योगी से रिटर्न गिफ्ट लेने में कामयाब हुए लालजी निर्मल

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योगी को दलित मित्र अवार्ड दिए जाने वाले दिन की तस्वीर, पीछे चश्में में लालजी प्रसाद निर्मल

लखनऊ। पिछले दिनों भारी विरोध के बावजूद यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को ‘दलित मित्र’ सम्मान देने वाले अम्बेडकर महासभा के अध्यक्ष लालजी प्रसाद निर्मल योगी से रिटर्न गिफ्ट हासिल करने में कामयाब रहें. तो वहीं मायावती सरकार में डीजीपी रहे रिटायर्ड आईपीएस बृजलाल को भी बड़ा इनाम मिला है.

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर रिटायर्ड आईपीएस बृजलाल को अनुसूचित जाति और जनजाति आयोग का अध्यक्ष नियुक्त किया गया है. इसी तरह सीएम योगी के निर्देश पर लालजी प्रसाद निर्मल को उत्तर प्रदेश अनुसूचित जाति वित्त विकास निगम का अध्यक्ष नियुक्त किया गया है. लालजी निर्मल के द्वारा योगी को दलित मित्र अवार्ड देने का भारी विरोध भी हुआ था. महासभा के दो संस्थापक सदस्यों जिनमें पूर्व आईजी एवं रिटायर्ड आईपीएस एस.आर. दारापुरी शामिल हैं, उन्होंने निर्मल के इस फैसले का जमकर विरोध किया था.

बावजूद इसके निर्मल ने सभी विरोधों को दरकिनार करते हुए यह कदम उठाया था. लखनऊ में 14 अप्रैल को अंबेडकर जयंती के मौके पर सीएम योगी को इस सम्मान से नवाजा गया. निर्मल की अध्यक्षता वाले अम्बेडकर महासभा ने सीएम योगी को यह अवार्ड तब दिया, जब उन पर 2 अप्रैल को दलितो के प्रदर्शन के बाद सैकड़ों दलितों को जबरन जेल में डाल देने का आरोप लगा था.

उन्नाव और कठुआ गैंगरेप पर खुलकर बोले बॉलिवुड सितारे

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उन्नाव और कठुआ रेप केस से पूरे देश के लोग गुस्से में हैं. बॉलिवुड सिलेब्स से लेकर आम आदमी तक हर कोई बुरी तरह मार दी गई बच्चियों के सपॉर्ट में है. मुंबई में भी साइलंट प्रोटेस्ट किया गया जहां कई बॉलिवुड सिलेब्स ने रेपिस्ट्स को कड़ी सजा दिलाने की मांग की. अभिनेत्री भूमि पेडनेकर, शबाना आजमी, अदिति राव हैदरी, सुनील शेट्टी, विशाल डडलानी,हेलन, पायल रोहतगी, समीरा रेड्डीऔर एकता कपूर जैसे सितारों ने कहा कि इस तरह की घटनाओं के मामले में कड़े कानून बनाए जाने चाहिए और घर में लड़कों को शिक्षा देनी चाहिए कि महिलाओं की इज्जत करें.

मुझे बहुत दुःख लगता है और घबराहट होती है.

भूमि कहती हैं, ‘हमारे देश में जिस तरह का माहौल है, ऐसे में एक लड़की होते हुए मुझे बहुत दुःख लगता है और घबराहट होती है. सोचती हूं कल आनेवाली जो जनरेशन है उनका क्या होनेवाला है. पता नहीं ह्यूमैनिटी किस तरफ जा रही है? महिलाओं के मामले में माहौल में एक दरिंदगी और जानवर जैसी भावना देखने को मिल रही है. यह सब सचमुच बेहद हार्टब्रेकिंग है. मैं सिस्टम में विश्वास रखती हूं और आशा करती हूं उन्नाव और कठुआ गैंगरेप मामले में जल्द ही न्याय मिलेगा. इस तरह के घिनौने और नीच अपराध के लिए इतनी कड़ी सजा निर्धारित की जानी चाहिए जिससे अगली बार कोई ऐसा अपराध करने से पहले डरे, किसी को ऐसा नहीं लगना चाहिए कि वह इतना घिनौना अपराध करके बच कर निकल जाएगा, इस तरह एक अच्छा उदाहरण सेट होगा.’

बेटी को पढ़ाने के लिए उसे जिंदा भी तो रखना पड़ेगा

शबाना आजमी ने कहा, ‘हिन्दुस्तान एक ऐसा मुल्क है जो कई सदियों में एक साथ जीता है. हम हिन्दुस्तानी 18वीं, 19वीं, 20वीं और 21वीं सदी में एक साथ रहते हैं और यह सबसे ज्यादा नजर आता है हमारे देश की औरतों में. एक तरफ हम देखते हैं हमारी औरतें बहुत ऊंचाइयों तक पहुंची हैं और बहुत बड़ी लीडर भी हैं और दूसरी ओर ऐसी खबरे पढ़ते, देखते, सुनते हैं कि कुछ कहने के लायक नहीं रह जाते. मुझे ऐसा लगता है कि हम एक आवाज के साथ पूरी तरह उठकर मेहनत करें ताकि जिस तरह के कांड रोजमर्रा में हो रहे हैं वह बंद हो जाएं. हम बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ कहते हैं और यह होना भी चाहिए, लेकिन उसके लिए बेटी को जिंदा भी तो रहना चाहिए.’

भारतीय होने में हमको शर्म आनी चाहिए

सुनील शेट्टी कहते हैं, ‘बेहद शर्मनाक घटना है. इस तरह की घटना के बाद भारतीय होने में हमको शर्म आनी चाहिए कि बार-बार हम ऐसी घटनाएं होने देते हैं. इस बार पूरा देश एक हो गया है और अपराधियों को सजा मिल भी रही है, लेकिन यह सजा ऐसी होनी चाहिए कि दोबारा ऐसा सोचने पर भी उन्हें डर लगना चाहिए.’

इन अपराधों को कतई भी पॉलिटिक्स और धर्म से न जोड़ें

पायल रोहतगी ने कहा, ‘आज भारत देश दुनिया भर में गलत रीजन की वजह से फेमस हो रहा है. कुछ वर्ष पहले निर्भया केस हुआ था और लगातार ऐसे केस सामने आते रहे हैं और अब एक साथ कई रेप और गैंगरेप के मामले सामने हैं. इन अपराधों को कतई भी पॉलिटिक्स और धर्म से न जोड़ें. मुद्दा यह है कि हमारे भारतीय पुरुष महिलाओं को क्यों इस नजर से देखते हैं. हमारे लड़के घरों में कैसे बड़े हो रहे हैं जो वह महिलाओं की रिस्पेक्ट नहीं कर पा रहे हैं. महिलाओं को लेकर भारतीय पुरुषों की सोच पर हमें बात करनी चाहिए. सुधार लड़कों की परवरिश और सोच में करना जरूरी है.’

यह कोई धर्म या किसी खास समुदाय से जोड़नी वाली घटना है क्या?

अदिति राव हैदरी कहती हैं, ‘जब तक हम सब मिलकर आवाज नहीं उठाएंगे कोई बदलाव नहीं आएगा. उन्नाव और कठुआ गैंगरेप मामले में जब आम जनता ने आवाज उठाई है तब जाकर इस मामले को इतनी गंभीरता से लिया गया है. अब हमें लगातार ऐसे मामले में खुलकर सामने आकर आवाज उठाते रहना होगा. यह मामला जनवरी महीने का है, कितने महीने गुजर गए हैं. इसी तरह तमाम परिवार और बहुत सी लड़कियां इस तरह की घटनाओं का शिकार हो रही हैं. अब इसे धर्म से जोड़ रहे हैं. यह कोई धर्म या किसी खास समुदाय से जोड़नी वाली घटना है क्या? यह एक बेसिक मांग है… देश की लड़कियां सुरक्षित रहें और खुद को सुरक्षित महसूस करें. पता नहीं लड़कों को क्या हो गया है. मुझे लगता है लड़कों को पढ़ाने की बहुत ज्यादा जरूरत है. जब तक एक लड़की मजबूत नहीं होगी देश विकास नहीं करेगा.’

तू-तू, मैं-मैं से ऊपर उठकर ऐक्शन लेना होगा

समीरा रेड्डी ने कहा, ‘शुरू से शुरू करना होगा. हर मां को अपने बेटे को लड़कियों और महिलाओं की इज्जत करना सिखाना होगा. बदलाव तो आएगा लेकिन थोड़ा वक्त लगेगा. इस मामले में किसी सरकार, धर्म, समुदाय और माहौल को जिम्मेदार ठहराने का कोई मतलब नहीं है. बदलाव लाने के लिए तू-तू, मैं-मैं से ऊपर उठकर अपने लड़कों को महिलाओं की इज्जत करना… सिखाने की जरूरत है. मैं एक मां हूं और सभी माताओं को कहना चाहती हूं बचपन से ही बेटे की परवरिश में महिलाओं की इज्जत करने की बात को शामिल करें.’

सुधार तभी होगा जब कड़े कानून बनेंगे

एकता कपूर कहती हैं, ‘यह घटना बेहद पेनफुल है. सुधार तभी होगा तब कड़े कानून बनेंगे और पुराने कानून में परिवर्तन होगा. कम से कम समय में अपराधी को कड़ी सजा मिलनी चाहिए.’

इसे धर्म से जोड़ना बंद करें

विशाल डडलानी कहते हैं, ‘उन्नाव और कठुआ में जो हुआ है उसे जो हिन्दू-मुस्लिम या धर्म-समुदाय से जोड़ा गया वह बिल्कुल बकवास बात है. इसे धर्म से जोड़ना बंद करें. बच्चियां सबकी होती हैं. वह बच्ची भी सबकी है. इस देश को हिन्दू-मुसलमान में बांटने की सोच जो अंग्रेज हमें विरासत में देकर गए हैं, यह भावना और सोच बंद होनी चाहिए. सोच ऐसी बननी चाहिए कि आप हिन्दू या मुसलमान नहीं बल्कि एक भारतीय हैं. यह देश हमारा है. यह प्रजातंत्र है. हम जैसे चाहेंगे देश वैसा चलेगा और हम चाहते हैं बलात्कार जैसी सभी तरह की घटनाएं बंद हों. कड़े कानून बनें और उसपर अमल भी किया जाए. कुछ लोग बलात्कारियों को बचाने में जुटे थे अब सब सामने है.’

2019 में बीजेपी सरकार नहीं बनेगी- अमेरिकी फर्म

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लोकसभा चुनाव 2019 में अभी एक साल का वक्त बचा है, लेकिन चुनाव से जुड़े पंडित अभी से ही आगामी सरकार को लेकर अटकलें लगाने लगे हैं. ऐसे में नरेंद्र मोदी के फिर से अपने दम पर सत्‍ता में आने को लेकर कयासबाजी का दौर भी शुरू हो गया है. अमेरिकी फर्म मॉर्गन स्‍टैनली ने वर्ष 2019 में केंद्र में गठबंधन की कमजोर सरकार बनने की संभावना जताई है. कंपनी की रिपोर्ट की मानें तो अगले साल कोई पार्टी अपने बूते सरकार नहीं बना पाएगी. ऐसे में भाजपा भी अपने दम पर सरकार नहीं बना पाएगी. वॉल स्‍ट्रीट की ब्रॉकरेज कंपनी के अनुसार, गठबंधन की कमजोर सरकार निवेशकों के लिए सबसे बड़ी चिंता है. मॉर्गन स्‍टैनली का कहना है कि बाजार का रुख आगामी आम चुनाव में पिछले लोकसभा चुनाव की तरह आशावादी नहीं रहेगा. कंपनी ने अपनी रिपोर्ट में कहा, ‘दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र चुनाव से महज 12 महीने दूर है. ऐसे में आने वाले कुछ महीनों में बाजार में चुनाव परिणाम को लेकर कयासबाजी शुरू होने की संभावना है. बाजार हमेशा मौजूदा से ज्‍यादा मजबूत सरकार की उम्‍मीद के साथ चुनाव में जाता है. लेकिन, वर्ष 2019 के चुनावों में यह लागू नहीं होगा, क्‍योंकि अगले साल वर्तमान से कमजोर सरकार बनने की संभावना है.

बाजार में नहीं दिखेगा उत्‍साह: मॉर्गन स्‍टैनली की रिपोर्ट के मुताबिक, केंद्र में गठबंधन की कमजोर सरकार बनने की संभावनाओं के बीच बाजार में आशा और उम्‍मीद रहने की संभावना बेहद कम है. अमेरिकी फर्म ने चेतावनी दी है कि वर्ष 2019 में बाजार का माहौल साल 2014 के आम चुनावों से पहले जैसा नहीं रहेगा. र्मार्गन स्‍टैनली ने पिछले पांच आम चुनावों के आधार पर यह निष्‍कर्ष निकाला है. कंपनी का कहना है कि 90 के दशक के मध्‍य से कोई भी सरकार पूर्ण बहुमत के साथ चुनाव में नहीं गई है.

इरा के सवाल

जिस जम्मू एवं कश्मीर को धरती का स्वर्ग के रूप में जाना जाता है, इसी जम्मू-कश्मीर के कठुआ जिले में रहने वाली 8 वर्षीय बच्ची आसिफा बानो के साथ सामूहिक बलात्कार की घटना घटित हुई. ये खबर सुनकर मेरा मन बहुत विचलित हुआ और मैंने सोचा कि मैं एक ऐसे देश में रह रहा हूँ, जहाँ भगवान के घर कहे जाने वाले मन्दिर में एक मासूम बच्ची जिसे अभी किसी धर्म व जाति के बारे में कुछ नहीं पता था . उस मासूम बच्ची को उठाकर लगातार 8 दिन तक मन्दिर के अन्दर बने प्रार्थना-स्थल में रखा गया, जहाँ उस बच्ची से सामुहिक बलात्कार किया गया. दरिन्दों के द्वारा बच्ची को भूखा रखा गया और उसे नींद की गोलियाँ व अपनी हवस को पूरा करने के लिए काम-वासना को उत्तेजित करने वाली दवाईयाँ खिलाई गई. लगातार उस मासूम बेटी के साथ बलात्कार किया गया और अन्त में उसका गला घोंट कर व पत्थरों से उसके चेहरे पर प्रहार करके उसे मौत की घाट उतार दिया गया और शव को जंगल में फेंक दिया गया.

ये सब हो रहा था एक मन्दिर प्रांगण में. आसिफा जो एक मुस्लिम बकरवाल परिवार में जन्मी थी. बकरवाल कश्मीर में एक घुमन्तु जनजाति के लोग हैं. ये लोग मौसम के अनुसार ऋतु प्रवास करते हैं, जिसमें ये लोग छः माह पहाड़ी और छः माह मैदान में अपने मवेशियों को चराकर अपना जीवन गुजर-बसर करते हैं. आसिफा उस दिन रस्साना के जंगलों में अपने घोड़े को चरा रही थी. वहीं से इन दरिन्दों ने आसिफा को उठाकर, मन्दिर में ले जाकर लगातार आठ दिन तक उस मासूम बच्ची के साथ बलात्कार किया. एक आठ वर्षीय मासूम बच्ची जिसे अभी किसी भी चीज के बारे में सही-सही जानकारी तक नहीं है . उसके साथ ये कुकृत्य किया इन दरिन्दों ने. इन दरिन्दों में देश के सुरक्षा के प्रहरी भी शामिल थे. कुछ प्रत्यक्ष रूप से और कुछ अप्रत्यक्ष रूप से.

आसिफा के साथ जब यह घटना घटित हो रही होगी तब उसके जहन में पुलिस से मदद की उम्मीद जगी होगी. जब मन्दिर में आसिफा ने पुलिस वाले को देखा होगा तो जरूर उसने नशे की हालात में लड़खड़ाती हुयी जुबान और तीन दिन से बिना पानी के सूखे-चिपके तालू से फुसफुसायी होगी, ‘‘अंकल मुझे बचा लो.‘‘ लेकिन पुलिस वाले के यह शब्द सुनकर वह मासूम बच्ची काँप उठी होगी, जब उसने पुलिस वाले को कहते हुए सुना होगा कि, ‘‘रूको मरने से पहले मुझे भी एक बार करने दो.‘‘ जहाँ उसे उम्मीद हुई थी कि पुलिस वाला मुझे इन दरिन्दों से बचायेगा, मगर उस मासूम को कहाँ पता था कि वो भी उस साढ़े तीन फूट के मरणासन्न शरीर से अपनी वासना शांत करने के जुगाड़ में था. वहीं दूसरी तरफ हिन्दुओं के तथाकथित संगठन उस बच्ची के बलात्कारियों को बचाने के लिए सड़कों पर उतरे हुए थे, सिर्फ इसलिए कि आसिफा मुस्लिम समुदाय में जन्मी थी. अरे मुर्खों, उसे तो अभी तक इस मानवीय मानसिक बीमारी के बारे में ज्ञान भी नहीं था. क्या मुस्लिम? क्या हिन्दू? उसका इससे कोई नाता नहीं था. वह तो थी बस एक मासूम सी कली.

यह घटना जब मन्दिर में घटित हो रही थी तो उस समय करोड़ों देवी-देवता कहाँ सो रहे थे? क्या आठ दिन तक मन्दिर में विराजमान भगवान सोते रहे? क्या आप भी उन जालिमों से मिले हुए थे या कोई रिश्वत खाई थी उनसे आपने? जवाब दो. अगर आपके पास कोई जवाब नहीं है तो फिर आपकी यह चुप्पी आप पर सवाल उठाती है. सवाल उठाती है आपके अस्तित्व पर, आपकी तथाकथित व्यवस्था पर. जिस दिन मुझे इस घटना की जानकारी मिली उस दिन मैं बहुत दुखी रहा. उस दिन शाम को मैं परेड ग्राउण्ड, देहरादून में चल रहे भीम महोत्सव में अपने मित्र सुमित कुमार के साथ कार्यक्रम देखने के लिए गया, तो वहाँ छोटी-छोटी बच्चियों को झूले में झूलते हुए देखा और सोचने लगा यदि आसिफा के साथ ये अमानवीय घटना न घटित होती तो वो भी ऐसे ही कहीं खेल रही होती और बहुत खुश होती. कार्यक्रम देखकर हम 10 बजे वापिस आ गये. सुमित मुझे मेरे कमरे पर ड्राप करके अपने घर के लिए निकल गया. कमरे पर पहुँचने के बाद मैं अपने बिस्तर पर लेट गया और कमरे की दीवार पर लगी अपनी बेटी इरा की फोटो देखने लगा जो अभी सात माह की है. इरा की फोटो देखते-देखते मैं एक अलग ही दुनिया में खो गया जहाँ मैं और इरा ही थे. मैं आसिफा की घटना को लेकर पूरे दिन बहुत दुखी था और सोच रहा था कि कल जब मेरी बेटी बड़ी होगी और मेरे इस लेख को पढ़ेगी तो वह मुझसे बहुत सवाल करेगी. मेरे लेख को पढ़कर इरा मुझसे आसिफा के बारे में पूछेगी.

आखिर क्यों हुआ यह आसिफा के साथ? इसलिए कि वह मुस्लिम थी. इरा मुझसे पूछेगी, ‘‘पापा जब वे दरिन्दे मन्दिर में आसिफा के साथ बलात्कार कर रहे थे तब भगवान कहाँ चले गये थे? क्या भगवान ने उनसे रिश्वत ले रखी थी? क्या भगवान ये सब होते हुए अपनी आँखों से देख रहे थे? क्या भगवान को आसिफा की मदद नहीं करनी चाहिए थी? पापा, क्या कर रहा था उस समय देश जब बच्ची के साथ यह कुकृत्य हो रहा था? पापा, जो लोग बलात्कारियों के समर्थन में सड़कों पर उतरे थे, वे कौन थे? पापा, जहाँ से आपने अपनी पढ़ाई की, जिसके बारे में आप तारीफ करते नहीं थकते उस शहर से भी एक दरिन्दा आसिफा के साथ बलात्कार करने जम्मू-कश्मीर गया था. क्या इसी मेरठ शहर से पढ़ाई की आपने? पापा, आप पूरे दिन मुझे संविधान की बाते बताते रहते हो. उस दिन संविधान की रक्षा करने वाले भी तो आसिफा के साथ मुँह काला कर रहे थे. पापा, क्या यह वही देश है, जहाँ महिलाओं को देवी का दर्जा दिया जाता है? पापा, आप कहते हो कि आप मेरी एक मुस्कान पाकर अपनी सारी समस्याओं को भूल जाते हो. पर पापा, क्या आसिफा के माँ-बाप अपनी बच्ची की मुस्कान को भूल पायेंगे? पापा, आप मेरे बिना एक पल नहीं रह सकते हो तो आसिफा के अब्बू-अम्मी कैसे रहेंगे अपनी आसिफा के बिना? क्या उन्हें आसिफा की याद नहीं आयेगी? पापा, क्या कश्मीर से पण्डितों को इसलिए ही भगाया गया था? पापा, आज मैं आपको एक बात बता रही हूँ. भगवान मूर्तियों में नहीं होता है और इस देश में आज भी नारी को सिर्फ भोग की वस्तु समझा जाता है.

इरा के सवाल सुनकर मैं सन्न रह गया था. अचानक से जैसे ही मुझे होश आया तो मैंने अपने आपको बहुत विचलित पाया. उस रात मैं इसी उधेड़बुन में सुबह तीन बजे तक सो नहीं पाया कि आखिर हम विश्व को शून्य की देन देने वाले भारतवासी अपनी संस्कृति को इस तरह के कुकृत्य को अंजाम देकर कैसे गर्त में ले जा रहे हैं? किस संस्कृति का उदाहरण पेश करेंगे हम विश्व के सामने कि हम उस देश के वासी हैं, जहाँ आठ वर्ष की मासूम बच्ची के साथ सामुहिक बलात्कार किया जाता है.

आज यह सवाल मुझसे इरा ने पूछे हैं. कल आपकी बेटी भी आपसे ऐसे सवाल करेगी और हमें शर्मशार होना पड़ेगा. आसिफा जैसी न जाने कितनी मासूम बच्चियों के साथ हो रही हवानियत के गुनहगार हम हैं. हम से मतलब – राजनीति, हिन्दू-मुस्लिम वाली भावना, ऊँच-नीच आदि में हम इस कदर घुस गये है कि सच का साथ देने सें डरते हैं. आज इन कुकृत्यों से हम अपनी संस्कृति की छवि को धूमिल कर रहे हैं.

नरेन्द्र वाल्मीकि

मोदी सरकार में नफरत भरे बयानों में 500 फीसदी का इजाफा

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नई दिल्ली। सबका साथ सबका विकास का नारा देने वाले मोदी सरकार के बारे में एक चौंका देने वाली सच्चाई सामने आई है, जो मोदी सरकार के दावे को झुंठला रहे हैं. सरकार के इस दावे की धज्जियां किसी और ने नहीं बल्कि खुद भाजपा के नेताओं ने उड़ाई है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चार साल के शासनकाल में दिग्गज नेताओं के घृणित और विभाजनकारी बयानों में करीब 500 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है.

न्यूज चैनल एनडीटीवी की रिपोर्ट के मुताबिक सासंद, मंत्री और विधायकों के साथ मुख्यमंत्री पद पर बैठे नेता भी इस दौरान नफरत भरे बयान देने से नहीं चूके. रिपोर्ट में सांसद, विधायकों, मुंख्यमंत्रियों के अलावा उन नेताओं के बयानों को भी शामिल किया गया है जो या तो पार्टी के प्रमुख हैं या राज्यों के राज्यपाल हैं. पब्लिक रिकॉर्ड्स और इंटरनेट के जरिए इकट्ठा कर बनाई गई इस रिपोर्ट में करीब 1300 आर्टिकल और अन्य सूत्रों से मिली सामग्रियों को शामिल किया गया है.

अध्ययन में अप्रैल के अंत तक आला नेताओं के करीब एक हजार ट्वीट्स को भी शामिल किया गया है. अगर सिलसिलेवार बात करें तो, मई, 2014 से अबतक 44 राजनेताओं द्वारा 124 बार नफरत भरे बयान दिए गए. इसी तरह पिछली सरकार के मुकाबले मोदी सरकार में नफरत भरे बयानों के मामले में 490 फीसदी की बढ़तरी हुई है.

अगर अलग अलग बात करें तो इस रिपोर्ट के मुताबिक 44 नेताओं द्वारा दिए नफरत भरे बयानों में 77 फीसदी यानी 34 भाजपा से ताल्लुक रखते हैं जबकि 23 फीसदी यानी 10 नेता कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और लालू यादव की राष्ट्रीय जनता दल से ताल्लुक रखते हैं.

हालांकि वहीं यह बात भी चौंकाने वाली है कि इन बयानों के लिए किसी पर भी कोई बड़ी कार्रवाई नहीं हुई है. रिपोर्ट के मुताबिक मोदी सरकार में जिन 44 नेताओं ने नफरत भरे बयान दिए उनमें सिर्फ पांच मामले में नेताओं को फटकाई लगाई गई या चेतावनी दी गई या इन नेताओं ने सार्वजिनक रूप से माफी मांगी. नफरत भरे बयान देने वाले 44 नेताओं में महज 11 खिलाफ केस दर्ज किया गया.

राज्यपाल ने छुआ महिला पत्रकार का गाल, पत्रकार ने ली जमकर खबर

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तमिलनाडु के राज्यपाल बनवारी लाल पुरोहित ने एक प्रेस कांफ्रेस में एक महिला पत्रकार के सवाल का जवाब देने की बजाय उसका गाल छू लिया. राज्यपाल के इस कदम से बवाल हो गया है. ‘डिग्री के लिए सेक्स’ केस में आरोपी महिला के बयान पर घि‍रे बनवारी लाल पुरोहित ने 17 अप्रैल को इस मामले पर प्रेस कॉन्फ्रेस बुलाई थी. इस प्रेस कॉन्फेस में तब सब चौंक गए जब एक महिला पत्रकार के सवाल पर राज्यपाल ने जवाब देने के बजाय उसके गाल सहला दिए.

राज्‍यपाल की इस हरकत से महिला पत्रकार काफी असहज हो गईं. राज्‍यपाल के ऐसा करने के बाद महिला पत्रकार लक्ष्मी सुब्रमण्यम ने सोशल मीडिया के जरिए इस हरकत का विरोध किया. इसके साथ ही उन्‍होंने एक मैगजीन के लिए 630 शब्दों का आर्टिकल लिखा, जिसमें राज्‍यपाल के ऐसा करने को दुखद और गलत बताया है. महिला पत्रकार ने ट्वीट किया कि, ‘मैंने अपना चेहरा कई बार धोया, लेकिन मैं इस भाव से छुटकारा नहीं पा रही. राज्‍यपाल बनवारी लाल पुरोहित से मैं काफी गुस्‍से में हूं. ये हो सकता है आपके लिए प्रोत्‍साहन का तरीका और दादाजी जैसा रवैया हो, लेकिन मेरे लिए आप गलत हैं. ये अव्‍यवहारिक रवैया है. किसी भी अंजान को उसकी सहमति के बिना छूना, खास तौर से महिला को, ये गलत है.’

फिर मुसीबत में मोहम्मद शमी, कोलकाता पुलिस ने पूछताछ के लिए बुलाया

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नई दिल्लीः आईपीएल में दिल्ली डेयरडेविल्स की तरफ से खेल रहे भारतीय तेज गेंदबाज मोहम्मद शमी फिर मुसीबत में फंस गए हैं. सोमवार को कोलकाता नाईट राइडर्स के खिलाफ हुए मैच के बाद कोलकाता पुलिस ने उन्हें रोक लिया. पुलिस ने उन्हें समन भेजकर बुधवार को 2 बजे पूछताछ के लिए बुलाया है. इसके बाद पुलिस ने उनको कोलकाता के ही होटल ग्रेट एस्टर्न में रोक लिया.

शमी की पत्नी हसीन जहां ने 10 अप्रैल को शमी पर भत्ता और इलाज का खर्चा नहीं देने का आरोप लगाते हुए केस दर्ज करवाया था. अब पुलिस शमी से भत्ते मामले पर बातचीत करेगी. वहीं पुलिस ने शमी के भाई हसीब को भी समन भेजा है. हसीने ने हसीब पर दुष्कर्म का आरोप लगाया है. यदि अब यह मामला आैर बढ़ता है तो हो सकता है शमी को आईपीएल से दूर होकर नुक्सान झेलना पड़ सके.

महीने का 10 लाख खर्चा मांग रही है हसीन

हसीन ने शमी से महीने का 10 लाख खर्चा मांगने की मांग की है. उसने 10 अप्रैल को भत्ते और इलाज खर्चे के रूप में हसीन जहां ने मोहम्मद शमी से प्रतिमाह 10 लाख रुपए की डिमांड की थी. हसीन जहां के वकील के मुताबिक, केस की गंभीरता को समझते हुए कोर्ट ने जल्द ही सुनवाई का फैसला किया है और साथ ही मोहम्मद शमी को उनका पक्ष कोर्ट में रखकर सफाई देने के लिए कहा है.

एक ही जगह पर दिखेंगे सभी कंपनियों के टैरिफ प्लान, ट्राई का नया पोर्टल शुरू

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टेलीकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया (TRAI) ने एक नया पोर्टल लॉन्च किया है. इस पोर्टल के जरिए ग्राहक देश में मौजूद टेलीकॉम ऑपरेटर्स के सारे टैरिफ प्लान्स की तुलना कर सकते हैं. पिछले कुछ समय से ट्राई टैरिफ प्लान्स में पारदर्शिता लाने की कोशिश कर रही है और ये कदम इसी के मद्देनजर उठाया गया है. फिलहाल ये पोर्टल बीटा स्टेज में है.

इस पोर्टल पर ग्राहक रेगुलर टैरिफ, STVs (स्पेशल टैरिफ वाउचर्स), प्रमोशनल टैरिफ और वैल्यू एडेड सर्विस प्लान्स देख सकते हैं. इसके अलावा भी तमाम प्लान्स देखे जा सकेंगे. फिलहाल दिल्ली सर्किल के लिए जानकारियां वेबसाइट पर मौजूद हैं. भविष्य में सभी सर्किलों के लिए जानकारियां पोर्टल पर उपलब्ध करा दी जाएंगी. यहां ग्राहक पोस्टपेड और प्रीपेड दोनों तरह के प्लान्स की तुलना कर सकते हैं. tariff.trai.gov.in इस लिंक के वेबसाइट को सार्वजनिक कर दिया गया है. ग्राहक यहां जाकर फीडबैक भी दे सकते हैं.

दूरसंचार नियामक ट्राई ने एक बयान में कहा कि, वेबसाइट का शुरुआती (बीटा) वर्जन पेश किया जिस पर विभिन्न दूरसंचार कंपनियों की सेवा या शुल्क दरों की तुलना की जा सकती है. ट्राई का मानना है कि इस कदम से विभिन्न कंपनियों की शुल्क दरों के बारे में अधिक पारदर्शिता आएगी और अधिक सूचना मिल सकेगी. इससे ग्राहकों को फायदा होगा.

इस समय दूरसंचार कंपनियां अपनी शुल्क दरों की जानकारी अपनी-अपनी वेबसाइटों पर देती हैं. ट्राई के अनुसार नए प्लेटफॉर्म से ग्राहकों को फायदा होगा वहीं अन्य भागीदार भी तुलनात्मक विश्लेषण कर सकेंगे.

29 अप्रैल को मुंबई में होगी सोनम कपूर की शादी

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फिल्म एक्ट्रेस सोनम कपूर की शादी की तारीख और स्थान बदल गए हैं. पहले 6 मई को होने जा रही शादी अब 29 अप्रैल को होगी. स्थान भी बदल गया है. बजाय स्विट्ज़रलैंड के यह शादी अब मुंबई में होगी.

सूत्रों के अनुसार स्विट्ज़रलैंड जाने में कई दिक्कत थी. लोगों को एक साथ ले जाना संभव नहीं हो पा रहा था. परिवार के कई सदस्य बुजुर्ग हैं जो इतनी लंबी यात्रा नहीं कर पाते, लिहाजा शादी को मुंबई में ही करने का फैसला ले लिया गया.

मुंबई में शादी के बाद दिल्ली में ग्रैंड रिसेप्शन होगा क्योंकि सोनम के होने वाले पति आनंद आहूजा दिल्ली के रहने वाले हैं. शादी और रिसेप्शन के कार्ड बंटने शुरू हो गए हैं और कई फिल्मी सितारों तक ये पहुंच गए हैं.

संगीत सेरेमनी भव्य पैमाने पर होगी. फराह खान इसे कोरियोग्राफ कर रही हैं. फराह ने रिहर्सल कराना शुरू कर दिया है. इसमें सोनम के माता-पिता और नजदीकी लोग परफॉर्म करेंगे. प्रेम रतन धन पायो के टाइटल ट्रैक पर करण जौहर के परफॉर्म करने की खबर है.

अम्बेडकर को लेकर पीएम मोदी का झूठ

2014 में अप्रत्याशित बहुमत से राजनीति में एक नये अवतार का अवतरण हुआ. किंतु बड़े-बड़े झूठ और जुमलों की बरसात के साथ. यदि यह मान भी लिया जाए कि चुनावी भाषणों का कोई मापदंड नहीं होता है तो भी कुछ तो नैतिकता होनी ही चाहिए कि नहीं? सबसे बड़ी हद तो तब हो गई, जब मोदी जी ने जिस जवाहर लाल नेहरु को चुनावी भाषणों में पानी पी-पी कर बेतहाशा कोसा, उसी नेहरु के उस कथन की चोरी कर ली जिसे नेहरू ने प्रधान मंत्री बनने पर कहा था. नेहरू ने कहा था कि मुझे प्रधान मंत्री नहीं अपितु “प्रथक सेवक” कहा जाए. मोदी जी ने प्रधान मंत्री बनते ही नेहरू के इस कथन में परिवर्तन करके खुद को “प्रधान सेवक” कहने की जहमत कर डाली. क्या यह किसी चोरी अथवा झूठ से कम है? कहना अतिशयोक्ति न होगा कि आज देश के सभी राजनीतिक दलों में दलित व पिछ्ड़ों… खासकर दलितों के हितैषी दिखने की होड़ लगी हुई है. विशेष रूप से भाजपा इस दिशा में सबसे आगे है. अब क्यूंकि भाजपा सत्तासीन है इसलिए वह बाबा साहब आम्बेडकर के बहाने समाज के दलित वर्ग को जाल में फंसाने का कोई अवसर गंवाना नहीं चाहती, फलत: प्रधान मंत्री और उनके मंत्री झूठ का सहारा लेने से कतई ही नहीं झिझक रहे हैं.

अन्य मंत्रियों की छोड़िये, प्रधान सेवक मोदी जी ने बाबा साहेब की 127वीं जयंती की पूर्व संध्या पर 26 अलीपुर रोड, दिल्ली पर बाबा साहेब के नाम पर बने “अम्बेडकर राष्ट्रीय स्मारक” के उदघाटन भाषण में कुछ ऐसे झूठ बोले जिनको छिपाना नामुमकिन है. मोदी जी ने कहा कि बाबा साहेब अम्बेडकर को आडवानी जी और अटल जी के आग्रह पर तत्कालीन प्रधानमंत्री वी. पी. सिंह ने “भारत रत्न” से विभूषित किया… जो कि सरासर झूठ है.

उल्लेखनीय है कि बाबा साहेब को भारत रत्न से विभूषित करने की कवायद राजीव गांधी की सरकार बनने के पहले से ही चली आ रही थी किंतु नाना-प्रकार के अप्रत्यक्ष विरोधों के चलते बाबा साहेब अम्बेडकर को भारत रत्न से विभूषित नहीं किया गया किंतु वी. पी. सिह के प्रधानमंत्री काल में बाबा साहेब को भारत रत्न से विभूषित किया गया जिसमें अडवानी जी और अटल जी की कोई भूमिका नहीं थी. हां! ये बात जरूर थी कि भाजपा वी. पी. सिंह की सरकार को बाहर से सपोर्ट कर रही थी जिसे वी. पी. सिंह द्वारा मंडल आयोग लागू करते ही वापिस ले लिया गया था और भाजपा मंडल आयोग को लागू करने के खिलाफ देशव्यापी आन्दोलन की अगुआ बन गई.

प्रधान सेवक जी ने यह भी कहा कि अटल जी के शासन काल में ही संसद भवन के केन्द्रीय हाल में बाबा साहेब का तैल-चित्र लगाया गया. उन्होंने कांग्रेस पर आरोप लगाया कि कांग्रेस ने संसद भवन के केन्द्रीय हाल में बाबा साहेब का तैल चित्र लगाने से यह कहकर इंकार कर दिया कि केन्द्रीय हाल में तैल-चित्र लगाने के लिए समुचित स्पेस नहीं है. जबकि बाबा साहेब का तैल-चित्र लगवाने की कवायद से जुड़े ‘डा. बी. आर. अम्बेडकर मंच’ के महासचिव रतनलाल केन का कहना है कि संसद भवन के केन्द्रीय हाल में बाबा साहेब का छोटे आकार का तैल चित्र दिनांक 09.08.1989 को लगाया गया, जब राजीव गांधी की सरकार थी और बाबा साहेब का बड़े आकार का तैल-चित्र दिनांक 12.04.1990 को लगाया गया, जब वी. पी. की सरकार थी. और यह भी कि बाबा साहेब का “छोटा” और “बड़ा” तैल-चित्र ‘डा. बी. आर. अम्बेडकर मंच’ के द्वारा ही उपलब्ध कराए गए थे न कि सरकार द्वारा.

मोदी जी ने यह भी कहा, ‘1951 में कैबिनेट से इस्तीफा देने के बाद बाबा साहेब ने 1952 में लोकसभा का आम चुनाव लड़ा था. कांग्रेस द्वारा की गई खिलाफत के कारण बाबा साहेब को हार का अपमान सहना पड़ा. इसके बाद उन्होंने 1953 में भंडारा सीट से लोकसभा का उपचुनाव लड़ा. कांग्रेस ने फिर बाबा साहेब को लोकसभा में पहुंचने से रोक दिया. इस लगातार अपमान के समय उनका साथ दिया था, डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने. उन्हीं के प्रयासों से बाबा साहेब राज्यसभा में पहुंचे.’ किंतु यह सत्य से कोसो दूर की बात है. अपितु सच्चाई ये है कि बाबा साहेब ने 1952 में राज्यसभा सदस्य के रूप में संसद में मुम्बई का प्रतिनिधित्व किया था.

डॉ. आम्बेडकर की विचारधारा का भगवाकरण कर यह सरकार राजनीतिक चरित्र हनन के उद्देश्य से कार्य कर रही है. यह वैचारिक हत्या का घिनौना कुकृत्य है. सच मायने में तो यह मनुवाद का एक नया संस्करण है. ‘पंचतीर्थ स्थल’ के नाम से बाबा साहेब डॉ. आम्बेडकर के ऐतिहासिक स्थलों का हिन्दूकरण करना कट्टरपंथी हिन्दुओं अर्थाथ आर एस एस का एक गुप्त एजेंडा है. जनता को समझ लेना चाहिए कि आज भाजपा के मुंह में आम्बेडकर और बगल में राम है.

– लेखक तेजपाल सिंह तेज तमाम पत्र पत्रिकाओं से जुड़े रहे हैं. फिलहाल स्वतंत्र लेखक के रूप में सक्रिय है

चुनाव आयोग ने लालू यादव को चेताया

नई दिल्ली। राष्ट्रीय जनता दल द्वारा अभी तक वित्तीय वर्ष 2014-15 के आयकर रिटर्न की जानकारी चुनाव आयोग को नहीं देने पर आयोग ने राजद को लेकर कड़ी टिप्पणी की है. चुनाव आयोग ने राष्ट्रीय जनता दल को नोटिस जारी कर सवाल पूछा है क्यों न पार्टी पर चुनाव चिन्ह से जुड़े कानून के तहत कार्रवाई की जाए. इस बारे में आयोग का रिमाइंडर पहले आरजेडी को भेज चुका है. आयोग ने जवाब देने के लिए 20 दिन का वक्त दिया है.

लालू यादव की पार्टी को 1968 के इलेक्शन सिम्बल एक्ट के पैरा 16ए के तहत कार्रवाई का नोटिस भेजा गया है जिसमें पार्टियों का सिम्बल ज़ब्त किया जा सकता है. इस हिसाब से लालू प्रसाद यादव की पार्टी के सिम्बल ‘लालटेन’ खतरे में पर सकता है. असल में नियन के मुताबिक राजनैतिक दलों को हर वित्तीय वर्ष के आयकर रिटर्न की जानकारी उस साल 31 अक्टूबर तक देनी होती है. इस हिसाब से आरजेडी को 31 अक्टूबर 2015 तक इंकम टैक्स रिटर्न की जानकारी दे देनी चाहिये थी लेकिन अब तक नहीं दी गई है. वैसे कांग्रेस बीजेपी जैसी पार्टियां भी आयकर रिटर्न भरने में कुछ महीनों की देरी करती हैं जिसे लेकर चुनाव सुधार से जुड़े कार्यकर्ता सवाल उठाते रहे हैं. इस बारे में अब आयोग से नोटिस मिलने के बाद यह देखना महत्वपूर्ण है कि पार्टी आयोग के नोटिस का क्या जवाब देती है.

योगी के प्रदेश में एक और मासूम की रेप के बाद हत्या

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प्रतीकात्मक

लखनऊ। उत्तर प्रदेश के एटा जिले से एक और हैवानियत की खबर आई है. खबर है कि अपने माता-पिता के साथ एक शादी समारोह में हिस्सा लेने गई 8 साल की मासूम के साथ पहले रेप और फिर गला काटकर हत्या कर दी गई है. कठुआ में एक बच्ची के साथ ऐसी ही घटना के बाद आई इस घटना ने सबको सन्न कर दिया है. आरोपी का नाम सोनू है और उसकी उम्र 18 साल है. उसे जब गिरफ्तार किया गया था तो वह नशे की हालत में शव के बगल में ही लेटा हुआ था.

जानकारी के मुताबिक घटना रात करीब 1:30 बजे की है जब हर कोई शादी समारोह में व्यस्त था और तेज म्यूजिक के चलते आसपास कोई आवाज नहीं सुनाई दे रही थी. तभी आरोपी सोनू मौका देखकर मासूम को उठा ले गया और एक अधबने घर में ले जाकर रेप कर उसका गला काट दिया. लोगों ने बताया कि जब लड़की काफी देर तक नहीं दिखी तो उसकी तलाश शुरू की गई और फिर उसको उस घर से बरामद किया गया. आरोपी को फिलहाल गिरफ्तार कर पॉक्सो ऐक्ट का मुकदमा दर्ज कर लिया गया है.

पिछले दिनों में देश भर में इस तरह की एक के बाद एक कई घटनाएं हो चुकी है. ऐसी घटनाओं से पूरे देश में गुस्से का माहौल है.

आंबेडकरवाद पर ग्रहण

14 अप्रैल को लखनऊ के किंग जार्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी में डॉक्टरों द्वारा आयोजित एक भव्य आंबेडकर जयंती समारोह में शिरकत करने के बाद जब मैं लखनऊ के गोमती नगर अवस्थित सामाजिक परिवर्तन स्थल की ओर जा रहा था: दारुल सफा के सामने गुजरते एक जुलुस को देखकर स्तब्ध हुए बिना न रह सका. स्तब्ध इसलिए हुआ कि इसमें शामिल लोगों के हाथों में लाल झंडे थे और वे आंबेडकर जिंदाबाद के नारे लगा रहे थे.

लाल झंडे हाथों में लिए वामपंथी इस तरह आंबेडकर का जय-जयकार कर सकते हैं, यह मेरी कल्पना से परे था. लिहाजा मैं उसमें शामिल एक कार्यकर्ता को रोक कर जब अपना विस्मय व्यक्त किया तब पता चला कि मानसा (पंजाब ) में गत 23-28 मार्च तक चले भाकपा (माले) के राष्ट्रीय महाधिवेशन में निर्णय लिया गया था कि आंबेडकर जयंती को ‘ संविधान बचाओ-लोकतंत्र बचाओ’ दिवस के रूप में मनाया जायेगा. इसी संकल्प के तहत भाकपा (माले) ने माकपा, भाकपा, एसयूसीआई(सी) इत्यादि अन्य वाम दलों के साथ मिलकर परिवर्तन चौक से हजरत गंज चौराहा स्थित आंबेडकर प्रतिमा तक संयुक्त मार्च निकालने का संकल्प लिया था. ऐसा सिर्फ लखनऊ ही नहीं बल्कि इलाहबाद,कानपूर, रायबरेली, जालौन, गाजीपुर, बलिया समेत उत्तर प्रदेश के अन्य जिलों में भी डॉ. आंबेडकर जयंती के अवसर पर धरना-प्रदर्शन, जुलुस इत्यादि निकाल कर किया गया, इसकी जानकार 15 अप्रैल के प्रकाशित अख़बारों से हुई.

निश्चय ही जो वामपंथी कभी डॉ. आंबेडकर को ब्रिटिश डॉग कहा करते थे, उनके द्वारा इस तरह आंबेडकर जयंती मनाना एक आश्चर्य का विषय ही कहा जायेगा. लेकिन यह आश्चर्य भी नहीं है . आज आंबेडकर जयंती एक लोक-उत्सव का रूप ले ली है, जिसमें तमाम विचारधारा के दलों को शामिल होते देखा जा सकता है . आज आंबेडकर जयंती जिस उत्साह और जोश खरोश के साथ मनाई जाती है, वैसा विश्व के किसी अन्य महामानव की जयंती में दिखना मुश्किल है. आंबेडकरवादी पार्टी के रूप में पहचान बना चुकी बसपा तो पहले ही बड़े पैमाने पर आंबेडकर जयंती मनाती रही है, इसमें मार्क्सवादी, गांधीवादी , राष्ट्रवादी के साथ मार्क्सवादी और लोहियावादी दलों को भी होड़ लगाते देखा जा सकता है.

यही नहीं कमाल की बात तो यह है कि जिनके लिए आंबेडकर वर्षो से अस्पृश्य रहे वे दल आज ताल ठोक कर इस बात का दावा कर रहे हैं कि आंबेडकर को सम्मान देने में उनसे आगे कोई नहीं. लेकिन आज कई आंबेडकर विरोधी दल अगर आंबेडकर के प्रति सम्मान प्रदर्शित करने में होड़ लगा रहे हैं तो इससे निश्चय ही सच्चे आंबेडकरवादी आह्लादित हो सकते हैं. लेकिन ऐसे आंबेडकरवादियों को आह्लादित होने के साथ चिंतित भी होने की जरुरत है क्योंकि मंडल उत्तरकाल में जो ‘वाद’ सारे वादों को म्लान करते हुए नित्य नई बुलंदी छूते जा रहा है, उस पर आज ग्रहण सा लग गया है. इस बात को समझने के लिए पहले आंबेडकरवाद की परिभाषा और विश्वमय इसकी प्रभावकारिता को ठीक से समझ लेना आवश्यक है .

वैसे तो आंबेडकरवाद की कोई निर्दिष्ट परिभाषा नहीं है, किन्तु विभिन्न समाज विज्ञानियों के अध्ययन के आधार पर कहा जा सकता है कि जाति,नस्ल,लिंग,इत्यादि जन्मगत कारणों से शक्ति के स्रोतों(आर्थिक-राजनीतिक-शैक्षिक-धार्मिक इत्यादि) से जबरन बहिष्कृत कर सामाजिक अन्याय की खाई में धकेले गए मानव समुदायों को शक्ति के स्रोतों में कानूनन हिस्सेदारी दिलाने का प्रावधान करने वाला सिद्धांत ही आंबेडकरवाद है और इस वाद का औंजार है: आरक्षण . भारत के मुख्यधारा के बुद्धिजीवियों के द्वारा दया-खैरात के रूप में प्रचारित आरक्षण और कुछ नहीं, शक्ति के स्रोतों से जबरन बहिष्कृत गए लोगों को कानून के जोर से उनका प्राप्य दिलाने का अचूक माध्यम मात्र है.

बहरहाल दलित,आदिवासी और पिछड़ों से युक्त भारत का बहुजन समाज प्राचीन विश्व के उन गिने-चुने समाजों में से एक है जिन्हें जन्मगत कारणों से शक्ति के समस्त स्रोतों से हजारों वर्षों तक बहिष्कृत रखा गया.ऐसा उन्हें सुपरिकल्पित रूप से धर्म के आवरण में लिपटी उस वर्ण- व्यवस्था के प्रावधानों के तहत किया गया जो विशुद्ध रूप से शक्ति के स्रोतों के बंटवारे की व्यवस्था रही.इसमें अध्ययन-अध्यापन ,पौरोहित्य,भूस्वामित्व,राज्य संचालन,सैन्य वृत्ति,उद्योग-व्यापारादि सहित गगन स्पर्शी सामाजिक मर्यादा सिर्फ ब्राह्मण,क्षत्रिय और वैश्यों से युक्त सवर्णों के मध्य वितरित की गयी.स्व-धर्म पालन के नाम पर कर्म-शुद्धता की अनिवार्यता के फलस्वरूप वर्ण-व्यवस्था ने एक आरक्षण व्यवस्था का रूप ले लिया ,जिसे कई समाज विज्ञानी हिन्दू आरक्षण व्यवस्था कहते हैं .

हिन्दू आरक्षण ने चिरस्थाई तौर पर भारत को दो वर्गों में बांट कर रख दिया: एक विशेषाधिकार युक्त सुविधाभोगी वर्ग और दूसरा शक्तिहीन बहुजन समाज! इस हिन्दू आरक्षण में शक्ति के सारे स्रोत सिर्फ और सिर्फ विशेषाधिकारयुक्त तबकों के लिए आरक्षित रहे.इस कारण जहाँ विशेषाधिकारयुक्त वर्ग चिरकाल के लिए सशक्त तो दलित,आदिवासी और पिछड़े अशक्त व गुलाम बनने के लिए अभिशप्त हुए.लेकिन दुनिया के दूसरे अशक्तों और गुलामों की तुलना में भारत के बहुजनों की स्थिति सबसे बदतर इसलिए हुई क्योंकि उन्हें आर्थिक और राजनीतिक गतिविधियों के साथ ही शैक्षिक और धार्मिक गतिविधियों तक से भी बहिष्कृत रहना पड़ा.इतिहास गवाह है मानव जाति के सम्पूर्ण इतिहास में किसी भी समुदाय के लिए शैक्षिक और धार्मिक गतिविधियां धर्मादेशों द्वारा पूरी तरह निषिद्ध नहीं की गयीं,जैसा हिन्दू आरक्षण-व्यवस्था के तहत बहुजनों के लिए किया गया.यही नहीं इसमें उन्हें अच्छा नाम तक भी रखने का अधिकार नहीं रहा.इनमें सबसे बदतर स्थिति दलितों की रही.वे गुलामों के गुलाम रहे.इन्ही गुलामों को गुलामी से निजात दिलाने की चुनौती इतिहास ने डॉ.आंबेडकर के के कन्धों पर सौंपी ,जिसका उन्होंने नायकोचित अंदाज में निर्वहन किया.

अगर जहर की काट जहर से हो सकती है तो हिन्दू आरक्षण की काट आंबेडकरी आरक्षण से हो सकती थी,जो हुई भी.इसी आंबेडकरी आरक्षण से सही मायने में सामाजिक अन्याय के खात्मे की प्रक्रिया शुरू हुई. हिन्दू आरक्षण के चलते जिन सब पेशों को अपनाना अस्पृश्य-आदिवासियों के लिए दुसाहसपूर्ण सपना था,अब वे खूब दुर्लभ नहीं रहे.इससे धीरे-धीरे वे सांसद -विधायक, डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफ़ेसर इत्यादि बनकर राष्ट्र की मुख्यधारा से जुड़ने लगे .दलित –आदिवासियों पर आंबेडकरवाद के चमत्कारिक परिणामों ने जन्म के आधार पर शोषण का शिकार बनाये गए अमेरिका, फ़्रांस, न्यूजीलैंड, आस्ट्रेलिया, कनाडा, दक्षिण अफ्रीका इत्यादि देशों के वंचितों के लिए मुक्ति के द्वार खोल दिए. संविधान में डॉ.आंबेडकर ने अस्पृश्य-आदिवासियों के लिए आरक्षण सुलभ कराने के साथ धारा 340 का जो प्रावधान किया ,उससे परवर्तीकाल में मंडलवादी आरक्षण की शुरुआत हुई,जिससे पिछड़ी जातियों के भी सामाजिक अन्याय से निजात पाने का मार्ग प्रशस्त हुआ. और उसके बाद ही आंबेडकरवाद नित नई ऊंचाइयां छूते चला गया तथा दूसरे वाद म्लान पड़ते गए. लेकिन 7अगस्त, 1990 को प्रकाशित मंडल की जिस रिपोर्ट के बाद आंबेडकरवाद ने जरुर नित नई ऊंचाइयां छूना शुरू किया , उसी रिपोर्ट से इस पर ग्रहण लगने का सिलसिला भी शुरू हुआ.

मंडलवादी आरक्षण लागू होते ही हिन्दू आरक्षण का सुविधाभोगी तबका एक बार फिर शत्रुतापूर्ण मनोभाव लिए बहुजनों के खिलाफ मुस्तैद हो गया.इसके प्रकाशित होने के बाद 24 जुलाई , 1991 हिन्दू आरक्षणवादियों द्वारा बहुजनों को नए सिरे से गुलाम बनाने के लिए निजीकरण,उदारीकरण,विनिवेशीकरण इत्यादि का उपक्रम चलाने साथ जो तरह-तरह की साजिशें की गयीं, उसके फलस्वरूप आज जहां आंबेडकरवाद पर ग्रहण लग गया है वहीं भारत का बहुजन प्रायः विशुद्ध गुलाम में तब्दील हो चुका है. 24जुलाई, 1991 के बाद शासकों की सारी आर्थिक नीतियाँ सिर्फ आंबेडकरवाद की धार कम करने अर्थात आरक्षण के खात्मे और धनार्जन के सारे स्रोतों हिन्दू आरक्षण के सुविधाभोगी वर्ग के हाथों में शिफ्ट करने पर केन्द्रित रहीं . इस दिशा में जितना काम नरसिंह राव, अटल बिहारी वाजपेयी ने और मनमोहन सिंह ने 20 सालों में किया, नरेंद्र मोदी ने उतना प्रायः चार सालों में कर डाला है.राव-वाजपेयी –सिंह और खासकर मोदी की नीतियों से धन-सपदा पर टॉप की 10% आबादी का 90% ज्यादा कब्ज़ा हो गया है .

देश की 90%वंचित आबादी जहां मात्र 10% धन पर वहीं आंबेडकर के लोग 1% धन-संपदा पर जीवन वसर करने के लिए विवश हैं. बहुजनों के लिए जो सरकारी नौकरियां धनार्जन का एकमात्र स्रोत थीं, वह स्रोत लगभग पूरी तरह रुद्ध कर दिया गया है. लेकिन जो लोग बहुजनों के धनार्जन के एकमात्र स्रोत को शेष कर देने के लिए खासतौर से जिम्मेवार हैं, उन्होंने बाबा साहेब की 127 वीं जयंती पर घोषणा किया है कि जबतक दुनिया है आरक्षण रहेगा.इससे जो लोग आरक्षण और संविधान बचाने की लड़ाई की लम्बी-चौड़ी घोषणा कर रहे हैं, वे चाहें तो चैन की नीद सो सकते हैं. क्योंकि सरकार की घोषणा के मुताबिक संविधान और आरक्षण अक्षत रहेगा. पर सच्चे आंबेडकरवादी ध्यान रहें की आरक्षण जरुर रहेगा, लेकिन उसका वजूद सिर्फ कागजो पर रहेगा.

उसका भौतिक लाभ हिन्दू आरक्षण के वंचितों को नहीं मिलेगा: शक्ति के प्रायः शतप्रतिशत स्रोत उन हिन्दू आरक्षणवादियों के कब्जे में चले जायेंगे, जिनसे विमुक्त कराने के लिए डॉ. आंबेडकर ने अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया. यदि हिन्दू आरक्षणवादियों की साजिश कामयाब हो जाती है , आंबेडकरवाद म्लान अर्थात बेअसर हो जायेगा. फिर धीरे-धीरे बाबा साहेब को सम्मान देने की होड़ ख़त्म हो जाएगी. मतलब आंबेडकरवाद के फीका पड़ने के साथ लोग बाबा साहेब आंबेडकर को भी भूलते चले जायेंगे. अगर आप चाहते हैं आंबेडकरवाद नित नई उंचाई छुए ; डॉ. आंबेडकर को सम्मान देने की प्रतियोगिता में उनके विरोधी लगातार व्यस्त रहें तो आपको अमेरिका और दक्षिण अफ्रीका के वंचितों से प्रेरणा लेते हुए मिलिट्री और न्यायपालिका सहित सरकारी और निजी क्षेत्र की सभी प्रकार की नौकरियों, सप्लाई, डीलरशिप, ठेकों,पार्किंग,परिवहन, फिल्म, मीडिया इत्यादि शक्ति के समस्त स्रोतों में सभी प्रमुख सामाजिक समूहों की महिलाओं और पुरुषों के संख्यानुपात में बंटवारे की लड़ाई में सर्वशक्ति लगानी होगी. आंबेडकरवाद को ग्रहण –मुक्त करने का यही एकमेव विकल्प है.

भाजपा के खिलाफ तोगड़िया ने खोला मोर्चा

अहमदाबाद। विश्व हिन्दू परिषद के अध्यक्ष पद से हटने के बाद प्रवीण तोगड़िया भाजपा नेताओं से खार खाए हुए हैं. तोगड़िया ने पद से हटते ही भाजपा के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. इसके लिए उन्होंने राम मंदिर के निर्माण का मुद्दा फिर से उठा दिया है. तोगड़िया ने अहमदाबाद में राम मंदिर की मांग को लेकर अनिश्चितकालीन उपवास शुरू कर दिया है. इससे सरकार खासे दबाव में आ गई है.

अध्यक्ष पद से हटने के बाद प्रवीण तोगड़िया राममंदिर निर्माण को लेकर माहौल बनाने की कोशिश में जुट गए हैं. प्रवीण तोगड़िया 32 साल तक विहिप के अध्यक्ष रहे. उन्होंने विहिप के नए अध्यक्ष एस कोकजे को उपवास में शामिल होने का आग्रह किया और कहा कि वह या तो उपवास में उनके साथ शामिल हों या संसद में राम मंदिर निर्माण के लिए विधेयक लाने के लिए दबाव बनाएं.

उन्होंने कहा कि विहिप ने कहा था कि एक बार हम (संघ परिवार) संसद में बहुमत में आएंगे तो हम विधेयक पास कर राम मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त करेंगे. विहिप ने लोगों से अयोध्या में कार सेवा करने के लिए और शहादत देने को भी कहा था. राम मंदिर के लिए करीब 60 लोगों ने अपनी शहादत दी थी और गुजरात के हजारों लोगों ने अपना योगदान दिया था. तोगड़िया ने मोदी की आलोचना करते हुए कहा कि सीमाओं पर सैनिक सुरक्षित नहीं हैं. किसान खुदकुशी कर रहे हैं. हमारी बेटियां हमारे घरों में सुरक्षित नहीं हैं और प्रधानमंत्री विदेश दौरे पर गए हैं.

आसिफा के न्यायप्रिय हत्यारे

सिफा को न्याय’ (जस्टिस फॉर आसिफा) की गुहार दिल्ली से संयुक्त राष्ट्र संघ तक गूँज रही है. सामाजिक-नागरिक संगठन आसिफा की सामान्य और मृतावस्था की तस्वीर लगा कर अपने नाम के बैनर-झंडे लहराते हुए, नारे लगते हुए आसिफा को न्याय दिलाने के लिए सड़कों पर उतर पड़े हैं. कठुआ से लेकर दिल्ली और देश के अन्य कई शहरों में प्रतिरोध मार्च और कैंडल विजिल हो रहे हैं. बच्चे भी हिस्सा ले रहे हैं. दिल्ली सरकार की एक महिला अधिकारी ‘महिलाओं की सुरक्षा’ के सवाल पर भूख हड़ताल पर बैठी हैं. उनका कहना है कि मोदी जब एक झटके में विमुद्रीकरण कर सकते हैं तो महिलाओं की सुरक्षा क्यों नहीं कर सकते. सोशल मीडिया आसिफ़ा को न्याय दिलाने की पोस्टों से पट गया है. अखबारों के स्तंभकार, सामाजिक-राजनीतिक सरोकार रखने वाले बुद्धिजीवी ‘आसिफा को न्याय’ पर लेख लिख रहे हैं. अंतर्राष्ट्रीय मीडिया पर भी यह प्रमुख खबर बनी है. उत्तर प्रदेश के उन्नाव बलात्कार मामले पर लोगों का आक्रोश जारी था कि जम्मू-कश्मीर की अपहरण, बलात्कार और हत्या की दिल दहला देने वाली यह वारदात सामने आ गई.
ज़ाहिर है, बर्बरता की शिकार हुई आसिफा को पता नहीं था कि देश में न्याय देने के लिए एक न्यायपालिका होती है, जिसमें बड़े-बड़े न्यायधीश, वकील और गवाह सबूतों के आधार पर न्याय करते हैं. उसे पता नहीं था कि दुनियां में संयुक्त राष्ट्र संघ भी है जो न्याय दिलवाता है. आसिफा नहीं जानती थी कि सरकारें बर्बरतापूर्वक मार दी जाने वाली बच्चियों के माता-पिता को कुछ धनराशि देकर न्याय करती हैं. आसिफा को यह भी कहाँ पता था कि देश में ‘फासीवाद’ आ चुका है; लोग बताएँगे कि उसका वैसा हश्र उसी फासीवाद का नतीज़ा है; और फासीवादी ताकतों को हराना ही आसिफा को न्याय दिलाना है. उसे शायद यह भी नहीं पता चला हो कि मंदिर में उसके साथ ‘हिंदू न्याय’ किया जा रहा है. आसिफा तिरंगे झंडे के बारे में नहीं जानती होगी, जिसे लहरा कर अदालत से लेकर सड़कों तक ‘हिंदू न्याय’ का जुलूस निकला गया.
पता नहीं आसिफा को कितना पता था कि वह कितनी मुसलमान है. अलबत्ता उसने छोटी-सी उम्र में यह जरूर जान लिया कि दोजख ज़मीन पर ही है – धरती का स्वर्ग कही जाने वाली ज़मीन पर. दुनिया छोड़ने से पहले उसने यह भी जान लिया कि शैतान अलग से नहीं होता. क़यामत के दिन खुदा आसिफा का क्या न्याय करेगा.
रूह अगर कोई चीज़ है तो आसिफा हैरत से सोचती होगी कि उसकी हत्या के तीन महीने बाद अचानक देश भर में इतने लोग और संगठन उसे न्याय दिलाने के लिए आंदोलित हो उठे हैं. अपहरण और हत्या के समय से ही उसके साथ हुए नृशंस कृत्य का प्रतिरोध करने वाले उसके गाँव के युवा वकील तालिब हुसैन अब उसे अकेले नहीं लगते होंगे. परिपूर्ण का अंश रूह पर शायद उम्र का असर नहीं रहता होगा. रूह बन कर आसिफा देख रही होगी कि हिन्दुस्तान और दुनिया कितनी बड़ी और घात-प्रतिघातों से भरी है.
वह अच्छी तरह समझ रही होगी कि यह दुनिया और व्यवस्था उसे न्याय नहीं दे सकती. इस व्यवस्था में जितने भी न्याय हैं – सामाजिक न्याय, आर्थिक न्याय, नागरिक न्याय, मानवीय न्याय, बाल न्याय – उन सबसे उसे बाहर रखा गया. तभी इतना आसान हुआ कि उसके वजूद को बर्बरतापूर्वक कुचल दिया गया और पूरे देश में तीन महीने तक कहीं पत्ता नहीं खड़का. वह समझ रही होगी कि उसे न्याय दिलाने का यह जोश जल्दी ही ठंडा हो जाएगा. अगली वारदात होने पर फिर एक उबाल आएगा और ठंडा पड़ जाएगा. अन्य रूहों के साथ वह समझ गई होगी कि उबलने, ठंडा पड़ने का यह सिलसिला चलते रहना है.
आसिफा को आश्चर्य होता होगा कि ये इतने लोग क्या ढोंग करते हैं? उनकी क्या मजबूरी है? नहीं, ढोंग नहीं करते. वे अपने में सच्चे हैं. आसिफाओं का सारा हिस्सा मार कर वे खुद को न्यायप्रिय दिखाना चाहते हैं. जताना चाहते हैं कि यह सब उनके नाम पर नहीं हो रहा है. रूहों को किसी के प्रति द्वेष नहीं होता. आसिफा मुस्कुरा कर कहेगी – न्यायप्रिय हत्यारे.
तीन सामान्य सुझाव हैं, ठीक लगें तो : आसिफा को न्याय के बहाने हम यह फैसला कर सकते हैं कि राष्ट्र-ध्वज फिर से केवल राष्ट्रीय मामलों में इस्तेमाल किया जाए. सुप्रीम कोर्ट का 2004 का वह निर्णय वापस ले लिया जाए, जिसमें किसी भी भारतीय नागरिक को किसी भी अवसर पर, किसी भी स्थान पर, किसी भी समय (दिन या रात) सम्मान के साथ तिरंगा फहराने का अधिकार दिया गया था. दूसरे, हम चुप रहना सीखें और अपने से बात-चीत ज्यादा करें. शायद तब हम जान पायें कि हम सब इस व्यवस्था के ही हिस्सेदार और ताबेदार हैं. तीसरी बात, आरएसएस वाले यह समझने की कोशिश करें कि ‘हिंदुत्व’ का जो पिटारा वे खोले हुए हैं, उसकी समाज, सभ्यता, राष्ट्र, इंसान – किसी के लिए कोई सार्थकता नहीं है. देश की राजनीति कारपोरेट के हाथों में चली गई है. कारपोरेट पूंजीवाद की विष्ठा खाने वाला कोई भी संगठन सत्ता में आ सकता है. लेकिन जब तक मानव सभ्यता की सांस बाकी है, उसका सामाजिक और मानवीय बहिष्कार बना रहेगा.
शायद आसिफा की रूह को इससे सुकून मिले और उसके अम्मी-अब्बा, भाई-बहनों को सहने की ताकत. बाकी सरकार और कानून-व्यवस्था कुछ न कुछ करेंगी ही. उन्हें अपने होने का धर्म जो निभाना है. जम्मू और कश्मीर में दो मंत्रियों के इस्तीफे हो चुके हैं. अदालती कार्रवाई भी कुछ न कुछ होगी ही.
प्रेम सिंह
  

बहुजन नायकों और ब्राह्मणवादी गुरुओं का भेद

गौतम बुद्ध को पता चल चुका था कि उनकी मृत्यु तय हो चुकी है. एक गरीब लोहार के घर जहरीला भोजन खाने से उनके शरीर में जहर फैलने लगा था. गौतम बुद्ध जहर को अपने शरीर में फैलता हुआ अनुभव कर रहे थे. उन्होंने तुरंत घोषणा करवाइ कि वे अब विलीन होने वाले हैं और यह गरीब लोहार भाग्यशाली है कि इसके घर अंतिम भोजन करके मैं विलीन हो रहा हूँ. यह बात सुनकर वो गरीब लोहार ग्लानी और पश्चाताप से रोने लगा, बुद्ध ने उसे प्यार से समझाते हुए उसकी सुरक्षा के इन्तेजाम किये. साथ में बुद्ध के जो शिष्य थे वे अपने गुरु की इस करुणा और महानता से प्रभावित हुए. जहरीला भोजन कराने वाले व्यक्ति के प्रति भी उनमे इतनी करुणा थी. इसी तरह एक बार और बुद्ध अपनी सुरक्षा की चिंता किये बिना एक खूंखार हत्यारे अंगुलिमाल के पास जाते हैं. उन्हें पता है कि वह डाकू उनकी ह्त्या कर सकता है लेकिन वे फिर भी उसे समझाने जाते हैं और अपने प्रेम और करुणा से उसे प्रभावित करके अपने साथ लेकर ही लौटते हैं. बुद्ध की मृत्यु के बाद इन जैसी हजारों घटनाओं का पता चलते ही बुद्ध के शिष्यों का नैतिक साहस नई बुलंदी पर पहुँच गया. जो गुरु करुणा की मुद्रा में मौत को गले लगा सकता है उसके शिष्यों में एक ख़ास किस्म की नैतिकता आ ही जाती है. यही नैतिक साहस एक सभ्यता, एक संस्कृति और एक धर्म को जन्म देता है. सदियों बाद डाक्टर अंबेडकर के जीवन में भी इस तरह की चुनौतियाँ और दुःख आते हैं. वे बहुजनों (ओबीसी, SC/ST और स्त्रीयों) की मुक्ति के लिए अकेले लड़ रहे हैं. उनके नवजात बच्चे गरीबी, बीमारी के कारण एक के बाद एक मरते जाते हैं. हालत ये होती है कि अपने बच्चों के कफ़न खरीदने के लिए भी उनके पास पैसे नहीं होते हैं. उनकी पत्नी अपनी साडी के टुकड़े से अपने पुत्र का कफन बनाती हैं. डॉ. अंबेडकर और उनकी पत्नी इतनी विपन्नता, अपमान और दुःख के बावजूद न तो झुकते हैं न रुकते हैं और न कोई समझौता करते हैं. वे चाहते तो एक वकील या स्टॉक एक्सचेंज सलाहकार की तरह चुपचाप प्रेक्टिस करके मजे से सुविधापूर्ण जीवन जी सकते थे. एक अन्य अवसर पर महाराष्ट्र में कालाराम मंदिर सत्याग्रह के दौरान डॉ. अंबेडकर अपने सैकड़ों शिष्यों के साथ खुद भी लाठी खाते हैं, उन पर जानलेवा हमला किया जाता है. इस सबके बीच वे अपने मित्रों अनुयायियों को छोड़कर भागते नहीं हैं. अपने मिशन में एक विराट नैतिक बल और नैतिक साहस लिए आगे बढ़ते हैं. उनके बाद हजारों बहुजन आन्दोलनकारियों को इन कहानियों ने प्रभावित किया और तैयार किया है. इसी तरह ओबीसी माली समाज से आने वाले ज्योतिबा फुले हैं, उनकी पत्नी सावित्रीबाई फुले हैं जिन पर हमले होते हैं वे भी भयानक गरीबी में बहुजन मुक्ति के लिए और शुद्रातिशुद्रों और स्त्रीयों की मुक्ति के लिए काम करते थे. वे कभी अपने लोगों को छोड़कर नहीं भागे न ही किसी के आगे झुके. * * * वहीं दुसरी तरफ अपने शरीर में बुद्ध के अवतरण की घोषणा करने वाले ओशो रजनीश को देखिये. ओशो रजनीश एक गाल पर चांटा पड़ने पर के बदले दोनों गाल नोच लेने की शिक्षा देते हैं. भारत की सरकार को आँख दिखाते हैं. अमेरिका को “फक यू” “गो टू हेल” कहकर चुनौती देते हैं. लेकिन जब भारत सरकार और अमेरिकी सरकार से निर्णायक लड़ाई का क्षण आता है तो पहले भारत में रातोरात अपने शिष्यों को अकेला छोड़कर भाग जाते हैं और दुसरी बार अमेरिका में अपने शिष्यों को अकेला मरने के लिए एक रात चुपचाप प्लेन में बैठकर उड़ जाते हैं. इस भयानक अंतर पर गौर कीजिये. श्रमण परम्परा के, बहुजन परम्परा के महापुरुष एक नैतिक साहस और इमानदारी के साथ अपने शिष्यों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर आगे बढ़ते हैं. और दुसरी तरफ व्यापारी बुद्धि के ब्राह्मणवादी बाबा लोग सिद्धांतों की जलेबी बनाते हुए अपने ही शिष्यों का शोषण करते हैं और जरूरत पड़ने पर छोड़कर भाग जाते हैं. इसीलिये उनके शिष्यों में कोई नैतिक साहस और कोई सुधारवादी आन्दोलन नहीं पैदा होता. इस विस्तार में देखने के बाद आप समझ सकेंगे कि क्यों बुद्ध, फूले और अंबेडकर के शिष्यों में एक नैतिक साहस और स्पष्टता होती है और वे सब कुछ सहकर भी अपना आन्दोलन आगे बढाए जाते हैं. इससे ये भी समझ में आयेगा कि क्यों साबुन तेल शेम्पू या ध्यान, समाधि बेचने वाले भगोड़े बाबाओं के शिष्यों में एक अवसरवादिता, कायरता और अस्पष्टता होती है, और ऐसे भगोड़े बाबाओं के शिष्य क्यों कुछ नहीं कर पाते हैं. -संजय श्रमण

विधान परिषद चुनाव में बहुजन समाज बनाने की राह पर सपा-बसपा

लखनऊ। उत्तर प्रदेश के विधान परिषद चुनाव में सपा-बसपा ने अपने जिन दो प्रत्याशियों को टिकट दिया है, उससे साफ है कि दोनों पार्टियां बहुत संभल कर अपने कदम बढ़ा रही हैं. इस चुनाव में बसपा ने दलित समाज से आने वाले भीमराव अम्बेडकर को प्रत्याशी बनाया है, जबकि सपा के प्रत्याशी पिछड़े वर्ग के नरेश उत्तम पटेल हैं. पटेल कुर्मी बिरादरी से आते हैं. सपा-बसपा गठबंधन इसी सोशल इंजीनियरिंग से 2019 के चुनाव में उतरना चाहता है.

भाजपा ने 10 प्रत्याशियों में पिछड़े वर्ग से केवल अशोक कटारिया और अनुसूचित जाति से सिर्फ एक विद्यासागर सोनकर को प्रत्याशी बनाया है. सपा-बसपा के प्रत्याशियों को देखने से साफ पता चलता है कि उसके एजेंडे में सबसे ऊपर बहुजन समाज है. जहां तक बसपा प्रभारी की बात है तो पार्टी ने अपने जमीनी नेता भीमराव अम्बेडकर को सदन में भेजने का अपना वादा पूरा किया है. अम्बेडकर को राज्यसभा में पहुंचाने में असफल रही पार्टी प्रमुख मायावती ने उन्हें विधान परिषद में भेज दिया है. सभी उम्मीदवारों का चुना जाना तय है.

 

बाबासाहेब को ‘मुक्त’ न करने पर BBAU के छात्रों का रोष प्रदर्शन

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बीबीएयू में धरने पर बैठे बहुजन छात्र और पीछे जंजीरों के बीच बाबासाहेब की प्रतिमा

लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर केंद्रीय विश्वविद्यालय में बाबासाहेब की प्रतिमा को लोहे की चारदीवारी से मुक्त नहीं करने पर बहुजन छात्रों ने अम्बेडकर जयंती की पूर्व संध्या पर जमकर बवाल काटा. छात्र पिछले कई दिनों से विश्वविद्यालय कैंपस में मौजूद बाबासाहेब की प्रतिमा को हटाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं.

इस बीच विश्वविद्यालय प्रशासन ने 12 अप्रैल को प्रतिमाओं के दरवाजे खोल देने की बात कही थी, लेकिन 13 अप्रैल की शाम तक ऐसा नहीं करने पर छात्रों के सब्र का बांध टूट गया और उन्होंने जबरदस्त विरोध प्रदर्शन किया. छात्रों का कहना है कि उन्होंने बाबा साहेब की दोनों मूर्तियों को हटाने के लिए 15 दिन में तीन बार प्रार्थना पत्र दिया था. इस पर विवि प्रशासक ने उन्हें 12 अप्रैल को उनका पक्ष सुनने के लिए बुलाया था. बातचीत के बाद आदेश हुआ था कि 12 अप्रैल तक दोनों मूर्तियों के चैनल हट जायेंगे, लेकिन विवि प्रशासन ने झूठे आशवासन देकर 13 अप्रैल तक नहीं हटाया.

प्रॉक्टर को अपने मांग का ज्ञापन देते बीबीएयू, लखनऊ के विद्यार्थी

इसके बाद बहुजन छात्र दोपहर के 03:00 बजे से ही बाबा साहेब को मुक्त कराने के लिए धरने पर बैठ गए. छात्रों का आरोप है कि इस दौरान आशियाने थाने की पुलिस छात्रों को धमकाने लगी और रमाबाई चौकी प्रभारी दरोगा भी छात्रों को भविष्य खराब करने की धमकी देते रहे. फिर भी छात्र नहीं हटे. आखिरकार विश्वविद्यालय के प्रॉक्टर प्रो. राम चंद्रा के आने और 14 अप्रैल को सुबह 7.30 बजे तक चैनल हटाने का लिखित आश्वासन देने पर ही बहुजन छात्र धरने से हटे. लेकिन यह पूरा घटनाक्रम विश्वविद्यालय प्रशासन की मंशा पर सवाल उठाता है.

  • रिपोर्ट- बसंत कन्नौजिया

विनोद खन्ना को दादा साहब फाल्के पुरस्कार

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65वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की घोषणा कर दी गई है. इसमें दादा साहब फाल्के पुरस्कार से लेकर सर्वश्रेष्ठ अभिनेता, अभिनेत्री और फिल्म को लेकर तस्वीर साफ हो गई है. बीते 27 अप्रैल को दुनिया को अलविदा कह देने वाले शानदार अभिनेता और भारतीय जनता पार्टी के सांसद रहे विनोद खन्ना को दादा साहब फाल्के पुरस्कार से नवाज़ा गया है.

फिल्म चांदनी में उनकी सह कलाकार रही फिल्म अभिनेत्री श्रीदेवी को उनकी फिल्म मॉम के लिए सर्वश्रेष्ठ अदाकारा का खिताब दिया गया है. ‘मॉम’ श्रीदेवी की आखिरी फिल्म थी. उनका भी 24 फ़रवरी की रात दुबई के एक होटल में निधन हो गया था.

दादा साहब फाल्के अवार्ड पाने वाले अभिनेता विनोद खन्ना को एक वक्त में अमिताभ बच्चन से ज्यादा बेहतर कलाकार माना जाता था. उनकी कई फिल्मों को लोग आज भी पसंद करते हैं. इनमें मेरे अपने, मेरा गांव मेरा देश, कच्चे धागे, मुकद्दर का सिकंदर, अमर-अकबर एंथनी, द बर्निंग ट्रेन, खून-पसीना, चांदनी आदि शामिल है. खलनायक की भूमिका में भी उन्हें काफी सराहना मिली. सभी विजेताओं को 3 मई को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद राष्ट्रीय पुरस्कार सम्मान से सम्मानित करेंगे.

 

योगी ने अमित शाह और मोदी से छिनी थी सीएम की कुर्सी

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नई दिल्ली। हाल ही में भाजपा की प्रवक्ता डॉ. दीप्ती भारद्वाज ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और अमित शाह को ट्विट किया था. इस ट्विट में उन्होंने लिखा था, आदरणीय भाई @AmitShah जी उत्तर प्रदेश को बचा लिजिए, सरकार के निर्णय शर्मसार कर रहे हैं. ये कलंक नहीं धुलेंगे. आदरणीय भाई @narendramodi जी और आपके साथ हम सबके सपने चूर-चूर होंगे.”

असल में भाजपा की यह प्रवक्ता सेंगर के मामले में चैनल में डिबेट पर बैठी थी, तभी रेप के एक अन्य आरोपी स्वामी चिन्मयानंद पर से सरकार द्वारा मामला वापस लेने की खबर आ गई और इससे भौंचक प्रीती के पास कहने को कुछ नहीं था. भाजपा के कई अन्य नेताओं का भी यही हाल है. वो मुंह चुराते फिर रहे हैं. आलम यह है कि चौक-चौराहों तक पर सेंगर के मामले में भाजपा और योगी की फजीहत होने लगी है.

लेकिन भाजपा का एक धड़ा कुलदीप सेंगर के पक्ष में मजबूती से खड़ा है. सेंगर के मामले में पार्टी के ठाकुर विधायकों की जिस तरह की गोलबंदी देखी जा रही है और उसका असर सरकार के फ़ैसलों पर देखा जा रहा है, उसे लेकर भारतीय जनता पार्टी के भीतर भी योगी पर जातिवादी होने की चर्चा तेज हो गई है. यूं तो योगी आदित्यनाथ सरकार पर शुरू से ही ये आरोप लग रहे थे कि संन्यासी होने और भेद-भाव न करने के अपने वादे के विपरीत वो राजपूतों के प्रति कुछ ज़्यादा ही ‘मेहरबान’ हैं, उन्नाव की घटना ने इन आरोपों को मज़बूती दे दी है. इसकी चर्चा न सिर्फ भाजपा के बाहर है, बल्कि भाजपा के अन्य समाज के नेता भी इससे दुखी हैं. बात इतनी फैल गई है कि पार्टी के भीतर खुलकर कहा जाने लगा है कि उत्तर प्रदेश में सरकार टी सिरीज़ चला रही है.” ‘टी’ यानि ‘ठाकुर.’

बीबीसी अपनी एक रिपोर्ट में भाजपा के एक वरिष्ठ नेता के हवाले से लिखता है कि मोदी और अमित शाह की पहली पसंद योगी नहीं थे, बल्कि योगी आदित्यनाथ ने अमित शाह और मोदी से मुख्यमंत्री की कुर्सी छीन ली थी. योगी ने आलाकमान से मुख्यमंत्री की कुर्सी छीनने की हिम्मत प्रदेश के ठाकुर विधायकों की बदौलत की. ऐसे में जाहिर है कि अब अगर वह ठाकुर विधायकों के साथ नहीं खड़े होंगे तो ख़ुद ही कमज़ोर हो जाएंगे.

‘बीजेपी ने योगी को मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंपकर अपने परंपरागत मतदाता वर्ग यानी ब्राह्मणों को पहले ही नाराज़ कर दिया था, अब योगी का ठाकुर प्रेम इस नाराज़गी को और बढ़ा रहा है. प्रदेश में भाजपा के दलित नेता योगी से पहले ही नाराज हैं. ऐसे में इस बात की संभावना बढ़ गई है कि ब्राह्मण और दलित नेताओं की नाराजगी से बचने के लिए भाजपा नेतृत्व योगी को मुख्यमंत्री की कुर्सी से हटा सकता है. लेकिन इससे पहले मोदी और अमित शाह को प्रदेश के ठाकुर नेताओं को साधना होगा.