संसद सत्र कल से, चार साल में मोदी सरकार के 40 बिल अटके

नई दिल्ली। संसद का मॉनसून सत्र कल बुधवार से शुरू होने जा रहा है. इसको लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मंगलवार को विपक्षी दलों के साथ बैठक की और सदन चलाने के लिए उनका सहयोग मांगा. इस सत्र के दौरान सरकार के सामने उन तमाम बिलों को पारित करने की चुनौती होगी जो वो पिछले चार साल के अपने सरकार में लाई है. ऐसे बिलों की संख्या तकरीबन 40 हैं जो अटके हुए हैं. इसमें से 12 बिल बहुमत वाले सदन लोकसभा में पारित करा लिए हैं लेकिन राज्यसभा में अबतक यह अटके ही हुए हैं.

लंबित बिलों की बात करें तो मोदी सरकार की ओर से लाए गए लोकपाल, भूमि अधिग्रहण, व्हिसल ब्लोअर संरक्षण, ट्रांसजेंडर के अधिकार, तीन तलाक, भगोड़ा आर्थिक अपराधी, नदी विवाद से जुड़े बिल लंबित हैं. इनमें से सरकार तीन तलाक और भूमि अधिग्रहण बिल को प्रमुखता से पारित कराने की कोशिश में जुटी है. मुस्लिम महिलाओं से जुड़े इस बिल पर देशभर में सियासी संग्राम भी छिड़ा हुआ है.

इन बिलों को पारित करवाना सरकार के लिए चुनौती है. क्योंकि लोकसभा में बिल पारित होने के बाद वह राज्यसभा में सरकार का बहुमत नहीं होने से अटक जाते हैं. हालांकि अब चुनावों की उल्टी गिनती शुरू होने से संसद का मॉनसून सत्र काफी हंगामेदार रहने के आसार हैं. पिछले दिनों पूरा बजट सत्र हंगामे की भेंट चढ़ गया था साथ ही कामकाज के लिहाज से 16वीं लोकसभा का रिकॉर्ड काफी खराब ही रहा है.

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झारखंडः भाजपा के कार्यकर्ताओं ने स्वामी अग्निवेश को पीटा, कपड़े फाड़े

रांची। भारतीय जनता पार्टी के युवा मोर्चा के कार्यकर्ताओं ने सामाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश पर के साथ मारपीट की और उनके कपड़े फाड़ दिए. घटना आज मंगलवार की है. भाजयुमो कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश के दौरे का विरोध कर रहे थे और ‘अग्निवेश गो बैक’ के नारे लगा रहे थे. स्वामी अग्निवेश जैसे ही होटल से बाहर आएं भाजपा कार्यकर्ताओं ने न सिर्फ उन्हें काले कपड़े दिखाई बल्कि उनपर हमला कर दिया और उनकी लात-जूतों से पिटाई कर दी. स्वामी अग्निवेश को धकेल कर नीचे गिरा दिया. उनके कपड़े फाड़ दिए गए, पगड़ी खोल दी गई. इस दौरान बीजेपी युवा मोर्चा कार्यकर्ताओं ने स्वामी अग्निवेश के खिलाफ नारे लगाते रहे. उन्होंने जय श्री राम, अग्निवेश भारत छोड़ो, अग्निवेश पाकुड़ में नहीं रहना होगा जैसे नारे भी लगाए. दरअसल स्वामी अग्निवेश मंगलवार को पाकुड़ जिले के लिट्टीपाड़ा में पहाड़िया समुदाय की एक सभा को संबोधित करने वाले थे. यह सभा अखिल भारतीय आदिम जनजाति विकास समिति दामिन दिवस के 195वें वर्षगांठ पर आयोजित की गयी थी. इस सभा के पहले उन्होंने एक प्रेस कांफ्रेंस को भी संबोधित किया. इसमें उनके दिए बयानों से नाराज कार्यकर्ताओं ने स्वामी अग्निवेश के होटल से बाहर निकलते ही उनपर हमला कर दिया. उन्होंने आरोप लगाया कि अग्निवेश ईसाई मिशनरी के इशारे पर आदिवासियों को भड़काने का काम कर रहे हैं. घटना के बाद पुलिस ने दोषियों पर कार्रवाई करने की बात कही तो वहीं स्वामी अग्निवेश ने अपने ऊपर हमले की न्यायिक जांच की मांग की है.

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मायावती ने बसपा नेताओं के लिए जारी किए कई निर्देश

नई दिल्ली। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के बारे में तीखी टिप्पणी करना बहुजन समाज पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष जयप्रकाश सिंह को भारी पर गया है. जयप्रकाश सिंह के बयान की आलोचना होने के बाद बसपा प्रमुख मायावती ने उन्हें राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और नेशनल को-आर्डिनेटर के पद से हटा दिया है. दरअसल 16 जुलाई को यानि कल सोमवार को लखनऊ में बहुजन समाज पार्टी की लखनऊ और कानपुर जोन की बैठक थी. इस बैठक की जिम्मेदारी बसपा अध्यक्ष मायावती ने पार्टी के दोनों नेशनल कोआर्डिनेटर एड. वीर सिंह और जयप्रकाश सिंह को दिया था.

यह पहला मौका था जब इतना बड़ा कार्यक्रम बिना मायावती के हो रहा था. इसलिए दोनों नेशनल को-आर्डिनेटर के लिए यह बड़ी बात थी. दोनों ने यानि वीर सिंह और जयप्रकाश सिंह ने इसे संबोधित किया. इसी बैठक में जयप्रकाश सिंह की जबान फिसल गई और उन्होंने सीधे कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी पर निशाना साधा. उन्होंने कह दिया कि राहुल गांधी विदेशी मूल के हैं इसलिए भारत की राजनीति में सफल नहीं हो सकते. देश बहन मायावती को पीएम के तौर पर देखना चाहता है.

जयप्रकाश सिंह के इस बयान को लेकर उन्हें पद से हटाए जाने के बाद बहुजन समाज पार्टी के नेताओं में हड़कंप मच गया है. इस पूरे मामले को लेकर बसपा प्रमुख मायावती के ऑफिस से एक प्रेस रिलिज मीडिया को भेजी गई है, जिसमें सुश्री मायावती ने पार्टी के नेताओं को कई अहम निर्देश दिए हैं. डालते हैं उस पर एक नजर-

इस मुद्दे पर मीडिया को जारी अपने बयान में बसपा प्रमुख मायावती ने कहा है कि बी.एस.पी. सर्वजन हिताय एवं सर्वजन सुखाय तथा धर्म-निरपेक्ष व सर्व-धर्म सम्मान की सोच एवं नीतियों में विश्वास रखती है तथा उन पर पूरी ईमानदारी व निष्ठा से अमल भी करती है और यह सब उत्तर प्रदेश में, मेरे नेतृत्व में बी.एस.पी. की चार बार चली सरकार में भी देखने के लिये मिला है. जयप्रकाश सिंह ने बी.एस.पी. की इस मानवतावादी सोच व नीतियों के विरूद्ध जाकर तथा अपनी विरोधी पार्टियों के सर्वोच्च राष्ट्रीय नेताओं के बारे में भी काफी कुछ व्यक्तिगत टीका-टिप्पणी करके उनके बारे में काफी अनर्गल बातें भी कही हैं, जो बी.एस.पी. के कल्चर के पूरे तौर से विरूद्ध है. और जिनका बी.एस.पी. से कोई लेना-देना नहीं है. जिसे अति गम्भीरता से लेते हुये तथा पार्टी व मूवमेन्ट के हित में राष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्री जयप्रकाश सिंह को उनके इस पद से तत्काल प्रभाव से हटा दिया गया है और साथ ही, इनको बी.एस.पी. के राष्ट्रीय को-ओडिनेटर के पद से भी हटा दिया गया है.

पदाधिकारियों को चेतावनी मैं मीडिया के माध्यम से पूरे देश में, अपनी पार्टी के सभी छोटे-बड़े कार्यकर्ताओं, पदाधिकारियों व नेताओं को भी यह चेतावनी देती हूँ कि वे बी.एस.पी. की हर छोटी-बड़ी मीटिंग व कैडर-कैम्प एवं जनसभा आदि में केवल बी.एस.पी. की विचारधारा, नीतियों व मूवमेन्ट के बारे में तथा दलित एवं पिछड़े वर्ग में जन्में अपने महान सन्तों, गुरूओं व महापुरूषों एवं पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष के बारे में केवल उनके जीवन-संघर्ष एवं सिद्धान्तों व सोच के सम्बन्ध में ही अपनी बातें रखें. उनकी आड़ में दूसरों के सन्तों गुरूओं व महापुरूषों के बारे में अभद्र एवं अशोभनीय भाषा का कतई भी इस्तेमाल ना करें.

गठबंधन पर बयान से बचें गठबंधन पर बहनजी ने कहा है कि… उत्तर प्रदेश व देश के अन्य राज्यों में भी किसी भी पार्टी के साथ जब तक चुनावी गठबन्धन की घोषणा नहीं हो जाती है, तब तक गठबन्धन के बारे में किसी भी स्तर पर बात न करें. यह सब पार्टी के लोगों को अपनी पार्टी के हाईकमान पर ही छोड़ देना चाहिये.

लिखकर करें प्रेस वार्ता बहनजी ने पार्टी के नेताओं को सुझाव दिया है. उन्होंने कहा है- मैं पार्टी के खासकर वरिष्ठ नेताओं व पदाधिकारियों को यह सलाह देती हूँ कि उन्हें विशेषकर गम्भीर व महत्वपूर्ण विषयों पर तथा प्रेसवार्ता में भी ज्यादातर अपनी बातों को लिखकर ही रखना व बोलना चाहिये. ताकि खासकर जातिवादी मीडिया व हमारी विरोधी पार्टियों को फिर किसी भी प्रकार से हमारी पार्टी के बारे में गलत बात कहने व प्रचार करने का मौका ना मिल सके.

तो ये तमाम बातें हैं जो बसपा अध्यक्ष मायावती ने मीडिया को जारी प्रेस विज्ञप्ति में कही है. जहां तक जयप्रकाश सिंह को पद से हटाए जाने की बात है तो दिक्कत यह हुई कि इस बैठक में राहुल गांधी पर हमले और उनके विदेशी मूल के सवाल को उठाने से कांग्रेस के नेताओं ने भी शिकायत दर्ज करा दी. खबर जब मायावती जी तक पहुंची तो वो भी हैरान रह गईं क्योंकि इस वक्त राहुल गांधी को निशाने पर लेना बिल्कुल गैर जरूरी था. क्योंकि राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में गठबंधन को लेकर बसपा और कांग्रेस के बीच बात चल रही है और राहुल गांधी इस मामले को खुद देख रहे थे. तो वहीं अगर 2019 में बसपा अध्यक्ष मायावती के प्रधानमंत्री बनने की संभावना बनती है तो वह बिना कांग्रेस के समर्थन के पूरा नहीं हो सकती है. ऐसे में सीधे राहुल गांधी पर निशाना साधना जाहिर है जयप्रकाश सिंह का गैर जरूरी कदम था. जिसकी सजा उन्हें मिल गई है.

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बसपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष जयप्रकाश सिंह पर गिरी गाज

नई दिल्ली। बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष सुश्री मायावती ने हाल ही में बनाए गए राष्ट्रीय उपाध्यक्ष जयप्रकाश सिंह को पद से हटा दिया है. जयप्रकाश सिंह के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और नेशनल को-आर्डिनेटर के पद से हटाया गया है. ऐसा लखनऊ में 16 जुलाई को हुए कानपुर और लखनऊ जोन की बैठक में जयप्रकाश सिंह के आपत्तिजनक संबोधन के बाद किया गया है. जयप्रकाश सिंह ने अपने संबोधन में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणी की थी.

इस बारे में एक बयान जारी कर बसपा प्रमुख ने यह जानकारी दी है. प्रेस विज्ञप्ति में बसपा की राष्ट्रीय अध्यक्ष सुश्री मायावती के हवाले से कहा गया है कि- “मुझे कल लखनऊ में बी.एस.पी. के हुये कार्यकर्ता-सम्मेलन में, पार्टी के खासकर राष्ट्रीय उपाध्यक्ष ‘‘श्री जयप्रकाश सिंह’द्वारा दिये गये भाषण के बारे में यह जानकारी मिली है कि उसने कल बी.एस.पी. की इस मानवतावादी सोच व नीतियों के विरूद्ध जाकर तथा अपनी विरोधी पार्टियों के सर्वोच्च राष्ट्रीय नेताओं के बारे में भी काफी कुछ व्यक्तिगत टीका-टिप्पणी करके उनके बारे में काफी अनर्गल बातें भी कही हैं, जो बी.एस.पी. के कल्चर के पूरे तौर से विरूद्ध है. और जिनका बी.एस.पी. से कोई लेना-देना नहीं है.

अर्थात इनके द्वारा इस किस्म की कही गई बातें उनकी व्यक्तिगत सोच की उपज हैं तथा बी.एस.पी. की नहीं और साथ ही उनकी ऐसी सभी बातें बी.एस.पी. की सोच व नीतियों के विरूद्ध भी हैं. जिसे अति गम्भीरता से लेते हुये तथा पार्टी व मूवमेन्ट के हित में भी आज हमारी पार्टी ने अभी हाल ही में नये-नये बने बी.एस.पी. के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्री जयप्रकाश सिंह को उनके इस पद से तत्काल प्रभाव से हटा दिया गया है और साथ ही, इनको आज ही बी.एस.पी. के राष्ट्रीय को-ओडिनेटर के पद से भी हटा दिया गया है.

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हेट क्राइम में यूपी टॉपर, गुजरात नंबर 2

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नई दिल्ली। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल ने एक रिपोर्ट जारी की है. यह रिपोर्ट भाजपा शासित उत्तर प्रदेश और गुजरात पर गंभीर सवाल खड़े करने वाला है. रिपोर्ट के मुताबिक, हेट क्राइम के मामले में भाजपा शासित उत्तर प्रदेश नंबर वन है. जबकि, गुजरात को दूसरे नंबर पर रखा गया है. रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में साल 2018 के पहले 6 महीनों में 100 हेट क्राइम दर्ज किए गए. इसमें ज्यादातर शिकार दलित, आदिवासी, जातीय और धार्मिक रूप से अल्पसंख्यक समुदाय के लोग और ट्रांसजेंडर बने हैं.

एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट के मुताबिक, हेट क्राइम में अब तक कुल 18 घटनाओं के साथ यूपी टॉप पर है. इसके बाद 13 घटनाओं के साथ गुजरात दूसरे नंबर पर और 8 घटनाओं के साथ राजस्थान तीसरे नंबर पर है. खास बात यह है कि नफरत की इस आग का शिकार सबसे ज्यादा दलित और शोषित समाज है. रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2018 के पहले 6 महीनों में ‘हेट क्राइम’ के कुल 67 मामले वंचित-शोषित समाज के खिलाफ दर्ज किए गए हैं. जबकि अल्पसंख्यकों के खिलाफ इस तरह के 22 मामले हुए हैं. इनमें से ज्यादातर केस गाय और ऑनर किलिंग से संबंधित हैं. उत्तर प्रदेश में भी सबसे अधिक मामले पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दर्ज किए गए हैं.

एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट ऐसे वक्त पर आई है, जब विगत शनिवार को कर्नाटक के बीदर जिले में भीड़ ने बच्चा चोरी की अफवाह पर एक 32 साल के सॉफ्टवेयर इंजीनियर की जान ले ली. भीड़ ने उसके तीन दोस्तों की भी जमकर पिटाई की, जिसमें एक ही हालत नाजुक है.

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मोदी सरकार के चार साल

दलितों व अल्पसंख्यकों पर हुए अत्याचार के आँकड़े भी तो देते मोदी जी.
केंद्र में मोदी सरकार के चार साल पूरे हो गये हैं. वर्ष 2014 में जब इस सरकार ने सत्ता संभाली थी, तब जनता की उम्मीदें यूं ही आसमान पर नहीं थीं, बल्कि मोदी जी ने जनता को दिन में ऐसे तारे दिखाए थे, जिन्हें भाजपा के अमित शाह ने जुमला करार देकर जनता की छाती पर दाल दलने का काम किया. तीस साल बाद केंद्र में किसी पार्टी को जुमलेबाजी के बल पर अकेले बहुमत हासिल हुआ था. किन्तु इस मजबूत सरकार से जनता कुछ बड़े बदलावों की आशा कर रही थी और खुद मोदी और उनके सहयोगियों ने इसका वादा भी किया था. किन्तु हुआ क्या? टीम मोदी ने नोटबंदी और जीएसटी जैसे फैसले लेकर देश की आम जनता और व्यापारिक वर्ग को तबाही के मुकाम पर लाकर खड़ा कर दिया. भाजपा बेशक इन फैसलों को अपनी सफलता मानती रहे. नोटबंदी के फैसले के साथ जुड़ी अपेक्षाओं को लेकर कई जरूरी आंकड़े सरकार ने अब तक जारी नहीं किए हैं, फिर सरकार इस नोटबंदी को किस आधार पर अपनी सफलता से जोड़कर प्रस्तुत कर रही है?
सरकार का कहना है कि गत चार वर्षों के दौरान विभिन्न मोर्चों पर कई परेशानियों का सामना करते हुए, उसने हर परेशानी को दूर कर विकास का मार्ग प्रशस्त किया. सरकार ने दावा किया कि मुद्दा चाहे डोकलाम का रहा हो या फिर सीमा पर पाक की कार्रवाई का या फिर देश में नक्सलवाद का या फिर घरेलू मंच पर तेल का, हर मुद्दे को सुलझाने में सरकार ने बखूबी सफलता हासिल की. डोकलाम और पाक सीमाओं का तो हमें पता नहीं किंतु तेल की कीमतों का बहीखाता तो हमारे सामने है, फिर किस आधार पर ये मान लिया जाय कि मोदी सरकार ने ऐसे बड़े मामले आसानी से हल कर लिए? सरकार का यह भी कहना है कि न केवल देश में बल्कि वैश्विक मंच पर भी भारत का मान बढ़ाया, किंतु मोदी सरकार ने ये खुलासा नहीं किया कि किस प्रकार से भारतीय दूतावास के जारिए मोदी जी की सभा में प्रवासी भारतीयों की भीड़ को इक्ट्ठा किया गया?
सरकार का कहना है कि सरकार ने हर मोर्चे पर पारदर्शी रहते हुए अपने सभी फैसलों की जानकारी आम-जन तक पहुंचाई. जबकि सरकार का ऐसा कहना सच्चाई से कोसो दूर है. सच तो ये है कि सरकार की असफलता को उजागर करने वालों को सीधा देशद्रोही ठहरा दिया जाता रहा. सरकार का यह एक थोथा दावा है कि पीएम मोदी ने सोशल नेटवर्किंग से जुड़कर लोगों को अपने रोजाना के कार्यक्रम और लोगों को अपनी सोच के बारे में बताया और उनसे सुझाव भी मांगे. हाँ! ‘मन की बात’ कार्यक्रम के जरिए पीएम ने अपने मन की बात तो की किंतु जनता के मन की बात न तो सुनी और न ही जनता से किए गए वादों के कार्यान्वयन के बारे सही से कुछ बताया. कहा जा सकता है कि मोदी सरकार के चार साल में झूठ और धर्मान्धता की संस्कृति का इस कदर फैलाव हुआ है कि भाजपा अन्दरखाने इस फैलाव का जश्न मना रही है. सरकार को अपने इस कृत्य पर तनिक भी अफसोस नहीं है. इस बारे में जिस तरह से सोशल मीडिया पर कुतर्कों का जाल बुना गया है, वह बताता है कि यह सरकार जनता की तर्क बुद्धि का कितना सम्मान करती है.
सरकार ने मीडिया की गुलामगीरी पर कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया.…. क्यों? विदित हो कि मोदी सरकार ने सबसे ज्यादा पैसा मीडिया को मौन रखने और सरकार की वाहवाही करने के लिए खर्च किया है. सरकार को इसका खुलासा करना चाहिए. कोई तो बात होगी कि भारत का मीडिया 180 देशों के रिपोर्ट कार्ड में 138वें स्थान पर आ गया है. भारतीय प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया सत्ता का पैरोकार बनने को मजबूर किया गया है या फिर उसकी आदत बन गई है कि अब चाटुकारिता के अलावा कुछ और कर ही नहीं सकता.
सरकार को इस सवाल का जवाब देना चाहिए कि दो करोड़ की रिश्वत मांगने के आरोप में जेल जाने वाले पत्रकार सुधीर चौधरी को इस सरकार ने वाई श्रेणी की सुरक्षा मुहैया कराई हुई है जबकि अन्य चर्चित और ईमानदार पत्रकारों को सुरक्षा प्रदान करने में कोताही क्यों बरती जा रही है, जबकि उन्हें हिन्दुवादी हिंसक ताकतों द्वारा न केवल हिन्दू विरोधी करार दिया जा रहा है अपितु उन्हें जान से मार देने की धमकियां दी जा रही हैं. होना तो ये चाहिए कि सरकार को ये बातों खुद संज्ञान लेकर ऐसे पत्रकारों को सुरक्षा मुहैया करानी चाहिए. खेद की बात है कि भाजपा के शासन काल में पिछ्ले शासन काल के मुकाबले सबसे ज्यादा पत्रकारों की हत्याएं की गई हैं. सरकार ने इस पर कोई बयान क्यों नहीं दिया? इस दौरान रोहित वेमुला, नजीब जैसे कई प्रतिभाशाली छात्रों को जमींदोज करने का काम भी किया गया है. क्या ऐसे मुद्दे मोदी सरकार के एजेंडे से बाहर के मुद्दे हैं? क्या आर एस एस के मुद्दे ही आज की सरकार के मुद्दे हैं? क्या हिन्दुत्व ही मोदी जी का मूल मुद्दा है? जब वो अपने को ओ बी सी का बताते हैं तो फिर वो कैसे ब्राह्मणवाद का समर्थन कर सकते हैं? अगर वो ब्राह्मणवाद का समर्थन करते हैं तो फिर ओ बी सी  कैसे हो सकते हैं?
मोदी सरकार ने पिछ्ले चार साल में जनहित के नाम पर लगभग सौ से भी ज्यादा योजनाओं की घोषणाएं की हैं. ये एक अच्छी बात है. किंतु इन योजनाओं के क्रियान्वयन पर ये सरकार खाली कागजी आंकड़े पेश करके ही संतुष्टी का ढोंग कर जनता को 2019 की बजाय 2022 तक अपने वादों को पूरा करने का झुनझुना थमा दे रही है. रिटायर हो चुके लोगों को अब न्यू पेंशन स्कीम का झुनझुना थमा दिया गया है. अब वो इस झांसे को समझ गये हैं. सच ये है कि मोदी सरकार की एक भी स्कीम का कार्यान्वयन जमीनी आधार पर नहीं हुआ है. खाली कागजों को रंगने का काम किया है मोदी सरकार ने.
सरकार ने इस बात का भी कोई उल्लेख नहीं किया कि बैंकों का पूरा सिस्टम क्यों ध्वस्त है? सरकार ने माल्या, नीरव मोदी, मोहुल भाई और न जाने और भी कितने ही ऐसे भाई लोग हैं जो बैंकों को चूना लगाकर इस मोदी राज में परदेसी हो गए. उनपर कोई चर्चा क्यों नहीं की? उल्टा बैंक कर्मियों को ही दोषी ठहराने का काम किया जा रहा है. राजनेता चाहे कांग्रेस के हों या भाजपा के, सब दूध के धुले हैं, यह सिद्ध करना ही उनका काम रहा है.
वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार के अनुसार दो ऐसे सेक्टर हैं जिनको ये सरकार फैलाने का काम कर रही है…एक- झूठ और दूसरा- धर्मांधता. माना कि हर सरकार के दौर में एक राजनीतिक संस्कृति पनपती है, किंतु मोदी सरकार के दौर में “झूठ” नई सरकार की संस्कृति बनकर उभरी है. अब सवाल किया जा सकता है कि जब प्रधानमंत्री ही झूठ बोलते हों तो फिर दूसरों के बारे में क्या कहें? उल्लेखनीय है कि धर्मांधता की धारा को आगे बढ़ाने के मकसद से भारतीय जनता पार्टी और आरएसएस से इत्तेफाक रखने वाले कई संगठन बनकर खड़े हो गए हैं जो काम तो इन्हीं के लिए करते हैं मगर अलग इसलिए हैं ताकि बदनामी उन पर न आएं.
सरकार ने इस सत्य पर भी कोई टिप्पणी नहीं की कि उनकी सरकार नौकरी के फ्रंट पर फेल रही है. रोजगार न दे पाने के कारण भी सरकार की चमक फीकी हो रही है, किंतु इस मसले पर सरकार मौन रही है और पकौड़े तलने जैसे सुझाव देकर ही अपनी असफलता को छुपाने के काम में लगी रही. अफसोस की बात है कि अपना सबसे बड़ा वादा मोदी सरकार पूरा नहीं कर पाई. चुनावी घोषणा पत्र में उसने हर साल 2 करोड़ रोजगार पैदा करने का वादा किया था, मगर हकीकत कुछ और ही निकली. सरकार की सोच है कि सिर्फ नौकरी को ही रोजगार न माना जाए. लेकिन ऐसा तब होता जब काफी लोगों को स्वरोजगार के साधन उपलब्ध हो पाते. स्टार्ट-अप योजना के जरिए इस दिशा में एक कोशिश जरूर हुई पर वह लहर दो साल भी नहीं चली. सबसे ज्यादा रोजगार देने वाले रीयल एस्टेट सेक्टर का हाल बुरा है. इस सदी में सबसे ज्यादा मध्यवर्गीय नौकरियां टेलिकॉम सेक्टर में मिलती थीं, जो अचानक समस्याग्रस्त लगने लगा हैं. नौकरियों में आरक्षण पर कुठाराघात, एस सी/ एस टी पर अत्याचार के विरोध में पूर्व पारित सरकारी आदेश का सुप्रीम कोर्ट द्वारा निरस्त किया जाना क्या मोदी सरकार के संज्ञान में नहीं आया? यदि नहीं, तो क्यों?
और भी बहुत से सवाल हैं जो देश की दलित और अल्पसंख्यक आबादी से जुड़े हुए हैं जिन्हें मोदी सरकार ने चार साल पूरा होने के जश्न के दौरन छुआ तक नहीं. मसलन कश्मीर में हिंसा को रोकने के लिए क्या किया? एक सिर के बदले दस सिर लाने वाले मोदी जी ने यह भी नहीं बताया कि उनके शासन काल में कितने सैनिक शहीद हुए और कितनों को यथावत सम्मान दिया गया? और उनके बदले कितने दुश्मनों के सिर देश में लाए गए. पीएम मोदी दलित उत्पीड़न पर भी चुप्पी साधे रहें, उन्होंने यह नहीं बताया कि उनकी सरकार के पिछ्ले चार सालों में कितने दलितों और अल्पसंख्यकों को मौत के घाट उतारा गया और किस आधार पर? मोदी सरकार के पिछ्ले चार सालों में कितनी किशोरियों की लाज लूटी गई और कितनों की हत्या की गई? मोदी सरकार ने यह भी नहीं बताया कि मोदी जी के पिछ्ले चार सालों में शासन-प्रशासन ने दलितों और अल्पसंख्यकों के साथ कितने फर्जी मुकदमे दर्ज किए और कितने फर्जी एनकाउंटर किए? केवल और केवल सरकारी आँकड़ों के बल पर सुर्खियां बटोरने का काम करना न केवल राजनीतिक है अपितु समाज विरोधी भी है.
खैर! सरकार के पास अभी एक साल का वक्त और है. इस बीच वह जनता की कुछ मुश्किलें दूर कर दे तो सरकार को अपना गुणगान करने की कोई जरूरत नहीं पड़ेगी अपितु जनता उनका ये काम खुद ही कर देगी. विकास का काम जमीन पर ऐसे ही दिखना चाहिए जैसे कि दलितों और अल्पसंख्यकों के साथ लगातार हो रहे अत्याचार. तो फिर माना जा सकता है कि सरकार विकास के कार्यो के लिए कटिबद्ध है, अन्यथा नहीं.
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बहनजी को पीएम बनाने के संकल्प के साथ हुई बसपा के दो बड़े जोन की बैठक

लखनऊ। आगामी लोकसभा चुनाव को लेकर बहुजन समाज पार्टी हर मोर्चे पर तैयारी में जुट गई है. इन्हीं तैयारियों के तहत आज 16 जुलाई को लखनऊ और कानपुर मंडल के पार्टी कार्यकर्ताओं का सम्मेलन लखनऊ के गोमती नगर में हुआ. इस सम्मेलन की शुरुआत पार्टी अध्यक्ष मायावती को पीएम बनाने के संकल्प के साथ की गई. इसके साथ ही पार्टी कार्यकर्ताओं ने समाजवादी पार्टी (सपा) के साथ गठबंधन पर उत्साह जताया. हालांकि इस सम्‍मेलन में खुद मायावती शामिल नहीं हुईं.

यह सम्मेलन लखनऊ के सबसे बड़े ऑडिटोरियम इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में आयोजित किया गया था. आज की इस बैठक का जिम्मा नए बनाए गए नेशनल कोऑर्डिनेटर वीर सिंह और जयप्रकाश सिंह को दिया गया. मायावती अपने तमाम कार्यकर्ताओं का फीडबैक इन जोनल कोऑर्डिनेटरों की मीटिंग के माध्यम से ले रही हैं. माना जा रहा है कि इस सम्मेलन का मकसद पार्टी कार्यकर्ताओं से उनकी राय जानकर लोकसभा चुनाव के लिए रणनीति तय करना है. इसके साथ ही पार्टी की नीतियों को जनता तक पहुंचाने के काम पर भी फैसला लिया जाएगा.

इस कार्यक्रम की शुरुआत बकायदा दोनों नेशनल कोऑर्डिनेटर को मुकुट पहनाकर की गई. कार्यक्रम की शुरुआत में यह संकल्प हुआ कि मायावती को प्रधानमंत्री बनाना है. हाल ही में एमएलसी बनाए गए भीमराव अंबेडकर ने मंच से 1993 के गठबंधन की याद दिलाई और 2019 में एक बार फिर से वैसे ही गठबंधन को दोहराने की बात करते हुए पार्टी मुखिया मायावती को देश का अगला प्रधानमंत्री बनाने की बात कही.

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हरभजन सिंह की खरी-खरी, ‘क्रोएशिया ने FIFA फाइनल खेला और हम हिंदू-मुस्लिम खेल रहे हैं’

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नई दिल्ली। ओलंपिक खेलों और फुटबाल के दौरान हमेशा भारत की संख्या का हवाला देकर पदकों और विश्व कप फुटबाल में क्वालीफाई न कर पाने की चर्चा आम है. यह बात हर भारतीय को सालती है कि आखिर इतनी ज्यादा संख्या होने के बावजूद भारत ओलंपिक में पदक के लिए क्यों जूझता है. तो विश्वकप फुटबाल में क्वालीफाई भी क्यों नहीं हो पाता. फीफा वर्ल्ड कप 2018 के बाद इसी मुद्दे पर क्रिकेट खिलाड़ी हरभजन सिंह का दर्द छलक गया है.

फीफा वर्ल्ड कप फ्रांस और क्रोएशिया के बीच खेला गया. इसी पर हरभजन सिंह ने कहा कि ‘क्रोएशिया ने FIFA फाइनल खेला और हम हिंदू-मुस्लिम खेल रहे हैं.’ दरअसल फाइनल गंवाने वाला क्रोएशिया महज 50 लाख आबादी वाला एक छोटा सा देश है. रविवार को रूस के लुज्निकी स्टेडियम में खेले गए फाइनल मैच में फ्रांस ने क्रोएशिया को 4-2 से मात दी. इस छोटे देश के बड़े कारनामे से प्रभावित होकर इंडियन क्रिकेटर हरभजन सिंह ने देश के मौजूदा हालात पर तंज कसे हैं.

हरभजन सिंह ने फाइनल मैच शुरू होने से पहले ट्वीट किया- ‘लगभग 50 लाख की आबादी वाला देश क्रोएशिया फुटबॉल वर्ल्ड कप का फाइनल खेलेगा और हम 135 करोड़ लोग हिन्दू-मुसलमान खेल रहे है’. इसके साथ ही हरभजन सिंह ने हैशटैग सोच बदलो देश बदलो भी लिखा था.

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पंजाब में आम आदमी पार्टी से दर्जनों नेताओं ने एकसाथ छोड़ी पार्टी

चंडीगढ़। पंजाब में तेजी से उभरती दिख रही आम आदमी पार्टी (AAP) को करारा झटका लगा है. पार्टी के एक दर्जन से ज्यादा नेताओं ने सोमवार को एक साथ पार्टी छोड़ दिया है. सामूहिक इस्तीफा देने वाले नेताओं में 5 जिला अध्यक्ष, 6 क्षेत्रीय प्रभारी और 2 महासचिव हैं. इस सामूहिक इस्तीफे के बाद पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल और पंजाब मामलों के प्रभारी मनीष सिसौदिया को करारा झटका लगा है.

चंडीगढ़ के इन सभी 16 नेताओं ने पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल और पंजाब पार्टी मामलों के प्रभारी मनीष सिसोदिया को अपना इस्तीफा भेजा है. इन सभी का इस्तीफा मंजूर हुआ है या नहीं, अभी तक इसकी जानकारी नहीं मिल पाई है. ‘आप’ छोड़ने वाले नेताओं ने केजरीवाल को भेजे इस्तीफा में डॉ. बलबीर सिंह गुट पर तानाशाही रवैये का आरोप लगाया है. इनमें से अधिकतर नेता प्रतिपक्ष के नेता सुखपाल खैरा से जुड़े हुए हैं. सामूहिक इस्तीफे में इन नेताओं ने डॉ. बलबीर सिंह पर कई नेताओं को मनमाने ढंग से निकालने का आरोप लगाया है.

राहुल गांधी ने संभाली कांग्रेस-बसपा गठबंधन पर चर्चा की कमान
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दलित इंडियन आइडल की सच्चाई पर बवाल क्यों

इंडियन आईडल नाम की सिंगिंग प्रतियोगिता शुरू हो चुकी है. खास बात यह है कि इस शो के प्रोमों के दौरान प्रतियोगियों की पृष्ठभूमि के बारे में बताया जा रहा है. इस शो में दलित समाज के युवा सौरभ वाल्मीकि भी पहुंचे हैं. सौरभ का प्रोमो सुपरहिट है. प्रोमों के बाद यह तय माना जा रहा है कि अपनी शानदार आवाज की बदौलत सौरभ इस गायकी प्रतियोगिता में मजबूत दावेदारी पेश करेंगे. लेकिन प्रोमो रिलिज होने के बाद सौरभ अपने ही शहर वालों के निशाने पर हैं.

दरअसल प्रोमो के दौरान सौरभ ने जातिवाद के दंश का जिक्र किया है. प्रोमो में सौरभ कह रहे हैं… कहते हैं कि म्यूजिक की कोई धर्म और जाति नहीं होती लेकिन म्यूजिक सीखने के लिए मुझे जातिवाद का सामना करना पड़ा…. सौरभ इस प्रोमो में कहते हैं कि हमें मंदिर में नहीं जाने दिया जाता, प्रसाद फेंक कर दिया जाता है. सौरभ का यह भी कहना है कि सार्वजनिक नलों से पानी नहीं पीने दिया जाता.

सौरभ के इसी बयान से उनके शहर लखीमपुर के लोग भड़क गए हैं. शहर में लोग सौरभ के इस बयान की निंदा कर रहे हैं. उनका तर्क है कि सौरभ नेशनल टीवी पर अपने लखीमपुर शहर के बारे में गलत छवि पेश कर रहे हैं. लोगों का कहना है कि सौरभ जिस तरह की बातें कर रहे हैं उससे समूचे उत्तर प्रदेश और खासकर खीरी जिले को लेकर के मुंबई और दिल्ली में बैठे हुए लोगों का नजरिया बहुत ही बदल जाएगा.

हालांकि अगर आप सौरभ के प्रोमों को ध्यान से देखेंगे तो यह साफ हो जाएगा कि सौरभ जातिवाद और छूआछूत की बात दलित समाज के लिए कह रहे हैं न कि व्यक्तिगत तौर पर अपने लिए…

सौरभ साफ कह रहे हैं कि हमें यानि दलित समाज को मंदिर में नहीं जाने दिया जाता और प्रसाद फेंक कर दिया जाता है, जो कि सच्चाई है. भारत में दलितों को आए दिन जिस कदर जातिवाद का सामना करना पड़ता है वो कोई छुपी बात नहीं है, बल्कि सरकारी आंकड़ों में दर्ज है. दलित समाज के साथ हर 18वें मिनट में अत्याचार होता है.

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक पिछले दिनों कानपुर देहात में मंगलपुर कस्बे में पुजारी ने दलित महिलाओं को मंदिर में जाने से रोक दिया था और धमकाने लगा. जब महिलाएं जबरन मंदिर में घुस गई तब पुजारी ने उनके निकलने के बाद पत्नी के साथ मिलकर पूरे मंदिर परिसर को गंगाजल से धुलवाया. इसी तरह पिछले साल अगस्त में आई एक खबर के मुताबिक उत्तर प्रदेश के हमीरपुर जिले के मौदाहा कस्बे के गदाहा गांव में रामायण पाठ के दौरान दलितों को मंदिर परिसर से दूर रहने का नोटिस चिपका दिया गया था. तो वहीं राजस्थान के झुंझुनू जिले में बुहाना तहसील के गांव चुडिना में एक दलित के मंदिर में प्रवेश करने पर पूरे गांव के दलितों की लाठी-डंडों से पिटाई की गई.

ये महज कुछ खबरे हैं जिसे उदाहरण के तौर पर दिया जा रहा है. सोशल मीडिया पर वायरल हुई तस्वीर कि शूद्र मंदिर परिसर में प्रवेश न करें तमाम लोगों के सामने से जरूर गुजरी होगी.

इसलिए जाति की बात कह कर शहर की इज्जत को खराब करने का लखीमपुर के लोगों का तर्क भी एक तरह का जातिवाद ही है. असल में सौरभ ने समाज की उस कुरीति को कुरेद दिया है, जिसे समाज का उच्च तबका हमेशा से दबा कर रखना चाहता है. स्थानीय लोगों को यही हजम नहीं हो रहा है.

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FIFA World Cup Final 2018: 20 साल बाद फ्रांस ने किया फुटबाल विश्व कप पर कब्जा

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नई दल्ली। फीफा वर्ल्ड कप के फाइनल मुकाबले में जैसे ही फ्रांस के गोलकीपर ह्यूगो लोरिस ने गेंद विपक्षी टीम के हाफ की ओर मारी, रेफरी ने सीटी बजा दी. नीली जर्सी में मौजूद फ्रांसीसी टीम के खिलाड़ी एक दूसरे के गले मिलने लगे, रोने लगे, चिल्लाने लगे. जश्न का दौर कुछ इस तरह से शुरू हुआ, मानों स्कूली बच्चे पहली ट्रोफी जीतने पर खुशी में झूम रहे हों. पूरा लुजनिकी स्टेडियम जश्न के शोर में डूब गया. आखिर यह होता भी क्यों नहीं. 20 साल बाद फ्रांस एक बार फिर फुटबॉल का सरताज बन चुका था. वहीं दूसरी तरफ लाल-सफेद जर्सी में मौजूद क्रोएशिया टीम आंसुओं में डूबी थी. खुद को संभालते हुए 40 लाख की आबादी वाले इस मुल्क के प्लेयर्स फ्रांस के सम्मान में तालियां भी बजा रहे थे.

महत्वपूर्ण मौकों पर स्कोर करने की अपनी काबिलियत और किस्मत के दम पर फ्रांस ने रविवार को यहां फीफा विश्व कप के रोमांचक फाइनल में दमदार मानी जा रही क्रोएशिया टीम को 4-2 से हराकर दूसरी बार विश्व चैंपियन बनने का गौरव हासिल किया. फ्रांस ने 18वें मिनट में मारियो मैंडजुकिच के आत्मघाती गोल से बढ़त बनाई लेकिन इवान पेरिसिच ने 28वें मिनट में बराबरी का गोल दाग दिया. फ्रांस को हालांकि जल्द ही पेनल्टी मिली जिसे एंटोनी ग्रीजमैन ने 38वें मिनट में गोल में बदला जिससे फ्रांस हाफ टाइम तक 2-1 से आगे रहा.

पॉल पोग्बा ने 59वें मिनट में तीसरा गोल दागा जबकि किलियान एमबापे ने 65वें मिनट में फ्रांस की बढ़त 4-1 कर दी. जब लग रहा था कि अब क्रोएशिया के हाथ से मौका निकल चुका है तब मैंडजुकिच ने 69वें मिनट में गोल करके उसकी उम्मीद जगाई.

फ्रांस ने इससे पहले 1998 में विश्व कप जीता था. तब उसके कप्तान डिडियर डेसचैम्प्स थे जो अब टीम के कोच हैं. इस तरह से डेसचैम्प्स खिलाड़ी और कोच के रूप में विश्व कप जीतने वाले तीसरे व्यक्ति बन गये हैं. उनसे पहले ब्राजील के मारियो जगालो और जर्मनी फ्रैंक बेकनबऊर ने यह उपलब्धि हासिल की थी.

कहीं खुशी…..

क्रोएशिया पहली बार फाइनल में पहुंचा था. उसने अपनी तरफ से हर संभव प्रयास किए और अपने कौशल और चपलता से दर्शकों का दिल भी जीता लेकिन आखिर में जालटको डालिच की टीम को उप विजेता बनकर ही संतोष करना पड़ा. बेशक क्रोएशिया ने बेहतर फुटबॉल खेली लेकिन फ्रांस अधिक प्रभावी और चतुराईपूर्ण खेल दिखाया, यही उसकी असली ताकत है जिसके दम पर वह 20 साल बाद फिर चैंपियन बनने में सफल रहा. दोनों टीमें 4-2-3-1 के संयोजन के साथ मैदान पर उतरी.

क्रोएशिया ने इंग्लैंड की खिलाफ जीत दर्ज करने वाली शुरुआती एकादश में बदलाव नहीं किया तो फ्रांसीसी कोच डेसचैम्प्स ने अपनी रक्षापंक्ति को मजबूत करने पर ध्यान दिया. क्रोएशिया ने अच्छी शुरुआत और पहले हाफ में न सिर्फ गेंद पर अधिक कब्जा जमाये रखा बल्कि इस बीच आक्रामक रणनीति भी अपनाए रखी. उसने दर्शकों में रोमांच भरा जबकि फ्रांस ने अपने खेल से निराश किया. यह अलग बात है कि भाग्य फ्रांस के साथ था और वह बिना किसी खास प्रयास के दो गोल करने में सफल रहा. फ्रांस को पहला मौका 18वें मिनट में मिला और वह इसी पर बढ़त बनाने में कामयाब रहा.

फ्रांस को दाईं तरफ बाक्स के करीब फ्री किक मिली. ग्रीजमैन का क्रास शॉट गोलकीपर डेनियल सुबासिच की तरफ बढ़ रहा था लेकिन तभी मैंडजुकिच ने उस पर हेडर लगा दिया और गेंद गोल में घुस गयी. इस तरह से मैंडजुकिच विश्व कप फाइनल में आत्मघाती गोल करने वाले पहले खिलाड़ी बन गये. यह वर्तमान विश्व कप का रेकॉर्ड 12वां आत्मघाती गोल है. पेरिसिच ने हालांकि जल्द ही बराबरी का गोल करके क्रोएशियाई प्रशंसकों और मैंडजुकिच में जोश भरा. पेरिसिच का यह गोल दर्शनीय था जिसने लुजनिकी स्टेडियम में बैठे दर्शकों को रोमांचित करने में कसर नहीं छोड़ी. क्रोएशिया को फ्री किक मिली और फ्रांस इसके खतरे को नहीं टाल पाया.

मैंडजुकिच और डोमागोज विडा के प्रयास से गेंद विंगर पेरिसिच को मिली. उन्होंने थोड़ा समय लिया और फिर बाएं पांव से शाट जमाकर गेंद को गोल के हवाले कर दिया. फ्रांसीसी गोलकीपरी ह्यूगो लोरिस के पास इसका कोई जवाब नहीं था. लेकिन इसके तुरंत बाद पेरिसिच की गलती से फ्रांस को पेनल्टी मिल गयी. बाक्स के अंदर गेंद पेरिसिच के हाथ से लग गयी. रेफरी ने वीएआर की मदद ली और फ्रांस को पेनल्टी दे दी. अनुभवी ग्रीजमैन ने उस पर गोल करने में कोई गलती नहीं की. यह 1974 के बाद विश्व कप में पहला अवसर है जबकि फाइनल में हाफ टाइम से पहले तीन गोल हुए.

कहीं गम……

क्रोएशिया ने इस संख्या को बढ़ाने के लिए लगातार अच्छे प्रयास किये लेकिन फ्रांस ने अपनी ताकत गोल बचाने पर लगा दी. इस बीच पोग्बा ने देजान लोवरान को गोल करने से रोका. क्रोएशिया ने दूसरे हाफ में भी आक्रमण की रणनीति अपनायी और फ्रांस को दबाव में रखा. खेल के 48वें मिनट में लुका मोड्रिच ने एंटे रेबिच का गेंद थमाई जिन्होंने गोल पर अच्छा शॉट जमाया लेकिन लोरिस ने बड़ी खूबसूरती से उसे बचा दिया. लेकिन गोल करना महत्वपूर्ण होता है और इसमें फ्रांस ने फिर से बाजी मारी.

दूसरे हाफ में वैसे भी उसकी टीम बदली हुई लग रही थी. खेल के 59वें मिनट में किलियान एमबापे दायें छोर से गेंद लेकर आगे बढ़े. उन्होंने पोग्बा तक गेंद पहुंचायी जिनका शॉट विडा ने रोक दिया. रिबाउंड पर गेंद फिर से पोग्बा के पास पहुंची जिन्होंने उस पर गोल दाग दिया. इसके छह मिनट बाद एमबापे ने स्कोर 4-1 कर दिया. उन्होंने बायें छोर से लुकास हर्नाडेज से मिली गेंद पर नियंत्रण बनाया और फिर 25 गज की दूरी से शॉट जमाकर गोल दाग दिया जिसका विडा और सुबासिच के पास कोई जवाब नहीं था.

एमबापे ने 19 साल 207 दिन की उम्र में गोल दागा और वह विश्व कप फाइनल में गोल करने वाले सबसे कम उम्र के खिलाड़ी बन गये. पेले ने 1958 में 17 साल की उम्र में गोल दागा था. क्रोएशिया लेकिन हार मानने वाला नहीं था. तीन गोल से पिछड़ने के बावजूद उसका जज्बा देखने लायक था लेकिन उसने दूसरा गोल फ्रांसीसी गोलकीपर लोरिस की गलती से किया. उन्होंने तब गेंद को ड्रिबल किया जबकि मैंडजुकिच पास में थे. क्रोएशियाई फारवर्ड ने उनसे गेंद छीनकर आसानी से उसे गोल में डाल दिया.

इसके बाद भी क्रोएशिया ने हार नहीं मानी. उसने कुछ अच्छे प्रयास किए लेकिन उसके शॉट बाहर चले गए. इस बीच इंजुरी टाइम में पोग्बा को अपना दूसरा गोल करने का मौका मिला लेकिन वह चूक गए. रेफरी की अंतिम सीटी बजते ही फ्रांस जश्न में डूब गया.

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भाजपा नेता से परेशान 200 दलितों ने दिया धर्म परिवर्तन का अल्टीमेटम

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पटना। बिहार के समस्तीपुर जिले से चौंकाने वाली खबर है. यहां दलित समाज के 200 लोगों ने स्थानीय प्रशासन को इस्लाम धर्म कबूलने का अल्टीमेटम दिया है. इस लोगों ने स्थानीय भाजपा नेता रघुवीर मिश्रा के भाई रणवीर मिश्रा पर प्रताड़ित करने का आरोप लगा है. मामला समस्तीपुर जिले के उजियारपुर प्रखंड अंतर्गत हरपुर रेवाड़ी गांव का है

पीड़ित सुजीत कुमार राम के अनुसार 24/06/2018 को वह घर के पास अपने पंचर बनाने की दुकान पर काम कर रहा था जहां दबंग रणबीर मिश्रा अपने साथियों के साथ आए और बोला कि मेरा पंक्चर बनाओ. सुजीत ने पंक्चर बनाने से मना कर दिया क्योंकि पहले से ही आरोपी लोग दबंगता के साथ सुजीत के दुकान पर काम करवाया करता था और पैसा नहीं देता था जिसके कारण पहले का भी बकाया पैसा था.

पीड़ित सुजीत ने कहा कि पहले पहले का पैसा दो तब मैं आपका पंचर बना दूंगा जब सुजीत ने पंचर बनाने से मना कर दिया तो सुजीत से भाजपा नेता के भाई रणवीर मिश्रा ने हाथापाई करना शुरू कर दिया और अपने साथियों के साथ घर पर हमला बोल दिया. पीड़ित लोगों का कहना है कि पूरे दुकान का सामान और घर का सामान माल मवेशी के साथ हमलावरों ने लूट लिया और लाठी डंडे से पिटाई भी की. घटना के बाद स्थानीय अंगार घाट थाना में FIR दर्ज की गई लेकिन Fir पर आज तक कोई भी कार्यवाही नहीं की गई है.

पीड़ितों का आरोप है कि आरोपी स्थानीय भाजपा नेता का भाई है और प्रशासन पर भाजपा के नेता लोग दबाव बना रहे हैं जिसके कारण प्रशासन कोई कार्यवाही नहीं कर रही है. प्रशासन के तरफ से इस तरह के संवेदनहीन रवैया पर लगातार भाजपा नेता के द्वारा मिल रही धमकी और दबंगों के अत्याचार से ऊबकर दलित समाज के 31 परिवार के 200 से अधिक लोगों ने सामूहिक धर्म परिवर्तन करने का आवेदन स्थानीय जिला अधिकारी को दिया है.

दलित समाज के लोगों का आरोप है कि आरोपी उनलोगों पर दबाव बना रहे हैं कि तुम लोग केस वापस लो और सुलह लगाकर चैन से रहो नहीं तो चैन से नहीं रह पाओगे. आपको बता दें कि एससी एसटी एक्ट के निष्प्रभावी होने के बाद बिहार कथादेश में दलितों पर लगातार अत्याचार की घटनाएं बढ़ रहा है. जिस में आए दिन हत्या वह इस तरह की घटनाएं सामने आती है समस्तीपुर की यह घटना भाजपा और संघ परिवार की राजनीति पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करने वाला है. इस घटना ने भाजपा के समरसता के ढोंग की पोल भी खोलकर रख दी है.

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मीडिया में MP में बसपा-कांग्रेस गठबंधन की खबर को बसपा ने किया खारिज

नई दिल्ली। मीडिया में बसपा का कांग्रेस के साथ गठबंधन की खबरें जोर से चल रही है. एक प्रतिष्ठित मीडिया संस्थान ने तो बसपा-कांग्रेस के गठबंधन का फार्मूला भी पेश कर दिया है. मीडिया संस्थान के मुताबिक प्रदेश में बसपा 26 सीटें जबकि कांग्रेस 204 सीटों पर चुनाव लड़ेगी. हालांकि बहुजन समाज पार्टी के मध्यप्रदेश अध्यक्ष ने इस खबर को खारिज किया है.

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक कांग्रेस ने चुनाव में बसपा के साथ गठबंधन तय कर लिया है. कांग्रेस राज्य में बीएसपी को 26 सीटें देने को राजी हो गई है, जबकि 204 सीटों पर कांग्रेस खुद अपने प्रत्याशी उतारेगी. रिपोर्ट के मुताबिक राहुल गांधी से गठबंधन को लेकर मिली हरी झंडी के बाद कमलनाथ ने बसपा सुप्रीमो मायावती से मिलकर सीटों के बंटवारे को लेकर चर्चा की है. इसमें तय हुआ है कि बसपा विंध्य, बुंदेलखंड, चंबल में अपने प्रभाव वाली सीटों पर प्रत्याशी उतारेगी. इस खबर पर दलित दस्तक ने मध्य प्रदेश के बसपा अध्यक्ष से बात की तो उन्होंने इस खबर को भ्रामक बताया. प्रदेश अध्यक्ष प्रदीप अहिरवार का कहना था कि कांग्रेस पार्टी जान बूझ कर इस तरह की खबरें प्रायोजित कर रही हैं. अहिरवार के मुताबिक कांग्रेस के साथ गठबंधन को लेकर अभी तक हमें केंद्रीय नेतृत्व की ओर से कोई सूचना नहीं मिली है. गौरतलब है कि इससे पहले भी बसपा के प्रदेश स्तर के नेता कांग्रेस के साथ गठबंधन की खबरों से इंकार करते रहे हैं. तो सवाल है कि आखिर गठबंधन की खबरें मीडिया में कैसे तैर रही है?

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Jio इ्स्टीट्यूट और मोदी सरकार का हैरान करने वाला फैसला

Jio Institute of Reliance Foundation नाम जानते हैं इस संस्थान का? या कोई फ़ोटो है इस संस्थान की ? या किसी स्टूडेंट को जानते हैं जो वहाँ पढ़ रहा है?? यक़ीनन कुछ नहीं पता होगा इस संस्थान के बारे में. लेकिन अंबानी को बिकी हुई मोदी सरकार के मानव संसाधन मंत्रालय ने जो छः एमिनेंस संस्थान की घोषणा की है उसमें जियो यूनिवर्सिटी का भी एक नाम है वो भी निजी कोटे से.

दरअसल ऐसा कोई संस्थान है ही नहीं. अभी स्थापना नहीं हुई लेकिन सरकार को शायद ज्योतिषों-पंडो या किसी ओझा-तांत्रिक ने बताया होगा कि जब भी जियो फाउंडेशन बनेगा बिल्कुल टॉप क्लास वाला बनेगा. यानी हवाई किला है फिर भी यह देश के सब संस्थानों से ऊपर है. सरकार द्वारा जारी तस्वीरों में बाकी चयनित इंस्टिट्यूट IIT( दिल्ली, मुंबई, बैंगलुरू) BITS पिलानी, मनिपाल यूनिवर्सिटी की बिल्डिंग्स की ऑरिजनल फ़ोटो हैं, लेकिन जिओ इंस्टिट्यूट का नहीं. यहाँ तक कि गूगल बाबा भी आपको कोई फ़ोटो नहीं दिखा सकता है. इस सूची में जेएनयू क्यों नहीं है आपको बताने की ज़रूरत है क्या??

एकतरफ़ सरकार ने यूजीसी को खत्म कर दिया है और एक सुपरस्पिशियल अथॉरिटी बना दी है जिसमें साफ प्रावधान है कि सरकार जिसे पसंद करेगी या चाहेगी उसे ही पैसा देगी. और दूसरी तरफ सरकार को पसंद क्या आया रिलायंस का हवाई संस्थान जिसका अब तक कोई अस्तित्व ही नहीं है.

अब इस जियो यूनिवर्सिटी पर हम टैक्सपेयरों का पैसा लगेगा जो सरकार देगी. इसका मुनाफा जाएगा अम्बानी की जेब में और उस मुनाफे का कुछ हिस्सा भाजपा को. इस तरह देश की उच्च शिक्षा का कल्याण होगा.

आरक्षण खत्म करके, रोस्टर सिस्टम लागू करके, उच्च शिक्षा को महँगी करके, निजीकरण करके इस देश के बहुजनों को तो उच्च शिक्षा से बेदख़ल करने के लिए सब क़वायद शुरू कर ही ली गई है. रही सही कसर पूरी करेंगे हम लोगों के खून-पसीने की कमाई को चूस कर.

तो बच्चा लोग बजाओ ताली विकास अब हवा में भी आ रहा.

दीपाली तायडे

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भाजपा दलितों का सबसे ज्यादा हितैषी होने की बात तो करती है किंतु…

मैंने जब से होश संभाला है, हमेशा यही सुना कि हरेक सरकार ने गरीबों के हक में जीजान से काम किया है…. करती रही हैं. गरीबी और जातियों को मिटाने के नाम पर न जाने हर सरकार ने कितनी ही योजनाएं बनाईं किंतु समझ नहीं आया कि आजादी के सत्तर साल बाद भी गरीबी का प्रतिशत टस से मस नहीं हो पाया है. जातियां तो और भी पुख्ता होती जा रहीं हैं.  माना कि समाज के गरीब और निरीह समाज में वक्त बदलने के साथ-साथ जरूर कुछ परिवर्तन हुए हैं किंतु उतने नहीं, जितने की जरूरत है/थी. इस प्रकार के परिवर्तन केवल भारत में ही नहीं अपितु अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हुए हैं. अत: इसका श्रेय किसी भी राजनीतिक दल को देना तर्कसंगत नहीं होगा. यहाँ यह कहना गलत नहीं होगा कि प्रेत्येक राजनीतिक दल ने दलितों के हक में केवल और केवल वोट बैंक को साधने के लिए हमेशा खोखले वादे किए हैं.

आज की भाजपा यानि कि मोदी सरकार भी यही कर रही है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने आपको दलितों का सबसे बड़ा हितैषी होने की बात तो जरूर करते हैं पर हकीकत कुछ और ही है. भारतीय जनता पार्टी दलितों के वोट हासिल करने के लिए जोरदार कोशिश करती हुई दिखती है, लेकिन अपनी पार्टी के पुराने दलित नेता और उनके परिजनों की बेकदरी करने से बाज नहीं आती. फिर ये कैसे आशा की जा सकती है कि मोदी सरकार आम जनमानस के हित की बात पर यकीन रखती है. और तो और देश के और भाजपा द्वारा बनाए गए दलित राष्ट्रपति का दर्जा आज भी दलित होने का ही बना हुआ है. उनके साथ भी जगन्नाथ के मन्दिर में अपमान जनक सुलूक किया गया. अब राम कोविन्द जी को राष्ट्रपति तो बना दिया गया किंतु ‘जाति’ है कि जाती ही नहीं.  फिर भी दलित मन्दिर जाने से भला परहेज क्यों नहीं करते?

भाजपा आज पूरे देश में शासन कर रही है. उसी भारतीय जनता पार्टी के जनक रहे अटल बिहारी बाजपेयी के समय जनसंघ से लखना विधानसभा सुरक्षित सीट से दो बार विधायक रहे रामलखन धोबी का परिवार आज गुजारे के लिए परेशान है. रामलखन धोबी 1974 में पहली बार ‘दीपक’ चुनाव निशान वाली जनसंघ पार्टी से व 1977 में जनसंघ के बाद बनी जनता पार्टी से विधायक लखना विधानसभा से जीते थे. आज भी उनके परिवार की निष्ठा भाजपा के साथ है. घर के दरवाजे पर आज भी कमल के निशान वाला भाजपा का स्टिकर चिपका है. किंतु लखना का परिवार दलितीय जिन्दगी जीने को ही मजबूर है. अब इसे लखना के साथ भेदभाव वाला रवैया कहें या इतना होने पर भी लखना के परिवार की अदूर्शिता? खैर! ये तो एक परिवार की बात रही. समूचे समाज के प्रति भाजपा का इस प्रकार का ही उपेक्षापूर्ण रवैया आज भी बना हुआ है.

भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह अपनी किसी भी सभा में यह कहने से नहीं चूकते कि भाजपा दलितों के साथ है. किंतु वर्तमान भाजपा सरकार द्वारा बजरिए सुप्रीम कोर्ट अनुसूचित जाति (एससी)/अनुसूचित जनजाति (एसटी) अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989 को कमजोर करा दिया गया. और जब 2 अप्रैल 2018 को भाजपा के इस पराक्रम के खिलाफ दलितों/ओबीसी/अल्पसंख्यकों  द्वारा सामूहिक आन्दोलन किया गया तो इसी भाजपा सरकार ने दलितों/ओबीसी/अल्पसंख्यकों के अनेक नौजवानों को झूटे मामले बनाकर जेलों में ठूंस दिया गया. बहुत से तो आज तक जेल की सलाखों के पीछे हैं. माब लिंचिग के जितने भी मामले हैं, सबके शिकार दलित अथवा अल्पसंख्यक ही हुए है; गोरक्षा के नाम पर सबसे ज्यादा दलितों और अल्पसंख्यकों को ही निशाना बनाया गया है; महिला बलात्कार के मामले भी ज्यादातर इसी वर्ग की महिलाओं के साथ हुए हैं.  किंतु अमित शाह बारबार यह आश्वासन देने से नहीं चूकते कि केंद्र सरकार दलित समुदाय के प्रत्येक अधिकार की रक्षा करेगी. भाजपा प्रमुख ने एक साथ कई ट्वीट करते हुए कहा, ‘सरकार दलितों के प्रत्येक अधिकार की रक्षा करेगी और उनकी आकांक्षाओं को पूरा करना जारी रखेगी…..’ किंतु धरातल पर उनकी घोषणा के विपरित ही काम हो रहे हैं.

काफी शोरशराबे के बाद माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा एससी/एसटी एक्ट पर आदेश देने के दिन से ही केंद्र सरकार तत्काल और सजगता के साथ सक्रिय तो हो गई किंतु सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस मसले को ठंडे बस्ते में ही डाल दिया गया. हुआ यूँ कि समाज में दलितों/ओबीसी/अल्पसंख्यकों के खिलाफ और भी भयावह घटनाएं घटने लगीं हैं. न्यायलाय से बेल मिलने के बावजूद भीम सेना के रावण को रासुका के तहत जेल में डाल दिया गया. रोहित विमोला के कातिलों को आजतक नहीं पकड़ा गया. पुलिस को तो केवल बहाना चाहिए था… वो सुप्रीम कोर्ट के सुझाव पर असल में अमल करने में लग गई. यदि भाजपा सरकार दलितों के हक में है तो फिर इस बाबत पुराने एक्ट को ही लागू कराने के लिए सरकारी विधेयक क्यों नहीं लाई? भाजपा सरकार में मंत्री पद पर विराजमान दलित नेता पासवान यह कह कर कि सरकार अनुसूचित जाति (एससी)/अनुसूचित जनजाति (एसटी) अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989 को पुन: अपने प्राथमिक रूप में बनाए रखने के लिए ‘अध्यादेश’ लाएगी. किंतु अभी तक तो ऐसा कुछ हुआ नहीं है.

अमित शाह का ये कहना कि सरकार द्वारा एससी/एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम, 2015 में संशोधन कर वास्तव में उसे और शक्ति प्रदान की है, किसी अत्यंत ही भद्दे मजाक से कम नहीं है. कमाल की बात तो ये भी है कि सुप्रीम कोर्ट के जिस जज आदर्श गोयल ने ‘उदय ललित’ के साथ मिलकर SC,ST एक्ट को बर्बाद कर दिया, उसे सेवा निवृत्त होते ही  नरेंद्र मोदी सरकार ने ‘नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल’ के चेयरमैन जैसे मालदार पद पर अगले पांच साल के लिए बैठा दिया. फिर ये कैसे मान लिया जाय कि एस सी/एस टी एक्ट को कमजोर करने में मोदी सरकार का हाथ नहीं है? क्या इसके बाद भी SC-ST को आगामी चुनावों अपनी भूमिका तय नहीं करनी चाहिए? कहने को तो भाजपा डॉ. भीमराव अंबेडकर के सपने को पूरा करने को भाजपा की प्रतिबद्धता बताती है पर करती कुछ नहीं.

अल्पसंख्यक विश्वविद्यालयों में एस सी/ एस टी/ओ बी सी को आरक्षण दिए जाने का सवाल उठाकर भाजपा अपने किए पर पर्दा डालने का काम ही नहीं रही अपितु उसे  वंचितों की फिक्र कम राजनीति की ज्यादा चिंता है. सरकारी नौकरियों में आरक्षण को कायम रखने के नाम पर भी भाजपा दोहरी भूमिका में नजर आ रही है. प्रशासनिक नौकरियों में सीधे भर्ती करना, निजी संस्थानों में आरक्षण की व्यवस्था न करना, ठेकेदारी प्रथा को बढावा देना और न जाने कितने ही अघोषित दलित विरोधी कार्यक्रम मोदी सरकार द्वारा चलाए गए हैं, उनकी गणना करना ही दुर्लभ है. यदि विपक्षी राजनीतिक दल उनके इस घृणित कार्य की ओर उंगली उठाते हैं तो भाजपा के प्रवक्ता इतिहास पर ही सवाल करके विपक्षियों के सवाल को खारिज करने का काम करते हैं. अब कोई इनसे पूछे कि यदि आज के विपक्षी दलों ने गलतियां न की होती तो भाजपा की सरकार किस बिना पर बनती. इस प्रकार भाजपा पुरानी सरकारों की कमियों को सामने लाकर अपनी कमियों को छुपाती रहेगी?

अब मोदी जी तो कुछ बोलते नहीं है. पहले वो कहते थे कि मनमोहन सिंह मौनी बाबा है. उनके अनुसार, क्या अब ये कहा जाए कि मनमोहन सिंह जी तो कम बोलते थे, किंतु मोदी जी तो किसी की सुनते ही नहीं. शाह कहते हैं कि भाजपा का मत स्पष्ट है कि हम बाबा साहेब द्वारा प्रदत्त संविधान और इसमें एससी तथा एसटी समुदाय को दिए गए अधिकारों में पूर्ण विश्वास रखते हैं…..किंतु शाह केवल और केवल बयान देते हैं, होता-जाता कुछ नहीं.

सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के संबंध में दलित सांसदों ने प्रधानमंत्री से मुलाकात की. उन्हें आश्वासन दिया गया कि सरकार उनके अधिकारों की रक्षा और उनके भले के लिए सब कुछ कर रही है….और दलित सांसद इतना सुनकर शांत हो गए. प्रत्युत्तर में एक का भी मुंह नहीं खुला कि जो सरकार इस बाबत विधेयक कब तक लाएगी. … अब बेचारों को अपनी कुर्सी भी तो बचानी है कि नहीं.

चलते-चलते इस बात और कि दिनांक 16.07.2018 के दैनिक जागरण  के राष्ट्रीय संस्करण में खबर है कि भाजपा एस सी /एस टी वर्ग के पढे-लिखे लोगों को जमीनी संगठन का सरताज बनाएगी. मिशन 2019 को लेकर भाजपा ने अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लोगों को बूथ कमेटियों का कर्णधार बनाने का लक्ष्य तय किया है. पार्टी नेतृत्व ने तय किया है कि संगठन के पदाधिकारी से लेकर नेता और बड़े कार्यकर्ता भी इस मुहिम को सफल बनाने के लिए गांवों में कैंप करेंगे. स्मरण रहे कि भाजपा का यह निर्णय मिशन 2019 के तहत लिया गया है. भाजपा 2019 के लोक सभा चुनाव में ‘साम, दाम दण्ड, भेद’ जैसे सारे हथकंडे अपनाएगी, इस बात को कतई नहीं नकारा जा सकता. यह आज की राजनीति का सबसे भयानक चेहरा है.

बिहार दौरे पर गए भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने प्रति बूथ एससीएसटी वर्ग से 10 कार्यकर्ताओं का चयन कर संगठन में शामिल करने का जो निर्णय लिया है इसके पीछे भाजपा की हताशा साफ झलकती है.  भाजपा का मानना है कि इस पहल से विपक्षी दलों के आधार वोट बैंक में सेंध लगाने के साथ संगठन के लिए यह मुहिम वरदान साबित होगी. इतना ही नहीं इस प्रकार भाजपा एस सी /एस टी वर्ग के युवाओं को पद का लालच/झांसा देकर भाजपा से विमुख दलितों को अपने पाले में खींचने का नापाक काम करना चाहती है. अब दलितों पर निर्भर है कि वो भाजपा के इस झांसे से बच पाते है कि नहीं. और इसमें एस सी /एस टी वर्गे के युवाओं को भाजपा इस झांसे में न आने की भूमिका निभानी होगी कि वो भाजपा द्वारा बांटी जाने वाली बूर को तिलांजली देकर समूचे दलित समाज के हक में काम करें.

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बहनजी ने दिया मोदी की आजमगढ़ रैली का जवाब

नई दिल्ली। बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष सुश्री मायावती ने कहा है कि पीएम मोदी हताश हैं और लोकसभा चुनाव इसी साल संभव है. बसपा प्रमुख ने एक बयान जारी कर पीएम मोदी को घेरते हुए कहा कि मोदी विकास की राग छोड़कर जिस प्रकार श्मसान-कब्रिस्तान, तलाक, हिन्दू-मुस्लिम, विपक्ष के खिलाफ फेक न्यूज व जातिवादी एवं सांप्रदायिकता आदि की वकालत व सरकारी संरक्षण करने में लगे हैं. इससे साफ हो रहा है कि वो हताश हैं.

यूपी की पूर्व मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि हताशा में भाजपा देश को जातिवादी और साम्प्रदायिकता की आग में झोंकने को तैयार हैं. मायावती ने यह भी कहा कि हताश मोदी लोकसभा का चुनाव समय से पहले इस साल के अंत तक करवा सकते हैं. जम्मू-कश्मीर में महबूबा मुफ्ती की सरकार को गिराकर बीजेपी इसकी भूमिका पहले ही तैयार कर चुकी है.

पीएम मोदी के आजमगढ़ व मिर्जापुर में दिए गए भाषण को चुनावी जुगाड़ों वाला भ्रामक भाषण बताते हुए उन्होंने कहा कि कर्नाटक में विपक्ष के साथ मिलकर भाजपा को पटखनी देने वाली बसपा प्रमुख ने कहा कि कर्नाटक में तमाम हथकंडे अपनाने के बावजूद सरकार नहीं बना पाने के कारण बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व कुण्ठा व हताशा से ग्रस्त है. देश भर में व उत्तर प्रदेश में अटकी तमाम सरकारी परियोजनाओं की ओर इशारा करते हुए पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि तमाम परियोजनाओं के अटके, लटके व भटके रहने में बीजेपी की सरकारों का भी खास योगदान है, आखिर पीएम मोदी इसे स्वीकार करने से क्यों कतराते हैं.

मध्यप्रदेश की 80 सीटों का फैसला करेंगे दलित-आदिवासी दल

नई दिल्ली। मध्य प्रदेश के चुनाव में सारी बहस कांग्रेस और भाजपा के बीच टिक गई है. इस बीच बसपा किसको समर्थन देगी यह भी एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है. इसकी वजह भी है क्योंकि पिछले विधानसभा चुनाव में बीजेपी को 44.88 फीसदी और कांग्रेस को 36.38 फीसदी वोट मिले थे. वहीं, बहुजन समाज पार्टी के पास 6.29 फीसदी वोट थे. इस लिहाज से ये प्रदेश की राजनीति में ये तीनों दल काफी महत्वपूर्ण हैं.

लेकिन इन तीनों दलों से इतर कुछ और राजनीतिक दल भी मध्यप्रदेश की राजनीति में काफी मायने रखते हैं. और प्रदेश में सत्ता किसके पास जाएगी, इसमें इन दलों की महत्वपूर्ण भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता. इन दलों में सबसे पहले गोंडवाना गणतंत्र पार्टी का नाम आता है. पिछले विधानसभा चुनाव में उसके पास एक फीसदी वोट था. यूं तो ऊपर से देखने पर यह वोट प्रतिशत बहुत कम नजर आता है लेकिन पिछले विधानसभा चुनाव के नतीजों को गौर से देखें, तो बसपा, गोंडवाना गणतंत्र पार्टी और दूसरे छोटे दलों ने 80 से अधिक सीटों पर 10,000 से ज्यादा वोट हासिल किए. विधानसभा चुनावों में इतने वोट काफी मायने रखते हैं.

अगर मध्यप्रदेश विधानसभा के चुनावी नक्शे पर बीएसपी को गौर से देखें तो यह उत्तर प्रदेश से सटे जिलों में खासा असर रखती है. इसमें मुरैना, भिंड, ग्वालियर, दतिया, शिवपुरी, अशोक नगर, सागर, टीकमगढ़, छतरपुर, पन्ना, सतना, रीवा, सीधी और सिंगरौली जैसे 14 जिलों में बीएसपी का खासा असर है. यानी एक तिहाई मध्यप्रदेश में बीएसपी की पकड़ है. 2013 विधानसभा चुनाव में 62 विधानसभा सीटें ऐसी रहीं, जहां बीएसपी के प्रत्याशी ने 10,000 से ज्यादा वोट हासिल किए. तो 62 में से 17 सीटें ऐसी हैं जहां बीएसपी को 30,000 से ज्यादा वोट मिले हैं.

जहां तक गोंडवाना गणतंत्र पार्टी का सवाल है तो आदिवासी बहुल सीटों पर उसने अपनी ताकत दिखाई है. पिछले विधानसभा चुनाव में जीजीपी ने ब्योहारी, जयसिंहनगर, जैतपुर, पुष्पराजगढ़, शाहपुरा, डिंडोरी, बिछिया, निवास, केवलारी और लखनादौन सीटों पर 10,000 से ज्यादा वोट हासिल किए. अशोक भारती की जन सम्मान पार्टी भी अपनी दावेदारी जता रही है.

इसके अलावा जय आदिवासी युवा शक्ति यानि जेएवाईएस भी आगामी विधानसभा चुनाव में ताल ठोकने को तैयार है. एम्स की नौकरी छोड़कर इस संगठन की कमान संभालने वाले 35 साल के डॉ. हीरा अलावा का संगठन आदिवासियों के लिए प्रदेश में आरक्षित सभी 47 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने या फिर दूसरों को समर्थन देने को तैयार है. संगठन की नजर उन 50 सीटों पर भी है, जहां आदिवासी समाज का 20 फीसदी से ज्यादा वोट है.

इस संगठन के दावे को इसलिए हल्के में नहीं लिया जा सकता क्योंकि पिछले साल अक्टूबर में हुए छात्र संघ के चुनावों में धार जिले के छात्र परिषद में उसके नौ अध्यक्ष और 162 सदस्य जीतकर आए थे. इसकी ताकत का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि यह संगठन राज्य सरकार के तमाम कार्यक्रमों में ‘वनवासी’ शब्द को ‘आदिवासी’ शब्द में बदलवाने में कामयाब रहा था. मध्य प्रदेश की राजनीति में ये छोटे दल चुनाव बाद बड़े खिलाड़ी बनकर उभर सकते हैं.

उन चार लोगों के बारे में जानिए जो राज्यसभा के लिए हुए हैं फाइनल

राज्यसभा के लिए चयनित चार नए नाम

नई दिल्ली। राज्यसभा में अब चार नए चेहरे दिखेंगे. भाजपा सरकार की अनुशंसा पर राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने इन नामों को फाइनल किया है. इसमें संघ के विचारक राकेश सिन्हा, मशहूर नृत्यांगना सोनल मानसिंह, किसान नेता राम शकल सिंह और प्राचीन धरोहरों को संजोने वाले रघुनाथ महापात्र का नाम शामिल है. इन सभी नामों को राष्ट्रपति की ओर से राज्यसभा के लिए मनोनीत किया गया है.

राज्यसभा के लिए चुने गए इन नामों की बात करें तो 53 साल के राकेश सिन्हा संघ के विचारक हैं और मीडिया में संघ का पक्ष रखने के लिए जाने जाते हैं. सिन्हा ‘इंडिया पालिसी फाउंडेशन के संस्थापक और मानद निदेशक हैं. वे दिल्ली विश्वविद्यालय में मोतीलाल नेहरू कॉलेज में प्रोफेसर और भारतीय सामाजिक विज्ञान शोध संस्थान के सदस्य हैं. राकेश सिन्हा ने संघ संस्थापक डॉ. हेडगेवार की जीवनी लिखी है जिसे भारत सरकार के प्रकाशन विभाग ने प्रकाशित किया है. माना जा रहा है कि सिन्हा को इसी का इनाम मिला है.

उत्तर प्रदेश के राम शकल सिंह ने दलित समुदाय के कल्याण एवं बेहतरी के लिए काम किया है. एक किसान नेता के रूप में उन्होंने किसानों, श्रमिकों के कल्याण के लिए काम किया, वे तीन बार सांसद रहे और उत्तर प्रदेश के राबर्ट्सगंज का प्रतिनिधित्व किया था. राम शकल सिंह की उम्र 55 साल है.

एक अन्य नामित सदस्य रघुनाथ महापात्रा का पारंपरिक स्थापत्य और धरोहरों के संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान रहा है. उनके प्रसिद्ध कार्यों में 6 फुट लंबे भगवान सूर्य की संसद के सेंट्रल हाल में स्थित प्रतिमा और पेरिस में बुद्ध मंदिर में लकड़ी से बने बुद्ध हैं. जाने-माने मूर्तिकार महापात्रा पद्मश्री, पद्म भूषण और पद्म विभूषण से सम्मानित हैं. रघुनाथ महापात्रा 75 साल के हैं और इनकी मूर्तिकारी का डंका भारत ही नहीं, विदेशों में भी बजता है.

जबकि सोनल मानसिंह प्रख्यात भरतनाट्यम और ओडिसी नृत्यांगना हैं. मौजूदा सरकार ने स्वच्छ भारत अभियान के लिए नवरत्न चुने तो उसमें इन्हें भी जगह दी गई. सोनल मानसिंह भारत सरकार ने 1992 में कला के क्षेत्र में पद्म भूषण से सम्मानित किया था. सोनल मानसिंह मशहूर नृत्यांगना हैं और पद्म विभूषण और संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित हैं.

अलग-अलग विधा और क्षेत्र के इन नामों को नामित कर सरकार ने जहां प्रतिभाओं का सम्मान किया है तो वहीं जनता के बीच एक साकारात्मक संदेश देने में भी सफल रही है.

मदर टेरेसा से भारत रत्न सम्मान वापस लेना चाहते हैं संघ और भाजपा नेता

नई दिल्ली। आरएसएस और भाजपा के कुछ बड़े नेता दिवंगत संत मदर टेरेसा से भारत रत्न का सम्मान वापस लेना चाहते हैं. इन नेताओं का कहना है कि रांची के मिशनरीज ऑफ चैरिटी के केंद्रों से बच्चे बेचने की बात सही साबित होती है तो दिवंगत मदर टेरेसा को दिया भारत रत्न सम्मान वापस लेना चाहिए. मदर टेरेसा से यह सम्मान लेने की वकालत आरएसएस के दिल्ली प्रचार प्रमुख राजीव तुली ने की है तो वहीं भाजपा के वरिष्ठ नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने तुली की इस मांग का समर्थन किया है.

तुली के मुताबिक मदर टेरेसा ने कभी भी ‘लोक कल्याण के लिए काम नहीं किया. जबकि सुब्रह्मणयम स्वामी का कहना है कि ब्रिटिश लेखक क्रिस्टोफर की किताब ‘द मिशनरी पोजीशन: मदर टेरेसा इन थ्योरी ऐंड प्रैक्टिस’ में पूरा दस्तावेज दिया गया है कि किस प्रकार मदर टेरेसा ने जालसाजी की.

File Photo: मदर टेरेसा को ‘भारत रत्न’ देते भारत के राष्ट्रपति एन. संजीव रेड्डी

दरअसल ये पूरा मामला इस साल मई में सामने आया, जब मिशनरीज ऑफ चैरिटी से जुड़े होम से एक नवजात शिशु को एक दंपति ने 1.20 लाख रुपए में लिया था. इस दंपति से नवजात के जन्म और चिकित्सा देखभाल के नाम पर ये रकम ली गई थी. दंपति का आरोप है कि चैरिटी संस्थान ने ये आश्वासन देकर बच्चा वापस ले लिया कि प्रक्रिया पूरी होने के बाद बच्चा लौटा दिया जाएगा. जब बच्चा वापस नहीं मिला तो दंपति ने इसकी शिकायत चाइल्ड वेलफेयर कमेटी से कर दी.

गौरतलब है कि मदर टेरेसा को 1980 में भारत रत्न दिया गया था. मदर टेरेसा को पिछले साल ही वेटिकन से संत की उपाधि मिली है.

हिन्दू राष्ट्र पर शिवसेना का भाजपा पर वार

नई दिल्ली। भारतीय जनता पार्टी के नेताओं द्वारा बार-बार हिन्दू राष्ट्र के समर्थन में बयान देने पर शिवसेना ने भाजपा को घेरा है. शिवसेना ने अपने मुखपत्र सामना में हिन्दू राष्ट्र के मुद्दे पर कहा कि भारत को हिंदू राष्ट्र घोषित करने के लिए 2019 तक रुकने की जरूरत नहीं है. ऐसी घोषणा पीएम मोदी अब भी कर सकते हैं और यह घोषणा वे तत्काल करें, ऐसा हमारा आग्रह है.

संपादकीय में शिवसेना ने बीजेपी विधायक सुरेंद्र नारायण सिंह के उस बयान पर अमित शाह से मांफी की मांग की है, जिसमें विधायक ने कहा था कि प्रभु श्री राम भी बलात्कार को नहीं रोक सकते. शिवसेना ने कहा है कि यह समस्त हिंदुओं का अपमान है. इसके लिए अमित शाह माफी मांगेंगे क्या? भाजपा पर कटाक्ष करते हुए संपादकीय में लिखा गया है कि अयोध्या में राम का मंदिर नहीं बन पाता, लेकिन लोगों की भावनाओं को छेड़ने के लिए रेलवे रामायण एक्सप्रेस चलाने का काम करती है. 2019 तक ये गैस के गुब्बारे हवा में छोड़े जाएंगे और 2019 में फिर से नई घोषणाएं होंगी. इसे राम राज्य नहीं कहा जा सकता. थरूर के बयान पर संपादकीय में कहा गया है कि थरूर भाजपा की ही भाषा बोलते हैं और संघ को प्रणव बाबू की तरह ही शशि थरूर को भी संघ को प्रवचन देने बुलाना चाहिए.