शाकाहार और मांसाहार की बहस

शाकाहार और मांसाहार में तुलनात्मक मेरिट की ही बात है तो ध्यान रखियेगा कि दुनिया में सारा ज्ञान विज्ञान तकनीक मेडिसिन चिकित्सा यूनिवर्सिटी शासन प्रशासन संसदीय व्यवस्था व्यापार उद्योग इत्यादि यूरोप के मांसाहारियों ने ही दिया है. भारत सहित अन्य मुल्कों को भी लोकतन्त्र, शिक्षा, विज्ञान और मानव अधिकार सिखाने वाले यूरोपीय ही थे. आज भी वे ही सिखा रहे हैं. मुल्क जिन भी व्यवस्थाओं से चल रहा हा वो सब उन्ही की देन है.

अपने वेदों और पुराणों को भी ठीक से देखिये, देवताओ सहित ऋषि मुनि पुरोहित राजा और सभी देवियाँ मांसाहारी हैं. शाकाहारी खुद हजारो साल तक गुलाम रहे हैं और गुलामियों और भेदभाव को पैदा करने में विश्व रिकॉर्ड बनाते रहे हैं.

शाकाहार की बहस असल में मुल्क को कमजोर कुपोषित और मानसिक रूप से दिवालिया बनाती है. शाकाहार में अव्वल तो आवश्यक पोषण होता ही नहीं या फिर इतना महंगा होता है कि भारत जैसे गरीब मुल्क में इसकी मांग करना गरीबों का मजाक है. पूरी दुनिया में भारत डाइबिटीज केपिटल बना हुआ है. कारण एक ही है, भारतीय थाली से प्रोटीन छीन लिया गया है. सबसे कमजोर और बोगस भोजन भारत का ही है. रोटी, चावल, घी, तेल, मक्खन, दूध दही शक्कर नमक सहित सभी अनाज सिर्फ फेट स्टार्च और कारबोहाइड्रेट देते हैं. बस चुल्लू भर दाल में ही थोडा सा प्रोटीन है वो भी अब आम आदमी की औकात के बाहर चली गयी है.

इसीलिये भारत लंबे समय से कमजोर, ठिगने, मन्दबुद्धि और डरपोक लोगों का मुल्क रहा है. भारत की 15 प्रतिशत से ज्यादा आबादी पुलिस या सेना की नौकरी के लायक ही नहीं होती. मुल्क की जनसंख्या में इतने बड़े अनफिट प्रतिशत का उदाहरण पूरी दुनिया में और कहीं नहीं है. याद कीजिये मुट्ठी भर मुगलों और अंग्रेजों ने इस मुल्क पर हजारों साल राज किया था. ये शाकाहार की महिमा है. हालाँकि इसमें जाति और वर्ण व्यवस्था का भी हाथ है जिसने फ्री नॅचुरल सिलेक्शन को असंभव बनाकर पूरे मुल्क के जेनेटिक पूल को जहां का तहाँ कैद कर दिया है और समाज को हजारों टुकड़ों में तोड़ डाला है. इस देश में कोई जेनेटिक मिक्सिंग और सुधार नहीं हो सका है.

बाकी सौंदर्यबोध के नाते आप शाकाहारी हैं तो ठीक है, आपकी मर्जी… लेकिन उससे आप महान नहीं बन जाते, न ही मांसाहारी नीच हो जाते हैं. अपनी महानता दूसरों पर थोपकर उनसे बदलने का आग्रह करना भी हिंसा है. मांसाहारियों ने शाकाहारियों की थाली को लेकर कभी बवाल नहीं किया. लेकिन शाकाहारियों को जाने क्या दिक्कत होती है उनकी नजर हमेशा भटकती रहती है. आपका स्वर्ग तो पक्का है, अकेले वहां जाकर खुश रहो न भाई, दूसरों की हांडी में झाँकने की क्या जरूरत है?

शाकाहार और शुचिता का दावा करने वालों का आचरण देखिये. वे हजारों साल से इंसान का खून चूस रहे हैं. उनके देवी देवताओं को देखिये, वे हमेशा तीर तलवार लिए खड़े हैं. उनकी देवियां प्याले भर भर खून पी रही हैं. जिनको मांसाहारी कहा जाता है उनका एकमात्र मसीहा बिना तीर तलवार गंडासे के नंगा होकर सूली पर लटका है और सबको माफ़ करते हुए विदा ले रहा है. और जिन लोगों को आतंकी या खूंख्वार कहकर लांछित किया गया है; उन्होंने अपने खुदा की कोई तस्वीर और मूर्ति तक नहीं बनाई है.

– लेखक भोपाल में रहते हैं. सामयिक विषयों पर लेखन भी करते हैं।

1 COMMENT

  1. यदि ज्ञान का लड्डू बनाना चाहते हैं तो महात्मा बुद्ध और अंबेडकर के विचारों को पढ़िए शाकाहार के बारे में, शाकाहार जातिभेद अपने और पराए से दूर विज्ञान का एक महत्वपूर्ण अंग है जिसकी खोज या फिर शाकाहार में काम आने वाली चीजों की खोज उस समय में की गई जब मशीनें उपलब्ध नहीं थी मांसाहार और उस से बनने वाली चीजें हमेशा से ही प्रभावशाली रही है लेकिन शाकाहार का मुख्य मकसद है की जरूरत पड़ने पर ही हिंसा की जाए… एक तरफ तो विज्ञान देवी देवताओं को नहीं मानता दूसरी तरफ देवी देवताओं का हवाला देकर लोगों को मांसाहारी बनाने का काम किया जा रहा है विश्व में जितने भी धर्म है और जितने भी धर्म गुरुओं हैं जो आज मानने हैं सभी में एक धर्म को छोड़कर, सभी धर्मों के अधिष्ठाता शाकाहारी ही रहे हैं अब वह हारे या जीते बहस यहीं समाप्त हो जाती है महाराणा प्रताप पहलवान सुशील अमिताभ बच्चन गौतम बुद्ध गुरु नानक ईसा मसीह राम कृष्ण वशिष्ठ ,गौतम ,विश्वामित्र, आरव ऋषि , धनवंतरी, चाणक्य ,गुरु वशिष्ठ ,गुरु रविदास, कबीर दास ,तुलसीदास ,आर्यभट्ट, शाकाहारी ओ की श्रंखला बहुत लंबी है जियो और जीने दो.. अगर लोगों को मांसाहारी बनाने का उद्देश्य राजनीतिक है तो कहावत है कि जागे हुए को कोई नहीं जगा सकता जैसा करोगे वैसा भरोगे.. बुद्धम शरणम गच्छामि..
    आपके जवाब का इंतजार रहेगा जय भीम जय भारत

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