बुद्ध पूर्णिमा विशेषः भारत में धम्म कारवां की दिशा

buddhismधम्म कारवां आज काफी फल-फूल चुका है. 1956 में पांच लाख लोगों की संख्या करोड़ों में पहुंच गई है. अंग्रेजी अखबार द टाईम्स ऑफ इंडिया (नई दिल्ली संस्करण, 10 नवंबर 2006) में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार भारत वर्ष में सन 2006 तक 30 लाख लोगों ने बौद्ध धम्म की दीक्षा ली थी. 2001 की जनगणना के वक्त बढ़कर यह लगभग 81 लाख हो चुकी थी, जो कि 2011 की आखिरी जनगणना के प्रारंभिक अनुमानों के अनुसार 97 लाख पहुंच गई हैं. हालांकि कुछ विशेषज्ञ भारत में बौद्धों की संख्या 3 करोड़ 50 लाख से भी अधिक मानते हैं. उनका मानना है कि जनगणना में वास्तविक संख्या इसलिए सामने नहीं आ पाती हैं क्योंकि काफी लोग बौद्ध होते हुए भी अपने को आधिकारिक दस्तावेजों में बौद्ध नहीं घोषित करते.

सांस्कृतिक रूप से देखा जाए तो लगभग सभी प्रदेशों में बौद्ध अनुयायियों ने अनेकों बौद्ध विहारों का निर्माण करवाया है. पंजाब में 22 बुद्ध विहार निर्मित किए गए हैं. गुजरात में कई जगहों पर बुद्ध अनुयायियों ने बुद्ध विहारों का निर्माण करवाया है. यू.पी, बिहार, दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक सहित देश के तमाम प्रदेशों में अनेकों बुद्ध विहारों का निर्माण करवाया जा चुका है. ऐसे में जब भारत में धम्म दिनों दिन फैल रहा है, यह सोचना भी जरूरी है कि धम्म कारवां की दिशा क्या हो और उसमें हमारी भूमिका क्या हो? उसके लिए कुछ जरूरी बिंदुओं पर ध्यान देना जरूरी है.

बौद्धों का जीवन

 बौद्धों को अपना जीवन और दैनिक क्रियाकलाप बौद्धधम्म की शिक्षाओं के अनुरूप जीना चाहिए. इसके लिए सबसे आवश्यक है कि देवी-देवताओं की पूजा का मोह त्यागना होगा. धम्म वंदना और दीक्षा प्रतिज्ञा गाथा के उस पालि सुत्त की बातें जीवन में उतारनी होगी जिसमें कहा गया है कि… ‘मैं भगवान बुद्ध के अलावा (बुद्ध मार्ग) अन्य किसी की भी शरण नहीं जाऊंगा. इस सत्य वचन से मेरा कल्याण हो. मैं धम्म के अलावा अन्य किसी की भी शरण नहीं जाऊंगा. धम्म ही मेरा श्रद्धा स्थान हैइस सत्य वचन से मेरा कल्याण हो. भिक्खु संघ के अलावा मैं अन्य किसी की भी शरण नहीं जाऊंगा; इस सत्य वचन से मेरा कल्याण हो.

संस्कृति

बौद्धों को एक ऐसी संस्कृति का विकास करना चाहिए जिसमें प्रत्येक देशवासी को एक सम्मानित नागरिक माना जाए और प्रत्येक नागरिक की मानवीय गरिमा और आत्मसम्मान के साथ जीने का अवसर सुनिश्चित हो. देश में परस्पर भाईचारे के साथ प्रेम और सौहार्द की भावना हो. डॉ. आम्बेडकर का कहना था कि राष्ट्रवाद तभी औचित्य ग्रहण कर सकता है जब लोगों के बीच जाति, नस्ल या रंग का अंतर भुलाकर उनमें सामाजिक-भ्रातृत्व को सर्वोच्च स्थान दिया जाए… लेकिन इस भावना के विकास में जाति सबसे बड़ी बाधा है. डॉ आम्बेडकर का निष्कर्ष था कि जाति की प्रकृति ही विखण्डन और विभाजन करना है. जाति का यह अभिशाप है. जाति भावनाओं से आर्थिक विकास रूकता है. इसलिए डॉ. अंबेडकर का लगातार यह प्रयत्न रहा कि भारत में एक ऐसी सांझी संस्कृति का निर्माण हो जिसमें जात-पात के आधार पर लोगों के साथ अन्याय और शोषण न हो और हर नागरिक अपनी क्षमताओं के अनुसार राष्ट्र निर्माण में योगदान दे सके. आपस में उपजातिवाद छोड़कर एक साझा पहचान जो बौद्ध पहचान है उसको अपनाना चाहिए और आपस में रोटी-बेटी का संबंध कायम करना चाहिए, जिससे कि राष्ट्रीय एकता के विकास में सहायता मिले. डॉ. आम्बेडकर चाहते थे कि समाज के सभी वर्गों में खान-पान का संबंध विकसित हो. जो लोग धम्म दीक्षा लेने के बाद भी जाति और उप-जाति बनाए रखना चाहते हैं या जाति-पात में विश्वास करते हैं वो बौद्ध धर्म का बहुत बड़ा नुकसान कर रहे हैं क्योंकि इससे बौद्ध धर्म में भी जाति का जहर फैल जाएगा.

buddhismविपस्सना

एक अन्य चर्चा विपस्सना को लेकर है. बहुत लोगों को यह गलतफहमी है कि विपस्सना लोगों को निष्क्रिय कर देती हैं, उनका क्रोध समाप्त हो जाता है जबकि दलित समाज को आंदोलित रखने के लिए क्रोध की आवश्यकता है और विपस्सना से समाज सेवा की भावना कम हो जाती है. इन सब मिथ्या प्रचार को हमें दूर करना होगा. गौतम बुद्ध ने छः वर्षों तक ध्यान साधना किया और विपस्सना का आविष्कार किया. विपस्सना करते-करते 35 वर्ष की उम्र में बुद्धत्व को प्राप्त किया. बुद्धत्व प्राप्त करने के पश्चात 45 वर्षो तक शहरों, गांवों, कस्बों में जा-जाकर धम्म का प्रसार किया. यदि भगवान बुद्ध निष्क्रिय नहीं हुए तो फिर उनकी खोजी हुई विपस्सना करने से उनके अनुयायी कैसे निष्क्रिय हो सकते हैं?

भिक्खुओं द्वारा खुद पहल कर लोगों से नहीं मिलना भी एक समस्या है. बहुत से भिक्खु इस आशा में रहते हैं कि जब कोई बुद्ध विहार में आएगा तभी वो धम्म दीक्षा की बात करेंगे. इस बारे में भगवान बुद्ध का उदाहरण हमारे सामने है. भगवान बुद्ध बोधगया से चलकर सारनाथ आए थे और धम्मचक्र प्रवर्तन किया था. वह इस भरोसे में नहीं बैठे रहे कि लोग बोधगया आए और तब वो उनको धम्म सिखाएं. इसीलिए डॉं. आम्बेडकर ने ‘इंगेज्ड बुद्धिज्म’ की परिकल्पना की थी. इस परिकल्पना को पूरी दुनिया में मान्यता मिली है. वियतनाम में भिक्खु संघ ने अमेरिका के आक्रमण के खिलाफ पूरी ताकत से विरोध किया और लोगों के बीच जाकर धर्म का प्रचार-प्रसार किया. ताईवान में बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार में वहां के भिक्खुनी संघ ने अहम भूमिका अदा की है. ताईवान में भिक्खुनी संघ स्कूल भी चलाता है, अस्पताल भी चलाता है और लोगों के घरों में जाकर उनकी समस्याओं का निदान भी करता है. ताईवान के उदाहरण को भारत वर्ष में भी दोहराने की आवश्यकता है.

बौद्ध संस्कृति विकसित करना जरूरी

 हर सिक्ख रविवार को अनिवार्य रूप से गुरूद्वारा जाता है, ईसाई चर्च जाते है. हर मुसलमान शुक्रवार की नमाज मस्जिद जाकर अता करता है. बौद्ध समाज के लोगों को भी ऐसी परंपरा डालनी होगी. प्रत्येक रविवार को अपने नजदीकी बौद्ध विहार में जाएं. जहां बौद्ध विहार नहीं है, वहां किसी के घर में और यदि वो भी संभव नहीं है तो किसी पार्क या सार्वजनिक स्थल पर कोई संगोष्ठी करें. ऐसी कोशिश भी की जा सकती है कि जीवन के उत्सव चाहे जन्मदिन का कार्यक्रम हो या सालगिरह, उसे बौद्ध विहार में मनाए. इसके साथ ही अपना जीवन पंचशीलों के अनुसार जीने की कोशिश करें.

डॉ. आम्बेडकर ने स्वयं बुद्ध पूर्णिमा के दिन अपने आवास को सजाना आरंभ किया और उत्सव मनाने की परंपरा आरंभ की. विवाह के लिए विवाह विधि का प्रतिपादन किया और बौद्ध चर्या पद्धति तैयार की. बौद्धों में शील और सदाचार का जीवन विकसित करने के लिए ‘बुद्धिस्ट सोसायटी ऑफ इंडिया’ की स्थापना की जिसकी शाखाएं हर प्रदेश में स्थापित की गई. डॉ. आम्बेडकर ने 25 नवंबर, 1956 को सारनाथ के मृगदाय वन में 150 भिक्खुओं के समक्ष भाषण दिया था कि प्रत्येक बौद्ध के लिए अनिवार्य है कि वह हर रविवार को बौद्ध विहार में जाए और वहां उपदेश सुने. यदि ऐसा नहीं होगा तो नव दीक्षित बौद्ध को धम्म की जानकारी नहीं हो सकेगी. प्रत्येक क्षेत्र में ऐसे बौद्ध विहारों का निर्माण किया जाए जिसमें सभा करने के लिए काफी स्थान रहे. बौद्ध विहारों को सभामंदिर होना चाहिए.

बाल साहित्य और बौद्ध साहित्य

सुरूचिपूर्ण बाल साहित्य और जनभाषा में बौद्ध साहित्य की भी काफी आवश्यकता है. इसके लिए आवश्यक है कि स्थानीय लोक भाषा में छोटी-छोटी पुस्तकें बड़े अक्षरों में छपवाई जाए और सस्ते दामों में लोगों को उपलब्ध कराई जाएं, क्योंकि साहित्य के बगैर धर्म का प्रचार-प्रसार कठिन होगा. जो भी बौद्ध साहित्य लिखा गया है, उसको और सरल और सुगम बनाकर कम से कम शब्दों में तैयार कर जन-जन तक पहुंचाने की जरूरत है जिससे कि किसान, मजदूर, गांव के लोग, कम पढ़े लिखे लोग, सभी लोग समझ सकें और उसको जीवन में उतार सकें. बुद्ध की शिक्षाओं को जन-जन तक पहुंचाने के लिए शीलवान और पढ़े-लिखे भिक्खुओं की जरूरत है. इसके साथ ही, हमें एक समानांतर प्रचार व्यवस्था को विकसित करना होगा जिसमें नुक्कड़ नाटक, भजन मंडली, स्वांग मंडली, लोकगीत शामिल हैं जो लोगों तक आपकी बात पहुंचा सके.

पर्सनल लॉ की जरूरत

लगभग सभी अल्पसंख्यकों के अपने-अपने Personal Low हैं. ईसाईयों का Personal Low उनका बाईबिल है, मुसलमानों का Personal Low कुरान शरीफ द्वारा निर्धारित होता है. सिक्खों में आनंद कारज विवाह प्रथा को मान्यता प्राप्त है, लेकिन बौद्धों का अपना कोई Personal Low नहीं है. इसलिए जब तक सभी नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता नहीं बन जाती, बौद्धों का भी अपना Personal Low होना चाहिए.

चारों महत्वपूर्ण अंगों को सामने आना होगा

बौद्ध धम्म के सामाजिक संगठन के चार महत्वपूर्ण अंग हैं. ये हैं भिक्षु संघ, भिक्षुणी संघ, उपासक संघ और उपासिका संघ. धम्म कारवां के आगे बढ़ने के लिए इन चारों संघों का शील-सदाचार पूर्ण जीवन जीना और सामाजिक तथा सांस्कृतिक रूप से मजबूत होना आवश्यक है. लेकिन ये एक बहुत बड़ी विडंबना है कि भारत में अकेले भिक्षु संघ काम कर रहा है. अभी तक न तो भिक्षुणी संघ बन पाया है, न ही उपासक संघ और न ही उपासिका संघ. इसलिए आवश्यक है कि बौद्ध अनुयायियों को इन संघों का निर्माण करना चाहिए और उनको मजबूत बनाया जाना चाहिए.

buddhaभ्रम फैलाने की कोशिश

धम्म कारवां की लोकप्रियता से डरे कुछ लोगों और संगठनों द्वारा अनेकों दुष्प्रचार करने की घटना भी सामने आई हैं. इसमें एक दुष्प्रचार यह किया जा रहा है कि बौद्धधर्म केवल दलित अपना रहे हैं. जबकि हकीकत इससे अलग है. भगवान बुद्ध दलित नहीं थे. उनके प्रथम पांचों शिष्य ब्राह्मण थे. उसके बाद यश और उसके 54 साथी व्यापारी वर्ग से थे. राजा बिबिंसार और राजा प्रसेनजित तथा शाक्य संघ के लोग सभी के सभी क्षत्रिय थे. वर्तमान समय में बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले महापंडित राहुल सांस्कृत्यायन, धर्मानंद कौशाम्बी, डी डी कौशाम्बी पूर्व में ब्राह्मण थे. इसी तरह भदन्त आनंद कौशलायन, आचार्य सत्यनारायण गोयनका, भन्तेसुरई सशई, अमेरिका के मशहूर फिल्म अभिनेता रिचर्ड गेरे, फिल्म प्रोड्यूसर टीना टर्नर कोई भी दलित वर्ग से नहीं है.

 बुद्ध के बारे में एक दुष्प्रचार यह किया जाता है कि भगवान बुद्ध विष्णु के अवतार थे. ये सब हिन्दू धर्मांवलंबियों की चाल है. भगवान बुद्ध ने स्वयं ही अवतार के सिद्धांत को नकारा था. बुद्धत्व प्राप्ति के बाद उन्होंने यह उल्हास भरी घोषणा की थी-

‘अयं अन्तिमा जाति’ ‘नत्थिदानि पुनब्भवोति’

यानि यह मेरा अंतिम जन्म है, और अब मेरा पुनर्जन्म नहीं होगा. बुद्ध के इस शब्द को समझ कर बौद्धों को धर्म विशेष के लोगों द्वारा फैलाई गई तमाम भ्रांतियों से दूर रहना होगा. और भारत  धम्म कारवां को बढ़ाना होगा.

  • लेखक एक बौद्ध विचारकसाहित्यकार और सामाजिक चिंतक हैं.

बलात्कारी आशाराम बापू का ‘ब्रह्मज्ञान’

पिछले दिनों बलात्कार के जुर्म के लिए आशाराम को सजा हुई. आशाराम ने कोर्ट में बचाव में जो दलीलें पेश की थीं उनमें एक दलील बड़ी रोचक और ध्यान देने वाली है. बलात्कारी आशाराम की दलील थी कि ब्रह्मज्ञानी व्यक्ति किसी के साथ भी यौन संसर्ग कर सकता है, यह दैवीय कृत्य होता है. ईश्वर को जब किसी के साथ यौन संसर्ग करने की इच्छा होती है तो वह ब्रह्मज्ञानी व्यक्ति के शरीर में प्रवेश करता है.

 इस तरह आशाराम को यह विश्वास था कि ‘ब्रह्मज्ञानी’ व्यक्ति द्वारा लड़की का यौन शोषण आपराधिक कृत्य नहीं होता है. इस तरह हम देखते हैं कि ‘ब्रह्मज्ञान’ इंसान को अमानवीय मूल्यों और आपराधिक कृत्यों के प्रति अपराधबोध से भी मुक्त करता है जिससे समाज में अनाचार फैलता है और ‘ब्रह्मज्ञानी’ व्यक्ति को कानून के साथ-साथ समाज का भी अपराधी बना देता है. इसलिए ब्राह्मणवादी विचारधारा बाकी मनुष्यों के साथ साथ ब्राह्मण के लिए भी खतरनाक साबित होती है. इसको जितनी जल्दी हो सके त्याग देना चाहिए. बहुजन समाज को तो इससे दूर ही रहना चाहिए.

बहुजन संघर्षशील और जुझारू है. अपनी मेहनत के दम पर कुछ भी कर सकते हैं. तमाम बाधाओं और सुविधाओं से महरूम होने के बावजूद आज बहुजन हर क्षेत्र में अपनी प्रतिभा के दम पर आगे बढ़ रहे हैं. सवाल यह है कि तमाम सुविधाओं का भरपूर उपभोग करते हुए भी ब्राह्मण आज तक कोई आविष्कार या खोज क्यों नहीं कर सका ? ब्राह्मण समाज अपने बीच से आज तक कोई वाल्टेयर क्यों नहीं पैदा कर सका ? ब्राह्मण के अंदर वो कौन सी हीन ग्रंथि है जो ब्राह्मण को हमेशा खुद को ही श्रेष्ठ मानने पर मजबूर करती है ? इन सब सवालों पर गंभीर चिंतन होना चाहिए.

कुछ साल पहले की बात है. इलाहाबाद हाईकोर्ट बार एसोसिएशन का चुनाव चल रहा था. अध्यक्ष पद के एक ब्राह्मण प्रत्याशी, जो पूर्व में भी अध्यक्ष रह चुके थे, चैंबर में अधिवक्ताओं को संबोधित कर रहे थे. उनके पैनल से प्रायः सभी पदों पर ब्राह्मण ही चुनाव लड़ रहे थे. एक ठाकुर जाति के अधिवक्ता ने टोक दिया कि हर पद पर ब्राह्मण प्रत्याशी नहीं होना चाहिए.

इस पर उनका जवाब था,”ब्राह्मण आवश्यक बुराई है. आप उसकी लाख आलोचना कर लीजिए लेकिन जन्म से लेकर नामकरण, विवाह होने और मृत्यु तक ब्राह्मण आवश्यक है. ब्राह्मण में लाख बुराईयां हो सकती हैं लेकिन ब्राह्मण के बिना आपका कोई काम नहीं चल सकता.”

मुझे लगा कि पंडित जी ठीक ही कह रहे थे. जब तक आप अपना कोई भी सामाजिक-सांस्कृतिक कार्य बिना ब्राह्मण के सम्पन्न करना नहीं शुरू करते हैं, आपको ब्राह्मणवाद की आलोचना करने का कोई नैतिक अधिकार नहीं बनता है. इसलिए जन्म से लेकर नामकरण, विवाह और मृत्यु तक सारे कार्य खुद करना सीखिए. जब तक आपके किसी कार्य के लिए ब्राह्मण आवश्यक है, ब्राह्मणवाद खत्म नहीं हो सकता. इसीलिए अर्जक संघ ने देश में अर्जकों हेतु एक वैकल्पिक सांस्कृतिक व्यवस्था की स्थापना की है जिससे आपको अपने किसी भी सांस्कृतिक कार्य में ब्राह्मण को बुलाने की मजबूरी न रहे.

आपको जानकर आश्चर्य हो सकता है कि जिस तरह क्षत्रियों, वैश्यों और शूद्रों में तमाम जातियाँ होती हैं उसी तरह ब्राह्मणों में भी तमाम जातियाँ होती हैं. लेकिन सवाल उठता है कि ब्राह्मण एक क्यों दिखता है ? क्या आपने कभी सोचा कि जिस तरह अहीर, गड़ेरिया, कुर्मी, कोइरी, जाट, गुजर, लोध, चमार, पासी, धोबी, लुहार, कुम्हार, तेली, राजपूत जैसी तमाम जातियाँ अपनी अलग पहचान बताती हैं उसी तरह ब्राह्मणों की तमाम जातियाँ अपनी अलग-अलग पहचान क्यों नहीं दिखातीं ?

इसकी वजह है ब्राह्मण का अपना अलग धर्म. ब्राह्मण से जब उसकी जाति पूछी जाती है तब वह अपने धर्म, ब्राह्मण धर्म को बताता है. वह अपनी जाति कभी नहीं बताता. ब्राह्मणों की तमाम जातियों के बीच भी उसी तरह छुआछूत और भेदभाव मौजूद है जैसे बाकी जातियों के बीच. कभी कभी तो ये भेदभाव गैर ब्राह्मण जातियों से भी ज्यादा होता है.

ब्राह्मणों में छुआछूत के उदाहरण के लिए पंक्तिदूषण ब्राह्मण को देखिए. पंक्तिदूषण ब्राह्मण उन ब्राह्मणों को कहा जाता है, जिनके बैठने से ब्रह्मभोज की पंक्ति दूषित समझी जाती है. ऐसे लोगों की बड़ी लम्बी सूची है. इसके विपरीत पंक्तिपावन ब्राह्मण उन ब्राह्मणों को कहा जाता है, जिनके भोजपंक्ति में बैठने से पंक्ति पवित्र मानी जाती है. इन ब्राह्मणों में प्राय: वेदों का स्वाध्याय और पारायण करने वाले श्रोत्रिय ब्राह्मण होते हैं. पंक्तिदूषक ब्राह्मणों की लम्बी सूची देखकर समझा जा सकता है कि पंक्तिपावन ब्राह्मणों की संख्या बहुत बड़ी नहीं हो सकती और ज्यादातर ब्राह्मण ब्राह्मणों में अछूत जैसे ही हैं. इस तरह ब्राह्मणों के बीच भी भयंकर भेदभाव और छुआछूत मौजूद है. इससे निष्कर्ष निकलता है कि ब्राह्मणवाद स्वयं ब्राह्मण के लिए भी हानिकारक है.

एक और महत्वपूर्ण कार्य है जो बहुजनों के लिए बहुत जरूरी है और इसे तत्काल करना चाहिए और वह है ब्राह्मणवादी मीडिया का बहिष्कार. क्या आप जानते हैं कि देश के विभिन्न राज्यों में ब्राह्मणों की तमाम जातियां और उपजातियां आरक्षण का लाभ लेती हैं ? जोशी ब्राह्मण, महाब्राह्मण, गोसाईं, मराठी ब्राह्मण, बैरागी ब्राह्मण, मणिपुरी ब्राह्मण जैसी तमाम जातियां विभिन्न राज्यों में ओबीसी कोटे के तहत आरक्षण का लाभ प्राप्त करती हैं. इसके अतिरिक्त गुजरात में कायस्थ और कर्नाटक तथा गुजरात में राजपूत भी ओबीसी में शामिल हैं और आरक्षण का लाभ प्राप्त करते हैं.

लेकिन सबको प्रतिनिधित्व सुनिश्चित कराने वाली राष्ट्रनिर्माण की पहल आरक्षण की विरोधी ब्राह्मणवादी मीडिया यह भ्रम बनाए रखने में कामयाब हो जाती है कि द्विज जातियों को आरक्षण का लाभ नहीं मिलता है. इस भ्रम को तोड़ना बहुत जरूरी है नहीं तो ये लोग अपनी मुट्ठी भी ताने रहेंगे और इनकी काँख भी नहीं दिखेगी. अश्लील ब्राह्मणवादी मीडिया का बहिष्कार कीजिए और अपने घरों में ब्राह्मणवादी मीडिया द्वारा परोसी जाने वाली अश्लील सामग्री फैलने से रोकिए. अपनी आने वाली पीढियों को ब्राह्मणवादी मीडिया से दूर रखिए.

  • मनोज अभिज्ञान अधिवक्ता एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता ईमेल : juristverdict@gmail.com

आरक्षण खत्म होना चाहिए

Representative Schoolमैं भी आप का समर्थन करता हूँ कि “आरक्षण बंद होना चाहिए”, लेकिन “सब को शिक्षा सब को काम” की भी मांग कर रहा हूँ. 30 प्रतिशत सवर्ण भूमिहीन हैं. 20 प्रतिशत सवर्णों के पास 100 बीघे से भी अधिक जमीनें हैं. मैं सरकार से मांग करता हूँ कि उन अमीर जमीदार सवर्णों की जमीन छीनकर गरीब सवर्णों में बांट दिया जाय जिससे उनके बाल-बच्चे ठीक से जीवन-यापन कर सकें. 10 प्रतिशत सवर्णों के पास 100 एकड़ जमीनें हैं. सरकार को चाहिए कि उनसे जमीनें छीनकर अन्य वर्गों के भूमिहीनों में वह जमीन बांट दी जाय. असमानता अन्याय है.

परम्परावादी सवर्ण की बड़ी बुरी आदत है कि वह व्यक्तिगत तौर पर चिढ़ने लगता हैं. वह अमीर सवर्ण जमीदार के पक्ष में खड़ा होकर सवाल पूछने और उपदेश देने लगता है कि तुम अपनी ज़मीन क्यों नहीं दान कर देते? यदि किसी अमीर के पास अधिक जमीन है तो वह उसके बाप-दादा की है. इसमें तुम्हारा क्या जाता है. ऐसे ही एक ब्राह्मण मित्र के सवाल के जवाब में मैंने अपनी सफाई पेश करते हुए लिखा कि मेरे पास या मेरे पिता जी के पास 1 बीघा खेत भी नहीं है. 5 भाई और 2 बहनों में मैं इकलौता व्यक्ति हूँ जो इत्तेफ़ाक से नौकरी कर रहा है और मैं सभी भाई बहनों को साथ लेकर चल रहा हूँ. क्या यह समाज के लिए कम बड़ी जिम्मेदारी है. मेरे पास तनखाह के अतिरिक्त कुछ नहीं है. मैं किसी को क्या दे सकता हूँ.

हाँ, यदि बहुत से जमीदार सवर्णों की जमीनें सरकार छीन ले तो अन्य गरीब सवर्ण मजे में रह सकते हैं. मैं सवर्णों से छीनी जमीनें दलितों में बांटने की बात कत्तई नहीं कर रहा हूँ. फिर आप को पीड़ा क्यों होने लगती है? क्या आप अपने ही भाई को ठीक से कमाते-खाते नहीं देखना चाहते हैं? जब सवर्णों से छीनने की बात उठती है तो आप को अनायास पीड़ा होने लगती है, क्यों? क्या उसे मैं अपने लिए मांग रहा हूँ, जी नहीं. सवर्ण समाज में समरूपता आए, इसलिए ऐसा विचार मैं अपने लेख द्वारा गूँगी-बाहरी सरकार तक पहुंचा रहा हूँ. कुछ सवर्णों की वजह से 77.1प्रतिशत सवर्ण गरीब हैं, नौकरी विहीन हैं. उनके लिए यह मांग करिए, लेकिन आप बेवजह सवालिया हो रहे हैं. इसे ही कहते हैं जाति की पीड़ा और जातिवाद से ग्रसित होना. जातिवाद कभी भी समानता की कायल नहीं है.

बस एक नई बात जोड़ दी की जिनके पास जीवन-यापन से अधिक खेती है, उनसे वह खेत छीनकर गरीब सवर्णों में बांट दिया जाय. मैं यह भी नहीं कह रहा हूँ कि वह जमीन शूद्रों को दे दी जाय. आप समझो न मेरी बात को. लेकिन आप को एक धुन सवार हो गई है कि बात आरक्षण वाले मुद्दे से भटक गई है.

आप जानते हैं सवर्ण साथी भी भूमिहीन है. उसके भूमिहीन होने का कारण ये सवर्ण जमीदार ही हैं. किसी के पास एक धुर जमीन नहीं किसी के पास 100 एकड़ जमीन है. ये कहाँ का न्याय है? इससे तो असमानता रहेगी ही. सिर्फ आरक्षण ख़त्म कर देने या आर्थिक आधार पर आरक्षण कर देने से समस्या का समाधान नहीं हो जाएगा. इस समय 35 करोड़ युवा हैं. मैं जाति-धर्म की बात नहीं कर रहा हूँ. सिर्फ युवा की बात कर रहा हूँ. नौकरियां 2 करोड़ 75 लाख हैं. किस-किस को आरक्षण के आधार पर नौकरियां मिल सकती हैं? क्या 35 करोड़ युवा को नौकरियां मिल सकती हैं?

फिर क्या है समस्या का समाधान? दलित कहे कि सवर्ण आरक्षण छीन रहा है और सवर्ण कहें कि आरक्षण की वजह से हमें नौकरियां नहीं मिल रही हैं. लड़ते रहो आपस में. क्या फायदा निकलेगा? समस्या की जड़ है पूँजीवाद, जो हमें लड़ाकर खुद मुनाफा कमाकर असंख्यों रुपए तिजोरी में कैद कर रही है. सारे सार्वजनिक सेक्टर्स को प्राइवेट सेक्टर्स में बदल रही है. और प्राइवेट वाले उच्चतम तकनीकी से कम व्यक्तियों के द्वारा अत्यधिक श्रम का शोषण करके हमें बेरोजगार बना रहे हैं.

हमारी आंखे वहां नहीं देख पाती है जहां समस्या की जड़ है. हम सिर्फ आरक्षण में समस्या खोजते हैं. रोजगार बढ़ाने के लिए संघर्ष करो. सभी जातियों के लोग उस संघर्ष में उतारेंगे और समस्या का समाधान जरूर होगा. यदि जातिवादी मानसिकता से ऊपर उठ पा रहे हों, तो मेरी बातों पर गौर फरमाइए. आप की बात को मैं कब का मान चुका हूँ कि “आरक्षण ख़त्म हो जाना चाहिए.” यह डीवेट तो कब का ख़त्म हो चुका है.

हमें समझना है कि संपत्ति का राष्ट्रीयकरण क्यों नहीं किया जाता है? जमीनों का राष्ट्रीयकरण क्यों नहीं किया जाता है? किसी भी संस्था का राष्ट्रीयकरण क्तो नहीं किया जाता है? किसी भी पूँजीपति के पास जो अकूत रुपया है उसका वह क्या करेगा? सिर्फ अमीर बने रहने की एक गलत महत्वाकांक्षा ही तो है. वह खुद नहीं कुछ करता है. करते हम आप हैं. मुनाफा कमा कमा कर धन वह इकठ्ठा कर रहा है. वह धन न उसके काम आता है न हमारे ही काम आता है. न राष्ट्र के काम आता है. अनुत्पादक पूँजी पड़ी हुई है.

इसी तरह जिसके पास ज्यादे बीघा जमीने है, किस काम की? क्या वह कुछ ज्यादे खा लेता है? बिल्कुल नहीं. लेकिन उसकी वजह से बहुत से ग्रामवासी जो उन्हीं की जाति-बिरादरी के हैं, भूमिहीन और गरीब हैं. यदि जमीनों का राष्ट्रीयकरण हो जाय या सामान बटवारा हो जाय तो न किसी की तिजोरी भरेगी और न कोई गरीब और बेरोजगार भूंखों मरेगा. आओ हम अपने सोच का दायरा बढ़ाएं. जाति-धर्म से ऊपर उठें. यह मानसिकता एक बीमार मानसिकता है. इस बीमारी को दूर भगाएं.

  • आर डी आनंद

सिविल सेवा परीक्षा टॉप करने की कहानी अनुदीप की जुबानी

2

“मैं बहुत ख़ुश हूं और आगे जो ज़िम्मेदारी मेरा इंतज़ार कर रही है उससे वाक़िफ़ हूं. रैंक से ज़्यादा बड़ी वो ज़िम्मेदारी है जो मेरे आगे है. मैं अपने परिजनों, दोस्तों और अध्यापकों का शुक्रिया करता हूं जिन्होंने मेरा साथ दिया.” अनुदीप कहते हैं कि “मैं आज यहां सिर्फ़ अपनी मेहनत के दम पर पहुंचा हूं. मेहनत का कोई विकल्प नहीं.” वे बताते हैं, “हम जो भी करें, चाहें परीक्षा दे रहे हों या कोई खेल खेल रहे हों, हमारा लक्ष्य हमेशा उत्कृष्टता हासिल करना होना चाहिए. मैंने यही अपने पिता से सीखा और परीक्षा की तैयारी में इसे लागू किया.”

अनुदीप कहते हैं, “अब्राहम लिंकन हमेशा से मेरी प्रेरणा का स्रोत रहे. वो एक महान नेता का उदाहरण हैं. बेहद मुश्किल हालातों में चुनौतियों का सामना करते हुए उन्होंने अपने देश का नेतृत्व किया. मैं हमेशा उनसे प्रेरणा लेता हूं.” अपनी तैयारी के बारे में अनुदीप बताते हैं, “ये बेहद मुश्किल परीक्षा होती है क्योंकि बहुत से क़ाबिल लोग इसके लिए तैयारी करते हैं. आज भी बहुत से क़ाबिल लोगों का नाम चुने गए उम्मीदवारों की सूची में है. आप कितने घंटे पढ़ रहे हैं इससे ज़्यादा महत्वपूर्ण ये है कि आप क्या पढ़ रहे हैं और कैसे पढ़ रहे हैं.”

अनुदीप 2013 में भी सिविल सेवा में चुने गए थे. तब उनका चयन भारतीय राजस्व सेवा के लिए हुआ था. अनुदीप कहते हैं, “मैं हैदराबाद में असिस्टेंट कमिश्नर के पद पर तैनात हूं. नौकरी करते हुए मैं तैयारी कर रहा था. सप्ताहांत के अलावा मुझे जब भी समय मिलता मैं तैयारी करता. मेरा यही मानना है कि पढ़ाई की गुणवत्ता और एकाग्रता मायने रखती है. हमें हमेशा सर्वश्रेष्ठ के लिए कोशिश करनी चाहिए. सिर्फ़ मेहनत और उत्कृष्टता के लिए प्रयास ही मायने रखता है. नतीजा अपने आप आ जाता है.”

अनुदीप को पढ़ने का शौक है और उन्हें फुटबाल में गहरी दिलचस्पी है. बचपन से ही वो फुटबॉल खेलते हैं और फुटबॉल के मैच देखते हैं. अनुदीप कहते हैं, “फुटबॉल मेरे जीवन का हमेशा से अहम हिस्सा रही है. मैं खूब खेलता भी हूं और खूब देखता भी हूं. जब भी तनाव होता है तो इसे तनाव दूर करने के लिए भी इस्तेमाल करता हूं. इसके अलावा मुझे पढ़ने का बहुत शौक है. मैं फ़िक्शन (काल्पनिक कहानियां) ज़्यादा नहीं पढ़ता बल्कि असल विषयों पर किताबें पढ़ता हूं.”

अनुदीप कहते हैं, “मुझे जब भी खाली समय मिलता है मैं या तो खेलता हूं, या पढ़ता हूं. मुझे लगता है कि सभी को अपने शौक़ रखने चाहिए. ये न सिर्फ़ हमें तनाव से दूर रखते हैं बल्कि हमारे चरित्र का निर्माण भी करते हैं. मैं तो कहूंगा कि हमारे शौक़ ही हमें इंसान बनाते हैं.”

अनुदीप के परिवार के लिए ये सबसे बड़ी ख़ुशी है. वे कहते हैं, “ये ख़बर सुनने के बाद मेरी मां की आंखों से आंसू बहने लगे, मेरे पिता तो अभी तक यक़ीन ही नहीं कर पाएं हैं. ये बेहद ख़ुशी का पल है. मैं ख़ुद अभी तक यक़ीन नहीं कर पा रहा हूं. ये मेरे लिए अविश्वसनीय पल हैं. मैं सबका शुक्रिया अदा करता हूं.”

अनुदीप का मानना है कि जो भी काम उन्हें दिया जाएगा वो करेंगे लेकिन वो चाहेंगे कि वो शिक्षा के क्षेत्र में काम कर पाएं.वे कहते हैं, “मुझे लगता है कि हमें शिक्षा के क्षेत्र में और आगे बढ़ने की ज़रूरत है. दुनिया के विकसित देश, उदाहरण के तौर पर स्कैन्डिनेवियन देशों में सबसे ज़्यादा ज़ोर शिक्षा पर ही है. मज़बूत शिक्षा व्यवस्था ही उनके विकास की जड़ है. अगर हमें नया भारत बनाना है तो अपनी शिक्षा व्यवस्था को सुधारना होगा. हम इस दिशा में काम कर रहे हैं और आगे भी काम करने की ज़रूरत है. मैं अपने विकास की यात्रा में छोटी ही सही लेकिन कोई भूमिका निभाना चाहता हूं.”

अपनी क़ामयाबी का श्रेय अपने पिता को देते हुए अनुदीप कहते हैं, “मेरे पिता मेरे रोल मॉडल है. वो तेलंगाना के एक दूरस्थ गरीब इलाक़े से आते हैं. अपनी मेहनत के दम पर वे आगे बढ़े और मुझे बेहतर शिक्षा मिल सकी. उन्होंने हमेशा मेरा सहयोग किया है. वे अपने काम में बेहद मेहनत करते हैं और ऊंचे स्टैंडर्ड का पालन करते हैं. मैंने अपने जीवन में हमेशा उन जैसा बनना चाहा है.”

अनुदीप के मुताबिक़, “हमारे प्रेरणास्रोत हमारे इर्द-गिर्द ही होते हैं बस हमें उन्हें पहचानने की ज़रूरत है. “

 

अकेले अय्यर पड़े केकेआर पर भारी

0

नई दिल्ली। दिल्ली के नए नवेले कप्तान श्रेयस अय्यर की दमदारी पारी की बदौलत डेयडेविल्स ने केकेआर को 55 रन से मात दे दी. आइपीएल के 26वें मुकाबले में दिल्ली की टीम गौतम गंभीर के बिना और नए कप्तान श्रेयस अय्यर की कप्तानी में खेलने उतरी और जीत हासिल की. हार की मार झेल रही दिल्ली की मौजूदा आइपीएल में ये दूसरी जीत रही और डेयरडेविल्स की इस जीत के हीरो कप्तान श्रेयय अय्यर रहे. उन्हें इस मैच में मैन ऑफ द मैच के खिताब से नवाज़ा गया. इस मुकाबले में श्रेयस अय्यर ने एक ऐसा काम कर दिया जो कोलकाता की पूरी टीम मिलकर भी नहीं कर सकी.

दिल्ली के नए कप्तान श्रेयस अय्यर ने सिर्फ 40 गेंदों पर नाबाद 93 रन की पारी खेली. इस पारी के दौरान अय्यर के बल्ले से 3 चौके और 10 छक्के निकले. इस मैच में अय्यर ने इतने छक्के जड़ दिए कि कोलकाता की पूरी टीम मिलकर भी इतने छक्के नहीं जड़ सकी. अय्यर ने 10 छक्के लगाए तो केकेआर की तरफ से 9 छक्के लगे. कोलकाता की ओर से सबसे अधिक छक्के आंद्रे रसेल ने लगाए. रसेल के बल्ले से चार छक्के निकले. वहीं सुनील नरेन ने 3 छक्के लगाए. दिनेश कार्तिक और शुभमन गिल ने भी एक-एक छक्का लगाया. इस तरह कोलकाता की पूरी टीम मिलकर जो न कर सकी वो अकेले दिल्ली के कप्तान श्रेयस अय्यर ने कर दिया.

कोलकाता के कप्तान दिनेश कार्तिक ने टॉस जीतकर पहले गेंदबाज़ी करने का फैसला किया. दिल्ली की टीम ने पहले बल्लेबाज़ी करते हुए निर्धारित 20 ओवर में 4 विकेट खोकर 219 रन बनाए. अय्यर ने धमाकेदार पारी खेलते हुए दिल्ली की पारी के आखिरी ओवर में शिवम मावी की गेंदों पर 29 रन कूट दिए. इसी की दम पर ही दिल्ली ने कोलकोता के सामने 220 रन का पहाड़ सा लक्ष्य रखा. इस चुनौती का पीछा करते हुए कोलकाता की टीम 20 ओवर में नौ विकेट पर 164 रन बना सकी और मैच हार गई. दिल्ली ने इस सत्र की दूसरी जीत दर्ज करते हुए अपने पिछली तीन हार के सिलसिले पर भी विराम लगा दिया. कोलकाता की यह लगातार दूसरी हार रही.

डालमिया का हुआ शाहजहां का बनाया लाल किला!

0

भारत के इतिहास में पहली बार किसी कॉरपोरेट घराने ने ऐतिहासिक विरासत को गो‍द लिया है. जी हां! डालमिया भारत ग्रुप ने भारतीय संप्रभुता के प्रतीक दिल्लीो स्थित लाल किला को पांच वर्षों के लिए गोद लिया है. मुगल बादशाह शाहजहां ने 17वीं शताब्दीर में इसका निर्माण करवाया था. अंग्रेजों के भारत छोड़ने के बाद स्वातंत्रता दिवस के मौके पर हर साल 15 अगस्तक को देश के प्रधानमंत्री तिरंगा फहरा कर आजादी का जश्न‍ मनाते हैं, जिसमें देश का हर नागरिक शरीक होता है. डालमिया ग्रुप ने नरेंद्र मोदी सरकार की ‘अडॉप्टं ए हेरिटेज’ नीति के तहत इसे गोद लिया है. लाल किला को अडॉप्टन करने की होड़ में इंडिगो एयरलाइंस और जीएमआर ग्रुप जैसी दिग्गतज कंपनियां भी शामिल थीं. लेकिन, डालमिया भारत ग्रुप ने इन्हें पछाड़ते हुए पांच साल के कांट्रैक्टि पर ऐतिहासिक इमारत को गोद लिया है. इस बाबत डालमिया भारत ग्रुप ने 9 अप्रैल को ही पर्यटन मंत्रालय, संस्कृसति मंत्रालय और भारतीय पुरातत्वह सर्वेक्षण के साथ समझौता किया था. डालमिया ग्रुप लाल किला को पर्यटकों के बीच लोकप्रिय बनाने के लिए उसे नए सिरे से विकसित करने के तौर-तरीकों पर विचार कर रहा है.

डालमिृया भारत ग्रुप के सीईओ महेंद्र सिंघी ने कहा कि लाल किला में 30 दिनों के अंदर काम शुरू कर दिया जाएगा. उन्होंवने कहा, ‘लाल किला हमें शुरुआत में पांच वर्षों के लिए मिला है. कांट्रैक्ट को बाद में बढ़ाया भी जा सकता है. हर पर्यटक हमारे लिए एक कस्टामर होगा और इसे उसी तर्ज पर विकसित किया जाएगा. हमारी कोशिश होगी कि पर्यटक यहां सिर्फ एक बार आकर ही न रुक जाएं, बल्कि बार-बार आएं. यूरोप की कुछ किलाएं लाल किला के मुकाबले बहुत ही छोटे हैं, लेकिन उन्हें बहुत ही बेहतरीन तरीके से विकसित किया गया है. हमलोग भी लाल किला को उसी तर्ज पर विकसित करेंगे और यह दुनिया के सबसे बेहतरीन स्माहरकों में से एक होगा.’ बता दें कि कांट्रैक्टं के तहत डालमिया ग्रुप को तय समयसीमा के अंदर लाल किला में विकास कार्य कराने होंगे.

पर्यटन और संस्कृ ति मंत्रालय से जरूरी मंजूरी मिलने के बाद डालमिया भारत ग्रुप पर्यटकों से शुल्के भी वसूलना शुरू करेगी. कंपनी ने बताया कि लाल किला के अंदर होने वाली गतिविधियों से इकट्ठा राजस्व‍ का ऐति‍हासिक इमारत के रखरखाव और उसके विकास पर ही खर्च करने की योजना है. स्वेतंत्रता दिवस को देखते हुए लाल किला को जुलाई में सुरक्षा एजेंसियों के हवाले करना होगा, ताकि प्रधानमंत्री द्वारा किए जाने वाले झंडारोहण के लिए जरूरी सुरक्षा इंतजाम किए जा सकें. मालूम हो कि पीएम नरेंद्र मोदी इस साल मौजूदा कार्यकाल में आखिरी बार लाल किला के प्राचीर से देश को संबोधित करेंगे.

फिर भाजपा पर भड़के प्रकाश राज, जानिए इस बार की वजह

अभिनेता प्रकाश राज

अभिनेता प्रकाश राज की छवि भारतीय जनता पार्टी के कट्टर आलोचक के रूप में बनती जा रही है. पिछले कुछ समय से प्रकाश राज लगातार भाजपा और उसके नेताओं पर हमलावर रहे हैं. इस बार उन्होंने एक वीडियो जारी कर भाजपा पर निशाना साधा है.

प्रकाश राज ने अपने ट्विटर अकाउंट पर भाजपा के नेता की पत्नी का वीडियो शेयर करते हुए कहा कि “देखिए भाजपा कैंडिडेट की पत्नी मंगलुरु में धर्म के आधार पर लोगों से उनके पति को वोट देने की अपील कर रही है.” प्रकाश राज ने ट्विटर पर वीडियो शेयर करते हुए इसे सांप्रदायिक राजनीति करार दिया है.

कुछ ही दिनों पहले कर्नाटक में होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर प्रकाश ने लोगों से अपील भी की थी कि वो भाजपा को वोट ना दें. प्रकाश राज ने कहा था कि भाजपा देश के लिए बहुत बड़ा खतरा है. प्रकाश राज ने बीजेपी को कैंसर की तरह बताया है. पिछले महीने इंडिया टुडे ग्रुप के ‘कर्नाटक पंचायत’ कार्यक्रम के दौरान भी प्रकाश राज ने कहा था कि भारतीय जनता पार्टी का हिंदुत्व हिन्दुस्तान में नहीं चलेगा.

राजस्थानः हनुमान मंदिर के पुजारी ने किया 7 साल की बच्ची से रेप

अजमेर। राजस्थान के अजमेर में हनुमान मंदिर के एक पुजारी पर 7 वर्षीय बच्ची से बलात्कार करने का आरोप है. पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर लिया है. आरोपी पुजारी ने कथित तौर पर मंदिर में ही बच्ची के साथ घिनौनी करतूत की. टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के मुताबिक, इस वारदात को बुधवार (25 अप्रैल) को अजमेर के कालीछट हनुमान मंदिर में अंजाम दिया गया.

रिपोर्ट्स के मुताबिक, अजमेर के बाहरी इलाके कल्याणीपुरा स्थित कालीछट हनुमान मंदिर के पास पीड़िता परिवार के मवेशियों को इकट्ठा करने गई थी. तभी 48 वर्षीय स्वामी शिवानंद उर्फ बलवंत बच्ची को फुसलाकर मंदिर के भीतर ले गया. वहां पुजारी ने कथित तौर पर बच्ची के साथ बलात्कार किया और बेहोशी की हालत में कमरे में छोड़ दिया. बच्ची को तलाशने आए आए उसके पिता को वह एक खाली कमरे में मिली. होश में आने के बाद बच्ची ने सारी आपबीती अपने माता-पिता से कही. इसके बाद पुलिस को सूचना दी गई, जिस पर पुलिस ने पुजारी को गिरफ्तार कर लिया है.

Times Now Opinion poll में मध्यप्रदेश से BSP के लिए अच्छी खबर

0

नई दिल्ली। मध्य प्रदेश में इस साल होने जा रहे चुनाव में भाजपा को सीटों के मामले में झटका लग सकता है, तो वहीं बहुजन समाज पार्टी को बड़ा फायदा हो सकता है. ये दावा टाइम्स नाउ के एक ओपिनियन पोल में किया गया है. इस ओपिनियन पोल के मुताबिक बीजेपी को पिछली बार के मुकाबले 12 सीटें कम मिलने का अनुमान है. तो वहीं सर्वे के मुताबिक कांग्रेस को इस बार 7 सीटों का फायदा होगा.

ओपिनियन पोल में मध्य प्रदेश विधानसभा की 230 सीटों में से भाजपा को 153 सीटें मिलने की बात कही गई है. यानि ओपीनियन पोल के मुताबिक प्रदेश में भाजपा सरकार बना सकती है. टाइम्स नाउ ने यह सर्वे 15 मार्च से 20 अप्रैल के बीच किया है. इस दौरान राज्य की 230 विधानसभा सीटों पर 42 हजार 550 मतदाताओं से उनकी राय पूछी गई.

इस ओपीनियन पोल में सबसे बड़ी खबर बहुजन समाज पार्टी के लिए है. सर्वे में बसपा की सीटें तीन गुना बढ़ने की बात कही गई है. सर्वे के मुताबिक पिछले चुनाव में 4 सीटें जीतने वाली बसपा इस बार अपना आंकड़ा 12 तक ले जा सकती है. इस लिहाज से बसपा को 8 सीटों का लाभ होता दिख रहा है. हालांकि गठबंधन कर चुनाव लड़ने की स्थिति में बसपा के लिए स्थिति और बेहतर हो सकती है.

जिस तरह से पार्टी विधानसभा चुनावों में नई रणनीति के तहत आगे बढ़ रही है, अगर मध्य प्रदेश में भी बसपा ने वही रणनीति अपनाई तो स्थिति दूसरी होगी. बसपा कर्नाटक और हरियाणा में गठबंधन कर चुनाव लड़ रही है. यूपी में भी समाजवादी पार्टी के साथ बसपा का समझौता हुआ है. ऐसे में अगर पार्टी मध्यप्रदेश में भी गठबंधन की राह चलती है तो 12 सीटों का आंकड़ा बढ़ सकता है जबकि भाजपा को नुकसान पहुंच सकता है.

बसपा के मध्यप्रदेश का प्रभार राज्यसभा सांसद अशोक सिद्धार्थ के पास है. सिद्धार्थ कर्नाटक के भी प्रभारी हैं, जहां बसपा-जेडीएस गठबंधन भाजपा और कांग्रेस को कड़ी टक्कर दे रही है. संभव है कि कर्नाटक के चुनावी नतीजों के बाद अशोक सिद्धार्थ की रिपोर्ट पर बसपा प्रमुख मायावती मध्य प्रदेश पर भी फैसला लें.

जातिवाद दूर करने के लिए अनोखी पहल

सामूहिक विवाह के दौरान का दृश्य. फोटोः NBT

पालनपुर। समाज में हर रोज जातिगत भेदभाव की खबरें आती रहती हैं. ऐसे में जाति तोड़ने की कोशिश करने या जातिगत भेदभाव खत्म करने की दिशा में उठाया गया एक छोटा सा कदम भी समाज के बीच साकारात्मक संदेश दे जाता है. गुजरात के बनासकाठा जिले से ऐसी ही एक खबर आई है. यहां के अमूर्त देसाई ने अपनी बेटी की शादी के दौरान एक ऐसा फैसला लिया, जिसने समाज को जोड़ने का काम किया है.

दरअसल देसाई अपनी बेटी की शादी कर रहे थे. इस दौरान उन्हें दलित समाज की गरीब बच्चियों का विवाद करने का भी ख्याल आया. देसाई चाहते थे कि बेटी के साथ ही मंडप में एक साथ दलित समाज की लड़कियों की भी शादी हो, ताकि समाज को एक संदेश दिया जा सके. देसाई ने पहले अपनी बेटी से और फिर बेटी के ससुराल वालों से इसकी स्वीकृति ली. फिर गांव वालों से भी इस संबंध में चर्चा की. सभी लोगों ने न सिर्फ इसको लेकर हामी भर दी बल्कि इस पूरे कार्यक्रम में बढ़-चढ़ कर सहयोग करने को भी तैयार हो गए.

इसके बाद करीब 3 हजार लोगों की मौजूदगी में पालनपुर के पाटन हाउस में 26 अप्रैल को यह सामूहिक विवाह संपन्न हुआ. विवाह का सारा खर्च अमूर्त देसाई ने उठाया. देसाई ने भेंट स्वरूप सभी को घर के उपयोग में आने वाला सामान भी दिया.

  • सूचनाएं नवभारत टाइम्स से भी

यूपी में एक बार फिर भाजपा VS सपा-बसपा

लखनऊ। गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा उपचुनाव के बाद उत्तर प्रदेश में भाजपा और सपा-बसपा गठबंधन एक बार फिर से आमने-सामने है. कैराना लोकसभा उपचुनाव के लिए चुनाव आयोग द्वारा तारीख तय कर दिए जाने के बाद हलचल तेज हो गई है. 2014 के लोकसभा चुनाव में कैराना संसदीय सीट से बीजेपी के हुकुम सिंह ने जीत दर्ज की थी. इसी साल 3 फरवरी को उनका निधन हो जाने के चलते यहां उपचुनाव हो रहा है. इस सीट पर 28 मई को मतदान और 31 मई को मतगणना होगी.

चुनाव के तारीख की घोषणा होते ही भाजपा और सपा-बसपा सक्रिय हो गए हैं. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उप-मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य इस सीट को जीतकर अपनी-अपनी सीटों पर मिली हार का हिसाब चुकता करना चाहते हैं. वहीं अखिलेश यादव और बसपा प्रमुख मायावती अपनी जीत के सिलसिले को कैराना में भी हर हाल में बरकरार रखना चाहेंगी.

खबर है कि भाजपा इस सीट से हुकुम सिंह की बेटी मृगांका सिंह को चुनाव मैदान में उतार सकती है. मृगांका को पिता की मौत की वजह से सहानुभूति वोट मिल सकता है. हालांकि, मृगांका विधानसभा चुनाव में किस्मत आजमा चुकी हैं लेकिन वह सपा के नाहिद हसन से हार गई थीं.

कैराना लोकसभा सीट के तहत पांच विधानसभा सीटें आती हैं. इनमें से चार भाजपा के पास जबकि और कैराना विधानसभा सीट सपा के पास है. इस तरह देखा जाए तो यहां भाजपा के मुकाबले में कोई पार्टी नहीं है. लेकिन सपा-बसपा गठबंधन ने लड़ाई को दिलचस्प बना दिया है. और सपा और बसपा के कार्यकर्ताओं को लगता है कि जब वह गोरखपुर जैसे भाजपा के गढ़ को जीत सकते हैं तो फिर कैराना जितना भी मुश्किल नहीं होगा.

1962 में वजूद में आने के बाद से अब तक इस सीट पर 14 बार चुनाव हो चुके हैं. हालांकि यह सीट किसी एक दल का गढ़ कभी नहीं बन पाया. इस सीट पर 1996 में सपा तो 2009 में बसपा जीत दर्ज कर चुकी है. कैराना लोकसभा सीट पर 17 लाख मतदाता हैं जिनमें पांच लाख मुस्लिम, चार लाख बैकवर्ड (जाट, गुर्जर, सैनी, कश्यप, प्रजापति और अन्य शामिल) और डेढ़ लाख वोट जाटव दलित है और 1 लाख के करीब गैरजाटव दलित मतदाता हैं.

जहां तक 2014 लोकसभा चुनाव में प्रदर्शन की बात है तो इसमें भाजपा को 5 लाख 65 हजार 909 वोट मिले थे, जबकि सपा को 3 लाख 29 हजार 81 वोट और बसपा को 1 लाख 60 हजार 414 वोट मिले थे. ऐसे में अगर सपा-बसपा के वोट जोड़ लिए जाएं तो भी बीजेपी आगे है. लेकिन 2014 और 2018 की कहानी अलग है.

तब मतदाताओं की मोदी और भाजपा के पक्ष में एकतरफा गोलबंदी थी. लेकिन चार सालों में मतदाताओं का भाजपा और मोदी को लेकर मोहभंग हुआ है तो यूपी में योगी भी कोई कमाल नहीं दिखा सके हैं. ऐसे में अगर सपा-बसपा गठबंधन ने गोरखपुर औऱ फूलपुर वाले परिणाम को दोहरा दिया तो यह यूपी में भाजपा के ताबूत की आखिरी कील साबित हो सकती है.

कर्नाटक चुनावः राहुल गांधी ने जारी किया कांग्रेस का घोषणापत्र

congress manifesto for Karnataka

बंगलुरू। कर्नाटक चुनाव को लेकर सरगर्मी तेज हो गई है. पिछले दिनों नरेन्द्र मोदी ने सभी भाजपा उम्मीदवारों से वीडियो कांफ्रेंसिंग कर उन्हें जीत का मंत्र दिया था. तो वहीं अब कांग्रेस पार्टी ने अपना घोषणापत्र (मैनिफेस्टो) जारी कर दिया है. इसके जरिए राहुल गांधी ने कांग्रेस का प्लान सामने रख दिया है.

पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी ने मैंगलोर में पार्टी मैनिफेस्टो जारी करते हुए कहा कि यह जनता से पूछकर बनाया गया मैनिफेस्टो है. उन्होंने कहा कि ‘यह घोषणा-पत्र बंद कमरे से नहीं बनाया गया है, बल्कि प्रदेश के लोगों से पूछकर तैयार किया गया है. हमने जनता को ये नहीं कहा कि हम क्या करेंगे, हमने उनसे पूछा कि आप क्या चाहते हैं.’

इस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तंज कसते हुए राहुल ने कहा, ‘पीएम मोदी अपने मन की बात करते हैं. लेकिन हमारे इस घोषणापत्र में कर्नाटक की जनता के मन की बात है.’ बता दें कि कर्नाटक विधानसभा चुनाव में अब बहुत ही कम वक्त बचा है. जिसके मद्देनजर प्रमुख पार्टियां अपने अंतिम दांव खेल रही हैं. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी 1 मई से कर्नाटक चुनाव प्रचार के लिए उतरने वाले हैं.

बलात्कार पर सजा-ए-मौत का कानून काफी नहीं है

कठुवा और उन्नामव में हुए गैंग रेप और उस पर देश भर की जनता के आक्रोश का असर यह पड़ा की केंद्र सरकार ने त्वरित कदम उठाते हुए 24 घंटे के भीतर ही रेप पर मौत की सजा के अध्यादेश को मंजूरी दे दी. सवाल यह है कि क्या कानून बन जाने से बलात्कार की घटनाओं में कमी आ जाएगी? एनसीआरबी के मुताबिक भारत में महिलाओं के साथ बलात्कार के कुल 34651 मामले दर्ज हुए. इनमें से सबसे ज्यादा बलात्कार के मामले मध्यप्रदेश (4391) में दर्ज हुए हैं. इसके बाद महाराष्ट्र (4144), राजस्थान (3644) और फिर उत्तरप्रदेश (3025) का स्थान आता है. ओडिशा में बलात्कार के 2251 मामले दर्ज हुए हैं.

राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) द्वारा वर्ष 2015 के लिए जारी आंकड़ों के मुताबिक, बेंगलुरु में यौन अपराध से बच्चों की सुरक्षा अधिनियम (पोकसो) के अंतर्गत किसी अन्य शहर की तुलना में सर्वाधिक मामले दर्ज हुए. वर्ष 2015 में 273 मामले दर्ज किए गए थे. वर्ष 2015 में अपराध वर्ष 2014 की अपेक्षा 23% बढ़ गए हैं. प्रकृति ने महिला और पुरुष में यौन संबंध जैसा एक अलौकिक रिश्ताल मुहैया कराया है, जिसके लिए प्रकृति का ऋणी होना चाहिए. लेकिन मनुष्य ने इसके उलट जानवरों को पीछे छोड़ते हुए यौन संबंध को बलात्कार के रूप में बदल दिया. यौन संबंध और बलात्काबर में कुछ मूलभूत अंतर हैं. जैसे एक में प्या2र है तो दूसरे में नफरत. एक में समर्पण है तो दूसरे में लूट. एक सम्माजन है तो दूसरे में घृणा और ज्यादती.

आइए आगे की चर्चा से पहले जानते हैं कि बलात्कार दरअसल है क्या?

अक्सर यह माना जाता है कि सेक्स से पीड़ित व्यक्ति बलात्कार करता है, जबकि सच्चाई यह है कि बलात्कार का सेक्स से कोई संबंध है ही नहीं. यह बलात्कारी व्यक्ति के बीमार मानसिकता की पहचान है. किसी महिला के साथ बलात्कार करने की कुछ खास मायने होते हैं जैसे-

1. उस महिला को जलील करना. 2. किसी जाति या समुदाय को नीचा दिखाना है तो उनकी महिलाओं के साथ बलात्कार करना नीचा दिखाने का सबसे        अच्छा उपाय माना जाता है. 3. भारत में बलात्कार को एक जीत की तरह देखा जाता है. एक इनाम की तरह देखा जाता है. इसलिए जब कोई बीमार     मानसिकता वाला व्यक्ति किसी महिला को या किसी लड़की को या किसी बुजुर्ग महिला को अकेला देखता है तो उसे      लगता है की उसके लिए एक इनाम है और उसे उसे पाने के लिए या अपना अधिकार जताने के लिए सबसे अच्छा          तरीका होता है उसके साथ यौन संबंध बनाना. चाहे उसकी रजामंदी हो या ना हो. 4. बलात्कार कमजोर को और कमजोर किए जाने वाली प्रक्रिया है. आप देखिए जितने भी बलात्कार हुए हैं, वह वंचित        वर्ग या अल्पसंख्यक वर्ग के साथ ही होते हैं.

बलात्कार एक सामाजिक समस्या है या धार्मिक समस्या बहुत सारे लोग यह मानते हैं कि बलात्कार एक सामाजिक समस्या है, जबकि कम से कम भारत के लिए यह पूरा सच नहीं है. यदि आप बलात्कार को सामाजिक समस्या मान कर चलते हैं तो आप इसका इलाज कभी भी नहीं कर पाएंगे, चाहे आप कितने कानून बना लीजिए. चाहे आप कितने भी सोशल अवेयरनेस की मुहिम चला लीजिए, इस समस्या से आप निजात नहीं पा सकते. मैं इसे समझाने के लिए आपको छोटा सा उदाहरण देता हूं.

पिछले दिनों आपने देखा है की आसाराम के ऊपर बलात्कार का आरोप है वह भी छोटी-छोटी बच्चियों से. उसके जेल में बंद रहने के दौरान इस केस के 9 गवाहों पर जान लेवा हमला तथा 3 गवाहों को मार दिया गया. बावजूद इसके आप देख सकते हैं कि बड़ी संख्या में महिलाएं और पुरुष आसाराम के पक्ष में खड़े हुए हैं. उन्हें अपना तन मन धन देने के लिए तैयार हैं. इसी प्रकार आप राम रहीम के बारे में भी देख सकते हैं कि बलात्कार जैसा संगीन आरोप होने के बावजूद बड़ी संख्या में महिलाएं उनके पक्ष में खड़ी है. उन्हें इन बाबाओं के ऊपर लगे रेप के आरोप, आरोप की तरह नहीं बल्कि किसी उपाधि की तरह लगते हैं.

अब प्रश्न उठता है कि ऐसा क्यों होता है? दरअसल भारत का धार्मिक ताना-बाना इस प्रकार बना हुआ है भारत के बहुत सारे जो धार्मिक नायक हैं. उनके ऊपर बलात्कार का आरोप है. पौराणिक नायिकाओं में रानी वृंदा हो या अहिल्या इन बलात्कार पीड़ित महिलाओं को धार्मिक ग्रंथों ने निरीह प्राणी बना दिया और बलात्कारियों को देवता. इसीलिए तो बलात्काारियों को बचाने वाली महिलाएं कहती हैं कि भगवान ने भी तो वृंदा के साथ बलात्कार किया था तो वह तो हमारे देवता हैं, फिर बाबा हमारे अपराधिक कैसे हुए?

कोर्ट से बलात्कारी साबित होने के बावजूद भारत में किसी भी व्यक्ति को सामाजिक रुप से अपराधी होने का बोध नहीं हो पाता है क्योंकि समाज में उसे एक विजेता के रूप में समझा जाता है. वहीं दूसरी ओर उस महिला को या उसके समुदाय को नीचे या बेइज्जत समझा जाता है. चाहे कानून कितना भी बन जाए लेकिन इस मानसिकता को बदले बिना समाज में सुधार की संभावना नहीं है.

इस विधेयक के पास होने के पहले भी IPC की धारा 376 में बलात्कार पर 7 साल की सजा का प्रावधान है. इस प्रावधान के बावजूद बलात्कार के प्रकरणों में कोई कमी नहीं आई है. मौत की सजा इस नए कानून में तय की गई है इससे भी लोगों में सुधार की कोई गुंजाइश नहीं है क्योंकि हमने अब तक इस समस्या के जड़ को नहीं पकड़ा है. इन घटनाओं के पीछे दूसरा एक सबसे बड़ा कारण भारत में बढ़ती सांप्रदायिक नफरत है.

कुछ राजनीतिक साजिशों के कारण अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने के लिए चंद लोग युवाओं में सांप्रदायिक नफरत का बीज बो रहे हैं. उसका असर यह हो रहा है कि ऐसे जातिगत एवं सांप्रदायिक हत्याएं और बलात्कारों को बढ़ावा मिल रहा है. चाहे राजस्थान में एक दलित युवक शंभू रैगर के द्वारा दूसरे दलित मुसलमान की हत्या का मामला हो और उसके बाद एक खास विचारधारा और जातियों के द्वारा इस हत्या को बढ़ावा देने का मामला हो. ठीक उसी प्रकार कठुआ में आसिफा के साथ बलात्कार और बलात्कारियों को बचाने के लिए जय श्रीराम तथा भारत माता की जय लगाने वाले खास तबके का मामला हो. इन दोनों मामले को यदि आप गौर से देखें तो यह मामला सामाजिक कम धार्मिक समस्या से ज्यालदा ग्रसित दिखाई पड़ता है.

यानि जिस महिला का नायक कोई बलात्कारी होगा वह भला कैसे अपने बलात्कारी भाई का बहिष्कार कर पाएगी? बलात्कारी धार्मिक गुरु का तिरस्कार कर पाएगी? जब धर्म की किताबों में बलात्कारियों को महान बताया जायेगा तो उस धर्म के मानने वाले आखिर कैसे एक बलात्कारी को अपराधी मान सकते हैं? या उनका अनुकरण करने से बच सकते हैं. यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है इसका जवाब हमें ढूंढना होगा तभी इसका इलाज संभव हो सकेगा.

भारत में बलात्कार की घटनाएं सिर्फ सेक्स के लिए नहीं होती है इन घटनाओं के पीछे मैंने चार मकसद आपको गिनाए हैं. आंकड़े बताते हैं कि दामिनी से लेकर आसिफा तक ज्यादातर बलात्कार पिछड़े वर्ग, दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यकों की महिलाओं के साथ हो रहे हैं. इसका इलाज तभी संभव है जब हम गलत को गलत और सही को सही कह सके चाहे वह धार्मिक नायक हो या धर्म गुरू. धर्म उसे नायक और कानून उसे अपराधी माने इस पहेली को सुलझाना होगा.

  • संजीव खुदशाह sanjeevkhudshah@gmail.com

RSS पर फिल्म का रास्ता साफ, भागवत की हरी झंडी

नई दिल्ली। हिन्दुवादी संस्था राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) पर फिल्म बनने का रास्ता साफ हो गया है. फिल्म की स्क्रिप्ट पढ़ने के बाद आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने फिल्म को हरी झंडी दे दी है. फिल्म में आरएसएस का पूरा इतिहास दिखाया जाएगा. फिल्म को मुंबई के प्रोड्यूसर राज सिंह के साथ मिलकर भाजपा कार्यकर्ता तुलसीराम नायडू को-प्रोड्यूस करेंगे, जिन्हें कन्नड़ सिनेमा की दुनिया में लहरी वेलु के नाम से जाना जाता है. फिल्म हिंदी, तेलगु समेत चार अन्य भाषाओं में रिलिज होगी.

इस फिल्म की स्क्रिप्ट फिल्म ‘बाहुबली’ के दोनों पार्ट्स की स्क्रिप्ट लिख चुके के.वी.वी. विजयेंद्र प्रसाद द्वारा लिखी गई है. बताया जा रहा है कि इस फिल्म को अगले साल होने वाले आम चुनावों से पहले रिलीज किया जा सकता है. रिपोर्ट के अनुसार, लहरी वेलु ने बताया कि उन्होंने इस फिल्म की सहमती के लिए दो साल पहले संघ प्रमुख से संपर्क किया था जिन्हें यह आइडिया काफी पसंद आया. यह फिल्म 180 करोड़ रुपए के बजट में बनाई जाएगी. इस फिल्म की कास्ट के लिए बॉलीवुड से लेकर साउथ की फिल्मों के कलाकारों से संपर्क किया जा रहा है.

जज की नियुक्ति के खिलाफ आएं सुप्रीम कोर्ट के 100 वकील

नई दिल्ली। केंद्र सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की सिफारिश के बावजूद जस्टिस के एम जोसेफ का नाम लौटा देने और इंदु मल्होत्रा को सुप्रीम कोर्ट में जज बनाए जाने के बाद मामला बिगड़ गया है. इसका विरोध करते हुए सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन से जुड़े करीब 100 वकीलों इसके खिलाफ उतर गए हैं. इन सभी वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट में अर्जी देकर तुरंत इस मामले पर सुनवाई करने और इंदु मल्होत्रा की नियुक्ति पर रोक लगाने की मांग की है. हालांकि सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने इस पर रोक लगाने से इंकार कर दिया है.

पूर्व सॉलिसिटर जनरल इंदिरा जय सिंह ने इस मामले की पैरवी सुप्रीम कोर्ट में की. मामले में पैरवी करते हुए इंदिरा जय सिंह ने कहा कि उनका मकसद इंदु मल्होत्रा की नियुक्ति को रोकना या टालना नहीं है बल्कि जस्टिस जोसेफ के मामले में केंद्र सरकार के कदम से न्यायपालिका को बांटने की कोशिश से रोकना है. हालांकि चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अदालत ने इस पर रोक लगाने से इनकार कर दिया. इससे पहले कानून मंत्रालय द्वारा सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस को लिखी चिट्ठी में कहा गया है कि जस्टिस जोसेफ को प्रोन्नति देने का यह सही समय नहीं है.

उल्लेखनीय है कि इस साल की शुरुआत में 10 जनवरी को पांच जजों की कॉलेजियम ने उत्तराखंड हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस के. एम. जोसेफ और सुप्रीम कोर्ट की सीनियर एडवोकेट इंदु मल्होत्रा को सुप्रीम कोर्ट में जज बनाने के लिए सिफारिश की थी. इसके बाद कानून मंत्रालय ने प्रक्रिया शुरू की और सिर्फ इंदु मल्होत्रा की फाइल की आईबी जांच पूरी करवाई. केंद्र ने कॉलेजियम को जस्टिस जोसेफ के नाम पर दोबारा विचार करने का अनुरोध करते हुए फाइल फिर से सुप्रीम कोर्ट भेज दी.

बीमार पिता से मिले तेजस्वी, बताया कैसे हैं लालू

Tejashwi Yadavनई दिल्ली। राजद के राष्ट्रीय अध्यक्ष लालू यादव के छोटे बेटे और बिहार में विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव गुरुवार (26 अप्रैल) को अपने पिता से मिलने पहुंचे. नई दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में भर्ती पिता से तेजस्वी की मुलाकात एक महीने बाद हुई है. इससे पहले दोनों पिता-पुत्र के बीच पिछले महीने 18 मार्च को रांची के रिम्स अस्पताल में मुलाकात हुई थी.

पिता से मिलने के बाद तेजस्वी ने सोशल मीडिया पर लालू यादव की तबीयत को लेकर चिंता जाहिर की है. उन्होंने लिखा है, “लंबे समय बाद पिताजी से चंद मिनटों के लिए एम्स में मुलाकात हुई. उनके स्वास्थ्य को लेकर चिंतित हूं. बहुत ज्यादा सुधार नहीं दिख रहा है. इस उम्र में उन्हें लगातार देखभाल और उनके संवेदनशील एनं महत्वपूर्ण शारीरिक अंगों की निगरानी जरूरी है.” हालांकि उन्होंने देश के बड़े अस्पताल में इलाज को लेकर संतुष्टि जाहिर की.

गौरतलब है कि लालू यादव चारा घोटाले के तीन मामलों में सजा सुनाए जाने के बाद से रांची की बिरसा मुंडा जेल में सजा काट रहे थे. इस बीच तबीयत खराब होने पर पहले उन्हें रांची के रिम्स और फिर बाद में एम्स अस्पताल में भर्ती कराया गया. उन्हें किडनी में इन्फेक्शन है. इसके अलावा वो हार्ट, शूगर और ब्लड प्रेशर के भी मरीज हैं. पिछले महीने 28 मार्च को लालू यादव को ट्रेन से रांची से दिल्ली लाया गया था और एम्स में भर्ती कराया गया था.

दलित के इस्लाम अपनाने पर बजरंग दल वालों ने की मारपीट

0
फाइल फोटो

लखनऊ। उत्तर प्रदेश के शामली जिले से एक दलित व्यक्ति द्वारा धर्मांतरण करने के बाद उससे मारपीट की खबर है. युवक का नाम प्रमोद कुमार है और वो वेल्डिंग का काम करता है. कुछ दिनों पहले प्रमोद ने इस्लाम कबूल कर लिया था. यह खबर मिलते ही बजरंग दल के लोग उसके पीछे पर गए थे. इस बीच पवन के साथ मारपीट की भी खबर है.

इसको लेकर एक वीडियो सामने आया था जिसमें बजरंग दल के लोग पवन के साथ मारपीट कर रहे थे. एक शख्स ने पवन के सर पर हाथ मारकर उसकी टोपी गिरा दी थी. उसके बाद ही पवन ने दुबारा हिन्दू धर्म अपनाने की खबर आई. बजरंग दल के पदाधिकारी का कहना है कि उन्होंने पवन को समझाया-बुझाया, जिसके बाद वह दोबारा हिन्दू बनने के लिए तैयार हो गया. जबकि कुछ लोगों का कहना है कि पवन को धमका कर हिन्दू धर्म में वापसी करवाई गई है.

इस बारे में पुलिस का कहना है कि पवन ने मारपीट को लेकर शिकायत दर्ज कराने से इनकार कर दिया है. हालांकि पुलिस पूरे मामले पर नजर बनाए हुए है. दरअसल पवन के तीन हफ्ते पहले इस्लाम अपनाने की खबर मिली. इसके बाद वह टोपी पहनने लगा और उसने दाढ़ी भी बढ़ा ली. जबकि पवन ने पुलिस को दिए बयान में कहा है कि उसने तो मुस्लिम कैप पहनना और दाढ़ी बढ़ाना इसलिए शुरू किया, क्योंकि उसे ऐसा करना अच्छा लगता था. पुलिस का कहना है कि अगर पवन को शिकायत दर्ज कराने को लेकर डर है तो पुलिस टीम उससे दोबारा बात करेगी.

दलित के घर भाजपा का रसोईया

सीएम योगी के लिए रोटी बनाती स्वाति सिंह, चूल्हा भी ईंटों से जोड़कर अलग बनाया गया है

90 के दशक में दलितों का वोट हासिल करना सबसे आसान था. गांव के दबंग के लोग दलितों के मुहल्ले में जाकर पोलिंग बूथ तक उनके पहुंचने का रास्ता बंद कर देते थे. इस तरह कोई दलित वोट देने नहीं जा पाता था और उनके नाम के वोट कोई और डाल देता था. वक्त बदला और दलितों को वोट देने से रोक पाना मुश्किल होता गया. तब नेता दलितों के मुहल्लों में जाने लगें, उनसे हाथ जोड़कर वोट मांगने लगें.

दलित थोड़े और संबल हो गए तो अब वही नेता दलितों का वोट हासिल करने के लिए उनके घर अपनी चारपाई लगाने और खाने लगे हैं. वो दलितों के घर जाकर खा रहे हैं. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उनके मंत्री इन दिनों ग्राम स्वराज अभियान चला रहे हैं. इसके तहत वो उत्तर प्रदेश के जिलों में घूम रहे हैं और दलितों के घर खाना खा रहे हैं. ऐसा कर वह उन्हें ‘उपकृत’ कर रहे हैं या फिर ‘हैसियत’ दिखा रहे हैं, यह बहस का मुद्दा है.

लेकिन गांव में रात्रि विश्राम और दलितों के घर भोज की कलई खुल गई है. जो बात सामने आई है, उसके मुताबिक घर तो दलित का है, लेकिन खाने का बर्तन और खाना कहीं और से आ रहा है. या फिर दलितों के चूल्हे में घुसकर भाजपा की महिला नेता खुद रोटियां सेक रही हैं. सीएम योगी ने 23 अप्रैल को प्रतापगढ़ के मधुपुर गांव में दयाराम सरोज के घर खाना खाया. इसको खूब प्रचारित किया गया. लेकिन इसी खाने के दौरान योगी की मंत्री स्वाति सिंह द्वारा रोटी सेकने की घटना ने मोदी सरकार और भाजपा के समरसता की कलई खोलकर रख दी है. ठाकुर बिरादरी की स्वाति सिंह ने दयाराम सरोज के रसोई में बैठकर योगी आदित्यनाथ के लिए रोटी बनाई थी. स्वाति जिस चूल्हे पर रोटी बना रही हैं, उसपर भी ध्यान देना जरूरी है. वह घर का चूल्हा नहीं बल्कि अलग से ईंटों को जोड़कर बनाया गया चूल्हा है.

भाजपा नेताओं का दलितों के घर खाने की इससे पहले भी आई कई तस्वीरें सवाल उठाती रही है. इन तस्वीरों में अक्सर बोतलबंद पानी दिख जाता है, तो वहीं दस लोगों के लिए एक से बर्तन उपलब्ध होते हैं. एक सामान्य दलित परिवार में ऐसा नहीं होता है. जो तस्वीरे मीडिया के सामने परोसी जाती है या फिर जो तस्वीरे मीडिया लोगों के सामने परोसता है, उसमें कद्दावर नेताओं के बीच बैठे हुए दलित परिवार के मुखिया का डर उसके चेहरे पर दिखता है.

देश के तकरीबन 85 फीसदी दलितों की आय 5000 रुपये महीने से भी कम है, ऐसे में एक सामान्य दलित परिवार में नेताओं के भोज का खर्चा उठाने की कुव्वत कम ही है. राजनीति के इस दौर में दलित आज भी मोहरा बने हुए हैं, जिसे सब अपने हिसाब से नचाने की कोशिश में जुटे हैं. असल में भाजपा जो भोज कर रही है, उसमें घर सिर्फ दलित का है, खाना तो खुद उन्हीं का है. अब इसमें रसोईये का भी जुड़ जाना दलितों के प्रति भाजपाईयों के घृणा को साफ कर देता है.

जानिए, आसाराम के दरबार में कौन-कौन भाजपा नेता देते थे जाहिरी

नई दिल्ली। आसाराम को अदालत ने बलात्कार के आरोप में उम्रकैद की सजा सुना दी है. अदालत में सुनवाई के दौरान आसाराम की ओर से 14 वकीलों की फौज थी तो पीड़िता की ओर से मजह दो वकील. बावजूद इसके वकीलों की फौज आसाराम को बचा न सकी और देश का कानून सच्चाई और कमजोर के पक्ष में खड़ा होकर जीत गया.

आज आसाराम भले ही असहाय जेल में बंद हो, एक वक्त ऐसा था जब देश के प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक बलात्कारी बाबा के दरबार में हाजिरी लगाने पहुंचते थे. इसमें सबसे ज्यादा भाजपा के नेता थे. आइए जानते हैं, आसाराम की अदालत में कौन-कौन नेता हाजिरी लगाने पहुंचा था.

आसाराम के आश्रम पहुंचने वाले नेताओं में वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम शामिल है. मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे तो अक्सर आसाराम के कार्यक्रमों में हाजिरी लगाते थे. बलात्कारी बाबा का सानिध्य हासिल करने के लिए भाजपा के शिखर पुरुष एवं देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी भी जाते थे. वह आसाराम के कई कार्यक्रमों में शामिल हुए हैं.

आडवाणी और आसाराम एक साथ

वाजपेयी के अलावा पूर्व डिप्टीज पीएम लालकृष्णल आडवाणी को भी बलात्काररी बाबा के प्रवचनों में देखा जाता रहा था. तो गृहमंत्री राजनाथ सिंह भी आसाराम के कई कार्यक्रमों में भाग लेते थे. हाल ही में मध्य प्रदेश में बाबाओं को राज्यमंत्री का दर्जा देने वाले प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी आसाराम के कार्यक्रम में आशीर्वाद लेने जा चुके हैं. तो मध्ययप्रदेश के पड़ोसी राज्य छत्तीेसगढ़ की राजधानी रायपुर में जब आसाराम एक कार्यक्रम में पहुंचे थे तो इस दौरान राज्यद के सीएम रमन सिंह उनका आशीर्वाद लेने पहुंचे थे.

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान

राजस्थांन की सीएम वसुंधरा राजे भी आशीर्वाद लेने में पीछे नहीं थीं. वसुंधरा के अलावा बीजेपी के दिग्ग ज नेता मुरली मनोहर जोशी भी आसाराम के प्रवचनों में जाते रहते थे. आसाराम पर आरोप लगने के बाद उनके बीजेपी नेताओं के करीबी होने पर विवाद शुरू हुआ था, उस समय भी अटल बिहारी वाजपेयी और आसाराम के संबंधों पर सवाल उठे थे. लेकिन तब पार्टी ने चुप्पी साध ली थी.

… तब आसाराम ने कहा था मोदी भस्म हो जाएगा

0

 नई दिल्ली। आध्यात्मिक गुरु आसाराम को नाबालिग से रेप मामले में जोधपुर की अदालत ने दोषी करार दे दिया है. चाय बेचने वाले से लेकर आध्यात्मिक गुरु बनने तक आसाराम का जीवन काफी दिलचस्प रह है. असल में आसाराम का असली नाम असुमल थाउमल हरपलानी है. उसका परिवार मूलतः सिंध, पाकिस्तान के जाम नवाज अली तहसील का रहनेवाला था, लेकिन भारत-पाकिस्तान बंटवारे के बाद उसका परिवार अहमदाबाद में आकर बस गया था.

आसाराम के परिवार के बारे में जो सूचना है, उसके मुताबिक आसाराम के पिता लकड़ी और कोयले के कारोबारी थे. आसाराम को पढ़ने में मन नहीं लगता था. किसी तरह उसने तीसरी क्लास तक ही पढ़ाई की. पिता के निधन के बाद उसने कभी टांगा चलाया तो कभी चाय बेचने का काम तक किया. 15 साल की उम्र में आसाराम ने घर छोड़ दिया और गुजरात के भरुच स्थित एक आश्रम में आ गया. यहां आध्यात्मिक गुरु लीलाशाह की सेवा करने लगा. यहीं रहते हुए उसने साधना भी की. बाद में इन्हीं से दीक्षा ली. दीक्षा के बाद लीलाशाह ने ही असुमल थाउमल हरपलानी का नाम आसाराम बापू रखा था.

1973 में आसाराम ने अपने पहले आश्रम और ट्रस्ट की स्थापना अहमदाबाद के मोटेरा गांव में की. इसके बाद वक्त बीतने के साथ आसाराम का साम्राज्य बढ़ता चला गया. 1973 से 2001 तक उसने कई गुरुकुल, महिला केंद्र बनाए. इसी दौरान आसाराम के आश्रम में भक्तों की बढ़ती हुई भीड़ के कारण राजनीति में भी उसकी साख बढ़ती गई. नेताओं को लोगों के वोट चाहिए थे और आसाराम के पास लोग थे, जो उसकी सारी बातें मानते थे.

1997 से 2008 के बीच उस पर रेप, जमीन हड़पने, हत्या जैसे कई आरोप लगते गए. 2008 में जब एक बच्चे की मौत आसाराम के स्कूल में हुई तो उस पर तांत्रिक क्रियाओं को लेकर हत्या करने के आरोप लगे. इसके बाद तत्कालीन मोदी सरकार ने आसाराम के ऊपर जांच बैठाई. तब आसाराम ने कहा था कि मोदी भस्म हो जाएगा. अगस्त 2013 में एक नाबालिग ने आसाराम पर रेप का आरोप लगाया. घटना जोधपुर के आश्रम की बताई गई. इस केस की एफआईआर दिल्ली में दर्ज कराई गई. जोधपुर पुलिस ने 1 सितंबर को 2013 को आसाराम को अरेस्ट कर ही लिया. आसाराम के खिलाफ धारा 342, 376, 506 और 509 के तहत केस दर्ज हैं. इसके अलावा पॉक्सो एक्ट भी लगा. इसी मामले में अदालत ने आसाराम को उम्र कैद की सजा सुनाई है.