(23 जून) प्लासी युद्ध: बहुजन मुक्ति का प्रथम संग्राम, दुसाध जाति ने दिखाया था शौर्य

(लेखकः विजय कुमार त्रिशरण) भारत में यूं तो अपनी रियासतें बचाने के लिए तमाम राजा-रजवाड़ों के आपस में लड़ने के किस्से मिलते रहते हैं। तो विदेशी आक्रमणकारियों और भारतीय राजाओं के बीच भी युद्ध आम रहा है। इसमें मुगल से लेकर अंग्रेजों के हमले तक शामिल हैं। लेकिन भारतीय इतिहास में दो ऐसे बड़े युद्ध हुए हैं, जिसने दो बड़े साम्राज्य को खत्म कर दिया है। एक है प्लासी का युद्ध जिसने नवाब सिराजुद्दौला के सल्तनत को खत्म कर दिया तो दूसरा है कोरेगांव का संग्राम जिसने अत्याचारी पेशवाओं के अहंकार को रौंद दिया था। इन दोनों महायुद्धों में एक बात समान थी। वह यह थी कि इस युद्ध में जीतने वाले पक्ष की ओर से भारत के मूलनिवासी जिन्हें अछूत और दलित कहा जाता था, वो लड़े थे। एक बात और समान थी, अछूत मूलनिवासी योद्धाओं ने अपने पराक्रम से विरोधी सेनाओं के कई गुना बड़े फौज को रौंद डाला था। 1 जनवरी 1818 को महार सैनिकों द्वारा पेशवाओं के खिलाफ लड़े गए कोरेगांव के युद्ध के बारे में तो मूलनिवासी समाज जानने लगा है, लेकिन 23 जून 1757 को लड़े गए प्लासी के युद्ध का इतिहास अभी बहुजनों के सामने प्रमुखता से नहीं आ पाया है। लेकिन इसके बारे में जानना जरूरी है।

भारतीय इतिहास की तारीख में प्लासी का युद्ध इतिहास का एक महत्वपूर्ण मोड़ है। प्लासी का पहला युद्ध 23 जून 1757 को मुर्शिदाबाद के दक्षिण में नदिया जिले में गंगा नदी के किनारे ‘प्लासी’ नामक स्थान में हुआ था। इस युद्ध ने न केवल मुग़ल सल्तनत को जड़ से उखाड़ कर ब्रितानियां हुकूमत की नींव रखी, बल्कि सदियों से ब्राह्मणशाही व्यवस्था की बुनियाद हिला कर रख दी। प्लासी का युद्ध 23 जून 1757 को नबाब सिराजुदौला और लार्ड क्लाइव के बीच लड़ा गया था। इसमें एक ओर मुग़ल नवाब था तो दूसरा ब्रिटिशर्स था। युद्ध के मैदान में लार्ड क्लाइव के पास महज 2200 सैनिक थे जबकि सिराजुदौला की ओर से 50 हज़ार सैनिकों को उतारा गया था। जिसमें 15 हजार घुड़सवार और 35 हजार पैदल सेना थी। तो दूसरी ओर सिराजुदौला के इस विशाल सेना का मुकाबला करने के लिए लार्ड क्लाईव की ओर से तकरीबन दो हजार से 2200 सैनिक थे। जिसमें से आधे के करीब सैनिक युद्ध के लिए गए थे।
23 जून को दोनों सेनाओं के बीच भयंकर भिडंत हुई। इस महज़ दो घंटे के आमने-सामने के सीधे मुकाबले में क्लाइव के मूलनिवासी वीर अछूत सैनिकों ने सिराजुदौला और उसके सेनापति मीर मदन को मौत की नींद सुला कर प्लासी युद्ध को फतह कर लिया। प्लासी की जीत के बाद ब्रिटेन की ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने बंगाल में अपना साम्राज्य स्थापित किया। हालांकि इतिहास की किताबों में यह भी कहा गया है कि लार्ड क्लाइव ने सिराजुद्दौला के लोगों को अपने में मिला लिया था। लेकिन यह युद्ध का एक हिस्सा है और इससे सैनिकों की वीरता कम नहीं होती।
बाबासाहेब डॉ० आंबेडकर ने ‘डॉ बाबासाहेब आंबेडकर रायटिंग एंड स्पीचेज वोल्यूम 12’ में अपने शोध के निष्कर्ष में लिखा है कि “प्लासी का युद्ध जीतने वाले मूल भारतीय सैनिक अछूत समुदाय के थे। वे लोग ईस्ट इण्डिया कम्पनी की सेना में भर्ती थे, वे अछूत थे। जिन्होंने क्लाइव के साथ प्लासी का युद्ध लड़ा वे दुसाध थे।
प्रसिद्ध विद्वान प्रो० सीले के मुताबिक “क्लाइव की सेना में एक हिस्सा ब्रिटिश योद्धाओं का जबकि चार हिस्सा स्थानीय भारतीय योद्धाओं का था, जो कि अछूत वर्ग के थे। यानी कि इस युद्ध में हिस्सा लेने वाले 70 फीसदी सैनिक मूलनिवासी दुसाध थे।

ऐसे ही बंगाल के इतिहासकार एस के विश्वास ने लिखा है कि “अगर प्लासी युद्ध में दुसाध अपनी भूमिका ग्रहण नहीं किये होते तो अश्पृश्य बहुजन के भाग्य के आकाश में मुक्ति का सूर्योदय नहीं होता।
प्लासी के युद्ध को बहुजन मुक्ति का प्रवेश द्वार भी कहा जाता है। प्लासी विजय के बाद ही भारत में ब्रिटिश हुकुमत की स्थापना हुई। इसके बाद सदियों से मनुवादी व्यवस्था में गुलाम बना कर रखे गए भारत के मूलनिवासी वर्ग को मानवीय जीवन जीने का अधिकार मिलना शुरू हुआ। उनकी मुक्ति के रास्ते खुलने शुरू हुए। जहाँ मनुवादी व्यवस्था ने मूलनिवासियों को अछूत बना कर पशु से भी बद्तर जीवन जीने को मजबूर कर दिया था, वहां ईस्ट इंडिया कंपनी ने अछूतों को सेना में भर्ती कर नौकरी, शिक्षा और स्वाभिमान की ज़िंदगी देना शुरू किया। इस तरह “सन 1757 में मूलनिवासी दुसाध जाति के लोगों ने जिस मुक्ति संग्राम का आगाज़ किया, उसे 01 जनवरी 1818 को कोरेगांव में महारों ने अंजाम दिया था। ……. हालांकि प्लासी का युद्ध औऱ खासकर कोरेगांव के युद्ध को लेकर तमाम लोग मूलनिवासी समाज की आलोचना करते हैं और कहते हैं कि मूलनिवासी समाज ने भारत के खिलाफ युद्ध किया। बाबासाहेब आंबेडकर ने इसका जवाब दिया है। बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर लिखते हैं कि “कुछ लोग अछूतों के अंग्रेजों को जितवाने में सहयोग करने को देशद्रोहिता की संज्ञा दे सकते हैं परन्तु इस मामले में अछूतों की भूमिका बिल्कुल निष्पक्ष थी क्योंकि यह खुद की मुक्ति के लिए स्वयं द्वारा भारत की जीत थी।” दरअसल अछूत सैनिक अपनी सेना की ओर से लड़ रहे थे, जैसे बाद के दिनों में अंग्रेजी शासनकाल के दौरान उच्च वर्ग के तमाम लोग अंग्रेजों की नौकरी कर रहे थे और उनके शासन में मदद कर रहे थे।

इस प्रकार 1757 में मूलनिवासी वीरों द्वारा जीता गया प्लासी युद्ध, 1818 में कोरेगांव के मैदान ए जंग में उतरने वाले योद्धाओं के प्रेरणास्रोत थे। इस प्रकार यह दोनों ही युद्ध अद्वितीय था।
पश्चिम बंगाल के नदिया जिले में प्लासी युद्ध में लड़े वीर सैनिकों की स्मृति में, एक विजय स्तम्भ बना हुआ है। बहुजनों को इसके संबंध में अभी पर्याप्त जानकारी और जागरूकता नहीं है। परन्तु प्लासी विजय स्तम्भ के प्रति भी कोरेगावं विजय स्तम्भ की भांति अपने पूर्वजों की त्याग, संघर्ष और बहुजन गौरव के प्रतीक के रूप में पहचान स्थापित करने की आवश्यकता है। इसके लिए बहुजनों को प्रति वर्ष 23 जून को नदिया जा कर कृतज्ञता और सम्मान प्रकट करने की परंपरा विकसित करने की तथा विजय दिवस मानाने की आवश्यकता है; इससे मूलनिवासी बहुजन समाज को अपने समाज की मुक्ति के लिए पूर्वजों की वीरता और त्याग से प्रेरणा और उर्जा प्राप्त होगी।


लेखक विजय कुमार त्रिशरण झारखंड में रहते हैं। विभिन्न प्रकाशन समूहों से इनकी किताबें प्रकाशित हो चुकी है।

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