
जन्म लेना शुभ है, मृत्यु होना अशुभ। हर दिन कोई न कोई जन्म लेता है, और हर दिन किसी न किसी की मृत्यु होती है। इसलिए मैं हर दिन को एक समान मानता आया हूं। मैंने 17 दिसंबर को जन्म लिया था। साल नहीं बताऊंगा, क्योंकि आप यकीन नहीं करेंगे और मुझसे युवा बने रहने का नुस्खा पूछने लगेंगे। लेकिन अब मैं खुद को सीनियर घोषित कर सकता हूं। मैंने यह मान लिया है कि मैं बचपने से बाहर आ चुका हूं और युवावस्था के शीर्ष पर हूं।

आज पहली बार है जब जन्मदिन पर कुछ लिख रहा हूं। हाशिये के समाज से ताल्लुक रखने वाले करोड़ों लोगों की तरह हमारे घर में जन्मदिन मनाने का कभी चलन नहीं रहा। चमरौटी के एक कोने में फूस के घेरे (जिसे हमारे पूर्वज घर कहते थे) में हमारी कई पीढ़ियां पेट भरने को गेहूं की रोटी को तरसती रही। दादा-परदादा कलकत्ता गए, वहां अंग्रेजों/ पूंजीपतियों के जूट मिल में मजदूरी की तो पिता और परिवार का पेट भरा। पिता परिवार के पहले ग्रेजुएट बने, तब तक देश आजाद हो गया था, बाबासाहेब ने संविधान लिखा, उसमें आरक्षण की व्यवस्था की, तब जाकर इस देश के हर संसाधन पर कब्जा कर के बैठे लोगों ने हमारे लिए कुछ नौकरियां मजबूरी में छोड़ी। पापा अशर्फी दास खानदार के पहले व्यक्ति थे, जो सिविल कोर्ट में लिपिक (क्लर्क) बनें।
अगर आप पूछेंगे कि आगे क्या करना है, तो मेरा जवाब होगा देश के हर हिस्से में वंचित समाज के बीच पहुंचना मेरे जीवन का उद्देश्य है। दलित-आदिवासी समाज के भीतर भी कई रंग हैं। हर प्रदेश में इस समाज का अपना इतिहास, अपनी परंपरा, जीवन जीने का अपना तरीका है। उन सारी कहानियों, परंपराओं, लोक गीतों, रिवाजों को आप सब को दिखाना चाहता हूं। दिल्ली में बैठे-बैठे मन उकताने लगा है। जीवन एकरस लगने लगा है, इसको तोड़ना चाहता हूं। बस भ्रमण पर निकल जाता चाहता हूं। बहुत सारे अनुभव समेटना चाहता हूं। आपलोगों से उन अनुभवों को बांटना चाहता हूं। उम्मीद है कि आपके गांव-शहर आऊंगा तो आप छत और रोटी जरूर देंगे। देंगे न??
बाकी, आप सबका दिया मान-सम्मान और स्नेह मेरे होने को सार्थक करता है। किसी व्यक्ति को समाज महत्वपूर्ण बनाता है। मैं आपलोगों के प्यार से अभिभूत हूं, नतमस्तक हूं। इसके बावजूद मैं यह मुगालता कभी नहीं पालता कि मैं बहुत महान काम कर रहा हूं या फिर मैं कोई “महत्वपूर्ण” व्यक्ति हूं और मुझे हर कोई जानता है। हम सब अपनी-अपनी जगह महत्वपूर्ण हैं, और हमसे ज्यादा महत्वपूर्ण हमारा काम है। क्योंकि यही हमारी पहचान है। यही वजह है कि थोड़ा छिपा रहता हूं, थोड़ा कम बोलता हूं। क्योंकि जरूरी है कि हमारा काम बोले। आखिर में जन्मदिन की बधाई देने वाले सभी मित्रों, शुभचिंतकों का धन्यवाद, बड़ों से आशीर्वाद की अपेक्षा करता हूं और मित्रों से स्नेह की। उम्मीद करता हूं कि मैं भविष्य में अपने सपनों को पूरा करने के लिए जो फैसला करूं, मेरे नजदीकी, मेरे परिवार के लोग मेरा साथ देंगे।
अशोक दास (अशोक कुमार) दलित-आदिवासी समाज को केंद्र में रखकर पत्रकारिता करने वाले देश के चर्चित पत्रकार हैं। वह ‘दलित दस्तक मीडिया संस्थान’ के संस्थापक और संपादक हैं। उनकी पत्रकारिता को भारत सहित अमेरिका, कनाडा, स्वीडन और दुबई जैसे देशों में सराहा जा चुका है। वह इन देशों की यात्रा भी कर चुके हैं। अशोक दास की पत्रकारिता के बारे में देश-विदेश के तमाम पत्र-पत्रिकाओं ने, जिनमें DW (जर्मनी), The Asahi Shimbun (जापान), The Mainichi Newspaper (जापान), द वीक मैगजीन (भारत) और हिन्दुस्तान टाईम्स (भारत) आदि मीडिया संस्थानों में फीचर प्रकाशित हो चुके हैं। अशोक, दुनिया भर में प्रतिष्ठित अमेरिका के हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में फरवरी, 2020 में व्याख्यान दे चुके हैं। उन्हें खोजी पत्रकारिता के दुनिया के सबसे बड़े संगठन Global Investigation Journalism Network की ओर से 2023 में स्वीडन, गोथनबर्ग मे आयोजिक कांफ्रेंस के लिए फेलोशिप मिल चुकी है।



मै २००८ मे retd हुआ, हरियाणा मे जॉर्नलिस्ट बनना चाहता था, किन्ही २ पत्रकारों ने संस्तुति नहीं दी, आज अध्यापक हूँ, मगर टिस आज भी की पत्रकारिता मे हम क्यो नहीं आ सकते? MA pub adm, Net,STET, BA Tourism, BEd, एक्स आर्मी, अब जूनियर अध्यापक। सामाजिक/ नागरिक पत्रकार
पत्रकारिता क्या है, आप लिखना शुरू करिए, आपका स्वागत है। आप अलग-अलग विषयों पर लिखिए। मुझे ई-मेल करिए। dalitdastak@gmail.com