बेटी के लिए मासूम बेटे की हत्या, मां गिरफ्तार

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नई दिल्ली। एक ऐसी दर्दनाक घटना सामने आई है जो कि आपको झकझोर कर रख देगी. लोग बेटे के लिए बेटी की हत्या कर देते हैं लेकिन एक मां ने बेटी के लिए मासूम बेटे को पानी में डूबोकर मौत के घाट उतार दिया. शव पानी से भरे टब में पड़ी मिली. पुलिस ने शव जब्त कर लिया है.

महाराष्ट्र के औरंगाबाद में एक दिल दहला देने वाली घटना सामने आई है. यहां एक महिला ने ‘बेटी’ की चाह में अपने 10 महीने के बेटे की हत्या कर दी. नेटवर्क18 की खबर के अनुसार यह मामला तीन दिन पुराना है. तीन दिन पहले महिला ने पुलिस थाने में अपने बेटे के गायब होने की शिकायत दर्ज कराई थी. पुलिस ने जब बच्चे की तलाश शुरू की तो शक की सुई मां की तरफ भी घूमी. जब पुलिस ने महिला के घर की तलाशी ली तो बाल्टी से 10 महीने के मासूम का शव मिला, जिसके बाद यह मामला प्रकाश में आया.

हालांकि पूछताछ में महिला ने अपने मासूम बेटे की हत्या की बात स्वीकार कर ली है. बताया जा रहा है कि पहले बेटे के बाद महिला बेटी चाहती थी, लेकिन दूसरी बार भी उसने बेटे को जन्म दिया. परिवार के डर और डर के कारण मां ने बेटे की हत्या कर दी. मामले में पुलिस ने हत्या की आरोपी मां को गिरफ्तार कर लिया है.

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बसपा की राह पर बीजेपी, 2019 में जीतने की तैयारी!

नई दिल्ली। एक बात तो साफ हो चुकी है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में मायावती पीएम नरेंद्र को कड़ी टक्कर देंगीं. शायद इसलिए बीजेपी बसपा की नकल कर मात देने की तैयारी में जुटी है. वैसे यह जानकार हैरानी होगी कि बसपा जिन रणनीतियों पर सालों से चुनाव लड़ रही है उसी राह पर चलकर बीजेपी 2019 का लोकसभा चुनाव जीतने की तैयारी में है. अमित शाह व उनकी टीम बहुजन समाज पार्टी की तर्ज पर काम कर रही है.

24 जून को हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार बीजेपी 543 लोकसभा क्षेत्रों में प्रभारी नियुक्त करेगी. अगले वर्ष 2019 के संसदीय चुनावों की तैयारी शुरू करने के लिए हर राज्य में 11 सदस्यीय समिति की स्थापना करेगी. बीजेपी ऐसा पहली बार कर रही है जबकि बसपा इससे पहले इन नीतियों पर चुनाव लड़ते आ रही है. पूर्णं बहुमत वाली मोदी सरकार बनाने में भी बसपा की रणनिती का बहुत बड़ा हाथ था. 2014 लोकसभा चुनाव में अमित शाह ने हर बूथ पर कैंडिडेट नियुक्त किया था. बूथ पर कैंडिडेट नियुक्त करने की शुरूआत बसपा के संस्थापक कांशीराम ने की थी.

इसके अलावा बीजेपी 2019 के लिए 11 सदस्यीय पैनल बना रही है जिसको “चुनावी तैयारी टोली” कहा जाएगा. ये टीम स्पेशल टास्क पर काम करेगी. बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह सभी राज्यों के दौरा करना आरंभ कर दिया है. शाह ने इसकी शुरूआत 10 जून से छत्तीसगढ़ की है. वैसे इससे साफ पता चलता है कि रणनीतियों की नकल करना बीजेपी के लिए कोई नई बात नहीं है.

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यूपी में आधा दर्जन दलितों ने हिंदू धर्म छोड़ा

प्रतीकात्मक फोटो

लखनऊ। सवर्णों के अत्याचार से तंग आकर उत्तर प्रदेश के दलित हिंदू धर्म छोड़ रहे हैं. हरियाणा के बाद यूपी के करीब आधा दर्जन दलित परिवारों ने बौद्ध धर्म अपनाया. हिंदू धर्म छोड़ने वाले दलितों का कहना है कि हिंदू धर्म के लोग सिर्फ उनका इस्तेमाल करते हैं, अत्याचार करते हैं. ऐसे धर्म में रहने का कोई मतलब नहीं है.

उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के अमीनगर सराय में सिंघावली अहीर गांव के आधा दर्जन दलित परिवारों ने धर्म परिवर्तन करते हुए बौद्ध धर्म अपना लिया. अमर उजाला की खबर के अनुसार बौद्ध संत प्रियंतीस भंते ने इन्हें दीक्षा दी. वहीं धर्म में शामिल करने के प्रमाणपत्र भी सौंपे. धर्म परिवर्तन करने वाले परिवारों का कहना है कि दलितों पर अत्याचार बढ़ रहे हैं. इसी की वजह से यह कदम उठाया गया है. रविवार को धर्म परिवर्तन करने वाले मुन्ना लाल, बाबू, अजीत, अजय, मोनू, सोनू ने कहा कि समाज पर हर रोज अत्याचार हो रहे हैं. आज भी उन्हें छूआछूत की नजरों से देखा जाता है. कहीं भी उनकी सुनवाई नहीं होती. ऊंची जाति के लोग उन्हें हीन भावना से देखते हैं.

जबकि ग्राम प्रधान सतवीर यादव ने बताया कि बौद्ध धर्म दलितों ने क्यों अपनाया है इसकी जानकारी नहीं है. गांव में तो आज तक कोई उन पर अत्याचार भी नहीं हुआ है. वह हमेशा उनके पक्ष में खड़े रहे हैं. शनिवार को दूसरे समुदाय के व्यक्ति से मामूली विवाद में झगड़ा हो गया था, जिसको शांत कराया. वैसे यहां पर दलितों को करीब 200 परिवार रहते हैं. संभावना है कि इसके बाद अन्य दलित भी बौध्द धर्म का रास्ता अपनाएंगे.

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बसपा ने दिल्ली में बदला प्रदेश अध्यक्ष

नई दिल्ली। बहुजन समाज पार्टी की दिल्ली इकाई में बड़ा फेरबदल हो गया है. खबर के मुताबिक कई सालों से दिल्ली के प्रदेश अध्यक्ष पद पर जमें सी.पी सिंह की छुट्टी हो गई है. उनकी जगह पार्टी के मिशनरी कार्यकर्ता और पूर्व विधायक सुरेन्द्र सिंह को नया प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया है. 22 जून को बसपा की राष्ट्रीय अध्यक्ष सुश्री मायावती के दिल्ली आवास पर हुई बैठक में बसपा प्रमुख ने यह फैसला लिया.

सुरेन्द्र सिंह बहुजन समाज पार्टी के कर्मठ कार्यकर्ता हैं. साल 1998 में पार्टी ज्वाइन करने के बाद वह लगातार बसपा से जुड़े रहे हैं. सुरेन्द्र सिंह ने पहला चुनाव बसपा के टिकट पर 2003 में रोहतास नगर विधानसभा से लड़ा. इसमें वह तीसरे नंबर पर रहें. 2008 में बसपा ने उन्हें गोकुलपुरी से टिकट दिया. सुरेन्द्र सिंह इस सीट से 3800 वोटों से जीतकर पहली बार विधायक बने. हालांकि 2013 में सुरेन्द्र सिंह सीटिंग विधायक रहते हुए भी पार्टी की अंदरुनी गुटबाजी का शिकार हो गए और पार्टी का टिकट हासिल नहीं कर पाएं.

तब सुरेन्द्र सिंह ने गोकुलपुरी से निर्दलीय चुनाव लड़ा. हालांकि वह जीत न सकें और महज 1900 वोटों से दूसरे नंबर पर रहें. वोटों के इस मामूली अंतर से पराजित हो जाने के बाद सुरेन्द्र सीधे बसपा प्रमुख मायावती की नजर में आ गए जिन्होंने सुरेन्द्र को वापस पार्टी में बुला लिया.

सुरेन्द्र सिंह टिकट कटने से मायूस तो थे लेकिन बहुजन आंदोलन के सच्चे सिपाही की तरह वह एक बार फिर से बसपा के लिए काम करने में जुट गए. इस बीच अस्तित्व में आई आम आदमी पार्टी ने उनपर लगातार डोरे डाले और उन्हें आप में शामिल करने की कोशिश में जुटे रहे लेकिन सुरेन्द्र सिंह ने मिशन का दामन थामे रखा. आप की लहर के बावजूद सुरेन्द्र सिंह 30500 वोट हासिल करने में कामयाब रहे. उनकी निष्ठा को देखते हुए बसपा प्रमुख ने आखिरकार अब उन्हें प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी दे दी है.

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फ़िल्‍म प्रेमक बसातः दो मजहब के प्रेम की बेताब हवा

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नई दिल्ली। मैथिली फिल्‍म ‘प्रेमक बसात’ इन दिनों खासे चर्चा में है. प्रेम की नई परिभाषा गढ़ने वाली फिल्म के ट्रेलर ने दिलों को बैचेन कर दिया है. फिल्म के लेखक रूपक शरर ने प्रेम की नई कहानी लिखी है. यह एक ऐसी फिल्म है जिसमें कि विलेन नहीं है. समाज में प्रेम की हवा लेकर आ रहे निर्देशक रूपक शरर की बातचीत रवि रणवीरा, दलित दस्तक से हुई. इन्होंने जो फिल्म के बारे में बताया वो तो वाकई बेताब कर देने वाला है…

मैथिली फिल्‍म ‘प्रेमक बसात’, बतौर लेखक व निर्देशक रूपक शरर की पहली फिल्म है. इनका कहना है कि प्रेम बहुत पुराना विषय है लेकिन ऐसी कहानी भारतीय सिनेमा में पहली बार आ रही है. ज्यादातर प्रेम कहानियां जात-पात, अमीरी-गरीबी, विलेन-हीरो तक ही सिमट कर रह जाती हैं, लेकिन मैथिली फिल्‍म ‘प्रेमक बसात’ इससे हटकर है. जो कि दर्शकों देखने के लिए विवश करेगी.

दो मजहब के प्रेम को बताने वाली यह फिल्म, यू-ट्यूब से लेकर सोशल मीडिया व मेनस्ट्रीम मीडिया में धमाल मचाई हुई है. ट्रेलर आने के बाद बेसब्री से फिल्म का इंतजार किया जा रहा है. हालांकि इसको लेकर निर्देशक का कहना है कि निर्माण कार्य अंतिम दौर में है. सेंसर आदि के बाद फिल्म बहुत जल्द पर्दे पर आ जाएगी.

वैसे तो मैथिली फिल्म का बाजार व्यापक नहीं है फिर भी मातृभाषा को बढ़ावा देने के लिए फिल्म निर्माता वेदांत झा व कार्यकारी निर्माता कुणाल ठाकुर ने दिल खोलकर हाथ बढ़ाया. इनका मानना है कि इस फिल्म से मैथिली सिनेमा को नया बाजार मिलेगा. वैसे इस फिल्म के रिलीज के लिए प्रेमक बसात की टीम नेपाल, कतर, दुबई, दोहा आदि जाने वाली है. संभावना है कि नेपाल में फिल्म सबसे पहले रिलीज होगी.

फिल्म के अभिनेता पियूष कर्ण व अभिनेत्री रैना बनर्जी की पहली फिल्म है.

वैसे फिल्म की शूटिंग बिहार में हुई है. पिछले साल सितंबर में फिल्म का काम शुरू किया गया था. ‘प्रेमक बसात’ का म्‍यूजिक रिलीज मुंबई में एक भव्‍य कार्यक्रम के दौरान कुछ दिन पहले ही संपन्‍न हुआ. इस फिल्म का म्यूजिक हिंदी व भोजपुरी सिनेमा के हस्तियों के हाथों किया गया. फिल्‍म ‘प्रेमक बसात’ कई मामलों में खास है, जिसमें म्‍यूजिक भी प्रमुख है.

प्‍ले बैक सिंगर उदित नारायण के बेटे

‘प्रेमक बसात’ मैथिली की पहली ऐसी फिल्‍म है, जिसमें मशहूर प्‍ले बैक सिंगर उदित नारायण के बेटे आदित्‍य नारायण ने पहली बार अपनी आवाज में गाना गया है. प्रेमक बसात के सभी गानें टी-सीरीज के यू-ट्यूब चैनल से लांच होंगे. रूपक शरर का कहना है कि फिल्‍म के सभी गानें बेहतरीन म्‍यूजिक और लिरिक्‍स के साथ बने हैं. इस फिल्‍म के गानें मैथिली की मिठास बढ़ा देंगे. इस फिल्म का संगीत सरोज सुमन, प्रवेश मल्लिक व एस कुमार का है. जेएमके इंटरटेनमेंट के बैनर तले बनी मैथिली फिल्म ‘प्रेमक बसात’ जल्द ही सिनेमा घरों के पर्दे पर आ जाएगी.

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लश्‍कर-ए-तैयबा की ऑनलाइन मैग्जीन, तबाही का संदेश

नई दिल्ली। पाकिस्तानी आतंकी संगठन लश्‍कर-ए-तैयबा ने ऑनलाइन मैग्जीन जारी की है. इसके द्वारा लश्‍कर-ए-तैयबा ने कश्मीर में तबाही का संदेश दिया है. लश्कर ने कहा है कि साल 2018 कश्मीर घाटी में भारतीय सुरक्षाबलों के लिए मुश्किल होने वाला है. इसके लिए हमारे साथी काम कर रहे हैं. हम लोगो कश्मीर की आजादी की लड़ाई में पूरा सहयोग करेंगे. इस तरह की बातों को लेकर लश्‍कर-ए-तैयबा ने खौफनाक संदेश दिया है.

कश्मीर में ‘आम आदमी के संघर्ष’ में मदद…

लश्‍कर की इस मैग्जीन का नाम “Wyeth” है. इसमें लश्कर के प्रवक्‍ता अब्‍दुल्‍ला गजनवी ने इंटरव्‍यू देकर अपनी दिली तमन्ना जाहिर की है. इसके अलावा मैग्जीन में उन आतंकी हमलों की एक लिस्‍ट भी दी गई है जो साल 2017 में इसे कैडर्स की ओर से अंजाम दिए गए. मैग्जीन में कहा गया है कि कश्मीर में वह ‘आम आदमी के संघर्ष’ में मदद कर रहा है.

गजनवी ने इंटरव्यू में इस सवाल का भी जवाब दिया है कि क्‍या लश्‍कर, पाकिस्‍तान सेना का ही अंग है? कश्‍मीर में आजादी के अधूरे एजेंडे को पूरा करने के लिए संघर्ष को नैतिक और कानूनी तौर पर समर्थन देना पाकिस्‍तान की मजबूरी है.  गजनवी ने कहा कि अब तक लश्‍कर की ओर से कुरान और हादिथ पर आधारित साहित्‍य को वितरित किया जाता रहा है.

हिंदुस्तान की खबर के मुताबिक, आईबी के पूर्व स्पेशल डायरेक्टर अरुण चौधरी ने कहा, लश्कर हमेशा से टेक सेवी रहा है. वह सोशल मीडिया के माध्यम से स्थानीय लड़कों को उग्रवाद की ओर धकेलने में लगा रहता है. घाटी तक पहुंचने के लिए ऑनलाइन मैग्जीन लश्कर के लिए सबसे अच्छा तरीका है.

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स्कूल टॉयलेट में जाकर लड़की को पंद्रह बार चाकू मारने वाला गिरफ्तार

गुजरात। अपनी ही जूनियर को 15 बार चाकू से गोदकर बेहरमी से मौत के घाट उतारने वाले को पुलिस ने धर दबोचा है. गुजरात पुलिस ने वडोदरा स्कूल के 10वीं क्लास में पढ़ने वाले एक आरोपी छात्र को गिरफ्तार किया है. उसके ऊपर शुक्रवार को टॉयलेट में अपने जूनियर की हत्या करने का आरोप है. इस घटना ने पिछले साल हरियाणा के गुरुग्राम की दर्दनाक घटना की याद ताज़ा कर दी. जब वहां के रेयान इंटरनेशनल स्कूल में एक छात्र की गला रेतकर टॉयलेट के अंदर ही हत्या कर दी गई थी. और उसमें भी आरोपी सीनियर छात्र ही था.

3चाकू और रेड चिली सॉल्यूशन से भरी बोतल

बाथरूम में मिला हत्या से जुड़ा सामान

बारनपुर स्थित भारती विद्यालय के आरोपी छात्र को चाकू मारते हुए छात्रों ने देखा था. इसकी पुष्टि करते हुए  पुलिस कमिश्नर मनोज शशिधर ने बताया कि चार स्कूली छात्रों ने आरोपी को चाकू मारते हुए देखा था. पुलिस ने बताया कि आरोपी का एक स्कूल बैग स्कूल के पास मंदिर के चबूतरे पर मिला है. इसके अंदर तीन चाकू और एक रेड चिली सॉल्यूशन से भरी बोतल मिली है. एक अधिकारी ने बताया कि एक और 12 इंच का चाकू लड़की के शव के पास से बरामद किया गया है.

स्कूल से जुड़े एक स्टाफ ने बताया कि 9वीं के छात्र ने इसी साल दाखिला लिया था. उन्होंने आगे बताया- “सुबह करीब साढ़े ग्यारह बजे प्राइमरी के छात्रों ने टीचर्स को बताया कि बाथरूम में एक लाश पड़ी हुई है.” इस घटना के बाद स्कूल में मातम पसर गया था. पुलिस इस मामले को लेकर और लोगों से पूछताछ कर रही है.

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अमित शाह फिर घिरे, नोटबंदी में सबसे ज्यादा 750 करोड़ रुपये जमा

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नई दिल्ली। बीजेपी अध्यक्ष एक बार फिर चर्चा में हैं. नोटबंदी में सबसे ज्यादा नोट जमा करने को लेकर चर्चाएं तेज हो रही हैं. बताया जा रहा है कि भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह जिस जिला सहकारी बैंक के निदेशक हैं, वहां नोटबंदी के फैसले के बाद करीब 750 करोड़ रुपये जमा किए गये थे.

समाचार एजेंसी आईएएनएस के मुताबिक मुंबई के एक आरटीआई कार्यकर्ता की याचिका के जवाब में यह खुलासा हुआ है. गौरतलब है कि 08 नवंबर, 2016 को प्रधानमंत्री मोदी ने 500 और 1000 के नोटों को बंद करने का फैसला लिया था और जनता को बैंकों में अपने पास जमा पुराने नोट बदलवाने के लिए 30 दिसंबर, 2016 तक यानी 50 दिनों का समय दिया गया था.

बैंक के निदेशक अमित शाह

इस फैसले के पांच दिन बाद यानी 14 नवंबर, 2016 को सरकार की ओर से यह निर्देश दिया गया कि किसी भी सहकारी बैंक में नोट नहीं बदले जाएंगे. ऐसी आशंका थी कि जमा काले धन को सफेद करने के लिए ऐसे बैंकों का दुरुपयोग हो सकता है. इस आरटीआई के जवाब में यह सामने आया है कि अहमदाबाद जिला सहकारी बैंक (एडीसीबी) ने इन्हीं पांच दिनों में 745.59 करोड़ मूल्य के प्रतिबंधित नोट जमा किए. बैंक की वेबसाइट के मुताबिक अमित शाह अब भी इस बैंक के निदेशक हैं और इस पद पर कई सालों से बने हुए हैं. साल 2000 में वे इस बैंक के अध्यक्ष भी थे. 31 मार्च 2017 तक एडीसीबी में कुल 5,050 करोड़ रुपये जमा हुए थे और वित्त वर्ष 2016-17 का इसका मुनाफा 14.31 करोड़ का था.

मनोरंजन ने आईएएनएस से बात करते हुए कहा, ‘नोटबंदी के फैसले के  बाद राज्य सहकारी बैंकों और जिला सहकारी बैंकों में जमा हुई राशि के बारे में पहली बार आरटीआई के तहत कोई जानकारी सामने आई है और यह चौंकाने वाली है.’ इससे पहले भी अमित शाह अपने बेटे की कंपनी के ट्रांजेक्शन को लेकर चर्चा में थे.

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ग्वालियर में बसपा के कद्दावर नेताओं ने बिगुल फूंका

ग्वालियर। बसपा राज्य के प्रमुख स्थानों पर जाकर पार्टी को मजबूत करने की कवायद शुरू कर दी है. भोपाल के बाद ग्वालियर में पार्टी ने 2019 के लिए रणनीति के तहत कार्यकर्ताओं के साथ चर्चा किया. मध्य प्रदेश में अकेले चुनाव लड़ने की तैयारी को लेकर पार्टी की गतिविधियां तेज दिख रही हैं. बसपा के राष्ट्रीय महासचिव व पूर्व केंद्रीय मंत्री रामअचल राजभर ने कार्यकर्ताओं की बातें सुनी.

प्राप्त जानकारी के अनुसार 22 जून को डॉ. भगवत सहाय मेडिकल सभागार आमखो कम्पू ग्वालियर मे जोन स्तरीय, जिला, विधानसभा एवं सेक्टर स्तरीय कार्यकर्ता समीक्षा व प्रशिक्षण सम्मेलन का आयोजन किया गया. कार्यक्रम की अध्यक्षता रामअचल राजभर ने किया. इस दौरान रामअचल राजभर ने कहा कि देशभर में बदलाव की लहर चल रही है. हमारी पार्टी की पकड़ मजबूत हो रही है. हमें और भी तेजी से मिलकर काम करना होगा. साथ ही आने वाले लोकसभा चुनाव में बसपा सुप्रीमो के सपनों को साकार करना है.

इस मौके पर मध्य प्रदेश के बसपा प्रदेश अध्यक्ष नर्मदा प्रसाद अहिरवार ने कहा कि कार्यकर्ता अपने-अपने क्षेत्रों के लोगों के साथ मिलकर पार्टी की बातों को बताएं. साथ ही लोगों की मदद भी करें. इस कार्यक्रम में राज्यसभा सांसद डॉ.अशोक सिध्दार्थ, भूपेन्द्र मौर्य, पी.एस मंडेलिया, मानसिंह कुशवाह, डीपी चौधरी, रामवीर सिंह कुशवाह, मनीष कत्रोलिया व कार्यकर्ता मौजूद थे.

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दिल्ली बसपा में बड़े फेरबदल की खबर, अध्यक्ष सी.पी सिंह की छुट्टी तय

फाइल फोटो

नई दिल्ली। बहुजन समाज पार्टी की दिल्ली इकाई में बड़े फेरबदल की खबर आ रही है. सूत्रों से आ रही खबर के मुताबिक कई सालों से दिल्ली के प्रदेश अध्यक्ष पद पर जमें सी.पी सिंह की छुट्टी तय मानी जा रही है. उनकी जगह नया प्रदेश अध्यक्ष कौन बनेगा, यह अभी तय नहीं है लेकिन पूर्व विधायक सुरेन्द्र सिंह का नाम सबसे आगे है. पार्टी सूत्रों के मुताबिक बसपा की राष्ट्रीय अध्यक्ष सुश्री मायावती पूर्व विधायक सुरेन्द्र सिंह के नाम पर मुहर लगा सकती हैं.

सुरेन्द्र सिंह काफी लंबे समय से पार्टी से जुड़े हैं. वह बसपा के टिकट पर विधायक भी रह चुके हैं. लेकिन पार्टी की अंदरुनी राजनीति का शिकार होने के कारण उनका टिकट काट दिया गया था, जिसकी वजह से वह निर्दलीय चुनाव लड़ते हुए मामूली अंतर से चुनाव हार गए थे. हालांकि पार्टी का टिकट नहीं मिलने के बावजूद उन्होंने किसी दूसरी पार्टी को ज्वाइन नहीं किया और बसपा के प्रति अपनी निष्ठा बनाए रखी. उनकी निष्ठा को देखते हुए आखिरकार अब उन्हें प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी मिलना लगभग तय माना जा रहा है.

बीजेपी को झटका देने वाले जस्टिस चेलमेश्वर के वो फैसले

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट में 7 साल तक सेवा देने के बाद जस्टिस चेलमेश्वर 22 जून को रिटायर हो गए. कई मौके पर जस्टिस चेलमेश्वर का कार्यकाल विवादित रहा. और जाते-जाते भी वो चर्चा के केंद्र में रहे. इनके फैसलों ने आम आदमी को राहत दी तो वहीं सत्ता के हिटलरों को करारी मात भी दी. इनके पूरे कार्यकाल को देखें तो इस दौरान उन्होंने भाजपा को कई झटके दिए.

अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने चीफ जस्टिस की दो बार खिलाफत की. इन तमाम फैसलों के कारण जस्टिस चेलमेश्वर का कार्यकाल विवादों से भरा रहा लेकिन इससे आम लोगों को बड़ी राहत मिली. आइए जानते हैं इनके विवादित कोर्ट लाइफ के बारे में, जो कि बीजेपी के लिए खासे मुसीबत साबित हुए.

पहला मामला जज मामले से जुड़ा है

जज लोया की कथित हत्या के मामले में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह का नाम खूब चर्चा में रहा. इसको लेकर जजों का तबादला भी हुआ लेकिन जस्टिस चेलमेश्वर खामोश होकर तमाशा देखने वालों में से नहीं थे. इन्होंने एमबी लोकुर और कुरियन जोसफ के साथ अदालत में केसों की चयन प्रक्रिया और 1 दिसंबर 2014 को सीबीआई के विशेष जज बी.एच. लोया की मौत के संवेदनशील मामलों को उठा गया. इसके बाद बीजेपी के पसीने छुटने लगे थे.

इसी से जुड़ा एक और मुद्दा चर्चा में रहा. यह दूसरी बार था, जब जस्टिस चेलमेश्वर सरकार के लिए सरदर्द बने.

बीजेपी व दीपक मिश्रा को लेकर कई तरह के कयास लग रहे थे कि तभी जस्टिस चेलमेश्वर ने चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ जंग छेड़ दी. चेलमेश्वर ने अन्य तीन सुप्रीम कोर्ट जजों के साथ सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ 12 जनवरी को अभूतपूर्व प्रेस कान्फ्रेंस की. इससे जमकर बवाल मचा. उनके विरोध को देखते हुए मौजूदा मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने कोलेजियम के फैसलों को सार्वजनिक करना शुरू कर दिया. यह सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में एक बड़ी घटना रही.

तीसरा मामला आधार से जुड़ा है

आधार को बीजेपी सरकार हर जगह जोड़ रही थी. आम जनता इसे निजता का उल्लंघन कह रही थी. तब जस्टिस चेलमेश्वर और नौ जजों वाली सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार बताया. इस फैसले में जस्टिस चेलमेश्वर का बहुत बड़ा योगदान रहा. यह भाजपा के लिए करारी हार जैसा रहा.

आज हम किसी भी नेता के ऊपर सोशल मीडिया पर तीखी से तीखी टिप्पणी कर पाते हैं तो इसमें भी इनका योगदान है. सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक टिप्पणी का हवाला देकर होने वाली गिरफ्तारी को रोकने के लिए भी जस्टिस चेलमेश्वर ने अहम फैसला लिया. उन्होंने आईटी एक्ट की धारा 66 ए को असंवैधानिक घोषित कर सोशल मीडिया को असीम आजादी दे दी. ये चौथा बड़ा फैसला था, जिसने भाजपा को बड़ा झटका दिया था.

नौकरी से जाते-जाते भी उन्होंने कुछ ऐसे फैसले लिए जिसके लिए उन्हें हमेशा याद रखा जाएगा. जस्टिस चेलमेश्वर शायद सुप्रीम कोर्ट के इकलौते जज होंगे जो अपनी ही विदाई की पार्टी में नहीं पहुंचे थे. बार काउंसिल ने इनकी विदाई को लेकर पार्टी दी थी और उनसे आने का आग्रह किया था, जिसे उन्होंनें ठुकरा दिया था. वह उस दिन कोर्ट भी नहीं पहुंचे. तो अपने रिटायरमेंट से पहले ही उन्होंने यह साफ कर दिया था कि वो रिटायरमेंट के बाद कोई सरकारी नियुक्ति स्वीकार नहीं करेंगे. आने वाले दिन जस्टिस चेलमेश्वर पूर्व जस्टिस हो जाएंगे लेकिन उनके दिए फैसले हर किसी को याद रह जाएंगे.

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‘मेरे मन की बाल कहानियां’ को बाल साहित्य पुरस्कार

नई दिल्ली। देश के जाने माने बाल साहित्यकार दिविक रमेश को बाल साहित्य पुरस्कार-2018 के लिए चुना गया है. साहित्य अकादेमी ने इसके लिए देश भर से 23 लेखकों को चुना है. इन लेखकों को भी अलग-अलग भाषा के लिए सम्मानित किया जाएगा. बाल साहित्य पुरस्कार मिलने की घोषणा होने पर दिविक रमेश काफी खुश हैं.

दिविक रमेश ने शुक्रवार को फेसबुक पर जानकारी शेयर करते हुए साहित्य अकादेमी के साथ-साथ अपने श्रेष्ठ-गुरूजनों का आभार व्यक्त किए. वे लिखते हैं कि “ मित्रो! छोटी-बड़ी सब खुशियां साझा करता रहा हूं. दिखावा मुझे करना नहीं आता,शायद इसीलिए. हालंकि यह सामाचार फेसबुक के माहिर मेरे एक आत्मीय जन ललित लालित्य के माध्यम से आपमें से बहुतों तक पहुंच चुका/रहा है तो भी स्वयं मुझे आप सब की शुभकामनाओं के फलस्वरूप प्राप्त इसे साझा करते हुए खुशी और गर्व का अनुभव हो रहा है. इस प्रतिष्ठित साहित्य अकादमी पुरस्कार की सबसे पहले बधाई सहित प्रामाणिक सूचना मुझे मेरे बहुत ही प्रियजन कुमार अनुपम, देवेंद्र कुमार देवेश और ज्योतिकृष्ण वर्मा से मिली. माननीय उपाध्याक्ष प्रिय माधव कौशिक जी की गर्मजोशी से भरी बधाई का शानदार उपहार मिला. माननीय सचिव श्री के. श्रीनिवासराव के इन शब्दों ने तो जैसे मुझे भीतर तक छू लिया है”.

अकादेमी की ओर से लेखकों को 14 नवंबर को सम्मानित किया जाएगा. इसके लिए ताम्रफलक व 50 हजार पुरस्कार स्वरूप प्रदान किया जाएगा. बता दें कि दिविक रमेश देश के प्रसिध्द बाल साहित्यकार हैं.

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प्रमोशन में आरक्षण के लिए उत्तराखंड के शिक्षकों ने ऐसे बनाया दबाव

नई दिल्ली। आरक्षण के आधार पर एससी एसटी कर्मचारियों को जल्द प्रमोशन देने के लिए दबाव बनाया जा रहा है. इसके लिए उत्तराखंड के 13 जिलाधिकारियों को ज्ञापन सौंपा गया. शुक्रवार को मिली जानकारी के अनुसार केंद्र सरकार द्वारा जारी किये गए 15 जून, 2018 के पत्र जो कि पदोन्नति में आरक्षण विषयक हैं. इस क्रम में उत्तराखंड के अनुसूचित जाति-जनजाति शिक्षक एसोसिएशन ने प्रांतीय अध्यक्ष संजय भाटिया के आह्वान पर ज्ञापन दिए गए.

बताया जा रहा है कि जिलाधिकारी के माध्यम से मुख्यमंत्री उत्तराखंड सरकार को पदोन्नति में आरक्षण बहाल करने संबंधी ज्ञापन प्रेषित किया गया. साथ ही मानसून सत्र में 117 वें संविधान संशोधन विधेयक जो कि पदोन्नति में आरक्षण से सम्बंधित है, को पारित करने एवं एससी एसटी एट्रोसीटी एक्ट, 1989 को पुनः पूर्व रूप में लाने हेतु आवश्यक बिल लाने के सम्बन्ध में प्रधानमन्त्री को ज्ञापन प्रेषित किया गया.

संगठन ने दबाव डालते हुए कहा कि 10 दिन में बहाल न करने की स्थिति में पुनः स्मरण दिलाया जायेगा. यदि फिर भी बहाल नहीं किया गया तो 15 दिन बाद अग्रिम रणनीति बनाकर जन आंदोलन का स्वरूप देकर आंदोलन किया जायेगा. जिसकी जिम्मेदार सरकार स्वयं होगी. निर्णय एवं क्रियान्वयन में भागीदारी लोकतान्त्रिक व्यवस्था में आवश्यक है.

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महाराष्ट्र में बसपा की डिमांड, शरद पवार मिलकर लड़ना चाहते हैं चुनाव

नई दिल्ली। देश चुनावी मोड में आ चुका है. भाजपा ने जहां कश्मीर में गठबंधन तोड़ कर चुनाबी बिसात में अपनी पहली चाल चल दी है तो बिहार से लेकर बंगाल तक में आगामी लोकसभा चुनाव को लेकर हलचल साफ महसूस की जा रही है. इस बीच कर्नाटक चुनाव के बाद बसपा देश की राजनीति में महत्वपूर्ण होकर उभरी है. आलम यह है कि तमाम राजनीतिक दल अपने राज्य में बसपा से गठबंधन करना चाहते हैं.

महाराष्ट्र में लोकसभा चुनाव से पहले एक नया गठजोड़ बनता दिख रहा है. और इसे जमीन पर उतारने की कोशिश में जुटे हैं महाराष्ट्र के दिग्गज और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष शरद पवार. महाराष्ट्र में शिवसेना के अकेले लड़ने की घोषणा के बाद पवार अब भाजपा को घेरने में जुट गए हैं. इसके लिए पवार महाराष्ट्र के विदर्भ इलाके में बसपा का साथ चाहते हैं.

विदर्भ में लोकसभा की 11 सीटें हैं. 2014 लोकसभा चुनावों में इन सीटों पर भाजपा-शिवसेना गठबंधन ने जीत हासिल की थी. इन 11 सीटों को अपने पाले में लाने के लिए राकांपा यहां कांग्रेस और बसपा के साथ मिलकर महागठजोड़ बनाना चाहती है.

हालांकि, बसपा ने महाराष्ट्र में कोई विधानसभा या लोकसभा सीट पिछले चुनाव में नहीं जीता था पर दोनों चुनावों में उसका वोट प्रतिशत ढाई फीसदी के आसपास रहा है. इसमें पिछले चुनाव में एनसीपी-कांग्रेस के वोटों को जोड़ा जाए तो यह गठजोड़ बड़ी ताकत बनकर उभर सकता है. हाल के दिनों में जिस तरह कोरेगांव और 2 अप्रैल को दलित उभार दिखा है, उसको बसपा के पक्ष में वोट में बदलने की संभावना है. इसी संभावना ने कर्नाटक, हरियाणा, उत्तर प्रदेश के बाद अब महाराष्ट्र में भी विपक्षियों के लिए बसपा को महत्वपूर्ण कर दिया है.

अकेले चुनाव लड़ने पर अड़ी शिवसेना अगर भाजपा के खिलाफ कोई निर्णायक कदम उठाएगी तो विपक्ष की संभावनाएं बढ़ सकती हैं. अगर पवार की कोशिश रंग ले आई और अगर वो कांग्रेस और बसपा के साथ मिलकर महागठजोड़ बनाने में कामयाब हो जाते हैं तो महाराष्ट्र में भाजपा की राह आसान नहीं होगी.

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क्या दलितों की हितैषी पार्टियां कानपुर दुष्कर्म काण्ड का राष्ट्रव्यापी विरोध करेंगी?

भारत 15 अगस्त, 1947 को राजे-रजवाड़ों, बादशाहों-नवाबों, ठाकुरों-जागीरदारों और ब्रिटिश राज की गुलामी से आजा़द हो गया. बाबा साहेब चाहते थे कि राजनैतिक आजादी से पहले सामाजिक आजादी मिले, लेकिन तत्कालीन नेताओं ने उनकी बातों पर ध्यान नहीं दिया. इसका नतीजा यह रहा कि न केवल आज भी सामाजिक असमानता मौजूद है, अपितु छूआछूत भी मौजूद है.

इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं वे अखबार जो इन घटनाओं को जनता तक रोज पहुँचा रहे हैं.

ऐसा कोई दिन, सप्ताह या माह नहीं जाता जिस दिन दलित का अपमान नहीं हुआ हो, चाहे दबंगों द्वारा अपमानित करने के रूप में हों, चाहे इनके घर-खेतों पर कब्जा करने को लेकर हो, इनके सामाजिक-राजनैतिक अधिकारों के हनन के रूप में हो अथवा दलित समाज की बालिकाओं-स्त्रियों की इज्जत पर हमले के रूप में हो, आज भी बेरोकटोक जारी है.

इस बात का कोई फर्क नहीं पड़ता कि शासन किस पार्टी का है, क्योंकि दोनों ही प्रमुख पार्टियों में दबंगों का वर्चस्व है और दलितों के हितों का दावा करने वाली तथा दलितों के वोटों के बल पर उत्तर प्रदेश में, जहाँ यह काण्ड हुआ, सरकार बनाने वाली बहुजन समाज पार्टी आज बहुजन को भूलकर सर्वजन के पीछे लगी हुई है.

आज दलित अपने को ठगा-सा महसूस कर रहे हैं क्योंकि इन्होनें जिस पार्टी को वोट दिया, उसने इनका जमकर उपयोग किया और काम निकल जाने के बाद दूध की मक्खी की तरह निकाल कर फेंक दिया और जिस पार्टी को वोट और नोट दिया, आज वह भी वोट के खातिर इनको भूल ब्राह्मण, बनियों और राजपूतों अर्थात् दबंगों के साथ हाथ मिला चुकी है. ऐसे में दलित चैराहे पर खड़ा है कि आखिर जाये तो कहां जाये? यह लिखते कोई संकोच नहीं कि दलितों के नेता या तो बिकाऊ होते हैं या दल-बदलू. थोड़ा सा भी फायदा देखा कि डगमग डोल जाते हैं और अपने सिद्धान्तों को ताक में रख देतें हैं.

बाबा साहेब के सिद्धान्त त्रयी में उक्त घटनाओं का समाधान नजर आता है. शिक्षा के जरिये हमें अपने-पराये की पहचान होनी चाहिये. प्रयास यह करना चाहिये कि जो लोग किसी भी प्रकार के लालच अथवा दबाव में आकर अपने वर्ग के हितों को छोड़ रहे हैं, उनको समाज से जोड़े रखा जाये. इसके बाद जो सबसे महत्त्वपूर्ण बात है वो यह कि दलित समाज के प्रबुद्ध जनों को जातीय हितों की अपेक्षा वर्ग हितों को प्राथमिकता देना चाहिये.

आज भी दलित जातियों में संगठन का भारी अभाव है और इसके नतीजे सामने हैं. संगठन के ही अभाव में अत्याचारियों को उचित सबक नहीं मिल पाता, रिपोर्ट तक दर्ज नहीं हो पाती, ढंग से तफ्तीश नहीं होती और कई मामलों में तो एफ आर लगा दी जाती है. दलितों में आज तक जो संगठन हुआ है वह सतही और अधिकतर राजनैतिक फायदे के लिये है. जो संगठन है वह स्वार्थों के चलते इतने खण्डों में बंट गया है कि दलितों का ही विश्वास नहीं जीत पा रहे हैं. आज दलित समाज के दुख-दर्द को विश्व पटल पर रखने वाला और इनके पक्ष में खड़ा होकर दोषियों को सजा दिलवाने वाला कोई संगठन नहीं है. जो संगठन हैं वे अपने-अपने दायरे में सीमित हैं. इसी कारण आज भी पुरानी वर्जनायें जारी हैं, दलितों को दोयम दर्जे का नागरिक समझा जाता है और मनचाहा दुव्यर्वहार कर लिया जाता है. चूंकि सारे मीडिया पर कब्जा भी इनका ही है, अतः इस प्रकार की घटनाओं को बहुत कम प्रकाश में लाया जाता है अथवा तोड़-मरोड़ कर पेश किया जाता है. कहीं गौवध का संभावित आरोपी मानकर हत्या कर दी जाती है तो कही दूल्हे को घोड़ी पर से उतारा और पीटा जाता है. कहीं बहिन-बेटियों की इज्जत से खिलवाड़ किया जाता है तो कहीं जमीनें हड़प ली जाती है और ट्रैक्टर के पहियों तले रौंद दिया जाता है. जैसे कि यह रोज का नियम हो गया है.

इन सबके पीछे कारण एक ही है कि दलित समाज संगठित नहीं है. और जो हजारों संगठन बने हुए हैं उनको अपनी-अपनी दुकानें चलाने से ही फुर्सत नहीं है. चुनावों के दिन आने वाले हैं, सबके-सब दोनों राजनैतिक पार्टियों के तलवे चाटने में व्यस्त हैं कि कहीं से टिकट मिल जाये तो जीत कर एमपी एमएलए बन जाये फिर पुश्तों का इंतजाम हो जायेगा. दलितों की कौन सोचता है?

अभी हाल ही में 11 जून, 2018 के राजस्थान पत्रिका में 12 मई, 2018 की घटना की खबर ठीक एक महीने बाद छपी है. खबर के अनुसार कानपुर देहात में दलित समाज की एक लड़की का उसी की शादी के दिन पांच रसूखदारों ने अपहरण कर बन्धक बना आठ घण्टे तक कई बार रेप किया जबकि उसकी बारात उसके दरवाजे पर पंहुच चुकी थी. उसकी मां सिर पटती रही, लेकिन दरिन्दों ने उसकी एक नहीं सुनी. उसकी शादी होने के बाद अगले ही दिन ससुराल वालों ने उसके जिस्म पर घाव देखकर मामला पूछा और उसे निकाल दिया. रसूलाबाद थाने में मुकदमा दर्ज नहीं हुआ. जब युवती ने राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग में गुहार की तब जाकर महीने भर बाद मुकदमा दर्ज हुआ और कार्रवाही शुरु हुई.

क्या दलितों के वोट और नोट के बल पर यूपी में पांच बार सरकार बनाने वाली बहुजन समाज पार्टी का दायित्व नहीं बनता कि इस घटना के विरोध में आंदोलन करे, पीड़िता को सुरक्षा दे और अपराधियों को फांसी के तख्ते तक पहुंचाये? समाजिक कार्यों में हमें मिशनरी भावना से कार्य करना होगा. वह मिशनरी भाव यह है कि दलित का वोट उसी पार्टी को जाये, जो वास्तव में हमारा भला करे. रोटी बेटी का रिश्ता दलित समाज में ही हो. समाज का हर व्यक्ति हार्दिक रूप से यथा संभव दूसरों की सहायता करे. राजनैतिक पार्टियां स्थाई नहीं होती हैं ये तो आती जाती रहती हैं. अगर सामाजिक रुप से सशक्त हो गये तो सरकारें बनाना कोई बड़ी बात नहीं है.

दलित जातियों को आपस में संगठित होकर एक वर्ग का रूप लेना चाहिये. रैगर, भाम्बा, बैरवा, मोची, जीनगर, मेघवाल, खटीक, कोली, धोबी, मेहतर आदि को यह समझना होगा कि अब पुराने विवादों को त्यागना होगा, नये विवाद खत्म करने होंगे और आपस में संगठित रहना होगा. किसी एक की विपत्ति सबकी विपत्ति समझी जाये और इसका उसी तरह विरोध हो जिस तरह कि खुद की विपत्ति का होता है. यदि आज किसी रैगर या धोबी समाज के दूल्हे को घोड़ी पर से उतारा जाता है तो अन्य जातियों का दायित्व है कि सब आपस में मिलकर विरोध करें और दोषियों को कठोरतम दण्ड दिलवायें. शक्ति प्रदर्षन करना हो तो सब साथ में करें. आश्चर्य है कि कानपुर दुष्कर्म काण्ड में अभी तक ऐसा कुछ नहीं हुआ जो कि जागृत प्रदेश कहा जाता है! शीर्ष नेतृत्व समाजिक-राजनैतिक संगठनों को करना चाहिये और विरोध प्रदर्शन सारे देश में ठीक उसी तरह हो जैसा कि 2 अप्रैल, 2018 को किया गया था. अपराधियों को नये कानून के तहत सरेआम फांसी पर लटकाया जाये, ताकि अपराधियों को सजा मिलने के साथ साथ इस तरह के विचार रखने वालों को भी नसीहत मिल सके और आगे इस प्रकार की घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो.

श्याम सुन्दर बैरवा

सहायक प्रोफेसर (वस्त्र रसायन)

माणिक्यलाल वर्मा टेक्सटाईल्ज एवं

इंजीनियरिंग कॉलेज, भीलवाड़ा

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कश्मीर में आजादी, आजादी का शोर, भड़की बीजेपी

नई दिल्ली। कश्मीर की आजादी को लेकर विवाद नया नहीं है. लेकिन कश्मीर में बीजेपी व पीडीपी की सरकार गिरने के बाद कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं द्वारा आजादी को लेकर बयानबाजी करने पर जमकर बवाल मचा है. इसको लेकर शिवसेना व बीजेपी ने जमकर हमला बोला है. गुलाम नबी आजाद और सैफुद्दीन सोज के बयानों पर भाजपा नेता और केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने पलटवार किया है.

आजाद के बयान से आंतकी खुश

शुक्रवार को आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में प्रसाद ने कहा कि आजाद और सोज के बयानों पर सोनिया और राहुल गांधी को जवाब देना चाहिए. तो वहीं गुलाम नबी आजाद और सैफुद्दीन सोज इनकी सोच व आतंकी संगठन लश्कर में कोई फर्क नहीं है. इन बातों को लेकर भारत की राजनीति गरमा गई है. आजाद के बयान से आंतकी खुश हैं. पाकिस्तान के आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा ने आजाद के बयान के समर्थन में अपना बयान जारी किया है.

लश्कर के प्रवक्ता अब्दुल्ला गजनवी का कहना है कि महमूद शाह आजाद के बयान से सहमत हैं. निर्मला सीतारमण द्वारा शहीद औरंगजेब के परिवार से मिलने जाने को कांग्रेस ने ड्रामा बताया था. इस पर पलटवार करते हुए प्रसाद ने पूछा कि औरंगजेब से मिलने रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण गईं तो क्या यह ड्रामा है. अगर यह ड्रामा है तो 120 करोड़ लोग खड़े होकर कहेंगे कि मरहूम औरंगजेब के जज्बे को सलाम.

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आतंकी बेटे की कश्मीरी मां का दर्द, जिसे देश सुन रहा है

प्रतीकात्मक फोटो

नई दिल्ली। बेटा मां के लिए हमेशा बेटा ही रहता है, चाहे दुनिया उसे चोर-बदमाश, आतंकी ही क्यों ना कहे. एक ऐसे ही मां का दर्द जिसका बेटा आतंकी बन चुका है. इस बात को बखूबी जानती है लेकिन फिर भी उसको बेटा, बेटा कहकर बुला रही है, उसके घर आने की राह ताक रही है. इस इंतजार में टूट चुकी मां बेटे रोशन जमीर से लौट आने का आश लगाए जिंदगी काट रही है.

पिता की हिम्मत…

दरअसल, करीब एक माह पहले अनंतनाग में रहने वाले एक कश्मीरी लड़के रोशन जमीर के लापता होने की घटना सामने आई थी. रोशन के पिता ने उसके गायब होने की एफआईआर दर्ज करवाई. बाद में उन्हें पता चला कि रोशन एक आतंकवादी ग्रुप हिजबुल मुजाहिदीन में शामिल हो चुका है. इसके बाद पिता की हिम्मत ही टूट गई और परिवार बिखरता चला गया.

मैं खत्म हो…

एक मां अपने घर को टूटता व बेटे को मौत के मुंह में समाता देख उसने एक वीडियो मैसेज जारी किया. उस वीडियो के जरिए मां बेटे से गुहार लगा रही है. बेटे के वियोग में टूट चुकी मां कहती है कि “मेरे बेटे अल्लाह के वास्ते लौट आओ… मेरे बेटे घर वापस आ जाओ, तुम्हारे जाने से हम सब मुसीबत में आ गए हैं, क्या इस दिन के लिए ही तुम्हें पाल पोसकर बड़ा किया था.. ख़ुदा के वास्ते वापस आ जाओ. मेरे बेटे मैं टूट चुकी हूं, मैं खत्म हो चुकी हूं… मुझे किसके सहारे छोडकर गए हो तुम.”

रोंगटे खड़े कर देने वाले मां के अल्फाज को देश सुन रहा है. वीडियो सुनने के बाद हर कोई बेटे के लौट आने की कामना कर रहा है. लेकिन पता नहीं वह आतंकी बन चुका बेटा उस रास्ते से लौटेगा या नहीं. रोशन के पिता गुलाम मोहम्मद भी इसी उम्मीद में सोशल मीडिया पर वीडियो शेयर किया है. सोशल मीडिया पर ये वीडियो वायरल हो रहे है.

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सेना के रेल टिकट में घपला, छह माह के लिए काउंटर बंद

प्रतीकात्मक फोटो

नई दिल्ली। बीजेपी के शासन काल में रेल व सेना से जुड़ी घालमेल की खबर सामने आई है. सेना के जवानों के लिए रेल टिकट बुकिंग में गड़बड़ी का मामला बताया जा रहा है. रेलवे की जांच में पाया गया है कि लखनऊ छावनी में सेना के लिए विशेष बुकिंग सुविधा का दुरुपयोग करके दो करोड़ रुपये का रेलवे को नुकसान पहुंचाया गया है.

सीबीआई जांच

जांच प्रक्रिया करने के लिए संबंधित काउंटर को छह माह के लिए बंद कर दिया गया है. रेलवे ने इस मामले की जांच के लिए सीबीआई को भेजा है, जबकि सेना भी आंतरिक तौर पर छानबीन कर रही है. इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक रेलवे एक विशेष समझौते के तहत सेना को टिकट मुहैया कराती है.

आरोप है कि लखनऊ छावनी में बैठे सेना के अधिकारियों ने टिकट बुकिंग सॉफ्टवेयर में गड़बड़ी कर घोटाला किया. लखनऊ में रिजर्वेशन काउंटर पर बैठे रक्षा विभाग के कर्मचारी को इस कथित घोटाले में आरोपी बताया गया है. जांच पड़ताल में पता चला है कि टिकट काउंटर पर बैठे लोगों ने पैसेंजर रिजर्वेशन सिस्टम में एक पीएनआर नंबर बनाया और उसे जीरो वैल्यू टिकट बताया. समझाने के लिए कहा जाए तो सिस्टम को धोखा देने के लिए इस पर फर्जी टिकट नंबर दर्ज किया गया. इस तरह से सॉफ्टवेयर व पीएनआर नंबर की हेरफेर आदि का दुरूपयोग कर गड़बड़ी करी गई है. फिलहाल मामले की जांच जारी है.

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बच्चों के आंसूओं ने रूकवाया भगवान टीचर का ट्रांसफर

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नई दिल्ली। एक शिक्षक के मेहनत व मोहब्बत ने ऐसा असर दिखाया कि बच्चे शिक्षक की ट्रांसफर की खबर पाकर इतना रोए इतना रोए… कि आखिरकार शिक्षक का ट्रांसफर रोकना पड़ा. बच्चों को जैसे ही खबर पता चली और वे टीचर को जाता देख घेर-पकड़कर रोने लगे. इस नजारा को देखकर स्कूल के आसपास लोगों का हुजूम उमड़ आया और नजारा देखकर लोगों की आंखे भी भर आईं. वाकई ऐसा नजारा विरले ही देखने को मिलता है.

फिर क्या था चेन्नई के तिरुवल्लूर में विलियाग्राम सरकारी स्कूल के करीब सौ बच्चों व एक अंग्रेजी टीचर की मार्मिक तस्वीर सोशल मीडिया पर दौड़ने लगी. शिक्षक व शिष्य प्रेम को देखकर सोशल मीडिया पर भी जमकर तारीफ हो रही है.

बच्चों के साथ अभिभावक भी

प्राप्त जानकारी के मुताबिक विलियाग्राम सरकारी स्कूल के लगभग 100 से ज्यादा बच्चों ने अपने टीचर के ट्रांसफर का विरोध शुरु कर दिया. बच्चों के साथ-साथ अभिवावकों ने भी टीचर के ट्रांसफर का विरोध किया. इसके बाद स्कूल प्रशासन को अपने अधिकारियों से भगवान के ट्रांसफर ऑर्डर को दस दिनों के लिए रोकने को कहना पड़ा.

प्रिंसीपल ए अरविंदन ने बताया कि भगवान उनके स्कूल के सबसे बेहतरीन टीचर हैं. 28 साल से जी. भगवान स्कूल के अंग्रेजी टीचर हैं. सरकारी स्कूलों में टीचर-स्टूडेंस के अनुपात को बनाए रखने के लिए सामान्य ट्रांसफर प्रक्रिया के तहत जी भगवान के नाम की भी घोषणा हुई. स्कूल प्रिंसीपल ने बताया कि भगवान स्कूल में क्लास 6 से 10 तक के बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाते हैं. उनके ट्रांसफर ऑर्डर के बाद स्कूल में उनकी जगह नया टीचर आया और उसने 10 बजे स्कूल ज्वाइन कर लिया.

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चीफ जस्टिस की खिलाफत करने वाले न्यायमूर्ति चेलमेश्वर का आखिरी दिन

नई दिल्ली। न्यायमूर्ति जे. चेलमेश्वर अपने ऐतिहासिक फैसलों के लिए हमेशा हमें याद रहेंगे. इन्होंने अपने कार्यकाल में प्रेस कांफ्रेंस बुलाकर देश के चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ आवाज उठाई थी. चेलमेश्वर के साथ सुप्रीम कोर्ट के तीन और जजों ने चीफ जस्टिस पर गंभीर आरोप लगाए थे. जे. चेलमेश्वर शुक्रवार, 22जून को रिटायर हो रहे हैं.

वरिष्ठतम न्यायमूर्ति चेलमेश्वर ने देश की सबसे बड़ी अदालत में करीब सात साल तक सेवा दीं. न्यायाधीश चेलमेश्वर आज 65 साल के हो गए. वह नौ न्यायाधीशों की उस पीठ का हिस्सा थे जिसने ऐतिहासिक फैसले में निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार घोषित किया था.

बता दें कि आंध्र प्रदेश के कृष्णा जिले के मोव्या मंडल के पेड्डा मुत्तेवी में 23 जून 1953 को जन्मे चेलमेश्वर की शुरुआती पढाई कृष्णा जिले के मछलीपत्तनम के हिन्दू हाईस्कूल से हुई. उन्होंने स्नातक चेन्नई के लोयोला कॉलेज से भौतिक विज्ञान में किया. उन्होंने कानून की डिग्री 1976 में विशाखापत्तनम के आंध्र विश्वविद्यालय से ली.

वह तीन मई 2007 को गौहाटी हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बने थे और बाद में केरल हाईकोर्ट में स्थानान्तरित हुये. न्यायमूर्ति चेलमेश्वर 10 अक्टूबर, 2011 को सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश बनाए गए थे. न्यायमूर्ति रंजन गोगोई, एम बी लोकुर और कुरियन जोसेफ के साथ मिलकर चेलमेश्वर ने विशेष सीबीआई न्यायाधीश बीएच लोया की रहस्यमय मौत के संवेदनशील मामले सहित अन्य मामलों के चुनिंदा आवंटन पर सवाल उठाए थे. लोया की एक दिसंबर 2014 को मौत हो गई थी.

Read Also-न्यायमूर्ति स्वतंत्र कुमार एनजीटी के अध्यक्ष पद से रिटायर
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