गोरखपुर और फूलपुर में खतरे में भाजपा

उत्तर प्रदेश में फूलपुर और गोरखपुर लोकसभा सीटों पर उपचुनाव के लिए 11 मार्च को चुनाव हो चुका है. दोनों सीटों पर बीजेपी और सपा के बीच कांटे का मुकाबला है. फूलपुर में 37.40 फीसदी और गोरखपुर में 43 फीसदी लोगों ने मतदान किया. मतदान का यही प्रतिशत भाजपा के लिए अब चिंता का विषय बन गया है. इसके बाद अब दोनों सीटों पर सबकी निगाहे गैर जाटव और गैर यादव वोटो पर हैं. यही वोटर दोनों चुनाव का भविष्य तय करेंगे.

चुनाव प्रचार के दौरान भी सीएम योगी अपनी चुनावी सभाओं में लगातार शहरी मतदाताओं से ज्यादा से ज्यादा वोटिंग करने की अपील करते थे. असल में शहरी मतदाताओं को परंपरागत तौर पर भाजपा का वोटर माना जाता है. लेकिन वोटिंग के बाद साफ है कि शहरी मतदाताओं में वोटिंग को लेकर उत्साह नहीं रहा. गोरखपुर में हुए कुल 43 प्रतिशत वोटिंग मे से गोरखपुर शहर में सबसे कम 37.76 प्रतिशत वोटिंग हुई. जबकि ग्रामीण इलाकों पिपराइच में 52.24 प्रतिशत और सहजनवां में 50 प्रतिशत वोटिंग हुई.

यही हाल फूलपुर का भी है. यहां हुई साढ़े 37 प्रतिशत वोटिंग में सबसे कम उत्साह शहरी वोटरों का ही रहा. इलाहाबाद पश्चिमी में 31 प्रतिशत और इलाहाबाद उत्तर में 21.65 प्रतिशत वोटिंग ही हुई. इस कम वोटिंग ने भाजपा की चिंता को बढ़ा दिया है. वैसे भारतीय जनता पार्टी दोनों सीटों पर अगड़ी जातियों के वोट को लेकर निश्चिंत है. लेकिन बसपा-सपा के साथ के बाद उसकी नजर भी गैर जाटव और गैर यादव वोटरों पर टिकी रही. भाजपा ने सबसे ज्यादा मेहनत इन्हीं दोनों वर्गों के बीच किया है. गोरखपुर में करीब 19 लाख वोटर हैं,जिसमें से आधे से ज्यादा ओबीसी समाज के हैं. दलित वोटों की बात करें तो गोरखपुर और फूलपुर दोनों जगहों पर उनकी उपस्थित प्रभावी है. देखना है ऊंट किस करवट बैठता है.

नारी सशक्तिकरण के दौर में बदलते हुए नारी पुरुष सम्बन्ध

8 मार्च 2018 को देश के सभी महत्वपूर्ण समाचार पत्रों में अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर लेख पढ़ने को मिले। इन लेखों में पितृसत्ता, यौनिकता, कुंठा, चेतन-अचेतन, अन्याय, असमानता, हिंसा, असुरक्षा और पीड़ा के स्वर मुखर थे । लेकिन अगर देखा जाय तो नारी सशक्तिकरण के इस दौर में नारी पुरुष संबंधो मने तीजी से बदलाव आया है ?

ढोल ,गंवार, शूद्र, पशु, नारी ये सकल ताड़ना के अधिकारी से give us good women we we’ll have a great nation ” तक नारी ने एक लम्बी वैचारिक यात्रा तय की है .कभी देवी के रूप में वंदनीय तो दासी के रूप में तिरष्कृत ? क्या कभी भी नारी समानता की स्थिति पा सकती है ?

सभ्यता के प्रारंभ से ,तथाकथित ‘सोशल कामनसेंस ”के ज्ञान समाज तक ,सदैव से सभ्यता का यह आधा भाग अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहा है .प्रश्न यह उठता है की क्यों स्त्री के नैसर्गिक व्यक्तित्व का हनन ,हर सभ्यता का नैतिक खेल रहा है .

इस प्रश्न का उत्तर क्या पुरुष के स्त्री की जैविक सीमाओं से मुक्त होने में है,अधिक बलशाली होने में है ,अथवा स्त्री को सम्पत्ति समझना ,एक निम्न प्रजाति का समझाने में है अथवा यह अहम् का प्रश्न है ?वास्तव में यह सदियों से विवाद चलता आ रहा है व् इसकी व्याख्या भिन्न भिन्न से प्रकार से की गयी है . उल्लेखनीय है की सभ्यताओं के स्वर्ण युग व अंध युग की भांति ,स्त्रियों की जीवन में भी इसी प्रकार का समय आता रहा

वैदिक काल में जब नारी- पुरुष समान थे, स्त्रियों के जनेऊ धारण करने से लेकर शिक्षा प्राप्त करने तथा वर चुनने का अधिकार था ,वह वीरंगना ,वह विदुषी,गार्गी ,अपाला ,घोषा ,लोपामुद्रा,स्त्री इतिहास के वे स्वर्णाक्षर है ,जिन्होंने आने वाले अंधयुग में उसकी योग्यता ,क्षमता ,पर प्रश्नचिन्ह नही लगने दिया .

मध्यकाल की परम्पराओं ने ,अनेक धार्मिक मान्यताओं की विकृत व्याख्याओं ने ,स्त्री के जीवन का वह अंधकार युग प्रारंभ किया ,जो 21वीं सदी तक आते आते पूर्णरूपेण समाप्त नही हुआ है .

इस काल में स्त्री जन्म लेने से लेकर पालन पोषण तक,विवाह से लेकर मृत्यु -संस्कार तक पुरुष के अधीन बन गयी है यहाँ वह दौर था जब वह अपनी आन्तरिक पहचान ,व्यक्तित्व निर्माण की शक्ति,एक निजता के भाव से पूर्णत :विहीन थी जिसमें ओज,तेज,बल भरने का प्रयास पुनर्जागरण काल से प्रारम्भ हुआ ,जिसमे स्त्री के अस्तित्व को व्यक्तित्व के रूप में पहचान मिली .

पाश्चात्य जगत की मेरीवुलस्टोन क्राफ्ट ,से साइमन दी बुआ ,दुर्गा बाई से मधुकिश्वर तक अनेक नारीवादी विचारो ने स्त्री दुर्दशा पर ध्यान खींचा व प्रारम्भ हुआ सुधार का युग .

वह सुधार का युग जो नारी सशक्तिकरण पर रुका जिसमें अनेक सामाजिक ,नैतिक ,सांस्कृतिक मूल्य पुनः परिभाषित होने लगे .जिमसे नारी पुरुष परम्परागत समानता पर मंथन प्रारंभ हुआ .एक को “आधार ” और एक को “ आधारित ” मानने पर प्रश्नचिन लगा और उस मंथन से निकली आत्मनिर्भर,शिक्षित,आत्मविश्वास से परिपूर्ण,विश्व विजय को तैयार ,अपनी क्षमताओं को जानने वाली व् उसके सार्थक करने को आतुर नारी.

वह नारी जो ग्लैमर व गरिमा को साथ लेकर चलने को लालायित थी ,वह जिसने पुरुष के साथ अपने सभी सम्बधो के निर्धारक आधारों को पुनर्परिभाषित करना चाहा व समाज को पूर्णत :नवीन समीकरण प्रदान करने की चेष्टा की .

वह बदले समीकरण जो न केवल पारिवारिक स्तर पर ,वरन सामाजिक सांस्कृतिक ,आर्थिक,राजनीतिक,नैतिक ,मनोवैज्ञानिक स्तर पर द्रष्टिगोचर हुए समाज की एक नयी दिशा तय की. और पारिवारिक स्तर पर चिंतन करे तो शसक्तीकरण के बाद ,पुरुष स्त्री सम्बन्ध चाहे वह पुरुष स्त्री सम्बन्ध चाहे वह पति –पत्नी के रूप में हो अथवा माता –पुत्र के रूप में ,एक नए रूप में व्याख्यायित होने लगे है .स्त्री ने न केवल शिक्षित होकर स्वयम को आत्मनिर्भर बनाया है ,बल्कि प्रतिस्पर्धात्मक समाज में पति को आर्थिक सहायता भी दी , इससे वह एक पक्ष में अपने पति के समतुल्य हो गयी ,उसका दासत्व भाव समाप्त हुआ व स्वतंत्र ,चिंतनशील प्राणी के रूप में आविर्भाव .

यह भाव , जिसने स्त्री को समानता की ओर ले जाने में महत्वपूर्ण भुमका निभाई,जिसमें स्त्री पुरुष सम्बन्ध उच्च निम्न के सतह पर मैत्रीपूर्ण होने की ओर अग्रसारित हुए यह वही पहला कदम था जिसमें वह अपने स्वयं को शोषण विमुक्ति की ओर ले गयी. यह वह कदम था जिसने स्त्री की पहचान सर्वप्रथम ‘भार ‘से ‘ भार लेने वाली ”के रूप में परिणति हुई.

विशेष रूप से निम्न वर्ग की स्त्रियाँ जिसने पहली बार स्वतंत्रता और समानता की स्वास ली थी .इसी अर्थ कमाने की योग्यता ने उसे निर्णय निर्माण में सहभागिता दिलाई जिसमें सशक्तीकरण वास्तविक रूप से साकारित हुआ,यही वह प्रथम कदम था जिसने नारी –पुरुष सम्बंधो का पुनार्विवेचन प्रारंभ किया .वह नारी जिस पर पुरुष का अधिपत्य था वर्चस्व था आज समाज में नित नए आयाम गढ़ रही है ,वह डाक्टर बनी ,इंजीनीयर बनी,राजनीतिज्ञ बनी,अध्यापिका बनी,वैज्ञानिक बनी,कला ,खेल,मनोरंजन,के क्षेत्र में उन ऊँचाइयों को छुआ जो केवल पुरुषों के कार्य क्षेत्र थे .

पुरुषो के सभी क्षेत्र में नारी के अतिक्रमण ने उसे परम्परत के साथ आधुनिकता ,के मूल्यों से युक्त किया जिसमें उसने अपने प्रति हो रहे प्रत्येक आवाज के खिलाफ आवाज बुलंद की चाहे वह निशा शर्मा हो ,जो दहेज़ के कारण बारात लौटा देती है,अथवा मुख्तारण माई जो अपने साथ हुए अत्याचार को विश्व के सामने रखने से नहीं हिचकिचाती है ,निःसंकोच यह महिला पुरुष के बदलते सम्बंधो का पहला आगाज था .

महिला सशक्तीकरण के इस रूप ने पुरुष को एक पारम्परिक पिता ,पति और पुत्र की भूमिकाओं में परिवर्तित किया .संविधान में ‘ कलम की नोक ’ने स्त्री को अनेक अधिकार दिए ,अनेक कानून बने जिससे महिला सशक्तिकरण संभव हुआ .पुरुष की शोषक की भूमिका में परिवर्तन हुआ व सहयोगी की भूमिका प्रारंभ हुई .यह मूल्य सर्वप्रथम विकसित हुआ की स्त्री की अपनी योग्यता और भूमिका होती है .पाश्चात्य जगत में ऐसे उदाहरण भी है ,जब स्त्री ने घर के बाहर के कार्य तत्परता से किये व पुरुष ने घर के कार्यों को पूरा किया .

एक पिता के रूप में वह और परिपक्व हुआ जब उसने पुत्री की शिक्षा सुनिश्चित की उसकी योग्यता को पहचान कर दिशा दी, एक पति के रूप में वह और अधिक सह्भागी हुआ जब उसने घर परिवार के पालन में अधिक योगदान दिया वही मित्र के रूप में सफल हुआ जिसने गुणों को पहचान कर उसे आगे बढने की प्रेरणा दी ,इस सफलता का परिणाम ही है समाज के वे स्त्री रत्न ‘जिन्होंने काल के गाल पर हस्ताक्षर किए कि एक महान विचारिका की पक्तियाँ सहज ही स्मरण हो आती है – अन्धकार की छाती पर पदचिन्ह जमायें . चले अमावास तक हम पूनम तक आये , हमने मुस्काते मुस्काते तिमिर पिया था. हमने तम की छाती पर चढ़ नाद किया था , नाग नाथने का इतिहास दोहराया हमने , हमने स्वर्णिम स्याही से उजला प्रष्ठ सजाया हमने .

अमेरिका की राष्ट्रपति की उम्मीदवार रही हिलेरी क्लिंटन हो या भारत की राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ,भारत की विदेश मंत्री निरुपमा राव,पहली दलित मुख्यमंत्री मायावती ,अथवा खेल जगत की प्रसिद्ध एथलीट अंजू बाबी जार्ज ,ऐश्वर्या राय या आरबीआई की उपगवर्नर उषा थोराट अथवा किरण मजूमदार शा ,संगीत की एम् एस शुब्बुलक्ष्मी या प्रसिद्ध न्रात्यांगना शोबिता नारायाण ,कल्पना चावला ,सुनीता विलियम्स,पुलिस कमिस्नर कंचन भट्टाचार्य ,यह सूची बहुत लम्बी है ,जिसमें सभी महिलाये अपने परिवार ,पिता ,पति के सहयोग से ,अपनी क्षमताओं को पहचान कर अपने -अपने क्षेत्र की परिचय बनी .

यह सूची जो सुखद एहसास दे रही है ,क्या वास्तव में सम्पूर्ण भारत का प्रतिनिधित्व करती है ,क्या वास्तव में महिला शसक्तीकरण के पश्चात महिला -पुरुषो के सम्बन्धो में परिवर्तन हुआ है ? क्या वास्तव यह पंक्ति की “हर सफल पुरुष के पीछे महिला का हाथ होता है ” बदलने का समय आ गया है कि “हर सफल महिला के पीछे भी एक पुरुष का हाथ है ” ? यह सभी प्रश्न ऐसे है जिन पर गहन चिंतन की आवश्यकता है ,सत्य तो यह की स्त्री की आत्मनिर्भरता ने समाज के मूल्यों में आमूलचूल परिवर्तन नहीं किया है .उसका सशक्तिकरण नही हुआ है कि वह परंपरा और आधुनिकता की अद्वितीय सांठ गाँठ ,भ्रूण निर्धारित यंत्र से रक्षा कर सके .पंचायत में वह सरपंच भी बनी परन्तु हस्ताक्षर की शक्ति ने उसे समानता की स्थिति नहीं दी .घर व आफिस के दोहरे दायित्तो का पालन करती रही , ‘रोल कनफ्लिक्ट ” से जूझती इसी सशक्तिकृत नारी की कानून भी रक्षा नही कर सका .

पुरुष की भोगवादी मानसिकता जिसमें एक पिता के अपनी पुत्री के शीलभंग करने के उदाहरण मिलते है .बढती उपभोक्तावादी मानसकिता जिसने उसे “ सेक्स आब्जेक्ट” के रूप में बदल दिया है ,वास्तव में महिला पुरुषो के संबंधो में सार्थक परिवर्तन नही करती .

आज भी स्त्री के भाग्य- विधाता उसके पिता और पति ही है ,जो जाति से बाहर विवाह करने में “आनर – किलिंग” कर देते है वही दहेज़ न लाने के आरोप में पति के द्वारा जलाकर की गयी हत्या ,पत्नी की कमाई किन्तु व्यव का निर्णय पति का, उच्च वर्गीय स्त्री से सौन्दर्य की वस्तु बनने की मांग व निम्नवर्गीय स्त्री से एक मशीन बनाने की मांग जो कभी नहीं थकती ,यह भी विश्व समाज का एक पक्ष है .

वास्तव में आवश्यकता एक सन्तुलन की है,समन्वय की है, एक निर्मल साहचर्य की है ,जो दमित है, शोषित है, पीडित है ,उनके कल्याण की , वहीँ जो सशक्तिकृत है ,समर्थ है, आत्मनिर्णय की स्वतंत्रता से युक्त है उन्हें सही दिशा लेने की .

इक्कीसवी सदी की भागती तीव्र दुनियां ,जिसमें सरकार ,गैर सरकारी संगठन ,सिविल सोसाइटी ,मीडिया सभी का साझा दायित्व है ,कि महिलाओं का आधा भाग जो मुख्यधारा से पीछे छूट गया है ,उसे गुणवत्ता परक शिक्षा दे ,आत्मनिर्भर बनाये जिसमें आरक्षण (पंचायत व् लोकसभा)में सार्थक कदम हो सकता है .वहीँ उन महिलाओं को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक किया जाय कि वह वास्तव में सशक्तिकृत होकर समाज को नवीन आयाम दे.

उल्लेखनीय है कि वह समर्थ पक्ष ,वह शिक्षित पक्ष ,वह सकल पक्ष जो विकास की दौड़ में साथ साथ दौड़ रहा है ,जो स्वतंत्रता और स्वछंदता के विवाद में फंसा है जिसने परिवार व विवाह की संस्थाओं पर प्रश्नचिन्ह खड़ा कर दिया है ,को-लिविंग, लेस्बियन-गे मैरिज का सूत्रपात किया है वह भी प्रगति की राह पर सतर्कता के साथ अग्रसारित रहे व दिशा विमुख न हो .

वास्तव में यह युद्ध कि श्रेस्ठतम कौन ? कौन विजयी हुआ ? से महत्वपूर्ण है ,हम विजयी हुये , सभ्यता को उन्नति व प्रगति के मार्ग पर ले जाए ,इसके लिए यह अति आवश्यक है की नारी व् पुरुष हठ धर्मिता का त्याग करे ,सहयोगी बने ,मित्रवत बने ,तभी वह सही अर्थों में मानवता को ईश्वर की सर्वश्रेस्ठ रचना कह सकेंगे व सभ्यता को सांस्कृतिक गुणों से परिपोषित ,संवाहित,कर सकेंगे ,इस राष्ट्र को इस विश्व को संयुक्त होकर सुजलाम,सुफलाम व मलयज शीतलम बना सकेंगे .

राजस्थान के दिग्गज आदिवासी नेता भाजपा में शामिल

जयपुर। राजस्थान में करीब 45 विधानसभा सीटों पर अपनी पकड़ रखने वाले आदिवासी नेता किरोड़ीलाल मीणा को पार्टी में शामिल कर लिया है. रविवार 11 मार्च को मीणा ने अपनी राष्ट्रीय जनतांत्रिक पार्टी का भाजपा में विलय कर दिया. बदले में भाजपा उन्हें राज्यसभा में भेजेगी. उन्हें मंत्री भी बनाया जा सकता है. उपचुनाव में हार के बाद भाजपा प्रदेश में जीत का फार्मूला तलाश रही थी.

मीणा के कद का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्हें पार्टी में शामिल करवाने की पहल खुद पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने की तो उन्हें पार्टी ज्वाइन कराने के लिए मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और बीजेपी के आला नेता जयपुर में पार्टी दफ्तर में मौजूद थे. एक दूसरी बात यह भी है कि मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे से छत्तीस का आंकड़ा रखने के बावजूद भाजपा ने उन्हें पार्टी में शामिल किया. वसुंधरा सरकार में ही मंत्री रहते हुए किरोड़ी लाल मीणा ने 10 साल पहले बीजेपी छोड़कर अपनी अलग पार्टी बना ली थी.

किरोड़ी लाल को पार्टी में लाकर मोदी और शाह की जोड़ी ने अपना पुराना फार्मूला कायम रखा है. तमाम प्रदेशों में चुनाव जीतने के लिए भाजपा ने लगातार दूसरी पार्टी के जनाधार वाले नेताओं को पार्टी में शामिल किया है. राजस्थान उपचुनाव में मिली हार के बाद घबराई भाजपा ने आनन-फानन में मीणा को पार्टी में शामिल करवाने की कोशिश जारी कर दी. इसकी पहल राज्य नेतृत्व से नहीं बल्कि केंद्रीय नेतृत्व ने की थी. पिछले दिनों में मीणा अमित शाह के अलावा राजनाथ सिंह से भी मिल चुके थे.

असल में राजस्थान जीतने के लिए मीणा को भाजपा में लाना भाजपा की मजबूरी बन गई थी. तभी वसुंधरा राजे से घोर मतभेद के बावजूद उन्हें पार्टी में शामिल करवाया गया. राजस्थान में 45 सीटों पर मीणा वोटर किसी को भी चुनाव हराने और जीताने की ताकत रखते हैं. इसमें से करीब 29 विधानसभा क्षेत्रों में मीणा समाज नंबर वन है. पिछली बार मोदी लहर में भी किरोड़ी लाल मीणा की राजपा ने 134 सीटों पर चुनाव लड़कर 4 सीटें जीती थी. किरोड़ी लाल 5 बार विधायक रहे हैं और दो बार सांसद रहे. उन्हें आरएसएस का भी करीबी माना जाता है. राजस्थान में दिसंबर महीने में चुनाव होना है.

वो आदिवासी लड़का, वो आदिवासी लड़की

फ़ोटो में जिस लड़के को आप देख रहे हैं न, वो अनिल मुंडा है. 20-21 साल का. अनिल रांची के लोहरदग्गा का रहने वाला है. मेरे दोस्त का ईंट का भट्ठा है, गांव में, वहीं पर काम करता है. और साथ में जो लड़की है, वो करिश्मा है. अनिल के ही इलाके की है. दोनों आदिवासी हैं. दोनों अब ‘साथ’ रहते हैं.

दोनों के ‘साथ’ रहने को मेरे गॉव के लड़के मजाक में ‘लिव इन’ कहते हैं, कुछ पति पत्नी, तो कुछ कहते हैं कि हमसे अच्छे तो आदिवासी ही हैं, जो प्यार हो जाने पर ‘साथ’ रहना शुरू कर देते है, ज़िन्दगी जीते हैं, माँ-बाप भी बन जाते हैं, पहले शादी की कोई बाध्यता नहीं, जब मन हुआ, तब शादी कर लेते हैं…

इस होली में जब मैं गांव गया था, भट्ठे के कई लेबर दोस्त के घर आये थे होली मनाने, मालिक से त्योहारी लेने…उसी में अनिल-करिश्मा भी थे. सभी नांच-गा रहे थे. दोस्तों ने इशारा करके बताया कि कौन अनिल-करिश्मा के माँ-बाप हैं, कौन सास-ससुर? सभी ने दारू साथ-साथ पी रखी थी, साथ-साथ होली खेलना, एक साथ नाचना-गाना, कोई भेद नहीं.

अगले दिन भट्ठे पर जब अनिल से मिला. ढेर सारी बातें की उसके बारे में, करिश्मा से प्यार के बारे में, उसके गॉव, आदिवासी समाज-संस्कृति के बारे में…लेकिन जब मैंने उससे पूछा कि अगर प्रेमी जोड़ों में ऐसी खटपट हो कि साथ रहना मुश्किल हो जाये, तब क्या करते हैं?

“झगड़ा क्यों होगा?” उसने हंसते हुए मुझसे पूछ लिया. “अगर ऐसा होता है तो क्या करते हैं?” “झगड़ा क्यों होगा, मैंने पसंद किया है…” वो फिर हंसते हुए मेरी तरफ देखने लगा…

खैर, वो मेरी बात पर सोचने को ही तैयार नहीं था. उंसे अपने समाज के स्वाभाविक जीवन से प्यार है…अब आप महिला दिवस के ‘अंतरराष्ट्रीय’ अभिनय पर सोच कर देखिये कि आधुनिक कौन, हम या हमारा आदिवासी समाज? किसको किससे सीखने की ज़रूरत है?

Ajay Yadav

पालि भाषा के लिए दिल्ली की सड़कों पर उतरे बुद्धिस्ट

नई दिल्ली। पालि भाषा को संविधान की 8वीं सूची में शामिल करवाने के लिए बौद्ध भिक्खुओं और बौद्ध धर्म के अनुयायियों ने आज 9 मार्च को एक शांति मार्च निकाला. इसमें दिल्ली और आस-पास के क्षेत्रों के बौद्ध भिक्खु और उपासकगण शामिल हुए. प्रदर्शनकारियों में इस बात को लेकर रोष था कि भारत की प्राचीन भाषा होने के बावजूद सरकार पालि भाषा की लगातार अनदेखी कर रही है. अम्बेडकर भवन से निकल कर इस मार्च को संसद मार्ग तक जाना था, लेकिन बौद्ध धर्म के दमन को तैयार सरकार ने इसे वहीं पर रोक दिया.

इस शांति मार्च में उपस्थित लोग पालि को 8वीं सूची में शामिल करने के अलावा बुद्ध पूर्णिमा पर राष्ट्रीय अवकाश घोषित करने और देश भर में पालि संस्थान स्थापित करने की मांग कर रहे थे. ये तमाम लोग पालि भाषा को लेकर भारत सरकार के पक्षपाती रवैये से काफी आहत थे.

असल में सम्राट अशोक के शासनकाल में बौद्ध धर्म का काफी विस्तार हुआ था. भारत से होता हुआ यह विस्तार श्रीलंका सहित पूरे एशिया में फैल गया. बौद्ध धर्म का महान ग्रंथ त्रिपिटक पालि भाषा में ही है. भारत और विश्व भर में बौद्ध धर्म को मानने वाले लोगों के धार्मिक आयोजनों के दौरान बौद्ध भिक्खु पालि भाषा में ही सभी धार्मिक क्रियाओं को संपन्न कराते हैं. ऐसे में पालि भाषा का महत्व न सिर्फ भारत के लिए बल्कि विश्व में भारत की साख के लिए भी जरूरी है.

कार्यक्रम के संयोजक भंते चन्द्रकीर्त्ती और अर्चना गौतम ने मांगों के संबंध में शिष्ट मंडल के साथ राष्ट्रपति को ज्ञापन दिया.

गोरखपुर-फूलपुर चुनाव से पहले मायावती का कार्यकर्ताओं के लिए फरमान

लखनऊ। गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा सीटों पर उपचुनाव में बहुजन समाज पार्टी सपा के उम्मीदवार को जीताने के लिए पूरा जोर लगा रही है. बसपा प्रमुख मायावती खुद बसपा द्वारा इन दोनों सीटों पर किए जा रहे प्रचार की खबर ले रही हैं. बसपा सुप्रीमो ने पार्टी पदाधिकारियों को दोनों लोकसभा क्षेत्रों में कम से कम 100 नुक्कड़ सभाएं करने कानिर्देश दिया था. गुरुवार को हुई मीटिंग में मायावती ने अपने करीबी राज्यसभा सांसद अशोक सिद्धार्थ और कुछ अन्य बड़े नेताओं को इस कैंपेन पर नजर रखने को कहा.

बीएसपी कार्यकर्ताओं को उतनी ही मेहनत से प्रचार करने के लिए कहा था, जितनी वो अपनी पार्टी के चुनाव लड़ने पर करते हैं. बसपा प्रमुख के इस निर्देश से साफ है कि वह भाजपा को किसी भी हाल में रोकने के लिए गंभीर हैं. फूलपुर चुनाव पर खुद राज्यसभा सांसद अशोक सिद्धार्थ नजर बनाए हुए हैं. सिद्धार्थ इसके लिए लगातार इलाहाबाद में जमें हुए हैं. तो गोरखपुर में घनश्याम सिंह खरवार लगातार बसपा नेताओं के साथ मिलकर पार्टी के वोटों को भाजपा के खिलाफ गोलबंद करने में जुटे रहें.

आखिरी वक्त में बूथ लेवल कार्यकर्ताओं को अपने क्षेत्रों में डोर-टु-डोर कैंपेन चलाने के लिए भी कहा गया है. मायावती ने पार्टी नेताओं से यह सुनिश्चित करने को कहा है कि पार्टी का कैडर वोट सपा उम्मीदवार के पक्ष में जाए. गोरखपुर और फूलपूर सीटों पर 11 मार्च को वोटिंग होगी और 14 मार्च को नतीजे आएंगे. फूलपुर सीट केशव प्रसाद मौर्य और गोरखपुर सीट योगी आदित्यनाथ के इस्तीफे के बाद खाली हुई थी.

गोरखपुर में सपा-बसपा से डरे योगी, देखिए क्या अपील कर रहे हैं

गोरखपुर।  गोरखपुर में चर्चा है कि सीएम योगी अपने ही गढ़ में डरे हुए हैं. योगी का यह डर उनके भाषणों में साफ दिख रहा है, जिसमें वह खास तौर पर शहर के वोटरों से मतदान प्रतिशत बढ़ाने की अपील कर रहे हैं. योगी कह रहे हैं कि शहर के मतदाता कम से कम साठ फ़ीसदी मतदान सुनिश्चित करें.

जाहिर है कि इस इलाके की राजनीतिक नब्ज को सबसे बेहतर ढंग से पहचानने वाले योगी आदित्यनाथ सपा-बसपा और निषाद पार्टी के काट को ढूंढ़ रहे हैं. इनको मिले पीस पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल जैसी पार्टियों के साथ के चलते गोरखपुर में एक-एक वोट की लड़ाई छिड़ गई है. योगी को इस बात का डर है कि जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में यह गठबंधन कुछ गुल खिला सकता है. इसी की काट के लिए योगी शहरी मतदाताओं से वोट प्रतिशत बढ़ाने की अपील करते फिर रहे हैं.

सपा-बसपा गठबंधन को काटने के लिए सीएम योगी आदित्यनाथ ने खुद कमान संभाल रखी है तो केंद्रीय वित्त राज्यमंत्री शिव प्रताप शुक्ला के अलावा प्रदेश के आधा दर्जन से अधिक मंत्रियों, सभी क्षेत्रीय विधायकों और सांसद एक के बाद एक दौरे कर रहे हैं. बसपा-सपा के वोटों को अपने पाले में खिंचने की कोशिश में भाजपा ने इस इलाके में 20 फरवरी से ही एक दर्जन से ज्यादा दलित और पिछड़े वर्ग के नेताओं को खासतौर पर उतार दिया है. इसमें अनिल राजभर, अनुपमा जायसवाल, दारा सिंह चौहान और जय प्रकाश निषाद जैसे नेता शामिल हैं. इन सबको ऐसे इलाकों में लगातार भेजा गया जहां उनके सजातीय वोटरों की तादाद ज्यादा थी. यहां तक कि सिद्धार्थ नाथ सिंह का भी एक कार्यक्रम चित्रगुप्त मंदिर में कायस्थ समुदाय के बीच करवाया गया है.

जहां तक योगी आदित्यनाथ की बात है तो उन्होंने खुद पिछले एक पखवाड़े में गोरखपुर में चार दौरे किए हैं. योगी ने खुद अपने चुनाव के लिए भी इतने दौरे नहीं किए थे. योगी की छटपटाहट साफ बता रही है कि गोरखपुर को फिर से फतह करना उनके लिए बहुत आसान काम नहीं है.

टीडीपी प्रकरण में शिवसेना का वार, बोली ओवर कॉन्फिडेंट है भाजपा

नई दिल्ली। भारतीय जनता पार्टी के तमाम सहयोगी दल उससे नाखुश हैं. शिवसेना भी उनमें से एक है. शिवसेना समय समय पर अपने बयान के जरिए भाजपा को कठघरे में खड़ा करती रही है. एक बार फिर से टीडीपी के बहाने शिवसेना ने भाजपा पर निशाना साधा है. शिवसेना की नेता मनीषा कायान्दे ने कहा है कि अब भाजपा ओवर कॉन्फिडेंट है. भाजपा के लिए 2019 चुनौतीपूर्ण होगा.

शिवसेना के वरिष्ठ नेता संजय राउत का इस मुद्दे पर कहना है, “शिवसेना को इसकी पहले से ही उम्मीद थी, दूसरी पार्टियां भी इसी तरह एनडीए से बाहर हो जाएंगी. सहयोगी पार्टियों के भाजपा के साथ अच्छे संबंध नहीं रह गए हैं. जैसे-जैसे उनकी शिकायतें बाहर आएंगी, वैसे ही वो एनडीए गठबंधन से बाहर होती जाएंगी.” साल 2019 के लोकसभा चुनावों और महाराष्ट्र के विधानसभा चुनावों में शिवसेना अकेले चुनाव मैदान में उतरने का एलान कर चुकी है. हालांकि, अभी तक आधिकारिक तौर पर शिवसेना और भाजपा का गठबंधन जारी है, लेकिन जिस तरह से दोनों पार्टियों के रिश्तों में पिछले कुछ दिनों से उतार-चढ़ाव चल रहा है, उससे दोनों पार्टियों का गठबंधन टूटने की आशंका व्यक्त की जा रही है.

करण कुमार

राहुल गांधी के विरोध में पार्टी के सीनियर नेता

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नई दिल्ली। कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद राहुल गांधी पार्टी में अहम बदलाव करना चाहते हैं, लेकिन अब इसको लेकर पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेता राहुल गांधी से सहमत नहीं हैं. असल में राहुल गांधी पार्टी में सर्वोच्च निर्णय लेनी वाली संस्था, कांग्रेस वर्किंग कमेटी (CWC) के 12 पदों के लिए चुनाव कराना चाहते हैं. उनके इस फैसले पर दिग्गज कांग्रेस नेता सहमत नहीं है. वो पहले की ही तरह नामांकन व्यवस्था को जारी रखना चाहते हैं.

राहुल गांधी के पूर्वज और 19 साल तक कांग्रेस अध्यक्ष रहीं सोनिया गांधी ने भी नामांकन व्यवस्था को बनाए रखा था और पुरानी परंपरा के अनुसार CWC सदस्यों का चुनाव किया गया. हालांकि कांग्रेस की रूल-बुक में चुनाव में कराने का प्रावधान है. राहुल गांधी इसी को फॉलो करना चाहते हैं. कांग्रेस का आंतरिक संविधान कहता है कि CWC के दस सदस्य प्रतिनिधियों द्वारा चुने जाएं जबकि अन्य दस सदस्यों को पार्टी अध्यक्ष मनोनीत कर सकता है. कांग्रेस अध्यक्ष की कमान संभालने के बाद राहुल गांधी अपने तरीके से देश की सबसे पुरानी पार्टी को मजबूत करने में जुटे हैं

आजम खान पर गलत तरीके से दलितों की जमीन खरीदने के आरोप

रामपुर। सपा के दिग्गज नेता आजम खान और उनकी जौहर युनिवर्सिटी विवादों में घिर गई है. लघु उद्योग भारती नामक औद्योगिक संगठन ने आजम खान पर गलत तरीके से दलितों की जमीन खरीदने का आरोप लगाया है. लघु उद्योग भारती संगठन की रामपुर शाखा के अध्यक्ष आकाश कुमार सक्सेना की शिकायत पर राजस्व परिषद ने जौहर यूनिवर्सिटी के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया है. शिकायत में कहा गया है कि आजम खान ने जौहर यूनिवर्सिटी के लिए 100 बीघा जमीन 10 दलितों से नियमों की अनदेखी करते हुए गलत तरीके से खरीदी है. आजम खान इस विश्वविद्यालय के चांसलर भी हैं.

असल में नियमों के मुताबिक, अनुसूचित जाति के व्यक्ति के नाम पट्टा होने के कारण वह जमीन सामान्य श्रेणी की जौहर यूनिवर्सिटी को नहीं बेची जा सकती थी. लेकिन आजम खान ने अपने रसूख का इस्तेमाल करते हुए यह जमीन जौहर यूनिवर्सिटी के नाम पर खरीदी और अनुसूचित जाति के विक्रेताओं के नाम खतौनी में दर्ज नहीं कराए. साथ ही, इस पूरी खरीद में डीएम की अनुमति भी नहीं ली गई. विवादित भूखंड रामपुर के सीगनखेड़ा इलाके में स्थित है. आकाश सक्सेना ने 10 फरवरी 2018 को मुख्यमंत्री से इस मामले की शिकायत की थी। इसके बाद राजस्व परिषद ने जौहर यूनिवर्सिटी के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने से पहले इसकी जांच कमिश्नर, मुरादाबाद से भी करायी, जिसमें जौहर यूनिवर्सिटी के खिलाफ आरोप सही पाए गए.

आस्ट्रेलिया में क्यों हो रहा है मोदी के करीबी अडानी का विरोध

नई दिल्ली। भारतीय उद्योगपतियों में अंबानी के बाद आज जिसकी सबसे ज्यादा चर्चा है, वह गुजरात के गौतम अडानी हैं. भारत में नरेंद्र मोदी की सरकार आने से पहले से ही अडानी ग्रुप के चेयरमैन गौतम अडानी चर्चा में रहे हैं. 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान अडानी की नरेंद्र मोदी से क़रीबी ने ख़ूब सुर्ख़ियाँ बटोरी थी. मोदी अक्सर अडानी के चार्टर्ड प्लेन में उड़ते दिखते थे. अडानी को मोदी का मित्र माना जाता है. भारत के अलावा अडानी ने इंडोनेशिया और ऑस्ट्रेलिया में भी अपने बिजनेस का विस्तार किया है. इन्हीं परियोजनाओं में से एक ऑस्ट्रेलिया के कोयला खदान परियोजना को लेकर इन दिनों आस्ट्रेलिया में अडानी का खूब विरोध हो रहा है.

पिछले साल जून में ऑस्ट्रेलिया में अडानी की कोयला खदान परियोजना को हरी झंडी मिली थी. विरोध करने वालों के मुताबिक़ ये प्रस्तावित परियोजना पर्यावरण के लिए ख़तरनाक है और इससे वातावरण में प्रदूषण फैलेगा. हालांकि इसका समर्थन करने वाला एक वर्ग भी है, जिसका कहना है कि इससे लोगों को नौकरियां मिलेंगी.

कारमाइकल कोयला खान उत्तरी ऑस्ट्रेलिया के क्वींसलैंड राज्य में है जहाँ अडानी की कंपनी खनन करने वाली है. इस प्रोजेक्ट को लेकर आस्ट्रेलिया सरकार अडानी के साथ है और अडानी ने जरूरी सभी 112 क्लियरेंस ले लिया है. बावजूद इसके एक बड़ा वर्ग कोयला निकालने को ही गैर जरूरी बताकर इस प्रोजेक्ट का विरोध कर रहा है. विश्व स्वास्थ्य संगठन की 2016 रिपोर्ट के मुताबिक़ वायु प्रदूषण से हर साल 30 लाख लोगों की मौत होती है.

विरोध का एक कारण अडानी की आस्ट्रेलिया में नाकारात्मक छवि भी है. प्रदर्शनकारियों का कहना है कि “अडानी को रोकना ज़रूरी है क्योंकि ये कंपनी पर्यावरण का आदर नहीं करती. ऑस्ट्रेलिया में पर्यावरण को लेकर मज़बूत क़ानून हैं लेकिन इस कंपनी का हमारी सरकार पर इतना प्रभाव है कि हमें कंपनी के ख़िलाफ़ खड़ा होना पड़ा है.”

अडानी ग्रुप की आधिकारिक बेवसाइट के मुताबिक उनका कारोबार 11 अरब डॉलर से अधिक का राजस्व उगाही करता है. ग्रुप की स्थापना 1988 में हुई थी. माना जाता है कि अडानी ग्रुप भारत में कोयला व्यापार करने वाली सबसे बड़ी कंपनी है. कोयला के आलावा अडानी ग्रुप खेती, रियल स्टेट, वित्तीय सेवाओं और लॉजिस्टिक में भी डील करती है.

सत्ता और बाज़ार के जाल में फंसता महिलाओं के संघर्षो का प्रतीक “महिला दिवस”

एक बार फिर 8 मार्च आ गया है. 8 मार्च जो पूरे विश्व मे महिला दिवस के रूप में मनाया जाता है. लगभग पूरे विश्व की सरकारें महिला दिवस को सरकारी तौर पर मनाती है. आज सुबह से ही महिला दिवस की शुभकामनाएं शोशल मीडिया पर मिलनी शुरू हो गयी है. सरकार भी हर साल की तरह महिला दिवस पर बधाई संदेश देगी.

8 मार्च,विश्व महिला दिवस,होली जो एक महिला को जिंदा जलाने का त्यौहार है अभी 4 दिन पहले पूरा देश होली मना रहा था. शोशल मीडिया होली के बधाई संदेशों से पटा हुआ था. सरकार और बाज़ार भी होली-होली कर रहे थे. आज सत्ता, बाज़ार और आप सब महिला दिवस-महिला दिवस कर रहे हो.

क्या इन दोनों दिनों में कोई फर्क नही है या आपको मालूम नही है इन दोनों दिनों का इतिहास या आप दोगलापन कर रहे हो.

होली जो एक महिला को जिंदा जलाने का त्यौहार है वहीं अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस महिलाओ के संघर्षो की दास्तना है. महिला दिवस महिलाओ के संघर्षों का प्रतीक है. महिलाओं द्वारा राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक आजादी के लिए किए गए संघर्ष की दास्तना है महिला दिवस. हजारो महिलाओ ने अपनी जान कुर्बान की है इस संघर्ष में, खून बहाया है. पूरे विश्व मे ये लड़ाइयां बराबरी की मांग को लेकर लड़ी गयी.

इसलिए आप दोनों दिनों को बधाई सन्देश कैसे दे सकते हो और अगर कोई ऐसा कर रहा है. उसको जरूर सोचना चाहिए कि होली महिला के अस्तित्व के खात्मे का त्यौहार है तो महिला दिवस महिलाओं की मौजूदगी का दिन है.

“आकर्षक उपहार का प्रलोभन देकर महिला मुद्दों को गुमराह करता बाजार द्वारा प्रायोजित महिला दिवस”

लेकिन आज महिला दिवस की प्रसंगिगता ही खात्मे के कागार पर है. क्योंकि महिला दिवस जिन महिला संघर्षो के मैदान में पैदा हुआ. जंग के मैदान में जो दुश्मन वर्ग था.

आज वो दुश्मन वर्ग ही महिला दिवस मनाने का ढोंग किये हुए है. उसने बड़ी चतुराई से महिला दिवस का औचित्य ही बदल दिया है. दुश्मन वर्ग जो सत्ता में बैठा है जिसका प्रचार के साधनों पर कब्जा है. उसके व्यापक प्रचार के कारण महिला दिवस एक त्यौहार बन कर रह गया है. जैसे और त्यौहारों का हम बेसब्री से इंतजार करते है. वैसे ही 8 मार्च का भी ये ही हाल हो गया है. आज महिला फरमाइस करती है अपने पति या प्रेमी से की हमारा महिला दिवस है इसलिए आज हमको ये खरीददारी करनी है. जन्मदिन पर महँगा तोहफा, शादी पर ढेरों तोहफ़े, ये प्रलोभन, ये बाज़ार का जाल महिला को इस बात को सोचने से ही दूर कर दे रहे हैं कि महिला दिवस मनाने का औचित्य क्या है. बाज़ार ने महिला दिवस को नाम दिया है खरीददारी करने की आजादी

FM रेडियो से लेकर tv पूरा प्रचार तंत्र बाज़ार के पक्ष में माहौल बनाता है कि 8 मार्च महिला दिवस है इसलिए महिला को आजादी हो, आजादी खरीदने की, आजादी खुद को बेचने की, आजादी खुद को वस्तु बनाने की, इसलिए बाज़ार में आइए और महिलाओं के इस पावन त्यौहार पर स्कूटी, कार खरीदिये, सौन्दर्य का सामान खरीदिये, अच्छे होटल बार मे जाइये, खाइये, पीईये और फूल मस्ती कीजिये क्योकि आज आपका दिवस है.

महिलाओं ने काम के घण्टे 10 करने, पुरुष के बराबर वेज देने, सामाजिक बराबरी के लिए 8 मार्च 1857 न्यूयार्क शहर के कपड़ा और गारमेंट्स उधोग से आंदोलन की शुरुआत की, उस समय की सत्ता ने भी इस आंदोलन को कुचलने में कोई कसर नही छोड़ी. महिलाओ के इस आंदोलन से पुरुषवादी सत्ता हिल गयी. महिलाओ ने एकजुट हो आवाज जो उठाई थी. इसलिए इस चिंगारी को बुझाने के लिए दमन भी व्यापक तौर पर किया गया.

महिला जिसकी आज से 160 साल पहले लड़ाई आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक बराबरी की मांग को लेकर थी. आज सैंकड़ो साल बाद ये लड़ाई जो बहुत ज्यादा व्यापक होनी चाहिए थी. उन्होंने लड़ाई की मशाल जिस जगह हमको दी थी हमको उसे आगे ले जाना चाहिए था. उस मशाल से आग लगा देनी चाहिए थी दुश्मन की सत्ता को, लेकिन हुआ इसके उल्ट हमने बाजार, दुश्मन वर्ग और उसकी सत्ता के जाल में फंस कर उस मशाल को उस लड़ाई से बहुत पीछे की तरफ के गए. आज जो मशाल हम पकड़े हुए है वो मशाल दुश्मन वर्ग की है. उसमें ईंधन बाजार ने डाला है. इसलिए वो आग भी हमको ही लगा रही है.

आज सभी सरकारी-गैरसरकारी संस्थाए महिला दिवस मनाने की औपचारिकता करते है. महिला संघर्षो पर बात करने की बजाये महिलाओ के नाच गाने करवाते हैं, बाजार ओरियन्तिड प्रोग्राम करते है. किसी भी महकमे के सरकारी दफ्तरों में महिला चित्र सजा कर महिला दिवस मनाना महिला के खिलाफ एक साजिश है, एक भद्दा मजाक है

महिला दिवस कोई खुशी मनाने का त्यौहार नही है. महिला दिवस तो संघर्षो की समीक्षा करने और लड़ाई की आगे की रणनीति बनाने का दिन है. उन महिलाओं की कुर्बानियों को याद करने और लड़ाई के लिए खुद को कुर्बान करने की प्रेरणा लेने का दिन है. महिला दिवस पूरे विश्व की महिलाओ के संघर्षो का प्रतीक है. ये महिला दिवस उन महिला और पुरुषों को मनाना चाहिए जो महिलाओं की आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक बराबरी की बात करता हो.

महिला दिवस की खुशी तभी सार्थक है जब समाज में उसकी सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक बराबरी की बात करता हो, संपूर्ण समानता. क्या महिला के काम का बँटवारा लिंग के आधार पर खत्म हो चुका है? क्या वो अभी शिक्षा के अधिकार से वंचित नहीं, उसका सम्पत्ति में बराबरी का हक है? अपना जीवन साथी चुनने का अधिकार है? उसको तो अपनीभावी संतान चुनने का अधिकार भी नही है. महिला को कितने बच्चे करने है, कब करने है, लड़का या लड़की में से क्या पैदा करना है इन सब मामलों में महिला को फैंसले लेने का अधिकार ये सब पुरुषवादी शता तय करती है. जब आपको खुद के शरीर के बारे में भी फैसले लेने तक का अधिकार नही है तो कोनसी खुशी में पगलाए हुए हो.

बाज़ार जो झूठे सपने दिख कर हमको फंसा रहा है अगर इसमें थोड़ी सी भी सच्चाई होती तो समाजिक संस्थाये, साहित्य, सिनेमा, अखबार, पत्रिकाएँ चीख कर महिला की आज की स्थिति से अवगत ना करवाती, हर दिन अखबार भरे मिलते है कि महिलाओ से बलात्कार की घटनाओं से 1 साल की बच्ची से 80 साल तक कि महिला के साथ बलात्कार की घटनाएं हो रही है. महिलाओ पर तेजाब फेंकने की घटनाएं, छेड़छाड़ आम बात है. आज जब पूरे विश्व मे खासकर भारत मे महिलाओ के हालात बहुत बुरे है. सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक बराबरी तो अभी बहुत दूर का सपना है.

आज भी महिला की स्थिति संकटर्पूण है. रूढ़िवादी धारणा की ताकत का प्रभाव उस पर पूरी तरह व्याप्त है उसे दूर करना होगा. एक ऐसे महिला आंदोलन की जरूरत है जो इन क्रीटिकल मुद्दों से रूबरू करवा सके. महिला आमूल परिवर्तन की दिशा जो आज उपभोक्तावादी बना दी गई है उसके लिए आंदोलन जरूरी है. हमे विचार विमर्श से एक मजबूत सपोर्ट बनानी होगी जो महिला की राजनीतिक सक्रियता और सीविल सोसायटी के लिए आवाज उठाने हेतू खुला स्थान दिला सके ताकि हमारे परिवर्तन की दिशा में जो सार्थक प्रयास है,उद्देश्य है वो पूरे हो सके. इस आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी के साथ साथ जरूरी है Male feminist रवैये की.

इसलिए आज जरूरत है महिला दिवस को बाज़ार और सत्ता के चंगुल से निकाल कर उसके असली रूप में लाने की, बराबरी के समाज का निर्माण करने के लिए कुर्बान हुई हजारो महिलाओं के सपनो को पूरा करने के लिए इस लड़ाई की मशाल को अंत तक ले जाने के लिए संघर्ष करने की.

USha Singh & Uday Che

राष्ट्रपति के प्रोग्राम से पहले 6 एएमयू स्टूडेंट्स को नोटिस

अलीगढ़। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के दीक्षांत समारोह में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के कार्यक्रम का ‘विरोध’ कर रहे छात्रों पर पुलिस ने सख़्ती दिखाई है. बुधवार को यूनिवर्सिटी के 65वें दीक्षांत समारोह में कुछ छात्रों द्वारा राष्ट्रपति कोविंद का विरोध करने की आशंका को देखते हुए एएमयू के छह स्टूडेंट्स को नोटिस दे दिया गया.

पुलिस की रिपोर्ट पर अलीगढ़ के एक कोर्ट ने छात्रों से ये भरोसा देने को कहा था कि वे राष्ट्रपति के कार्यक्रम में बाधा नहीं पहुंचाएंगे. अपर नगर मजिस्ट्रेट (द्वितीय), अलीगढ़ की कोर्ट ने यूनिवर्सिटी के छह छात्रों को अदालत में हाजिर होकर पांच लाख रुपये की रकम की दो ज़मानतें और इसी रकम का हाजिरी मुचलका उत्तर प्रदेश सरकार के पक्ष में भरने के लिए कहा. पांच मार्च की तारीख से जारी किए गए कोर्ट के हुक्मनामे के मुताबिक़ इन छात्रों को इस ज़मानत से एक साल के लिए शांति बनाए रखने की गारंटी ली जाएगी.

अलीगढ़ प्रशासन ने जिन छात्रों को नोटिस जारी किया है, उनके नाम हैं, मोहम्मद जुनैद अहमद, मोहम्मद नदीम अंसारी, अदनान आमिर, जयेद शेरवानी, राव फराज वारिस और इमरान ख़ान. इस कार्रवाई पर छात्रों का कहना है कि जब उन्होंने कोई क्राइम नहीं किया है, तो हमें नोटिस कैसे भेजा जा सकता है. एक छात्र इमरान ख़ान का कहना था कि, “हमारा विरोध राष्ट्रपति से नहीं है बल्कि हम राष्ट्रपति के साथ आ रहे संघ की विचारधारा वाले लोगों के यूनिवर्सिटी में दाखिल होने से विरोध कर रहे थे.” उन्होंने कहा, “हम अपने वकील के जरिए इस नोटिस का जवाब देंगे.

श्री मोदी’ नहीं कहा तो जवान की सात दिन की तनख़्वाह काटी

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नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से जुड़ा एक दिलचस्प मामला सामने आया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम के सामने ‘श्री’ न लगाने के कारण सीमा सुरक्षा बल के एक जवान के सात दिन की तनख़्वाह काट दी गई है. मामला 21 फ़रवरी का है. इस दिन बंगाल के नदिया के महातपुर में मौजूद बीएसएफ़ की 15वीं बटालियन के मुख्यालय में परेड चल रही थी. परेड के दौरान जवान संजीव कुमार ने रिपोर्ट देते वक्त ‘मोदी के कार्यक्रम’ का इस्तेमाल किया.

संजीव कुमार को बीएसएफ़ एक्ट की धारा 40 के अनुसार ‘दोषी’ पाया गया और सज़ा के तौर पर उनकी सात दिन की तनख़्वाह काटी गई. असल में बीएसएफ की परंपरा के मुताबिक देश के प्रधानमंत्री सहित गृहमंत्री और रक्षा मंत्री आदि के नाम के पहले आदरसूचक शब्द के रूप में ‘श्री’ शब्द लगाने का चलन रहा है.

आंदोलन से पहले पुलिस ने सहारनपुर में भीम आर्मी पर कसा शिकंजा

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सहारनपुर। भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर आजाद रावण की गिरफ्तारी के खिलाफ कल 8 मार्च को जेल भरो आंदोलन से पहले पुलिस ने भीम आर्मी के कार्यकर्ताओं को डराना शुरू कर दिया है. अमर उजाला के मुताबिक सहारनपुर पुलिस ने भीम आर्मी के पांच प्रमुख कार्यकर्ताओं को नोटिस जारी कर दिया है और उनको मुचलका में पाबंद किया जा रहा है.

पुलिस ने 9 मई 2017 में हुई घटना के मामले में नामजद हुए सौ से अधिक लोगों पर गिरफ्तारी के लिए दबाव बनाया है, जिसके बाद कार्यकर्ताओं ने जमानत करानी शुरू कर दी. पुलिस ने इस मामले में 500 से अधिक लोगों को नोटिस भेजा है, जिससे भीम आर्मी के कार्यकर्ताओं में रोष है. नोटिस में कहा गया है कि वे भीम आर्मी के सक्रिय कार्यकर्ता हैं और उनकी गतिविधियों के चलते माहौल खराब होने की संभावना है.

दरअसल भीम आर्मी की 18 फरवरी को हुई सभा में पुलिस ने गुपचुप तरीके से प्रमुख पदाधिकारियों के अलावा भीड़ की भी वीडियोग्राफी करा ली थी. सूत्रों के अनुसार भीड़ में से लोगों की पहचान कराकर उन्हें चिह्नित कर उनपर कार्रवाई की जा रही है. चंद्रशेखर उर्फ रावण को जेल से रिहा कराने के लिए भीम आर्मी कार्यकर्ताओं ने 8 मार्च को जेल भरो आंदोलन करने की घोषणा की है. इस संबंध में भीम आर्मी के कार्यकर्ताओं ने जेल में चंद्रशेखर रावण से भी मुलाकात की. भीम आर्मी के जिलाध्यक्ष कमल वालिया ने कहा है कि भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर उर्फ रावण ने उन्हें गिरफ्तारी देने के लिए हरी झंडी दे दी है. उन्होंने समर्थकों से बेझिझक होकर गिरफ्तारी देने का आह्वान किया.

पेरियार की मूर्ति टूटने पर भड़कीं मायावती

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लखनऊ। भाजपा समर्थकों द्वारा लेनिन और पेरियार की मूर्ति तोड़े जाने के खिलाफ बसपा प्रमुख मायावती ने भाजपा की राजनीति पर सवाल खड़ा किया है. इस मुद्दे पर बसपा प्रमुख ने भाजपा की बयानबाजी को खोखला बताते हुए उसकी निंदा की है. उन्होंने सवाल उठाया कि जब पश्चिम बंगाल की तृणमूल सरकार श्री श्यामा प्रसाद मुखर्जी के मामले में तत्काल कानूनी कार्रवाई कर सकती है तो अन्य राज्यों की सरकारें भी त्वरित कानूनी कार्रवाई क्यों नहीं कर सकती थी.

उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री ने कहाकि बीजेपी एंड कंपनी को अपने लोगों पर नियंत्रण रखने के साथ-साथ केंद्र सरकार को भी सभी राज्य सरकारों को हिंसा को रोकने के सख्त निर्देश देने चाहिए, न कि उपद्रवियों को खुला छोड़ देना चाहिए. उन्होंने केंद्र व बीजेपी की राज्य सरकारों से लोगों के जान-माल व मजहब के सुरक्षा की संवैधानिक गारंटी को सुरक्षित रखने की मांग की. भाजपा पर तंज कसते हुए मायावती ने कहा कि सत्ता में आ जाने के बाद बीजेपी व आर.एस.एस को राजनीतिक हिंसा व विध्वंस को अपना हथियार बनाने से बाज आना चाहिए.

लखनऊ से जारी अपने बयान में बसपा अध्यक्ष ने कहा कि त्रिपुरा राज्य में नई बीजेपी सरकार के बनते ही वहां मार्क्सवादी नेताओं पर हमले, उनके कार्यालयों में तोड़फोड़ तथा सार्वजनिक स्थलों में स्थापित लेनिन की मूर्तियों का विध्वंस करने के साथ आत्म सम्मान मूवमेंट के नेता रामास्वामी नायकर पेरियार की मूर्ति को खंडित करना यह साबित करता है कि देश में नफरत, हिंसा व विघटन की राजनीति हर तरफ सर चढ़कर बोलने लगी है, क्योंकि आपराधिक मानसिकता वाले लोगों को अब कानून का बिल्कुल खौफ नहीं रह गया है.

मूर्तितोड़ राजनीति के बाद सोशल मीडिया में उबाल

त्रिपुरा में भाजपा के सत्ता में आने के बाद रुसी क्रांति के महानायक लेनिन की मूर्ति तोड़ने से शुरू हुआ विवाद बढ़ता जा रहा है. भाजपा समर्थकों ने लेनिन की मूर्ति तोड़ने के बाद तामिलनाडु में बहुजन विचारक पेरियार की मूर्ति भी तोड़ दी. इससे गुस्साए वाम समर्थकों ने दक्षिण कोलकाता में जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी की प्रतिमा को क्षतिग्रस्त कर दिया. लेनिन और पेरियार की मूर्ति तोड़ने के बाद चुप्पी साधे सरकार और भाजपा समर्थकों की नींद श्यामा प्रसाद मुखर्जी की प्रतिमा तोड़े जाने के बाद खुल गई है. पीएम मोदी और अमित शाह ने इस हिंसा को रोकने की अपील की है. पेरियार की मूर्ति से तोड़फोड़ के मुद्दे पर तमिलनाडु के सांसदों ने संसद परिसर में विरोध प्रदर्शन किया. इस मामले पर टीएमसी सांसद डेरेक ओ ब्रायन ने कहा कि- ‘जिस तरीके से ये हो रहा है, आगे वह नेता जी सुभाष चंद्र बोस, विवेकानंद और गांधी की मूर्तियां तोड़ने लगेंगे. हम स्टालिन-लेनिन की विचारधारा का समर्थन नहीं करते, लेकिन हमने चुनाव जीता तो उसे नुकसान नहीं पहुंचाया.

तो वहीं सोशल मीडिया में इस घटना के बाद विचारों को लेकर बहस छिड़ गई है. आम लोगों से लेकर नेताओं और पत्रकारों ने इस घटना को लेकर अपना नजरिया रखा है.

Ram Gayas

राम ग्यास ने फेसबुक पर लिखा है- गांधी की मूर्ति पूरी दुनियां में क्या कर रही है, उसे तोड़ देना चाहिए। ईशा के चर्च यहां क्या कर रहे हैं। मोहम्मद की मस्जिद यहां कर रही है। हिंदुओ के मंदिर कम्बोडिया में क्या कर रहे हैं। बुद्ध की मूर्तियां पूरे एशिया में क्या कर रही हैं। जो लोग एक बूत को बर्दाश्त नहीं कर पा रहे है वो विश्वगुरु बन के दुनियां को अपनी बकलोली समझाते है.

हाल ही में राजनीति में आए फिल्म अभिनेता कलम हासन ने पेरियार की मूर्ति पर हमले को लेकर कहा है- मूर्ति की सुरक्षा के पुलिस तैनात करने की कोई जरूरत नहीं है. हम तमिल खुद इसकी सुरक्षा करेंगे. मुझे लगता है कि कावेरी मुद्दे से ध्यान भटकाने के लिए यह सब किया जा रहा है.

पत्रकार मंजीत ठाकुर ने (फेसबुक) लिखा है- मूर्तियां नश्वर होती हैं. विचार शाश्वत होते हैं. मूर्तियों को तोड़ देने से विचारों का नाश होना होता, तो मुस्लिम आक्रांताओं के हाथों हजारों मूर्तियों के टूटने से हिंदू धर्म नष्ट हो जाता, राजा शशांक के हाथों बोधि वृक्ष कटवाए जाने और बामियान में तालिबान के हाथों प्रतिमा तोड़ने से बौद्ध धर्म खत्म हो जाता. मूर्तियां खत्म हो जाती हैं, विचार रह जाते हैं.

वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार ने ट्विट किया- ‘त्रिपुरा में लेनिन की मूर्ति ढहा दी गई, कल अंबेडकर परसों भगत सिंह फिर नेहरु और बाद में गांधी की गिराओगे, लेकिन ये तो बताओ इस देश को कहां ले जाओगे?’ तो जिग्नेश मेवाणी ने राजस्थान हाई कोर्ट में लगी मनु की मूर्ति तोड़ने की बात कर डाली है. इस विवाद पर मेवाणी ने ट्विट कर कहा है कि- Modi ji tell your boys to destroy the statue of manu, not lenin or Periyar. Mind well, exploited dalits will always cherish the legacy of aambedkar, lenin, periyar, Phule and some day they will definitely destroy the manu-murti at Rajasthan high court.

 

आदिवासी बहुल इलाकों में आदिवासियों को कमान क्यों नहीं देती भाजपा

त्रिपुरा में जीत के बाद भारतीय जनता पार्टी खासी उत्साहित है. उसे जहां वाम का गढ़ ढहा देने की खुशी है तो वहीं पूर्वोतर राज्यों में जीत से भाजपा फूले नहीं समा रही है. त्रिपुरा में अगर किसी एक समाज के संख्याबल के प्रभुत्व की बात करें तो वह आदिवासी समाज है. प्रदेश में उनके लिए बीस सीटें सुरक्षित हैं, जबकि उनकी आबादी 31.8 फ़ीसदी है. लेकिन 20 सीटों और तकरीबन 32 फीसदी आबादी के बावजूद त्रिपुरा की सत्ता पर एक गैर आदिवासी नेता का कब्जा हो गया है.

सवाल सिर्फ त्रिपुरा का नहीं है, बल्कि त्रिपुरा जैसे ही अन्य आदिवासी बहुल राज्यों का हाल भी यही है. त्रिपुरा के अलावा झारखंड, ओडिशा और छत्तीसगढ़ को आदिवासी बहुल राज्य के रूप में जाना जाता है. हालांकि ये राज्य पूर्वोतर के उन छह राज्यों अरुणाचल प्रदेश, नगालैंड, मिजोरम, मेघालय, दादर एवं नागर हवेली और लक्षद्वीप से अलग हैं, जहां आदिवासियों की आबादी पचास फ़ीसदी से भी ज्यादा है. सवाल उठता है कि आखिर आदिवासियों की इतनी बड़ी आबादी होने के बावजूद सत्ता की कमान इनके हाथों में क्यों नहीं सौंपी जाती है?

थोड़ा पीछे चलते हैं. 26.2 प्रतिशत आदिवासी आबादी वाले झारखंड को जब बिहार से अलग राज्य के रूप में गठित किया जा रहा था तो दावा यह किया जा रहा था कि आदिवासी आबादी के लिए यह ज़रुरी हैं और झारखंड के अलग राज्य बनने के बाद यहां के आदिवासियों का विकास बहुत तेजी से होगा. लेकिन आदिवासी हित के दावे अब तक झूठे ही साबित हुए हैं. पिछले चुनाव में पहली बार अकेले दम पर बहुमत से सत्ता में आने के बाद भाजपा ने यहां रघुवर दास के रूप में गैर आदिवासी को मुख्यमंत्री बनाने का फैसला लिया.

इसी तरह मध्यप्रदेश से अलग कर के जब 30.6 प्रतिशत आदिवासी आबादी के साथ छत्तीसगढ़ राज्य बनाया गया तो इसको आदिवासियों के पिछड़ेपन को दूर करने लिए जरूरी कदम के रूप में प्रचारित किया गया था. छत्तीसगढ़ में भी भाजपा की सरकार है, लेकिन किसी आदिवासी को सत्ता की कमान देने की बजाय पिछले पंद्रह सालों से सत्ता के शीर्ष पर सवर्ण समाज के रमन सिंह बैठे हैं. ये तब है जब झारखंड में आदिवासियों के लिए सुरक्षित सीटों की संख्या 28 और छत्तीसगढ़ में 29 है और इनकी आबादी राज्य के किसी एक हिस्से में न होकर पूरे राज्य में फैली है.ओडिशा में भी सुरक्षित क्षेत्रों की संख्या 33 हैं और 22.8 प्रतिशत आबादी के साथ आदिवासी समुदाय पूरे चुनाव को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं. लेकिन ओडीशा में भी गैर आदिवासी मुख्यमंत्री ही रहे हैं.

आंकड़े बता रहे हैं कि राजनैतिक दल आदिवासियों को बहला कर उनका वोट और विश्वास तो हासिल कर लेते हैं लेकिन उन्हें सत्ता में भागेदारी देने से बचते हैं. दलितों और आदिवासियों को ज्यादा सबल नहीं बनाने के भी यही कारण हैं, न वो सबल होंगे और न ही सत्ता में हक मांगेगे. और उनके वोट के बूते समाज का सवर्ण तबका लगातार सत्ता का सुख भोगता रहेगा.

राज्यसभा उम्मीदवारी पर मायावती का एक तीर से दो निशान

लखनऊ।गोरखपुर और फुलपूर उपचुनाव में सपा-बसपा के साथ आने के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति में कई तरह के कयास लगने शुरू हो गए थे. कहा यह भी गया कि इस गठबंधन के जरिए मायावती अपने भाई और पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष आनंद कुमार को राज्यसभा भेजना चाहती हैं. इन तमाम तरह की चर्चाओं को करारा झटका लगा है. बसपा प्रमुख मायावती ने बसपा के राज्यसभा उम्मीदवार के तौर पर एक जमीनी कार्यकर्ता के नाम की घोषणा कर के सबको चौंकाते हुए सभी अटकलों पर रोक लगा दिया है.

राज्यसभा सीट के लिए मायावती ने कांशीराम के सहयोगी रहे पार्टी के पूर्व विधायक भीमराव अंबेडकर को राज्यसभा भेजने का ऐलान किया. भीमराव उत्तर प्रदेश के इटावा के रहने वाले हैं. मायावती ने मंगलवार को राज्यसभा चुनाव की तैयारी के लिए विधायकों और पार्टी के प्रमुख नेताओं के साथ बैठक के बाद सबको चौंकाते हुए भीमराव अंबेडकर के नाम की घोषणा कर दी. जहां तक बसपा के घोषित राज्यसभा प्रत्याशी भीमराव अंबेडकर की बात है तो वह पार्टी प्रमुख मायावती के करीबी नेताओं में से एक हैं. मौजूदा समय में वो कानपुर मंडल के जोनल को-ऑर्डिनेटर हैं. वह बसपा के संस्थापक कांशीराम के समय से ही पार्टी में सक्रिय भूमिका में है. उनका नाम पार्टी के मिशनरी कार्यकर्ताओं में उनका नाम आता है.

भीमराव पेशे से वकील हैं. 2007 में वो इटावा के लखना विधानसभा सीट से चुनाव जीत कर पहली बार विधायक बने थे. उत्तर प्रदेश की 10 राज्यसभा सीटों के लिए चुनाव होने हैं. उनके नाम की घोषणा कर के मायावती जहां पार्टी के जमीनी कार्यकर्ताओं को साकारात्मक संदेश देने में सफल रही हैं तो वहीं भाजपा द्वारा दलितों को अपने पाले में करने की कोशिशों को भी झटका दे दिया है.

मुस्लिम और बौद्ध अनुयायियों के बीच हिंसा के बाद श्रीलंका में 10 दिनों का आपातकाल

श्रीलंका में बौद्ध धर्म और इस्लाम के अनुयायियों के बीच हिंसक तनाव को देखते हुए सरकार ने 10 दिनों के आपातकाल की घोषणा की है. कैबिनेट की विशेष बैठक में यह फैसला लिया गया है. श्रीलंका सरकार के प्रवक्ता के मुताबिक हिन्द महासागर क्षेत्र के कैंडी जिले में उपजे साम्प्रदायिक तनाव के चलते इमरजेंसी लगाने का फैसला किया गया है. इस इलाके के बौद्ध कट्टरपंथियों और मुसलमनों में पिछले लगभग एक साल से तनाव चल रहा है.

बौद्ध कट्ट्ररपंथियों का कहना है कि मुसलमान जबरन हमारे लोगों का धर्म परिवर्तन करा रहे हैं और साथ ही हमारी ऐतिहासिक धरोहरों को भी नुकसान पहुंचा रहे हैं. बहुत से बौद्धों को श्रीलंका में रोहिंग्या मुसलमानों को शरण देने को लेकर भी ऐतराज है. सोशल मीडिया के जरिए अफवाह फैलाने वालों पर भी कार्रवाई करने की बात कही गई है.

स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक सरकार ने हिंसाग्रस्त कैंडी जिले में भारी मात्रा में सुरक्षाबल तैनात कर दिया है. इस इलाके में सोमवार को कुछ मसलमानों की दुकानों में तोड़फोड़ के बाद उन्हें आग के हवाले कर दिया था. इस इलाके में बौद्ध बहुसंख्यक जबकि मुसलमान अल्पसंख्यक हैं. कैंडी जिले में सरकार ने कर्फ्यू भी लगा दिया है.