संविधान में संशोधन पर्याप्त नहीं, समाज को सोच बदलने की जरूरत

आज कल देश में समान नागरिक संहिता की बहस संसद से लेकर धर्मगुरूओं की पंचायत तक डिबेट का विषय बना हुआ है. लेकिन भारत में संविधान का कानून तो है, मगर जो संविधान धर्मनिरपेक्षता और अस्पृश्यता की बात करता है उसी देश में धर्म और जाति के नाम पर दंगे, हत्यायें और शोषण हो रहे हैं. इसका कारण धर्मों के कट्टर पंथी लोगों का समाज के बड़े हिस्से पर मानसिक रूप से पकड़. भारत का संविधान विश्व का सबसे बडा़ संविधान है. यहां विभिन्न धर्मों और जातियों के लोग रहते हैं. ये जरूरी है कि एक देश के संविधान और एक राष्ट्रीय ध्वज के नीचे निवास करने वाले नागरिकों के लिए समान अधिकार और समान संहिता अवश्य ही होनी चाहिए.

देश के संविधान के भाग 3 में अनुच्छेद 12 से 35 तक नागरिकों को मूल अधिकार दिए गये है. ये मूल अधिकार विभिन्न प्रकार की स्वतंत्रतायें देश के नागरिकों को प्रदान करते हैं. लेकिन अधिकारों के साथ-साथ भाग 4क के अनुच्छेद 51क में मूल कर्तवय भी दिये गये हैं. देश में समस्याएं इसलिए भी पैदा हो रही हैं कि हम अधिकारों की मांग तो करते हैं मगर कर्तव्यों को नकार देते हैं. मुस्लिम समाज में ज्यादातर सरिया और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का कानून अभी तक हावी रहा है. तलाक के लिए मात्र तीन बार तलाक-तलाक कहकर तलाक को स्वीकार करना संविधान के दायरे से बाहर का कानून है, जिसको अवश्य ही संविधान के कानून के दायरे में लाया जाना चाहिए.

सिर्फ कानून बनाकर और संविधान में संशोधन करके समाज और देश में परिवर्तन नहीं लाया सकता. लोगों को भी अपनी सोच बदलने होग. लोगों को अपनी संकीर्ण मानसिकता में संशोधन कर संविधान के अनुरूप आचरण और व्यवहार करने की जरूरत है. आज मुस्लिम धर्म के लिए समान नागरिक संहिता चर्चा का विषय बना हुआ है. ये भी हकीकत है कि संविधान में पहले जो 6 मूल अधिकार दिये गये हैं क्या आजादी के 69 वर्ष बाद भी इन कानूनों का क्या हिंदू धर्म के समाज ने पूरी निष्ठा और ईमानदारी से पालन किया है? अनुच्छेद “17” अस्पृश्यता के उन्मूलन के लिए बना है. मगर अस्पृश्यता के कारण यहां शहीदों को भी जलाने के लिए दो गज जमीन नसीब नहीं होती है. जबकि अनुच्छेद 15 राज्य को आदेश देता है कि किसी भी नागरिक के साथ केवल धर्म, जाति, मूलवंश, लिंग, जन्म-स्थान या इनसे किसी भी आाधार पर विभेद न करें.

आज भी देश में महिलाओं को वो संवैधानिक अधिकार पूर्ण रूप से हांसिल नहीं हुए हैं. महिलाओं को मंदिर प्रवेश से रोका जाता है. वंचित वर्ग जिसको दलित की उपाधि से नवाजा गया है मस्जिद, गुरूद्वारे, चर्च में तो जा सकता है मगर मंदिर में नहीं. कानून में दहेज देना और लेना दोनों अपराध की श्रेणी में आते हैं मगर देश में हर वर्ष हजारों दुल्हनें उत्पीड़न का शिकार होती हैं. हजारों की निर्मम हत्या कर दी जाती है. ये समाज की संकीर्ण सोच ही तो है. कन्या भ्रूण हत्या को रोकने के लिए सन 1994 में एक अधिनियम बनाया गया जिसमें गर्भ में पल रहे बच्चे का लिंग की जांच करना या करवाना कानूनन अपराध है. मगर इस कानून को भी लोगों ने धन कमाने का जरिया बना लिया है. समाज की संवेदनहीनता के कारण आये दिन कूडे़दानों, झाड़ियों, और नालियों में कन्याभ्रूण फेंक दिये जाते हैं. ये सब हमारी परंपरागत धर्मिक मान्यताओं का ही कारण है जो समाज में बेटे को ज्यादा महत्व देते हैं और उसे कुल का वारिस समझा जाता है. बेटियों को अलग समझा जाता है.

हम संविधान से अधिकारों की ही अपेक्षा रखते हैं पुरानी कुरीतियों और अंधविश्वास को त्यागना नहीं चाहते. दूसरी बात भारत की वर्तमान राजनीति भी समाज में परिवर्तन को जल्दी नहीं देखना चाहती है. कारण स्पष्ट है कि चुनावी मुद्दों के लिए जाति और धर्म ही एक मात्र सत्ता तक पहुंचने की सीढ़ी बन चुकी है. एक और कड़वा सच ये भी है कि राजनीति में साधुओं, धर्मगुरुओं, शंकराचार्यों, को दखल नहीं करनी चाहिए. विज्ञान और तकनीक के युग में देश के युवाओं को बौद्धिक रूप से सशक्त करने, अंधविश्वास से दूर रहने तथा महिलाओं और वंचितों को बराबरी के अधिकार देने हेतु आहवान करने की जरूरत है. सिर्फ हिंदू-हिंदू और इस्लाम-इस्लाम रटाकर देश 21 सवीं सदी के विज्ञान के मुहाने पर खडा़ नहीं हो सकता. अब्दुल कलाम साहब के सपनों का भारत नहीं बन सकता. इसके लिए हम सब को मिलकर रूढी़वाद से लड़ना होगा. भ्रष्टाचार से लड़ना होगा. जातिवाद को खत्म करना होगा. सिर्फ और सिर्फ संविधान के आदर्शों और समाज सुधारकों के आदर्शों पर चलने के लिए नई चेतना देश में जगानी होगी. अन्यथा संविधान में चाहे कितने संशोधन कर नये कानून बनाये जायें, जब तक भारतीय समाज रूढ़ियों और फतवाओं से ऊपर उठ कर अपनी सोच में बदलाव नहीं कर लेता कानून बनाना सार्थक नहीं हो सकता.

लेखक प्रवक्ता (भौतिक विज्ञान) हैं. अल्मोडा़ (उत्तराखण्ड) में रहते हैं. संपर्क- iphuman88@gmail.com

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