बसपा छोड़ शिवपाल यादव के साथ आए मलिक कमाल

डुमरियागंज (सिद्धार्थनगर)। समाजवादी पार्टी के संस्थापक सदस्यों में शामिल रहे डुमरियागंज के पूर्व विधायक मलिक कमाल यूसुफ बसपा छोड़ शिवपाल यादव के साथ हो गए हैं. मंत्री रह चुके यूसुफ सपा में रहते हुए शिवपाल यादव के काफी करीब थे. पिछले विधानसभा चुनाव से पूर्व पार्टी में विवाद छिड़ने पर उन्होंने बसपा का दामन थाम लिया. अब वह पुरानी दोस्ती को तरजीह देते हुए शिवपाल के नवगठित समाजवादी सेक्युलर मोर्चा में शामिल हो गए हैं.

कमाल ने फेसबुक पर शिवपाल यादव के साथ अपनी तस्वीर शेयर की है. इस संबंध में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि वह शिवपाल के साथ हैं. कमाल सपा मुखिया अखिलेश यादव पर हमलावर दिखे. कहा कि अखिलेश की राजनीति समाजवादी पार्टी पर टिकी है, जबकि इस पार्टी को बनाने में शिवपाल ने कड़ी मेहनत की थी. उन्होंने कहा कि सपा में आज पुराने नेताओं को महत्व नहीं दिया जा रहा है. इसी वजह से वह सपा छोड़कर बसपा में शामिल हो गए थे. अब वह एक बार फिर अपने पुराने साथी शिवपाल के साथ आ गए हैं. पूर्व विधायक ने कहा कि वह जल्द ही डुमरियागंज आकर कार्यकर्ताओं व समर्थकों के साथ बैठक करेंगे और आगे की रणनीति बनाएंगे. शिवपाल की पार्टी में शामिल होने के मौके पर कमाल के साथ उनके बड़े बेटे इरफान मलिक भी थे.

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रिटायर्ड कर्नल-एडीएम विवाद ने लिया राजनीतिक रंग, सीएम योगी और मायावती आमने-सामने

नई दिल्ली। नोएडा में चर्चित एडीएम और रिटायर्ड कर्नल का विवाद ने अब राजनीतिक का रुप ले लिया है. एक पक्ष के साथ उत्तर प्रदेश सरकार खड़ी है तो दूसरे पक्ष ने पूर्व यूपी सीएम मायावती से मदद मांगी है. बता दें कि सीएम योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर रिटायर्ड कर्नल वीरेंद्र प्रताप सिंह चौहान से मारपीट के मामले में मुजफ्फरनगर के एडीएम हरिशचंद्र को निलंबित कर दिया है. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार एडीएम हरिश्चंद्र की पत्नी उषा ने मायावती से दिल्ली में मुलाकात की है. बताया जा रहा है कि इसके बाद मायवाती के कहने पर नेता लालजी वर्मा ने सीएम योगी से भेंट मुलाकत की है. उन्होंने आरोप लगाया है कि सिर्फ दलित होने के कारण एडीएम को परेशान किया जा रहा है.

ये है पूरा मामला दरअसल, 14 अगस्त की सुबह सोसायटी में एक एडीएम की पत्नी ने वीरेंद्र पर छेड़छाड़ का आरोप लगाते हुए मामला दर्ज कराया था. सेक्टर-20 पुलिस ने आनन-फानन में रिपोर्ट दर्ज करते हुए कर्नल को कोर्ट भेज दिया था. कोर्ट ले जाते समय पुलिस ने कर्नल को चोरी के आरोपी के साथ हथकड़ी लगाकर भेजा था. अमर उजाला ने इस खबर को प्रमुखता से प्रकाशित किया था. घटना के बाद पुलिस को अपनी गलती का पता चला तो एसएसपी ने सीओ अनित कुमार का तबादला करते हुए दादरी सर्किल में तैनात कर दिया था और इंस्पेक्टर को थाना सेक्टर-20 से हटाकर थाना सूरजपुर भेज दिया था.

पूर्व सैनिकों ने बीते शाम इस मामले को लेकर कैंडल मार्च भी निकाल निकला. जिसके बाद पुलिस ने एडीएम के राहुल नागर (गनर) और जीतेन्द्र अवस्थी (नौकर) को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया हैं. बाकी आरोपियों को गिरफ्तार करने के लिए पुलिस की टीमें बनाकर गिरफ्तारी के प्रयास किए जा रहे हैं. वहीं मामला उल्टा पड़ता देख एडीएम पत्नी और परिवार सहित फरार हो गए. मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक मुजफ्फरनगर के एडीएम छुट्टी पर हैं. वहीं पूर्व सैनिक ने डीएम से मिलकर शिकायत की और सीसीटीवी फुटेज भी सौंपा जिसमें एडीएम ही कर्नल से मारपीट कर रहा था. कोर्ट में सीसीटीवी पेश होने के बाद रिटायर्ड कर्नल को जमानत मिल गई.

मामले की जानकारी होने पर सीएम योगी ने दोनों पक्षों को निष्पक्ष जांच का आश्वासन दिया है. मामले में रिटायर्ड कर्नल के पक्ष में लोगों ने एडीएम की गिरफ्तारी, सीओ अनित व एसएचओ मनीष सक्सेना की बर्खास्तगी, मामले की न्यायिक जांच और एडीएम की आय से अधिक संपत्ति की जांच की मांग की है.

तो वहीं दूसरे पक्ष ने एडीएम की पत्नी का रोते हुए एक वीडियो जारी किया. इसमें उसने आरोप लगाया है कि उसे दलित होने की वजह से परेशान किया जा रहा है. एडीएम पक्ष के लोग उनपर लगे हत्या के प्रयास, मारपीट आदि के आरोपों को हटाने की मांग कर रहें हैं. बता दें कि कर्नल अब जेल से बाहर आ गए हैं. जेल से निकलते ही उनके मित्रों व अन्य अधिकारियों ने जबरदस्त स्वागत किया.

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‘मोदीकेयर’ में केजरीवाल का अड़ंगा, PM नहीं मुख्यमंत्री के नाम से हो योजना!

नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ड्रीम प्रोजेक्ट में से एक आयुष्मान भारत 25 सितंबर को देशभर में लॉन्च होगी. इस योजना के तहत करीब देश के 10 करोड़ परिवारों को लाभ मिलेगा. लेकिन इस योजना के जमीन पर उतरने से पहले ही विवाद होता नज़र आ रहा है. और ये विवाद कहीं ओर नहीं बल्कि देश की राजधानी दिल्ली में ही है.

राजधानी दिल्ली में योजना के तहत करीब 20 लाख से अधिक लोगों को लाभ मिलेगा. योजना का पूरा नाम ‘आयुष्मान भारत- प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना’ है, लेकिन दिल्ली की आम आदमी पार्टी सरकार की मांग है कि इस योजना का नाम प्रधानमंत्री नहीं बल्कि मुख्यमंत्री के नाम पर रखा जाए.

अंग्रेजी अखबार मेल टुडे की खबर के अनुसार, दिल्ली सरकार की मांग है कि योजना का नाम ‘मुख्यमंत्री आम आदमी स्वास्थ्य बीमा योजना-आयुष्मान भारत’ रखा जाए. हालांकि, अभी केंद्र की ओर से इस मुद्दे पर यही कहा जा रहा है कि पहले योजना की शुरुआत करने पर ध्यान दिया जाए, बाकी चीज़ों को बाद में देख लिया जाएगा.

हालांकि, दोनों सरकार में विवाद के बस ये ही एक जड़ नहीं है. दिल्ली सरकार की मांग है कि इस योजना में 50 लाख लोगों का नाम और जोड़ा जाए. जबकि केंद्र का तर्क है कि इस योजना का संचालन 2011 की जनगणना के अनुसार हो रहा है, जिसके तहत राजधानी में 20 लाख लोगों का ही नाम आता है.

बता दें कि आयुष्मान भारत को दुनिया की सबसे बड़ी हेल्थ प्लान स्कीम बताया जा रहा है. जिसके तहत करीब 50 करोड़ लोगों को सीधा फायदा पहुंचेगा. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त को लालकिले से इसका ऐलान किया था, 25 सितंबर से ये स्कीम धरातल पर लागू होगी.

इस स्कीम के तहत हर परिवार को सालाना तौर पर 5 लाख रुपए तक का कवर मिलेगा. यानी 1 रुपए से लेकर 5 लाख रुपए तक के इलाज गरीब परिवारों के लिए मुफ्त में किए जाएंगे. बताया जा रहा है कि अभी ये इस योजना का पहला चरण ही है.

मोदीकेयर के नाम से पॉपुलर इस स्कीम का ये विरोध बीजेपी के नेताओं को रास नहीं आया है. दिल्ली बीजेपी के प्रवक्ता नागेंद्र शर्मा ने मेल टुडे को बताया कि इस प्रकार की मांग के कारण किसी भी गरीब को दिक्कत नहीं होगी, हम चाहते हैं कि ये स्कीम लागू हो. वहीं, दिल्ली विधानसभा में विपक्ष के नेता विजेंद्र गुप्ता ने भी केजरीवाल सरकार की इस मांग का जमकर विरोध किया है.

इस मामले में Delhi’s Director-General of Health Services (DGHS) के डॉ. कीर्ति भूषण का कहना है कि दिल्ली सरकार ने इस स्कीम में कुछ चीजें जोड़ने का प्रस्ताव रखा है, जिसमें लोगों की संख्या बढ़ाना भी शामिल है.

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दलित प्रेरणा स्थल की पार्किंग का ओखला बर्ड सेंचुरी के लिए इस्तेमाल करने की तैयारी

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नई दिल्ली। सेक्टर-95 स्थित ओखला बर्ड सेंचुरी में जाने वालों के लिए सबसे बड़ी समस्या पार्किंग की है. जल्द ही इसका समाधान निकालने की तैयारी है. सूत्रों के अनुसार दलित प्रेरणा स्थल की पार्किंग को ओखला बर्ड सेंचुरी में आने वाले लोगों के लिए इस्तेमाल करने की तैयारी है. अथॉरिटी ऐसी प्लानिंग कर रही है ताकि दलित प्रेरणा स्थल की पार्किंग में वाहन खड़े करने के बाद टहलते हुए लोग ओखला बर्ड सेंचुरी जा सके.

दरअसल ओखला बर्ड सेंचुरी में जाने वालों के लिए सबसे बड़ी समस्या वाहन पार्क करने की है. अगर सेक्टर-14ए के सामने स्थित शनिमंदिर वाले गेट के लोग ओखला बर्ड सेंचुरी जाएं तब भी बाहर वाहन खड़े करने के लिए कोई जगह नहीं है. इसी तरह एक्सप्रेस वे के रास्ते से जाते हुए भी सड़क पर वाहन खड़े करने पड़ते हैं जहां दो-चार वाहन ही खड़े हो पाते हैं. पार्किंग की समस्या की वजह से लोग चाहते हुए ओखला बर्ड सेंचुरी नहीं जा पाते हैं. इसी समस्या को देखते हुए अथॉरिटी ऐसा प्लान कर रही है कि दलित प्रेरणा स्थल की पार्किंग के को इस्तेमाल किया जाए जो कि अभी खाली पड़ी हुई है और वहां से सीधी कनेक्टीविटी के लिए ओखला बर्ड सेंचुरी जाने वालों को एक पैदल का रास्ता बना दिया जाए.

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52 गांवों की दलित महापंचायत आज, पुलिस-प्रशासन अलर्ट

नई दिल्ली। उल्देपुर प्रकरण को लेकर दलित संघर्ष मोर्चा के बैनर तले कमिश्नरी पार्क में 52 गांवों की महापंचायत आज होगी. महापंचायत को भीम आर्मी ने अपना समर्थन दे दिया है. आयोजकों का दावा है कि कई जिलों के दो हजार से ज्यादा लोग जुटेंगे. इसे लेकर पुलिस-प्रशासन अलर्ट हो गया है. खुफिया विभाग ने रिपोर्ट बनाकर लखनऊ भेज दी है.

दलित संघर्ष मोर्चा से जुड़े डॉक्टर सुशील गौतम ने बताया कि करीब 19 सामाजिक, छात्र और दलित संगठनों ने इस मोर्चा को समर्थन दिया है. महापंचायत कमिश्नरी पार्क में गुरुवार सुबह 10 बजे शुरू हो जाएगी. पंजाब से टाइगर फोर्ट संगठन के पदाधिकारी भी आएंगे. भीम आर्मी के राष्ट्रीय प्रवक्ता मंजीत नौटियाल के मौखिक समर्थन के बाद मेरठ से भीम आर्मी के कुछ कार्यकर्ता भी इस महापंचायत में आएंगे. इसके अलावा बुलंदशहर, हापुड़, मेरठ, गाजियाबाद, मुजफ्फरनगर, बागपत सहित हरिद्वार से भी समाज से जुड़े लोग पहुंचेंगे.

यह था उल्देपुर प्रकरण

गंगानगर क्षेत्र के उल्देपुर गांव में नौ अगस्त को दो पक्षों में खूनी संघर्ष हो गया था. इसमें रोहित जाटव की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई थी. नौ में से तीन आरोपी जेल जा चुके हैं. पुलिस ने रोहित पक्ष पर भी क्रॉस मुकदमा दर्ज कर लिया था. इसे लेकर दलित आंदोलन कर रहे हैं. 20 अगस्त की महापंचायत में पुलिस अफसरों ने क्रॉस केस समाप्त करने सहित कई मांगों को पूरा करने का भरोसा दिया था, लेकिन कुछ नहीं हुआ.

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चारा घोटाला: लालू प्रसाद यादव ने कोर्ट में किया सरेंडर…

रांची। चारा घोटाले से जुड़े मामले में सजा काट रहे राजद प्रमुख और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने गुरुवार को रांची की सीबीआई कोर्ट में सरेंडर किया. चारा घोटाला मामले में सजायाफ्ता बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने सीबीआई के विशेष न्यायाधीश एसएस प्रसाद की अदालत में सरेंडर कर दिया है. लालू प्रसाद के अधिवक्ता प्रभात कुमार के अनुसार लालू प्रसाद को कोर्ट से सीधा जेल भेजा जाएगा. इसके बाद जेल प्रशासन उन्हें रिम्स भेज देगी. लालू को हाई कोर्ट ने जमानत का आदेश दिया था. उसमें यह शर्त है कि उनका इलाज रिम्स में चलेगा. ऐसे में संभावना जताई जा रही की जेल भेजने के बाद सीधे रिम्स भेजे जाएंगे.

कोर्ट परिसर में सुरक्षा की कड़ी व्यवस्था की गई है. राजद समर्थक राजद समर्थक और पुलिसकर्मियों की भीड़ लगी हुई है. लालू प्रसाद की अदालत सीबीआई भवन के पहले मंजिल पर है जहां जाने से पुलिसकर्मियों ने रोक लगा रखी है. नीचे के गेट को बंद कर दिया गया है ताकि ऊपरी मंजिल पर कोई नहीं जा सके. कोर्ट परिसर में सिटी डीएसपी प्राण रंजन कोतवाली डीएसपी कुमार अजीत, कोतवाली इंस्पेक्टर श्यामानंद मंडल सहित कई अधिकारी और पुलिसकर्मी मौजूद हैं.

बता दें कि लालू 10 मई को अपने बेटे तेजप्रताप यादव की शादी के लिए बाहर आए थे, जिसके बाद अब करीब 110 दिन बाद वह जेल लौटेंगे. लालू यादव, पिछले कई दिनों से जमानत पर थे, वह मुंबई में अपना इलाज करा रहे थे. लालू के सरेंडर करने से पहले गुरुवार को झारखंड विकास मोर्चा चीफ बाबूलाल मरांडी ने रांची में उनसे मुलाकात की. लालू से मुलाकात करने के बाद बाबूलाल मरांडी ने कहा कि राजनीति के कारण बीजेपी लालू यादव पर शिकंजा कस रही है.

बीते 27 अगस्त को लालू की जमानत की मियाद पूरी हो रही थी. इससे पहले लालू ने अदालत से औपबंधिक जमानत की अवधि तीन महीने और बढ़ाने की अपील की थी जिसे अदालत ने अस्वीकार करते हुए उन्हें 30 अगस्त तक सीबीआई अदालत में आत्मसमर्पण करने का आदेश दिया था.

पटना से रवाना होने से पहले आरजेडी सुप्रीमो लालू यादव ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर हमला बोलते हुए आरोप लगाया कि देश तानाशाह शासन की ओर बढ़ रहा है. पटना एयरपोर्ट पर बातचीत में लालू ने बिहार में कानून व्यवस्था ठीक नहीं होने का आरोप लगाते हुए कहा कि यहां पूरी तरह से अराजकता का माहौल है.

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एशियन गेम्स: 20 साल बाद फाइनल में पहुंची महिला हॉकी टीम, अब नजरें गोल्ड पर …

नई दिल्ली। गुरजीत कौर ने आखिरी क्वार्टर में 52वें मिनट में पेनाल्टी कॉर्नर को गोल में तब्दील कर भारतीय महिला हॉकी टीम को 20 साल बाद एशियाई खेलों के फाइनल में पहुंचा दिया. भारत ने गुरजीत के एकमात्र गोल के दम पर सेमीफाइनल में चीन को 1-0 से हराते हुए फाइनल का टिकट कटाया. भारतीय महिला हॉकी टीम ने इससे पहले 1998 में बैंकॉक में हुए एशियाई खेलों के फाइनल में जगह बनाई थी. फाइनल में भारत का सामना शुक्रवार को जापान से होगा. इसी दिन कांस्य पदक के लिए चीन का मुकाबला दक्षिण कोरिया से होगा.

गुरजीत के गोल से पहले भारतीय टीम ने गोल करने के कई मौके गंवाए. टीम को कुल सात पेनाल्टी कॉर्नर मिले जिसमें से वो एक को ही गोल में तब्दील कर पाई. अगर भारतीय महिलाएं मौकों में से आधे को भी भुना लेतीं तो ज्यादा अंतर से मैच अपने नाम करतीं. पूरे मैच में भारतीय टीम ही हावी रही लेकिन उसकी फिनिशिंग कमजोर होने के कारण कई मौकों पर चीन को हावी होने के अवसर मिले। भारतीय डिफेंस ने हालांकि चीन के हमलों का माकूल जवाब दिया.

भारतीय महिलाओं ने शुरुआत अच्छी की थी। टीम ने पहले क्वार्टर में धैर्य से खेला और सटीक पासिंग के जरिए चीनी खिलाड़ियों को गेंद पर ज्यादा पकड़ नहीं बनाने दी. आठवें मिनट में भारत को लगातार दो पेनाल्टी कॉर्नर मिले लेकिन दोनों पर गोल नहीं हो सका. भारतीय महिलाएं लगातार चीन के घेरे में जगह बना रही थीं। इसी प्रयास में 13वें मिनट में भारत ने गोल करने का शानदार मौका बनाया लेकिन फॉरवर्ड लाइन इस प्रयास को गोल में बदलने में नाकाम रही.

भारत को 51वें मिनट में लगातार तीन पेनाल्टी कॉर्नर मिले जिसमें आखिरी प्रयास में 52वें मिनट में गुरजीत ने गोल कर भारत का खाता खोला और फाइनल में जाने का रास्ता तय किया.

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गिरफ्तार बुद्धिजीवियों के समर्थन में आईं मायावती

File Photo

नईे दिल्ली।  कोरेगांव से जुड़े मामले में बुद्धिजीवियों की गिरफ्तारी के खिलाफ बसपा प्रमुख सुश्री मायावती ने मोर्चा खोल दिया है. नक्सल समर्थकों के नाम पर देश के कई राज्यों में पुणे पुलिस द्वारा की गई छापेमारी और फिर उस क्रम में कवि, महिला वकील, प्रोफेसर आदि बुद्धिजीवियों की गिरफ्तारी पर बसपा अध्यक्ष ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है. इस कार्रवाई को भाजपा द्वारा भय फैलाने और सत्ता का दुरुपयोग ठहराते हुए बसपा प्रमुख ने कहा है कि-

दलितों के आत्म-सम्मान व स्वाभिमान से जुड़े भीमा-कोरेगाँव के 200 वर्ष पूरे होने के मौके पर दलितों की ज़बर्दस्त एकजुटता भाजपा को रास नहीं आई. कोरेगांव हिंसा की आड़ में देश में दलितों, आदिवासियों व पिछड़ों पर हो रहे शोषण और अत्याचार के खिलाफ लगातार संघर्ष करने वाले बुद्धिजीवियों व सामाजिक कार्यकत्ताओं को परेशान किया जा रहा है. जिस प्रकार एन.जी.ओ. चलाने वालों पर सरकारी आतंक व भय फैलाने के लिये देश भर में जो गिरफ्तारयाँ की गई हैं वे बीजेपी सरकार की निरंकुशता व सत्ता के दुरूपयोग की प्रकाष्ठा है, जिसकी जितनी भी निन्दा की जाये वह कम है.

भाजपा को कठघरे में खड़ा करते हुए यूपी की पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा है कि वास्तव में इस प्रकार की सरकारी आतंक की घटनाओं के माध्यम से बीजेपी की सरकारें अपनी घोर विफलताओं पर से लोगों का ध्यान बांटना चाहती है. लेकिन गिरफ्तारी से लोगों का रोष बढ़ा ही है.

बसपा प्रमुख ने कहा कि इतना ही नहीं बल्कि भीमा-कोरेगाँव में हिंसा के सम्बन्ध में जिन लोगों के खिलाफ पुलिस में एफ.आई.आर. दर्ज है, उन्हें गिरफ्तार करके न्याय की व्यवस्था को बहाल करने के बजाय इसकी आड़ में उन विख्यात लोगों को टारगेट किया जा रहा है जो दलितों, आदिवासियों व पिछड़ों आदि के हित के लिये हर प्रकार का संघर्ष करते रहे हैं और जिनका सार्वजनिक जीवन वास्तव में एक खुली किताब की तरह से लोगों के सामने है.

सुश्री मायावती ने महिला सामाजिक कार्यकर्ताओं व अन्य बुद्धिजीवियों पर भाजपा सरकार द्वारा ’नफरत फैलाने’ के आरोप को भी बेतुका कहा और सरकार के उस तर्क पर भी सवाल खड़े किए जिसमें ’’पी.एम. मोदी की हत्या की साज़िश रचने के आरोप में गिरफ्तारी की बात कही जा रही है. उन्होंने कहा कि यह गिरफ्तारियां गुजरात में बीजेपी सरकार के उस दौर की याद दिलाता है जब मुख्यमंत्री की हत्या की साजिश को विफल करने की आड़ में लगातार फर्जी पुलिस इंकाउण्टर हुआ करते थे.

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बहुजनों द्वारा अपने धर्म और संस्कृति की घोषणा : एक वास्तविक क्रान्ति

भारत के दलितों-बहुजनों के खिलाफ जो अन्याय अत्याचार हुआ है, जो हो रहा है और जो आगे भी कुछ समय तक जारी रहेगा उसके लिए जो लोग जिम्मेदार हैं उनमे बहुत हद तक बहुजनों के हितैषी भी जिम्मेदार हैं. यह एक विचित्र और कठोर वक्तव्य है. लेकिन अनुभव बतलाता है कि यह सच बात है. आइये इसे समझने की कोशिश करें.

बहुजनों के हितैषियों के नाम पर हम जिन लोगों को पाते हैं वे दलितों-बहुजनों को सिर्फ एक विक्टिम की तरह देखते आये हैं. विशेष रूप से अगर हम जनजातीय या ट्राइबल मित्रों की बात करें तो उन्हें तो बिलकुल ही विक्टिम की तरह देखा जाता है. अधिकाँश दलित, शूद्र (ओबीसी) और शेड्यूल्ड ट्राइब्स (आदिवासी) को ही नहीं बल्कि महिलाओं को भी विक्टिम की तरह देखा जाता है.

नारीवाद ने आजकल स्त्री की गरिमा और स्वतन्त्रता का जो झंडा बुलंद किया है उसमे एक गहरी प्रतीति रही है जिसे हमने अब तक दलित-बहुजन आन्दोलन के सन्दर्भ में न सिर्फ नजरअंदाज किया है बल्कि कई बार प्रयासपूर्वक अदृश्य बनाये रखा है. नारीवादी आंदोलनों ने शेष विश्व और भारत में भी नारी के विक्टिम होने की बात को अपनी सैद्धांतिकी में काफी लंबे समय तक बनाये रखा, इससे सहानुभूति और संवेदना का निर्माण हुआ. लेकिन कुछ दशकों के बाद इस “विक्टिम के विलाप” से नारीवाद ने अपने को आजाद करने का प्रयास किया और वह अभी तक जारी है.

स्त्री की अपनी अस्मिता, उसका अपना व्यक्तित्व और उसके अपने सपनों को मान्यता देते हुए नारीवादी आन्दोलन जिस तरह से बढ़ा उसने स्त्री को विक्टिम की तरह नहीं बल्कि अपनी पहचान को रचने वाली समर्थ और स्वतंत्र इकाई के रूप में खड़ा किया. इसका परिणाम अब दुनिया भर में नजर आता है.

इसके उलट दलित-बहुजन आंदोलनों में दलितों बहुजनों के अपने नेतृत्व और हितैषी (गैर-बहुजन) नेतृत्व ने अभी तक क्या किया है? अनुभव यह बताता है कि ऐसे अधिकांश नेताओं चिंतकों साहित्यकारों ने दलित-बहुजन समाज को विक्टिम होने के विलाप से अभी तक आजाद नहीं होने दिया है. साहित्य ने जिस तरह का पीड़ा और भेदभाव का चित्रण दिया है, कहानियों उपन्यासों और कविताओं ने शोषण और दमन का जो रेखाचित्र उभारा है उसमे विलाप और यह क्रंदन इतना मुखर होकर उभरता रहा है कि दलित-बहुजन साहित्य का मतलब ही विलाप का साहित्य हो गया है.

यह विलाप–साहित्य मूल रूप से गैर दलित-बहुजन साहित्यकारों की कलम से निकला और चूँकि वे अपनी अधिकतम ताकत लगाकर “हितैषी या सहानुभूतिपूर्ण मित्र” ही हो सकते थे – पीड़ा के या समाधान के प्रयासों के सहभागी नहीं – इसलिए उन्होंने दलितों-ओबीसी-आदिवासियों का विलाप बहुत नए नए ढंग से उजागर करना शुरू किया. यही ट्रेंड स्वयं दलित बहुजन साहित्यकारों में भी आ गया और अभी भी जारी है. इस तरह भीतर और बाहर दोनों तरफ से साहित्यकार और विचारक मित्र दलित-बहुजनों को विक्टिम बनाकर उनके विलाप का लेखा जोखा बनाये जा रहे हैं.

बहुत हद तक यह एक सुरक्षित चुनाव भी है. इस सुरक्षा की जरूरत किसे पहले थी? यह जानना बहुत जरुरी है. सबसे पहले इस सुरक्षा की जरूरत गैर-बहुजन लेखकों को ही थी. सवर्ण समाज से आने वाले साहित्यकारों को अपने स्वयं के घर और समाज में जिस विरोध का सामना करना होता था उस विरोध ने बहुत हद तक विलाप चित्रण को एक सुरक्षित स्ट्रेटेजी बनाये रखा. दलित-बहुजन शोषण का चित्रण करते जाना और उससे निकलने के उपायों का कोई अनुमान न देना या ऐसी किसी मुक्ति की संभावना का कोई उल्लेख न करना – यह साहित्य का सामान्य क्रम बन गया. हालाँकि स्वय दलित-बहुजन समाज के अपने कई पुरोधाओं ने क्रांतिकारी प्रस्तावनाएँ दी हैं और पीड़ा के चित्रण से आगे जाकर समाधान की यांत्रिकी भी दी है. लेकिन उसे बहुत आसानी से सवर्ण और बहुजन साहित्यकारों ने भुलाए रखा.

कबीर और ज्योतिबा फुले यहाँ उल्लेखनीय हैं. वे दोनों बहुत हद तक एक सीधी भाषा में तोड़फोड़ और बदलाव की बात करते हैं. ज्योतिबा के स्वर में तो नवनिर्माण का मार्ग भी मिलता है जिसे बहुत अर्थों में डॉ. अंबेडकर विकसित करते और अमल में लाते हैं. लेकिन हमारा साहित्य कबीर और फूले के साथ जो दुर्व्यवहार करता है वह बड़ा मजेदार है. कबीर को सगुण-निर्गुण की बहस और भक्ति-अध्यात्म इत्यादि से बाहर नहीं निकलने दिया जाता. वहीं फूले का जितना भी उल्लेख होता है उसमे वे शिक्षा के प्रयासों तक समेट दिए जाते हैं. कबीर और फूले दोनों में एक पुराने शोषक धर्म के खंडन और नयी संभावनाओं के रोडमेप का जो इशारा मिलता है उस इशारे की बात नहीं की जाती है.

सवर्ण तबके के लिए यह इशारा छुपाया जाना जरूरी है. फूले कबीर की ही तरह अन्य क्रांतिकारी हैं जो न सिर्फ खंडन कर रहे हैं बल्कि नवनिर्माण का पूरा फ्रेमवर्क दे रहे हैं, वे दलितों- बहुजनों को विक्टिम नहीं बल्कि चेंजमेकर की तरह खड़ा कर रहे हैं. लेकिन दुर्भाग्य से अधिकांश गैर-बहुजन और बहुजन साहित्यकार भी जो विलाप के चित्रण को संभावित समाधान के अनुमान से अधिक महत्वपूर्ण मानते हैं – उन्होंने अभी भी यह दलितों- बहुजनों को विक्टिम होने से अधिक और किसी चीज के लायक नहीं समझा है.

जैसे नारीवाद के वैश्विक आन्दोलन ने स्त्री को विक्टिम से आगे ले जाकर स्वयं निर्मात्री होने का मार्ग दिया उसी तरह क्या दलित-बहुजनों को भी विक्टिम-हुड की सदी गली लेकिन सुरक्षित राजनीती से निकाला जा सकता है? यह कितना आसान या कठिन है यह कहना मुश्किल है लेकिन इतना जरुर कहना होगा कि अब यह आवश्यक है. लेकिन दलितों-बहुजनों को विक्टिम बनाये रखने में किसे लाभ होता है? और दलितों-बहुजनों को अपनी संस्कृति धर्म और इतिहास सहित भविष्य का निर्माता बनने से कौन और क्यों रोकना चाहते हैं? ये एक भयानक प्रश्न है जो अब सभी दलितों, शूद्रों आदिवासियों को बार बार पूछना चाहिए.

जब तक दलित, शूद्र और आदिवासी अपनी पीड़ा और विलाप के गीत गाते हैं तब तक सभी इनसे सहानुभूति रखते हैं लेकिन जैसे ही ये अपने इतिहास और संस्कृति की घोषणा करने निकलते हैं तो तकलीफ शुरू हो जाती है. यह असल में एक छुपे हुए षड्यंत्र के उजागर होने का संकेत है. अधिकांश विचारकों और साहित्यकारों में यह प्रवृत्ति है कि वे इस देश के तथाकथित मुख्यधारा के या अल्पसंख्यकों की संस्कृति और धर्मों को संरक्षित करने प्रचारित करने के अधिकार को समर्थन देते हैं. साथ ही वे यह भी बताते जाते हैं कि भाषा संस्कृति, सांस्कृतिक चिन्ह, रीती रिवाज और जीवन व्यवहार को बचाए-बनाये रखना क्यों जरुरी है.

लेकिन जब बात आती है दलितों-बहुजनों की अपनी संस्कृति और धर्म को उजागर करने और प्रचारित करने की तो अधिकाँश साहित्यकार विचारक मित्र असहज होने लगते हैं. तब बहुत अधिकांश मौकों पर वे यह भूल जाते हैं कि संस्कृति और धर्म जिस तरह तथाकथित मुख्यधारा के और अल्पसंख्यकों के लिए जरुरी हैं उसी तरह ये बहुजन बहुसंख्यकों के लिए भी आवश्यक हैं.

यह एक भयानक विरोधाभास है जिसे उजागर करके चुनौती दी जानी चाहिए. कोई भी समाज सिर्फ विलाप करके सहानुभूति इकट्ठी करके बाहरी समर्थन से अपनी आजादी नहीं हासिल कर सकता. जो समाज स्वयं समर्थ, आजाद और आत्मनिर्भर होना चाहता है उसे अपनी संस्कृति और धर्म को मजबूत बनाकर ही ऐसा करना होता है.

संस्कृति और धर्म के मुद्दे पर भारत के अधिकांश साहित्यिक मित्र एक नकारात्मक मुद्रा में आ जाते हैं और नास्तिकता को एकमात्र शुभ की तरह प्रचारित करते हुए संस्कृति और धर्म की विराट शक्ति को शोषक सवर्ण तबके को सौंप देते हैं. वह शोषक वर्ग नास्तिकता के प्रचार से बिलकुल भी चिंतित नहीं होता. इसे बोलीवुड फिल्मों में भी देखा जा सकता है. जो फिल्मे मजदूर मालिक संघर्ष पर बनी हैं वे बड़ी आसानी से चलती हैं किसी को कोई दिक्कत नहीं होती. लेकिन जो फ़िल्में जातीय हिंसा और दमन पर बनती हैं उन्हें दबाया जाता है. इससे साफ़ होता है कि सवर्ण शोषक वर्ग को क्या पसंद है और क्या नहीं.

अगर दलित-बहुजन तबका विलाप में ही उलझा रहेगा तो वह पर-निर्भर ही रहेगा. जो भी तबका अपनी संस्कृति और अपने धर्म की घोषणा नहीं कर पाता वह कमजोर और शोषित होगा. साहित्यिक मित्रों के लिए यह बात अधिक आकर्षक नहीं होगी क्योंकि साहित्य को यथास्थिति के चित्रण का टूल माना जाता है. साहित्य से समाधान देने की अपेक्षा नहीं की जा सकती, या ठीक से कहें तो सवर्ण साहित्य से समाधान की उम्मीद नहीं की जा सकती. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि बहुजन खेमे से आने वाले साहित्यकार भी समाधान के अनुमान से स्वयं भी उदासीन हो जाएँ.

भारतीय दलित-बहुजन साहित्यिक मित्रों को समाजशास्त्र और मानवशास्त्र का थोड़ा अध्ययन करना चाहिए. साहित्यिक उड़ान में बहुत सी कल्पनाएँ करने की जो सुविधा उन्हें मिलती है वह उन्हें अक्सर एक परीलोक में ले जाती है जहां विश्व के अन्य देशों में हुई क्रांतियों की जय-जयकार गूंज रही है. इस परीलोक से गुजरते हुए वे जिस संघर्ष की सफलता की धुन सुनते हैं वह उन्हें सिखाती है कि किस तरह गरीब और अमीर तबके के बीच युद्ध हुआ और गरीबों ने अमीरों की दासता से आजादी पा ली.

भारत में लौटकर ये मित्र अधिकांश मौकों पर इसी धुन को बजाना जारी रखते हैं. ये मित्र यह भूल जाते हैं कि गरीबी अमीरी का संघर्ष जो कि गरीब और अमीर दोनों के एक ही धर्म और एक ही संस्कृति के वारिस होने की प्रष्ठभूमि में हुआ था उस संघर्ष को भारत में अनेक धर्मों सम्प्रदायों और संस्कृतियों के बड़े घमासान में सीधे सीधे लागू करना मुश्किल है. पश्चिम में बहुत हद तक अमीर गरीब एक ही धर्म और सम्प्रदाय के थे, उनकी साझा संस्कृति और देवालय थे जहां वे एक से नैतिक आग्रहों और प्रस्तावनाओं से संचालित होते थे. इसीलिये वहां क्रांति या सुधार की प्रस्तावनाएँ एक ही समय में समाज के अनेकों स्तरों पर एकसाथ फ़ैल सकीं. वहां भारत की तरह सामाजिक स्तरों के एयर-टाईट कम्पार्टमेंट नहीं थे. इसीलिये सांस्कृतिक अंतर और धार्मिक अंतर की बात किये बिना सीधे सीधे गरीब अमीर की बात उठानी आसान थी.

लेकिन हमारे मित्र यही फार्मूला भारत में भी आजमाना चाहते हैं. हालाँकि उसकी असफलता बहुत हद तक उजागर हो चुकी है लेकिन फिर भी उस फार्मूले का सम्मोहन कम नहीं होता. यह सम्मोहन पुनः उसी सुरक्षा के साथ जुडा हुआ है जिसका अनुष्ठान सवर्ण साहित्यकार स्वयं अपने घर परिवार और समाज में सुरक्षित होने के लिए करते आये हैं. वे विलाप का चित्रण बहुत गंभीरता से करेंगे लेकिन इस विलाप के खात्मे के लिए विदेशी इलाज बतायेंगे जो कि यहाँ संभव ही नहीं है.

इसी परिपाटी को कई दलित-बहुजन मित्र भी अपनाए हुए हैं. वे बहुत गहराई में अभी भी बहुजन-गैर बहुजन संघर्ष को अमीर-गरीब का संघर्ष मानकर चलते हैं. वे इसे भिन्न संस्कृतियों और धर्मों के संघर्ष की तरह नहीं देख पाते. उनकी मान्यता में यह बात भी शामिल है कि ये बहुजन और गैर-बहुजन दोनों एक ही संस्कृति और एक ही धर्म के अनिवार्य वारिस हैं. बस इन दोनों मान्यताओं के कारण ही वे स्वय दलित-बहुजन होते हुए भी फुले-अम्बेडकरी विचारधारा से दूर निकलकर स्वयं अपने समाज से मुंह मोड़ लेते हैं और समाधान की बजाय विलाप के चित्रण में ही लगे रहते हैं.

इसीलिये ऐसा विलाप प्रधान साहित्य अब आम जनता द्वारा पसंद नहीं किया जाता. दलितों-बहुजनों के जीवन में भी विलाप है और उन्हें साहित्य में भी वही परोसा जाता है. ये एक अन्य तरह का अन्याय है. इसी कारण दलित-बहुजन खेमे के बीच से फुले-अंबेडकरवादी क्रान्तिदृष्टि उभरने लगी है जो विलाप के चित्रण वाले साहित्य से नहीं बल्कि ठोस राजनीति, संविधानिक और समाजशास्त्रीय समझ से आकार ले रही है. बहुजन संस्कृति, बहुजनों के अपने धर्म. अपने स्वयं के कृषि और उर्वरता से जुड़े कर्मकांड, गीत नृत्य उत्सव, सांस्कृतिक प्रतीक और स्पिरिचुआलिटी भी अब पूरी ताकत के साथ उभर रही है. इस उभार के बारे में प्रति “गरीब अमीर” फ्रेमवर्क वाले साहित्यिक मित्र क्या सोचते हैं यह वे ही जानें लेकिन स्वयं बहुजन तबका अपनी संस्कृति और धर्मों को लेकर अब आगे बढ़ने लगा है.

दलितों ओबीसी में बौद्ध धर्म का आन्दोलन चल निकला है अन्य अनेक राज्यों में जनजातीय समाज के अपने धर्मों और संस्कृति के बारे में बड़े पैमाने पर आन्दोलन चल निकले हैं और वे सभी अपनी अलग संस्कृति और धर्म की घोषणा की तैयारी कर रहे हैं. अब तक भारत के एकीकरण के जो प्रयास हुए हैं वे कमजोरों और शोषितों के एकीकरण के प्रयास थे जिसमे सभी शोषित जन शोषकों की मर्जी से इकट्ठे होने को बाध्य थे. अब निकट भविष्य में जो एकीकरण होगा वह समर्थ समुदायों का स्वैच्छिक एकीकरण और संवाद होगा जिससे न सिर्फ वे समुदाय स्वयं सबल होंगे बल्कि भारत में एक वास्तविक लोकतंत्र निर्मित होगा.

मेरी नजर में यह एक बहुत बड़ी क्रान्ति है जिसकी जड़ें भारत की अपनी जमीन में है. यह क्रांति जरुर सफल होगी और इससे न सिर्फ भारत के शोषण सवर्ण वर्ग के शोषण का निर्णायक रूप से खात्मा होगा बल्कि यही वर्ग भविष्य में बहुजनों में अवशोषित होकर पहले से अधिक सभ्य भी बन सकेगा.

 संजय श्रमण

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यलगार परिषद को माओवादियों से जोड़ने पर दलित नेता नाराज

नई दिल्ली।  पीएम मोदी की हत्या की साजिश और यलगार परिषद से जुड़ाव को लेकर देश भर के कथित नक्सल समर्थकों के घरों व कार्यालयों पर छापे मारे जाने और कई कार्यकर्ताओं को हिरासत में लेने से दलित नेता नाराज हैं. दलित नेता इसे राजनीतिक साजिश और सनातन संस्था के दबाव में उठाया गया कदम बता रहे हैं.

दलित नेताओं का कहना है कि यलगार परिषद का माओवादियों से कोई नाता नहीं है. भरीप बहुजन महासंघ के अध्यक्ष प्रकाश अंबेडकर ने इंडियन एक्सप्रेस अखबार से बातचीत में कहा, ’31 दिसंबर, 2017 को यलगार परिषद का आयोजन पुणे में हुआ था. इसका उद्देश्य मराठों और पिछड़ों तथा मराठों और एससी/एसटी के बीच बढ़ती खाई को दूर करना था. आज इस संगठन का कोई अस्तित्व नहीं दिख रहा है. इसलिए यलगार परिषद की गतिविधियों को माओवादियों या भीमा कोरेगांव हिंसा से कैसे जोड़ा जा सकता है?’

उन्होंने संकेत दिया कि कोर्ट में सभी केस पर चुनौती दी जाएगी. दलित लेखक अर्जुन दांगले ने कहा, भीमा कोरेगांव को माओवादी हिंसा से जोड़ना खतरनाक है, इससे दलित समुदाय में गुस्सा और बढ़ सकता है.’

दलित नेताओें का यह भी कहना है कि कार्रवाई तो सनातन संस्था पर होनी चाहिए थी, लेकिन कार्रवाई दलितों के खिलाफ की जा रही है. उनका कहना है कि कोर्ट के आदेश और कर्नाटक से मिले सुराग की वजह से सनातन संस्था के खिलाफ कार्रवाई अपरिहार्य है.

दूसरी तरफ, दलित इंडियन चैम्बर ऑफ कॉमर्स ऐंड इंडस्ट्री (डिक्की) के अध्यक्ष मिलिंद काम्बले ने कहा, ‘कानून को अपना काम करने दीजिए, यदि किसी ने गलत नहीं किया है तो उसे डरने की जरूरत नहीं है.’

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आखिर उस चिट्ठी में क्या लिखा है, जिसकी वजह से गिरफ्तार हुए वामपंथी विचारक

नई दिल्ली। भीमा कोरेगांव हिंसा से जुड़े मामलों में मंगलवार को पुणे पुलिस की अगुवाई में देशभर में छापेमारी हुई. इस दौरान कई वामपंथी विचारकों को गिरफ्तार किया गया, जिसके बाद इस मामले ने तूल पकड़ा हुआ है.

इस साल की शुरुआत में पुणे पुलिस ने माओवादी नेता की ओर से लिखे गए एक कथित पत्र को जब्त किया था जिसमें देश में विभिन्न नक्सल गतिविधियों के लिए प्रतिष्ठित तेलुगू कवि वरवरा राव के कथित ‘मार्गदर्शन’ के लिए उनकी तारीफ की गई थी.

राव उन पांच लोगों में शामिल हैं जिन्हें माओवादियों के साथ संदिग्ध जुड़ाव के आरोप में गिरफ्तार किया गया. महाराष्ट्र पुलिस ने कई राज्यों में प्रतिष्ठित वामपंथी कार्यकर्ताओं के घरों पर छापेमारी के बाद ये गिरफ्तारियां की. कॉमरेड मिलिंद द्वारा हिन्दी में लिखे पत्र में राव की तारीफ करते हुए उन्हें ‘वरिष्ठ कॉमरेड’ बताया गया है.

पत्र में कहा गया है, ‘‘ पिछले कुछ महीनों के दौरान वरिष्ठ कॉमरेड वरवर राव और हमारे कानूनी सलाहकार कॉमरेड वकील सुरेंद्र गाडलिंग की विभिन्न गतिविधियों में मार्गदर्शन की वजह से हमें राष्ट्रीय स्तर पर अच्छा प्रचार मिला है.’’

और क्या था चिट्ठी में…

दरअसल, इस साल जून में माओवादियों की एक चिट्ठी सामने आई थी, जिसमें राजीव गांधी की तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या की साजिश रचने का खुलासा हुआ था. 18 अप्रैल को रोणा जैकब द्वारा कॉमरेड प्रकाश को लिखी गई चिट्ठी में कहा गया कि हिंदू फासिस्म को हराना अब काफी जरूरी हो गया है. मोदी की अगुवाई में हिंदू फासिस्ट काफी तेजी से आगे बढ़ रहे हैं, ऐसे में इन्हें रोकना जरूरी हो गया है.

इसमें लिखा गया था कि मोदी की अगुवाई में बीजेपी बिहार और बंगाल को छोड़ करीब 15 से ज्यादा राज्यों में सत्ता में आ चुकी है. अगर इसी तरह ये रफ्तार आगे बढ़ती रही, तो माओवादी पार्टी को खतरा हो सकता है. इसलिए वह सोच रहे हैं कि एक और राजीव गांधी हत्याकांड की तरह घटना की जाए.

इस चिट्ठी में कहा गया कि अगर ऐसा होता है, तो ये एक तरह से सुसाइड अटैक लगेगा. हमें लगता है कि हमारे पास ये चांस है. मोदी के रोड शो को टारगेट करना एक अच्छी प्लानिंग हो सकती है.
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भीमा कोरेगांव हिंसा केस में ताबड़तोड़ छापेमारी, नक्सल समर्थक होने के शक में 5 गिरफ्तार

नई दिल्ली। पांच महीने में दूसरी बार मंगलवार को पुणे पुलिस ने देशभर के कथित नक्सल समर्थकों के घरों व कार्यालयों पर ताबड़तोड़ छापेमारी की. सूत्रों के मुताबिक भीमा कोरेगांव हिंसा मामले में जांच के मद्देनजर छापे के बाद अब तक कवि वरवरा राव, अरुण पेरेरा, गौतम नवलखा, वेरनोन गोन्जाल्विस और सुधा भारद्वाज को गिरफ्तार किया गया है. सभी आरोपियों को सेक्शंस 153 A, 505(1) B, 117, 120B, 13, 16, 18, 20, 38, 39, 40 और UAPA (गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम ऐक्ट) के तहत मामला दर्ज किया गया है.

आपको बता दें कि भीमा-कोरेगांव में जनवरी महीने में हुई हिंसा में पांच लोगों की गिरफ्तारी के बाद चौंकानेवाला खुलासा हुआ था. पुणे पुलिस को एक आरोपी के घर से ऐसा पत्र मिला था, जिसमें राजीव गांधी की हत्या जैसी प्लानिंग का ही जिक्र किया गया था. इस पत्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को निशाना बनाने की बात भी कही गई थी.

सूत्रों ने बताया कि मंगलवार को देशभर के कई शहरों मुंबई, रांची, हैदराबाद, फरीदाबाद, दिल्ली और ठाणे में छापेमारी की गई. रांची में स्टेन स्वामी को गिरफ्तार नहीं किया गया है, केवल उनके घर की तलाशी ली गई. कार्यकर्ताओं के कई समर्थकों ने विभिन्न जगहों पर पुलिस छापे के दौरान प्रदर्शन किया. उधर, भीमा कोरेगांव हिंसा मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने पुणे के लिए ऐक्टिविस्ट गौतम नवलखा की ट्रांजिट रिमांड पर स्टे लगा दिया है. वह बुधवार को केस की सुनवाई होने तक हाउस अरेस्ट रहेंगे.

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सामाजिक कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी लोकतांत्रिक आवाजों को दबाने की कोशिश- रिहाई मंच

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लखनऊ। रिहाई मंच ने मानवाधिकार और लोकतांत्रिक अधिकारों के जाने-माने पैरोकारों के घरों पर हुई छापेमारी और उनकी गिरफ्तारी की कड़ी निंदा करते हुए तत्काल रिहाई की मांग की. मंच ने सुधा भारद्ववाज, गौतम नवलखा, अरुण फरेरा, वेराॅन गोंजाल्विस, आनंद तेलतुंबडे, वरवर राव, फादर स्टेन स्वामी, सुसान अब्राहम, क्रांति और नसीम जैसे सामाजिक कार्यकर्ताओं पर इस हमले को अघोषित आपातकाल कहा.

रिहाई मंच अध्यक्ष मुहम्मद शुऐब ने कहा कि मोदी जब भी राजनीतिक रुप से फंसते हैं उनकी जानपर खतरे का हौव्वा खड़ा हो जाता है- कभी इशरत जहां को मार दिया जाता है तो आज मानवाधिकार-लोकतांत्रिक अधिकारवादी नेताओं, वकीलों और षिक्षाविदों की गिरफ्तारी हो रही है. अच्छे दिनोें के नाम पर जिस मध्यवर्ग को वोट बैंक बनाया गया सरकार उसे कुछ भी दे पाने में विफल रही. इस असफलता को छुपाने के लिए ‘अरबन नक्सली‘ की झूठी कहानी गढ़ी गई है.

सुधा भारद्वाज का बस इतना जुर्म है कि वो आदिवासी जनता के हक-हुकूक की बात करती हैं तो वहीं गौतम नवलखा सरकारी दमन की मुखालफत करते हैं. तो वहीं आनंद तेलतुबंडे बाबा साहेब के विचारों को एक राजनीतिक षिक्षाविद के रुप में काम करते हैं. दरअसल सच्चाई तो यह है कि छत्तीसगढ़ समेत कई राज्यों में चुनाव होने को हैं और जनता भाजपा के खिलाफ है. ऐसे में जनता की लड़ाई लड़ने वालों की गिरफ्तारी सरकार की खुली धमकी है.

मुहम्मद शुऐब कहते हैं कि सनातन संस्था की उजागर हुई आतंकी गतिविधियों से ध्यान बंटाने की यह आपराधिक कोषिष है जिसकी कमान मोदी-षाह के हाथ में है. एक तरफ पंसारे, कलबुर्गी, दाभोलकर, लंकेष की सनातन संस्था हत्या कर रही है दूसरी ओर मोदी पर हमले के नाम पर इस तरह की गिरफ्तारियां साफ करती हैं कि जो तर्क करेगा वो मारा जाएगा या उसे जेल में सड़ाया जाएगा.

रिहाई मंच ने कहा कि यह कार्रवाई असंतोष की आवाजों को दबाने और सामाजिक न्याय के सवाल को पीछे ढकेलने की सिलसिलेवार कोषिष का चरम हिस्सा है. भीमा कोरेगांव मामले को माओवाद से जोड़ा जा रहा है और उसके मुख्य अभियुक्त संभाजी भिडे को संरक्षण दिया जा रहा है. यह मोदी की दलित विरोधी नीति नया पैतरा है.

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पूँजीवादी ब्राह्मणवाद के नायक हैं अटल बिहारी वाजपेयी

पिछले लगभग दस वर्षों से सक्रिय राजनीतिक जीवन से विरत व अस्वस्थ रहने वाले अटल बिहारी वाजपेयी की 16 अगस्त 2018 को मृत्यु हो गयी. उन्होंने सामान्य व्यक्ति से कहीं ज्यादा 93 वर्ष का जीवन जिया. उन्होंने 80 वर्ष की उम्र तक प्रधानमंत्री के रूप में कार्य किया एवं उसके पश्चात भी सक्रिय थे. वे ‘जी भर जिए और मन से मरे.’ कोई ऐसा व्यक्ति जो सामान्य परिवार में पैदा हुआ हो, भारत के प्रधानमंत्री का पद प्राप्त करे और उसकी 93 वर्ष की उम्र में मृत्यु हो, तो उस व्यक्ति के जीवन को शानदार कहा जा सकता है. लेकिन जिस तरह भारतीय जनता पार्टी व मीडिया इनको महान बनाने का अभियान चला रही है वह न केवल निन्दनीय है बल्कि महान विभूतियों का अपमान भी है. हालांकि इस अभियान में न तो भाजपा, न ही मीडिया, वाजपेयी को महान बनाने वाले तथ्यों व तर्कों का विवरण उपलब्ध करा पा रही है, सिवाय इसके कि वे कवि हृदय, प्रखर वक्ता व विरोधियों की भी पसन्द थे.

जो व्यक्ति तीन बार प्रधानमंत्री रहा हो क्या उसके खाते में एक भी कार्य ऐसा नहीं है जिसको गिनाकर कहा जाये कि वाजपेयी जी ने यह कार्य किया है जिससे भारत की सामान्य जनता को लाभ हुआ है. जिस दौर में वी.पी. सिंह जैसे न्यूनतम कार्यकाल वाले प्रधानमंत्री हैं, जिन्होंने सरकारी सेवाओं में मण्डल आयोग की सिफारिशों को लागू किया, जिससे देश की लगभग 52 प्रतिशत पिछड़ी जनंसख्या के लिए अवसर की समानता का अधिकार प्राप्त हुआ. ऐसे दौर में अटल बिहारी वाजपेयी के 6 वर्ष के कार्यकाल में ऐसा कोई कार्य है जिससे सामान्य जन का भला हुआ है? उत्तर होगा नहीं. वास्तव में वाजपेयी ने ऐसा कोई कार्य किया ही नहीं है जिसे भाजपा व मीडिया गिना सके. उल्टे उन्होंने ऐसे कई किये हैं जिससे पिछड़े वर्गों, अल्पसंख्यकों, अनुसूचित जातियों/जनजातियों, मजदूरों व नौकरीपेशा जनता के जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा. भाजपा जिस विचारधारा की पोषक है उसमें इसी तरह के व्यक्तियों को महान बनाया जाता है. शुरुआत राम से होती है, लोकमान्य तिलक, महात्मा गांधी जैसे व्यक्तियों की इसी तरह महान बनाया गया.

आइये अब वाजपेयी जी के कार्यों का विवरण देखते हैं जो उन्होंने अपने प्रधानमंत्रित्व काल में किया जिससे साधारण जन के हितों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा. इन कार्यों का प्रतिकूल प्रभाव ही पड़ा है वरना ये कार्य इतने बड़े हैं कि भाजपा व मीडिया इसकी चर्चा करने से अपने आपको रोक नहीं पाते. पहला कार्य उन्होंने अपने 13 दिन के कार्यकाल में किया था जब वे संवैधानिक व नैतिक रूप से सक्षम नहीं थे. क्योंकि उन्होंने केवल प्रधानमंत्री पद की शपथ लिया था, लोक सभा का विश्वासमत उन्हें प्राप्त नहीं हुआ था और उस लोकसभा का विश्वास उन्हें मिला भी नहीं. अन्ततः तेरहवें दिन उन्हें इस्तीफा भी देना पड़ा. वह कार्य था- एक अमेरिकी कम्पनी ‘एनरान’ को बिजली बनाने की अनुमति देना. उनहोंने न केवल अनुमति दिया था बल्कि उसके द्वारा बनायी गयी बिजली को रु.2.40 की दर से खरीदने की गारण्टी भी दिया था और यह दर डालर का मूल्य बढ़ने के साथ बढ़ती रहनी थी. उस समय यह आकलन किया गया था कि पांच साल बाद जब एनरान कम्पनी बिजली बनाकर देगी तो डालर का मूल्य बढ़ा होगा और बिजली रु. 6.0 से रु 7.0 प्रति यूनिट की दर से खरीदनी पड़ेगी. जबकि अन्य पब्लिक सेक्टर की कम्पनियाँ उस समय रु. 00.70 से रु. 1.50 की दर से बिजली देने को तैयार थीं. हालांकि एनराॅन कम्पनी अब बंद हो चुकी है. क्या इसका उल्लेख भाजपा और मीडिया कर सकती हैं?

वाजपेयी जी को याद करने का एक और कारण हो सकता है कि उन्होंने कांग्रेस द्वारा लागू की गयी नई आर्थिक नीतियों को और तेज गति से लागू किया. नई आर्थिक नीति का एक प्रमुख घटक था निजीकरण. इसके लिए वाजपेयी जी ने एक मंत्रालय बनाया जिसका नाम रखा ‘विनिवेश मंत्रालय’. इसके मंत्री बनाये गये थे अरुण शौरी. अरुण शौरी पत्रकार थे और बाबासाहब अम्बेडकर को ‘तुच्छ व्यक्ति’ सिद्ध करने के लिए एक पुस्तक लिखे थे ‘Worshiping of False God’ . वाजपेयी ने उनकी प्रतिभा और दृष्टि को पहचान कर सरकारी संस्थाओं को बेचने का कार्य सौंपा. भला सरकारी संस्थाओं को बेचने के लिए ‘अम्बेडकर विरोधी’व्यक्ति से बेहतर कौन हो सकता था. क्योंकि बाबासाहब राष्ट्रीयकरण के समर्थक जो थे. अरुण शौरी ने इस कार्य को बखूबी किया. अरुण शौरी ने जिन संस्थाओं को बेचा उनमें ‘बाल्को’ का मामला काफी चर्चित हुआ. दरअसल 2001 में बाल्को की 51 प्रतिशत हिस्सेदारी रु.551.5 करोड़ में बेची गयी. 51 प्रतिशत हिस्सेदारी बेचने का मतलब होता है मालिकाना हक बेचना. जबकि बाल्को के पास उस समय रु. 300.00 करोड़ का फिक्स डिपाजिट था और रु.200.00 करोड़ का निवेश बाल्को ने अन्य कम्पनियों में किया था. बाल्को को रु. 551.50 करोड़ में खरीदने वाले को रु. 500.00 करोड़ एफ.डी. और निवेश के रूप में तुरंत मिल गये साथ ही साथ 3000 एकड़ की बाल्को की जमीन भी मिली. इस सौदे पर काफी हो हल्ला भी हुआ. वास्तव में उस समय बाल्को की कीमत रु. 4000.00 करोड़ से ज्यादा थी. जिसे ओने-पौने दामों में बेच दिया गया. क्या भाजपा और मीडिया को इसका जिक्र कर सकती है?

एक और कार्य का जिक्र भाजपा और ‘मीडिया को वाजपेयी के द्वारा किये गये महान कार्यों में करना चाहिए. वह कार्य है नई पेंशन योजना को लागू करना. वाजपेयी की सरकार ने 1 अप्रैल 2004 के पश्चात सरकारी नौकरी पाने वाले कर्मचारियों और अधिकारियों के लिए नई पेंशन योजना लागू किया. इसका भी जिक्र भाजपा और मीडिया के लोग नहीं कर रहे हैं. वे इसका जिक्र कर भी नहीं सकते. क्योंकि जैसे ही नई पेंशन योजना का जिक्र करेंगे तो सवाल खड़ा होगा कि पुरानी पेंशन योजना में क्या था, तो वाजपेयी की महानता खतरे में पड़ जायेगी. वाजपेयी सरकार ने केन्द्रीय सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों के लिए 01/04/2004 से पेंशन बन्द कर दिया. तत्पश्चात धीरे-धीरे राज्य सरकारों ने भी राज्य कर्मचारियों का पेंशन छीन लिया. केवल तमिलनाडु में राज्य कर्मचारियों को पेंशन दी जाती है शायद इसलिए कि वहाँ कोई ब्राह्मणवादी सत्ता में नहीं आया. पेंशन से जुड़े एक और पहलू का जिक्र यहाँ आवश्यक है. वाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व काल में जहाँ कर्मचारियों से पेंशन छीन ली गयी वहीं उन्हीं के कार्यकाल में राज्य विधानमण्डलों, लोकसभा और राज्य सभा के सभी सदस्यों के पेंशन को न केवल बढ़ाया गया बल्कि पेंशन की शर्तों में छूट भी दी गयी. 2004 में यह संशोधन लागू किया गया कि चुनाव आयोग द्वारा गजट होने के पश्चात ही माननीय सदस्यगण पेंशन पाने के हकदार हो जायेंगे, जबकि इसके पूर्व निश्चित कार्यकाल पूरा करने के पश्चात ही सदस्यगण पेंशन के हकदार होते थे.

एनरान समझौता, बाल्को विनिवेश, पेंशन बन्द करने के साथ एक और उदाहरण देना उचित होगा जिससे अटल बिहारी वाजपेयी के व्यक्तित्व की उचित समीक्षा की जा सके. वह उदाहरण है 1999 में शहरी भूमि सीलिंग एण्ड रेगुलेशन एक्ट 1976 को निरस्त करना. कानून बनाते समय इसके उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए कहा गया गया था कि व्यापक जनहित में नगरीय समूह में भूमि के न्यायसंगत वितरण हेतु इस कानून को बनाया जाना आवश्यक है. क्या 1999 तक शहरी भूमि का न्यासंगत वितरण हो चुका था जो 1999 में इस कानून को निरस्त कर दिया गया?

जहाँ भाजपा और मीडिया मिलकर भी वाजपेयी को महान बनाने वाले एक कार्य का भी उल्लेख नहीं कर पा रही हो वहाँ उपरोक्त चारों कार्यों का उल्लेख वाजपेयी की प्रतिबद्धता को स्पष्ट करने के लिए पर्याप्त है. यदि वाजपेयी जी पर लगे आरोपों जैसे 1942 में स्वतंत्रता सेनानियों की मुखबिरी तथा सजा माफ गवाह बनना, 1992 में बाबरी ढाँचा गिराने में भूमिका, 2002 में गुजरात दंगा के पश्चात मोदी को मुख्यमंत्री पद से बर्खस्त न करना, आदि को नजरअंदाज कर दिया जाये तो भी उनके व्यक्तित्व में ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे उन्हें महान माना जाये. उन्होंने और उनके मातृ संगठन ने सामन्तों, रजवाड़ों एवं पूंजीपतियों के हित में कार्य किया है. बैंकों व बीमा कम्पनियों के राष्ट्रीकरण का विरोध, प्रिवी पर्स समाप्त करने का विरोध, मंडल कमीशन का विरोध जैसे कार्यों से वाजपेयी की प्रतिबद्धता स्वंय सिद्ध है. अटल बिहारी वाजपेयी ब्राह्मण जाति में पैदा हुए थे, ब्राह्मणों की श्रेष्ठता स्थापित करने वाले ‘मनु’को आदर्श मानते थे, वर्ण व्यवस्था को पुष्पित-पल्लवित करने वाले अदृश्य संगठन ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’की पाठशाला में शिक्षित प्रशिक्षित हुए थे, संघ की रणनीति के अनुसार ही अपने व्यक्तित्व को उदार चेहरे से ढके हुए रहते थे. उन्होंने आजीवन पूँजीवादी अर्थव्यवस्था की नीतियों का पक्ष लिया तथा प्रधानमंत्री बनने पर उन नीतियों को बढ़-चढ़कर लागू किया एवं जाति जनगणना के प्रस्ताव को निरस्त किया. वाजपेयी को पूंजीवादी ब्राह्मणवाद के नायक के रूप में याद किया जायेगा.

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आरक्षण के खिलाफ उतरी भाजपा, तेज हुआ संघर्ष

नई दिल्ली। बिहार में इन दिनों आरक्षण को लेकर राजनीतिक सरगर्मी बढ़ गई है। कोई दलित आरक्षण के विरोध में बयान दे रहे हैं तो कोई सवर्णों को भी आरक्षण देने की मांग करने लगे हैं। राजनीतिक मंच से निजी क्षेत्र में आरक्षण की मांग की जा रही है।

भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद सीपी ठाकुर ने 26 अगस्त को दलित आरक्षण का विरोध करते हुए आर्थिक रूप से पिछड़े सवर्णों को आरक्षण देने की मांग की. सीपी ठाकुर ने कहा कि, “दलितों की सिर्फ दो पीढ़ियों को नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण दिया जाना चाहिए, और इसके बाद उन्हें आरक्षण नहीं दिया जाना चाहिए.

दलित आईएएस अधिकारी के बेटे को नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण का लाभ नहीं दिया जाना चाहिए.” उन्होंने आर्थिक रूप से कमजोर सवर्णों के लिए आरक्षण की मांग करते हुए कहा कि, “आज देश में सवर्णों की हालत काफी खराब हो चुकी है. इस समाज के पिछड़े लोगों को भी आरक्षण मिलना चाहिए.”

यह पहली बार नहीं है जब भाजपा सांसद ने आरक्षण को लेकर इस तरह का बयान दिया है. इससे पहले भी वे जाति आधारित आरक्षण को समाप्त करने की वकालत कर चुके हैं. वे आर्थिक आधार पर आरक्षण लागू करने के पक्ष में हैं.

वहीं, दूसरी ओर एनडीए के घटक दल राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री उपेंद्र कुशवाहा ने एक राजनीतिक मंच से निजी क्षेत्र में भी आरक्षण की मांग की. उन्होंने कहा कि, “सरकारी क्षेत्र में नौकरियां कम हो रही है. इसलिए निजी क्षेत्र में भी आरक्षण लागू करने की जरूरत है. साथ ही उन्होंने सुप्रीम कोर्ट व हाईकोर्ट के कोलेजियम सिस्टम पर सवाल उठाते हुए कहा कि इससे लोगों के अधिकार का हनन हो रहा है. जज अपना उत्तराधिकारी चुनते हैं. दलित, पिछड़े, आदिवासी और गरीब सवर्ण के मेधावी बच्चे जज नहीं बन सकते हैं. यह संविधान का उल्लंघन है. इसलिए इस प्रणाली में भी बदलाव होना चाहिए.”

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एशियाड में पदक जीत आदिवासी खिलाड़ी ने देश को दिलाया गौरव

नई दिल्ली। ओडिशा के जो आदिवासी इलाके अभी तक नक्सली हिंसा के लिए चर्चा में थे, अब वे दुति चंद की वजह से सुर्खियों में है. जकार्ता में चल रहे एशियाड खेलों में दुति चंद ने रजत पदक जीता है. दुति स्वर्ण पदक जीतने से महज 0.02 सेकंड से पिछड़ गई. इस शानदार खिलाड़ी की जीत इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पूरे दो दशक बाद भारत के किसी खिलाड़ी ने 100 मीटर की रेस में कोई पदक जीता है. दुति ओडिशा से हैं और आदिवासी हैं.

दुति के साथ ही जिन दो और महिला खिलाड़ियों से देश को पदक की उम्मीद है, उनका नाम जौना मुर्मू और पूर्णिमा हेम्ब्रम है. ये दोनों भी आदिवासी हैं और ओडिशा की हैं. जहां तक दुति की बात है, वो 2016 के रियो ओलिम्पिक में भी फर्राटा दौड़ी थीं. दुति की सफलता में उस माहौल का खासा योगदान है जिसमें वो पली-बढ़ी हैं.

आदिवासी समाज में खेल को लेकर एक खास तरह का रुझान होता है. जंगल की विपरीत परिस्थितियां, मीलों चलकर पानी लाने की मजबूरी, जंगली जानवरों और प्राकृतिक कहर उन्हें चट्टान सा मजबूत बना देता है. इसलिए आदिवासी कुदरती तौर पर खिलाड़ी होते हैं. लेकिन उनको मौकों की कमी और संसाधन के अभाव से जूझना पड़ता है.

हालांकि इस बीच ओडिशा के भुवनेश्वर में चल रहा कलिंगा संस्थान इन आदिवासी खिलाड़ियों के लिए वरदान साबित हुआ है. इस संस्थान की नींव पेशे से शिक्षक अच्युत सावंत ने रखी है. सावंत उन हजारों आदिवासी बच्चों का भविष्य संवारने में जुटे हैं, जो सावंत के न होने पर शायद माओवादिओं की गिरफ्त में होतें.

दुति की सफलता जहां देश के लिए गौरव की बात है तो साथ साथ उन आदिवासी बच्चों के लिए एक प्रेरणा भी है जो आज भी मुख्यधारा में आने के लिए छटपटा रहे हैं.

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मोदी को क्यों हराना चाहता है ये नोबेल विजेता

नई दिल्ली। नोबल पुरस्कार से सम्मानित ‘भारत रत्न’ अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने साल 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी विरोधी गैर सांप्रदायिक पार्टियों से एकजुट होने की अपील की है ताकि एनडीए को सत्ता में आने से रोका जाए.

अमर्त्य सेन ने बीजेपी पर हमला करते हुए उसे एक वो बीमार पार्टी बताया, जिसने 55 फीसदी सीटों के साथ सत्ता हासिल कर ली, जबकि उसे केवल 31 फीसदी वोट ही हासिल हुए थे. सेन बीजेपी को गलत इरादों से सत्ता में आई पार्टी मानते हैं. क्या माना जाए कि अमर्त्य सेन के मुताबिक देश की जनता ने ‘गलत इरादों वाली पार्टी’ को देश सौंपा है?

सवाल उठता है कि आखिर अमर्त्य सेन को एनडीए या फिर मोदी सरकार से क्या नाराजगी है?

दरअसल साल 2014 में भी अमर्त्य सेन ने मोदी के पीएम पद की दावेदारी का जोरदार विरोध किया था. अमर्त्य सेन की अपील विपक्ष के लिए भाजपा को घेरने का मौका हो सकती है. हालांकि भाजपा ने भी सेन पर पलटवार किया है और अमर्त्य सेन की तुलना उन बुद्धिजीवियों से की है जिन्होंने हमेशा समाज को गुमराह किया.

अमर्त्य सेन को साल 1998 में अर्थशास्त्र के लिये नोबल पुरस्कार मिला था. बंगाल की मिट्टी से उभरे अर्थशास्त्र के नायक अमर्त्य सेन ने गरीबों, स्वास्थ और शिक्षा को लेकर अपने विचारों से दुनिया में सबका ध्यान खींचा था. लेकिन आज वो एनडीए को सत्ता में आने से रोकने की अपील कर देश में सबका ध्यान खींच रहे हैं. खासबात ये है कि अमर्त्य सेन को एनडीए सरकार ने ही ‘भारत-रत्न’ दिया था. उस वक्त एनडीए सरकार के पीएम अटल बिहारी वाजपेयी थे.

लेकिन साल 2014 आते-आते अमर्त्य सेन की एनडीए को लेकर मानसिकता बदल गई. साल 2014 में जब बीजेपी ने गुजरात के तत्तकालीन सीएम नरेंद्र मोदी को पीएम पद का उम्मीदवार घोषित किया तो अमर्त्य सेन ने इसका विरोध किया. सेन ने मोदी की पीएम पद की दावेदारी पर सवाल उठाए. जिसके बाद बीजेपी के पश्चिम बंगाल से नेता चंदन मित्रा ने ‘भारत-रत्न’ वापस लेने तक की मांग कर डाली थी.

अमर्त्य सेन के विचारों को निजी विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बता कर कांग्रेस और वामदलों ने बीजेपी पर जमकर हमला बोला था. इसके बाद से लगातार ही अमर्त्य सेन मोदी सरकार पर सवाल उठाते रहे हैं. उन्होंने यहां तक कहा कि पीएम मोदी को आर्थिक विकास के मामलों की समझ नही हैं. उन्होंने नोटबंदी को दिशाहीन मिसाइल कहते हुए गलत फैसला बताया था.

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क्या भारत में कंकालों का म्यूजियम संभव है?

यूरोप के जर्मनी और अफ्रीका के रवांडा जैसे कुछ देशों में कई सारे होलोकॉस्ट म्यूजियम हैं स्कूल कॉलेज के बच्चों को वहां दिखाया जाता है कि हिटलर के दौर में या हुतु तुत्सी जातीय हिंसा के दौर में किस नँगाई का नाच हुआ था, कैसे पढ़े लिखे समझदार लोग जानवर बन गए थे और एकदूसरे की खाल नोचने लगे थे।

मरे हुए लोगों को खोपड़ियां, कंकाल, जूते, कपड़े, उनके बर्तन, फर्नीचर इत्यादि सब सजाकर रखे गए हैं ताकि अगली पीढ़ी देख सके कि वहशीपन क्या होता है और धार्मिक नस्लीय जातीय हिंसा से क्या क्या संभव है।

भारत मे भी हर जिले में भी ऐसा ही कम से कम एक “दंगा, छुआछूत और बाबा म्यूजियम” होना चाहिए जिसमें उस इलाके में हुए धार्मिक जातीय दंगों का विवरण और फोटो इत्यादि रखे गए हों। छुआछूत के आधार पर उस इलाके के पाखण्डी सवर्ण द्विजों ने सालों साल तक कैसे अपनी ही स्त्रियों और दलितों, यादवों, अहीरों, कुर्मियों, कुम्हारों, किसानों, मजदूरों, शिल्पियों को जानवर सी जिंदगी में कैद रखा, कैसे मूर्ख बनाकर गरीबों की जमीनों और औरतों को लूटा – ये सब बताया जाना चाहिए।

कैसे यज्ञ हवन और पूजा पाठ करने वालों, ज्योतिषियों, गुणियों कान फूंकने वाले ओझाओं ने औरतों और शूद्रों दलितों को शिक्षा और रोजगार सहित पोष्टिक भोजन और जीवन के अधिकार से वंचित रखा ये दिखाया जाना चाहिए।

कितने बाबाजन, योगियों, रजिस्टर्ड भगवानों और धर्मगुरुओं ने कितने बलात्कार किये, कितने मर्डर किये, कितनी जमीने दबाई कब कोर्ट ने उन्हें दबोचा, वे कितने साल जेल में रहे – ये सब विस्तार से बताना चाहिए।

अगली पीढ़ी अगर इन सब मूर्खताओं को करीब से देख समझ ले तो उसे कावड़ यात्रा, कार सेवा, देवी देवता के पंडालों, धार्मिक दंगों, बाबाओ के बलात्कार और जातीय धार्मिक दंगों सहित छुआछूत भेदभाव और अंधविश्वास से बचाया जा सकता है।

लेकिन दुर्भाग्य की बात ये है कि ये सब बताने की बजाय भारतीय परिवार अपने बच्चों को अपने मूर्ख पारिवारिक गुरुओं, देवी देवताओं के पंडालों और आत्मा परमात्मा की बकवास सिखाने वाले शास्त्रों की गुलामी सिखाते हैं। हर पीढ़ी बार बार उसी अंध्विश्वास, छुआछूत और कायरता में फंसती जाती है।

भारत मे व्यक्ति और समाज की चेतना का एक सीधी दिशा में रेखीय क्रमविकास नहीं होता बल्कि यहां सब कुछ गोलाई में घूम फिरकर वहीं का वहीं पुराने दलदली गड्ढे में वापस आ जाता है। इसीलिए ये मुल्क और इसकी सभ्यता कभी आगे बढ़ ही नहीं पाती, हर पीढ़ी उन्हीं बीमारियों में बार बार फसती है जिन्हें यूरोप अमेरिका के समाज पीछे छोड़ चुके हैं।

भारत के धर्म और सँस्कृति को इतना सक्षम तो होना ही चाहिए कि अपने लिए नए समाधान न सही कम से कम नई समस्याएं ही पैदा कर ले। बार बार उन्हीं गड्ढों में गिरना भी कोई बात हुई?

संजय श्रमण

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शिवसेना नेता राउत ने उठाए सवाल, ‘क्या 16 अगस्त को ही हुआ था वाजपेयी का निधन?’

मुंबई। शिवसेना के वरिष्ठ नेता संजय राउत ने रविवार को सवाल उठाया कि क्या पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का निधन 16 अगस्त को ही हुआ था या उस दिन उनके निधन की घोषणा की गई जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का स्वतंत्रता दिवस भाषण बाधित न हो. राज्यसभा सांसद और शिवसेना के मुखपत्र ‘सामना’ के संपादक राउत ने वाजपेयी के निधन के दिन को लेकर उठाए गए सवाल का कोई स्पष्टीकरण या कारण वाजपेयी के निधन की घोषणा एम्स द्वारा 16 अगस्त को की गई थी और उनके निधन का वक्त भी बताया गया था. राउत ने कहा, ‘हमारे लोगों के बजाए हमारे शासकों को पहले यह समझना चाहिए कि ‘स्वराज्य’ क्या है. वाजपेयी का निधन 16 अगस्त को हुआ, लेकिन 12-13 अगस्त से ही उनकी हालत बिगड़ रही थी. स्वतंत्रता दिवस पर राष्ट्रीय शोक और ध्वज को आधा झुकाने से बचने और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी लाल किले से अपना विस्तृत संबोधन देना था, वाजपेयी ने इस दुनिया को 16 अगस्त को छोड़ा (या जब उनके निधन की घोषणा की गई).’

राउत ने कहा, ‘यह परंपरा इस साल भी जारी रही. स्वतंत्रता दिवस समारोह पर हमले को अंजाम देने की साजिश रच रहे 10 आतंकवादियों को गिरफ्तार किया गया. भारी मात्रा में हथियार जब्त किए गए. इसलिए (इसके बाद) प्रधानमंत्री ने निर्भय होकर स्वतंत्रता दिवस मनाया.’ राउत ने लिखा, ‘प्रधानमंत्री मोदी ने गरीबों के लिये कई घोषणाएं कीं (अपने स्वतंत्रता दिवस संबोधन में). उनके भाषण की शैली ऐसी थी कि पूर्ववर्ती सरकारों ने कुछ नहीं किया, इसलिये स्वतंत्रता (अब तक) बेकार थी.’

उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री जहां कह रहे हैं कि रिश्वत लेने वालों पर कार्रवाई की जा रही है, वहीं घूसखोरी कम नहीं हुई है. शिवसेना नेता ने कहा, ‘यह सच है कि कल्याण योजनाएं टैक्स के पैसे से चलती हैं जो ईमानदार लोग चुकाते हैं. यह भी सच है कि प्रधानमंत्री का विदेश दौरा भी उसी रकम से संपन्न होता है और विज्ञापनों पर खर्च होने वाले हजारों करोड़ रूपये भी इसी के जरिये हासिल होते हैं. यह नया तरीका है जिसके तहत ‘स्वराज्य’ काम कर रहा है.’

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दलित-पिछड़े चाहते हैं कि उनके बीच का व्यक्ति बने सीएम: अशोक तंवर

हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के साथ लंबे समय से चले आ रहे मतभेद की खबरों के बीच प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष अशोक तंवर ने मुख्यमंत्री पद के लिए परोक्ष रूप से अपनी दावेदारी पेश करते हुए कहा है कि राज्य के दलित, पिछड़े और दूसरे वंचित वर्गों की यह आकांक्षा है कि अगला मुख्यमंत्री उनके बीच से बने.

तंवर ने मुख्यमंत्री पद के बारे में फैसले को कांग्रेस नेतृत्व का विशेषाधिकार करार दिया, लेकिन साथ ही कहा कि अगले साल प्रस्तावित राज्य विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को बिना किसी चेहरे के जनता के बीच जाना चाहिए. चुनाव में जीत के बाद जनभावनाओं के अनुसार मुख्यमंत्री के उम्मीदवार का फैसला किया जाना चाहिए. उन्होंने ‘भाषा’ को दिए साक्षात्कार में कहा, ” राहुल गांधी जी चाहते हैं कि मुख्यमंत्री की बात आए तो पांच-सात विकल्प होने चाहिए. विधायक और सांसद बनने की बात आए तब भी कई विकल्प होने चाहिए. अलग अलग वर्गों से हमारे पास विकल्प होने चाहिए. मुख्यमंत्री पद के दौड़ में शामिल होने के बारे में पूछे जाने पर हरियाणा कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा, ”मैं अपनी दावेदारी क्यों खारिज करूं? राहुल जी ने कठिन समय में मुझे अध्यक्ष की जिम्मेदारी दी. हरियाणा के दलितों, पिछड़ों और वंचित वर्गों की यह अकांक्षा और सपना है कि मुख्यमंत्री उनके बीच से हो. इसी भावना के साथ लोग हमारे साथ जुड़े हुए हैं. जिन लोगों को कभी भागीदारी नहीं मिली उसको मौका मिलना चाहिए. चुनाव से पहले मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित करने के सवाल पर तंवर ने कहा, ”मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करने का विशेषाधिकार कांग्रेस अध्यक्ष और अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी का है. अमूमन यह देखा गया है कि जहां हम विपक्ष में होते हैं वहां हम बिना चेहरे के चुनाव में जाते हैं. इसके बाद जनता का विश्वास जिसके ऊपर होता है वही अगला मुख्यमंत्री होता है. मैं समझता हूं कि (हरियाणा में भी) पार्टी के लिए यही बेहतर है.

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