दुख सहना पड़ा। बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर और रमा ताई ने अपने पांच बच्चों में से चार को अपनी आंखों के सामने अभाव में मरते हुए देखा। गंगाधर नाम का पुत्र ढाई साल की अल्पायु में ही चल बसा। इसके बाद रमेश नाम का पुत्र भी नहीं रहा। इंदु नामक एक पुत्री हुई मगर, वह भी बचपन में ही चल बसी थी। सबसे छोटा पुत्र राजरतन भी ज्यादा उम्र नहीं देख पाया। यशवंत राव उनके सबसे बड़े पुत्र थे जो जिंदा बचे। इन सभी बच्चों ने अभाव में दम तोड़ दिया। जब गंगाधर की मृत्यु हुई तो उसकी मृत देह को ढ़कने के लिए गली के लोगों ने नया कपड़ा लाने को कहा। मगर, उनके पास उतने पैसे नहीं थे। तब रमा ताई ने अपनी साड़ी से कपडा फाड़ कर दिया था। वही मृत देह को ओढ़ा कर लोग श्मशान घाट ले गए और पार्थिव शरीर को दफना आए थे।

रमा इस बात का ध्यान रखती थी कि पति के काम में कोई बाधा न हो। रमाताई संतोष, सहयोग और सहनशीलता की मूर्ति थी। डॉ. अम्बेडकर प्राय: घर से बाहर रहते थे। वे जो कुछ कमाते थे, उसे वे रमा को सौप देते और जब आवश्यकता होती, उतना मांग लेते थे। रमाताई घर का खर्च चला कर कुछ पैसा जमा भी करती थी। बाबासाहेब की पक्की नौकरी न होने से उसे काफी दिक्कत होती थी। आमतौर पर एक स्त्री अपने पति से जितना वक्त और प्यार चाहती है, रमाबाई को वह डॉ. अम्बेडकर से कभी नहीं मिल सका। लेकिन उन्होंने बाबासाहेब का पुस्तकों से प्रेम और समाज के उद्धार की दृढ़ता का हमेशा सम्मान किया। वह हमेशा यह ध्यान रखा करती थीं कि उनकी वजह से डॉ. अम्बेडकर को कोई दिक्कत न हो।

डॉ. अम्बेडकर के सामाजिक आंदोलनों में भी रमाताई की सहभागिता बनी रहती थी। दलित समाज के लोग रमाताई को ‘आईसाहेब’ और डॉ. अम्बेडकर को ‘बाबासाहेब’ कह कर पुकारा थे। बाबासाहेब अपने कामों में व्यस्त होते गए और दूसरी ओर रमाताई की तबीयत बिगड़ने लगी। तमाम इलाज के बाद भी वह स्वस्थ नहीं हो सकी और अंतत: 27 मई 1935 में डॉ. अम्बेडकर का साथ छोड़ इस दुनिया से विदा हो गई।

रमाताई के मृत्यु से डॉ. अम्बेडकर को गहरा आघात लगा। वे बच्चों की तरह फूट-फूट कर रोये थे। बाबासाहेब का अपनी पत्नी के साथ अगाध प्रेम था। बाबसाहेब को विश्वविख्यात महापुरुष बनाने में रमाबाई का ही साथ था। बाबासाहेब के जीवन में रमाताई का क्या महत्व था, यह एक पुस्तक में लिखी कुछ लाइनों से पता की जा सकती है। दिसंबर 1940 में बाबासाहेब अम्बेडकर ने “थॉट्स ऑफ पाकिस्तान” नाम की पुस्तक को अपनी पत्नी रमाबाई को ही भेंट किया। भेंट के शब्द इस प्रकार थे.. “रमो को उसके मन की सात्विकता, मानसिक सदवृत्ति, सदाचार की पवित्रता और मेरे साथ दुःख झेलने में, अभाव व परेशानी के दिनों में जब कि हमारा कोई सहायक न था, अतीव सहनशीलता और सहमति दिखाने की प्रशंसा स्वरुप भेंट करता हूं…”

डॉ. अम्बेडकर द्वारा लिखे गए इन शब्दों से स्पष्ट है कि माता रमाबाई ने बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर का किस प्रकार संकटों के दिनों में साथ दिया और बाबासाहेब के दिल में उनके लिए कितना सत्कार और प्रेम था। दलित दस्तक इस महान महिला को नमन करता है।

कांग्रेस मुख्यालय पर आज से राहुल दरबार

नई दिल्ली। पार्टी कार्यकर्ताओं से सीधा संवाद करने के लिए कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अब पार्टी मुख्यालय में बैठेंगे. राहुल गांधी सप्ताह में दो से तीन दिन पार्टी मुख्यालय पहुंच कर वहां कार्यकर्ताओं से मिलेंगे. पार्टीजनों से मुलाकात का यह सिलसिला बुधवार से शुरू हो रहा है. कांग्रेस अध्यक्ष की इस नई पहल को 2019 आम चुनाव की तैयारी के रूप में देखा जा रहा है.

कांग्रेस ने बाकायदा अपने ट्वीटर हैंडल पर बुधवार को राहुल गांधी के कार्यकर्ताओं से मुलाकात के कार्यक्रम की जानकारी साझा की है. इसके मुताबिक वे बुधवार सुबह 9.30 से 11 बजे तक मुख्यालय में मौजूद रहेंगे और कार्यकर्ताओं से मिलेंगे. राहुल गांधी का यह कदम इसलिए भी खास है क्योंकि कोई कांग्रेस अध्यक्ष 19 साल बाद ऐसा कर रहा है. सोनिया गांधी पार्टी कार्यालय आने की बजाय अपने 10 जनपथ स्थित आवास से ही सारा काम निबटाती रहीं हैं.

पार्टी सूत्रों ने बताया कि पिछले कुछ दिनों से जिन पार्टी नेताओं-कार्यकर्ताओं ने उनसे मिलने का समय मांग रखा था, उन्हें फोन कर कांग्रेस मुख्यालय बुलाया जा रहा है. इनमें दिल्ली और देश के अन्य हिस्सों के नेता व कार्यकर्ता शामिल हैं. फिलहाल उन राज्यों के कार्यकर्ताओं को प्राथमिकता दी जाएगी, जहां इसी साल विधानसभा चुनाव होने हैं. जाहिर सी बात है कि अपने इस कदम से राहुल गांधी अपने कार्यकर्ताओं के और करीब आने में सफल होंगे. और आने वाले दिनों में कांग्रेस को अपने अध्यक्ष के इस कदम से मजबूती मिल सकती है.

चंद्रशेखर रावण की जमानत को लेकर पूर्व न्यायाधीशों ने लिखा सीएम योगी को खत

Bhim Army founder Chandrashekhar Azad 

नई दिल्ली। सहारनपुर मामले में हिंसा फैलाने के आरोप में जेल में बंद भीम आर्मी के प्रमुख चंद्रशेखर आजाद रावण की रिहाई को लेकर देश के तीन पूर्व न्यायाधीश सामने आ गए हैं. सिटिजंस फॉर जस्टिस एंड पीस नाम के नागरिक अधिकार संगठन की ओर से पूर्व न्यायाधीश सहित नौ सिविल राइट एक्टिविस्ट ने यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ को पत्र लिखकर चंद्रशेखर के खिलाफ सभी आरोपों को खारिज करने और उन्हें ज़मानत देने की मांग की है. साथ ही उनके बिगड़ते स्वास्थ को लेकर चिंता जताई है. पत्र की एक कॉपी गृहमंत्री राजनाथ सिंह औऱ राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को भी भेजी गई है.

पत्र में चंद्रशेखर रावण के एनएसए की अवधि को बढ़ाने को लेकर हैरानी जताई गई है. पत्र में चंद्रशेखर आजाद पर बेबुनियाद इल्ज़ाम लगाए जाने की बात कही गई है. साथ ही यह भी कहा गया है कि रावण पर राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम रासुका के तहत आरोप थोपे जा रहे हैं. पत्र में इस बात को लेकर भी विरोध जताया गया है कि सरकार की तरफ से रासुका का आदेश उस वक्त आया जब उन्हें ज़मानत मिल चुकी थी और वह रिहा होने वाले थे.

सिविल राइट्स एक्टिविस्ट के ग्रुप ने पत्र में चंद्रशेखर रावण के स्वास्थ को लेकर चिंता जताते हुए कहा है कि अगर चंद्रशेखर रावण को कुछ होता है तो इसकी जिम्मेदारी यूपी के सीएम और गृहमंत्री की होगी. चंद्रशेखर पर लगे आरोपों का जिक्र करते हुए उन्होंने साफ किया है कि भीम आर्मी द्वारा किया गया विरोध प्रदर्शन इतना गंभीर नहीं था जिसके लिए एनएसए लागू किया जाए. और यह नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं और वरिष्ठ न्यायाधीशों का भी मानना है. इस पत्र में भीम आर्मी द्वारा बच्चों के लिए 350 से ज्यादा स्कूल चलाने का भी जिक्र किया गया है, जिसे पिछले 9 महीनों से सरकार ने जबरन बंद करवा दिया है.

सरकार के नाम लिखे इस पत्र में सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज जस्टिस पी बी सावंत, रिटायर्ड हाई कोर्ट जज जस्टिस बी जी कोलसे पटिल, रिटायर्ड हाई कोर्ट जज जस्टिस होसबेट सुरेश, सीजेपी सचिव तीस्ता सितलवार, भीम आर्मी डिफेंस कमेटी के संयोजक प्रदीप नरवाल, लेखक एवं कार्यकर्ता राम पुनियानी, पत्रकार जावेद आनंद, एकैडेमिक मुनीज़ा खान और ग्लोकल यूनीवर्सिटी के प्रोफेसर खालिद अनिस अंसारी ने हस्ताक्षर किया है. इन सबने चंद्रशेखर आज़ाद रावण को तुरंत ज़मानत पर रिहा करने की मांग की है.

“आरक्षण से चयनित दलितों की क्षमता व उत्पादकता विषयक भ्रांति का वास्तविक मूल्यांकन”

आजकल सोशल मीडिया में आरक्षण से चयनित दलितों के संबध में उनकी क्षमता व दक्षता पर अति रंजित प्रचार प्रसार किया जा रहा है. अधिसंख्य लोंगों ने तो यहां तक अवधारणा बना ली है कि परीक्षा में 10% अंक पाने वाले दलित अभ्यर्थियों का इंजीनियरिंग व मेडिकल में दाखिला हो जाता है और ये लोग इंजीनियर डाक्टर बन जाते हैं. आरक्षण विरोधियों का मानना है कि आरक्षण कोटे से बने डॉक्टर मरीजों का क्या ईलाज करेंगे? ऐसे डॉक्टर मरीजों को मारेंगे ही. इसी प्रकार कोटे से बने इंजीनियर द्वारा निर्मित पुल तो गिरेगा ही, क्योंकि दलितों में योग्यता तो होती नहीं. वे ठीक से पढ़ना लिखना भी नहीं जानते. इस प्रकार की नकारात्मक सोच के चलते दलितों का हर पल मनोबल गिराने का प्रयास आज भी जारी है. डॉक्टर इंजीनियर ही नहीं किसी भी सेवा में अक्षमता और अयोग्यता के मनगढ़ंत दोषारोपण का सामना करना तो दलितों की चिरकाल से नियति बन चुकी है.

फेसबुक पर आरक्षण विरोधियों ने आरक्षण समाप्त कराने के लिए एक मंच बना लिया है औरसामान्य जाति के लोंगो को इसमें शामिल होने का आह्वान किया जा रहा है. ताकि पूरी शक्ति के साथ आरक्षण पद्धति का विरोध किया जासके. आरक्षण विरोधियों की समझ में आरक्षण के कारण दलितों के अयोग्य और अक्षम लोग तो नौकरियों में चुने जा रहे हैं, परन्तु योग्य और क्षमता सम्पन्न सामान्य जाति के लोग परेशान घूम रहे हैं. इन आरक्षण विरोधियों के मन में यह भी चिन्ता है कि केन्द्र सरकार द्वारा जो 15% आरक्षण “प्रेसीडेन्सियल आर्डर, 1950” द्वारा दलितों को अनुमन्य किया गया था, उसे भी वे अपने हिस्सा मानकर दलितों से क्षुब्ध प्रतीत होते हैं, जैसे कि देश की नौकरियों पर केवल उन्हीं का अधिकार हो. वे विगत हजारों साल से शत-प्रतिशत सरकारी सेवाओं पर काबिज रहे हैं. क्या हजारों साल मानवाधिकारों से वंचित समाज को यदि 70 वर्षों के स्वतंत्र भारत के कालखंड में कुछ सुविधाएं या संरक्षण संविधान में प्रवृत प्रावधान से मिल भी गयी तो ऐसा क्या अनर्थ हो गया, जो आरक्षण विरोधी इतना तिल मिलाए हुए हैं.

साथ ही यह भी आरक्षण विरोधियों को सोचना होगा कि देश के सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालयों, केन्द्रीय मंत्रिमंडल, सभी राज्यों के मंत्रिमंडलों, आईएएस, आईपीएस, अन्य केन्द्रीय व राज्य सेवाओं, राज्यों के मुख्यमंत्रियों व मंत्रियों देश के विभिन्न राज्यों के राज्यपालों तथा विश्वविद्यालयों के कुलपतियों के पदों में सवर्ण लोगों की कितनी-कितनी संख्या है और इनके सापेक्ष वंचितों का प्रतिनिधित्व इन पदों पर कितना है? सब पदों के आंकड़ें रखकर तथ्यात्मक बात रखनी चाहिए न कि एक सिरे से सब मिलकर दलितों और पिछड़ों के आरक्षण को ही कोसना शुरु कर दें और प्रलाप करें कि यह तो सब कुछ गलत हो रहा है और उनके हिस्से के पद आरक्षण के कारण अक्षम और अयोग्य दलितों में बांटे जा रहे हैं.

यही नहीं, इस पर भी आरक्षण विरोधी बंधुओं को विचार करने की आवश्यकता है कि दुनियां के दूसरे देशों में सामाजिक न्याय के तहत भारत जैसी सुविधाएं या संरक्षण समाज के कमजोर तबकों को उपलब्ध है या नहीं? यहां विश्व के सबसे ताकतवर देश (अमेरिका) का उल्लेख करना समीचीन होगा. अमेरिका में जब यह अहसास किया गया कि अश्वेतों के साथ सामाजिक न्याय नहीं हो पा रहा है तो वहां सकारात्मक कृत्य (एफरमेटिव एक्शन) के द्वारा ऐसे वंचितों को सरकारी व निजी क्षेत्र की सेवाओं में कुछ संरक्षण व रियायतें देने का निर्णय लिया गया जो वहां सबको स्वीकार है,

इसी प्रकार द.अफ्रीका, मलेशिया व ब्राजील आदि देशों में भी अमेरिका की भांति ही वंचितों को एफरमेटिव एक्शन के द्वारा वहां के समाज ने विकास में सहर्ष सहभागिता दी है. लेकिन अत्यंत विडम्बना पूर्ण है कि भारत में सवर्णों में कुछ लोग (सभी सवर्ण नहीं) सदियों से सामाजिक न्याय से वंचित दलितों को न्याय मिलते देखना नहीं चाहते. इसीलिए आये दिन ऐसे लोग योग्यता व प्रतिभा के बहाने आरक्षण को समाप्त कराने के लिए सवर्ण समाज को लामबंद करने की गुहार लगाते रहते हैं. नि:संदेह उनका यह प्रयास सफल नहीं हो सकेगा, क्योंकि संविधान के अनुच्छेद 16(4) व 16(4-ए) द्वारा पिछड़ चुके अनु.जाति तथा अनु.जन जाति के लोंगो को जो आरक्षण अनुमन्य किया गया है, वह संविधान के अन्तर्गत मौलिक अधिकारों के संवर्ग में आता है. सर्वोच्च न्यायालय के अनुसार मौलिक अधिकारों में संशोधन या इन्हें रद्द करने का अधिकार किसी को नहीं है. लेकिन लगता है जानकारी के अभावमें आरक्षण विरोधी अकारण हो हल्ला मचाए हुए हैं.

कदाचित आरक्षण विरोधियों के परिज्ञान में यह भी नहीं है कि दलित/वंचित वर्ग की आर्थिक स्थिति आरक्षण केलिए प्रासंगिक नहीं है. वंचित वर्ग को आरक्षण उनके आर्थिक पिछड़ेपन के कारण नहीं मिला हुआ है, बल्कि यह उनके“सामाजिक व शैक्षणिक पिछड़ेपन” को दृष्टिगत रखकर संविधान में प्रवृत्त किया गया है. इस पिछड़ेपन का प्रमुख कारण समाज में प्रचलित जातिगत भेदभाव को माना गया है. नि:संदेह जब तक भारतीय समाज जातीय विद्वेष से ग्रसित रहेगा, कदाचित आरक्षण को समाप्त करना संभव नहीं होगा. कुछ यही विचार रा.स्व.संघ सहित अन्य समाजसेवी संस्थाओं व राजनीतिक दलों का भी है.

शायद आज की पीढ़ी के लोग यह भी जानने की जिज्ञाशा नहीं रखते कि जाति प्रथा का दंश वंचित तबके के लोग विगत लगभग तीन हजार वर्षों से झेल रहे हैं. समाज ने इनके ऊपर इतने जुल्म ढाये हैं कि सुनकर ही आदमी के रोंगटे खड़े हो जायें. प्रबुद्ध लोग जरा विचार करके देखें कि कितनी प्रताड़ना, अन्याय व मानवाधिकारों से वंचना के दुर्दिन दलितों ने हजारों साल देखे. क्या यह ईश्वर का बनाया कानून हो सकता है? जिसमें दलितों को न शिक्षा काअधिकार हो, न संपत्ति रखने का अधिकार हो और यहां तक कानून हो कि सवर्ण जब चाहें दलितों की संपत्ति लूटसकते हैं.इस अन्याय पूर्ण व्यवहार पर उस समय का शासनतंत्र इनकी रक्षा बिल्कुल नहीं करता था. इसी कारण हजारों वर्षों तक इस वर्ग ने भयावह प्रताड़ना और उत्पीड़न अपने ही सहधर्मियों के हाथों झेला है. तब जाकर इस अन्याय को चुनौति देने के लिए ईश्वर ने एक अंबेडकर पैदा किया. श्रीमद् भगवद्गीता में भगवान कृष्ण ने स्वयं कहा है कि:-

“यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत. अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्.. परित्राणाय साधुनाम् विनाशाय च दुष्कृताम्. धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे..”

भावार्थ:-जब भी जहां धर्म का पतन होता है और अधर्म की प्रधानता होने लगती है तब-तब मैं आता हूं. भक्तों का उद्धार करने, दुष्टों का विनाश करने तथा धर्म की फिर से स्थापना के लि मैं हर युग में प्रकट होता हूं.

अत: ईश्वर का मनुष्य मात्र से यह वादा है कि जब भी पृथ्वी पर अत्याचार बढ़ेगा, ईश्वर इस अत्याचार को समाप्त करने की चिंता स्वयं करेंगे या फिर ऐसे किसी महापुरुष को उत्पन्न करेंगे जो मनुष्य मात्र पर होने वाले अन्याय व उत्पीड़न का शमन कर सके. कुछ ऐसी ही परिस्थितियों में डॉ० अंबेडकर दलित, वंचित वर्ग के परित्राण हेतु दलित घर में जन्म लेते हैं और उनके कष्टों का शमन करने के लिए प्रयास आरंभ करते हैं. डॉ० अम्बेडकर के अथक प्रयासों से वंचितों के नरकीय जीवन का अंत तो कुछ सीमा तक हुआ, लेकिन यह दलितों का दुर्भाग्य रहा कि जातीय विद्वेष की समाप्ति का जो सपना डॉ० अम्बेडकर ने संजोया था, उस सपने का अनुष्ठान पूर्ण होने से पूर्व ही वे संसार से महाप्रयाण कर गये. आरक्षण विरोधी लोगों का मत तो यह भी है कि देश से प्रतिभा पलायन भी बहुतांश में आरक्षण से तंग हो कर सामान्य वर्ग के युवक कर रहे हैं. यह बिल्कुल झूठ है. पलायन सरकारी नौकरी न मिलने के कारण नहीं, बल्कि निजीक्षेत्र में मिलने वाले हाई पैकेजेज के प्रलोभन में हो रहा है और दोष आरक्षण व्यवस्था के सिर मढ़ा जा रहा है. अस्तु, दलितों के विरुद्ध नकारात्मक सामाजिक अवधारणा के चलते और सहधर्मियों द्वारा इन पर बलताः थोंपी गयी आत्महीनता से दलितों को निस्तेज बनाने के प्रयास सदियों से होते रहे हैं. इसके बावजूद भी ये लोग संघर्ष करके अपनी कार्य दक्षता विपरीत सामाजिक परिस्थितियों में भी यह दृष्टिगत रखकर बनाये हुए हैं कि कहीं इनकी नौकरी खतरे में न पड़ जाये. कुछ यही सोचकर ऐसी विकट छवि के संकट के बीच भी दलित अपनी क्षमता व दक्षता के सामंजस्य को अक्षुण्ण बनाये हुए हैं. इन सभी परिस्थितियों की वास्तविकता की परख के लिए दिल्ली स्कूल आफ इकोनोमिक्स (दिल्ली विश्वविद्यालय,दिल्ली) के श्री अश्विनी देशपांडे और अमेरिका की मिशिगन यूनिवर्सिटी के श्री टॉमस ए वेस्काप्फ ने वर्ष 2010 में भारतीय रेल सेवा के आठ जोन के 1980 से 2002 के बीच के आंकड़े एकत्र करके आरक्षण से भर्ती हुए कर्मचारियों व अधिकारियों की दक्षता और उत्पादकता का अध्ययन किया है. यह पेपर इंटरनेट पर उपलब्ध है. वैसे इस भ्रांति पर कि क्या आरक्षण के कोटे से आये कर्मचारियों/अधिकारियों के आने से उत्पादकता और दक्षता बढ़ी है या घटी है? आम तौर पर इस विषय में अधिक अध्ययन नहीं हुआ है. अश्विनी देशपांडे व टामस की जोड़ी ने जो अध्ययन किया, उनके अध्ययन का निष्कर्ष चौंकाने वाला था. शोधकर्ताओं के अनुसार कोटे से आये लोगों से भारतीय रेल की उत्पादकता और दक्षता बढ़ी है घटी नहीं. जबकि इस विषय में दलितों के लिए आरक्षण विरोधियों ने बिल्कुल विपरीत अवधारणा बना रखी है.

यही नहीं, एनडीटीवी इंडिया के हृदयेश जोशी ने भी अपनी एक स्टोरी में कुछ ऐसा ही अनुभव बताया .कहा कि उनके पिता बीमार थे, वे ईलाज के लिए उन्हें भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान(एम्स),नई दिल्ली ले गये. वहां जो चिकित्सकों की टीम उनके पिता का ईलाज कर रही थी, उस टीम में प्रोफेसर राजन सहित सभी डॉक्टर दलित ही थे. जोशी जी ने माना कि उन्हें यह देखकर पहले तो वैसा ही डर लगा, जैसी अवधारणा दलितों के विषय में समाज में बनी हुई है, क्योंकि बीमारी भी थोड़ा गंभीर ही थी. बाद में उनके पिता जब बिल्कुल ठीक हो गये तो प्रोफेसर राजन से हृदयेश जोशी ने उत्सुकतावश पूछा कि आप लोग सभी दलित डॉक्टर एक ही टीम में क्यों काम करते हो? तो उन्होंने कहा कि हम लोग अलग-अलग टीम में काम करेंगे तो सामान्य वर्ग के दूसरे डॉक्टरों की गलती भी हमारे सिर आसानी से मढ़ दी जायेगी. इसका अर्थ यह हुआ कि दलित वर्ग का कर्मचारी समाज की आरक्षण विरोधी मानसिकता के चलते कितना सतर्कता से काम करता है, फिर भी हर पल अक्षमता के दोषारोपण से कितना डरा रहता है.

जहां तक दलित छात्रों के विरुद्ध जातिगत भेद आधारित आक्रामकता का प्रश्न है, इसमें एक स्टोरी में एनडीटीवी इंडिया ने बताया कि नई दिल्ली में एक बहुत ही प्रतिष्ठित मेडिकल कॉलेज है, जिसका नाम वर्द्धमान महावीर मेडिकल कॉलेज है. इसके 35 छात्रों को फीजियोलॉजी के एक पेपर में जान-बूझकर कई वर्षों तक फेल किया जाता रहा, जबकि सामान्य जाति का एक भी छात्र इस पेपर में फेल नहीं किया गया. इनमें से 14 छात्र तो ऐसे थे, जिन्हें 4 से 14 बार तक फीजियोलॉजी के पेपर में फेल किया गया. यह सब कॉलेज प्रशासन द्वारा दलितों के प्रति उनकी अतिशय घृणा के परिणाम स्वरूप हुआ. इस अन्याय से विक्षुब्ध होकर 30 नवम्बर,2010 को 35 अनु.जा./अनु.ज.जा.के छात्रों ने राष्ट्रीय अनुसूचित आयोग से इसकी शिकायत की. आयोग ने इसकी जांच भालचन्द्र मुंगेकर, पूर्व सदस्य योजना आयोग, जो राज्यसभा के सदस्य भी रह चुके थे,को सौंप दी. उन्होंने जांच के बाद पाया कि कॉलेज प्रशासन ने जातिगत भेदभाव से छात्रों को फेल किया. इसी बीच छात्रों ने दिल्ली हाईकोर्ट से गुहार लगाई कि उनके साथ कॉलेज द्वारा परीक्षाओं में जातिगत भेदभाव से फ़ेल किया जा रहा है. हाईकोर्ट ने सुनवाई के बाद किसी स्वतंत्र एजेंसी से परीक्षा आयोजित करा कर मामले को निबटारा करने का निर्णय दिया. तद्नुसार छात्रों की परीक्षा दिल्ली हाईकोर्ट की निगरानी में कराई गयी और सभी छात्र फीजियोलॉजी के पेपर में उत्तीर्ण हो गये. इस पेपर में उत्तीर्ण घोषित होने पर भी इन छात्रों को द्वितीय वर्ष के छात्रों के साथ बैठकर पढ़ने पर भी आपत्ति की गई. किसी तरह कोर्ट के हस्तक्षेप से ही विवाद निपटा.

इस प्रकार दलित वंचित लोगों के विकास के रास्ते में लगातार अतिरंजित विचारधारा के लोग रोड़े अटकाने सेचूक नहीं रहे. जो देश 21 वीं सदी में विश्व मंच पर शक्ति सम्पन्न देशों की कतार में खड़े होने को आतुर है, उस भारतदेश में यदि वही तीन हजार वर्षों पूर्व की दलित वंचित विरोधी आक्रामक अवधारणा जारी रहेगी तो किस मुंह से हम अपने आपको प्रगतिशील कह सकेगें और क्या यह कदाचित वेद ऋचाओं से पुष्पित व पल्लवित उदात्त भारतीय संस्कृति की अद्वितीय अवधारणा “सर्वे भवन्तु सुखिन:”और “वसुधैव कुटुम्बकम” की अवमानना नहीं है? इस पर खुले दिमाग से हर भारतवासी को विचार करने की आवश्यकता है.

प्रेम चन्द्र छाछर, ज्वाइंट कमिश्नर(से.नि.), वाणिज्य कर विभाग,उ.प्र., पंजाबी कॉलोनी,नि.शिव मंदिर, धामपुर(बिजनौर) Email- premc.chhachhar@yahoo.com

भाजपा के सीएम ने साल भर में चाय-पानी पर खर्च किया 68 लाख

उत्तराखंड के सीएम त्रिवेन्द्र सिंह रावत

नई दिल्ली। देश में 60 से 70 फीसदी परिवार ऐसे हैं जो 15 हजार रुपये से 50 हजार रुपये तक में पूरे महीने अपने घर का खर्च चला लेते हैं. यानि की साल का 1 लाख 80 हजार से लेकर 6 लाख तक. इस पूरी राशि में उस परिवार की थोड़ी बहुत सेविंग्स भी शामिल रहती है. वहीं अगर आपको यह पता चले कि एक मुख्यमंत्री अपने दफ्तर में लोगों को चाय पिलाने में सिर्फ 11 महीनों में 68 लाख रुपये से ज्यादा खर्च कर दे, तो फिर आप क्या कहेंगे??

जी हां, यह खबर सच है. पार्टी विद डिफरेंट का दावा करने वाली भारतीय जनता पार्टी के नेता और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने पद संभालने के बाद से अब तक मेहमानों को चाय-पानी कराने में 68 लाख रुपये से ज्यायदा खर्च कर दिया है. राज्ये सरकार ने सूचना का अधिकार कानून (आरटीआई) के तहत यह जानकारी दी है.

 

आरटीआई कार्यकर्ता हेमंत सिंह गौनियों ने 19 दिसंबर, 2017 को सीएम द्वारा चाय-पानी के मद में किए गए खर्च के बारे में जानकारी मांगी थी. राज्य सचिवालय प्रशासन की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक, उत्त राखंड सरकार ने 11 महीनों में चाय-पानी पर कुल 68,59,865 रुपये खर्च किए.

इस खबर के सामने आने के बाद सोशल साइट्स में भाजपा और सीएम रावत की खूब खिंचाई हो रही है. सौरव सिन्हा ने लिखा- ‘अब की बार रिफ्रेशमेंट सरकार.’ आलोक कुमार सिंह ने चुटकी लेते हुए लिखा- ‘राष्ट्र।वादी नाश्ताघ है भाई. तो वहीं पंकज कुमार ने नरेंद्र मोदी के बयान का हवाला देते हुए लिखा, ‘बहुत अच्छा! ना खाउंगा, ना खाने दूंगा डायलॉग का क्या हुआ?’ त्रिवेंद्र सिंह रावत ने 18 मार्च, 2017 को उत्तराखंड के मुख्यचमंत्री पद की शपथ ली थी. उत्तराखंड चुनावों में भाजपा ने 70 सदस्यीय विधानसभा में 57 सीटें हासिल की थीं.

वैंकैया नायडू के खिलाफ पूरे विपक्ष ने किया वॉकआउट

नई दिल्ली। राज्यसभा के सभापति वैंकैया नायडू पर पक्षपात करने का आरोप लगाते हुए पूरे विपक्ष ने मंगलवार को राज्यसभा से वॉक आउट कर दिया. वॉक आउट करने वाले दलों में कांग्रेस से लेकर सपा, टीएमसी, आम आदमी पार्टी सहित सभी विपक्ष के दल एकजुट होकर सदन से बाहर आ गए. विपक्ष की इस एकजुटता और वॉक आउट के बाद राज्यसभा की कार्यवाही पूरे दिन के लिए स्थागित हो गई.

सदन से बाहर आए कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद ने कहा कि विपक्ष के सांसदों का यह काम है कि वह राज्यों से जुड़े जनहित के मुद्दों को नोटिस देकर राज्यसभा के भीतर उठाएं. लेकिन ऐसा कई बार होता है कि मामला इतना जरूरी होता है कि पहले से नोटिस देने की प्रक्रिया को पूरा नहीं किया जा सकता लेकिन इसके बावजूद परंपरा यह रही है कि अगर मामला संवेदनशील और गंभीर है तो सांसदों को अपनी बात उठाने का मौका मिलता है. लेकिन राज्यसभा में लगातार विपक्ष की आवाज दबाने की कोशिश की जा रही है और उन्हें नहीं बोलने दिया जा रहा है. समाजवादी पार्टी सांसद नरेश अग्रवाल ने कहा कि अगर सभापति का यही रवैया रहा तो आगे भी हम निर्णय लेंगे कि क्या करना है? पिछले एक सप्ताह से सभापति इसी ढंग से फैसले कर रहे हैं.

तृणमूल कांग्रेस के सांसद डेरेक ओ ब्रायन ने कहा कि सदन के अंदर और सदन के बाहर डेमोक्रेसी का मर्डर हो रहा है. इसलिए सब लोग इकट्ठा होकर यहां पर आए हैं. तो वहीं आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह ने कहा कि सभापति सदन को इस ढंग से चला रहे हैं कि सदन के बाहर और भीतर दोनों जगह विपक्ष को बोलने नहीं देना है. आज पूरा सदन ऑर्डर में था. कोई वेल में नहीं गया. आज हम सभी लोग अपनी जगह खड़े होकर अपनी बात कह रहे थे. इसके बावजूद सभापित ने सदन को 2:00 बजे तक के लिए स्थगित कर दिया. इसका मतलब सरकार का मकसद है कि बाहर और भीतर दोनों जगह विपक्ष को बोलने मत दो.

तो इस बात पर लालू ने बीजेपी को दिए 100 में से 100 अंक

पटना। आरजेडी सुप्रीमों लालू प्रसाद यादव यूं तो इस वक्त जेल में सज़ा काट रहें हैं लेकिन उनके आधिकारिक ट्विटर अकाउंट पर समय समय पर ट्विट्स देखने को मिलते रहते हैं. जेल में होने के बावजूद भी वे सरकार पर निशाना साधने से नहीं चूकते, इस बार फिर बजट पेश होते ही लालू ने ट्वीटर के ज़रिए भाजपा सरकार को सवालों के कठधरे में खड़ा कर दिया है. वित्त मंत्री अरुण जेटली द्वारा बजट पेश करने के बाद सरकार पर तंज कसते हुए लालू यादव ने ट्विट किया ‘जैसे हरिद्वार से बंगाल की खाड़ी तक गंगा मैया क्लीन होकर अविरल हो गईं, जैसे देश में 100 स्मार्ट सिटी बनकर तैयार है, 15 लाख रुपये मिल गए, वैसे ही किसानों की आय दोगुनी हो जाएगी, वैसे ही गरीबों को मेडिक्लेम मिलेगा।’ ट्विट के साथ ही लालू ने भाजपाइयों को झूठ बोलने के लिए 100 में से 100 अंक दे डाले. लालू के इन तीखे सवालों से साफ है कि वह विरोधियों पर तंज कसने का कोई मौका नहीं छोड़ते. हाल ही में पेश हुए बजट में 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने के वादे पर लालू ने सरकार पर सीधा हमला बोलते हुए कहा कि जनता ने वर्तमान सरकार को बहुमत 2019 तक दिया है ना कि 2022 तक, सरकार इसका रोडमैप दे. केवल हवाई बातों और मुंह जुबानी खर्च से आय दोगुनी हो जायेगी क्या?

पियूष शर्मा  

सिद्धारमैया ने दिया पीएम मोदी को भ्रष्टाचार पर चर्चा का चैलेंज

कर्नाटक। इस साल कर्नाटक में होने वाले चुनाव कि तैयारी में भाजपा सेंध लगाने की पूरी कोशिश कर रही है. इसके चलते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को कर्नाटक में रैली की थी. रैली को संबोधित करते हुए पीएम मोदी ने कहा कि राज्य की कांग्रेस सरकार ने बहुत लूट मचाई है, अब कर्नाटक में बीजेपी की सरकार राज्य के विकास को21वीं सदी में ले जाएगी और सबकी जिंदगी को आसान बनाएगी.

उनके इस भाषण पर पलटवार करते हुए कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्दारमैया ने ट्वीट के ज़रिए पीएम मोदी को वॉक द टॉल्क (चलते चलते बातचीत) करने के लिए निमंत्रण दिया. उन्होने ट्वीट किया वह खुश हैं कि पीएम नरेंद्र मोदी भ्रष्टाचार पर बात कर रहे हैं. मैं उन्हें वॉक द टॉल्क (चलते चलते बातचीत) करने के लिए निमंत्रण देना चाहूंगा. शुरुआती मुद्दे कुछ इस तरह हो सकते हैं:

1.लोकपाल की नियुक्तिब 2.दूसरा, जज लोया केस की जांच 3.तीसरा, जय शाह की संपत्तिं अचानक बढ़ जाना 4. आपकी पार्टी की तरफ से बेदाग चेहरे को सीएम पद का उम्मीदवार क्यों नहीं बनाया गया पर चर्चा की जा सकती है.

उनकी नाराज़गी इतने पर ही खत्म नहीं हुई, पीएम मोदी के इस भाषण की निंदा करते हुए सिद्दारमैया ने यह भी कहा कि “देश के प्रधानमंत्री होने के नाते आपके शब्दों में विश्वसनीयता होनी चाहिए, इसलिए मैं आपसे अनुरोध करता हूं कि इन आरोपों को सिद्ध करें. क्यों न हम ये चुनाव राजनैतिक गरिमा को बचाने और तथ्यों के आधार पर लड़ें”.

पियूष शर्मा

क्या भारत बिटकोइन पर पूर्ण नियंत्रण कर पायेगा

पूरी दुनिया में जो भी मुद्रा है उस पर किसी ना किसी सरकार का उस पर नियंत्रण होता है पर बिटकोइन ऐसी मुद्रा है जिस पर किसी भी सरकार का नियंत्रण नही है.

बिट कोइन एक क्रिप्टोकरेंसी है जो पैसे के आसानी से लेन देन में सहूलियत देता है. इसका प्रयोग पैसे भेजने के लिए वैलेट एप का इस्तेमाल किया जाता है.

आप को जो भी रूपया भेजना है वो वैलेट एप में टाइप कीजिए जिसको भेजना है उसका अकाउंट नंबर टाइप करिए और उसे पैसे भेज दिए जायेंगे यानि बिटकोइन भेज दिए जायेंगे.बाद में वह व्यक्ति उस बिट कोइन को अपनी मुद्रा में बदल सकता है. एक बिटकोइन 13000 डालर के बराबर होता है.

बिटकोइन नेटवर्क में दो KEY होती है एक प्राइवेट KEY होती है और एक पब्लिक KEY होती है जो निजता को बना कर रखती है.

बिटकोइन एक डिजिटल करेंसी है जो किसी बैंक या सरकार से जुडी हुई नही होती है.जैसे हमारा भारतीय रुपया भारतीय रिज़र्व बैंक से जुडा हुआ है जिसे भारतीय रिज़र्व बैंक विनियमित करता है. बिटकोइन, सरकार या बैंक से ना जुडी होने कि वजह से कोई भी गुपचुप तरीके से बिना कर दिए हुए पैसा खर्च कर सकता है.

बिटकोइन कैश का ऑनलाइन संस्करण है जिससे आप बहुत सी वस्तुयें खरीद सकते है जैसे हार्डवेयर के सामान ,पेंट ,कुछ खाने कि वस्तुयें. पर यह ज्यादा अभी भारत में प्रचलित नही है जिससे हर जगह इस तरह की दुकानों की उपलब्धता मुश्किल है.

बिटकोइन नेट्वर्क को कोई भी संस्था अपने नियंत्रण में नही रखती है बिटकोइन नेटवर्क से कोई भी जुड़ सकता है. बिटकोइन से जितने भी लेन देन अब तक हुए है वो सारे PUBLIC LEDGER में जमा है. PUBLIC LEDGER की साइज़ 107 GB (गीगाबाइट) होती है इस PUBLIC LEDGER में सिर्फ खाताधारक का नंबर व कितने बिटकोइन का लेन देन हुआ ही रिकॉर्ड में रहता है.

1 नवम्बर 2008 को एक ऑनलाइन फोरम था जिस पर लोग बात कर रहे थे एक डिजिटल करेंसी के बारे में तभी वहां सातोशी नाकामोटो नाम का एक यूजर आता है. जो लोगों के सामने एक प्लान बताया की हम लोग एक डिजिटल करेंसी बनाते है बिटकोइन के नाम से. सातोशी नाकामोटो नाम का कोई व्यक्ति है या नही कहाँ का था कोई साक्ष्य उपलब्ध नही है.

बिटकोइन कि खोज करने के बाद सातोशी नाकामोटो सिर्फ एक साल तक ही ईमेल का जवाब दिए उसके बाद उन्होंने इसका जवाब देना बंद कर दिए.

असली पैसे को बिटकोइन से खरीदा जा सकता है.चूँकि पहले से ही हम लोग रूपये के जगह सोना चांदी का प्रयोग लेन देन में करते आ रहे है. जैसे अमेरिका में पहले AZTECKS कोकाबिन (COCOA BEANS ) का प्रयोग करते थे. हाल ही में बिटकोइन का महत्व 60% तक बढ़ गयी है. इन दिनों ज्यादातर देश इसका प्रयोग कर रहे है जल्दी और सस्ती लेन देन के लिए.

जापान ने क्रिप्टोकरेंसी को कानूनी मुद्रा मान ली है. रूस भी कानूनी मुद्रा घोषित करने पर विचार कर रहा है. जापान इस समय दुनिया का सबसे बड़ा बिटकोइन बाजार बन चुका है. अभी हाल ही में हम लोगों ने सुना था की रैमसमवेयर(RANSOMWARE) नामक वायरस ने दुनिया भर के कम्पूटर को हैक कर लिया था और लोगो से फिरौती मांग रहे थे और वो सारी फिरौती बिटकोइन में मांग रहे थे क्योंकि बिटकोइन में फिरौती मांगने वाले को पकड़ना मुश्किल है.

बिटकोइन के प्रयोग के फायदे भी बहुत है अगर आप को दुनिया में कहीं भी जल्दी से जल्दी पैसा पहुँचाना है तो सस्ते और आसानी से बिटकोइन के द्वारा संभव है.

बिटकोइन के प्रयोग के नुकसान भी है चूँकि ज्ञात है की भारत में 90% इंटरनेट यूजर को बिटकोइन के प्रयोग के बारे में पता ही नही है ,बिटकोइन कभी भी घट बढ़ सकता है , 21 मिलियन से ज्यादा बिटकोइन नही हो सकते. गूगल के पूर्व सीईओ ERIC SCHMIDT ने कहा “बिटकोइन एक असाधारण क्रिप्टोग्राफिक उपलब्धि है यह एक अच्छी चीज है जो दुनिया को अच्छा प्रभाव देगी”.

PAYPAL के सह संस्थापक पीटर थिएल ने कहा “ बिटकोइन दुनिया को बदल सकता है”. अभी हाल में क्या हुआ की भारत ने उन लोगो को नोटिस भेज दिया जो लोग क्रिप्टोकरेंसी में व्यापार कर रहे थे और कर नही दे रहे थे.

आज के समय भारत में क्रिप्टोकरेंसी की व्यापार दर 3.5 मिलियन पहुँच गई है. इसका प्रयोग कंप्यूटर जानकार युवा निवेशक, रियल इस्टेट व्यवसायी ,सोना व्यवसायी कर रहे हैं व जिसके पास पैसे है वो लोग बिटकोइन और आभासी मुद्रा (VIRTUAL CURRENCY ) का प्रयोग बड़े धलल्ले से कर रहे है.

भारत में सबसे ज्यादा बिटकोइन का प्रयोग मुंबई ,दिल्ली ,बेंगलोर , पुणे जैसे बड़े शहरों में काफी बढ़ गया है.

भारतीय रिज़र्व बैंक ने कई बार इस प्रकार के लेन देन करने वाले निवेशकों को हिदायत दी थी.वित्त मंत्री अरुण जेटली ने तो यहाँ तक कह दिया की बिटकोइन भारत में लीगल टेंडर नही है आप यहाँ निवेश मत करिए यहाँ आपको नुकशान हो सकता है. भारत में हर महीने बिटकोइन का प्रयोग करने वाले करीब 2000 यूजर बढ़ रहे हैं.

आयकर अधिनियम 1961 की धारा 55 जो कहता है की स्व उत्पन्न CAPITAL ASSESTS पर कर नही लगेगा पर वह बिटकोइन अगर खरीददारी में प्रयोग में लाया गया तो कर देना पड़ेगा. इस तरीके की बड़ी लेनदेन करने पर 20% तक कर चुकाना पड़ता है.

आजकल जिसके भी पास बेहिसाब पैसा(BLACK MONEY) है वे लोग बिटकोइन के प्रयोग की तरफ काफी तेजी से बढ़ रहे है इसलिये आज की तारीख में बहुत जरूरी हो गया था इस पर पाबंदी लगाना. जो भी भारत की खुफिया विभाग हैं वो सब पहले ही पाबंदी लगाने के लिए कह चुकी थी. खुफिया विभाग का मानना है की अपहरण/व्यपहरण जैसी घटनाएँ बढ़ सकती हैं. इससे और भी अपराध बढ़ सकते हैं जिससे राष्ट्रिय सुरक्षा प्रभावित हो सकती है.

जो भी भारत के आपराधिक सिंडीकेट ,नशीली दवावों के तस्कर ,कर चोर हैं इससे आसानी से रुपये को बिटकोइन में बदल सकते हैं.

भारत के लोग भी इस तरीके के क्रियायों में आगे बढ़ रहें है क्योंकि डिजिटल पैसे पर टैक्स छापे मारना मुश्किल है. आज भारत दुनिया में क्रिप्टोकरेंसी के प्रयोग में 19 वें स्थान पर है.

ZEBPAY जो भारत का सबसे बड़ा बिटकोइन लेन देन का फोरम है उसके रिपोर्ट के अनुसार 2017 में एक लाख से बढ़ कर पांच लाख तक इसके यूजर हो गये हैं.

अमेरिका ने बिटकोइन के प्रयोग को कानूनी बना दिया है और वहां कि सरकार इस तरीके के व्यापार और निवेशकों पर कर लगाने पर विचार कर रही है.

कनाडा ने भी बिटकोइन के प्रयोग को कानूनी मान्यता दे दी है, ऑस्ट्रेलिया ने भी काफी हद तक बिटकोइन को मान्यता दे दी है और कानूनी रूप भी दे दिया है.

लगभग पूरे यूरोप में जैसे बेल्जियम ,साइप्रस ,यूके ,स्विट्ज़रलैंड ,इटली ,नीदरलैंड ,फ्रांस सारे देश बिटकोइन को कानूनी रूप दे दिया गया है.सिंगापुर में भी बिटकोइन कानूनी है, जापान ने भी बिटकोइन को कानूनी कर दिया है यहाँ की सरकार ने बिटकोइन को डिजिटल मुद्रा मान ली है और यहाँ के लोग बढ़ चढ़ कर निवेश कर रहे हैं. इसराइल ने भी बिटकोइन को कानूनी मान्यता दे दी है.

रूस ने अभी कानूनी मान्यता नही दी है उसे लग रहा है उसकी मुद्रा रूबल को प्रभावित करने के लिए बिटकोइन मुद्रा अमेरिका की साजिश हो सकती है. रूस ने एक क्रिप्टो सिक्का बना दिया है और इसे अपने देश में लागू कर दिया है. जो आगे चल कर भारत भी कर सकता है पूरी तरीके से नियन्त्रण के लिए.जो उस मुद्रा को भारत सरकार विनियमित करेगी.जिसमे काफी नियम और विनियमन होंगे जो लोगों को निवेश करने के लिए आकर्षित करेंगे.

जैसा की हम लोग जानते हैं की बांग्लादेश और नेपाल ने बिटकोइन को बैन कर रखा है पर आज भी बांग्लादेश और नेपाल के लोग बिटकोइन से व्यापार कर रहे हैं उसको पूरी तरीके से नियन्त्रण में नही कर पा रहे हैं.

भारत ने भी इसी की तर्ज़ पर बिटकोइन को बैन कर दिया है अब देखना यह है की क्या भारत इस पर पूर्ण नियन्त्रण रख पायेगा या बांग्लादेश और नेपाल की तरह ही इसका भी नियन्त्रण इस पर संभव नही हो पायेगा.अगर पूर्ण नियन्त्रण कर पाता है तो यह फैसला आपराधिक सिंडीकेट, नशीली दवावों के तस्कर, कर लुटेरों पर जोरदार हमला साबित होगा.

चीनी Box Office की नंबर वन फिल्म सीक्रेट सुपरस्टार

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मुंबई। आमिर खान फिल्म सीक्रेट सुपरस्टार ने चीन के बॉक्स ऑफ़िस पर अब बड़ा तहलका करने जा रही है. फिल्म ने अपनी जबरदस्त कमाई का सिलसिला जारी रखा है और अब कलेक्शन 100 मिलियन डॉलर से बस कुछ ही दूर हैं.

चीन की बाहुबली यानि बॉक्स ऑफ़िस पर नंबर वन के स्थान पर जा बैठी अद्वैत चंदन निर्देशित इस फिल्म ने चीन में अपनी रिलीज़ के 17वें दिन 11.63 मिलियन डॉलर यानि 74 करोड़ 97 लाख रूपये का कलेक्शन किया. आमिर खान प्रोडक्शन में बनी ज़ायरा वसीम स्टारर फिल्म सीक्रेट सुपरस्टार अब तक चीन में 91.29 मिलियन डॉलर यानि 584 करोड़ 60 लाख रूपये का कलेक्शन कर चुकी है और जिस रफ़्तार से चल रही है फिल्म को 100 मिलियन डॉलर तक पहुंचने में एक दो दिन और लगेंगे. वैसे आपको बता दें कि फिल्म के कलेक्शन की रफ़्तार थोड़ी गिरी है क्योंकि वहां के बॉक्स ऑफ़िस पर अब चीन की अपनी फिल्म ‘Till the End of the World’ रिलीज़ हुई हैl वैसे सीक्रेट सुपरस्टार का आमिर खान की पिछली फिल्म दंगल के चीनी बॉक्स ऑफ़िस के कलेक्शन तक पहुंचना मुश्किल होगा. दंगल ने 17 दिनों में 125. 39 मिलियन डॉलर यानि 804 करोड़ 31 लाख रूपये का कलेक्शन किया था. हाल के दिनों में चीन के बॉक्स ऑफ़िस पर रिलीज़ दुनिया की कई बेहतरीन फिल्मों को पटखनी दे कर आमिर खान की सीक्रेट सुपरस्टार पहले ही नंबर वन का स्थान हासिल कर चुकी है.

सीक्रेट सुपरस्टार एक ऐसी लड़की की इमोशनल कहानी है जो अपने भीतर के गायकी के हुनर को दुनिया के सामने लाना चाहती है लेकिन उसके पिता, समाज के डर से उसे ऐसा करने से रोकते हैं. बाद में वो इंटरनेट पर वीडियो डाल कर फेमस हो जाती है. और इसी कारण फिल्म चीन वालों के दिल को छू गई.

दिल्ली के कार्यकर्ता सम्मेलन में दो बातें कहने से चूक गईं मायावती

बहुजन समाज पार्टी की दिल्ली यूनिट की ओर से 4 फरवरी को दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में प्रदेश स्तरीय कार्यकर्ता सम्मेलन का आयोजन किया गया. कार्यकर्ता सम्मेलन को बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष मायावती ने संबोधित किया. इस दौरान मायावती ने तमाम मुद्दों पर दिल्ली के कार्यकर्ताओं को संबोधित किया. इसमें हर बार की तरह मायावती ने बाबासाहेब और मान्यवर कांशीराम के सपने और राजनीति का जिक्र किया. साथ ही राज्यसभा से इस्तीफा देने के कारणों को लेकर एक बार फिर चर्चा की.

कार्यकर्ता सम्मेलन के दौरान बसपा प्रमुख मायावती ने खास कर तीन नई बातें कहीं. उन्होंने पहली बार विपक्षी दलों में मौजूद दलित नेताओं पर जमकर निशाना साधा. उन्होंने कहा कि भाजपा में बैठे दलित और ओबीसी नेता असल में बंधुआ मजदूर हैं. दलित ओबीसी नेताओं पर तंज कसते हुए मायावती ने कहा कि विरोधी पार्टियां दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्ग के नेताओं को भले ही कितना भी महत्पूर्ण पद क्यों न दे दें वो वहां बंधुआ मजदूर ही रहेंगे.

जो दूसरी बात है, वह यह रही कि मायावती ने दिल्ली के उपचुनाव को लड़ने की घोषणा की, जिसका सभी कार्यकर्ताओं ने तालियां बजाकर स्वागत किया. आम आदमी पार्टी के 20 विधायकों के अयोग्य घोषित होने के बाद दिल्ली में उपचुनाव की संभावना तेज हो गई है. ऐसे में आमतौर पर उप चुनावों से दूर रहने वाली बसपा की मुखिया मायावती ने कहा कि वह इस उपचुनाव में अपने कैंडिडेट उतारेंगी. इस कार्यकर्ता सम्मेलन की तीसरी महत्वपूर्ण बात यह रही कि बसपा प्रमुख ने अपने उपर पैसे लेने के इल्जाम को फिर से नकारा. उन्होंने विस्तार से यह बताया कि आखिर बसपा कार्यकर्ताओं से पैसे क्यों लेती है.

हालांकि इस कार्यकर्ता सम्मेलन में दो और बातें कही जा सकती थी. लगभग एक घंटे के भाषण में मायावती ने 25वें मिनट में बजट पर चर्चा की. हालांकि वो बजट को लेकर सरकार को घेरने से चूक गईं. बजट में दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों के हक को लेकर वह सरकार को घेर सकती थीं. तो वहीं सम्मेलन में बहुजन समाज के तमाम युवा मौजूद थे. बसपा प्रमुख ने एक बार भी उन युवाओं को सीधे संबोधित नहीं किया. अगर वो युवाओं का आवाह्न करतीं तो जाहिर सी बात है कि इससे एक बड़ा मैसेज जाता और युवा वहां से ऊर्जा लेकर जातें.

 

अमित शाह ने राज्यसभा में दिया पहला भाषण, देखिए क्या कहा

amit-shahनई दिल्ली। हाल ही में राज्यसभा पहुंचे भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने सोमवार को राज्यसभा सदस्य के रूप में अपना पहला भाषण दिया. अपने पहले भाषण में शाह ने एनडीए सरकार की उपल्ब्धि गिनाई और कांग्रेस पर निशाना साधा. उन्हों ने माना कि बेरोजगारी है लेकिन साथ ही यह भी कहा कि 55 साल कांग्रेस ने शासन किया. हम पिछले आठ साल से सत्ता में हैं.

इस दौरान उन्होंने पीएम मोदी के पकौड़े वाले बयान का भी बचाव किया. शाह ने कहा, “ कोई व्यक्ति मेहनत करके, पकोड़े बेचकर कोई रोजगार करता है,क्या हम उसकी तुलना भिखारी से करेंगे.” उन्हों ने कहा कि देश की जनता ने कांग्रेस को हराया है. आजादी के बाद पहली बार किसी गैर कांग्रेसी दल को पूर्ण बहुमत मिला. अपने पूरे भाषण के दौरान शाह एनडीए सरकार की उपलब्धियों को गिनवाते रहें.

 

‘उनको जवाब नहीं देंगे तो विश्व भर में नामर्द कहलाएंगे’

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नई दिल्ली। पाकिस्तान की तरफ से बार-बार हो रही गोलीबारी और सीज फायर के उल्लंघन को लेकर केंद्र सरकार विपक्ष के निशाने पर है. महाराष्ट्र में भाजपा की प्रमुख सहयोगी पार्टी शिवसेना के नेता अक्सर विवादित बयान देते रहते हैं. खासकर हिन्दुत्व और पाकिस्तान को लेकर वो काफी कड़ी भाषा का इस्तेमाल करते हैं. रविवार को भारत के एक कैप्टन सहित 4 जवानों के शहीद होने पर शिवसेना ने बड़ा बयान दिया है.

शिवसेना ने पाकिस्तान की कार्रवाई को युद्ध बताया है। एएनआई के अनुसार शिवसेना नेता संजय राउत ने कहा “सीज़फायर उल्लंघन की बात छोड़ दीजिए, यह सीधा युद्ध है, यह हमला है और उसका जवाब उसके तरीके से देना चाहिए. अगर आप उसका जवाब नहीं देंगे तो इस देश को पूरे विश्व में नामर्द कहा जाएगा. रविवार को पाकिस्तान ने हमारे जवानों पर हमला करने के लिए मिसाइल्स का इस्तेमाल किया. क्या हमारी मिसाइल केवल राजपथ की शोभा बढ़ाने और प्रदर्शनी के लिए रखी हुई हैं. क्या वे केवल 26 जनवरी को विदेशी प्रमुखों को दिखाने के लिए रखी गई हैं.”

कौन नहीं चाहता कासगंज में सब सामान्य हो जाए

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कासगंज। सांप्रदायिक हिंसा की आग में झुलस रहे उत्तर प्रदेश के कासगंज में स्थिति धीरे-धीरे सामान्य हो ही रही थी, लेकिन सोमवार 5 फरवरी को एक बार फिर से माहौल को बिगाड़ने की कोशिश की गई. ताजा रिपोर्ट के मुताबिक आज यहां गंजडुंडवारा कस्बे में एक धार्मिक स्थल का दरवाजे जला मिला, जिसके बाद भीड़ इकट्ठी हो गई. जानकारी के मुताबिक, सुबह पांच बजे गंजडूंडवारा कस्बे में स्थित धार्मिक स्थल के लकड़ी के दरवाजे में आग लगने की खबर मिली. आनन-फानन में पुहंची पुलिस ने आग को बुझाया. घटना की सूचना मिलते ही डीएम, एसपी और कई बड़े अधिकारी मौके पर पहुंचे और हालात का जायजा लिया. घटना के बाद इलाके में ऐहतियात के तौर पर अतिरिक्त सुरक्षाबल की तैनाती कर दी गई है. बता दें कि कासगंज में गणतंत्र दिवस के दिन तिरंगा यात्रा निकालने को लेकर हुए विवाद के बाद हिंसा में चंदन गुप्ता नाम के युवक की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी, जिसके बाद वहां के हालात बिगड़ते चले गए. हर दूसरे दिन जैसे ही लग रहा है कि स्थिति सामान्य है, वहां कुछ न कुछ घटित हो जा रहा है. सवाल है कि आखिर वो कौन लोग हैं जो नहीं चाहते कि कासगंज में हालात बिगड़े.  

मोहल्ले से शवयात्रा निकलने पर जातिवादियों ने मृत महिला के बेटे को पीटा

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सांकेतिक तस्वीर 

पंचमहल (गुजरात)। गुजरात में जातिवादियों के हौंसले लगातार बुलंद हैं. लेकिन वहां पिछले कई सालों से मौजूद सरकार उनको रोक नहीं पा रही है. ताजा मामला गुजरात के पंचमहल जिले का है, जहां पर जातिवादियों ने दलित समाज की एक महिला की शवयात्रा को रोक दिया और उसके बेटे के साथ मारपीट की. यह मामला पिंगली गांव का है.

दिनेश सोलंकी द्वारा कालोल पुलिस थाने में दर्ज कराई गई शिकायत के अनुसार, दिनेश की मां गंगा का हार्ट अटैक के कारण निधन हो गया था। शनिवार की सुबह गंगा के परिजन उसके शव को लेकर दरबार समुदाय के प्रभुत्व वाले इलाके से गुजर रहे थे कि तभी जातिवादियों के कुछ लोगों ने उनका रास्ता रोक दिया. उन्होंने शव यात्रा को वहां से निकलने नहीं दिया. इसे लेकर दोनों पक्षों के बीच बहसबाजी हुई और जातिवादी गुंडों ने दिनेश की पिटाई कर दी, जिसके बाद इसकी शिकायत पुलिस से की गई. सूचना मिलते ही पुलिस की एक टीम मौके पर पहुंची और पुलिस की मौजदगी में मृतक महिला का अंतिम संस्कार कराया गया. फिलहाल पुलिस ने इस मामले में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम और आईपीसी के प्रावधानों के तहत 12 लोगों के खिलाफ केस दर्ज किया है.

दिल्ली उपचुनावों के बारे में मायावती की बड़ी घोषणा

नई दिल्ली। आमतौर पर उप चुनावों से दूर रहने वाली बहुजन समाज पार्टी दिल्ली के उप चुनाव लड़ेगी. यह घोषणा बसपा की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने दिल्ली में आज कार्यकर्ता सम्मेलन के दौरान किया. मायावती ने कहा कि बसपा उप चुनाव नहीं लड़ती है लेकिन दिल्ली में 20 विधानसभा सीटों पर विधायकों के अयोग्य होने की स्थिति में होने वाले चुनाव में बसपा उप चुनाव लड़ेगी.

दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में आयोजित कार्यकर्ता सम्मेलन में कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए बसपा प्रमुख ने कहा कि दिल्ली में आम आदमी पार्टी के 20 विधायकों को अयोग्य घोषित कर दिया गया है. ऐसे में होने वाले उप चुनाव में पार्टी चुनाव मैदान में उतरेगी. इस दौरान मायावती ने चुनाव होने वाले विधानसभा क्षेत्रों के कार्यकर्ताओं और नेताओं को तैयार रहने की अपील की. मायावती की इस घोषणा का बसपा कार्यकर्ताओं ने जमकर स्वागत किया.

अंडर 19 वर्ल्डकपः भारत ने ऑस्ट्रेलिया को हराकर किया विश्वकप पर कब्जा

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नई दिल्ली। अंडर-19 विश्व कप के फाइनल में ऑस्ट्रेलिया को 8 विकेट से हरा कर भारत ने चौथी बार अंडर-19 विश्व कप का खिताब अपने नाम कर लिया.इस मैच में ऑस्ट्रेलिया के कप्तान जेसन सांघा ने टॉस जीतकर पहले बल्लेबाज़ी का फैसला किया. भारतीय गेंदबाज़ों के दमदार प्रदर्शन के चलते ऑस्ट्रेलिया की टीम पूरे 50 ओवर भी नहीं खेल सकी और 47.2 ओवर में ही 216 रन पर सिमट गई. 217 रन की चुनौती का पीछा करते हुए भारत ने 38.5 ओवर में सिर्फ 02 विकेट खोकर ही लक्ष्य को हांसिल कर लिया

भारत ने सधी हुई गेंदबाजी करते हुए सब से पहले को ब्रयांट 14 रन के निजी स्कोर पर तेज़़ गेंदबाज़ ईशान पोरेल की गेंद पर अभिषेक शर्मा के हाथों कैच आउट किया. इसके बाद दूसरे सलामी बल्लेबाज एडवर्ड भी 28 रन के निजी स्कोर पर पोरेल का शिकार बने. तीसरा विकेट कप्तान जेसन सांघा (13 रन) का गिरा, जिन्हें नागरकोटी की गेंद पर देसाई ने कैच आउट किया. इसके बाद जे. मर्लो और पी. उप्पल ने पारी संभालने की कोशिश की, लेकिन उप्पल 34 रन के स्कोर पर रॉय की गेंद पर उन्हीं को कैच दे बैठे. 23 रन बनाकर मैकस्वीनी स्पिनर शिवा के हाथों कॉट एंड बोल्ड आउट हो गए और भारत को मिली पांचवीं सफलता. इसके बाद अपने अगले ओवर में शिवा ने विकेटकीपर देसाई के हाथों कैच आउट करवा कर विल सदरलैंड को पवेलियन भेज दिया. इसके बाद 76 रन पर खेल रहे मर्लो ने रॉय की गेंद पर बड़ा शॉट लगाने की कोशिश की, लेकिन गेंद गई शिवा सिंह के हाथों में और भारत को मिली सातवीं सफलता. अगले ही ओवर की पहली ही गेंद पर नगरकोटी ने इवांस (01) को बोल्ड कर दिया. 13 रन पर खेल रहे होल्ट रन आउट हो गए और भारत को मिली नौवीं सफलता. शिवम मावी ने रेयान हेडली (01) को विकेटकीपर देसाई के हाथों कैच आउट करवाकर कंगारुओं की पारी को समेट दिया.

217 रन की चुनौती का पीछा करते हुए, भारतीय ओपनर पृथ्वी शॉ और मनजोत कालरा ने अपनी टीम को अच्छी शुरुआत देते हुए मात्र  11.4 ओवरों में 71 बनाए, पृथ्वी शॉ के रूप में भारत का पहला विकेट गिरा जिन्होंने ने अपनी 29 रनो की पारी में 41 गेंदें  खेली और 4 चौके लगाए। भारत का दूसरा विकेट शुभम गिल के रूप में गिरा जिन्होंने 30 गेंदों का सामना कर 4 चौकों की सहायता से 31 रन बनाए, भारतीय ओपनर नवजोत कालरा ने नाबाद रहते हुए 102 गेंदों ने 8 चौकों और 3 छक्कों की सहायता  से 101 रन बनाए और वहीँ हार्विक देसाई ने विजयी चौका जड़ते हुए 61 गेंदों में 5 चौकों की सहायता से नाबाद 47 रनो की पारी खेली

हम आपको यह भी बताना चाहते है के विश्व क्रिकेट ये चौथा मौका रहा जब भारतीय टीम ने अंडर 19 विश्व कप की ट्रॉफी उठाई. भारतीय टीम अब इस खिताब को सबसे ज़्यादा बार जीतने वाली टीम भी बन गई है. 2018 से पहले भारत ने मुहम्मद कैफ (2002), विराट कोहली (2008) और उन्मुक्त चंद (2012) की कप्तानी मे ये खिताब अपने नाम किया था. भारत क बाद सबसे ज़्यादा बार अंडर 19 विश्व कप ऑस्ट्रेलिया की टीम ने जीता है. ऑस्ट्रेलिया की टीम ने तीन बार इस ट्रॉफी को उठाया है. ऑस्ट्रेलिया ने 1988, 2002 और 2010 में विश्व कप खिताब जीता था.

अंडर 19 विश्व कप के इतिहास में टीम इंडिया सबसे ज़्यादा फाइनल खेलने वाली टीम बन गई है. भारतीय टीम ने 6 बार अंडर 19 विश्व कप का फाइनल खेला है. 2002, 2006, 2008, 2012, 2016 और 2018 में इस टूर्नामेंट के फाइनल तक का सफर तय किया है. भारत ने 2000, 2008, 2012 और 2018 में ये खिताब अपने नाम किया. 2006 और 2016 में टीम इंडिया फाइनल में तो पहुंची थी, लेकिन वो इस ट्रॉफी को नहीं उठा पाई थी. भारत को बाद पाकिस्तान और ऑस्ट्रेलिया ने इस टूर्नामेंट में सबसे ज़्यादा बार खिताबी मुकाबले खेले हैं. इन दोनों टीमों ने पांच-पांच बार अंडर 19 विश्व कप फाइनल में शिरकत की है.

 

यूपी के डीजी ने कहा, मंदिर वहीं बनाएंगे

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लखनऊ। यूपी के डीजी होमगार्ड डॉ. सूर्य कुमार शुक्ला ने अयोध्या में राममंदिर बनाने की शपथ ली है. एक अधिकारी के द्वारा राम मंदिर बनवाने के लिए शपथ लेने की घटना सामने आने के बाद सरकार और पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया है. उनके इस बयान की केंद्रीय और यूपी की आईपीएस असोसिएशन ने निंदा की है.

शुक्ला 1982 बैच के आईपीएस अफसर हैं और अगस्त, 2018 में रिटायर होने वाले हैं. ऐसे में सवाल उठने लगा है कि एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी होने के बावजूद उन्होंने यह शपथ सार्वजनिक रूप से क्यों ली? लोग कह रहे हैं कि कहीं रिटायरमेंट के बाद डॉ. सूर्य कुमार राजनीति की तैयारी तो नहीं कर रहे हैं? राम मंदिर के संकल्प को उनके राजनीति में संभावित एंट्री से भी जोड़ा जा रहा है.

डीजी (फायर सर्विस) प्रवीण सिंह के बाद वह सबसे वरिष्ठ अफसर हैं. तीन साल से डीजीपी की कुर्सी के लिए उनका नाम चर्चाओं में रहा. कुछ दिन पहले भी जब डीजीपी ओपी सिंह के केंद्र से रिलीव होने में अड़चने आईं थीं, तब भी सूर्य कुमार शुक्ला का नाम काफी चर्चा में आ गया था, लेकिन उन्हें फिर निराशा ही हाथ लगी.