आदि धर्म आंदोलन की पृष्ठभूमि में कबीर, रैदास और मक्खलि गोसाल का आजीवक आंदोलन था : डाॅ. भूरेलाल 

पंजाब में बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में “आदि धर्म” के नाम से दलित कौम के धार्मिक आंदोलन को चलाने वाले महापुरुष बाबू मंगूराम मुग्गोवालिया जी की 14 जनवरी, 2022 को 136वीं जयंती थी। उन के जन्मदिन पर ‘भारतीय आजीवक महासंघ (ट्रस्ट)’ द्वारा ‘डा. धर्मवीर साहित्यिक एवं सांस्कृतिक मंच’ से एक विचार गोष्ठी का आनलाइन आयोजन किया गया। विचार गोष्ठी ‘बाबू मंगूराम और उन का आदि धर्म आंदोलन’ विषय पर केंद्रित थी। जिस की अध्यक्षता इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के डाॅ. भूरेलाल जी ने की। वक्ता के रूप में सी.एम.पी. डिग्री कालेज, इलाहाबाद के एसोसिएट प्रोफेसर डाॅ. दीनानाथ जी, श्री संतोष कुमार तथा अरुण आजीवक ने अपने अपने विचार रखे।
विचार गोष्ठी का आरंभ डाॅ. दीनानाथ जी के व्याख्यान से हुआ। अपने व्याख्यान में बाबू मंगूराम के आंदोलन पर चर्चा करते हुए डाॅ. दीनानाथ जी ने बताया कि, ”बाबू मंगूराम जी का ‘आदि धर्म आंदोलन’ धार्मिक आंदोलन था बाद में उस में राजनीतिक एजेंडा भी जुड़ा।”
आदि धर्म आंदोलन के बारे में दीनानाथ जी ने एकदम ठीक कहा कि वह दलितों का धार्मिक आंदोलन था। दलितों को समझना चाहिए कि उन की कुल समस्या धर्म की ही है। दलित कौम अन्य कौमों की तरह एक पृथक कौम है। पृथक कौम है इस का मतलब ही है कि दलित कौम की अपनी खुद की विचारधारा और परम्परा है जिन से मिल कर धर्म बनता है। दलित अपने धर्म को भुला बैठे जिस के कारण ये जबरदस्ती हिन्दू धर्म में गिने जाने लगे। हिन्दू धर्म में गिने जाने के कारण ही विरोधियों ने इन्हें हरिजन, अछूत, अस्पृश्य, नीच आदि नाम दिये थे। बाबू मंगूराम जी ने दलितों की इस मूल धार्मिक समस्या को जाना था। सब से बड़ी बात यह है कि वे इस समस्या के समाधान में दलित कौम के खुद के धर्म की ओर बढ़े थे।
दीनानाथ जी ने आगे बताया कि, ‘बाबू मंगूराम का आदि धर्म और इसी तरह का स्वामी अछूतानन्द जी का ‘आदि हिन्दू आंदोलन’ हमारे सद्गुरुओं कबीर-रैदास के आंदोलन के प्रभाव में चले थे जो पीछे आजीवक धर्म और परम्परा तक जाते हैं।’
दीनानाथ जी ने बहुत ही सटीक बात कही है। बाबू मंगूराम जी ने एक किताब लिखी थी जिस का नाम है ‘आदि धर्म मंडल रिपोर्ट 1931’ जिस में उन्होंने साफ तौर पर लिखा है कि ‘हम आदि धर्मी हैं। हम हिन्दू के भाग नहीं हैं और ना हिन्दू हमारा भाग हैं।’ ठीक इसी तरह से मध्यकाल में हमारे कबीर और रैदास ने कहा था ‘ना हिन्दू ना मुसलमान’। एक तरफ वे ना हिन्दू ना मुसलमान कह रहे थे और दूसरी तरफ अपने कौम की परम्परा बता कर दलित धर्म की स्थापना भी कर रहे थे। बिल्कुल यही दृष्टि बाबू मंगूराम जी अपने समय में ले कर चले थे। बाबू मंगूराम आदि धर्म के रूप में दलित कौम के जिस धर्म की बात कर रहे थे वह अब हमारे सामने आ गया है। वह ‘आजीवक धर्म’ है जिस की खोज महान आजीवक चिंतक डाॅ. धर्मवीर ने की है।
अपने व्याख्यान में आगे दीनानाथ जी ने बहुत महत्वपूर्ण बात कही, उन्होंने कहा, ‘बाबू मंगूराम और स्वामी अछूतानन्द का कहना था कि हमारी संस्कृति, धर्म, इतिहास, चिंतन इन आर्यों से अलग हट कर है। उन्होंने इसे सिंधु सभ्यता से जोड़ा था। जबकि डा. अम्बेडकर का आंदोलन इन महापुरुषों के विपरीत चल रहा था। डा. अम्बेडकर वर्ण-व्यवस्था के अंदर अपने आप को रख कर चल रहे थे।’
दीनानाथ जी के इस वाक्य को सभी दलितों को ध्यान से समझना चाहिए। बाबू मंगूराम साफ साफ कह रहे थे कि हम हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, सिख नहीं हैं। जबकि डा. अम्बेडकर खुद को हिन्दू बता रहे थे और बाद में क्षत्रिय वर्ण के धर्म बौद्ध में धर्मांतरित हो गये। हजारों साल से दलितों की तरफ से जो स्वतंत्र धार्मिक आंदोलन चलाये जा रहे हैं उसे बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में बाबू मंगूराम और स्वामी अछूतानन्द ने आगे बढ़ाया था जबकि डा. अम्बेडकर दलित आंदोलन के विरोध में बुद्ध की शरण में चले गए।
विचार गोष्ठी में अगले वक्ता के रूप में अरुण आजीवक ने अपनी बात रखी, उन्होंने बताया-
“जाना जाए, बाबू मंगूराम जी को ‘हम हिन्दू नहीं हैं’ यह कहने की जरूरत क्यों पड़ी? कबीर – रैदास को भी ‘ना हिन्दू ना मुसलमान’ कहने की जरूरत क्यों पड़ी थी? इस का जवाब यह कि दलितों की लड़ाई धर्म की लड़ाई रही है। यह दलित धर्म और ब्राह्मण धर्म के बीच लड़ी जा रही है। मध्यकाल में ब्राह्मण ने हिन्दू धर्म के नाम पर दलितों को अपने साथ ले कर बहुसंख्यक बन कर इस्लाम के खिलाफ अभियान चलाने का षडयंत्र रचा था। आधुनिक काल में, अंग्रेजी सरकार द्वारा दलितों के कल्याण के लिए किये गये काम से प्रभावित हो कर दलित ईसाई बन रहे थे। इस समय भी ब्राह्मण द्वारा अंग्रेजों से राजनैतिक स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए हिन्दू धर्म के रूप में दलितों को साथ ले कर बहुसंख्यक बन कर लाभ उठाने का षडयंत्र रचा जा रहा था, वहीं दूसरी तरफ अपने हिंदू धर्मशास्त्रों के हवाले से दलितों को अछूत, अस्पृश्य, नीच भी घोषित किया जा रहा था। गांधी जी ने तो अपने से अलग बताते हुए ‘हरिजन’ के रूप में पहचान दे दी।
बाबू मंगूराम जी ब्राह्मण की कथनी-करनी की इस धूर्तता को बहुत गहराई से पहचाने थे। तभी उन्होंने आदि धर्म की गर्जना की और कहा कि हम हिन्दू नहीं हैं। मंगूराम जी ने किसी धर्मांतरण की बात न कर के आदि धर्म के रूप में दलितों के खुद के धर्म की बात की – यह कोई छोटी बात नहीं है। मंगूराम जी यह अच्छी तरह से समझ गए थे कि हमारे हक – अधिकार तभी सुरक्षित रह सकते हैं जब धर्म के रूप में हमारी स्वतंत्र पहचान स्पष्ट हो। धर्महीनता की स्थिति में ब्राह्मण दलितों पर अपनी पहचान थोपता है और फिर उन के सारे अधिकार अपने बता कर हड़प जाता है। उस का यह कहना रहता है कि मैंने तो रोटी खा ली है अब दलित को अलग से रोटी खाने की क्या जरूरत है।”
गोष्ठी के अगले वक्ता संतोष कुमार ने अपना व्याख्यान स्वामी अछूतानन्द जी की कविता ‘आदि-वंश का डंका’ के वाचन के साथ आरंभ की, जिस में वे कहते हैं-
“आर्य-शक-हूण बाहर से आये यहाँ, 
और मुसलिम ईसाई जो छाये यहाँ, 
                  खोलकर सारी बातें बताते चलो। 
                 आदि-हिन्दू का डंका बजाते चलो।।” 
इन पंक्तियों से साफ पता चलता है कि आदि हिन्दू आंदोलन दलित कौम की पहचान का आंदोलन था। इस के बाद संतोष कुमार ने बाबू मंगूराम के आदि धर्म आंदोलन पर पंजाब विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर डा. रौनकी राम द्वारा लिखे लेख को पढ़ा जो वेब पत्रिका फारवर्ड प्रेस में छपा है। जिस में बताया गया है, ‘बाबू मंगूराम और स्वामी अछूतानन्द के समर्थन के चलते ही बाबा साहेब डा. अम्बेडकर को भारत के दलित आंदोलन का नेतृत्व प्राप्त हुआ था।’
यह एकदम अकाट्य सत्य है। बताया जाए, स्वामी अछूतानन्द ने 1922 में दलितों के पृथक निर्वाचन क्षेत्र सहित 17 सूत्री मांग का एक ज्ञापन दिल्ली में आये प्रिंस आफ वेल्स को सौंपा था। पंजाब में भी बाबू मंगूराम जी दलितों के लिए स्कूल खोल रहे थे। वे सरकारी नौकरियों में दलितों के लिए आरक्षण की मांग कर रहे थे। पंजाब में दलितों के भूमि अधिकार के लिए मंगूराम जी संघर्ष कर रहे थे। इन तमाम दलित मुद्दों को ले कर दलितों के प्रतिनिधि के रूप में बाबा साहेब डा. अम्बेडकर लंदन में आयोजित गोलमेज सम्मेलनों में भाग लेने गए थे। गोलमेज सम्मेलन में दलित नेतृत्व को लेकर बाबा साहेब को गांधी के खास चुनौती का सामना करना पड़ा था। तब भारत से स्वामी अछूतानन्द और बाबू मंगूराम जी ने बाबा साहेब के समर्थन में तार भेजवाये थे। हमारे आदि आंदोलन के महापुरुषों के समर्थन के कारण ही डा. अम्बेडकर गोलमेज सम्मेलन में दलित नेतृत्व को गांधी से बचाने में सफल हो पाए थे। यह सारा इतिहास अब हमारे सामने आ चुका है जिसे महान आजीवक चिंतक डा. धर्मवीर जी ने अपने महान ग्रंथ ‘प्रेमचंद की नीली आंखें’ में लिपिबद्ध किया है।
वक्ताओं के व्याख्यान के बाद श्रोताओं से प्रश्न आमंत्रित किये गये। श्रोताओं में से रोहित कुमार ने एक महत्वपूर्ण प्रश्न किया – ‘स्वामी अछूतानन्द और बाबू मंगूराम की तरह आज के समय में हम किसे अपना नेतृत्वकर्ता मानें?’
बताया जाए, दलितों की समस्या धार्मिक रही है। ढाई हजार साल से दलित कौम धर्महीनता की स्थिति में रहती चली आयी है। धर्महीनता के चलते दलित कौम विरोधी धर्म की गुलाम बनी हुई है। धर्महीनता के कारण ही दलित घरों में जारकर्म ने पांव पसारे। धर्महीनता के कारण ही दलितों के सारे हक अधिकार उन से छिनते गए। धर्महीनता की मूल समस्या की पहचान डाॅ. धर्मवीर ने की। इस के समाधान में दलित कौम के धर्म ‘आजीवक’ की मुकम्मल खोज डाॅ. धर्मवीर ने की। प्राचीन काल में आजीवक धर्म की स्थापना करने वाले महान मक्खलि गोसाल और उन के दर्शन ‘नियतिवाद’ को डाॅ. धर्मवीर सामने ले कर आये। आजीवक महापुरुषों कबीर, रैदास के आंदोलन को भी डाॅ. साहब ही सामने ले कर आये। इस के साथ ही आजीवक धर्म का पर्सनल कानून ‘आजीवक सिविल संहिता’ भी डाॅ. साहब ने ही तैयार की। इस तरह डाॅ. धर्मवीर कम्प्लीट दलित चिंतन ले कर चलते हैं। इसलिए एकदम मजबूती के साथ पूरे अभिमान और गर्व के साथ कहा जा रहा है कि दलित कौम के पथ प्रदर्शक, दार्शनिक और चिंतक डाॅ. धर्मवीर हैं।
वक्ताओं के व्याख्यान के बाद गोष्ठी के अध्यक्ष डा. भूरेलाल जी ने बहुत ही विस्तृत और सारगर्भित वक्तव्य दिया। उन्होंने बताया कि, ‘1920 के दशक में पूरे भारत में आदि आंदोलन पांच शाखाओं में चल रहे थे। उत्तर प्रदेश में स्वामी अछूतानन्द के नेतृत्व में अखिल भारतीय स्तर का आदि हिन्दू आंदोलन, पंजाब में आदि धर्मी आन्दोलन तथा दक्षिण में आदि आंध्रा, आदि कर्नाटका तथा आदि द्रविड़ आंदोलन।’ उन्होंने बताया कि, ‘दलितों की तरफ से चलाये जा रहे ये सभी आंदोलन धार्मिक थे। धार्मिक आंदोलन के साथ साथ इन में राजनीतिक और आर्थिक मुद्दे भी समाहित होते गए। इस तरह ये सम्पूर्ण दलित आंदोलन बन गए थे।’ उन्होंने बताया कि,’ आदि आंदोलन कबीर-रैदास के आंदोलन की पृष्ठभूमि में चले थे और संत आंदोलन की पृष्ठभूमि में मक्खलि गोसाल का आजीवक आंदोलन था।’ इस तरह से प्राचीन से आधुनिक काल में चले दलित आंदोलनों की एक रूपरेखा सामने आ जाती है।
यहां बताया जाय कि, इतिहास में दलितों द्वारा लगातार आंदोलन किये जाते रहे हैं। उन आंदोलनों का इतिहास महान आजीवक चिंतक डाॅ. धर्मवीर ने उजागर कर दिया है। यह भी सामने आ चुका है कि दलित आंदोलन को दबाने के लिए द्विज किस तरह प्रक्षिप्त और किवदंती रचते रहे हैं। आधुनिक काल में भी द्विजों द्वारा आदि हिन्दू आंदोलन का विरोध किया जा रहा था। इस बारे में डाॅ. भूरेलाल जी ने बताया – ‘आदि हिन्दू आंदोलन एक व्यापक आंदोलन था। इस का विरोध कांग्रेस के कन्हैया लाल मिश्र प्रभाकर ने’ उत्तर प्रदेश स्वाधीनता संग्राम की झांकी’ किताब के माध्यम से किया था। चांद पत्रिका के मई 1927 के अछूत अंक द्वारा भी आदि हिन्दू आंदोलन का विरोध किया गया था। श्रीधर पाठक ने अपनी एक कविता के माध्यम से आदि हिन्दू आंदोलन का विरोध किया था। इस के अलावा लाहौर के अमीचंद शर्मा ने स्वामी अछूतानन्द के विरोध में’ श्रीवाल्मीकि प्रकाश’ नाम से एक पुस्तक लिखी थी।’
इस के अतिरिक्त, बताया जाय कि आदि हिन्दू आंदोलन के विरोध में द्विजों में जो सब से अग्रणी थे वह थे सामंत का मुंशी अर्थात प्रेमचंद। हिन्दू धर्म को सब से अधिक चुनौती स्वामी अछूतानन्द ने दी थी। इस के साथ ही स्वामी जी ने द्विजों के स्वाधीनता आंदोलन के पीछे छुपे षड्यंत्र को भी पहचाना था। चूंकि आदि आंदोलनों के पथ प्रदर्शक स्वामी अछूतानन्द जी थे इसलिए उन के विरोध में सामंत के मुंशी को उतरना पड़ा था। स्वामी जी के आंदोलन के विरोध में सामंत के मुंशी ने अपना उपन्यास ‘रंगभूमि’ लिखा था। इस उपन्यास की खोल-बांध डाॅ. धर्मवीर जी ने अपने महाग्रंथ “प्रेमचन्द की नीली आंखें” में की है।
दलित आंदोलन के विरोध में द्विज तो रहे ही हैं लेकिन दलित आंदोलन को नुकसान खुद दलितों द्वारा ही हुआ है। जी हाँ, आधुनिक काल में दलित आंदोलन के विरोध में खुद डाॅ. अम्बेडकर ही खड़े थे। इस बारे में डाॅ. भूरेलाल जी ने बहुत महत्वपूर्ण बात बतायी- ‘बाबू मंगूराम डा. अम्बेडकर के धर्मांतरण के पक्ष में नहीं थे। धर्म को ले कर पंजाब में डा. अम्बेडकर ने बाबू मंगूराम से भेंट की थी। धर्मांतरण की बात पर बाबू मंगूराम जी ने डा. अम्बेडकर से कड़े शब्दों में अपनी असहमति व्यक्त की थी।’
अपने व्याख्यान में डाॅ. भूरेलाल जी ने आगे बताया कि,’ आदि धर्म आंदोलन का अप्रोच बहुत मौलिक, बुनियादी और बहुत स्पष्ट था, लेकिन डा. अम्बेडकर ने इस आदि धर्मी आन्दोलन का समर्थन नहीं किया था। डा. अम्बेडकर अछूतों के इतिहास को वर्ण व्यवस्था के अंदर खोज रहे थे।’
तो, बाबू मंगूराम और डा. अम्बेडकर के आंदोलनों के अन्तर को यहाँ साफ साफ देखा जा सकता है। मंगूराम जी आदि धर्म के रूप में दलित कौम को स्वतंत्र ऐतिहासिक धर्म की तरफ ले जा रहे थे जबकि डा. अम्बेडकर धर्मांतरण के माध्यम से कौम को पराधीनता की तरफ ले जाने के पक्षधर थे। यह पूरा का पूरा विजन का अन्तर था। बाबू मंगूराम समेत आदि आंदोलन के समस्त महापुरुषों ने दलित कौम को एक स्वतंत्र कौम के रूप में देखा था। वे पूरी गहराई के साथ यह जान रहे थे कि हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, सिख आदि कौमों की तरह दलित कौम भी एक पृथक ऐतिहासिक कौम है जिस का खुद धर्म है। वहीं डा. अम्बेडकर दलित कौम को अलग कौम के रूप में देख ही नहीं सके थे। वे दलित कौम का इतिहास हिन्दू धर्म की वर्ण व्यवस्था के भीतर तलाश रहे थे।
अपने अध्यक्षीय व्याख्यान के अाखिर में डाॅ. भूरेलाल जी ने बहुत महत्वपूर्ण बात कही- “यह आंदोलन (आदि धर्मी) बहुत मूल्यवान और अनिवार्य विरासत है। हमारी ऐतिहासिकता और सांस्कृतिकता की अनिवार्य कड़ी है। कोई भी कौम आगे तभी बढ़ती है जब वह अपनी ऐतिहासिक परम्परा से सम्बद्ध रहती है, घनिष्ठ रूप से जुड़ी रहती है। दुनिया के किसी महापुरुष ने धर्मांतरण की बात नहीं की है। लेकिन यह बिडम्बना की बात है कि दलित कौम के महापुरुष डा. अम्बेडकर धर्मांतरण की अवधारणा ले कर आते हैं। जिस समय द्विज लोग हिन्दू के नाम पर अपने को बहुसंख्यक बना रहे थे उस समय धर्मांतरण की अवधारणा के चलते दलित कौम विभिन्न धर्मों में जा छिन्न भिन्न हो रही थी।”
गोष्ठी का संचालन इलाहाबाद विश्वविद्यालय के शोधाथी सुभाष गौतम ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन दिनेश पाल ने किया।
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रिपोर्ट – अरुण आजीवक

 मुलायम की बहू अपर्णा यादव का योगी कनेक्शन

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मुलायम सिंह यादव की बहू अपर्णा यादव के भाजपा में शामिल होने के बाद भाजपाई समाजवादी पार्टी को घेरने में व्यस्त हैं। तो दूसरी ओर स्वामी प्रसाद मौर्य की बेटी और भाजपा सांसद संघमित्रा मौर्य ने अपर्णा यादव बिष्ट पर निशाना साधते हुए सीएम योगी आदित्यनाथ से उनका कनेक्शन बता दिया है और भाजपा पर सवाल उठाया है। संघमित्रा मार्य ने अपर्णा बिष्ट यादव को योगी की चचेरी बहन बताया है। एक फेसबुक पोस्ट के जरिए विरोधियों को करारा जवाब देते हुए संघमित्रा मौर्य ने भाजपा समर्थकों पर सवाल उठाते हुए लिखा है-

संस्कार शब्द अच्छा है लेकिन संस्कार है किसके अंदर हफ्ते भर पहले एक बेटी का पिता पार्टी बदलता है तो  पुत्री पर वार हो रहा था, आज वही एक बहू अपने चचेरे भाई (योगी जी) के साथ एक पार्टी से दूसरी पार्टी में आती है तो स्वागत । क्या इसको भी वर्ग से जोड़ा जाना चाहिए कि बेटी  (मौर्य)  पिछड़े वर्ग की है और बहू (विष्ट) अगड़े वर्ग से है।

क्या बहन-बेटी की भी जाति और धर्म होता है ?

अगड़ा भाजपा में आता है तो राष्ट्रवादी और वो वोट भाजपा को करेगा या नही इसपे सवाल खड़ा करना तो दूर सोचा भी नही जाता, लेकिन पार्टी में रहने वाला राष्ट्रद्रोही, उसके वोट पे सवाल खड़े हो रहे ऐसा क्यों ? कृप्या सलाह न दे मैं कहाँ जाऊ क्या करूँ , मैं जहाँ हूं ठीक हूं।

दरअसल स्वामी प्रसाद मौर्य के भाजपा छोड़कर समाजवादी पार्टी ज्वाइन करने के बाद उनकी बेटी और भाजपा सांसद संघमित्रा मौर्य मनुवादियों के निशाने पर हैं। संघमित्रा के  भाजपा में बने रहने के बावजूद उनके खिलाफ तंज कसे जा रहे हैं और उन्हें नसीहतें दी जा रही है। तो पलटवार करते हुए संघमित्रा मौर्य ने न सिर्फ सीएम योगी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है, बल्कि विरोधियों को जमकर फटकार लगाई है और भाजपा पर सवाल उठाया है।

नारायण गुरू से डरी सरकार, केरल की झांकी को मंजूरी नहीं

हर साल गणतंत्र दिवस के मौके पर 26 जनवरी को राजपथ पर झांकी निकालने की परंपरा रही है। इस बार भी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की 12 और संवैधानिक संस्थानों की नौ झांकियां यानी कुल 21 झाकियां 26 जनवरी को राजपथ पर दिखेंगी। इस बार की थीम आजादी का अमृत महोत्सव है। लेकिन इस बार केरल, तामिलनाडु और पश्चिम बंगाल की झांकियों को जगह नहीं मिलने से हंगामा मचा है। खासकर केरल की झांकी को जगह नहीं मिलने से विवाद बढ़ गया है। केरल की झांकी महान समाज सुधारक नारायण गुरु पर आधारित थी। लेकिन रक्षा मंत्रालय ने मंजूरी नहीं दी है। इस खबर में बात केरल की झांकी की, नारायणा गुरू की।

केरल सरकार ने समाज सुधारक श्री नारायण गुरु और जटायु पार्क स्मारक की झांकी के लिए प्रस्ताव दिया था, लेकिन रक्षा मंत्रालय इसे आदि शंकराचार्य में बदलने पर जोर दे रही थी। केरल सरकार द्वारा ऐसा नहीं करने पर केरल की झांकी को गणतंत्र दिवस की परेड से खारिज कर दिया गया।

सवाल है कि आखिर रक्षा मंत्रालय को नारायण गुरू की झांकी से क्या दिक्कत थी? दरअसल सरकार नारायण गुरू से डर गई। क्योंकि नारायण गुरु ने अपने जीवन में जो बातें की और उससे केरल में जो क्रांति हुई, उस क्रांति के कारण केरल में आज तक हिन्दुत्व वादी ताकतें अपनी जड़ नहीं जमा सकी है।

नारायणा गुरू का जन्म केरल के तिरुअनतपुर के एक गांव में 22 अगस्त 1856 को हुआ था। बचपन से ही वह जातिवाद का विरोध करते थे। तब दलितों-शोषितों के मंदिर में जाने का अधिकार नहीं था। इसके विरोध में उन्होंने दक्षिण केरल में नैयर नदी के किनारे मंदिर बनाया जिसे अरुविप्पुरम के नाम से जाना जाता है। इसका काफी विरोध हुआ और ब्राह्मणों ने इसे महापाप करार दिया था। तब नारायण गुरु ने कहा था कि ईश्वर सबमें है। शिक्षा के क्षेत्र में भी उन्होंने काफी सुधार किया। पहले इन वर्गों के बच्चों पर सामान्य स्कूलों में पढ़ने पर प्रतिबंध था। नारायण गुरु के प्रयासों से आजादी से पहले ही यह प्रतिबंध हट गया।

कुल मिलाकर नारायणा गुरु ने केरल में या फिर पेरियार ने तामिलनाडु में जो क्रांति की, उसी का प्रभाव है कि आज भी दक्षिण भारत का दलित-शोषित वर्ग तमाम कर्मकांडों से दूर है।

बिहार में न्याय को तरस रहे हैं दलित, मजाक बना एससी-एसटी एक्ट

बिहार में दलितों के खिलाफ लगातार बढ़ रहे अत्याचार के मामले बेहद चिंताजनक हैं। लेकिन उससे बड़ी चिंता की बात यह है कि ऐसे मामलों में एससी-एसटी एक्ट होने के बावजूद उनको न्याय नहीं मिल पा रहा है।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बीते 23 दिसंबर को एससी-एसटी अधिनियम मामलों की समीक्षा बैठक की थी। इस बैठक में एससी-एसटी के ऊपर अत्याचार के मामलों और न्याय मिलने को लेकर जो आंकड़े सामने आए हैं, वो चौंकाने वाले हैं।

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, इस समीक्षा बैठक से पता चला है कि

  • वर्तमान में राज्य में एससी-एसटी अधिनियम से जुड़े कुल मामलों की संख्या 1,06,893 है
  • इनमें से 44,986 मामलों में न्याय नहीं मिला है
  • बीते 10 सालों में 44,150 मामलों में से सिर्फ 872 मामलों में ही फैसला

 बिहार पुलिस के आंकड़ों के मुताबिक एससी-एसटी अधिनियम के तहत सबसे अधिक

  • एससी-एसटी एक्ट में 2020 में 7,574, 2018 में 7,125 और 2017 में 6,826 मामले दर्ज

https://www.youtube.com/watch?v=Cx-T-GqaLxY  

नहीं मिल पा रहा है न्याय

रिपोर्ट के मुताबिक उत्पीड़न की घटनाओं में न्याय नहीं मिल पाने की वजह मामलों की संख्या ज्यादा होने का हवाला दिया जा रहा है। इसकी एक वजह यह भी है कि मामलों का निपटारा होने पर पीड़ितों को मुआवजा देना पड़ेगा, जिसकी वजह से भी न्याय मिलना दुभर होता जा रहा है। दरअसल हत्या के मामले में पीड़ित परिवारों को 8.5 लाख रुपये का मुआवजा मिलने का प्रावधान है।

 ऐसे मुआवजे के मामले में

  • 8,108 मामलों में अब तक सिर्फ 2,876 मामलों का ही निपटारा किया गया है और 5,232 मामले लंबित हैं।

इसका कारण फंड का नहीं होना बताया जा रहा है।

क्या कहते हैं नियम

 इन आंकड़ों के सामने आने के बाद बिहार में दलितों और आदिवासियों की दयनीय स्थिति की तस्वीर सामने आ जाती है। तो बिहार की सत्ता पर लंबे समय से बैठे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का भी दलितों को न्याय दिलाने के बारे में रवैया सवालों के घेरे में है। क्योंकि नियम के अनुसार एससी-एसटी की स्थिति पर हर छह महीने में समीक्षा बैठक होनी चाहिए जो आमतौर पर नहीं हुई। 4 सितंबर 2020 को समीक्षा बैठक के बाद मुख्यमंत्री की भी नजर इसपर पंद्रह महीने बाद गई और 23 दिसंबर 2021 को एससी-एसटी अधिनियम मामलों की समीक्षा बैठक हुई। इससे साफ है कि बिहार की सरकार, प्रशासन और आय़ोग दलितों और आदिवासियों के खिलाफ अत्याचार रोकने और उनको न्याय दिलाने के लिए गंभीर नहीं है।

http://योगी के गढ़ में चंद्रशेखर: टक्कर की लड़ाई या मीडिया स्टंट |Yogi Vs Chandrashekhar in GKP| Dalit Dastak

दरकने लगा भाजपा का अति पिछड़ा समीकरण

 उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2022 से पहले बीजेपी को झटके पर झटके लग रहे हैं। एक के बाद एक करीब सात विधायक बीजेपी का दामन छोड़ चुके हैं। इसमें स्वामी प्रसाद मौर्य और दारा सिंह चौहान जैसे कद्दावर नेता भी शामिल हैं, जो मंत्री पद से इस्तीफा दे चुके हैं। मौर्य के 14 जनवरी को समाजवादी पार्टी में शामिल होने की खबर है। तो दारा सिंह चौहान भी सपा का दामन थामने को तैयार हैं। आइए जानते हैं अब तक कितने विधायक बीजेपी छोड़ चुके हैं.

बीजेपी से इस्तीफा देने वाले विधायकों में कई अहम नाम हैं। इसमें पहला नाम है-

  1. रोशन लाल वर्मा
  • रोशन लाल वर्मा शाहजहांपुर के तिलहर से विधायक हैं
  • वह लोधी समाज से आते हैं
  • लगातार तीन बार विधायक रह चुके हैं
  • 12 सितम्बर 2016 को बीएसपी से बीजेपी में आए थे।
  1. बृजेश प्रजापति
  • बांदा जिले की तिंदवारी से विधायक है
  • 2017 में पहली बार विधायक बने
  • कुम्हार समाज से आते हैं
  • स्वामी मौर्या के करीबी हैं, बसपा सरकार में पिछड़ा वर्ग आयोग के सदस्य रह चुके हैं।
  • 2016 में ही मौर्य के बीजेपी में आने के बाद बसपा से बीजेपी में आए थे
  1.  भगवती प्रसाद सागर
  • कानपुर के बिल्हौर से विधायक हैं
  • पूर्व मंत्री हैं और 4 बार के विधायक हैं
  • अनुसूचित जाति में धोबी समाज से आते हैं
  • झांसी जिले से भी विधायक रह चुके हैं
  • 2016 में ही मौर्य के बीजेपी में आने के बाद बसपा से बीजेपी में आए थे.
  1. अवतार सिंह भड़ाना
  • पश्चिमी यूपी के मीरापुर से विधायक हैं
  • मेरठ और फरीदाबाद से सांसद रह चुके हैं
  • गुर्जर समुदाय के बड़े नेता माने जाते हैं
  • भड़ाना ने पिछले साल किसान आंदोलन का समर्थन करते हुए बीजेपी छोड़ने का ऐलान कर दिया था
  1. माधुरी वर्मा
  • बहराइच जिले की नानपारा विधानसभा सीट से विधायक हैं
  • माधुरी 2 बार विधायक रह चुकी हैं
  • 2012 में कांग्रेस के टिकट पर नानपारा सीट से विधानसभा सदस्य निर्वाचित हुईं थीं
  • 2017 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने कांग्रेस छोड़ भाजपा का दामन थामा
  1. अशोक कुमार वर्मा
  • अनुसूचित मोर्चा के प्रदेश महामंत्री रह चुके हैं। दलित समाज से आते हैं।
  1. दारा सिंह चौहान
  • इस्तीफा देने से पहले दारा सिंह चौहान हालिया योगी सरकार में उत्तर प्रदेश सरकार में वन्‍य एवं पर्यावरण मंत्री रह चुके हैं।
  • भाजपा में जाने से पहले वह बहुजन समाज पार्टी में थे। वह भी ओबीसी समाज से आते हैं। इसके अलावा 13 जनवरी को मंत्री धर्म सिंह सैनी, शिकोहाबाद से विधायक मुकेश वर्मा और औरया के बिधूना विधायक विनय शाक्य ने भाजपा से इस्तीफा दे दिया है।

हालांकि राजनीतिक गलियारों में कई और ओबीसी नेताओं के भाजपा छोड़ने के कयास लगाए जा रहे हैं। जिससे भाजपा को काफी नुकसान झेलना पड़ सकता है। ओबीसी नेताओं के लगातार पार्टी छोड़ने से भाजपा इसलिए घबराई है क्योंकि प्रदेश में पिछड़े वर्ग की जनसंख्या 43 से 45 प्रतिशत के करीब है। साल 2017 में भाजपा ने ओबीसी समाज को 125 सीट दिया था। इसी के बलबूते भाजपा ने चुनाव जीता था। स्वामी प्रसाद मौर्या का भाजपा छोड़ना इसलिए बड़ा झटका है क्योंकि वह कोइरी-कुशवाहा समाज से आते हैं। कोइरी कुशवाहा समाज का वोट प्रतिशत 5 प्रतिशत है, जिन पर स्वामी प्रसाद मौर्या की मजबूत पकड़ है। तो बाकी नेताओं की भी अपने-अपने वर्ग में पैठ है। ऐसे में भाजपा को इन वोटों से हाथ धोना पड़ सकता है, जो भाजपा के लिए चिंता का सबब बना हुआ है।

स्वामी प्रसाद मौर्या ने भाजपा को हिला दिया है

 उत्तर प्रदेश में चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आते जा रहे हैं, सत्ता की लड़ाई तेज होती जा रही है। और इस राजनैतिक लड़ाई में भाजपा की हवा टाईट होती जा रही है। 11 जनवरी को मंत्री पद और भाजपा से इस्तीफा देकर स्वामी प्रसाद मौर्या ने एक ऐसा धमाका कर दिया है, जिसकी गूंज एक दिन बाद तक सुनाई दे रही है।

मौर्या अपने साथ चार अन्य विधायकों को भी सपा में ले गए हैं, जिसमें दो मंत्री हैं। तो वहीं उनके इस दावे के बाद कि कतार में कई और भी विधायक हैं, भाजपा घबराई हुई है। भाजपा इतनी घबराई है कि एक ओर उसके नेता सिद्धार्थ सिंह कह रहे हैं कि पार्टी को कोई फर्क नहीं पड़ता तो दूसरी ओर अंदरखाने भाजपा मौर्य से वापसी की मिन्नते कर रही है। क्योंकि मौर्य जिस केईरी कुशवाहा समाज से ताल्लुक रखते हैं, प्रदेश में उसका वोट 5 प्रतिशत है। तो दारा सिंह चौहान भी अपने समाज में पैठ रखते हैं। दरअसल स्वामी प्रसाद मौर्य के इस झटके से यूपी की सियासत बदलने लगी है और भाजपा जिस ओबीसी के बूते पिछले पांच साल से उत्तर प्रदेश में और तकरीबन आठ साल से केंद्र में राज कर रही है, उसका यह किला दरकने लगा है। एक के बाद एक जैसे-जैसे भाजपा से ओबीसी नेता बाहर आते जा रहे हैं, उससे भाजपा अपनी पुरानी छवि ब्राह्मण-बनिया पार्टी के रूप में एक बार फिर से स्थापित होती जा रही है।

भाजपा इससे इतना घबरा गई है कि वह पार्टी में बचे ओबीसी नेताओं को हर कीमत पर साधने में जुटी है। और जब मामला सीएम योगी और यूपी के नेताओं से नहीं संभल रहा है तो खुद भाजपा के नंबर दो नेता अमित शाह सामने आ गए हैं। और जिन ओबीसी नेताओं के भाजपा छोड़ने की अटकलें हैं, उनको दिल्ली बुलाकर समझाने या ऐसा कहें कि मैनेज करने की कोशिश की जा रही है। हालांकि भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को तब झटका लगा जब दारा सिंह चौहान ने केंद्रीय मंत्रीमंडल से इस्तीफा दे दिया।

भाजपा की घबराहट की एक बड़ी वजह यह भी है कि भाजपा छोड़ने वाले तमाम ओबीसी नेता समाजवादी पार्टी में जा रहे हैं जिससे एक ओर जहां भाजपा का जनाधार खिसकता जा रहा है तो सपा का जनाधार बढ़ता जा रहा है। 10 फरवरी को चुनाव के पहले चरण की वोटिंग से पहले उत्तर प्रदेश की राजनीति में अभी काफी हचलच बाकी है।

पंजाबः CM की रेस में चरणजीत सिंह चन्नी सबसे आगे

 पंजाब में 14 फरवरी को विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में सभी राजनीतिक पार्टियां जीतने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा रही हैं। तो वहीं पंजाब के मतदाताओं ने भी तय कर लिया है कि वो पंजाब का ताज किसको देने वाले हैं। इस बीच एबीपी न्यूज़ ने पांचों चुनावी राज्यों को लेकर सर्वे किया है। एबीपी न्यूज के इस सीवोटर सर्वे में पंजाब में चरणजीत सिंह चन्नी सबको पछाड़ कर लोगों की पहली पसंद बने हुए हैं। सर्वे के मुताबिक मुख्यमंत्री पद को लेकर चरणजीत चन्नी के सामने न तो सिद्धू, न ही अमरिंदर सिंह और न ही कोई दूसरा टक्कर में है।

सर्वे के मुताबिक पंजाब में पूर्व सीएम कैप्टन अमरिंदर सिंह को सिर्फ 6 फीसदी लोग सीएम के तौर पर पसंद कर रहे हैं। पूर्व उप मुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल को 15 फीसदी पसंद करते है तो वहीं आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल को 17 फीसदी और नवजोत सिंह सिद्दू को 6 फीसदी लोग सीएम के रूप में देखना चाहते हैं। भगवंत मान इन सबसे आगे हैं और उन्हें 23 फीसदी जनता सीएम के तौर देखना चाहती है। लेकिन जब बात आई चरणजीत सिंह चन्नी की तो सी-वोटर सर्वे में उन्हें सबसे ज्यादा 29 फीसदी लोग सीएम के तौर पर दुबारा पंजाब में देखना चाहते हैं।

 पंजाब में साल 2017 में हुए विधान सभा चुनाव में कांग्रेस ने कुल 117 सीटों में से 77 सीटें जीतकर अपनी सरकार बनाई थी। इसके बाद 20 सीटें जीतकर आम आदमी पार्टी दूसरे नंबर पर रही थी। अकाली दल ने विधानसभा की 15 सीटें जीती थी। जबकि बीजेपी महज 3 सीटें पर ही सीमट गई थी। तो अन्य के खाते में 2 सीटें आई थी।

2022 चुनाव की बात करें तो एबीपी के इस सी-वोटर सर्वे के मुताबिक पंजाब के कई हिस्सों में कांग्रेस पार्टी आज भी अपनी पैठ बनाए हुए है। तो सीएम के रूप में चरणजीत सिंह चन्नी लोगों की पसंद है। ऐसे में संभावना जताई जा रही है कि सीएम चन्नी दोबारा सीएम की कुर्सी पर बैठ सकते हैं।

यूपी-पंजाब में गली-गली चुनावी चर्चा शुरू

 चुनाव की घोषणा होने के साथ ही अब यूपी और पंजाब में गली-गली में चुनावी चर्चा शुरू हो गई है। हर ओर यही कयास चल रहे हैं कि 2022 में प्रदेश में किसकी सरकार बनेगी। पांच राज्यों में चुनाव होने हैं, लेकिन सभी की निगाहे यूपी और पंजाब पर है।

चुनाव आयोग ने उत्तर प्रदेश और पंजाब समेत पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान कर दिया है। चुनाव आयोग की घोषणा के मुताबिक चुनाव कुल 7 चरणों में होने हैं। इन सभी राज्यों के चुनावों के रिजल्ट 10 मार्च को आएंगे। हालांकि इस बीच सबकी नजर उत्तर प्रदेश पर हैं जहां सभी 7 चरणों मे चुनाव है। पहले चरण का चुनाव 10 फरवरी को होगा, जबकि आखिरी 7वें चरण का चुनाव 7 मार्च को होगा। नतीजे 10 मार्च को आने हैं।

*पहले चरण में उत्तर प्रदेश के 11 जिलों के 58 विधान सभा सीटों पर चुनाव होंगे… दूसरे चरण में उत्तर प्रदेश के 9 जिलों के 55 विधान सभा सीटों पर चुनाव होंगे, तीसरे चरण में 16 जिलों के 59 सीटों पर, चौथे फेज में 9 जिलों के 60, पांचवे फेज में 11 जिलों के 60 सीटों पर चुनाव होने हैं, तो वहीं छठें चरण के 10 जिलों और सातवें चरण के 9 जिलों में क्रमश: 57 और 54 विधान सभा सीटों पर चुनाव होने हैं।

पहला चरण (10 फरवरी)- शामली, मुजफ्फरनगर, बागपत, मेरठ, गाजियाबाद, हापुड़, नोएडा, बुलंदशहर, अलीगढ़, मथुरा और आगरा।

दूसरा चरण (14 फरवरी)– सहारनपुर, बिजनौर, अमरोहा, मुरादाबाद, रामपुर, संभल, बदायूं, बरेली, शाहजहांपुर है।

तीसरा चरण (20 फरवरी)- कासगंज, हाथरस, एटा, फिरोजाबाद, मैनपुरी, फर्रूखाबाद, कन्नौज, इटावा, औरैया, कानपुर देहात, कानपुर नगर, जालौन, हमीरपुर, महोबा, झांसी, ललितपुर है यहां चुनाव 20 फरवरी को होंगे।

चौथै चरण (23 फरवरी)- पीलीभीत, लखीमपुर खीरी, सीतापुर, हरदोई, उन्नाव, लखनऊ, रायबरेली, फतेहपुर, बांदा जिला शामिल है।

पांचवा चरण (27 फरवरी)- बहराइच, श्रावस्ती, बाराबंकी, गोण्डा, अयोध्या, अमेठी, सुल्तानपुर, प्रतापगढ़, कौशाम्बी, चित्रकूट, प्रयागराज

छठा चरण (3 मार्च)- बलरामपुर, सिद्धार्थनगर, महराजगंज, बस्ती, संतकबीर नगर, गोरखपुर, कुशीनगर, अम्बेडकरनगर, देवरिया, बलिया जिले शामिल है।

सातवां चरण (7 मार्च)- जौनपुर, आजमगढ़, मऊ, वाराणसी, गाजीपुर, संत रविदासनगर, मिर्जापुर, चंदौली, सोनभद्र हैं।

पंजाब में 14 फरवरी को एक ही चरण में सभी सीटों पर चुनाव होंगे।

 सरदार चन्नी के इस दांव से पीएम मोदी चित्त

 पंजाब में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सुरक्षा में चूक के मामले में सियासत चरम पर है। चुनावी समर में बीजेपी और कांग्रेस इस मामले में भिड़े हुए हैं। इस बीच सूबे के मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी ने इस मामले में बयान देकर और ट्वीट कर इस पूरे विवाद को खूब हवा दे दी है। और प्रधानमंत्री मोदी को जमकर घेरा है।

दरअसल पंजाब में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सुरक्षा में चूक के मामले में पंजाब के सीएम चरणजीत सिंह चन्नी को सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया गया है। ऐसे में सीएम चन्नी ने इस मामले में अपनी सफाई दी है। लेकिन साथ ही मुख्यमंत्री चन्नी ने अपने एक ट्वीट में सरदार पटेल को कोट करते हुए इस मामले में पीएम मोदी का नाम लिए बिना उनपर जो तंज कसा है, उससे भाजपा तिलमिला गई है। सीएम चन्नी ने सरदार पटेल को कोट करते हुए ट्विट किया, जिसे कर्त्तव्य से ज़्यादा जान की फ़िक्र हो, उसे भारत जैसे देश में बड़ी जिम्मेदारी नहीं लेनी चाहिए।’

इससे पहले सीएम चन्नी ने गुरुवार को पंजाब के टांडा में रैली के दौरान भी इस मामले में पीएम को घेरते नजर आएं। चन्नी ने भाजपा और पीएम मोदी पर पलटवार करते हुए कहा- पूरे देश में झूठ फैलाया जा रहा है कि पीएम की सुरक्षा में चूक हुई थी। क्या किसी ने पत्थर मार दिया। कोई खरोंच आई। कोई गोली लगी याकिसी ने खिलाफ में नारे लगाए… जो पूरे देश में ये फैलाया जा रहा है कि प्रधानमंत्री की जान को खतरा हो गया।”

पीएम मोदी की सुरक्षा का मामला जोर पकड़ने के बाद सीएम चन्नी का प्रदर्शनकारियों के साथ व्यवहार की भी खूब चर्चा हो रही है। एक सभा में जाने के दौरान प्रदर्शनकारियों ने सीएम के काफिले को रोक लिया। इसके बाद मुख्यमंत्री ने अपने ड्राइवर से गाड़ी धीमी करने को कहा और उतरकर रास्ता रोकने वालों को उनकी समस्याएं सुलझाने का आश्वासन दिया। इस दौरान आजतक के रिपोर्टर मुख्यमंत्री के साथ थे।

इसपर सीएम चरणजीत सिंह चन्नी ने आज तक से कहा, ”ये प्रदर्शनकारी मुझे रोकने आए थे, क्या मैं इन्हें मार दूं?” उन्होंने कहा, दस लोग मेरी कार रोकने आए। पुलिस ने काफिले को घेर लिया। जबकि पीएम मोदी की कार को तो रोका भी नहीं गया। उनका काफिला प्रदर्शनकारियों से एक किलोमीटर दूर था। पंजाब के मुख्यमंत्री ने कहा, प्रदर्शन करना एक लोकतांत्रिक अधिकार है। प्रदर्शनकारी चाहते हैं कि पंजाब विधानसभा चुनाव के मद्देनजर आचार संहिता लागू होने से पहले उनकी मांगों को पूरा किया जाए। यही कारण है कि वे इस सड़क पर प्रदर्शन कर रहे हैं।

यानी पंजाब के फिरोजपुर में प्रधानमंत्री मोदी की जान को खतरा बताकर जिस तरह भाजपा… कांग्रेस और सीएम चन्नी को घेरने की कोशिश कर रही है, सीएम चन्नी के हालिया बयान से साफ है कि वो दबने वाले नहीं हैं। यहां तक की सीएम चन्नी ने जिस तरह पीएम मोदी को एक्सपोज किया है, उससे मोदी और भाजपा खुद बैकफुट पर आ गए हैं।

जयंती विशेषः भदन्त आनन्द कौसल्यायन, जिन्होंने बाबासाहेब से पूछा था- आपको कौन से बुद्ध पसंद हैं

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“जब मैं मर जाउंगा तो मेरी कब्र पर लिख देना कि डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर का यह चीवरधारी सेनानी बाबासाहेब के सपनों का भारत बनाने की जंग में लड़ते-लड़ते शहीद हो गया।” यह कथन भदन्त आनंद कौसल्यायन का है।
आधुनिक भारत को बौद्ध साहित्य विशेषकर पालि साहित्य से परिचित करवाने वाले विद्वानों में रत्नत्रय भदन्त आनन्द कौसल्यायन, भिक्खु जगदीस कस्सप और राहुल सांकृत्यायन का बहुमूल्य योगदान है। उन्हीं रत्नत्रय में 5 जनवरी, 1905 को भदन्त आनन्द कौसल्यायन का जन्म अविभाजित पंजाब के अम्बाला जिले के ‘सोहना’ नामक गाँव में हुआ था। बाल्यकाल में परिवार के लोग इन्हें ‘हरिनाम दास’ नाम से पुकारते थे, बाद में श्रीलंका में उपसंपदा हो जाने पर उन्हें भदन्त आनन्द कौसल्यायन नाम मिला।
स्वतंत्र वैचारिकी से पुष्पित बाल मन सामाजिक बन्धनों और विभिन्न कुरीतियों को स्वीकार करने की अपेक्षा उन्हें दूर करने के लिए आगे बढ़ना चाहता था और यही वजह थी कि 21 वर्ष की उम्र में गृहत्याग करते हुए वे जनसामान्य के उद्धार के लिए घर से निकल गए। भदन्त आनन्द कौसल्यायन बौद्ध साहित्य के मर्मज्ञ थे। उन्होंने आधुनिक भारतीयों को हिंदी भाषा के माध्यम से पालि साहित्य से परिचित कराने के लिए पालि व्याकरण, पिटक साहित्य, अनुपिटक साहित्य इत्यादि का हिंदी अनुवाद किया तथा स्वतन्त्र ग्रन्थों का लेखन व सम्पादन भी किया। बोधिसत्व बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर के “बुद्ध एन्ड हिज धम्मा” का हिंदी अनुवाद भी किया। थेरवाद परम्परा को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने भिक्खु धर्म का आजीवन पालन किया तथा प्रेरणा स्रोत रहें।
एक बड़ा ही सुंदर परिदृश्य इतिहास में से निकलकर आपसे रूबरू होना चाहता है। एक बार बाबासाहेब डॉ. अंबेडकर से भदन्त आनन्द कौसल्यायन ने पूछा, “बाबासाहेब आपको तथागत भगवान बुद्ध की कौनसी मुद्रा पसंद है?” “मुझे चलते हुए बुद्ध पसंद हैं।” बाबासाहेब ने यह कहा। “लेकिन बाबासाहेब भगवान बुद्ध की ऐसी तो कोई मुद्रा है ही नहीं। भगवान बुद्ध की तो दस मुद्राएं ही हैं। (1. धम्मचक्क मुद्रा, 2. ध्यान मुद्रा, 3. भूमिस्पर्श मुद्रा, 4. वरद मुद्रा, 5.करण मुद्रा, 6). वज्र मुद्रा, 7. वितर्क मुद्रा, 8. अभय मुद्रा, 9. उत्तरबोधि मुद्रा और 10. अंजलि मुद्रा)” भदन्त आनन्द कौसल्यायन ने आश्चर्य व्यक्त किया।
तब बाबासाहेब ने विनयपिटक के महावग्ग के धम्मचक्कपबत्तनसुत्त को उद्धृत करते हुए भदन्त आनंद कौसल्यायन को कहा कि भगवान बुद्ध का प्रथम उपदेश है, “चरथ भिक्खवे चारिकं बहुजन हिताय बहुजन सुखाय लोकानुकंपाय अत्थाय हिताय सुखाय देव मनुस्सानं। देसेथ भिक्खवे धम्मं आदिकल्याण मज्झे कल्याणं परियोसान कल्याणं सात्थं सव्यंजनं केवल परिपुन्नं परिसुद्धं ब्रह्मचरियं पकासेथ।” अर्थात भिक्खुओं, बहुजन सुख के लिये, बहुजन हित के लिये, लोगों को सुख पहुँचाने के लिये निरन्तर भ्रमण करते रहो। आदि में, मध्य में और अन्त में सभी अवस्थाओं के लिये कल्याणमय धम्म का भाव और आचरण प्रकाशित करते रहो।
बाबासाहेब अम्बेडकर ने उनसे कहा कि जिन करुणा सागर सम्यक सम्बुद्ध ने मनुष्यों के कल्याण के लिए बिना रुके, बिना थके निरंतर पैदल चलते हुए दुःख मुक्ति की देशनाएँ दी हों, तो मुझे ऐसे ही कारुणिक चलते हुए भगवान बुद्ध पसन्द हैं। यही कारण है कि वर्तमान भारत में सम्यक सम्बुद्ध की दस मुद्राओं के साथ – साथ चलते हुए बुद्ध की मुद्रा भी लोकप्रिय है। बाबासाहेब अम्बेडकर के प्रति अपना स्नेह अभिव्यक्त करते हुए अपने एक वक्तव्य में भदन्त आनन्द कौसल्यायन ने कहा था कि दुनिया में सबसे सुखी जीवन बौद्ध भिक्खु का होता है। जब मैं मर जाउंगा तो मेरी कब्र पर लिख देना कि डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर का यह चीवरधारी सेनानी बाबासाहेब के सपनों का भारत बनाने की जंग में लड़ते – लड़ते शहीद हो गया।
22 जून 1988 को भदन्त आनन्द कौसल्यायन जी का नागपुर में परिनिर्वाण हुआ। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा ने उनके योगदान को रेखांकित करते हुए अपने बौद्ध अध्ययन विभाग का नाम उनके नाम पर रखा  है।

अपनी नाकामी छुपाने के लिए दलित सीएम के पीछे पड़े मोदी

 प्रधानमंत्री पंजाब के फिरोजपुर में चुनावी रैली नहीं कर सकें। मोदी को मौसम, किसानों के विरोध और खाली कुर्सियों के कारण वापस लौटना पड़ा। लेकिन आपदा को अवसर बनाने में माहिर भाजपा ने इस पूरे मामले को भाजपा बनाम कांग्रेस बना दिया। और जो चुनावी रैली में न कर सके उसे सड़क पर कर दिखाया। जब भाजपा ने हुंकार भरी तो गोदी मीडिया ने भी अपनी ओर से कोई कसर नहीं छोड़ा और सरकार के साथ दलित समाज के सीएम चरणजीत सिंह चन्नी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया।

इस बीच बठिंडा एयरपोर्ट पर प्रधानमंत्री मोदी ने पंजाब के अधिकारियों से यह कहकर मामले को राजनीतिक रंग दे दिया कि ‘अपने सीएम को शुक्रिया कहना की मैं वापस जिंदा लौट आया’। मोदी के इस इशारे के बाद केंद्र सरकार के तमाम मंत्रियों, सांसदों ने पंजाब के मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी के खिलाफ मोर्चो खोल दिया। यहां तक की कांग्रेस के नेता भी सीएम चन्नी के पीछे पर गए। और तमाम नेताओं और मंत्रियों ने सीएम चन्नी के इस्तीफे की मांग कर दी है।

स्मृति इरानी ने बड़बोले पन में यहां तक कह दिया कि कांग्रेस मोदी से नफरत करती है। जबकि कैप्टन अमरिंदर सिंह और भाजपा ने सीएम का इस्तीफा मांग डाला। चारो ओर से घिरे पंजाब के मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी ने पीएम मोदी की सुरक्षा चूक की खबरों का खंडन किया है। सीएम चन्नी का कहना है कि उन्होंने खुद सारे इंतजाम देखे थे। पीएम को हेलीकॉप्टर से आना था, लेकिन अंतिम समय में उनका रूट बदल दिया गया और वे सड़क से आएं। हालांकि कांग्रेस और सरकार के बीच इस मुद्दे को लेकर जुबानी जंग जारी है। गृह मंत्रालय ने इसे बड़ी चूक मांगते हुए पंजाब सरकार से विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। जबकि कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने सीएम चन्नी का बचाव करते हुए साफ किया है कि- पीएम की सुरक्षा में 10 हजार जवान तैनात थे। पीएम को हेलीकॉप्टनर से आना था, लेकिन ऐन वक्त पर उन्होंने सड़क मार्ग को चुना, जिसकी जानकारी सरकार को नहीं थी।

दरअसल पीएम मोदी को पंजाब के फिरोजपुर में रैली में जाना था। लेकिन खराब मौसम की वजह से पीएम को हेलीकॉप्टर की जगह सड़क मार्ग से जाना पड़ा, इस दौरान फ्लाईओवर पर पहले से प्रदर्शन कर रहे प्रदर्शनकारियों के कारण पीएम को 15 से 20 मिनट तक फ्लाईओवर पर रुकना पड़ा। इसी को लेकर भाजपा ने हंगामा खड़ा कर दिया है। कहा जा रहा है कि रैली न कर पाने और किसानों के विरोध की खबर को दबाने के लिए भाजपा ने पूरे मामले को दूसरा रंग दे दिया है।

बिहार में SC-ST एक्ट का बुरा हाल, नहीं मिल रहा न्याय

बिहार में दलितों के खिलाफ लगातार बढ़ रहे अत्याचार के मामले बेहद चिंताजनक हैं। लेकिन उससे बड़ी चिंता की बात यह है कि ऐसे मामलों में एससी-एसटी एक्ट होने के बावजूद उनको न्याय नहीं मिल पा रहा है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बीते 23 दिसंबर को एससी-एसटी अधिनियम मामलों की समीक्षा बैठक की थी। इस बैठक में एससी-एसटी के ऊपर अत्याचार के मामलों और न्याय मिलने को लेकर जो आंकड़े सामने आए हैं, वो चौंकाने वाले हैं।

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, इस समीक्षा बैठक से पता चला है कि वर्तमान में राज्य में एससी-एसटी अधिनियम से जुड़े कुल मामलों की संख्या 1,06,893 है। इनमें से तकरीबन आधे 44,986 मामलों में न्याय नहीं मिला है। बीते 10 सालों यानी जनवरी 2011 से नवंबर 2021 के बीच दर्ज 44,150 मामलों में से सिर्फ 872 मामलों में ही फैसला सुनाया गया है।

 बिहार पुलिस के आंकड़ों के मुताबिक एससी-एसटी अधिनियम के तहत सबसे अधिक 7,574 मामले 2020 में दर्ज किए गए। इससे पहले 2018 में यह संख्या 7,125 और 2017 में 6,826 थी।

नहीं मिल पा रहा है न्याय

रिपोर्ट के मुताबिक उत्पीड़न की घटनाओं में न्याय नहीं मिल पाने की वजह मामलों की संख्या ज्यादा होने का हवाला दिया जा रहा है। इसकी एक वजह यह भी है कि मामलों का निपटारा होने पर पीड़ितों को मुआवजा देना पड़ेगा, जिसकी वजह से भी न्याय मिलना दुभर होता जा रहा है। दरअसल हत्या के मामले में पीड़ित परिवारों को 8.5 लाख रुपये का मुआवजा मिलने का प्रावधान है।

 ऐसे मुआवजे के मामले में 8,108 मामलों में अब तक सिर्फ 2,876 मामलों का ही निपटारा किया गया है और 5,232 मामले लंबित हैं। इसका कारण फंड का नहीं होना बताया जा रहा है।

क्या कहते हैं नियम

 इन आंकड़ों के सामने आने के बाद बिहार में दलितों और आदिवासियों की दयनीय स्थिति की तस्वीर सामने आ जाती है। तो बिहार की सत्ता पर लंबे समय से बैठे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का भी दलितों को न्याय दिलाने के बारे में रवैया सवालों के घेरे में है। क्योंकि नियम के अनुसार एससी-एसटी की स्थिति पर हर छह महीने में समीक्षा बैठक होनी चाहिए जो आमतौर पर नहीं हुई। 4 सितंबर 2020 को समीक्षा बैठक के बाद मुख्यमंत्री की भी नजर इसपर पंद्रह महीने बाद गई और 23 दिसंबर 2021 को एससी-एसटी अधिनियम मामलों की समीक्षा बैठक हुई। इससे साफ है कि बिहार की सरकार, प्रशासन और आय़ोग दलितों और आदिवासियों के खिलाफ अत्याचार रोकने और उनको न्याय दिलाने के लिए गंभीर नहीं है।

पंजाब में पीएम मोदी की भारी बेइज्जती, किसानों ने नहीं होने दी रैली

 कृषि कानूनों पर मोदी से लेकर भारत सरकार को हराने और अपनी मांग मंगवाने के बाद किसानों ने एक बार फिर भाजपा और पीएम मोदी को झटका दे दिया है। 5 जनवरी को पंजाब के फिरोजपुर दौरे पर गए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को किसानों ने रैली नहीं करने दी और पीएम को अपना कार्यक्रम रद्द कर वापस लौटना पड़ा। हालांकि अपनी इज्जत बचाने के लिए केंद्र सरकार इसके पीछे सुरक्षा कारणों का हवाला दे रही है, लेकिन स्थानीय रिपोर्ट के मुताबिक खाली कुर्सियों और किसानों के विरोध के कारण पीएम को अपना दौरा रद्द करना पड़ा। पीएम मोदी अपनी इस रैली से पंजाब चुनाव की शुरुआत करने वाले थे। इस दौरान वह फिरोजपुर में वह 42750 करोड़ रुपये की विकास योजनाओं की घोषणा करने वाले थे। इसके लिए प्रधानमंत्री मोदी सुबह बठिंडा पहुंचे थे। उन्हें वहां से हेलिकॉप्टर से हुसैनीवाला में राष्ट्रीय शहीद स्मारक जाना था। आसमान साफ नहीं था तो पीएम मोदी का सड़क मार्ग से जाना तय हुआ। लेकिन किसानों के प्रदर्शन के चलते पीएम मोदी को वापस लौटना पड़ा। हालांकि अब इस पूरे मामले को गृह मंत्रालय और भाजपा सुरक्षा की चूक मानकर पंजाब सरकार पर सारा ठिकरा फोड़ रही है।
लेकिन सच यह है कि किसान संगठनों ने पहले ही रैली का विरोध करने का ऐलान कर रखा था। किसान एमएसपी गारंटी कानून बनाने और प्रदूषण एक्ट में से किसानों को निकालने की मांग कर रहे थे। पीएम मोदी की इस रैली का विरोध सड़क से लेकर सोशल मीडिया पर तक देखने को मिला। सोशल मीडिया के पेज ट्रैक्टर टू ट्विटर पर बच्चे से लेकर नौजवान और बुजुर्ग भी मोदी की रैली का विरोध करते दिखे। देखते-देखते ट्विटर पर गो बैक मोदी टॉप ट्रेंड करने लगा। यहां लोगों का इस बात को लेकर गुस्सा था कि कृषि कानून के खिलाफ संघर्ष के दौरान 700 किसानों की शहादत होने के बाद प्रधानमंत्री ने कानून वापस लिया। अब भी किसानों की कई मांगें नहीं मानी गई हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री का पंजाब में स्वागत का सवाल ही नहीं है।
यानी कि जिस तरह पीएम मोदी और भाजपा यह मान रहे थे कि कृषि कानूनों की वापसी के बाद किसानों का गुस्सा शांत हो जाएगा, वैसा होता नहीं दिख रहा है। पीएम मोदी का विरोध कर पंजाब के किसानों ने साफ कर दिया है कि वह फिलहाल भाजपा और पीएम मोदी को पंजाब में घुसने देने के मूड में नहीं हैं।

क्या है सोशल मीडिया पर हंगामा मचाने वाला बुल्ली बाई ऐप

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 हैदराबाद शहर की पुलिस की साइबर अपराध शाखा ने सोमवार को बुल्ली बाई विवाद के संबंध में एक मामला दर्ज किया। बुल्ली बाई ऐप के खिलाफ ऐफआइआर तब दर्ज हुआ जब शहर की दो महिलाओं की तस्वीरों को एक ऐप के माध्यम से ‘नीलामी’ के लिए रखा गया, जिसमें कथित तौर पर उन्हें अपमानित करने के प्रयास में मुस्लिम महिलाओं को निशाना बनाया गया। वहीं कहा जा रहा है कि बुल्ली बाई ऐप ने करीब 100 मुस्लिम महिलाओं की नीलामी की तस्वीरें अपलोड की है, जिसे लेकर Bulli Bai मामले पर बवाल मचा हुआ है।

हालांकि ये पहली बार नहीं है जब नीलामी के लिए किसी महिला की तस्वीरें अपलोड की जा रही हैं इससे पहले भी Sulli Deals नाम से एक ऐप आया था, जिसमें Bulli Bai की ही तरह महिलाओं की नीलामी की जा रही थी।

अब जानते है कि जिस बुल्ली बाई ऐप पर इतना हंगामा हो रहा है वो आखिर है क्या?

जुलाई 2021 में ‘Sulli Deals’ नाम का एक ऐप सामने आया था, जिसमें कई मुस्लिम महिलाओं की तस्वीरें लगाकर उनकी कथित नीलामी की जा रही थी। उस दौरान कई महिलाओं ने ‘Sulli Deals’ के खिलाफ आवाज उठाई थी। वहीं करीब 6 महीने बाद ‘Bulli Bai’ नाम का एक ऐप फिर से सामने आया है, जिसमें और अधिक महिलाओं की ‘नीलामी’ की जा रही है।।।

कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि Sulli Deals और Bulli Bai को एक ही डेवलपर ने बनाया है। Sulli Deals और Bulli Bai ऐप को Github पर बनाया गया है। इस ऐप के खिलाफ मामला तब दर्ज किया जब पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, छात्रों और प्रसिद्ध हस्तियों सहित कई महिलाओं ने Bulli Bai के खिलाफ शिकायत की और इसके डेवलपर के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की। जिसके बाद मुंबई और दिल्ली पुलिस की साइबर सेल ने मामले की जांच की और पाया कि सैकड़ों मुस्लिम महिलाओं को ऐप पर ‘नीलामी’ के लिए डाला गया था।

सोशल मीडिया में Bulli Bai की बात जैसे ही सामने आई तो सरकार हरकत में आई और तुरंत Bulli Bai ऐप पर बैन लगाया गया। फिलहाल इस मामले में अब तब तीन लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है। इसमें मास्टरमाइंड के तौर पर 18 साल की लड़की श्वेता सिंह और 19 साल के विशाल झा की गिरफ्तारी हुई है, जबकि 20 साल के मयंक रावत को भी गिरफ्तार किया गया है।

Bulli Bai App पर मुस्लिम महिलाओं की निलामी मामले में दो गिरफ्तार

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 सोशल मीडिया में ‘बुली बाई’ एप पर मुस्लिम महिलाओं की निलामी पर देश भर में हंगामा मचा है। इस बीच बड़ी खबर यह है कि इस मामले में बुली बाई एप से जुड़े दो आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया है। इसमें बेंगलुरू से 21 साल के विशाल कुमार झा का नाम सामने आया है जबकि उत्तराखंड से एक महिला को गिरफ्तार किया गया है।

दरअसल इस ऐप पर सैकड़ों मुस्लिम महिलाओं को ‘नीलामी’ के लिए डाला गया था। जिसे लेकर सोशल मीडिया पर हंगामा मचा हुआ है। हैदराबाद पुलिस की साइबर अपराध शाखा ने सोमवार को बुल्ली बाई विवाद के संबंध में एक मामला दर्ज किया था। इस मामले की जांच दिल्ली और मुंबई की साइबर सेल ने भी की थी। जिसके बाद आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया है। दरअसल काफी दिनों से ‘बुली बाई’ एप को लेकर सोशल मीडिया पर बवाल मचा हुआ है। इस ऐप के जरिए करीब 100 मुस्लिम महिलाओं की नीलामी की तस्वीरें अपलोड की गई थी, जिसे लेकर कई पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, छात्रों, प्रसिद्ध हस्तियों सहित कई महिलाओं ने Bulli Bai के खिलाफ शिकायत की थी। इस मामले में सरकार ने जांच का आदेश दिया था जिसके बाद इस एप को ब्लॉक कर दिया गया था और अब इस मामले में दो आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया है।

 पुलिस का कहना है कि मुख्य आरोपी महिला ‘बुली बाई’ एप से जुड़े कुल तीन अकाउंट हैंडल कर रही थी। एक अन्य आरोपी विशाल कुमार ने खालसा वर्चस्ववादी के नाम से खाता खोला था। 31 दिसंबर को, उसने अन्य खातों के नाम बदल दिए और सिख नाम से मिलता-जुलता नाम रख दिया, ताकि इसके खाताधारकों की असली पहचान छुपाई जा सके। नए साल के पहले दिन में जिस तरह सोशल मीडिया पर मुस्लिम महिलाओं को लेकर बुल्ली बाय डील नामक ऐप पर आपत्तिजनक बातें और तस्वीरों को पोस्ट किया गया है, उस पर दिल्ली अल्पसंख्यक आयोग ने भी संज्ञान लिया था।

अब इस मामले में आरोपी के रूप में विशाल का नाम सामने आने के बाद हंगामा मचा है। विशाल की पहचान ब्राह्मण समाज की बताई जा रही है, इसको लेकर अंबेडकरवादी और मुस्लिम समाज हमलावर हैं। इसको हिन्दुवादी संगठनों की साजिश भी बताई जा रही है।

कोरोना की तेजी के बीच दिल्ली में वीकेंड कर्फ्यू का ऐलान

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कोरोना के लगातार बढ़ते मामले को देखते हुए और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के इसकी गिरफ्त में आने के बाद दिल्ली सरकार ने अहम फैसला किया है। मंगलवार को दिल्ली के उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने कोविड के नए गाइडलाएंस का एलान किया है। इसके मुताबिक अब दिल्ली में वीकेंड कर्फ्यू लगेगा। दरअसल दिल्ली में कोरोना के मामले पिछले 7 दिनों में काफी ज्यादा बढ़े हैं और इसके साथ ही 3 जनवरी को 4099 मामले सिर्फ दिल्ली में पाए गए हैं। इसको देखते हुए उप मुख्यमंत्री ने कोरोना के खिलाफ सख्ती बढ़ाने का ऐलान किया है।

उप मुख्यमंत्री ने कोविड को लेकर गाइडलाइंस जारी किए है। कोरोना के खिलाफ जो गाइडलांस जारी किए गए हैं उसके मुताबिक- • दिल्ली में वीकेंड कर्फ्यू लगेगा, यानी शनिवार और रविवार को कुछ जरूरी सेवाएं छोड़कर दिल्ली बंद रहेगी। इसका पहला दिन 7 जनवरी को होगा। • इसके अलावा कुछ जरूरी सेवाओं को छोड़ कर सभी सरकारी दफ्तर बंद रहेंगे। • सभी सरकरी दफ्तरों में वर्क फ्रॉम की बात कह दी गई है। • निजी दफ्तर 50% क्षमता के साथ खुलेंगे। • मैट्रो 100% क्षमता से चलेंगे लेकिन सभी को मास्क पहनने की अनिवार्यता रखी गई है। • सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करने का निर्देश दिया गया है।

इसके अलावा उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने कहा है कि सभी लोग जरूरत पड़ने पर ही घर से बाहर निकलें। आपको बता दें 3 जनवरी 2022 को कोरोना संक्रमण का ये आंकड़ा पिछले एक हफ्ते में 6.46% की दर के साथ 4099 हो गया था और 4 जनवरी को कोविड संक्रमितों की संख्या 5500 हो गई है। इससे देखा जा सकता है कि कितनी तेजी से कोरोना लोगों को अपनी चपेट में ले रहा है, हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि इस बार ये संक्रमण ज्यादा घातक नहीं है, लेकिन इसके बावजूद सतर्कता बरतने की बात कही जा रही है।

यूपी में भाजपा का भयंकर जातिवाद, डीएम-एसपी के पदों पर राजपूतों और ब्राह्मणों का कब्जा

 जरा बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी के शासनकाल को याद करिए। बसपा शासनकाल में जैसे ही बड़े पदों पर दलितों की पोस्टिंग हो जाती है या फिर सपा शासनकाल में जैसे ही बड़े पदों पर यादव आ जाते थे, इन सरकारों पर जातिवादी होने का ठप्पा लगा दिया जाता था। इस काम में जातिवादी मीडिया और भाजपा के लोग सबसे आगे रहते हैं। लेकिन भाजपा सरकार में अधिकारियों की तैनाती का जो आंकड़ा सामने आया है, वह भाजपा के भीतर के जातिवाद की कहानी कहता है।

अभी यूपी में भाजपा की सरकार है और प्रदेश में अधिकारियों की तैनाती का 30 दिसंबर 2021 तक का जो आंकड़ा सामने आया है, वो इस बात की ओर इशारा करती है कि बीजेपी शासित उत्तर प्रदेश के 75 जिलों में अधिकारियों की तैनाती उनकी जाति के हिसाब से हुई है। और इसमें ऊंची जाति के लोग भरे पड़े हैं। हम ये आंकड़े आपके सामने इसलिए रख रहे हैं क्योंकि यही बीजेपी सरकार जब अपोजिशन में थी तो उत्तर प्रदेश में बड़े पदों पर ओबीसी या एससी/ एसटी की तैनाती पर सवाल उठा रही थी और उसे सपा/बसपा का जातिवाद बता रही थी।

 जो डेटा हमारे पास है उसके मुताबिक यूपी के 75 जिलों में से 30 जिलाधिकारी यानी DM सामान्य वर्ग के हैं, इनमें सीएम योगी की जाति यानी राजपूत जाति के 20 डीएम हैं। तो करीब 11% ब्राह्मण जाति के डीएम हैं। अनुसूचित जाति की बात करें तो सिर्फ 4 DM दलित समाज से आते हैं।

अब उत्तर प्रदेश के जिलों में SSP/SP की तैनाती पर नजर डालेंगे तो वहां पर भी यही देखने को मिलता है… प्रदेश के 18 जिलों की कमान ठाकुर जाति के हाथ में है, जबकि इतने ही यानी 18 जिलों में ब्राह्मण जाति के SSP तैनात हैं। सिर्फ 5 जिलों के पुलिस कप्तान SC-ST समाज से  हैं।

OBC जाति की बात करें तो उनकी स्थिति थोड़ी बेहतर है। सूबे में ओबीसी समाज के 14 DM तैनात हैं। जबकि प्रदेश के 12 जिलों में ओबीसी पुलिस कप्तान हैं। हालांकि इसमें दिलचस्प यह भी है कि योगी सरकार ने यादव अधिकारियों पर भरोसा नहीं जताया है। और सिर्फ 1-1 जिले में DM और पुलिस कप्तान यादव रखे गए हैं।

 तो वहीं एक भी जिले की कमान मुस्लिम अधिकारियों को नहीं सौंपी गई है। हालांकि 1 सिख और 1 क्रिश्चियन को जिले की कमान डीएम के तौर पर सौंपी गई हैं।

 हालांकि तमाम सरकारें अपनी जाति के अधिकारियों की भर्ती करती रही है, लेकिन सवाल यह है कि सपा और बसपा के शासनकाल में ऐसी नियुक्तियों को जातिवाद कहने वाली भाजपा और उसके नेताओं को अपना जातिवाद क्यों नहीं दिख रहा? क्योंकि जिस तरह से इस सरकार में सवर्ण अधिकारियों को और खासकर सीएम योगी की जाति के अधिकारियों को विशेष तव्वजो दी जा रही है, वह जातिवाद नहीं तो और क्या है?

यूपी चुनाव को लेकर चुनाव आयोग की प्रेस कांफ्रेंस, आयोग ने की ये महत्वपूर्ण घोषणाएँ

 उत्तर प्रदेश चुनाव की समीक्षा को लेकर निर्वाचन आयोग की टीम तीन दिन के दौरे पर थी। इस दौरान तमाम राजनीतिक दलों से मिलने और उनकी प्रतिक्रिया लेने के बाद आयोग के अधिकारियों ने आज 30 दिसंबर को प्रेस कांफ्रेंस की। इस दौरान आयोग ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों को लेकर तमाम चीजें साफ की। मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील चंद्रा ने कई जरूरी ऐलान करते हुए साफ किया कि तमाम राजनीतिक दल समय पर चुनाव चाहते हैं। हालांकि आयोग ने अभी चुनाव की तारीखों का ऐलान नहीं किया।

 मुख्य चुनाव आयुक्त का कहना था कि आखिरी मतदाता सूची 5 जनवरी को आएगी। यानी कि माना जा सकता है कि उसके बाद चुनाव की तारीखों का ऐलान किया जाएगा। इस दौरान आय़ोग ने कई अन्य महत्वपूर्ण घोषणाएँ भी की। आयोग ने एक बड़ा ऐलान करते हुए विशेष लोगों को घर से ही वोटिंग की सुविधा देने का ऐलान किया। आयोग के मुताबिक आगामी यूपी के चुनाव में दिव्यांग और 80 साल से ज्यादा उम्र वालों को घर से ही मतदान की सुविधा मिलेगी। साथ ही इस बार कोरोना को देखते हुए भीड़ को नियंत्रित करने के लिए 11 हजार पोलिंग बूथ ज्यादा बनाए जाएंगे।

 मतदान के समय को लेकर भी आय़ोग ने बदलाव की बात कही है। अब सुबह 8 बजे से लेकर शाम को 6 बजे तक वोटिंग होगी। पहले यह शाम को पांच बजे तक ही होता था। आपको बता दें कि यूपी में 15 करोड़ मतदाता है। इनके लिए प्रदेश में कुल 11 हजार से अधिक बूथ बनाये जाएंगे। जिसमें कुल 11 लाख 74 हजार मतदान स्थल होंगे। आयोग ने वोटर कार्ड न होने की वजह से वोटिंग में होने वाली दिक्कतों पर राहत की घोषणा भी की है। आयोग का कहना था कि जिनके पास निर्वाचन कार्ड नहीं होंगे वो किसी भी आधिकारिक दास्तवेज के साथ वोट कर सकेंगे।

जानिए ओमिक्रॉन को लेकर क्या है ताजा अपडेट

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 नए साल की दस्तक हो चली है, लेकिन उससे पहले कोरोना वायरस के नए वैरिएंट ओमिक्रॉन ने आकर लोगों के उत्साह पर पानी फेर दिया है। कई देशों में डेल्टा की जगह ओमिक्रॉन वैरिएंट पूरी तरह हावी हो चुका है और ये देश महामारी की चौथी लहर झेल रहे हैं। वहीं भारत में अब तक कोरोना की दूसरी लहर देखी गई है। भारत में ओमिक्रॉन के बढ़ते मामले और कोविड मामलो में आई उछाल से तीसरी लहर के आने की आशंका तेज हो गई है।

 दरअसल भारत में 30 दिसंबर तक ओमिक्रॉन के 961 मामले सामने आ चुके हैं। इसी के साथ 29 दिसंबर को कोविड के मामलों में 44% की तेजी दर्ज की गई है। ऐसे में एक्सपर्ट्स का कहना है कि कोरोना के तेजी से बढ़े ये मामले ओमिक्रॉन की वजह से हैं और अनुमान है कि 2022 की शुरुआत में कोरोना के मामलो में उछाल आ सकता है। एक्सपर्ट्स और वैज्ञानिकों का अनुमान है कि भारत में बढ़े Covid-19 के मामलों की वजह से तीसरी लहर आने की संभावना है, लेकिन इसके साथ ही एक्सपर्ट्स ने एक राहत की खबर भी सुनाई है।

एक्सपर्ट्स ने कहा है कि जहां एक तरफ तीसरी लहर के आने की आशंका है वहीं एक बात ये भी है कि इसका प्रभाव पहली और दूसरी लहर की तरह गंभीर नहीं होगा। जानकारों के मुताबिक, ये लहर बहुत कम समय तक रहेगी। अब आपके ज़हन में एक सवाल आ रहा होगा की तीसरी लहर के आने की बात पुख्ता तरीके से क्यों कही जा रही है। तो हम आपको बता दें कि कोविड मामले पर लगातार रिसर्च करने वाले 4 अहम संस्थानों के एक्सपर्ट्स ने कोविड पर अपनी प्रतिक्रिया दी है। आइए जानते हैं कि उन संस्थानों ने क्या कहा-

> कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने एक ट्रैकर बनाया है जिसके मुताबिक दिसंबर के अंतिम सप्ताह से नए संक्रमण के मामले बढ़ने लगेंगे।

> आईआईटी-कानपुर की एक स्टडी में बताया गया है कि भारत में महामारी की तीसरी लहर 3 फरवरी, 2022 तक पीक पर आ सकती है। इस भविष्यवाणी के अनुसार मामलों में वृद्धि, 15 दिसंबर तक शुरू होनी थी।

> नेशनल कोविड-19 सुपरमॉडल कमेटी ने अनुमान लगाया है कि कोरोना की तीसरी लहर 2022 की शुरुआत में पीक पर पहुंचने की उम्मीद है। कमेटी के सदस्यों ने कहा कि जैसे ही ओमिक्रॉन डेल्टा की जगह लेना शुरू कर देगा, वैसे ही हर दिन इसके मामले बढ़ने लगेंगे।

> ओमिक्रॉन वैरिएंट की पहचान करने वाले दक्षिण अफ्रीकी डॉक्टर एंजेलिक कोएत्जी ने कहा है कि ओमिक्रॉन की वजह से भारत में कोविड के मामलों में वृद्धि होगी, लेकिन इसका संक्रमण हल्का होगा। कोएत्जी ने कहा कि इसकी पॉजिटिविटी रेट ज्यादा होगी लेकिन उम्मीद है कि इसके अधिकांश मामले उतने ही हल्के होंगे जितने हम यहां दक्षिण अफ्रीका में देख रहे हैं।

इन सभी एक्सपर्ट्स की कोविड पर जो राय है इससे ये लगता है की कोविड की दूसरी लहर आ सकती है लेकिन इसके साथ ही अच्छी खबर ये बताई जा रही है की इससे नुकसान की संभावना कम है।
  • रिपोर्ट- आस्था गुप्ता

योगी के दिये टैबलेट को OXL पर बेच रहे हैं यूपी के छात्र, वजह जानकर हो जाएंगे हैरान

 भाजपा के घोषणा पत्र में यूपी के छात्रों को एक करोड़ टेबलेट और स्मार्टफोन बांटने की बात कही गई थी। चुनाव नजदीक देख मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की जयंती 25 दिसंबर को 60 हजार छात्रों को टैबलेट और स्मार्ट फोन बांटा। लेकिन टैबलेट की पहली खेप मिलते ही छात्र इसे OLX पर बेचने लगे हैं। और छात्र इसकी जो वजह बता रहे हैं, उसे जानकर आप भी हैरान रह जाएंगे।

 छात्रों का कहना है कि उन्हें सरकार द्वारा दिये गए टैबलेट इस्तेमाल करने से डर लगता है क्योंकि इससे उन्हें अपनी प्राइवेसी की चिंता सता रही है। छात्र न तो इस टैबेलेट पर अपना व्हाट्सएप खोल रहे हैं और न हीं फेसबुक। उन्हें डर है कि ऐसा करते ही उनका सारा डेटा सरकार के पास चला जाएगा। और आज के युवाओं के लिए बिना व्हाट्सएप और फेसबुक के किसी फोन या टैब की कल्पना करना ही बेकार है।

 डर सिर्फ इतना ही नहीं है, बल्कि एक मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक एक छात्र ने बताया कि टैब के वॉलपेपर पर योगी सरकार की बड़ी तस्वीर होती है और अगर कोई उसे बदलने की कोशिश करता है तो पूरा फोन की ब्लॉक हो जाता है।

 छात्र यह भी कह रहे हैं कि टैब के ऊपर बारकोड के जरिए मैपिंग की गई है, जिसमें छात्रों का पूरा डेटा उस बारकोड में डाला गया है। जिसकी वजह से वह फोन किसी और के द्वारा नहीं चलाया जा सकता। ऐसे में इस फोन को निजी इस्तेमाल नहीं किया जा सकता और छात्र इसके जरिये सिर्फ पढ़ाई का काम ही कर पाएंगे।

इन्हीं मुश्किलों को देखते हुए अब OLX पर छात्र अपने टैब और स्मार्ट फोन को बेचने लगे हैं, जिससे सरकार की इस योजना की किरकिरी हो गई है। आपको बता दें कि समाजवादी पार्टी की सरकार में भी मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने लैपटॉप बांटा था, तब भी छात्रों द्वारा लैपटॉप को बेचने की खबर आई थी।