
रांची। पिछले दिनों झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने एक ऐतिहासिक चट्टानों के साथ एक फोटो शेयर की थी। दरअसल वो कोई आम चट्टान नहीं थे, बल्कि झारखंड की धरोहर प्राचीन मेगालिथ, मोनेलिथ और जीवाश्म थे। झारखंड सरकार ने अपने इस धरोहर को संरक्षित करने और उसे यूनोस्को के विश्व धरोहर की सूची में शामिल करवाने की मुहिम शुरू कर दी है। प्रदेश के पर्यटन मंत्री सुदिव्य कुमार एक प्रतिनिधि मंडल के साथ इसके लिए यूनाइटेड किंगडम के दौरे पर हैं।
इस यात्रा में झारखंड सरकार और उससे जुड़ी साझेदार संस्थाओं ने लंदन स्थित एक अंतरराष्ट्रीय आर्कियोलॉजी संस्थान के साथ प्रारंभिक चर्चा भी पूरी कर ली है। झारखंड के कई जिलों में फैली यह मेगालिथिक विरासत आदिवासी समाज के सामाजिक जीवन, धार्मिक विश्वास, स्मृति-परंपरा और मृतक संस्कारों से गहराई से जुड़ी हुई है। बड़े-बड़े पत्थरों से बने स्मारक, खड़े पत्थर (Menhir), पत्थर की कब्रें और अनुष्ठान स्थल आदिवासी इतिहास की हजारों साल पुरानी परंपरा को दर्शाते हैं।
झारखंड की धरती पर खड़े हमारे प्राचीन मेगालिथ केवल पत्थर नहीं, बल्कि मानव सभ्यता की स्मृति हैं।
जैसे विश्व के अन्य मेगालिथ–मोनोलिथ, वैसे ही ये संरचनाएँ भी हमारी सांस्कृतिक विरासत की पहचान हैं।
उचित संरक्षण व वैश्विक मान्यता के साथ इन्हें UNESCO विश्व धरोहर का दर्जा दिलाने हेतु…— Hemant Soren (@HemantSorenJMM) January 13, 2026
विशेषज्ञों का मानना है कि यह पहल सिर्फ ऐतिहासिक धरोहर को बचाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे आदिवासी समाज की सांस्कृतिक पहचान को अंतरराष्ट्रीय मंच पर स्थापित करने में मदद मिलेगी। विश्व धरोहर का दर्जा मिलने से इन स्थलों के संरक्षण, शोध, पर्यटन और स्थानीय समुदाय की आजीविका को भी मजबूती मिल सकती है।
सरकारी सूत्रों के अनुसार, अगले चरण में इन स्थलों का वैज्ञानिक सर्वेक्षण, दस्तावेजीकरण और अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार मूल्यांकन किया जाएगा। इसके बाद यूनेस्को को प्रस्ताव भेजने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाएगी। इस पूरी प्रक्रिया में आदिवासी समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित करने पर भी जोर दिया जा रहा है, ताकि संरक्षण के साथ-साथ उनकी सांस्कृतिक स्वायत्तता बनी रहे।
नवभारत टाईम्स को दिये अपने बयान में मंत्री सुदिव्य कुमार ने कहा कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के नेतृत्व में झारखंड सरकार राज्य की अमूल्य मेगालिथिक-मोनोलिथिक विरासत के संरक्षण, पुनर्स्थापन एवं सतत प्रबंधन के लिए पूर्ण रूप से प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा कि सरका इस विरासत को केवल एक पुरातात्विक धरोहर नहीं, बल्कि आदिवासी समुदायों की जीवंत सांस्कृतिक पहचान के रूप में देखती है और इसके संरक्षण के लिए वैज्ञानिक पद्धतियों, सामुदायिक सहभागिता तथा अंतरराष्ट्रीय सहयोग के माध्यम से ठोस और दीर्घकालिक प्रयास किए जाएंगे।
दूसरी ओर आदिवासी संगठनों और सांस्कृतिक विशेषज्ञों ने इस कदम का स्वागत करते हुए कहा है कि लंबे समय से झारखंड की मूलवासी संस्कृति को नजरअंदाज किया जाता रहा है। यह पहल न केवल इतिहास के साथ न्याय करेगी, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़ने का काम भी करेगी।

डॉ. पूजा राय पेशे से शिक्षिका हैं। भारत की सभ्यता, संस्कृति और साहित्य में उनकी गहरी रुचि है। उनके द्वारा लिखी गई पुस्तक ‘आधी आबादी का दर्द’ खासी लोकप्रिय हुई थी।

