अदालतें संवैधानिक नैतिकता के नाम पर सरकार की कार्रवाई को  असंवैधानिक  न ठहराएं.: रविशंकर प्रसाद

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जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली 25.12.2018) के हवाले से,  अगर संवैधानिक नैतिकता सरकार की कार्रवाई की कसौटी है तो इसे एकदम स्पष्ट परिभाषित किये जाने की जरूरत है, यह अलग-अलग न्यायाधीशों के लिए भिन्न नहीं हो सकतीं. इसमें हर हाल में सहमति और समरूपता होनी चाहिए. यह भी कि संवैधानिक नैतिकता स्पष्ट होनी चाहिए.
यह बात कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने संविधान दिवस के मौके पर विज्ञान भवन में आयोजित समारोह में बोलते हुए कही. कानून मंत्री यह टिप्पणी इस लिहाज से महत्वपूर्ण है कि कई बार अदालतें संवैधानिक नैतिकता के नाम पर सरकार की कार्रवाई को असंवैधानिक ठहरा देती हैं. ऐसे में कानून मंत्री का संवैधानिक नैतिकता को स्पष्ट परिभाषित किये जाने और उसके न्यायिक मानक तय किये जाने की जरूरत पर बल देने के मायने निकलते हैं. कानून मंत्री के इस बयान में क्या यह अंतरनिहित नहीं लगता कि अदालतो को सरकार कैसे ही भी काम हों — नैतिक अथवा अनैतिक, उन पर सवाल खड़े किए जाने चाहिएं.
संवैधानिक नैतिकता को परिभाषित करने की जरूरत पर बल देते हुए कानून मंत्री ने कहा कि हमने संवैधानिक नैतिकता के बारे में काफी सुना है. मै सम्मान के साथ कहना चाहता हूं कि इसे बहुत बारीकी से स्पष्ट किये जाने की जरूरत है. यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि जब सरकार की कार्रवाई को संवैधानिक नैतिकता के आधार पर संविधान की खिलाफत करने वाला बताया जाता है तो फिर उसके बारे में हर हाल में न्यायिक मानक तय होने चाहिए जिनके आधार पर उसका निर्धारण हो. जैसे अनुच्छेद 14 ‘समानता’ और अनुच्छेद 21 ‘स्वतंत्रता’ के अधिकार का मुद्दा.
मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने कहा कि  संविधान की सलाह नहीं मानना अव्यवस्था की ओर ले जाएगा. उन्होंने संविधान की खासियतों का उल्लेख करते हुए कहा कि यह मुश्किल समय में मार्ग दर्शन करता है. हमारे लिए हितकारी है कि हम इसकी सलाह पर ध्यान दें. अगर ऐसा नहीं करेंगे तो हमारे हठ का नतीजा तेजी से अवसान और अव्यवस्था की ओर ले जाएगा. उन्होंने यह भी कहा कि संविधान दिवस सिर्फ समारोह मनाने का मौका नहीं है बल्कि हमे भविष्य का रोडमैप तैयार करना चाहिए. जस्टिस गोगोई ने कहा कि शुरूआत में हमारे संविधान को जटिल और बड़ा बताकर आलोचना की गई थी लेकिन पिछले सात दशकों ने साबित कर दिया कि यह कितना अच्छा है.
इस आयोजन के के राम मन्दिर का मुद्दा उठाते हुए न्यायधीश/शों  के सामने रविशंकर जी ने कहा कि  फास्ट ट्रैक कोर्ट में सुना जाए मंदिर केस. यह भी कि कानून मंत्री ने इसे करोड़ों हिंदुओं की आस्था का सवाल बताते हुए मंदिर विवाद को जल्द सुलझाने का अनुरोध किया.  …. सनझ नहीं आया कि ये उनका जस्टिस गोगोई को कोई सुझाव है अथवा कुछ और…. मुझे तो लगता है कि उनका सुझावे अपरोक्ष रूप से अदालत पर राजनीतिक द्वाब बनाने का एक राजनीतिक तरीका है. हैरत की बात तो ये रही कि केंद्रीय मंत्री की बात सुनते ही दर्शक दीर्घा में बैठे अधिवक्ता ‘जय श्रीराम’ के नारे लगाने लगे.
अफसोस तो ये रहा कि उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के जज और सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस को नंदलाल बोस द्वारा लिखी गई संविधान की ‘मूल प्रति’ भेंट की. किताब के प्रथम पन्ने का जिक्र करते हुए कानून मंत्री ने कहा कि मौजूदा संविधान से पहले ही पश्चिम बंगाल के नंदलाल बोस ने इस संविधान को लिख दिया था. इस पर महात्मा गांधी से लेकर डॉ. राजेंद्र प्रसाद तक के हस्ताक्षर हैं. मेरे मतानुसार रविशंकर जी का ये बयान एकदम तथ्यों से मेल नहीं खाता क्योंकि में  26 लोगों की संविधान कमैटी में न तो नन्दलाल बोस का नाम ही शामिल है. संदर्भ हेतु मैं उन 26 लोगों के नाम भी यहाँ देदे रहा हूँ.
पंडित जवाहर लाल नेहरू (सबसे पहले प्रधान मंत्री), सरदार वल्लभ भाई पटेल, आचार्य जे बी कृपलानी, सरोजिनी नायडू, गोविंद वल्लभ पंत, बाबा साहेब डॉं. बी आर अंबेडकर (ये संविधान का मसौदा तैयार करने वाली समिति के अध्यक्ष थे. इन्हें संविधान का निर्माता माना जाता है.), शरत चंद्र बोस, सी राजगोपालाचारी (इन्हें राजाजी के नाम से जाना जाता है), डॉं. सच्चिदानंद सिन्हा (संविधान सभा के अस्थायी अध्यक्ष थे.), ए कृष्णास्वामी अय्यर- (संविधान का मसौदा तैयार करने वाली समिति के 6 सदस्यों में से एक थे.), बी पट्टाभि सीतारमैया- (संविधान सभा में हाउस कमेटी के अध्यक्ष थे.), के एम मुंशी, जी वी मावलंकर- (संविधान सभा की कार्रवाई समिति के अध्यक्ष  व लोकसभा के पहले अध्यक्ष थे.), एच सी मुखर्जी- (संविधान सभा में अल्पसंख्यकों की उपसमिति के अध्यक्ष थे.), गोपीनाथ बारदोलोई, ए वी ठक्कर- (संविधान सभा में असम को छोड़कर अन्य क्षेत्रों की उपसमिति के अध्यक्ष थे.),   बी एल मित्तर-( ये संविधान का मसौदा तैयार करने वाली समिति के 6 सदस्यों में से एक थे.), सैयद मोहम्मद सादुह- (संविधान का मसौदा तैयार करने वाली समिति के 6 सदस्यों में से एक थे.), डी पी खैतान-( ये संविधान का मसौदा तैयार करने वाली समिति के 6 सदस्यों में से एक थे.), बी एन राव- (संविधान सभा के सलाहकार थे.), माधव राव- (बी एल मित्तर के इस्तीफे के बाद इन्हें संविधान की मसौदा निर्माण समिति का सदस्य नियुक्त किया गया था.), टी टी कृष्णमाचारी- (डी पी खैतान के निधन के बाद इन्हें ही संविधान का मसौदा तैयार करने वाली समिति में जगह दी गयी थी.), एन गोपालस्वामी अयंगर- (संविधान का मसौदा तैयार करने वाली समिति के 6 सदस्यों में से एक थे.), श्री हरे कृष्ण महताब- (यह संविधान सभा के सदस्य थे), एम आसफ अली- (यह संविधान सभा के सदस्य थे.) तथा भारत की जनता- संविधान के निर्माण में, उसके अनुपालन में और उसके प्रति आस्था की अभिव्यक्ति में भारतीय जनता का स्थान सर्वोपरि है, क्योंकि यह पूरा संविधान हम भारत के लोगों के द्वारा ही अंगीकृत और आत्मार्पित है.
ये बात सही है कि आजादी मिलने से पहले ही स्वतंत्रता सेनानियों के बीच संविधान निर्माण की बात होने लगी थी. तब उन्होंने एक संविधान सभा का गठन किया. संविधान सभा की पहली बैठक 9 दिसंबर 1946 को संसद भवन के सेंट्रल हॉल में हुई. संविधान सभा के कुल 389 सदस्य थे, लेकिन उस दिन 200 से कुछ अधिक सदस्य ही बैठक में उपस्थिति हुए. हालांकि 1947 में देश के विभाजन और कुछ रियासतों के संविधान सभा में हिस्सा ना लेने के कारण सभा के सदस्यों की संख्या घटकर 299 हो गयी.
दुनिया के सबसे बडे़ लोकतंत्र के लिये संविधान निर्माण कोई आसान काम नहीं था, तभी इसके निर्माण में 2 साल 11 महीने और 17 दिन लगे. इस दौरान 165 दिनों के कुल 11 सत्र बुलाये गये. देश की आजादी के कुछ दिन बाद 29 अगस्त 1947 को संविधान सभा ने संविधान का मसौदा तैयार करने के लिये डॉं. भीमराव अंबेडकर के नेतृत्व में ड्राफ्टिंग कमेटी का गठन किया. 26 नवंबर 1949 को हमारा संविधान स्वीकार किया गया और इसके कुछ अर्टिकिल लागू भी कर दिए किंतु पूर्ण रूप 24 जनवरी 1950 को 284 सदस्यों ने इस पर हस्ताक्षर करने 26 जनवरी 1950 को हमारा सिंवधान लागू किया गया तो उसके साथ ही संविधान सभा भंग कर दी गयी.
यथोक्त के आलोक में पता नहीं रवि शंकर जी कहते है कि नन्दलाल बोस ने जो संविधान लिखा वर्तमान संविधान से पहले लिखा गया था जिस पर गान्धी जी और डा. राजेन्द्र प्रसाद जी के हस्ताक्षर भी है. भला नन्दलाल बोस ने किस अधिकार के चलते ऐसा किया गया होगा, इसके उल्लेख भी नहीं किया गया है. दूसरे यह कि संविधान को 26 लोगों की अधिकारिक टीम को सविधान  बनाने में 2 साल 11 महीने और 17 दिन लगे, अब नन्दलाल बोस जी को कि तथाकथित संविधान को बनाने में कितना समय लगा होगा. वैसे भी नन्दलाल जी के पास इतने संशाधन ही न थे जिससे वो इस प्रकार का कोई काम कर सकते. बता दें कि नन्दलाल बोस का जन्म दिसंबर 1882 में बिहार के मुंगेर नगर में हुआ. उनके पिता पूर्णचंद्र बोस ऑर्किटेक्ट तथा महाराजा दरभंगा की रियासत के मैनेजर थे. 16 अप्रैल 1966 कोलकाता में उनका देहांत हुआ. उन्होंने 1905 से 1910 के बीच कलकत्ता गवर्नमेंट कॉलेज ऑफ़ आर्ट में अबनीन्द्ननाथ ठाकुर से कला की शिक्षा ली, इंडियन स्कूल ऑफ़ ओरियंटल आर्ट में अध्यापन किया और 1922 से 1951 तक शान्तिनिकेतन के कलाभवन के प्रधानाध्यापक रहे.
अब देखने की बात ये है कि जो नन्दलाल बोस जी 1922 से 1951 तक शान्तिनिकेतन के कलाभवन के प्रधानाध्यापक रहे. अब ये कैसे माना जा सकता है कि नन्दलाल् बोस ने अपने स्तर पर किसी संविधान की रचना की होगी. हाँ! ये सच है कि एक केन्द्रीय मंत्री के प्रस्ताव पर विख्यात चित्रकार नंदलाल बोस को भारतीय संविधान की मूल प्रति को अपनी चित्रों से सजाने का मौका दिया गया था. नंदलाल बोस की मुलाकात पं. नेहरू से शांति निकेतन में हुई और वहीं नेहरू जी ने नंदलाल को इस बात का आमंत्रण दिया कि वे भारतीय संविधान की मूल प्रति को अपनी चित्रकारी से सजाएं. 221 पेज के इस दस्तावेज के हर पन्नों पर तो चित्र बनाना संभव नहीं था. लिहाजा, नंदलाल जी ने संविधान के हर भाग की शुरुआत में 8-13 इंच के चित्र बनाए. संविधान में कुल 22 भाग हैं. इस तरह उन्हें भारतीय संविधान की इस मूल प्रति को अपने 22 चित्रों से सजाने का मौका मिला. इन 22 चित्रों को बनाने में चार साल लगे. इस काम के लिए उन्हें 21,000 मेहनताना दिया गया. नंदलाल बोस के बनाए इन चित्रों का भारतीय संविधान या उसके निर्माण प्रक्रिया से कोई ताल्लुक नहीं है. वास्तव में ये चित्र भारतीय इतिहास की विकास यात्रा हैं. सुनहरे बार्डर और लाल-पीले रंग की अधिकता लिए हुए इन चित्रों की शुरुआत होती है भारत के राष्ट्रीय प्रतीक अशोक की लाट से. अगले भाग में भारतीय संविधान की प्रस्तावना है, जिसे सुनहरे बार्डर से घेरा गया है. मैं समझता हूँ कि नन्दलाल बोस जी द्वारा बनाए गए अन्य चित्रों का उल्लेख करता विषय संगत नहीं है.
चर्चा तो ये भी है कि राफेल केस के चलते हमारे कानून मंत्री और प्रधान सेवक ने नवनियुक्त चीफ जस्टिस गोगोई से उनके घर पर नहीं अपितु गोगोई जी के कार्यालय/ कोर्ट परिसर में मिले थे. इस फोटो के नीचे लिखा हुआ है, “अब जरा सोचिए इतिहास में पहली बार कोई पीएम प्रोटोकॉल तोड़कर किसी न्यायाधीश से मिलने उसके घर पहुंच जाए. उसके बाद तो क्लीनचिट मिलनी ही है.”
इसी बीच जब राफेल के मामले में सुप्रीम कोटे राफेल मामले क्लीन चिट दे दी जाती है तो लोगों का ये कयास लगाना शायद गलग नहीं होगा कि हो सकता कोर्ट का ये निष्कर्ष राजनीतिक दवाब में लिया गया फैसला है. … इसलिए भी कि जब विपक्ष और अन्य बुद्धीजीवियों द्वारा इस प्रकरण को जनता के बीच जोरों से उछाल दिया तो सरकार सुप्रीम कोर्टे में तथ्यात्मक सुधार करने के लिए याचिका दायर कर दी है जिससे सिद्ध होता है कि सरकार के द्वारा कोर्टे में गलत जानकारियां दी गई हैं. खैर! अब मूल मुद्दे पर आते है कि कानून मंत्री द्वारा दिए गए बयान से एक तीर से तीन शिकार करने जैसा है. पहला – अदालतों की कार्यप्रक्रिया पर अपरोक्ष रूप से सरकार के दवाब मानवाना कि सरकार के द्वारा किए गए किसी भी काम को संवैधानिक ढांचे में ढालें, दूसरे – राम मन्दिर का मुद्दा उठाकर सरकार ने अदालत को जैसे चुनौती ही है कि राममन्दिर का फैसला जल्दी जल्दी किया जाए. रविशंकर 2019 के चुनावों की चिंता भी सता रहा है तभी तो राममन्दिर के निर्माण का मुद्दा उठाकर वो रामभक्तों को ये संदेश देना चाहते हैं कि प्रयासों में को कमी नहीं रही है.  और तीसरे – नन्दलाल बोस को अधिकारिक संविधान से पहले की रचना का श्रेय देकर वो अधिकारिक संविधान समिति के सदस्यों और डा. अम्बेडकर के संविधान निर्माण के काम को नकार कर समिति के सदस्यों का अपमान भी करते हैं….. मूल रूप से मंत्री जी यहाँ बाबा साहेब अम्बेडकर की छवि को धूमिल करने का प्रयास करते दिखते हैं.

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