सुप्रीम कोर्ट ने दिखाया पीएम मोदी को आईना

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नई दिल्ली। आम जनता की सुविधा से जुड़े एक मामले में देश की सर्वोच्च न्यायालय ने प्रधानमंत्री मोदी को आईना दिखाया है. पलवल से कुंडली के बीच ईस्टन एक्सप्रेस वे के शुरू ना होने पर नाराज सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इसकी शुरुआत के लिए PMO की हरी झंडी का इंतजार क्यों? सुप्रीम कोर्ट ने NHAI को कहा कि इस महीने के अंत तक यानी 31 मई तक शुभारंभ नहीं भी होता तो 1 जून से जनता के लिए इसे खोला जाए.

असल में प्रधानमंत्री मोदी को इस एक्सप्रेस वे का उदघाटन 29 अप्रैल को करना था लेकिन पीएम के पास समय न होने के कारण इस कार्यक्रम को स्थगित कर दिया था. तब से लगातार इसके उदघाटन का मामला अटका हुआ है. इस पर संज्ञान लेते हुए कोर्ट ने कहा कि ईस्टन एक्सप्रेस वे को शुरू करने के लिए PM से शुभारंभ करने का इंतजार क्यों हो रहा है? इसे जनता के लिए शुरू किया जाए. जस्टिस मदन बी लोकुर और जस्टिस दीपक गुप्ता की बेंच ने कहा कि हमें भरोसा दिलाया गया था कि अप्रैल में PM इसका शुभारंभ करेंगे, लेकिन मीडिया रिपोर्ट कहती है कि PM आज या कल में यहां उपलब्ध नहीं है.

इस मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मेघलाय कोर्ट पांच साल से काम कर रहा है जबकि अभी तक उसका शुभारंभ नहीं हुआ. NHAI ने कहा कि हमनें PMO को इसके लिए कहा है. तब कोर्ट ने कहा कि अगर वो नहीं करते तो आप ही क्यों नहीं कर देते आप लोगों ने इस पर मेहनत की है. बताते चलें कि ईस्टन एक्सप्रेस वे 135 किलोमीटर का है.

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सेनाध्यक्ष ने चेताया, कश्मीर की ‘आज़ादी’ संभव नहीं, आप सेना से लड़ नहीं सकते

नई दिल्ली। सेनाध्यक्ष जनरल बिपिन रावत ने कश्मीर में आजादी के नारे लगाने वाले कश्मीरी युवाओं को चेतावनी दी है. उन्होंने कहा है कि कश्मीर के जो युवा कश्मीर की आजादी के नारे लगते हैं उनका यह सपना कभी पूरा नहीं होने वाला. उनके मुताबिक कश्मीरी युवाओं को यह समझने की जरूरत है कि उन्हें ‘आजादी’ कभी नहीं मिलेगी और वे सेना से नहीं लड़ सकते.

इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में बिपिन रावत ने कश्मीरी युवाओं के आतंक की राह पर चलने को लेकर चिंता जताई. उन्होंने कहा कि जो लोग युवाओं को बताते हैं कि ऐसा करके उन्हें आजादी मिल जाएगी वे उन्हें बहका रहे हैं. सेनाध्यक्ष ने कहा, ‘मैं कश्मीरी युवाओं से कहना चाहता हूं कि उन्हें जो आजादी चाहिए वह संभव नहीं है. ऐसा नहीं होगा. आप हथियार क्यों उठा रहे हैं? हम उनसे हमेशा लड़ते रहेंगे जिन्हें (भारत से) आजादी चाहिए और जो अलग होना चाहते हैं.’

जनरल बिपिन रावत ने यह भी कहा कि वे इस बात को ज्यादा महत्व नहीं देते कि सेना द्वारा कितने आतंकी मार गिराए गए. उन्होंने कहा, ‘मैं आंकड़ों के खेल में नहीं उलझता. मुझे पता है कि आतंक का भी एक चक्र है और नए आतंकियों की भी भर्ती का काम चल ही रहा है. मैं सिर्फ लोगों को यह बताना चाहता हूं कि आप सेना से नहीं लड़ सकते हैं. सेना से लड़कर तो आप कभी भी जीत नहीं सकते.’

सेनाध्यक्ष ने यह भी कहा कि आतंकी बने युवाओं की मौत से वे बेचैन होते हैं. उन्होंने कहा, ‘हमें किसी को मारकर खुशी नहीं मिलती है. आप आर्मी के साथ संघर्ष करेंगे तो सुरक्षा बल भी बदले में वार करेंगे. सुरक्षा बल बंदूक उठाने वाले लड़ाकों की तरह क्रूर नहीं हैं. आप सीरिया और पाकिस्तान के हालात देखिए… मानता हूं कि युवाओं में गुस्सा है, लेकिन सुरक्षा बलों पर पत्थर फेंकना कोई रास्ता नहीं है…’

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इंग्लैंड में भी दलितों से छूआछूत

(फोटो साभार : फेसबुक/Dalit Solidarity Network UK)

दलितों के अधिकारों की लड़ाई सिर्फ भारत में ही नहीं चल रही है, सात समुंदर पार ब्रिटेन में रह रहे दलित भी वहां फैले छुआछूत और जातिवाद के खिलाफ आर-पार की लड़ाई लड़ रहे हैं. दरअसल ब्रिटेन में दक्षिण एशियाई मूल के करीब 30 लाख लोग रहते हैं. ब्रिटेन की एजेंसियों का अनुमान है कि इनमें से 50,000 से 2 लाख के बीच आबादी दलितों की है. भारत की तरह ब्रिटेन में दलित उत्पीड़न रोकने के लिए कोई कानून नहीं है. हालांकि वहां नस्लीय उत्पीड़न रोकने के लिए समानता कानून है.

भारतीय मूल के दलितों का दावा है कि अगर अश्वेत व्यक्ति नस्लीय भेदभाव का शिकार होता है, तो वह इस कानून के तहत मामला दर्ज कराकर न्याय की गुहार लगा सकता है, लेकिन किसी दक्षिण एशियाई मूल के व्यक्ति को जातिसूचक शब्द या छुआछूत का शिकार होना पड़ता है तो न्याय पाना तो दूर वह अधिकारियों को यह समझा भी नहीं पाता है कि वह नस्लीय भेदभाव जितने ही खतरनाक जातीय भेदभाव या छुआछूत का शिकार हो रहा है.

पिछले कई दशक से ब्रिटेन के दलित मांग उठा रहे हैं कि भारत की तरह इंग्लैंड में भी उन्हें जात-पांत का शिकार होना पड़ रहा है. ब्रिटेन में लंबे समय से जातिवाद को कानूनी अपराध घोषित करने की लड़ाई लड़ रहीं पूर्व अधिकारी और सामाजिक कार्यकर्ता संतोष दास के मुताबिक, ‘पहले तो कोई मानता ही नहीं था कि ब्रिटेन में दलितों के साथ भेदभाव हो रहा है. और यह भेदभाव और कोई नहीं बल्कि ब्रिटेन में रह रहे भारतीय मूल के अगड़ी जातियों के लोग ही कर रहे हैं.’ ब्रिटेन में छुआछूत की रिपोर्ट तैयार करने का काम दिसंबर 2010 में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ इकोनॉमिक एंड सोशल रिसर्च को सौंपा गया. संस्थान की ओर से हिलेरी मेटकॉफ और हीथर रोल्फ ने कास्ट डिसक्रिमनेशन एंड हैरासमेंट इन ग्रेट ब्रिटेन नाम की अपनी 114 पन्ने की रिपोर्ट 28 जुलाई 2011 को सौंप दी. रिपोर्ट में जो कहा गया वह चौंकाने वाला था.

रिपोर्ट में ब्रिटेन में रह रहे दलित समुदाय के लोगों और वहां काम कर रहे दो दर्जन से ज्यादा दलित संगठनों से बातचीत की गई. स्कूलों में किए गए अध्ययनों में पता चला कि भारतीय मूल के सवर्ण छात्र अपने सहपाठी दलित छात्रों को जातिसूचक शब्दों से जलील करते हैं. कुछ ऐसे मामले भी सामने आए जहां पहले तो छात्रों के बीच दोस्ताना था, लेकिन एक-दूसरे की जाति पता चलने के बाद उनका व्यवहार बदल गया. कई मामलों में जातिगत भेदभाव के कारण छात्रों ने स्कूल ही छोड़ दिया. एक मामले में तो एक छात्रा ने स्कूल आना ही छोड़ दिया और घर रहकर इयरफोन से क्लास अटेंड की.

कई मामलों में दलितों को अलग बैठकर खाना खाना पड़ता है, क्योंकि सवर्ण उनके साथ बैठना पसंद नहीं करते. ज्यादातर मामलों में पीड़ित अपने गोरे अफसरों को समझा ही नहीं पाए कि आखिर उनके साथ हो क्या रहा है. सबसे विचित्र मामला तो टैक्सी चलाने वाले एक दलित कारोबारी के साथ सामने आया. उसकी कंपनी में ज्यादातर सवर्ण टैक्सी ड्राइवर काम करते थे. ये आपसी बातचीत में जातिसूचक शब्द और जातिवादी भावनाओं का इजहार करते रहते थे. जब कारोबारी ने उन्हें ऐसा करने से रोका, तो उन्होंने कहा कि इसमें क्या हर्ज है. तब कारोबारी ने बताया कि वह दलित है और जातिसूचक शब्दों से उसे अपमान महसूस होता है. कारोबारी के दलित होने की बात पता चलने पर पांच ड्राइवरों ने यह कहते हुए नौकरी छोड़ दी कि वे नीची जाति के व्यक्ति के यहां नौकरी नहीं करेंगे.

इन हालात पर द फेडरेशन ऑफ अंबेडकर एंड बुद्धिस्ट ऑर्गनाइजेशन्स यूके के अरुण कुमार कहते हैं, ‘यह रिपोर्ट ब्रिटेन के लोगों के लिए नई चीज थी. उन्हें यकीन ही नहीं हुआ कि ब्रिटेन में इस कदर छुआछूत फैली हुई है. हालांकि मेरे जैसे लोग 40 साल से यह बात सरकार को समझाने की कोशिश कर रहे थे. लेकिन साधन संपन्न हिंदुओं की लॉबी इसे दबाए हुए थी.’

इसके बाद यह तय किया गया कि ब्रिटेन के समानता अधिनियम 2010 में एक उपबंध जोड़कर ब्रिटेन में नस्ल की तरह जातिवादी भेदभाव को भी अपराध माना जाएगा. 2013 में ब्रिटिश सरकार ने कानून में संशोधन की घोषणा कर दी. लेकिन मई 2016 में अपने वादे से पलटते हुए प्रधानमंत्री थेरेसा मे ने इस विषय पर सर्वेक्षण कराने की बात कही. ब्रिटेन में बड़ी संख्या में रह रहे गैर-दलित दक्षिण एशियाई समुदाय ने अपनी दलील रखी कि 21वीं सदी के ब्रिटेन में जातिवाद की बात करना बकवास है. उन्होंने इसे हिंदू धर्म को अपमानित करने की साजिश बताया.

इस मामले में लगातार संघर्ष कर रहे ब्रिटेन के दलित एक्टिविस्ट अरुण कुमार ने कहा- ब्रिटेन में रह रहे दक्षिण एशियायी समुदाय में अगड़ी जातियों का वर्चस्व देखते हुए थेरेसा मे अपने फैसले से पलट गईं. लेकिन दलितों के लगातार विरोध प्रदर्शन के बाद उन्होंने अगस्त 2017 में एक राष्ट्रीय सर्वेक्षण शुरू कराया, जिसमें ऑनलाइन मत देकर लोगों को बताना था कि ब्रिटेन में जातिवाद है या नहीं. सितंबर 2018 में यह सर्वेक्षण पूरा हो गया. फिलहाल इसका नतीजा सार्वजनिक नहीं किया गया है. लेकिन इस बीच ब्रिटेन के हिंदू समुदाय ने अपना विरोध बढ़ा दिया. उन्होंने ऐसी दलील दी जिसे समझना जातिवाद से भलीभांति वाकिफ भारतीयों तक के लिए कठिन है. जिस तरह सदियों से भारत में दलित अधिकारों की लड़ाई जारी है और अब तक अपने मकाम पर नहीं पहुंची है, उसी तरह ब्रिटेन में भी यह लड़ाई अभी लंबी चलेगी.

– पीयूष बबेले साभार जी न्यूज. इंडिया. कॉम

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नेहा धूपिया ने भी कर ली शादी, बड़े क्रिकेटर का बेटा है नेहा का पति

नेहा धुपिया और अंगद बेदी

जब मीडिया का सारा फोकस अनिल कपूर की बेटी सोनम कपूर की शादी पर टिका था, तभी एक और जानी-मानी अभिनेत्री नेहा धूपिया ने भी शादी कर ली. यह शादी इतने गुपचुप तरीके से हुई कि किसी को कानों-कान इसकी खबर भी नहीं लगी. ये शादी सिख रीति रिवाज से दिल्ली में हुई.

शादी के बाद नेहा धूपिया ने खुद सोशल मीडिया के जरिए इसकी जानकारी दी. नेहा ने अपने बेस्ट फ्रेंड अंगद बेदी से दिल्ली में शादी की. सीक्रेट वेडिंग के बाद दोनों ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर फैंस को ये खुशखबरी दी. नेहा ने शादी की फोटो शेयर करते हुए लिखा- मेरी जिंदगी का सबसे सही फैसला. आज मैंने अपने बेस्ट फ्रेंड से शादी की, हैलो हसबैंड! @angadbedi ❤.

वहीं अंगद बेदी ने भी अपने इंस्टा अकाउंट पर शादी की तस्वीर शेयर करते हुए लिखा- बेस्ट फ्रेंड..अब मेरी पत्नी!!! हैलो मिसेज बेदी.

यहां इस खबर में ट्विस्ट यह है कि नेहा के पति अंगद बेदी दिग्गज क्रिकेटर बिशन सिंह बेदी के बेटे हैं. नेहा फिल्म जगत में एक जाना माना नाम है. हाल ही में उन्होंने विद्या बालन के साथ ‘तुम्हारी सुलु’ में महत्वूर्ण किरदार निभाया था. मिस इंडिया बनने के बाद नेहा बॉलीवुड में काम करने आई थीं. तो वहीं अंगद बेदी का ताल्लुक भी फिल्मी जगत से है. वह कई फिल्मों में कैरेक्टर रोल कर चुके हैं. वे अमिताभ बच्चन-तापसी पन्नू स्टारर मूवी पिंक में नजर आए थे.

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कर्नाटक चुनाव में दलित-बसपा फैक्टर

कर्नाटक चुनाव प्रचार का आज (10 मई) आखिरी दिन रहा. कर्नाटक चुनाव की सरगर्मी का असर पूरा देश महसूस कर रहा है. देश के दो सबसे ताकतवर नेता प्रधानमंत्री मोदी और कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी कई दिनों तक कर्नाटक में जमें रहे. आलम यह है कि कर्नाटक की चुनावी गर्मी का असर दिल्ली तक में साफ दिखा. प्रदेश में भाजपा जहां अपने बूते चुनाव मैदान में है तो कांग्रेस भी बिना गठबंधन चुनाव लड़ रही है. प्रदेश की तीसरी प्रमुख पार्टी पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा की जनता दल सेक्युलर यानि जेडीएस है. जेडीएस यहां बहुजन समाज पार्टी के साथ गठबंधन कर चुनाव मैदान में है.

प्रदेश में जो स्थिति बन रही है, उसमें जेडीएस-बसपा गठबंधन मजबूत बनकर उभरा है. कर्नाटक में सामाजिक संरचना को देखें तो जेडीएस और बसपा का यह गठबंधन काफी महत्वपूर्ण है. कर्नाटक में दलित और आदिवासी समुदाय के करीब 26% वोटर हैं, जो राज्य की 100 सीटों को प्रभावित करने का माद्दा रखते हैं. इस आंकड़े को और बेहतर तरीके से समझने की कोशिश करें तो राज्य की करीब 60 सीटों पर दलित समुदाय और 40 सीटों पर आदिवासी समुदाय के वोटर असर डालते हैं. जाहिर है इसके अलावा भी हर सीट पर दलित और आदिवासी वोटों की संख्या होगी ही.

यही आंकड़ा जेडीएस और बसपा के गठबंधन को मजबूत बना रहा है तो इसी आंकड़े से भाजपा और कांग्रेस पार्टी डरी हुई है. यही वजह है कि कांग्रेस देवेगौड़ा से यह पूछती दिखी कि वह कांग्रेस की ओर हैं या फिर भाजपा की ओर तो कर्नाटक में चुनाव प्रचार करने पहुंचे पीएम मोदी लगातार देवेगौड़ा पर डोरे डालते रहे.

कर्नाटक के विधानसभा की स्थिति की बात करें तो यहां 224 विधानसभा सीटे हैं. इसमें एससी यानि दलितों के लिए 36 जबकि एसटी यानि आदिवासियों के लिए 15 सीटें सुरक्षित हैं. 2014 के लोकसभा चुनाव को आधार बनाकर देखें तो विधानसभा वार सीटों पर बढ़त के लिहाज से भाजपा आदिवासियों के लिए आरक्षित 36 सीटों में से 18 जबकि कांग्रेस 16 सीटों पर आगे थी. वहीं,आदिवासियों के लिए आरक्षित सीटों 15 सीटों में भाजपा 8 और कांग्रेस 7 सीटों पर आगे थी. यानि दोनों में कड़ी टक्कर थी.

हालांकि यहां एक और तथ्य पर ध्यान देना होगा. कांग्रेस के मुख्यमंत्री सिद्दारमैया भी खुद पिछड़े समुदाय से आते हैं और उन्होंने दलितों और आदिवासियों के लिए कई योजनाएं चला रखी है. सिद्दारमैया को इसका कितना लाभ मिलता है यह इस पर निर्भर है कि ये योजनाएं जमीन पर कितनी पहुंची है. जबकि भाजपा के मंत्री अनंत कुमार हेगड़े के संविधान बदलने को लेकर प्रदेश के दलित-आदिवासी भाजपा से खार खाए हुए हैं. पिछले दिनों एक बैठक के दौरान दलितों ने हेगड़े के बयान को लेकर अमित शाह का बहिष्कार कर अपनी मंशा जता दी है.

प्रदेश में नए समीकरण बनने के बाद अचानक इस सभी सीटों पर जेडीएस-बसपा गठबंधन का दावा भी मजबूत हो गया है. बसपा देश की इकलौती ऐसी पार्टी है, जिसे देश के हर हिस्से में दलितों का कमोबेश समर्थन हासिल है. जेडीएस के साथ मिलकर मजबूती से चुनाव लड़ने की स्थिति में दलित वोट बसपा के पक्ष में गोलबंद हो सकते हैं. यह स्थिति प्रदेश में सत्ता का गणित बदलने के लिए काफी है.

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महाराष्ट्र में वर्दी पहनकर भीख मांगना चाहता है एक पुलिसकर्मी

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मुंबई। विभाग की असंवेदनशीलता के कारण वेतन रुकने से आर्थिक दिक्कतों का सामना कर रहे पुलिसकर्मी ने वर्दी पहनकर भीख मांगने की मंजूरी मांगी है. मुंबई पुलिस के एक कांस्टेबल ने सीएम देवेन्द्र फडणवीस को चिट्ठी लिखकर यह मांग की है. सिपाही ने अपनी चिट्ठी में दो महीने से वेतन नहीं मिलने का हवाला दिया है. चिट्ठी में उसने लिखा है कि वह अपने परिवार का भरण-पोषण कर पाने में असमर्थ है.

आरक्षक ने इस चिट्ठी की कॉपी मुंबई पुलिस कमिश्नर दत्ता पदसालगिकर और अपने विभाग के अन्य सीनियर अधिकारियों को भी भेजी है. अहीरराव स्थानीय शस्त्र इकाई से जुड़े हैं. उनकी तैनाती उद्धव ठाकरे के घर ‘मातोश्री’ की सुरक्षा में लगे दल में है. उन्होंने पत्र में लिखा है कि 20 मार्च से 22 मार्च के बीच उन्होंने छुट्टी ली थी लेकिन पत्नी के पैर में फ्रैक्चर होने के कारण वह छुट्टी खत्म होने के बाद काम पर नहीं लौट सके. पत्र में उन्होंने दावा किया है कि उन्होंने अपनी इकाई के प्रभारी को पांच दिन की आपात छुट्टी लेने की जानकारी दी थी और पत्नी के इलाज के बाद वह 28 मार्च को काम पर लौट आए थे. लेकिन इसके बाद उसका वेतन रोक दिया गया और इस संबंध में ज्यादा जानकारी नहीं दी गयी.

कांस्टेबल ने पत्र में लिखा, ‘‘मुझे अपनी बीमार पत्नी की देखभाल करनी होती है , बुजुर्ग माता-पिता और एक बेटी का गुजर बसर करना होता है. इसके अलावा मुझे कर्ज की मासिक किश्त देनी होती है. लेकिन जब से वेतन रोका गया है , मैं इन खर्चों का वहन करने में असमर्थ हूं. इसलिए मैं आपसे वर्दी पहनकर भीख मांगने की मंजूरी चाहता हूं.’’

इसे भी पढ़ें- सचिन वालिया की हत्या के बाद दलित संगठनों में रोष
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सचिन वालिया की हत्या के बाद दलित संगठनों में रोष

लखनऊ। सहारनपुर में भीम आर्मी के जिलाध्यक्ष कमल वालिया के भाई सचिन वालिया की हत्या को लेकर दलित संगठन काफी रोष में हैं. घटना के बाद तमाम दलित संगठनों ने हत्यारों की गिरफ्तारी की मांग की है. पूर्व आईपीएस अधिकारी एस. आर. दारापुरी के संगठन जन मंच ने बयान जारी कर यह मांग उठाई है. अपने बयान में उन्होंने कहा है कि सचिन वालिया को शहर से सटे गाँव रामनगर में 4 लोगों ने उस समय सीने में गोली मार दी गयी जब वह दुकान पर सामन ले रहा था और महाराणा प्रताप जयंती का जुलूस पास से गुज़र रहा था. इस घटना से पहले भीम आर्मी के सदस्यों को देख लेने की लगातार धमकियाँ मिल रही थीं.

पिछले साल भी महराणा प्रताप जयंती के अवसर पर ही शब्बीरपुर के दलितों पर राजपूतों द्वारा हमला किया गया था जिसमें दलितों के 60 घर जला दिए गये थे तथा 20 दलित बुरी तरह से ज़ख़्मी हुए थे. इस मामले में भी पुलिस ने हमलावरों के विरुद्ध प्रभावी कार्रवाही न करके 7 राजपूतों सहित 7 दलितों को भी गिरफ्तार कर लिया था तथा दो दलितों पर रासुका भी लगा दिया था जो अभी तक जेल में हैं.

यह भी उल्लेखनीय है कि एक तरफ योगी तथा उसके मंत्री दलितों को लुभाने के लिए उनके घर जा कर भोजन करने का नाटक करते हैं और योगी आंबेडकर महासभा के स्वयम्भू अध्यक्ष लालजी निर्मल से “दलित मित्र” का सम्मान प्राप्त करते हैं, वहीं दूसरी ओर उनके समर्थक राजपूत दलितों को गोली मार कर हत्यायें कर रहे हैं. यह बड़े दुःख की बात है उत्तर प्रदेश में सामंती तत्वों का मनोबल चरम पर है क्योंकि मुख्यमंत्री स्वयं सामंती ताकतों के सरगना हैं. योगी आदित्यनाथ पहले हिन्दू युवा वाहिनी के सामंती गुंडों के सरगना थे और अब मुख्यमंत्री के तौर पर राजपूत सामंतों को संरक्षण दे रहे हैं. भीम आर्मी के नेताओं पर रासुका लगाकर जेल में बंद रखना और अब उनकी हत्या करवाना एक रणनीति है, ताकि अन्याय के विरुद्ध कोई आवाज़ न उठ सके. यही रणनीति 2 अप्रैल के बंद के बाद भी अपनाई गयी है.

अतः जनमंच मांग करता है कि सचिन के चारों हत्यारों को तुरंत गिरफ्तार किया जाये, सचिन के परिवार वालों को 20 लाख का मुयाव्ज़ा दिया जाये तथा सरकारी और गैर सरकारी तौर पर किये जा रहे दलित दमन पर रोक लगाई जाये.

एस.आर.दारापुरी, पूर्व आई.जी. एवं संयोजक जन मंच

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डॉलर के सामने क्यों थरथर कांप रहा है रुपया

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-डॉलर के मुक़ाबले रुपये में कमज़ोरी जारी -पिछले एक महीने में सवा दो रुपये से अधिक टूटा रुपया -रुपया 15 महीने के सबसे निचले स्तर पर -कच्चे तेल में उबाल ने बिगाड़ी रुपये की चाल

अगस्त 2013, जगह- लोकसभा, नेता- सुषमा स्वराज “इस करेंसी के साथ देश की प्रतिष्ठा जुड़ी होती है और जैसे-जैसे करेंसी गिरती है, तैसे-तैसे देश की प्रतिष्ठा गिरती है…..”

तब लोकसभा में भाजपा की नेता और अब विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने ये भाषण अगस्त 2013 में दिया था और वो रुपये का भाव डॉलर के मुक़ाबले लगातार गिरने और 68 के पार पहुँचने पर वित्त मंत्री पी चिदंबरम के स्पष्टीकरण से संतुष्ट नहीं थी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से जवाब की मांग कर रहीं थीं.

अगस्त 2013, जगह- अहमदाबाद, नेता- नरेंद्र मोदी “आज देखिए, रुपये की कीमत जिस तेज़ी से गिर रही है और कभी-कभी तो लगता है कि दिल्ली सरकार और रुपये के बीच में कंपीटीशन चल रहा है, किसकी आबरू तेज़ी से गिरेगी. देश जब आज़ाद हुआ तब एक रुपया एक डॉलर के बराबर था. जब अटलजी ने पहली बार सरकार बनाई, तब तक मामला पहुँच गया था 42 रुपये तक, जब अटलजी ने छोड़ा तो 44 रुपये पर पहुँच गया था, लेकिन इस सरकार में और अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री के कालखंड में ये 60 रुपये पर पहुँच गया है.”

नरेंद्र मोदी का ये भाषण पाँच साल पुराना था जब वो गुजरात के मुख्यमंत्री थे. लेकिन उसके बाद से हिंदुस्तान की सियासत में काफ़ी कुछ बदल चुका है, आर्थिक हालात में भी बहुत उठापटक हुई है, लेकिन कभी गिरते रुपये पर मनमोहन सरकार को घेरने वाले ये नेता इन दिनों रुपये में गिरावट को लेकर चुप्पी साधे हुए हैं.

जब मोदी सरकार मई 2014 में दिल्ली में सत्तारूढ़ हुई थी तब डॉलर के मुक़ाबले रुपया 60 के स्तर के आसपास था. लेकिन इसके बाद से कमोबेश दबाव में ही है. पिछले कुछ महीनों से ये दबाव और बढ़ा है और हाल ये है कि लुढ़कते हुए 15 महीने के निचले स्तर पर पहुँच गया है. पिछले एक महीने में डॉलर के मुक़ाबले इसमें 2 रुपये 29 पैसे की गिरावट आई है.

वैसे, रुपये ने अपना सबसे निचला स्तर भी मोदी सरकार के कार्यकाल में ही देखा है. नवंबर 2016 में रुपये ने डॉलर के मुकाबले 68.80 का निचला स्तर छुआ था.

हालांकि डॉलर सिर्फ़ रुपये पर ही भारी हो ऐसा नहीं है. इस साल मलेशियाई रिंगिट, थाई भाट समेत एशिया के कई देशों की करेंसी भी कमज़ोर हुई है.

रुपये की कहानी

एक जमाना था जब अपना रुपया डॉलर को ज़बरदस्त टक्कर दिया करता था. जब भारत 1947 में आज़ाद हुआ तो डॉलर और रुपये का दम बराबर का था. मतलब एक डॉलर बराबर एक रुपया. तब देश पर कोई कर्ज़ भी नहीं था. फिर जब 1951 में पहली पंचवर्षीय योजना लागू हुई तो सरकार ने विदेशों से कर्ज लेना शुरू किया और फिर रुपये की साख भी लगातार कम होने लगी.

1975 तक आते-आते तो एक डॉलर की कीमत 8 रुपये हो गई और 1985 में डॉलर का भाव हो गया 12 रुपये. 1991 में नरसिम्हा राव के शासनकाल में भारत ने उदारीकरण की राह पकड़ी और रुपया भी धड़ाम गिरने लगा. और अगले 10 साल में ही इसने 47-48 के भाव दिखा दिए.

रुपये का क्या है खेल?

रुपये और डॉलर के खेल को कुछ इस तरह समझा जा सकता है. मसलन अगर हम अमरीका के साथ कुछ कारोबार कर रहे हैं. अमरीका के पास 67,000 रुपए हैं और हमारे पास 1000 डॉलर. डॉलर का भाव 67 रुपये है तो दोनों के पास फिलहाल बराबर रकम है.

अब अगर हमें अमरीका से भारत में कोई ऐसी चीज मंगानी है, जिसका भाव हमारी करेंसी के हिसाब से 6,700 रुपये है तो हमें इसके लिए 100 डॉलर चुकाने होंगे.

अब हमारे विदेशी मुद्रा भंडार में बचे 900 डॉलर और अमरीका के पास हो गए 73,700 रुपये. इस हिसाब से अमेरिका के विदेशी मुद्रा भंडार में भारत के जो 67,000 रुपए थे, वो तो हैं ही, भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में जो 100 डॉलर थे वो भी उसके पास पहुंच गए.

इस मामले में भारत की स्थिति तभी ठीक हो सकती है अगर भारत अमरीका को 100 डॉलर का सामान बेचे….जो अभी नहीं हो रहा है. यानी हम इंपोर्ट ज़्यादा करते हैं और एक्सपोर्ट बहुत कम. करेंसी एक्सपर्ट एस सुब्रमण्यम बताते हैं कि इस तरह की स्थितियों में भारतीय रिज़र्व बैंक अपने भंडार और विदेश से डॉलर खरीदकर बाजार में इसकी पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित करता है.

रुपये की चाल कैसे तय होती है? करेंसी एक्सपर्ट एस सुब्रमण्यम का कहना है कि रुपये की कीमत पूरी तरह इसकी डिमांड और सप्लाई पर निर्भर करती है. इंपोर्ट और एक्सपोर्ट का भी इस पर असर पड़ता है. हर देश के पास उस विदेशी मुद्रा का भंडार होता है, जिसमें वो लेन-देन करता है. विदेशी मुद्रा भंडार के घटने और बढ़ने से ही उस देश की मुद्रा की चाल तय होती है. अमरीकी डॉलर को वैश्विक करेंसी का रूतबा हासिल है और ज़्यादातर देश इंपोर्ट का बिल डॉलर में ही चुकाते हैं.

रुपया क्यों कमज़ोर?

डॉलर के सामने अभी के माहौल में रुपये की नहीं टिक पाने की वजहें समय के हिसाब से बदलती रहती हैं. कभी ये आर्थिक हालात का शिकार बनता है तो कभी सियासी हालात का और कभी दोनों का ही. दिल्ली स्थित एक ब्रोकरेज़ फर्म में रिसर्च हेड आसिफ़ इक़बाल का मानना है कि मौजूदा हालात में रुपये के कमज़ोर होने की कई वजहें हैं

पहली वजह है तेल के बढ़ते दाम- रुपये के लगातार कमजोर होने का सबसे बड़ा कारण कच्चे तेल के बढ़ते दाम हैं. भारत कच्चे तेल के बड़े इंपोर्टर्स में एक है. कच्चे तेल के दाम साढ़े तीन साल के उच्चतम स्तर पर हैं और 75 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुँच गए हैं. भारत ज्यादा तेल इंपोर्ट करता है और इसका बिल भी उसे डॉलर में चुकाना पड़ता है.

विदेशी संस्थागत निवेशकों की बिकवाली- विदेशी संस्थागत निवेशकों ने भारतीय शेयर बाज़ारों में अप्रैल में ही रिकॉर्ड 15 हज़ार करोड़ रुपये के शेयर बेचे हैं और मुनाफ़ा डॉलर में बटोरकर अपने देश ले गए. अमरीका में बॉन्ड्स से होने वाली कमाई बढ़ी- अब अमरीकी निवेशक भारत से अपना निवेश निकालकर अपने देश ले जा रहे हैं और वहाँ बॉन्ड्स में निवेश कर रहे हैं.

रुपया गिरा तो क्या असर?

सवाल ये है कि डॉलर के मुक़ाबले रुपया इसी तरह गिरता रहा तो हमारी सेहत पर क्या असर होगा.

करेंसी एक्सपर्ट सुब्रमण्यम के मुताबिक सबसे बड़ा असर तो ये होगा कि महंगाई बढ़ सकती है. कच्चे तेल का इंपोर्ट होगा महंगा तो महंगाई भी बढ़ेगी. ढुलाई महंगी होगी तो सब्जियां और खाने-पीने की चीज़ें महंगी होंगी. इसके अलावा डॉलर में होने वाला भुगतान भी भारी पड़ेगा. इसके अलावा विदेश घूमना महंगा होगा और विदेशों में बच्चों की पढ़ाई भी महंगी होगी.

रुपये कि कमज़ोरी से किसे फ़ायदा?

तो क्या रुपये की कमज़ोरी से भारत में किसी को फायदा भी होता है? सुब्रमण्यम इसके जवाब में कहते हैं. “जी बिल्कुल. ये तो सीधा सा नियम है, जहाँ कुछ नुकसान है तो फ़ायदा भी है. एक्सपोर्टर्स की बल्ले-बल्ले हो जाएगी….उन्हें पेमेंट मिलेगी डॉलर में और फिर वो इसे रुपये में भुनाकर फ़ायदा उठाएंगे.” इसके अलावा जो आईटी और फार्मा कंपनियां अपना माल विदेशों में बेचती हैं उन्हें फ़ायदा मिलेगा.

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साभार बीबीसी

बसपा से मिलकर इस तरह कांग्रेस और भाजपा को रोकेगी जेडीएस

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नई दिल्ली। कर्नाटक विधानसभा के चुनाव में भले ही कांग्रेस और भाजपा अपने दम पर सरकार बनाने का दावा कर रहे हों, सबकी नजर देवेगौड़ा की पार्टी जनता दल सेक्युलर (JDS) पर है. लेकिन जनता दल सेक्युलर की नजर बहुजन समाज पार्टी और उसकी मुखिया मायावती पर है.

दरअसल चुनाव पूर्व हुए सर्वे बता रहे हैं कि कर्नाटक चुनाव में किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलेगा. अगर ये सर्वे सही साबित होते हैं तो जनता दल सेक्युलर निर्णायक भूमिका में होगी. तो वहीं जेडीएस का सारा ध्यान इस बात पर है कि बहुजन समाज पार्टी जेडीएस के लिए कितने वोट ले आती है. बसपा के वोट ट्रांसफर होने की स्थिति में ही जेडीएस अपने प्रदर्शन को बेहतर कर सकता है.

आंकड़े पर गौर करें तो अगर बसपा अपने वोटरों से जेडीएस के पक्ष में कम से कम दो प्रतिशत वोट भी ट्रांसफर करवाने में कामयाब रहती है तो भाजपा और कांग्रेस दोनों मुंह के बल आ सकते हैं. पिछले चुनाव के आंकड़े इस बात को साबित भी करते हैं. जैसे पिछले विधानसभा चुनाव में जेडीएस 16 ऐसी सीटों पर हारी थी, जहां मार्जिन 5000 से कम था. इस बार बसपा, एनसीपी, टीआरएस और ओवैसी की एआईएमआईएम की मदद से अगर वह इन 16 सीटों को जीत में तब्दील करना चाहती है.

एक और तथ्य पर नजर डालें और पिछले तीन चुनावों का ट्रेंड देखें तो किसी भी पार्टी के वोट शेयर में सिर्फ 1 से 4 फीसदी की बढ़ोतरी पर ही सीटों का बड़ा फायदा होता है. ऐसे में जेडीएस के मामले में यह उछाल आया तो किसी को भी स्पष्ट बहुमत नहीं मिलेगा.

जेडीएस को सबसे ज्यादा फायदा बसपा से मिलने की उम्मीद है. क्योंकि पिछले चुनाव में मायावती की पार्टी ने 224 सीटों में से 175 पर अपने उम्मीदवार उतारे थे. हर सीट पर बसपा उम्मीदवार को औसतन 1% वोट मिला था. ये तब था जब बसपा के किसी सीट पर जीतने की कोई उम्मीद नहीं थी. इस बार जेडीएस से गठबंधन के बाद बसपा कार्यकर्ता और दलित समुदाय भी खासा उत्साहित है. जेडीएस से गठबंधन के बाद बसपा समर्थक अब जहां जेडीएस को खुलक सपोर्ट कर रहे हैं तो वहीं उन्होंने बसपा को जीताने के लिए भी ऐड़ी-चोटी का जोर लगा दिया है. बसपा यहां की 20 सीटों पर चुनाव मैदान में है, जबकि बाकी की सीटों पर वह जेडीएस को समर्थन दे रही है. खास बात यह भी है कि बसपा ने एससी-एसटी के लिए आरक्षित 51 सीटों में से 8 पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं. ऐसे में इन सीटों पर दलित वोट लामबंद हो सकते हैं.

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ठीक एक साल बाद सहारनपुर में फिर हिंसा, भीम आर्मी के जिलाध्यक्ष कमल वालिया के भाई की गोली मारकर हत्या

सहारनपुर। सहारनपुर में साल 2017 में आज ही के दिन महाराणा प्रताप की जयंती के दिन हिंसा भड़की थी. उसके ठीक एक साल बाद आज 9 मई को भीम आर्मी के जिलाध्यक्ष कमल वालिया के भाई सचिन वालिया की कुछ लोगों ने गोली मारकर हत्या कर दी. कहा जा रहा है कि हत्यारे कमल वालिया को मारना चाहते थे लेकिन सचिन और कमल वालिया के चेहरे मिलने के कारण सचिन मारा गया.

घरवालों के मुताबिक सचिन नाश्ता लेने के लिए बाहर निकला था तभी किसी ने गोली मार दी. सचिन वालिया को महाराणा प्रताप जयंती स्थल से कुछ ही दूरी पर गोली लगी. इसके बाद उन्हें तुरंत जिला हॉस्पिटल पहुंचाया गया, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया. हालांकि, गोली कैसे लगी या किसने मारी इसका पता अभी नहीं चल सका है. वहीं दूसरी ओर सचिन वालिया के परिजनों का कहना है कि उसकी गोली मारकर हत्या की गई है.

सचिन के हत्या की खबर मिलते ही सहारनपुर में भीम आर्मी समर्थक इकट्ठा हो गए. जिला अस्पताल के बाहर परिजनों ने जमकर हंगामा किया. उनका आरोप था कि सचिन को प्रशासन ने मरवाया है. इसके बाद परिजनों ने शव को पोस्टमार्टम के लिए ले जाने का भी विरोध किया. परिजनों का आरोप है कि महाराणा प्रताप की जयंती को लेकर हंगामे की आशंका के बावजूद प्रशासन ने इसकी अनुमति दी.

गौरतलब है कि महाराणा प्रताप जयंती को देखते हुए जिला प्रशासन अलर्ट पर था. महाराणा प्रताप भवन पर 800 पुलिसकर्मी तैनात किए गए थे. 200 लोगों को जयंती मानाने की प्रशासन ने सशर्त प्रशासन दी थी. गौरतलब है कि पिछले साल आज ही के दिन सहारनपुर में जातीय हिंसा भड़की थी.

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दलित युवाओं को लुभाने के लिए नीतीश कुमार ने खजाना खोला

पटना। दलित वोटों के लिए एक बार जीतनराम मांझी पर दांव लगा चुके नीतीश कुमार ने दलितों को अपने पाले में लाने के लिए फिर एक बड़ा फैसला किया है. इस बार नीतीश कुमार ने किसी नेता पर दांव न लगाकर सीधे दलित समाज के युवाओं को टारगेट किया है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने दलित छात्रों की आर्थिक मदद के लिए अपना ख़ज़ाना खोल दिया है. इसके लिए कई स्तरों पर दलित और आदिवासी समाज के छात्र-छात्राओं को आर्थिक मदद की योजना बनाई गई है.

इसके मुताबिक बिहार सरकार UPSC और BPSC की प्रारंभिक परीक्षा में उत्तीर्ण होने वाले एससी और एसटी उम्मीदवारों को आगे की तैयारी के लिए क्रमश: एक लाख रूपये एवं 50 हजार रूपये देगी. 8 मई को बिहार कैबिनेट की बैठक में नीतीश कुमार की सरकार ने फैसला लिया कि वह हर उस दलित और आदिवासी छात्र को संघ लोक सेवा आयोग की प्राथमिक परीक्षा पास करने पर सीधे उसके खाते में एक लाख रुपये देगी. लेकिन बिहार लोक सेवा आयोग के परीक्षा के PT पास करने पर पचास हजार दिया जाएगा. यह योजना मुख्यमंत्री अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति सिविल सेवा प्रोत्साहन योजना के नाम से जानी जाएगी.

इसके अलावा अब बिहार के किसी भी छात्रावास में रहने वाले दलित और आदिवासी छात्रों को सरकार द्वारा हर महीने एक हज़ार रुपये का भत्ता दिया जाएगा. इसके अलावा राज्य के सभी सरकारी, निजी छात्रावासों में रहने वाले दलित, आदिवासी, पिछड़ी जाति के छात्रों को हर महीने मुफ्त में पंद्रह किलो गेंहू और चावल दिया जाएगा जिससे उनके परिवार वालों पर इसका भार ना हो.

असल में भाजपा में शामिल होने के बाद से ही नीतीश कुमार की काफी आलोचना हो रही है. नीतीश कुमार और भाजपा यह मान कर चल रही थी कि राजद अध्यक्ष लालू यादव के जेल जाने के बाद राजद कमजोर होगी, लेकिन राष्ट्रीय जनता दल भी लगातार मजबूत हो रही है. उपचुनाव में तेजस्वी यादव के नेतृत्व में राजद ने नीतीश-भाजपा गठजोड़ को पराजित किया था. इससे घबराए नीतीश कुमार ने दलित वोटों को अपने पाले में करने के लिए यह कदम उठाया है. इसे भी पढ़े- बेटे तेजप्रताप की शादी में शामिल होंगे लालू, परोल मंजूर
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कर्नाटक चुनावः हजारों फर्जी वोटर कार्ड बरामद, कांग्रेस के मुताबिक फ्लैट भाजपा कार्यकर्ता का

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बरामद वोटर कार्ड

बेंगलुरु। कर्नाटक चुनाव की गहमा गहमी के बीच मंगलवार 8 मई को अचानक चुनाव आयोग से लेकर तमाम राजनीतिक दल एक फ्लैट से हजारों वोटर कार्ड बरामद होने के बाद सकते में आ गए. राजधानी बेंगलुरु में चुनाव आयोग ने एक फ्लैट से 9746 वोटर आईडी कार्ड बरामद किए. मामला ज्यादा गंभीर इसलिए भी है क्योंकि बरामद कार्ड फर्जी नहीं बल्कि असली कार्ड है. इस मामले में चुनाव आयोग ने एफआईआर दर्ज करवा दी है.

दूसरी ओर मामला सामने आने के बाद राजनीतिक दलों में एक-दूसरे को दोष देने की होड़ मच गई है. कांग्रेस और भाजपा ने जहां एक-दूसरे पर निशाना साधा है तो वहीं पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा आज चुनाव आयोग से मुलाकात और प्रेस कॉन्फ्रेंस करेंगे. वोटर कार्ड बेंगलुरु के जलाहाल्ली इलाके में बरामद हुआ. यह इलाका राज राजेश्वरी निर्वाचन क्षेत्र में पड़ता है. इस मामले को लेकर बेंगलुरु में चुनाव आयोग के मुख्य निर्वाचन अधिकारी संजीव कुमार ने मंगलवार रात को प्रेस कॉन्फ्रेंस भी की. उनके अनुसार, राज राजेश्वरी में करीब 4 लाख 35 हजार 439 वोटर हैं, यह वहां की आबादी का 75.43 फीसदी है. पिछली बार रिवीजन के दौरान 28 हजार 825 नाम जोड़े गए थे. इसके बाद अपडेशन के दौरान 19,012 नाम और जोड़े गए थे. इस दौरान 8817 लोगों का नाम हटाया भी गया था.

इस बीच कांग्रेस पार्टी ने भाजपा पर गंभीर आरोप लगाया है. मंगलवार (8 मई) को देर शाम कांग्रेस नेता रणदीप सुरजेवाला ने इस मुद्दे पर प्रेस कॉन्फ्रेंस की और कहा कि बीजेपी इस तरह कांग्रेस पर इल्जाम लगाकर अपनी तरफ ध्यान आकर्षित करना चाहती है. सुरजेवाला ने कहा कि यह वोटर आईडी कार्ड ना तो पुलिस ने बरामद किए हैं ना ही चुनाव आयोग ने बल्कि इन्हें बीजेपी कार्यकर्ता ने बरामद किया है. सुरजेवाला ने आरोप लगाया कि जिस फ्लैट से वोटर आईडी कार्ड बरामद हुए हैं वो फ्लैट मंजुला नंजामुरी का है, जो कि बीजेपी की नेता हैं. जबकि घर में रहने वाला किरायेदार उन्हीं का बेटा राकेश है.

सुरजेवाला ने बीजेपी पर पलटवार करते हुए कहा कि 2015 में राकेश ने बीजेपी के टिकट पर निगम चुनाव लड़ा था लेकिन वो हार गए थे. सुरजेवाला के इस बयान के बाद भाजपा कठघरे में है. गौरतलब है कि कर्नाटक में 12 मई को मतदान होना है. राज्य में 15 मई को नतीजे घोषित होंगे. हाल ही में आए कई ओपेनियन पोल में त्रिशंकु विधानसभा होने की आशंका दिखाई दी.

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बेटे तेजप्रताप की शादी में शामिल होंगे लालू, परोल मंजूर

बेटे तेजप्रताप के साथ लालू यादव (फाइल फोटो)

रांची। चारा घोटाला मामले में सजा काट रहे राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव अपने बड़े बेटे तेजप्रताप यादव की शादी में शामिल होंगे. बेटे की शादी में शामिल होने के लिए लालू प्रसाद यादव को पांच दिन परोल मिल गई है. जेल आईजी व जेल अधीक्षक की बैठक के बाद यह फैसला लिया गया. लालू प्रसाद यादव शाम को फ्लाइट से पटना जा सकते हैं. खबर यह भी है कि लालू के साथ इस दौरान रिम्सा के एक डॉक्टर भी होंगे.

इससे पहले मंगलवार (8 मई) को रांची के बिरसा मुंडा जेल प्रशासन ने महाधिवक्ता से कानूनी राय मांगी थी. महाधिवक्ता ने कानूनी राय जेल प्रशासन को भेज दी थी. इस मसले में रांची और पटना के एसएसपी ने मंजूरी देते हुए कहा कि लालू प्रसाद को पेरोल दिया जा सकता है. मंगलवार रात रिम्स के मेडिकल बोर्ड ने भी राजद सुप्रीमो को यात्रा करने के लिए फिट बता दिया. बता दें कि लालू प्रसाद ने जेल प्रशासन को आवेदन देकर बेटे की शादी के लिए पांच दिन का पेरोल मांगा था. बताते चलें कि 12 मई को पटना में लालू यादव के बड़े बेटे तेजप्रताप की बिहार के पूर्व मंत्री चंद्रिका राय की बेटी ऐश्वर्या राय से शादी होगी.

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ब्राह्मणों ने कहा… ‘आरक्षणाय स्वाहा’

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भोपाल। ब्राह्म समागम जनकल्याण समिति ने आरक्षण के विरोध में चूना भट्टी चौराहा काली मंदिर के सामने आरक्षण के विरोध में हवन यज्ञ किया. यज्ञ में 51 पंडितों ने 5 हवन कुंडों में 1 क्विंटल हवन सामग्री से लोगों से आहूति दिलवाई. इसके साथ ही ब्राह्मण समाज के पदाधिकारियों ने आरक्षणाय स्वाहा मंत्र के साथ आंदोलन शुरू करने का ऐलान किया.

इस दौरान समिति के प्रदेश अध्यक्ष धर्मेन्द्र शर्मा का कहना है कि ब्रह्म समागम जनकल्याण समिति देश से आरक्षण हटाने के लिए चुनिंदा वकीलों से संपर्क साध रही है. समिति घर घर जाकर आरक्षण के विरोध में दस लाख ब्राह्णों से स्टाम्प पर शपथ पत्र भरवाकर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करेगी.

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बंगाल पंचायत चुनाव: तृणमूल को हराने साथ आई लाल और भगवा पार्टी

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कोलकाता। राजनीति में अब विचारधारा नहीं सत्ता की लड़ाई हो गई है. शायद यही वजह है कि विचारधारा के स्तर पर धुर विरोधी मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) और भाजपा ने साथ मिला लिया है. इन दोनों पार्टियों ने सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) को हराने के लिए नदिया जिले में हाथ मिला लिए हैं.

माकपा के जिला स्तर के एक नेता ने इसे ‘सीट बांटने के लिए एक औपचारिक सामंजस्य’ बताते हुए कहा कि पार्टी को कई सीटों पर ऐसा करना पड़ा क्योंकि कई गांववाले तृणमूल के खिलाफ आर-पार की लड़ाई चाहते थे. माकपा भाजपा को अकसर ‘विभाजनकारी ताकत’ बताती रही है. भाजपा की नदिया जिला शाखा के अध्यक्ष ने इसे एक ‘अकेला मामला’ बताया है. दोनों दलों में यह भाईचारा अप्रैल के आखिरी हफ्ते में दिखना शुरू हुआ था जब दोनों दलों ने पंचायत चुनाव प्रक्रिया के दौरान तृणमूल कांग्रेस की कथित हिंसा के खिलाफ नदिया जिले के करीमपुर-राणाघाट इलाके में एक संयुक्त विरोध रैली का आयोजन किया था.

पश्चिम बंगाल राज्य चुनाव आयोग के सूत्रों से मिली खबर के मुताबिक 3,358 ग्राम पंचायतों की 48,650 सीटों में से 16,814 पर निर्विरोध चुनाव हो रहा है, वहीं 341 पंचायत समितियों की 9,217 में से 3,059 पर एक ही प्रत्याशी मैदान में है.

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अखिलेश और आजम के डर से मुलायम मुझे तीसरे दरवाजे से बुलाते थे

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मऊ। एक जमाने में मुलायम सिंह के सबसे खास रहे अमर सिंह अब मुलायम सिंह से अलग हो चुके हैं. खुद को समाजवादी के बजाय मुलायमवादी कहने वाले अमर सिंह और मुलायम सिंह की जोड़ी टूटने के बाद अमर सिंह अक्सर तल्ख बयान देते रहते हैं. उत्तर प्रदेश के मऊ जिले में एक निजी कार्यक्रम में शामिल होने आए अमर सिंह ने पत्रकारों से बातचीत करते हुए एक बार फिर मुलायम सिंह पर जमकर भड़ास निकाली है.

अमर सिंह ने कहा कि मुलायम सिंह ने मेरा इस्तेमाल राजनीतिक वेश्या के रूप में किया. अमर सिंह ने कहा कि मैंने उन्हें नहीं छोड़ा बल्कि उन्होंने मुझे छोड़ा है. अमर सिंह ने कहा, ‘मैं आज भी मुलायम सिंह को नहीं छोड़ता लेकिन मैंने उनका नहीं बल्कि मुलायम सिंह ने मेरा परित्याग किया है. उन्होंने मेरे साथ राजनीतिक वेश्या के रूप में व्यवहार किया है. उन्होंने कहा कि अखिलेश, रामगोपाल और आजम खान के नाराज होने के डर से मुलायम मुझे तीसरे दरवाजे से घर बुलाते थे.

अमर सिंह ने कहा, ‘आप कहते हैं कि मैं मुलायम सिंह के साथ था तब क्यों नहीं बोलता था? मैं तब भी बोलता था इसीलिए मुझे दो बार निकाला भी गया. अगर नहीं बोलता तो नहीं निकाला जाता. मैं बोलता था यही तो मेरा अपराध था. सच बहुत कड़वा होता है मैंने यह कभी नहीं बोला कि मुलायम सिंह भगवान हैं और हम उनकी मूर्ति लगाकर पूजा कर रहे हैं.

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दलितों के घर भोजन पर एक पत्र संघ प्रमुख के नाम

आदरणीय मोहन भागवत जी,

आजकल आपके राजनीतिक संगठन भाजपा के नेताओं में भारी तामझाम के साथ दलितों के घर भोजन करने की होड़ लगी है और उनका यह काम काफी सुर्खियाँ बटोर रहा है. ऐसा होने का प्रधान कारण यह है कि आपके लोग दलितों के घर बना रुखा-सूखा न खाकर बाहर का बना सुस्वादु भोजन अपने साथ लाये नए बर्तनों में खाते हैं और उनके साथ फोटो खिंचवाकर चलते बनते तथा जमकर प्रचारित करते हैं. उनके ऐसा करने पर दलित बुद्धिजीवियों के साथ मीडिया भी तंज कसती है. दलितों के घर खाने की घटनाओं को अतिप्रचारित किये जाने से भाजपा के कई दलित सांसदों सहित खुद प्रधानमंत्री मोदी भी खासे नाराज हैं.

खैर! अगर दलितों के घर भोजन का करने का अभीष्ट छुआछूत का खात्मा है तो आपके लोगों के इस प्रयास से कोई फर्क नहीं पड़नेवाला है , यह दावा भाजपा के सांसद डॉ. उदित राज और लोजपा के रामविलास पासवान जैसे कई दलित नेता और बुद्धिजीवी भी कर चुके हैं. लेकिन आप अगर सचमुच छुआछूत के खात्मे के प्रति गंभीर हैं तो इस विषय पर सर्वाधिक चिंतन करने वाले डॉ. आंबेडकर के अध्ययन से लाभ उठा सकते हैं, जिन्होंने इस समस्या की उत्पत्ति और उत्खात पर निर्भूल चिंतन पेश किया है.

डॉ. आंबेडकर ने इसकी उत्पत्ति के कारणों का संधान करते हुए लिखा है-‘ अस्पृश्यता मुख्यतः धर्म पर आधारित है. हालांकि इससे हिंन्दुओं को आर्थिक लाभ होता है. जब कभी आर्थिक या सामाजिक हित की बात होती है , तब कुछ भी पवित्र या अपवित्र नहीं होता. ये हित समय और परिस्थिति के अनुसार बदलते रहते हैं. गुलाम-प्रथा और खेतिहर गुलाम-प्रथा क्यों कर मिट गयी और अस्पृश्यता क्यों कर नहीं मिटी, इसका यही कारण स्पष्ट है. दो अन्य प्रश्नों का उत्त्तर भी यही है. अगर हिन्दू अस्पृश्यता का पालन करते हैं, तो यह इसलिए कि उसका धर्म उसे ऐसा करने का आदेश देता है. अगर उसकी इस स्थापित व्यवस्था के विरुद्ध उठने वाले अस्पृश्यों का वह नृशंसतापूर्वक और अन्यायपूर्वक दमन करता है, तब उसका करण उसका अपना धर्म है, जो केवल इस बात की ही शिक्षा नहीं देता की यह स्थापित व्यवस्था दैवीय विधान है और इसलिए पावन है, बल्कि उस पर यह सुनिश्चित करने का कर्तव्य भी आरोपित करता है कि उसे इस स्थापित व्यवस्था को हर संभव उपाय से कायम रखना है.

अगर वह मानवता की पुकार को नहीं सुनता तो , तब उसका करण यह है कि उसका धर्म अस्पृश्यों को मानव समझने के लिए उसे बाध्य नहीं करता. अगर अस्पृश्यों को मारने – पीटने, उनके घरों को लूटने तथा जलाने और उन पर अत्याचार करते समय उसके विवेक का कुछ भी ध्यान नहीं रहता , तब उसका कारण यह है कि उसका धर्म उसे इस बात की शिक्षा देता है कि इस सामाजिक व्यवस्था की सुरक्षा करने के लिए किया गया कोई भी कर्म पाप नहीं है. ‘

जब यह स्थिति है तब अस्पृश्यता के खात्मे के लिए चिंतित व्यक्ति को क्या करना चाहिए, इसका बहुत ही सुस्पष्ट मार्ग सुझाते हुए डॉ. आंबेडकर ने अपनी मशहूर रचना ‘ जाति का विनाश’ में जात-पात तोड़क मंडल के सचिव संतराम बी.ए. को संबोधित करते हुए बताया है-‘छुआछूत को ख़त्म करने के आन्दोलन में लगे महात्मा गाँधी जैसे व्यक्ति भी यह महसूस नहीं करते कि लोगों के काम व व्यवहार उनके दिमाग में शास्त्रों के धार्मिक विश्वास का परिणाम होते हैं. और जब तक शास्त्रों में उनकी आस्था ख़त्म नहीं हो जाती, उनका व्यवहार कभी बदल नहीं सकता.

ऐसी स्थिति में यदि समाज सुधारकों के प्रयास सफल नहीं होते तो इसमें कोई ताज्जुब की बात नहीं. और आप जात-पात तोड़क मंडल के समाज सुधारक वही गलती करने जा रहे हैं. इसलिए आपकी कोशिशों का भी वही नतीजा होने वाला है जो छुआछूत मिटाने वाले समाज सुधारकों का हुआ है. आपसी सहभोज और आपस में विवाह के आन्दोलन चलाना व प्रचार कर संगठित करना, हिन्दुओं को जबरदस्ती घुट्टी पिलाने के समान काम है. लेकिन यदि आप हिन्दू स्त्री-पुरुषों को शास्त्रों की गुलामी से मुक्ति दिला दो , उनके दिमाग से शास्त्रों के नुकसानकारी प्रभाव हटा दो तो लोग आपके पूछे बिना अपनी इच्छा से ही अंतरजातीय भोज व विवाह अपनाने के लिए सहर्ष स्वीकार कर लेंगे.

दोहरी नीति अपनाने और टेढ़ी बातें करने से कोई लाभ नहीं. लोगों को यह बताने से कोई लाभ नहीं कि शास्त्रों में वैसा नहीं कहा गया है जैसा वे समझते हैं. महत्त्व इस बात का है कि शास्त्रों को किन अर्थों में वे ग्रहण करते हैं. आपको गौतम बुद्ध की तरह कठोरता से खड़े होकर डटे रहना होगा. आपको वह कदम उठाना होगा जो गुरु नानक ने उठाया. आपको सिर्फ यही नहीं करना है कि शात्रों को नजरअंदाज ही कर दिया जाय बल्कि बुद्ध व नानक की तरह आपको शास्त्रों को भी गलत कहना होगा, उनकी सत्ता व आदेशों को भी नकारना होगा. हिन्दुओं को यह बताने की आपमें हिम्मत होनी चाहिए कि असली दोष आपके धर्म का है: वह धर्म जिसने आप में जाति व्यवस्था के पवित्र होने की धारणा पैदा की. क्या आप इतना साहस जुटा पाएंगे !’

भागवत जी, तब 1936 में जात-पात तोड़क मंडल,लाहौर के संतराम बी.ए. यह कहने का साहस नहीं जुटा पाए थे कि अस्पृश्यता की भावना फ़ैलाने के लिए हिन्दू धर्म शास्त्र ही दोषी हैं तथा इन्हें डायनामाइट से उड़ा दिया जाना चाहिए. संतराम ही क्यों कोई भी हिन्दू समाज सुधारक वैसा करने का साहस नहीं जुटा पाया इसलिए छुआछूत की भावना हिन्दुओं में बनी हुई है . आज जबकि आपके आनुषांगिक संगठन अस्पृश्यता मिटाने का उपक्रम चला रहे हैं, उनके मुखिया के रूप में अतीत के समाज सुधारकों की भाँति अस्पृश्यता के लिए हिन्दू धर्मशास्त्रों को जिम्मेवार ठहराने का साहस आप भी नहीं जुटा पाएंगे , इसका इल्म इस लेखक को है. पर, यदि सचमुच आप छुआछूत की समस्या मिटाने के लिए दिल से इच्छुक हैं , तो धर्मशास्त्रों को अक्षत रखते हुए दलितों के लिए कुछ करने के लिए आपके सामने अन्य विकल्प भी है.

भागवत जी, जिस अस्पृश्यता की समस्या को आप जैसे लोग सिर्फ इस रूप में देखते हैं की इसके कारण लोग अस्पृश्यों का छुआ खाते-पीते नहीं, उन्हें घृणित समझ कर दूरी बरतते हैं, उन्हें सार्वजनिक स्थानों के इस्तेमाल से रोकते एवं स्पृश्य लोगों से दूर अलग-थलग बस्तियां बसा कर रहने के लिए विवश करते हैं, वह अस्पृश्यता का लौकिक व स्थूल रूप है. डॉ. आंबेडकर के अनुसार अस्पृश्यता का दूसरा नाम बहिष्कार है और शक्ति के स्रोतों(आर्थिक- राजनीतिक-शैक्षिक-धार्मिक) से बहिष्कार ही दलितों की असल समस्या है : कह सकते हैं 1-9 तक यही बहिष्कार ही दलितों की सबसे बड़ी समस्या है, जिसके लिए जिम्मेवार है हिन्दू धर्म . अगर अस्पृश्य इस बहिष्कार के शिकार नहीं होते, हिन्दू उन्हें मनुष्येतर प्राणी समझने के बावजूद , उनका बाल भी बांका नहीं कर पाते.

मान्यवर, जिसे हिन्दू धर्म कहा जाता है, उसका प्राणाधार वह वर्ण-व्यवस्था है , जो मुख्यतः शक्ति के स्रोतों के बंटवारे की व्यवस्था रही एवं जिसमे प्रत्येक वर्ण के लिए धर्मादेशों से पेशे/कर्म निर्दिष्ट रहे. इन पेशों/कर्मो का अनुपालन ही विभिन्न वर्णों में बंटे हिन्दू का धर्म कहलाता है. इसमें ब्राह्मण का धर्म अध्ययन-अध्यापन, पौरोहित्य व राज्य संचालन में मंत्रणा दान: क्षत्रिय का राज्य संचालन, सैन्य वृति एवं वैश्यों का धर्म पशुपालन , व्यवसाय-वाणिज्य कर्म रहा. चूँकि पेशों की विचलनशीलता धर्मादेशो द्वारा पूरी तरह निषिद्ध रही, इसलिए जिस वर्ण को जो पेशे दिए गए , पीढ़ी दर पीढ़ी उस वर्ण के लोग वही/पेशे कर्म करने के लिए बाध्य रहे. ऐसा होने के फलस्वरूप वर्ण व्यवस्था एक आरक्षण व्यवस्था, जिसे हिन्दू आरक्षण-व्यवस्था कह सकते हैं, के रूप में तब्दील होने के लिए अभिशप्त हुई. इस हिन्दू आरक्षण में सदियों से ही शक्ति के समस्त स्रोत ब्राह्मण-क्षत्रिय और वैश्यों से युक्त सवर्णों के लिए आरक्षित रहे. इस हिन्दू आरक्षण-व्यवस्था में शूद्रों(आज के पिछड़ों ) और अतिशूद्रों (अस्पृश्यों) के मध्य वितरित की गयी शक्ति के स्रोतों के एकाधिकारी तीन उच्चतर वर्णों की सेवा, वह भी निःशुल्क! इसमें अस्पृश्यों को चिरकाल के लिए अध्ययन-अध्यापन, आध्यात्मानुशीलन, सैन्य वृत्ति, राजनीति , भूस्वामित्व, व्यवसाय – वाणिज्य इत्यादि पेशे/ कर्मों से बहिष्कृत होकर रह जाना पड़ा.

हिन्दू धर्म के सौजन्य से हजारों साल से शक्ति के स्रोतों से बहिष्कार ही अस्पृश्यों को मानव जाति के सम्पूर्ण इतिहास में सबसे घृणित व दुर्बल मानव समुदाय में तब्दील कर दिया. अगर दलित बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर को अपना मसीहा मानते हैं: उन्हें किसी भी भगवान से ज्यादा महत्त्व देते हैं तो इसलिए कि उन्होंने हिन्दू धर्म द्वारा शक्ति के समस्त स्रोतों बहिष्कृत किये गए मानवेतरों को अपने अथक प्रयास से शक्ति के कई स्रोतों में हिस्सेदारी सुनिश्चित करने का असंभव सा चमत्कार घटित कर डाला. उन्होंने इनके लिए आरक्षण का जो प्रावधान किया उसके फलस्वरूप हिन्दू आरक्षण के चिर-वंचित : अछूत बाबू, आइएएस, पीसीएस , डॉक्टर,इंजीनियर, प्रोफ़ेसर, सांसद, विधायक इत्यादि बन कर शक्ति के स्रोतों से जुड़ने लगे. और आप पाएंगे कि जो अस्पृश्य शक्ति के स्रोतों से जुड़े, उच्च वर्णीय लोग उनके साथ भोजन करने व मित्रता स्थापित करने में कोताही नहीं बरते. आजाद भारत में हिन्दू सिर्फ उन दलितों के साथ खुला भेदभाव करने करने का दुसाहस करते हैं, जो आज भी शक्ति के स्रोतों से जुड़ नहीं पाए हैं. तो समझ गए न असल समस्या शक्ति के स्रोतों से बहिष्कार है.

बहरहाल अछूतों का शक्ति के स्रोतों से जुड़ना हिन्दू आरक्षण के विवेकशून्य सुविधाभोगी वर्ग को कभी रास नहीं आया, इसलिए वे पूना-पैक्ट के ज़माने से आरक्षण का विरोध करते रहे. किन्तु धीरे-धीरे वे अछूतों के आरक्षण को झेलने की, अनिच्छापूर्वक ही सही, मानसिकता विकसित कर लिए. लेकिन 7 अगस्त, 1990 को प्रकाशित मंडल रिपोर्ट ने हिन्दू आरक्षण के सुविधाभोगियों को सीधे शत्रु की भूमिका में उतार दिया और उन्होंने क्या किया, इसे बताना कलम की स्याही का दुरूपयोग होगा. हाँ यह जान लीजिये कि बहुजनों के आरक्षण के खात्मे के लिए 24 जुलाई , 1991 को देश पर नवउदारवादी अर्थनीति थोपी गयी जिसे आगे बढ़ाने कांग्रेसी नरसिंह राव व डॉ. मनमोहन सिंह के साथ आपके परम श्रद्धेय अटल बिहारी वाजपेयी ने एक दूसरे से होड़ लगाया. लेकिन आरक्षण के खात्मे के जरिये पिछड़े-आदिवासियों के साथ अस्पृश्यों को शक्ति के स्रोतों दूर धकेलने का जितना काम राव-वाजपेयी और डॉ. सिंह ने दो दशकों में किया, उससे कही ज्यादा आंबेडकर प्रेम –प्रदर्शन में सबसे आगे रहने वाले स्वयंसेवी मोदी जी ने कर दिया है.

यूपी के सीएम योगी के दावे के मुताबिक जबतक दुनिया है आरक्षण जरुर रहेगा, लेकिन वह नाम का होगा. 24 जुलाई ,1991 से दलित-बहुजनो को शक्ति के स्रोतों से दूर धकेलने की जो साजिश शुरू हुई, आज वह पूर्णता को प्राप्त कर चुकी है. इसका सबसे बुरा प्रभाव आंबेडकर के लोगों पर पड़ने जा रहा है. वे अबतक धनार्जन के एकमात्र स्रोत नौकरियों पर निर्भर रहे, लेकिन मंडल उत्तरकाल में शासकों की साजिश से , जिसमे आपके स्वयंसेवी भी शामिल हैं, वह स्रोत लगभग सूख चुका है. इससे अछूत पुनः पहले की स्थिति में पहुँचने जा रहे हैं.

मोदी जी तो आंबेडकर प्रेम में सबको बौना बनाते ही रहे हैं, आपने भी कुछ साल पहले बाबा साहब को ‘भारतीय पुनरुत्थान के पांचवें चरण के अगुआ’ के रूप में आदरांजलि दी थी. अब यह जान लीजिये कि सरकारी नौकरी के रूप में धनार्जन के एकमात्र स्रोत के सूख जाने के बाद आंबेडकर के लोग विशुद्ध गुलाम के रूप में परिणित होने जा रहे हैं. ऐसी स्थिति में जैसा कि पहले कह चुका हूँ, हिन्दू धर्म और शास्त्रों के खिलाफ कुछ बोले बिना भी अछूतों के हित में करने का विकल्प है. और वह विकल्प यह है कि उन्हें आप सप्लाई, डीलरशिप, ठेकों, पार्किंग, परिवहन इत्यादि धनार्जन के अन्य स्रोतों में हिस्सेदारी सुनिश्चित कराने में अपने राजनीतिक संगठन पर दबाव बनायें. ऐसा करने पर भाजपा नेतृत्व को भी खूब आपत्ति नहीं होगी. क्योंकि भाजपा ने लोकसभा चुनाव-2009 के घोषणापत्र के पृष्ठ-29 पर दलित-पिछड़ों में उद्यमशीलता को बढ़ावा देने का वादा किया था. यदि नौकरियों के अतिरिक्त धनार्जन के अन्य स्रोतों में अछूतों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित कराने में आप अपनी क्षमता का इस्तेमाल नहीं कर सकते, तब तो मैं समझूंगा संघ और उसके आनुषांगिक संगठनों का आंबेडकर और उनके लोगों के प्रति प्रेम प्रदर्शन महज एक नौटंकी है.

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हिन्दू नहीं बल्कि इस धर्म से हुई सोनम कपूर की शादी

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मुंबई। फिल्म जगत के खानदारी परिवार की बेटी सोनम कपूर की शादी आज 8 मई को आनंद अहूजा से हो गई. यह शादी दिन में ही संपन्न हो गई. हालांकि यह शादी हिन्दू धर्म के रीति-रिवाजों से नहीं हुई, बल्कि सिख धर्म के मुताबिक हुई. यह बात सोनम के आनंद कारज की तस्वीरें सामने आने के बाद साफ हो गई. आनंद कारज हिंदू धर्म के विवाह से बिल्‍कुल अलग माना जाता है. यह रस्म दिन में होती है.

पारंपरिक हिन्दू शादि‍यों में लग्न, मुहूर्त, जन्मपत्रियों का मिलाना जरूरी होता है. आनंद कारज में ये रस्म ज्यादा महत्व नहीं रखते हैं. सिख धर्म में जो लोग गुरु पर पूरी आस्‍था रखते हैं, वे आनंद कारज करते हैं. उनके लिये हर दिन पवित्र होता है. आनंद कारज में ग्रंथी गुरुग्रंथ साहिब का पाठ करते हैं. इस दौरान सभी परिजनों के सिर पर पगड़ी या सरापा होता है. ये रस्म फेरों से पहले होती है. इस रस्म के दौरान कई बॉलीवुड सेलेब मौजूद रहे. सोनम के आनंद कारज की रस्में सुबह 11 से 12:30 बजे के बीच पूरी हुई. सोनम की शादी उनकी मौसी कविता सिंह के पुश्तैनी बंगले रॉकडेल (बांद्रा) में हुई. तमाम रस्मों में परिवार के सभी सदस्यों ने हिस्सा लिया. सोनम कपूर को शादी के मंडप तक लाने का काम उनके भाई हर्षवर्धन और अर्जुन कपूर ने किया.

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दलित समाज से जुड़े मामले में यूपी सरकार को मानवाधिकार आयोग का नोटिस

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बागपत। उत्तर प्रदेश के बागपत जिले में दलित युवक की पिटाई से मौत और उसके बाद दलित परिवारों के पलायन मामले में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने यूपी सरकार को नोटिस जारी किया है. मामले का स्वतः संज्ञान लेते हुए आयोग ने चार हफ्ते के भीतर अब तक की गई कार्रवाई के बारे में बताने को कहा है. साथ ही पीड़ित दलित परिवारों को राहत और उनके पुनर्वास के लिए सरकार ने क्या कदम उठाए हैं, इसकी भी जानकारी मांगी है.

इस मामले में आरोप है कि बागपत के कमाला गांव में एक दलित युवक और गुज्जर महिला के बीच संबंध के चलते दलित युवकों पर दबंगों ने हमला किया गया. हमले में 19 साल के युवक की जान चली गई, वहीं उसका 16 साल का साथी घायल हो गया. इस दौरान दलितों को मारे-पीटे जाने की धमकी दी गई. इससे डरे दलित समाज के लोगों ने घर खाली कर दिया.

मामले में आईजी मेरठ रेंज ने कहा ​है कि सभी सातों आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया है. वहीं पीड़ित के घर के आसपास सुरक्षा के प्रबंध किए गए हैं. मामले में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने स्वत: संज्ञान लेते हुए प्रदेश के मुख्य सचिव और डीजीपी से घटना के संबंध में विस्तृत रिपोर्ट तलब की है. आयोग ने इस घटना को मानवाधिकार का खुला उल्लंघन बताया है.

राहुल गांधी ने कहा, 2019 में प्रधानमंत्री बनने को तैयार

बंगलुरू। कर्नाटक चुनाव प्रचार के दौरान स्थानीय पत्रकारों से बात करते हुए राहुल गांधी ने भाजपा के मुख्यमंत्री प्रत्याशी येदुरप्पा और रेड्डी बंधुओं के भ्रष्टाचार के मुद्दे पर पीएम मोदी को जमकर घेरा. लेकिन इस दौरान केंद्र की राजनीति से जुड़े एक सवाल का जवाब देकर राहुल गांधी ने देश भर के लोगों को एक संदेश दे दिया है.

कर्नाटक में चुनाव प्रचार के दौरान बेंगलुरु में पत्रकारों से बात करते हुए राहुल ने बतौर पीएम अपनी उम्मीदवारी पर सीधा जवाब दिया. पत्रकार ने पूछा कि अगर साल 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस बड़ी पार्टी बन कर उभरती है तो क्या वो पीएम बनेंगे? इस पर राहुल ने सीधे कहा- ‘हां, क्यों नहीं.’ राहुल ने कहा कि कुछ राज्यों में हम अगर अपनी रणनीति पर काम करेंगे तो शायद ही कांग्रेस को साल 2014 सरीखे परिणाम मिलें. उन्होंने कहा कि मेरा आंकलन सही होगा और साल 2019 में नरेंद्र मोदी पीएम नहीं बनेंगे.

राहुल गांधी के इस जवाब के बाद देश भर के कांग्रेस कार्यकर्ताओं में उत्साह का माहौल है. तो वहीं उन्होंने यह भी संदेश दे दिया है कि 2019 का लोकसभा चुनाव सीधे-सीधे मोदी बनाम राहुल गांधी होने जा रहा है. यह पहली बार है जब राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री बनने को लेकर बयान दिया है. ऐसा इसलिए भी है कि गुजरात के बाद अब कर्नाटक में भी भले ही स्थानीय चेहरे चुनाव लड़ रहे हों, सीधा मुकाबला राहुल गांधी और नरेन्द्र मोदी के बीच दिख रहा है. संभव है कि राहुल गांधी को यह अहसास हो गया हो कि जब तक वो सीधे तौर पर मोदी को चुनौती नहीं देंगे तब तक बात बनने वाली नहीं है. शायद इसी वजह से राहुल गांधी ने इस संशय को दूर कर दिया है ताकि कार्यकर्ताओं में उत्साह फूंका जा सके.

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