अहमदाबाद। बीजेपी सरकार बनाने के लिए साम, दाम, दंड, भेद जैसे सारे तरीके अपनाती है, यह बात अन्य कई चुनावों में जगजाहिर हो चुकी है पर ताजा मामला गुजरात का है जहां से राज्यसभा चुनाव में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह चुनाव लड़ रहे हैं. बता दें की दो दिन में गुजरात कांग्रेस के सात विधायक पार्टी से इस्तीफा दे चुके हैं. रिपोर्ट्स के मुताबिक कई विधायक अभी पार्टी छोड़ने की कतार में हैं. काग्रेंस पार्टी के वरिष्ठ विधायक राघवजी पटेल ने कहा कि वह भी दूसरे विधायकों के साथ इस्तीफा देने की तैयारी कर रहे हैं. इसके एक दिन पहले ही कांग्रेस के तीन विधायकों ने अपना इस्तीफा दिया था.
शुक्रवार 28 जुलाई को जनजातीय वांसादा निर्वाचन क्षेत्र के विधायक चन्नाभाई चौधरी और बालासिनोर से मानसिंह चौहान ने अपना इस्तीफा अध्यक्ष रमनलाल वोहरा को सौंप दिया. सौराष्ट्र के जामनगर (ग्रामीण) निर्वाचन क्षेत्र के एक विधायक राघवजी पटेल ने कहा, “मैं भाजपा में जाना चाहता हूं और पांच अन्य भी हैं जो इसकी तैयारी कर रहे हैं.” इस पार्टी विधायकों में मचे भगदड़ के बीच कांग्रेस नेतृत्व ने भारतीय जनता पार्टी पर जोरदार हमला किया है और कहा है कि बीजेपी गुजरात में विधायकों की खरीद फरोख्त कर रही है. पार्टी नेता अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि गुजरात में भारतीय जनता पार्टी विधायकों की खरीद फरोख्त में करोड़ों रुपये खर्च कर रही है. अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा,‘गुजरात कांग्रेस के विधायक पुनाभाई गामित ने बताया कि बीजेपी द्वारा उन्हें 10 करोड़ रुपये ऑफर किये गये थे.’
कांग्रेस नेता रणदीप सुरजेवाला ने कहा कि बीजेपी गुजरात से 3 सीटों पर राज्यसभा के लिए चुनाव लड़ रही है. जबकि उसके पास जीतने लायक वोट दो उम्मीदवार के लिए है. ऐसे में बीजेपी धनबल, बाहुबल का इस्तेमाल कर कांग्रेस के विधायकों को तोड़ रही है. सुरजेवाला ने कहा कि बीजेपी सत्ता के लालच में अंधी हो चुकी है. रणदीप सुरजेवाला ने कहा कि सत्ता की भूख ने सत्ता के हुक्मरानों को अंधा कर दिया है और करोड़ों रुपये की रिश्वत देकर कांग्रेस विधायकों को खरीदा जा रहा है. रणदीप सुरजेवाला ने ये भी कहा कि बीजेपी कांग्रेस विधायकों को चुनाव खर्च और टिकट देने का भी लालच दे रही है.
बता दें कि गुजरात में राज्यसभा चुनाव के लिए 8 अगस्त को मतदान है. यहां से बीजेपी की ओर से पार्टी अध्यक्ष अमित शाह, केन्द्रीय मंत्री स्मृति ईरानी और गुरुवार को कांग्रेस से बीजेपी में शामिल हुए बलवंत सिंह राजपूत बीजेपी के कैंडिडेट हैं, जबकि कांग्रेस के उम्मीदवार अहमद पटेल हैं. बीजेपी गुजरात में राज्यसभा सीट को किसी भी हाल में खोना नहीं चाहती है जिसके लिए अब भरपूर धनबल का प्रयोग किया जा रहा है.
नई दिल्ली। भाजपा सरकार ने प्रत्येक क्षेत्र में आधार कार्ड को अनिवार्य कर दिया है जिस वजह से लोगों के सामने समस्याऐँ आनी शुरू हो गयी हैं. ताजा मामला गुजरात और महाराष्ट्र के आदिवासियों का है जहां ‘आधार’ की अनिवार्यता से छूट दिये जाने की मांग की गयी है. सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर कहा गया है कि सामाजिक योजनाओं का लाभ लेने के लिए ‘आधार’ की अनिवार्यता समाप्त की जाए. शुक्रवार को कोर्ट ने याचिका पर कोई भी अंतरिम आदेश देने से इन्कार करते हुए मामला आधार की सुनवाई कर रही पांच न्यायाधीशों की पीठ को भेज दिया है.
इससे पहले याचिका पर बहस करते हुए वकील मनोज गोरकेला ने कहा कि सरकार की अधिसूचना में कक्षा 9 से 12वीं तक प्रवेश लेने और सरकारी योजनाओं का लाभ लेने के लिए आधार कार्ड अनिवार्य कर दिया गया है. सरकार के इस आदेश के कारण आदिवासियों के बच्चों को आधार कार्ड न होने के कारण स्कूलों में प्रवेश नहीं मिल रहा है. उन्होंने आदिवासियों की दिक्कतें गिनाते हुए कहा कि कई कानूनों में आदिवासियों को छूट दी गई है ऐसे में आधार की अनिवार्यता से भी आदिवासियों को छूट दी जाए.
उन्होंने कोर्ट से इस बाबत अंतरिम आदेश देने की मांग करते हुए कहा कि जब सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट आदेश है कि योजनाओं का लाभ लेने के लिए आधार अनिवार्य नहीं होगा तो फिर सरकार इसे अनिवार्य कैसे कर सकती है. लेकिन पीठ ने अंतरिम आदेश देने से इन्कार करते हुए कहा कि इस मामले की सुनवाई पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ कर रही है इसलिए ये पीठ कोई अंतरिम आदेश नहीं दे सकती. कोर्ट ने याचिकाएं आधार की सुनवाई कर रही पांच न्यायाधीशों की पीठ को विचार के लिये भेज दीं है जिसमें बड़ा फैसला जल्द आने की संभावना है.
I was amused to read in the media that there was a ruckus in the Rajya Sabha over the alleged association of Hindu deities with alcohol. Since the objectionable remarks were expunged, I am not able to refer specifically to the god or to the MP who mentioned him. Our politicians may not be well versed in all our ancient lore specially because and knowledge of the past is not their strong point; but it is not too much to expect that they should have the basic idea of the qualities and activities of the divinities whom they worship and defend. For constraints of space it is not possible to discuss here the traits of all those gods and goddesses who used alcohol, but I would like to draw the attention of readers to only few of them who binged on intoxicating drinks.
In the Vedic texts soma was the name of a god as well as of a plant from which a heady drink of that name was derived and was offered to gods in most of the sacrifices; according to one opinion it was different from another intoxicating drink, sura, which was meant for the common people. Soma was a favourite beverage of the Vedic deities and was offered in most of the sacrifices performed to please gods like Indra, Agni, Varun, Maruts and so on, whose names occur frequently in the Rig Veda. Of them Indra, who is known by 45 epithets and to whom the largest number of Rig Vedic hymns — 250 out of more than a thousand — are dedicated, was the most important. A god of war and wielder of thunderbolt, rowdy and adulterous, potbellied from excessive drinking, he is described in Vedic passages as a great boozer and dipsomaniac; he is said to have drunk three lakes of soma before slaying the dragon Vritra. Like Indra, many other Vedic gods were soma drinkers but they do not seem to have been tipplers. Agni, for example, may have drunk moderately though a detailed analysis will show that teetotalism was unknown to the Vedic gods and drinking was an essential feature of sacrifices performed in their honour. In a ritual performed at the beginning of the Vajapeya sacrifice, a collective drinking took place in which a sacrificer offered five cups to Indra as well as 17 cups of soma and 17 cups of sura to 34 gods.
Like the Vedic texts, the epics provide evidence of the use of intoxicating drinks by those who enjoy godly status in Hindu religion. In the Mahabharata, for example, Sanjay describes Krishna (an incarnation of the god Vishnu) and Arjuna in the company of Draupadi and Satyabhama (wife of Krishna and an incarnation of Bhudevi), exhilarated by Bassia wine. In the Harivamsa, which is an appendix to the Mahabharata, Balarama, an avatara of Vishnu, is described as “inflamed by plentiful libations of kadamba liquor” dancing with his wife. And in the Ramayana, Rama, an avatara of Vishnu, is described as embracing Sita and making her drink pure maireya wine. Sita, incidentally, seems to have a great fascination for wine: While crossing the river Ganga, she promises to offer her rice cooked with meat (shall we call it biryani!) and thousands of jars of wine, and while being ferried across the Yamuna, she says that she will worship the river with a thousand cows and 100 jars of wine when her husband accomplishes his vow. The use of alcohol by the gods is not confined to the Vedic and epic traditions. In the Puranic mythology, Varuni, who emerged from the samudramanthana (churning of the ocean), is the Indian goddess of wine; Varuni was also the name of a variety of strong liquor.
The Tantric religion is characterised by the use of five makaras — madya (wine), mamsa (meat), matsya (fish), mudra (gesture) and maithuna (sexual intercourse) — and these were offered to gods, though only the followers of Vamachara were entitled to the use of panchamakara (five Ms). Much can be said about the Tantric affiliation of the goddess Kali and her various manifestations but it should suffice to refer to a goddess called Chandamari, a form of Kali and described in an 11th century text as using human skulls as drinking vessels. In the Kularnavatantra, an early medieval text, it is stated that “wine and meat are the symbols of Shakti and Shiva respectively and their consumer is Bhairava”. Not surprisingly, liquor was offered to Bhairava in early India. The practice has continued in our own times and one can see this at Bhairava temple in Delhi and at Kala Bhairava temple in Ujjain. According to a practice current in Birbhum, a “gigantic vessel of wine is brought in front of the deity called Dharma” who is carried in a procession to the house of a Sundi, who belongs to the wine-making caste. In both Tantric and tribal religions, the divinities are often associated with alcohol in various ways. These few examples cited here clearly show that some gods and goddesses were fond of alcohol and their worship would remain incomplete without it.
It may be pointed out that there were a large variety of intoxicating drinks, nearly 50 types of them, available in ancient India. The use of alcohol by men was quite common, despite occasional dharmashatric objections in the case of Brahmins; and instances of drinking among women were not rare. Buddhist Jataka literature mentions many instances of drunkenness. Sanskrit literature is replete with references to intoxicating drinks. The works of Kalidasa and other poets speak frequently of alcoholic drinks. Ancient Indians were bon vivant in a sense. If their gods were fond of good things of life, our politicians need not be offended by the divine hedonism. Prohibitionists should be considerate: Don’t forget, gods are watching!
डीएन झा का यह लेख द इंडियन एक्सप्रेस से साभार लिया गया है.
पीलीभीत। यूपी में योगीराज आने के बाद भी सुशासन कायम नहीं हो पाया. प्रशासन वैसे भी काम नहीं करता था और अब भी नहीं कर रहा है. इन दिनों पूरा भारत बारिश और बाढ़ से प्रभावित है. यूपी भी बारिश और बाढ़ से प्रभावित है. ऐसे में जगह-जगह जलभराव की समस्या भी हो रही है लेकिन यूपी प्रशासन कोई जल निकासी के लिए कोई कदम नहीं उठा रहा है.
ऐसे ही मुद्दे से जुड़ा मामला पीलीभीत के बीसलपुर से आया है. यहां कि दलित बस्ती के पास भरा नाले का गंदा पानी बस्ती के लोगों के लिए नासूर बना हुआ है. गंदे पानी से उठने वाली दुर्गंध से बस्ती के लोग परेशान हैं. समस्या से निजात पाने को लंबे समय से विभागीय अफसरों के पास चक्कर लगाते थक चुके हैं.
शहर के मुहल्ला दुर्गा प्रसाद में स्थित दलित बस्ती के पास बना नाला क्षतिग्रस्त होने के कारण उसका गंदा पानी पिछले कई वर्षों से बस्ती के पास भरा हुआ है. बारिश होने पर जल भराव की समस्या बस्ती के लोगों के लिए मुसीबत बनी हुई है. गंदे पानी से उठने वाली दुर्गंध से बस्ती के लोग परेशान हैं.
कई बार यहां के लोग पालिका कार्यालय में दूषित जल भराव के शिकायत कर चुके हैं परंतु अभी तक पालिका के अधिकारियों द्वारा ध्यान नहीं दिया गया है. जलभराव से बस्ती की महिलाओं को सबसे अधिक दिक्कत हो रही है. लेकिन प्रशासन अब भी सिर्फ दिलासा ही दे रहा है. बस्ती के लोगों ने समस्या का शीघ्र समाधान न होने पर आंदोलन करने की चेतावनी दी है.
नई दिल्ली। भारतीय जनता पार्टी जब सरकार बनाने की जद्दोजहद में लगी थी तब उनका एक मुद्दा धारा 370 को खत्म करना भी था जिसके तहत कश्मीर राज्य को विशेषाधिकार मिले हुये हैं. अब इस धारा 370 को लेकर ताजा बयान जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती का आया है. जिसमें उन्होंने उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 35(A) में किसी तरह की छेड़छाड़ को लेकर चेतावनी दी है. उन्होंने कहा कि “एक तरफ हम संविधान के दायरे में कश्मीर मुद्दे का समाधान करने की बात करते हैं और दूसरी तरफ हम इसपर हमला करते हैं.”मुफ्ती अनुच्छेद 35A को खत्म करने की कोशिशों पर बोल रही थीं. गौरतलब है की साल 2014 में एक एनजीओ ने रिट याचिका दायर करके अनुच्छेद 35A को खत्म करने की मांग की थी. मामला अभी सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है.
उन्होंने आगे कहा कि यदि इस धारा में बदलाव होता है तो मुझे यह कहते हुए झिझक नहीं होगी कि कश्मीर में गिरे हुए तिरंगे को भी कोई नहीं उठाएगा. मुख्यमंत्री ने कहा कि इस तरह के प्रावधान लागू कर आप अलगाववादियों पर निशाना नहीं साध रहे बल्कि उन सैन्यबल को कमजोर कर रहे हैं जिन्होंने भारत को स्वीकृत कर चुनावों में हिस्सा लिया है. वे जम्मू कश्मीर को भारत के साथ मिलाने के लिए प्रयास कर रहे हैं. आप उन्हें कमजोर बना रहे हैं.
बता दें कि ‘वी द सिटिजंस’ नामक एनजीओ द्वारा इस याचिका को चुनौती दी गयी. इस याचिका में संविधान के अनुच्छेद 35ए और अनुच्छेद 370 को यह कहते हुए चुनौती दी गई है कि इन प्रावधानों के चलते जम्मू-कश्मीर सरकार राज्य के कई लोगों को उनके मौलिक अधिकारों तक से वंचित कर रही है. सर्वोच्च न्यायालय ने इस याचिका पर सुनवाई के लिए तीन जजों की एक पीठ गठित करने की बात कही है जो छह हफ़्तों के बाद इस पर सुनवाई शुरू करेगी. इस अनुच्छेद के तहत देश के अन्य हिस्सों के नागरिकों को जम्मू कश्मीर में अचल संपत्ति का अधिग्रहण या राज्य सरकार में रोजगार नहीं मिल सकता है. अब सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को बड़ी बहस के लिए तीन सदस्यीय जजों के बेंच को सौंप दिया है जिस पर कोर्ट का बड़ा फैसला आना बाकि है.
मुंबई। दक्षिण के सुपरस्टार और बॉलीवुड कमल हासन की दो बेटियां हैं श्रुति हासन और अक्षरा हासन. ये दोनों ही फिल्म इंडस्ट्री में सक्रिय हैं. लेकिन अब कमल हासन की बेटी अक्षरा हासन इन दिनों चर्चा में हैं. हालांकि, इस बार उनकी चर्चा किसी फिल्म की वजह से नहीं बल्कि धर्म परिवर्तन की खबरों की वजह से हो रही है.
हिंदू धर्म में स्थापित आडंबर और कुरीतियों से तंग आकर लोग लगातार धर्म छोड़ रहे हैं. हिंदू धर्म छोड़कर लोग बौद्ध धर्म की तरफ आकर्षित हो रहे हैं और उसमें जा रहे हैं. दरअसल हाल ही में दिए एक इंटरव्यू में अक्षरा ने बताया कि वो नास्तिक थीं, लेकिन बौद्ध धर्म ने उन्हें आकर्षित किया इसलिए उन्होंने हाल ही में बौद्ध धर्म अपना लिया है. अपनी बहन श्रुति हसन के विपरीत अक्षरा एक डायरेक्टर बनना चाहती हैं और भविष्य में कमल, सारिका और श्रुति हसन को डायरेक्ट करने के लिए उत्सुक हैं.
अमिताभ बच्चन और धनुष के साथ ‘शमिताभ’ फिल्म से करियर की शुरुआत करने के बावजूद अक्षरा हासन अभी तक फिल्म इंडस्ट्री में अपनी पहचान नहीं बना पाई हैं. ‘शमिताभ’ के बाद अक्षरा एक और फिल्म ‘लाली की शादी में लड्डू दीवाना’ में नजर आईं थीं. अक्षरा जल्द ही साउथ की फिल्म ‘विवेगम’ में नजर आने वाली हैं.
मुंबई। सभी जानते हैं की बॉलीवुड एक्टर अक्षय कुमार इंडस्ट्री के उन अभिनेताओं में से हैं जो कि रियल लाइफ हीरो हैं. जवानों के लिए आर्थिक मदद करना हो या गरीबों और जरूरतमंदों को डोनेशन देना, उनके कदम लोगों को लगातार बेहतर बनने और दूसरों की मदद करने के लिए प्रेरित करते रहते हैं.
अक्षय की जिंदगी की कहानी भी कम फिल्मी नहीं है. चांदनी चौक में पराठे वाली गली से मॉडलिंग और मार्शल आर्ट में उनका टैलेंट सभी कुछ फिल्म के किसी हिस्से जैसा लगता है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि अक्षय की जिंदगी का एक हिस्सा वह भी है जब उन्हें सेक्सुअल एब्यूज का शिकार होना पड़ा था. अक्षय ने ह्यूमन ट्रैफिकिंग पर आयोजित की गई एक प्रैस कॉन्फ्रेंस में अपने इस बुरे अनुभव को साझा किया.
अक्षय ने बताया कि जब वह छोटे थे तो उनका लिफ्टमैन उन्हें गलत ढंग से छूने की कोशिश किया करता था क्योंकि अक्की अपने माता-पिता से खुलकर बात किया करते थे इसलिए उन्होंने इसका जिक्र अपने पेरेंट्स से किया. बाद में वह शख्स ऐसी ही हरकतों के चलते पकड़ा गया. अक्षय ने लोगों से अपील की कि वह अपने बच्चों के साथ मुखर हों और बच्चे भी ऐसी किसी भी घटना के होने पर खुलकर अपने माता-पिता के सामने इसे रखें. गौरतलब है कि अक्षय को हाल ही में बॉम्बे म्यूनिसिपल कॉर्पेरेशन का ब्रांड एंबेसडर बनाया गया है. नगर निगम की तरफ से अक्की अब मुंबई वालों को जागरुक करेंगे.
नई दिल्ली। संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) ने सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा के नतीजे घोषित कर दिए हैं. प्रारंभिक परीक्षा में सफल उम्मीदवारों की सूची आयोग की आधिकारिक वेबसाइट upsc.gov.in पर जारी कर दी गई है. नतीजे 18 जून को हुई प्रारंभिक परीक्षा के आधार पर घोषित किए गए हैं. यूपीएससी ने उन उम्मीदवारों के नाम भी घोषित कर दिए हैं जिन्होंने भारतीय वन सेवा मुख्य परीक्षा 2017 के लिए क्वालिफाई किया है.
प्रारंभिक परीक्षा पास करने वाले उम्मीदवारों ने सिविल सेवा मुख्य परीक्षा के लिए क्वालिफाई कर लिया है. पास होने वाले सभी उम्मीदवार सिविल सेवा मुख्य परीक्षा (2017) का विस्तृत आवेदन पत्र ऑनलाइन भर सकते हैं. आवेदन का फार्म यूपीएससी की वेबसाइट www.upsc.gov.in पर 17 अगस्त से 31 अगस्त, 2017 की शाम 6 बजे तक उपलब्ध रहेगा. सिविल सेवा (मुख्य) परीक्षा, 2017 का आयोजन 28 अक्तूबर को होगा.
भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस), भारतीय विदेश सेवा (आईएफएस) और भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) सहित अन्य शीर्ष सेवाओं के अधिकारियों के चयन के लिए यूपीएससी हर साल तीन चरणों – प्रारंभिक, मुख्य एवं साक्षात्कार – वाली सिविल सेवा परीक्षा आयोजित करती है. देश भर के विभिन्न केंद्रों पर हर साल लाखों परीक्षार्थी सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा में शामिल होते हैं.
परीक्षा प्रारंभ होने से लगभग 2 सप्ताह पहले पात्र उम्मीखदवारों के संदर्भ में मुख्य परीक्षा के लिए समय-सारणी और ई-प्रवेश पत्र आयोग की वेबसाइट पर अपलोड कर दिए जाएंगे. डीएएफ (सीएसएम) जमा करने के बाद डाक पते या ई-मेल पते या मोबाइल नंबर में हुए परिवर्तन, यदि कोई हों, के बारे में आयोग को तुरन्त सूचित किया जाए.
सिविल सेवा (प्रारंभिक) परीक्षा, 2017 के माध्यम से ली गई स्क्रीनिंग टेस्ट के अंक, कट ऑफ अंक और उत्तर कुंजी सिविल सेवा (प्रधान), परीक्षा, 2017 की संपूर्ण प्रक्रिया अर्थात् सिविल सेवा परीक्षा, 2017 के अंतिम परिणाम की घोषणा के बाद ही आयोग की वेबसाइट www.upsc.gov.in पर अपलोड किए जाएंगे.
कोलंबो। 2009 में श्रीलंका टीम पाकिस्तान में मैच खेलने गयी थी जिस पर आंतकवादियों ने हमला कर दिया था जिसके बाद पाकिस्तान में कई साल दूसरी अन्य टीम भी खेलने नहीं आयीं थी. पर इस साल फिर से श्रीलंका क्रिकेट बोर्ड को टीम भेजने की लिए आग्रह किया पर दो टी-20 मैच के लिए अपनी टीम पाकिस्तान भेजने का पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड का निमंत्रण श्रीलंका ने ठुकरा दिया है.
पीसीबी अध्यक्ष शहरयार खान ने इसकी बात की पुष्टि है कि श्रीलंका क्रिकेट अधिकारियों ने इस सप्ताह की शुरू में लाहौर में टी20 मैच खेलने के लिए अपनी टीम भेजने से इनकार किया है. 2009 में लाहौर में श्रीलंकाई टीम पर आतंकी हमला हुआ था, उसके बाद से किसी भी देश ने पाकिस्तान का दौरा नहीं किया है. खान ने कहा, ‘मैने श्रीलंका क्रिकेट अधिकारियों से आईसीसी बैठकों के दौरान बात की. मैंने उन्हें लाहौर में दो टी-20 मैच खेलने के लिए आने का और उसके बाद के मैच यूएई में खेलने का न्यौता दिया था.’
उन्होंने कहा कि श्रीलंका क्रिकेट अधिकारियों ने उन्हें आश्वासन दिया था कि वे सरकार से बात करके मंजूरी लेने की कोशिश करेंगे. उन्होंने कहा, ‘मैं श्रीलंका के इंकार से थोड़ा हैरान हूं क्योंकि आतंकी हमले दुनिया में हर जगह हो रहे हैं लेकिन खेल भी हो रहे हैं. सुरक्षा कारणों से सिर्फ पाकिस्तान को अलग करना गलत है. खान ने कहा कि इस साल मार्च में पीसीबी ने पाकिस्तान सुपर लीग के फाइनल का लाहौर में सफलतापूर्वक आयोजन किया था और उच्च स्तरीय सुरक्षा दी गई थी. हम इसी तरह की मजबूत सुऱक्षा अन्य बड़ी टीमों को भी देंगे पर हम पर विश्वास करना होगा तभी यह मुमकिन है.
नई दिल्ली। ई कॉमर्स कंपनी अमेजन के सीईओ और संस्थापक जेफ बेजोस ने माइक्रोसॉफ्ट के संस्थापक बिल गेट्स को दुनिया के सबसे धनी व्यक्ति के मामले में पीछे छोड़ दिया. गुरुवार को फोर्ब्स ने रिपोर्ट जारी करते हुए कहा कि बेजोस के पास 90.5 बिलियन डॉलर की संपत्ति हो गई है जबकि माइक्रोसॉफ्ट के मालिक बिल गेट्स के पास 90 बिलियन डॉलर की संपत्ति है.
लेकिन कुछ ही घंटों के भीतर मार्केट में अमेजन कंपनी के शेयर गिरने से बेजोस फिर से बिल गेट्स से पिछड़ गए. अमेजन ने हाल ही में यूएस ग्रोसर हॉल फूड्स को हासिल करने की योजना बनाई थी, जिससे अमेजन का विस्तार किया जा सके. पिछले चार माह में अमेजन के शेयर 1.7 प्रतिशत से उछलकर 25 प्रतिशत हो गए है.
फोर्ब्स के अनुसार, बिल गेट्स पिछले चार साल से दुनिया के सबसे धनी व्यक्ति हैं. वहीं, पिछले 22 सालों में बिल गेट्स 18 बार अमीर शख्स के तौर पर काबिज रह चुके हैं. आपको बता दें कि 2010 से 2013 में मेक्सिकन टेलिकॉम मैग्नेट कार्लोस स्लिम ने बिल गेट्स को पिछे छोड़ दिया था. जेफ बेजोस की सबसे ज्यादा आय अमेजन से ही होती है.
इसके अलावा बेजोस ब्लू ओरिजिन और वॉशिंगटन पोस्ट अखबार के भी मालिक हैं. बिलेनियर जेफ बेजोस ने 2016 में अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव में डोनल्ड ट्रंप का विरोध किया था लेकिन चुनाव के बाद ट्रंप जब राष्ट्रपति बने तो यूएस कंपनी अमेजन को ही सबसे अधिक फायदा हुआ.
जेफ ने अपना कैऱियर ऑनलाइन बुक्स बेचने से शुरू किया था. सबसे पहले उन्होंने इसके लिए जहां पर ऑफिस बनाया वो एक कार गैराज था, जहां से उनके बिजनेस को आगे बढ़ाने का मौका मिला.
जेफ बेजोस टेक बेस्ड कंपनी के अलावा पत्रकारिता से भी जुड़े हुए हैं. वो दुनिया के प्रसिद्ध अखबारों में से एक वाशिंगटन पोस्ट के मालिक भी हैं. यह दुनिया के उन पहले अखबारों में था जिसने सबसे पहले अपना मोबाइल ऐप और वेबसाइट लांच की थी.
पटना। जदयू के भाजपा की गोद में जाते ही बिहार की राजनीति पूरे रोमांच पर है. विपक्ष की ओर से नीतीश का जबर्दस्त विरोध हो रहा है जो दिल्ली से लेकर केरल तक जारी है. बिहार में अभी दो दिन पहले तक JDU और RJD साथ थे और अब ये एक दूसरे के आमने सामने हैं. अब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राजद का साथ छोड़ बीजेपी का दामन थाम लिया है. इसी बीच आरजेडी सुप्रीमो लालू यादव के बेड़े तेज प्रताप ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर तंज कसते हुए कल सोशल मीडिया पर नाग पंचमी की शुभकामनाएं दीं.
तेज प्रताप ने अपने ट्वीट में नाग की इमोजी का भी इस्तेमाल किया और ट्विटर पर लिखा, ‘माननीय नीतीश कुमार जी को नाग पंचमी की बहुत-बहुत शुभकामनाएं..’
वहीं पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने कहा कि मैं इस प्रस्ताव के विरोध में खड़ा हूं. हमें बीजेपी के खिलाफ वोट मिला था, ये सब पहले से प्लान था साथ ही तेज प्रताप ने कहा कि ये एक तरह से लोकतंत्र की हत्या है जो हो रहा है यह लोकतंत्र के लिये बहुत नुकसानदायक है.
बीजिंग। सिक्किम में डोकलाम पर जारी विवाद के बीच ब्रिक्स देशों के सम्मेलन में हिस्सा लेने बीजिंग गए एनएस अजीत डोभाल ने शुक्रवार को चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग मुलाकात की. इससे पहले डोभाल ने चीन के अपने प्रतिपक्षी यांग जेयची से मुलाकात की.
इस दौरान दोनों पक्षों के बीच द्विपक्षीय मुद्दों की ‘बड़ी समस्याओं’ पर भी चर्चा हुई. विदेश मंत्रालय के अनुसार सिक्किम क्षेत्र में विगत 16 जून को शुरू हुए सैन्य विवाद के बाद से दोनों देशों के बीच यह पहली उच्च स्तरीय बैठक है.
चीनी विदेश मंत्रालय ने गुरुवार को डोभाल और यांग की बैठक के संबंध में कहा कि इस दौरान यांग ने द्विपक्षीय मुद्दों पर और प्रमुख समस्याओं पर विस्तार से चीन की स्थिति बयान की. समझा जाता है कि चीन ने डोकलाम क्षेत्र में गतिरोध पर अपना पक्ष रखा है. हालांकि चीन की सरकारी समाचार एजेंसी शिन्हुआ ने यह भी बताया कि यांग ने डोभाल और दक्षिण अफ्रीका और ब्राजील के उनके प्रतिपक्षी अधिकारियों से उन्होंने अलग-अलग बातचीत की.
हालांकि शिन्हुआ की रिपोर्ट में सिक्कम में हुए टकराव पर प्रत्यक्ष रूप से कुछ नहीं है. दोनों उच्च अधिकारियों के बीच द्विपक्षीय के अलावा, अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय मुद्दों पर भी विचार-विमर्श हुआ. हालांकि चीन के सरकारी मीडिया ने लगातार यही धमकी दी है कि अगर भारत उस विवादित जगह से अपनी सेनाएं पीछे नहीं हटायेगा तब तक इस मुद्दे पर कोई बात नहीं होगी.
गौरतलब है कि अजीत डोभाल की इस बैठक का कोई ब्योरा भारतीय मीडिया को चीन ने नहीं दिया है. हालांकि मीडिया कल यानी शुक्रवार को पांच देशों के ब्रिक्स सदस्य देशों की संयुक्त बैठक को कवर करेगी.
सहारनपुर। करीब डेढ़ महीने पहले भाजपा सरकार ने जातीय हिंसा का आरोप लगाते हुए भीम आर्मी के संस्थापक को जेल में बंद कर दिया था जिसके बाद से उनके बारे में कोई भी खबर बाहरी लोगों को नहीं मिल रही थी पर कल खबर मिली की चन्द्रशेखर के साथ जेल में मारपीट की जा रही है. इसका पता लगने के बाद उनके समर्थक जेल में हुए जानलेवा हमले के विरोध में कलक्ट्रेट पर एकत्रित हुए. कार्यकर्ताओं ने आरोप लगाया कि चन्द्रशेखर पर अन्य बंदियों ने जेल में दो बार जानलेवा हमला किया है.
जेल में चन्द्रशेखर की जान को खतरा है. उन्होंने इस मामले की जांच और जेल प्रशासन के खिलाफ कार्रवाई की मांग को लेकर कलक्ट्रेट में प्रदर्शन किया और चेतावनी दी कि इस मामले में कार्रवाई न होने पर उन्हें सड़कों पर उतरकर आंदोलन के लिए विवश होना पड़ेगा.
बता दें की गुरुवार को कलक्ट्रेट में भीम आर्मी के कार्यकर्ता एकत्रित हुए. कार्यकर्ताओं ने बताया कि भीम आर्मी के जिलाध्यक्ष कमल वालिया की मां 26 जुलाई को जेल में कमल से मुलाकात करने पहुंची थीं. मुलाकात के दौरान कमल ने बताया कि 25 जुलाई को चंद्रशेखर पर दो बार जानलेवा हमला किया गया है. चंद्रशेखर की बैरक से आवाजें आने के बाद जेल में बंद अन्य कार्यकर्ताओं को घटना की जानकारी हुई. उन्होंने बताया कि हमलावरों ने बैरक में रखी किताबें और कपड़े भी इधर-उधर फेंक दिए.
इसी को लेकर गुरुवार को कार्यकर्ता जिलाधिकारी से मिलने पहुंचे. कार्यकर्ताओं का आरोप है कि जिला जेल में हाल ही में तैनात किए गए अधिकारी भी अत्याचार कर रहे हैं. उन्होंने जिलाधिकारी व एसएसपी के नाम ज्ञापन सौंपकर कारागार के अधिकारियों को तत्काल हटाने, इस घटना की निष्पक्ष जांच कराने और कार्यकर्ताओं को सुरक्षा उपलब्ध कराने की मांग की है. मांग पूरी न होने पर कार्यकर्ताओं ने सड़कों पर उतरकर आंदोलन करने की चेतावनी दी है और कहा है कि अगर भीम आर्मी संस्थापक को कुछ भी हुआ तो परिणाम बहुत गंभीर होंगे.
मुंबई। नेशनल अवार्ड विनिंग डायरेक्टर मधुर भंडारकर की फिल्म ‘इंदु सरकार’ पर पिछले काफी समय से हो हल्ला मचा हुआ था. आखिरकार इस फिल्म ने सिनेमाघरों में दस्तक दे दी है. फिल्म की शुरुआत भले ही डिस्क्लेमर से होती है कि यह फिल्म काल्पनिक घटनाओं पर आधारित है, लेकिन हकीकत में यह फिल्म देश के काले अध्याय इमरजेंसी की बात करती है. फिल्म में1975 से 1977 के उस अध्याय का जिक्र किया गया है. जो लोकतंत्र पर धब्बे के रूप में याद किया जाता है.
फिल्म की कहानी मुबीपुरा गांव में पुलिस के पहुंचने से शुरू होती है. पुलिस वहां से सभी पुरुष निवासियों को हिरासत में लेते हैं, फिर घोषणा करते हैं नसबंदी का साथ दो. जिसके बाद लोग भागने लगते हैं. सब खुद को अलग -अलग जगह छिपाने की कोशिश करते हैं. लोग विरोध करते हैं जिसके बाद पुलिस लाठी चार्ज करती है. मेरी नसबंदी क्यों कर रहे हो? एक 70 वर्षीय बूढ़ा पूछता है तो 13 वर्षीय लड़का भी. यह दृश्य फिल्म की शुरुआत को पर्दे पर बहुत सशक्त तरीके से सामने लाती है, उसके बाद कहानी अनाथ इंदु सरकार पर चली जाती है.
जो कवयित्री बनना चाहती है लेकिन इंदु (कीर्ति कुल्हाड़ी) की शादी सरकारी अफसर नवीन सरकार (तोता रॉय चौधरी) के साथ हो जाती है. इमरजेंसी में सरकार का रवैया इंदु को अच्छा नहीं लगता. दूसरी तरफ इंदु के पति अपने फायदे के लिए सरकार का साथ देने लगते हैं , इस वजह से इंदु और नवीन में अलगाव हो जाता है. इंदु सरकार की योजनाओं का विरोध करने लगती है और सरकार के खिलाफ मोर्चा शुरू कर देती है. कहानी में कई मोड़ आते हैं, फिल्म का रिसर्च वर्क अच्छा है.
इमरजेंसी के दौरान नसबंदी और मीडियाबंदी के साथ-साथ बाकी कई तरह के मुद्दों पर प्रकाश डालने की कोशिश की गयी है. संजय गांधी के लिए गाने से इनकार करने के बाद रेडियो और टेलीविजन से किशोर कुमार पर अनौपचारिक प्रतिबंध का भी फिल्म में उल्लेख किया गया है. फिल्म में इंदिरा गांधी के किरदार को मम्मीजी के तौर पर और संजय गांधी को चीफ के तौर पर दिखाया गया है. फिल्म में इंदिरा गांधी और संजय गांधी पर फोकस न कर इमरजेंसी के दौरान जो राजनीतिक कदम उठाये गए हैं उस पर है. राजनीतिक विरोधियों को कैद में डालने की घटना का भी जिक्र है.. फिल्म में इसका भी जिक्र है कि लोगों का भरोसा जीतने के लिए जब संजय गांधी इमरजेंसी खत्म कर चुनाव करवाते हैं लेकिन वह मुंह की खाते हैं. कहानी को थोड़ा और निखारने की ज़रूरत थी खासकर इंदु सरकार की शादीशुदा ज़िंदगी के बजाय इमरजेंसी के किस्सों और जोड़ने की जरुरत महसूस होती है.
चाईबासा। कुछ लोग समाज में अनोखी अलख जगाने के लिए ही पैदा होते हैं. भूदेव भक्त पर यह बात सटीक बैठती है. करीब बीस वर्ष पहले जेएनयू दिल्ली में पढ़ाई करते समय उनका सपना सिविल सेवा में शामिल होना था, लेकिन उन्होंने अपने आसपास कुछ ऐसा देखा कि अपनी जिंदगी की धारा ही बदल ली. झारखंड के पूर्वी सिंहभूमी जिले के जादूगोड़ा निवासी भूदेव भक्त बेहद साधारण परिवार में जन्मे हैं. पढ़ाई के दौरान समाजशास्त्र की कक्षाओं ने उनके जीवन का लक्ष्य ही बदल दिया. दिल्ली की झुग्गियों में रहने वाली महिलाओं पर एक प्रोजेक्ट पूरा करते-करते उन्होंने अपने भविष्य का लक्ष्य तय कर लिया. रसोई में धुएं से जूझती महिलाओं की स्थिति को देख वह विचलित हो गए. अब वह 11 साल से नक्सली इलाके में धुआं रहित चूल्हे से आदिवासी महिलाओं की सेहत को सहेजने में जुटे हैं.
केंद्र सरकार की उज्ज्वला योजना जिस बुनियादी उद्देश्य के साथ महिलाओं के लिए चलाई जा रही है, लगभग उसी के लिए भूदेव ने काफी पहले अपना अभियान छेड़ दिया था. अंतर इतना है कि केंद्र सरकार उज्ज्वला के तहत गरीब परिवारों को मुफ्त रसोई गैस कनेक्शन उपलब्ध करा रही है और भूदेव लकड़ी जलाकर ही खाना बनाने की क्षेत्रीय मजबूरियों में घिरीं महिलाओं को एक विशेष चूल्हे के जरिये धुएं से आजादी दिलाने में कामयाब हुए हैं. नक्सल प्रभावित वन क्षेत्रों में फिलहाल उज्ज्वला योजना पूरी तरह धरातल पर नहीं उतर सकी है. जिन्हें गैस सिलेंडर मिला भी है, वे भी लकड़ी की आसान उपलब्धता के कारण उसे ही प्राथमिकता देते हैं.
भूदेव ने 2006 से 2016 तक करीब 500 महिलाओं को रोजगार के लिए प्रशिक्षित कर उनसे धुआं-रहित चूल्हे का निर्माण कराया. इसके बाद बेहद व्यवस्थित तरीके से शिक्षित बेरोजगार महिला समिति नामक संगठन का गठन कर इन चूल्हों को तीन जिलों के सात ब्लॉक में रहने वाली 2500 महिलाओं तक पहुंचा दिया. पश्चिमी सिंहभूमी में 300 महिलाओं को वह धुआं-रहित चूल्हा बनाने का स्थायी रोजगार मुहैया करा चुके हैं. इस चूल्हे की निर्माण लागत हजार रुपये के करीब है. भूदेव ने स्वरोजगार से जुड़ीं इन महिलाओं को हस्तकला का प्रशिक्षिण भी दिला दिया है. नतीजा यह है कि महिलाएं बांस से घरेलू सामग्री बनाने में भी माहिर हो गईं.
इस चूल्हे में खाना बनाने के दौरान लकड़ी जलने पर भी निकलने वाला धुआं महिलाओं के श्वांस तंत्र तक नहीं पहुंचता है. सीमेंट के इस चूल्हे में पाइप लगाए जाते हैं, जिससे धुआं आसपास नहीं फैलकर ऊपर की ओर निकल जाता है. इस धुआं-रहित चूल्हा बनाने के लिए क्रेशर डस्ट या पत्थर चूर्ण, छड़ की जाली, ईंट, सीमेंट, मिट्टी की बनीं पांच चिमनी और एक लकड़ी के फ्रेम की जरूरत पड़ती है.
जानकारी देते हुए भूदेव भक्त बताते हैं मुझे खुशी है कि इस पहल को आत्मनिर्भर होने के साथ-साथ धुंआ रहित चुल्हों की शौगात भी मिल गयी.
रांची। बदलते भारत में इस तरह की घटनाऐं दहलाती हैं एक तरफ डिजीटल इंडिया पर जोर दिया जा रहा है तो दूसरी तरफ भूत पिशाच जैसे अंधविश्वास के नाम पर महिलाओं को मार दिया जाता है. अंधविश्वास में हत्याएं और प्रताडऩा झारखंड के लिए कोई नई घटना नहीं हैं. पहले भी राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में शर्मसार कर देने वाली ऐसी घटनाएं घट चुकी हैं. कभी अलौकिक शक्ति हासिल करने की चाह में मासूमों की बलि दे दी गई, तो कभी विधवा, वृद्ध और अधेड़ महिलाओं को मौत के घाट उतार दिया गया. इन सभी घटनाओं की जड़ में कहीं न कहीं अंधविश्वास ही रहा है.
झारखंड गठन के बीते 17 वर्षों की बात करें तो डायन करार देकर अच्छी-भली 1600 से अधिक महिलाएं मार डाली गईं. दर्जनों महिलाएं सपरिवार गांव से बहिष्कृत कर दी गईं. इतना ही नहीं डायन करार देकर निर्वस्त्र घुमाने, गंदगी खिलाने-पिलाने, शव के साथ कमरे में बंद कर देने जैसी असंख्य घटनाओं का गवाह रहा है झारखंड. शनिवार की घटना तो अंधविश्वास की सारी हदें ही पार कर गई.
जानकारी मिली है की तथाकथित तंत्र विद्या की सिद्धि के लिए गुमला में छह वर्ष के मासूम की बलि दे दी गई. हद तो यह कि खुद थाने में सरेंडर करने वाले हत्यारे ने पूर्व में अपने बेटे की बलि देने का खुलासा किया. ऐसे में हम डिजिटलाइजेशन की दुहाई दें, विकास दर में लंबी छलांग लगाने का दंभ भरें, बेइमानी ही होगी. तथाकथित डायन-बिसाही कुप्रथा के खिलाफ झारखंड में जंग लड़ रहे शोधकर्ताओं की मानें तो इस अंधविश्वास की जड़ में अशिक्षा तो है ही, तथाकथित ओझा-गुणी भी ऐसी घटनाओं के लिए जिम्मेदार हैं. उनके इशारे मात्र पर महिलाएं डायन करार कर दी जा रही हैं.
कुछ अपराधी प्रवृत्ति के लोग जमीन-जायदाद के लालच में ओझा-गुणी को आगे कर ऐसी घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं. ऐसी बात भी नहीं है कि सरकार इस मामले में बिल्कुल ही चुप है. अपराधियों के खिलाफ जहां विभिन्न धाराओं के तहत कार्रवाई हो रही है, वहीं अलग से डायन प्रतिषेध अधिनियम भी प्रभावी है. लोगों को जागरुक करने के लिए सुदूर क्षेत्रों में प्रचार वाहन के अलावा नुक्कड़ नाटक आदि आयोजित किए जा रहे हैं. सरकार की कोशिश के बावजूद लोगों की आंखों पर पड़ी अंधविश्वास की यह पट्टी हटती नहीं दिख रही. आवश्यकता है अंधविश्वास के खिलाफ इस जंग में हर तबके की सहभागिता की. यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि जबतक समाज जाग्रत नहीं होगा, शिक्षा की ज्योति सुदूर क्षेत्रों में नहीं जलेगी तब तक इस तरह से हत्याऐँ होती रहेंगी.
पटना। बिहार विधानसभा में हंगामे के बीच आज नीतीश कुमार ने अपना विश्वास मत हासिल कर लिया है. विपक्ष ने आज जमकर हंगामा किया लेकिन आखिरकार नीतीश ने अपना विश्वासमत हासिल किया और 131 के वोट पक्ष को मिले तो वहीं 108 वोट विपक्ष को मिले. नीतीश के विश्वास मत हासिल करते ही राजद ने सदन से वॉकआउट किया और सदन की कार्यवाही स्थगित कर दी गई है.
आज सुबह 11 बजे से विधानसभा का विशेष सत्र शुरू हुई और तीखी बहस के बाद नीतीश के विश्वास मत पेश करने के बाद सदस्यों ने पहले सदन में सभी सदस्यों की हां और ना के बाद लॉबी डिवीजन से फ्लोर टेस्ट हुआ और ध्वनिमत से सदन में फैसला नहीं होने के बाद वोटिंग कराई गई.
विधानसभा में वोटिंग शुरू होने के बाद रजिस्टर पर एक-एक कर सदस्य अपने हस्ताक्षर किए. नीतीश ने तो विश्वासमत हासिल कर लिया है लेकिन राजद के तेवर को देखकर एेसा लगता है कि सरकार को पहली बार मजबूत विपक्ष का सामना करना पडे़गा.
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार आज सुबह बहुमत साबित करने के लिए सुबह 10.30 बजे ही विधानसभा पहुंचे, उनके पहुंचने के थोड़ी देर बाद उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी भी सदन पहुंचे. आज विधानसभा का विशेष सत्र बुलाया गया था. नीतीश कुमार ने विधानसभा में विश्वासमत पेश किया उसके बाद तेजस्वी ने नीतीश पर तीखा हमला किया और कई गंभीर आरोप लगाए.
पक्ष-विपक्ष के विवाद के बीच सदन में नीतीश कुमार ने विश्वासमत पर बोलते हुए कहा कि सदन की मर्यादा का पालन करना चाहिए. हम एक-एक बात का सबको जवाब देंगे. सत्ता सेवा के लिए होता है, मेवा के लिए नहीं. नीतीश ने कहा कि मैंने महागठबंधन धर्म का हमेशा पालन किया, लेकिन जब मेरे लिए मुश्किल आई तो इस्तीफा दे दिया.
लाहौर। पनामा केस मामले में पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट ने नवाज शरीफ को दोषी करार दिया है. इस फैसले के बाद नवाज शरीफ पाकिस्तान के पद से हटाए जाएंगे. सुप्रीम कोर्ट में 5 जजों की बेंच ने नवाज शरीफ के खिलाफ फैसला सुनाया. पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट ने एनएबी को आदेश दिया है कि वे दो हफ्तों के अंदर नवाज शरीफ और उनके परिवार के खिलाफ केस दायर करें. सुप्रीम कोर्ट ने नवाज शरीफ को पद से तुरंत इस्तीफा देने का आदेश दिया है.
बता दें कि शरीफ के परिवार के विदेश में संपत्ति अर्जित करने के आरोपों की जांच के लिए संयुक्त जांच दल का गठन किया गया था और जेआईटी ने 10 जुलाई को अपनी रिपोर्ट अदालत को सौंप दी थी. रिपोर्ट में कहा गया था कि शरीफ और उनके बच्चों का रहन सहन उनके आय के ज्ञात स्रोत के मुताबिक नहीं है. रिपोर्ट में उनके खिलाफ भ्रष्टाचार का नया मामला दर्ज करने का सुझाव दिया गया था.
नवाज शरीफ को अब कुर्सी छोड़नी पड़ेगी. उम्मीद की जा रही है कि उनके छोटे भाई शहबाज शरीफ की प्रधानमंत्री पद पर ताजपोशी तय है. मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को अगर सुप्रीम कोर्ट संवेदनशील पनामा पेपर्स मामले में कथित भ्रष्टाचार और मनी लॉन्ड्रिंग के लिए अयोग्य ठहराने के बाद उनके छोटे भाई एवं पंजाब प्रांत के मुख्यमंत्री शहबाज उनकी जगह ले सकते हैं.
शहबाज पाकिस्तानी संसद के निचले सदन नेशनल असेम्बली के सदस्य नहीं हैं, जिसके चलते वह फौरन उनका स्थान नहीं ले सकते और उन्हें चुनाव लड़ना होगा. पाकिस्तानी चैनल जियो न्यूज ने सूत्रों के हवाले से बताया कि शहबाज के उपचुनाव में चुने जाने तक रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ के 45 दिनों तक अंतरिम प्रधानमंत्री के तौर पर कार्यभार संभालने की संभावना है. यह निर्णय सत्तारूढ़ पाकिस्तान मुस्लिम लीग नवाज (पीएमएल-एन) की उच्च स्तरीय बैठक में लिया गया.
ऩई दिल्ली। रामनाथ कोविंद के रूप में भारत के इतिहास में दूसरी बार एक दलित भारत का राष्ट्रपति बना है. इसके पहले केवल के. आर. नारायणन ही भारत के राष्ट्रपति थे जो कि दलित थे. लेकिन उत्तर भारत से राष्ट्रपति बनने वाले देश के पहले दलित रामनाथ कोविंद ही हैं.
भाजपा के नेताओं द्वारा इसको दलित सम्मान के रूप में देखा जा रहा है. भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह हों या उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, सब के सब यह बताने में लगे हुए हैं कि कैसे यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दलितों के प्रति सम्मान और उनके प्रेम का प्रतीक है. यह भी कहा जा रहा है यह प्रधानमंत्री के द्वारा किया गया दलित सशक्तिकरण का अद्भुत नमूना है और इससे उन राजनेताओं और राजनीतिक दलों में खलबली मच गई है जो दलितों के नाम पर अपनी राजनीतिक दुकान चलाते हैं. पर क्या यह सही है कि नरेंद्र मोदी के अधीन भाजपा सरकार बनने के बाद दलितों का सशक्तिकरण हो रहा है? उन्हें उन पदों पर बैठाया जा रहा है जहां वह कभी नहीं पहुंच पाए? क्या उनको उस तरह के पद भी दिए जा रहे हैं जो उनको समाज में प्रभावी बदलाव करने में मदद देंगे?
यह सही है की भाजपा ने कोविंद को राष्ट्रपति बनाकर पहली बार उत्तर भारत के किसी दलित को यह सम्मान दिया है. पर कांग्रेस पार्टी, जो अभी भी इसकी प्रमुख प्रतिद्वंदी है, यह पहले ही कर चुकी है. हालांकि कांग्रेस ने दक्षिण भारत के एक दलित को यह सम्मान दिया था. पर भारत के राष्ट्रपति का पद मूल रूप से रबड़ स्टैम्प का है. यही कारण है कि आजतक कोई भी सशक्त नेता, जिसका बहुत जनाधार हो, कभी राष्ट्रपति बनने की दौड़ में नहीं आया.
इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि आज देश के दो सबसे प्रभावशाली व्यक्ति हैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह. नरेंद्र मोदी गुजरात की मोढ घांची जाति से हैं, जो कि उत्तर भारत के तेली जाति के समकक्ष है. यह जाति OBC केटेगरी में आती है. अमित शाह जैन बनिया जाति से आते हैं जो कि सामान्य श्रेणी में आती है. यानी कि भाजपा के दोनों सबसे बड़े व्यक्तियों में से कोई भी दलित नहीं है.
भारत सरकार की सबसे प्रभावी कमेटी होता है कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी. इस कमेटी के सदस्य हैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री राजनाथ सिंह, विदेश मंत्री सुषमा स्वराज एवं वित्त मंत्री एवं रक्षा मंत्री अरुण जेटली. जहां राजनाथ सिंह उत्तर प्रदेश के ठाकुर हैं वहीं अरुण जेटली एवं सुषमा स्वराज ब्राह्मण हैं. यानी कि इस समिति में कोई भी दलित समुदाय से नहीं हैं.
किसी भी राज्य में सबसे प्रभावी पद होता है मुख्यमंत्री का. आज भाजपा के नेतृत्व वाले नेशनल डेमोक्रेटिक अलायन्स के कुल 17 मुख्यमंत्री हैं. नार्थ ईस्ट के राज्यों को छोड़कर, जहां के अधिकतर मुख्यमंत्री अनुसूचित जनजाति के हैं, भाजपा या NDA का कोई भी मुख्यमंत्री दलित नहीं है.
पार्टी में अध्यक्ष के बाद सबसे प्रभावशाली पद महासचिव का होता है. वर्तमान में भाजपा के 8 महासचिव है एवं उनमें से कोई भी दलित नहीं है.
2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के टिकट पर कुल 40 दलित सांसद निर्वाचित हुए थे. उनमें से एक भी नरेंद्र मोदी के मंत्री परिषद् में कैबिनेट दर्जे का मंत्री नहीं हैं. उनके मंत्री परिषद् में कुल 24 कैबिनेट स्तर के मंत्री है जिनमें से 2 दलित हैं. ये हैं रामविलास पासवान, जो भाजपा के सहयोगी दल लोक जनशक्ति पार्टी से आते हैं. वहीं भाजपा के एकमात्र दलित कैबिनेट मंत्री थावरचंद गहलोत राज्य सभा के सदस्य है. गहलोत केंद्रीय सामाजिक न्याय व अधिकारिता मंत्री हैं, जो अपेक्षाकृत कम महत्वपूर्ण विभाग माना जाता है.
2011 के जनगणना के मुताबिक, भारत की कुल 16.6 प्रतिशत आबादी दलितों की है. यानी कि करीब 20.14 करोड़ लोग इस श्रेणी के हैं. भाजपा संघटन के विभिन्न पदाधिकारियों एवं पार्टी के द्वारा सरकारी पदों पर बैठे हुए लोगों का आकलन करने पर यह प्रतीत होता है कि या तो दलितों को समुचित प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया, और अगर हैं भी तो केवल सांकेतिक हैं. रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति बनाना भी उसी श्रेणी का विस्तार माना जाएगा. ऐसा नहीं है कि अतीत की किसी सरकार ने दलितों के सशक्तिकरण के लिए कोई क्रान्तिकारी कदम उठाया है. कमोवेश भाजपा भी उन्हीं के पदचिन्हों पर चल रही है. फिर भी, अगर इन्हें लगता है कि कोविंद को राष्ट्रपति बनाने से दलित वोट बैंक में सेंध लगाने में सफल हो जाएंगे, तो शायद शासक दल को निराशा ही हाथ लगेगी.
(लेखक अशोक उपाध्याय का यह लेख आईचौक इन या इंडिया टुडे ग्रुप हिंदी से साभार लिया गया है. लेख में कोई बदलाव नहीं किया गया है)
हमारा देश सदियों पुराना देश है जहां ना जाने कितने बड़े-बड़े राजा-महाराजाओं ने राज किया और देश के इतिहास के पन्नों पर अपने कार्यों के माध्यम से अमिट छाप छोड़ दी. जितना पुराना इस देश का इतिहास है, लगभग उतना ही पुरानी इसकी जातिप्रथा का भी कलंक इसके हिस्से में आता है. कम से कम दस हज़ार वर्षों से तो जातिप्रथा का घुन इस देश के गौरव को एक दीमक की तरह चाट रहा है. इतिहास के पन्नों की परतें फिरोलें तो पता चलता है कि आज से लगभग 5250 वर्ष पहले महाभारत का युद्ध कुरुक्षेत्र की धरती पर हुआ था और उस वक़्त इस युद्ध के महानायक, श्रीकृष्ण की आयु 83 वर्ष की थी! श्री कृष्ण से लगभग 2100 वर्ष पूर्व भगवान राम हुए थे और राम से तकरीबन दो-ढ़ाई हज़ार वर्ष पहले मनु महाराज नाम का एक ऋषि हुआ था. इस मनु महाराज से पहले समाज में होने वाले सभी कार्यों में तरलता थी, अर्थात कोई जातिपाति नहीं थी. समाज में अमीर-गरीब का भेदभाव तो था, लेकिन समाज में रहने वाले सभी लोगों को अपनी हैसियत और शारीरिक बल और बुद्धि के हिसाब से कोई भी काम धंधा करने की सबको आज़ादी थी.
लेकिन फिर मनु महाराज जैसे बड़े ही शातिर दिमाग वाले लोगों ने राज घरानों के साथ अपने असर रसूख के बलबूते पर इस एकदम सरल वर्गीकरण व्यवस्था में ऐसी तब्दिलियां लानी प्रारंभ कर दी (तकरीबन दस हज़ार वर्ष पहले) जिसने कि समाज को एक बहुत बड़े और भयानक बदलाव की दिशा की ओर धकेल दिया. इस मनु महाराज ने समाज में ऐसा बंटवारा करवा दिया कि उस वक़्त के जो ग़रीब लोग और उनकी आने वाली अनेकों पीढ़ियों कि दशा ही बदल डाली. क्योंकि राजे महाराजों के लिए यह व्यवस्था ज़्यादा फ़ायदेमंद साबित हो रही थी, उन्होंने इस व्यवस्था पर अपनी स्वीकृति की मोहर लगा दी. मैं तो इस मनु महाराज को एक बहुत बड़ा षडयंत्रकारी और चालबाज ही कहूंगा, क्योंकि उसने अपने जैसे लाखों अमीरजादों के मुनाफ़े के मद्देनज़र हमेशा के लिए अच्छी आर्थिक सुविधाजनक परिस्थितियां बना डाली और समाज को चार वर्णो में विभाजित कर दिया – ब्राह्मण, क्षत्रिया वैश्य और शूद्र. किसी भी मनुष्य को उसकी अपनी बुद्धि, बल और क्षमता के आधार पर समाज में बढ़ने, फैलने-फ़ूलने के सभी दरवाजे बंद कर दिए. पहले जो समाज में व्यवसायों के लिए तरलता थी, वह अब समाप्त हो चुकी थी, क्योंकि इस व्यवस्था के अनुसार, ब्राह्मणों के बच्चे हमेशा ब्राह्मण ही रहेंगे, क्षत्रियों के बच्चे हमेशा क्षत्रिय ही रहेंगे, और इसी तरह वैश्य हमेशा वैश्य ही और शूद्र हमेशा के लिए शूद्र ही रहेंगे. ब्राह्मणों के लिए पढ़ना-पढ़ाना ही अनिवार्य कर दिया, क्षत्रिय बस देश का शासन और राजपाठ ही संभालेंगे, वैश्य समाज के सभी व्यापार/कारोबार इत्यादि ही करते रहेंगे और अंत में शूद्रों को बोल दिया कि आप लोग केवल ऊपर की तीनों जातियों की सेवा ही करोगे. इनके बाकी सभी सामाजिक-आर्थिक अधिकार समाप्त.
तो ऐसे इस षडयंत्रकारी मनु महाराज ने उस वक़्त के गरीबों को तमाम उम्र बाकिओं के दास बना दिया. उनको समाज में रहने वाली अन्य तीनों जातियों को उपलब्ध अधिकार- जैसे कि पढ़-लिख कर अपना जीवन संवारना, जमीन जायदाद का अधिकार, और न जाने कितने फलने फूलने के अवसर, वह सब बंद कर दिए. ऐसी ही शर्मनाक व्यवस्थाओं के चलते सदियां बीत गई, युग बदल गए, मगर शूद्रों का शोषण और उनपे होने वाले अत्याचार बंद नहीं हुए. बल्कि, उन पर अपवित्र और अस्पृश्य होने का कलंक और मढ़ दिया. यदाकदा इस व्यवस्था को बदलने के लिए कुच्छ क्रांतिकारियों ने यत्न भी किये, मग़र उनकी अवाज़ को बुरी तरह कुचल दिया गया.
डॉ. बी.आर. अम्बेडकर: उन्नीसवीं सदी के आख़िर में एक एक बड़े ही जुझारू योद्धा ने 14 अप्रैल, 1891 को मध्य प्रदेश के महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले में एक गरीब परिवार में जन्म लिया. भीम राव अम्बेडकर नाम के इस युवक ने बड़ी मुश्किल हालातों में शिक्षा प्राप्त की. उस वक़्त समाज में छुआछूत पूरे जोरों पर थी, दलितों पर खूब अत्याचार भी हुआ करते थे, इनके पढ़ने-लिखने के रास्ते में बहुत सी बाधाएं डाली जाती थी, ताकि यह लोग तमाम उम्र अनपढ़ रहकर, ग़ुलाम ही बने रहें और बाकी तीनों जातियों के लोग उन पर अपनी मन माफ़िक जुल्म, अत्याचार और शोषण कर सकें. डॉ. अम्बेडकर ने भी ऐसे ही शोषण और अत्याचारों की बीच रहते हुए अपनी शिक्षा पूरी ही नहीं की, बल्कि उस जमाने में भी ऐसी और इतनी बड़ी-बड़ी डिग्रियां हासिल की, कि उनके ज़माने के अपने आप को तथाकथित ऊंची जाति वाले भी उनके सामने फ़ीके पड़ने लगे.
देश में अंग्रेज हुकूमत का राज था और चारों तरफ़ गुलामी की जंजीरें काटने और इसको तोड़ने के लिए खूब जी-जान से यतन किये जा रहे थे. देश प्रेमी अपने देश के लिए आज़ादी हासिल करने ख़ातिर जान की बाजियां लगा रहे थे, मग़र इसी देश में रहने वाले करोड़ों दलितों को तथाकथित तीनों ऊंची जातियों के लोगों के चुंगल से छुड़वाने के लिए, किसी को कोई चिन्ता-फ़िक्र नहीं थी. बल्कि वह लोग तो चाहते थे कि यह दलित लोग हमेशा के लिए ऐसे ही दबे-कुचले ही रहें ताकि इनपर अपनी मनमर्जी के मुताबिक इनसे काम लिया जाये और इन में से किसी में भी इतनी हिम्मत न आए कि कोई उफ़ तक न कर सकें! वह तो सभी यही मानकर बैठे हुए थे कि यह लोग तो अंग्रेजों से आज़ादी हासिल होने के बाद भी हमारे ग़ुलाम ही बने रहेंगे.
25 दिसम्बर, 1927 को महाड़, महाराष्ट्र में अपने एक सत्याग्रह के दौरान डॉ. अम्बेडकर ने दलितों के साथ भेदभाव सिखाने वाली, रूढ़िवादी विचारों वाली और अवैज्ञानिक सोच पर आधारित ब्राह्मणवादी पुस्तक मनुसमृति एक भव्य जन समूह के सामने जला डाली और कड़े शब्दों में इस पुस्तक में बताई गई वर्णव्यवस्था सिरे से ही ठुकराते हुए अपने अनुयाईओं को भी इसे बिलकुल न मानने का निर्देश दे दिया. यही नहीं, उन्होंने सार्वजनिक स्थानों पर दलितों को पानी लेने का भी ऐलान किया क्योंकि भगवान ने सभी कुदरती साधन और व्यवस्थाएं सभी इन्सानों के लिए ही की हुई हैं. कुछ मनुवादियों को डॉ. अम्बेडकर द्वारा दी गई चुनौतियां पसन्द नहीं आई और उन्होंने डॉ. अम्बेडकर की इन हरकतों को समाज विरोधी बताया और ऐसा करने वालों में महात्मा गांधी समेत कांग्रेस के बहुत से बड़े-बड़े नेतागण भी शामिल थे. लेकिन डॉ. अम्बेडकर उनकी परवाह न करते हुए अपने मिशन में आगे बढ़ते ही जा रहे थे. दूसरी तरफ़, डॉ. अम्बेडकर ने अंग्रेजी हुकूमत को बार-बार पत्र लिखकर दलित शोषित वर्ग की स्थिति से अवगत करवाया और उन्हें अधिकार दिलवाने के लिए मांगपत्र भी भेजे. बाबासाहेब के पत्रों में वर्णित छुआछूत व भेदभाव के बारे में पढ़कर अंग्रेज़ दंग रह गए कि क्या एक मानव दूसरे मानव के साथ ऐसे भी पेश आ सकता है.
बाबा साहेब के तथ्यों से परिपूर्ण तर्कयुक्त पत्रों से अंग्रेज़ी हुकूमत अवाक रहगई और उसने 1927 में दलित शोषित वर्ग की स्थिति के अध्ययन के लिए और डॉ. अम्बेडकर के आरोपों की जांच के लिए अंग्रेज़ हुकूमत ने एक विख्यात वकील, सर जॉन साईमन की अध्यक्षता में एक कमीशन का गठन किया. कांग्रेस ने इस आयोग का खूब विरोध किया मग़र 1930 में आयोग ने भारत आकर अपनी कार्यवाही शुरू कर दी. मई 1930 को उनके साथ एक मीटिंग में डॉ. अम्बेडकर ने हिन्दू धर्म में फ़ैली बेशुमार कुरीतियों, अवैज्ञानिक जातिप्रथा की ग़लत धारणाओं पर आधारित, बड़ी तीन जातियों द्वारा अपनी कौम के साथ हो रही बेशुमार ज़्यादतियों का काला कच्चा चिट्ठा उसके सामने रखा और उनसे इस वर्णव्यवस्था को जड़ से समाप्त करने की अपील की. साइमन कमीशन को यह जानकर बड़ा दुख और हैरानी हुई की हिन्दुस्तान में समाज एक चैथाई तबके के साथ सदियों से ऐसा होता आ रहा है और देश सभी बड़े-बड़े नेता इस पर ख़ामोशी साधे हुए हैं?
ऐसे ही चलते-चलते जब आज़ादी का अन्दोलन अपने पड़ाव में आगे ही आगे बढ़ता जा रहा था और कांग्रेस बड़े नेता महात्मा गांधी ने दलितों के ऊपर हज़ारों वर्षों से चले आ रहे शोषण, व अत्याचार के प्रति अपनी अन्तिम राय दे दी की– “मैं तो एक कट्टर हिन्दू हूं, और हिन्दू धर्म में सदियों से चली आ रही वर्णव्यवस्था सही है, और मैं इसको बदलने के पक्ष में बिलकुल भी नहीं हूं”, तब डॉ. अम्बेडकर ने अंग्रेज़ हुकूमत के सामने अपनी एक और बड़ी मांग रख दी कि देश की आज़ादी के बाद हमें इन तथाकथित झूठे/पाखण्डी/अत्याचारी सवर्णों के साथ रहने में कोई दिलचस्पी नहीं है और हमें भी अपनी आबादी के अनुपात से एक अलग देश बनाने की अनुमति दी जाये और इसके लिए देश के पूरे क्षेत्रफ़ल में से अपने हिस्से की ज़मीन भी दी जाये. डॉ. अम्बेडकर की इस मांग को सुनकर कांग्रेस के सभी बड़े-बड़े नेताओं में तो हड़कंप मच गया (ख़ास तौर पे जब साईमन आयोग के साथ हुई 3-4 बैठकों के बाद कांग्रेसी नेताओं को इस बात का एहसास होने लग गया कि आयोग तो डॉ. अम्बेडकर के ज़्यादातर मामलों से सहमत होता नज़र आ रहा है) और महात्मा गांधी ने जलभुन के पुणे में आमरण अनशन रख दिया. जब अन्य कांग्रेस के नेताओं के समझाने के बावजूद भी डॉ. अम्बेडकर अपनी अलग देश की मांग को छोड़ने के लिए तैयार नहीं हुए, तो इन नेताओं ने डॉ. अम्बेडकर को मनाने के लिए एक साज़िश रची. इस षडयन्त्र के तहत गांधी की पत्नी, कस्तूरबा गांधी कुछ अन्य महिलाओं के साथ डॉ. अम्बेडकर से मिलने गई और उनसे अपनी अलग देश की मांग त्यागने की बिनती की और हाथ जोड़कर प्रार्थना की – “मेरे पति की जान अब केवल आप ही बचा सकते हो. अगर आप अपनी यह मांग त्यागने के लिए सहमत हो जाते हैं तो कांग्रेस आपकी बहुत सी मांगों पर सकारात्मक रूप में विचार कर सकती हैं.” डॉ.अम्बेडकर ने कस्तूरबा गाँधी को समझाते हुए स्पष्ट लफ़्ज़ों में कहा कि “यदि गाँधी भारत की स्वतंत्रता के लिए मरण व्रत रखते, तो वह न्यायोचित हैं.
परन्तु यह एक पीड़ादायक आश्चर्य तो यह है कि गांधी ने केवल अछूतों के विरोध का रास्ता चुना है, जबकि भारतीय ईसाइयों, मुसलमानों और सिखों को मिले इस अधिकार के बारे में गांधी ने कोई आपत्ति नहीं की. उन्होंने आगे कहा की महात्मा गांधी कोई अमर व्यक्ति नहीं हैं. भारत में ऐसे अनेकों महात्मा आए और चले गए, लेकिन हमारे समाज में छुआछूत समाप्त नहीं हुई, हज़ारों वर्षों से अछूत, आज भी अछूत ही हैं. मग़र अब हम गांधी के प्राण बचाने के लिए करोड़ों अछूतों के हितों की बलि नहीं दे सकते.” लेकिन फिर धीरे-धीरे दोनों पक्षों के बीच बैठकों का सिलसिला बढ़ने लगा और डॉ. अम्बेडकर ने कस्तूरबा गांधी के आश्वासन पर और दलितों की सम्पूर्ण स्तिथि पर बड़ा गहन सोच विचार किया, और इस तरह 24 दिसम्बर, 1932 को पूना समझौते के अन्तर्गत दलितों के लिए उनकी आबादी के अनुपात में चुनाव में, शिक्षा के लिए कॉलजों में दाखिले हेतु और सरकारी नौकरियों में और पद्दोन्तियों में सीटें आरक्षित रखने के मुद्दे पर सहमति बन पाई. ऐसे ही एक और मीटिंग में डॉ. अम्बेडकर ने महात्मा गांधी को उस वक़्त अच्छी तरह लताड़ दिया जब उसने कहा कि आप ऐसे ही इतने ख़फ़ा होते रहते हो, मैंने आपके लोगों के लिए एक नया शब्द “हरिजन” दे तो दिया है. डॉ. अम्बेडकर ने सभा में उपस्थित सभी को सम्बोधन करते हुए कहा, “मैं इतने वर्षो से जातिपाति के भेदभाव को समाप्त करने के लिए जी-जान से दिन रात संघर्ष कर रहा हूं, पूरे समाज को, पूरी मानवता को, इन्सानियत को एक ही पायदान पर लाकर खड़ा करने के प्रयासों में जुटा रहता हूं, और यह आदमी दलितों की एक अलग ही पहचान बनाने के लिए एक नई खिड़की खोल रहा है.” नेहरू से यह बर्दाश्त नहीं हुआ और उन्होंने बाबासाहेब से कहा, “अम्बेडकर जी! आप गांधीजी से इस लहजे में बात नहीं कर सकते!” इस पर डॉ. अम्बेडकर ने उन्हें भी तल्खी से लताड़ते हुए उत्तर दिया, “मेरी एक बात का जवाब दो – हरिजन का शाब्दिक अर्थ होता है- भगवान के बन्दे, अगर केवल मेरे दलित शोषित वर्ग के लोग ही हरिजन हैं, जैसा कि आपके महात्मा गांधी कह रहे हैं, तो क्या आप बाकी सब राक्षसों की औलाद हैं?” डॉ. अम्बेडकर का यह तर्क सुनकर सभा में बैठे सब लोग थोड़ा झेंपकर इधर-उधर देखने लग गए और सभा में थोड़ी देर के लिए सन्नाटा सा छा गया.
अगस्त 1947 में देश की आज़ादी के बाद उन्होंने देश का संविधान बनाने की ज़िम्मेदारी बखूबी निभाई और यह संविधान 26 जनवरी, 1950 को लागू किया गया. तमाम उम्र डॉ अम्बेडकर कड़ा संघर्ष ही करते रहे, पूरे देश की ख़ातिर और अपने समाज की ख़ातिर, मग़र वक़्त-वक्त पर कांग्रेस के नेताओं ने उनका तिरस्कार व निरादर ही किया. देश का संविधान लिखा, उनकी लिखी हुई एक पुस्तक (The Problem of the Rupee – Its Origin and Its Solution) के आधार पर रिज़र्व बैंक ऑफ़ इण्डिया की स्थापना 1 अप्रैल,1935 को की गई. न जाने और कितने उन्होंने समाज सुधार के कार्य किए. कानूनी तौर पर देश से छुआछूत मिटाई, सारी उम्र उन्होंने दलितों और समाज के दब्बे कुचले / बहिष्कृत और तिरस्कृत लोगों को न्याय दिलाने में लगा दी, देश के सभी नागरिकों को एक समान वोट देने का अधिकार दिलाया, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए चुनाव लड़ने के लिए अलग से निर्वाचिन सीटें दिलाईं, मगर उनके खुद के साथ पूरी उम्र ज्यादतियां ही होती रहीं. जब वे अपनी पढ़ाई पूरी करके देश लौटे और महाराजा गायकवाड़ के यहां अपने समझौते के मुताबिक नौकरी करने पहुंचे, तो वहां के लोगों ने उनकी नीची जाति के कारण उन्हें किराये पर कोई घर नहीं दिया. उनके ही दफ़्तर में काम करने वाला चपरासी जोकि पढ़ाई-लिखाई में बिलकुल ही निम्न स्तर का था, वह भी उनको पानी नहीं पिलाता था. जब अम्बेडकर पाठशाला में ही पढ़ते थे, क्लास में रखे हुए पानी के घड़े में से उनको पानी पीने की इजाजत नहीं थी, और वह क्लास से बाहर, अपने बाकी सहपाठियों से अलग, अपने ही घर से लाये गए टाट पर बैठते थे. इतना पढ़ने-लिखने के बाद भी जब उन्होंने ढेर सारी किताबें लिख चुके थे, अख़बार के एडिटर भी बन चुके थे, कॉलेज में प्रिंसिपल भी रह चुके थे, इसके बावजूद भी जुलाई 1945 में उनको पुरी में जगन्नाथ मन्दिर में जाने से वहां के पुजारियों ने रोक दिया था, क्योंकि अम्बेडकर एक शूद्र/महार परिवार से आए थे. केवल इतना ही नहीं, अपने आपको बड़े पढ़े-लिखे और आधुनिक कहलवाने वाले महात्मा गांधी ने भी एक बार यह बात कबूल की कि जब भी किसी मीटिंग में उनको डॉ. अम्बेडकर के साथ हाथ मिलाना पड़ता था, उस दिन घर जाने बाद जबतक वह साबुन से अच्छी तरह हाथ नहीं धो लेते थे, वह खाने पीने की किसी भी वस्तु को छूते तक नहीं थे. बाद में ऐसा ही रवैया कुछ और कांग्रेसी नेताओं ने स्वीकार किया.
वैसे तो डॉ. अम्बेडकर बहुत पहले अपने मन की बात कह चुके थे कि उनका जन्म ही हिन्दू धर्म में हुआ है, लेकिन वह हिन्दु मरेंगे नहीं, और अन्तत: 14 अक्टूबर, 1956 को डॉ. अम्बेडकर ने अपनी पत्नी सविता अम्बेडकर, अपने निजी सचिव- नानक चन्द रत्तु और दो लाख से भी ज्यादा अनुयाईयों के साथ नागपुर में हिन्दु धर्म त्यागने की घोषणा कर दी और बुद्ध धर्म (जोकि मानवता की बराबरी, ज्ञान, सच्चाई के रास्ते और करुणा/दया के सिद्धांतों पर आधारित है), को अपना लिया. आज़ादी के बाद भी वह देश के पहले कानून मंत्री बन गए थे, इतनी ज़्यादा विभिन्नताओं से भरे देश के लिए संविधान भी लिखा, मग़र इतना कुछ करने के बाद भी उनको देश का सर्वोच्च पुरस्कार भारत रत्न से नहीं नवाज़ा गया था, आख़िर यह तो तब सम्भव हो पाया जब 1990 में वीपी सिंह देश के प्रधानमंत्री बने, जबकि कोलंबिया विश्वविद्यालय, अमरीका, यहाँ से उन्होंने अपनी पी.एचडी की थी, उन्होंने डॉ. अम्बेडकर द्वारा लिखे गए संविधान को जब भारत ने 26 जनवरी, 1950 को लागू कर दिया था, तब ही अपने विश्वविद्यालय के प्रांगण में डॉ. अम्बेडकर को यथासम्भव सम्मान देते हुए उनकी प्रतिमा स्थापित कर दी थी. डॉ. अम्बेडकर का परिनिर्वाण तो दिल्ली में 6 दिसम्बर 1956 को हुआ था, लेकिन उनके अन्तिम संस्कार के लिए नेहरू ने दिल्ली में कोई जगह नहीं दी. इतना ही नहीं, नेहरू जानते थे कि पूरे देश में डॉ. अम्बेडकर को मानने और सम्मान देने वालों की संख्या करोड़ों में है, और अगर इनका अन्तिम संस्कार दिल्ली में हो गया तो प्रत्येक वर्ष अम्बेडकर के जन्म दिवस और परिनिर्वाण दिवस पर यहां तो मेले लगते रहेंगे. इस लिहाज़ से मरा हुआ अम्बेडकर जिन्दा अम्बेडकर से भी ज़्यादा ख़तरनाक सिद्ध हो सकता है. यही सब ध्यान में रखते हुए नेहरू ने उन्हें (उनके घर वालों की इच्छा के ख़िलाफ़) दिल्ली से दूर उनके शव को एक विशेष विमान से मुम्बई भेज दिया. तो इस तरह देश के संविधान निर्माता और एक बड़े तबके के रहनुमा के साथ परिनिर्वाण के बाद भी नाइन्साफ़ी ही हुई. देश के संविधान निर्माता को देश की राजधानी में जगह नहीं मिली. इतना ही नहीं, उनके परलोक सुधारने के बाद भी उनके साथ अत्याचार होने बंद नहीं हुए हैं, बहुत बार ऐसा हो चुका है कि देश में विभिन्न स्थानों पर स्थापित की गई उनकी प्रतिमाएं अक्सर या तो तोड़ दी जाती हैं या फिर उनके चेहरे पर कालिख़ पोत दी जाती है. कुछ भी हो, दलित समाज के करोड़ों लोगों के दिलों में डॉ अम्बेडकर का मान सम्मान और दर्जा किसी देवता से कम नहीं है और वह उन्हें 14वीं सदी के महान गुरू, क्रन्तिकारी समाज सुधारक, गुरू रविदास जी का ही अवतार मानते है.
इस तथाकथित महान आदमी, महात्मा गांधी का दोगलापन तो देखिए-जब 1893 में डरबन, साऊथ अफ्रीका में एक गाड़ी के प्रथम श्रेणी के डिब्बे में सफ़र करते समय एक टिकट चैकर ने उसे से गाड़ी से इसलिए उतार फेंका थाकि उसका काला रंग है और काले रंगवाले लोगों को ऐसे सहूलतों वाले रेल के डिब्बे में सफ़र करने की इजाजत नहीं है, तब उसने सारी दुनियां को चीख-चीख कर बताया था के मेरे साथ रंग/नसल के आधार पर भेदभाव करते हुए नाइंसाफी हुई है, उसी महात्मा गांधी को अपने ही देश हज़ारों वर्षों से शूद्रों के साथ जातिपाति के आधार पर हो रहे भेदभाव, शोषण और अत्याचार कभी नज़र नहीं आये और जब डॉ. अम्बेडकर ने इसके ख़िलाफ़ बुलन्द आवाज में विरोध किया तो वह हमेशा यही कहता रहा कि हिन्दुओं में प्रचलित यह वर्णव्यवस्था हज़ारों वर्ष पुरानी है और इसमें सुधार या बदलाव लाने की ज़रा भी गुंजाइश नहीं है. लेकिन इसके साथ ही यह बात भी सोलह आने सच है कि इस देश में अंग्रेज आए और उसी दौरान बाबासाहेब अम्बेडकर जैसी महान विभूति ने अवतार लिया और अंग्रेजों के दिलो-दिमाग़ में यह बात बैठाने में बाबासाहेब कामयाब हो गए कि इन तथाकथित ऊंची जाति वाले लोगों ने देश की एक चैथाई आबादी को हज़ारों वर्षो से ग़ुलाम बनाकर रखा हुआ है, झूठ, फ़रेब, अनपढ़ता और अंधविश्वाशों में उलझाकर उनका हजारों वर्षों से उनका शोषण व अत्याचार कर रहे हैं, उनकी उन्नति, विकास और प्रगत्ति के रास्ते में एक ज़हरीले साँप की तरह कुण्डली मारकर बैठे हुए हैं, और इन मनुवादी ब्राह्मणों से तो कहीं ज़्यादा तर्कशील और विवेकशील वह अंग्रेज शासिक थे, जिन्होंने बाबा साहेब द्वारा व्याख्यान की गई दलितों की व्यथा को ढंग से सुना और समझा और तब देश के साथ 2 दलितों को भी ग़ुलामी की जंजीरों से काफ़ी हद तक आज़ादी मिल गई, वार्ना इस से पहले वाले हजारों राजे महाराजे तो इन ब्राह्मणों की बनाई गई वर्णव्यवस्था के अन्तर्गत ही अपना राजपाठ व प्रसाशन चलाते रहते और उनके राजपाठ के चलते दलितों के कल्याण व उत्थान की कल्पना करना भी नामुमकिन सा ही था.
सावित्रीबाई फुले: डॉ अम्बेडकर की तरह ही एक महिला विद्वान, सावित्रीबाई फुले (पत्नी ज्योतिबा फुले) एक महान दलित विद्वान, समाज सुधारक और देश की पहली महिला शिक्षिका, समाज सेविका, कवि और वंचितों की आवाज उठाने वाली सावित्रीबाई फूले का जन्म 3 जनवरी, 1831 में एक दलित परिवार में हुआ था. 1840 में 9 साल की उम्र में उनकी शादी 13 साल के ज्योतिराव फुले से हुई. सावित्रीबाई फूले ने अपने पति क्रांतिकारी नेता ज्योतिबा फूले के साथ मिलकर लड़कियों के लिए 18 स्कूल खोले. सावित्रीबाई फुले देश की पहली महिला अध्यापक-नारी मुक्ति अन्दोलन की पहली नेता थीं. उन्होंने 28 जनवरी,1853 को गर्भवती बलात्कार पीडि़तों के लिए बाल हत्या प्रतिबंधक गृह की स्थापना की. सावित्रीबाई ने उन्नीसवीं सदी में छुआ-छूत, सतिप्रथा, बाल-विवाह और विधवा विवाह निषेध जैसी कुरीतियां के विरुद्ध बुलन्द आवाज़ उठाई और अपने पति के साथ मिलकर उसपर काम किया. सावित्रीबाई ने आत्महत्या करने जा रही एक विधवा ब्राह्मण महिला काशीबाई की अपने घर में पैदाइश करवाई और उसके बच्चे यशंवत को अपने दत्तक पुत्र के रूप में गोद लिया. दत्तक पुत्र यशवंत राव को पाल-पोसकर इन्होंने बड़ा किया और उसे डॉक्टर बनाया. ज्योतिबा फुले की मृत्यु सन 1890 में हुई. तब सावित्रीबाई ने उनके अधूरे कार्यों को पूरा करने का संकल्प लिया. सावित्रीबाई की मृत्यु 10 मार्च,1897 को प्लेग के मरीजों की देखभाल करने के दौरान ही हो गयी थी. उनका पूरा जीवन समाज में वंचित तबके, ख़ासकर महिलाओं और दलितों के अधिकारों के लिए संघर्ष में ही बीता. उनकी एक बहुत ही प्रसिद्ध कविता है जिसमें वह सबको पढ़ने लिखने की प्रेरणा देकर जाति व्यवस्था तोड़ने और ब्राह्मण ग्रंथों को फैंकने की बात करती हैं, क्योंकि यह पुस्तक हमेशा से ही दलितों को नीचा दिखाते आये हैं और इनकी प्रगति और विकास के मार्ग में बहुत बड़ी वाधा बनते आए हैं. बड़ी हैरानी की बात है कि उनके इतने बड़े संघर्ष और बलिदान को भूलकर जब अध्यापक दिवस मनाने की घोषणा की गई, तब सरकार में किसी को यह ध्यान क्यों नहीं आया की यह तो सावित्रीबाई के जन्म दिवस- अर्थात 3 जनवरी को ही मनाया जाना चाहिए था, ना कि 5 सितंबर को.
उस वक़्त जब औरतों को आदमियों की पैर की जूती बराबर ही समझा जाता था, सावित्री जी के प्रसिद्ध विचार पूरे समाज को एक नई दिशा और चेतना देने वाले इस प्रकार थे- जागो, उठो, पढ़ो-लिखो, बनो आत्मनिर्भर, मेहनती बनो, काम करो, ज्ञान और धन इकट्ठा करो, ज्ञान के बिना सब कुछ खो जाता है, ज्ञान के बिना आदमी पशु समान ही रह जाते हैं. उन्होंने हमेशा इस बात पर ज़ोर दिया कि दलित और शोषित समाज के दुखों का अंत केवल पढ़-लिख कर शिक्षित बनने, धन कमाने और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने से ही होगा. उस वक़्त के हिसाब से एक दलित परिवार से और बिलकुल ही निम्न स्तर से उठकर इस महान महिला के समाज सुधार को ध्यान में रखते हुए सभी दबे कुचले परिवारों के शोषित लोग सावित्रीबाई के जन्म दिवस (तीन जनवरी) को ही शिक्षक दिवस के रूप में मानते और मनाते हैं, नाकि 5 सितम्बर को, क्योंकि श्री राधाकृष्णन का पूरे समाज के लिए योगदान सावित्रीबाई के योगदान और बलिदान के सामने बिलकुल फ़ीका पड़ता ही नज़र आता है.
मेजर ध्यानचन्द: जब दलितों के साथ निरन्तर हो रहे अत्याचार, शोषण और तिरस्कार की बात चलती है तो हम हॉकी के महान जादूगर मेजर ध्यान चन्द को कैसे भूल सकते हैं. ध्यानचन्द का जन्म 29 अगस्त, 1905 को इलाहाबाद में हुआ था. वह भारतीय फ़ौज में नौकरी करते थे और हॉकी के बहुत ही बढ़िया खिलाड़ी थे. उनको तीन बार ओलिंपिक खेलों में भाग लेने का अवसर मिला– 1928, 1932 और 1936 में. अपने पूरे ख़ेल जीवन के दौरान उन्होंने 400 से ज़्यादा गोल किये और हमेशा अपनी टीम को जीत दिलाई. ख़ेल के दौरान ध्यानचन्द इतनी चुस्ती फुर्ती, स्फ़ूर्ति और कुशलता के साथ खेलते थे और उनके इतने ज्यादा गोल करने के क्षमता की वजह से ऐसा कहा जाने लग गया कि – हॉकी एक खेल नहीं है, बल्कि एक जादू है और ध्यान चन्द इसके महान जादूगर. 1936 ओलंपिक खेलों में भारत का फाइनल मैच जर्मनी के साथ होना था और यह मैच देखने के लिए उस वक़्त के जर्मनी के चांसलर अडोल्फ़ हिटलर भी स्टेडियम में मौजूद थे और वह चाहते थे कि किसी भी तरह जर्मनी यह फाइनल मैच जीत जाए. मगर ध्यान चन्द के होते हुए यह कहां सम्भव था, और अंतत: भारत ने जर्मनी को 8-1 के मार्जिन से हरा दिया. इस मैच में अकेले ध्यानचन्द ने 6 गोल दागे और जर्मनी के चांसलर हिटलर ध्यान चन्द की खेल कुशलता और शैली से इतना प्रभावित हुआ कि उसने ध्यानचन्द को अपने घर खाने पर बुलाया. खाने के दौरान हिटलर ने ध्यान चन्द से पूछा कि वह हॉकी खेलने के इलावा क्या करते है? ध्यानचन्द ने जवाब दिया कि वह आर्मी में लान्सनायक हैं. फिर हिटलर ने ध्यानचन्द को इंडिया छोड़कर जर्मनी में आकर बसने का निमंत्रण दिया और यह भी लालच दिया कि वह ध्यान चन्द को जर्मनी की सेना में जनरल बना देगा, एक बहुत बड़ी कोठी भी उसे दी जाएगी, बस वह आकर वहीं बस जाये और जर्मनी की टीम को हॉकी खेलना सिखाये. मगर ध्यानचन्द ने हिटलर का प्रस्ताव यह कहकर ठुकरा दिया कि वह अपने देश को बहुत प्यार करता है और अपना देश छोड़ने के बारे में सोच भी नहीं सकता.
मगर अपने देश में अन्य दलित लोगों की तरह, ध्यानचन्द के साथ भी जाति आधारित भेदभाव अक्सर होते रहते थे. जैसे कि खिलाडियों को जीतने के बाद जो इनाम में दी जाने वाली धन राशि को घोषणा होती है, वह भी उस खिलाड़ी की जाति जानकर ही होती है. सारी उम्र ध्यानचन्द का हॉकी के प्रति समर्पण, उसकी अपने देश को जीत दिलाने की लगन व कार्य-कुशलता को देखते हुए उसको बहुत पहले खेलों में भारत रतन मिल जाना चाहिए था. मगर ऐसा हरगिज़ नहीं हो सका, क्योंकि किस-किस खिलाड़ी को क्या-क्या इनाम और मान सम्मान देना है, इसका निर्णय तो सत्ता में शिखर पर बैठे बड़े अधिकारी और नेतागण ही करते हैं और यह निर्णय लेते समय वह खिलाड़ी की जाति देखना कभी नहीं भूलते. अंत में जब 2014 में यह निर्णय लिया गया कि भारत रत्न के लिए खेलों को भी शामिल किया जाना चाहिए, उस वक़्त भी ध्यानचन्द के साथ चार-पांच दशकों से होते रहे अन्याय को समाप्त करने की बजाय, एक बड़े दलित उम्मीदवार को छोड़कर एक ब्राह्मण (सचिन तेंदुलकर) को यह सम्मान दे दिया गया. और इस तरह ध्यानचन्द के साथ हो रहा तिरस्कार का सिलसिला उसके मरणोप्रांत अब भी जारी है. अपने ही गांव झाँसी में 3 दिसंबर, 1979 को उनकी मृत्यु हो गई.
मोहम्मद अली: ऐसा नहीं है ऐसे जातिपाति आधारित भेदभाव, तिरस्कार और उनकी प्रतिभा की अवेहलना हमारे देश में ही होती है. विश्वप्रसिद्ध अमरीकी बॉक्सिंग चैंपियन मोहम्मद अली (17 जनवरी, 1942 से 3 जून, 2016) को भी अपने पूरे जीवनकाल में बहुत बार रंगभेद का सामना करना पड़ा था. मोहम्मद अली, जोकि जन्म से एक ईसाई था और उसका नाम कैसियस मार्केलॉस क्ले था, को स्कूल के दिनों में अपने काले रंग की वजह से अनेकों बार पीड़ा, भेदभाव, तिरस्कार और भद्दी-भद्दी टिप्णियां सुननी पड़ती थी. फिर एक दिन ऐसा आया कि उसने अपना धर्म परिवर्तन करके इस्लाम धर्म अपना लिया और कैसियस क्ले से मोहम्मद अली बन गया. 25 फरवरी, 1964 को अपने से पहले बड़े मुक्केबाज़ चार्ल्स सोनी को, फ्लोरिडा में हराकर मोहम्मद अली बॉक्सिंग चैंपियन बन गया. विश्व चैंपियन बनने के बाद उनके पास पैसा, शोहरत, बड़ी कोठी इत्यादि तो सब आ गए थे, मगर उसके काले रंग की वजह होने वाले निरंतर तिरस्कार से उनका पीछा नहीं छूटा.
एक बार की बात है कि मोहमद अली की शादी की सालगिरह का अवसर था और उसके बच्चों की जिद्द थी उनके पिता बच्चों को शहर के सबसे बड़े और महंगे होटल में खाना खिलाएं. मोहम्मद अली ने बच्चों को बहुत समझाया कि जो खाने की उनकी इच्छा है, वह बता दें और इसका प्रबंध वह घर में ही कर देंगे. मगर बच्चे अभी इतने बड़े नहीं हुए थे कि वह समझ सकें कि उनके पिता उनको बड़े होटल में क्यों नहीं लेजा रहे. खैर, बच्चों की जिद्द के आगे नतमस्तक होकर मोहम्मद अली और उसकी पत्नी बच्चों को शहर के सबसे महंगे होटल में ले गए. वहां पहुंचकर एक ख़ाली मेज देखकर उसके इर्दगिर्द बैठ गए और मोहम्मद अली ने एक बैरे को खाने का मेनू लाने के लिए कहा. वह बैरा तो क्या, वहां पर उपस्थित सभी लोग मोहम्मद अली और उसके परिवार को ऐसे देखने लग गए जैसे कि वह कोई चोर हों. जब मोहम्मद अली ने अपने मेज के पास से गुजरते हुए एक बैरे को रोका और पूछा कि आप लोग हमारे लिए खाने का मेनू कार्ड क्यों नहीं दिखा रहे, तब उस बैरे ने बड़े नफ़रत भरे अंदाज से उत्तर दिया, “हमारे होटल में काले रंग के लोग और कुत्तों को अन्दर आने की इजाजत नहीं है, मुझे तो ताज्जुब हो रहा है कि आप लोग यहां आ कैसे गए?” इतना सुनते ही मोहम्मद अली का भी ख़ून खौल गया, आख़िर वह भी बॉक्सिंग का विश्व चैंपियन था, दोनों तरफ़ ख़ूब हाथापाई-मारपीट शुरू हो गई और मोहम्मद अली ने उस होटल के चार-पांच लोगों की अच्छी धुनाई कर दी. होटल के मैनेजर ने झट से फ़ोन करके पुलिस बुलवा ली और मोहम्मद अली पर होटल में जबरदस्ती घुसने और मारपीट करने और फर्नीचर की तोड़फोड़ का आरोप लगा दिया. पुलिस उस वक़्त तो मोहम्मद अली को पकड़कर ले गई, मग़र उसके ऊपर कोई कानूनी कार्यवाही नहीं कर सकी. और ऐसे इस घटना के बाद मोहमद अली के बच्चों को भी जिन्दगी भर का एक सबक मिल गया कि मां-बाप की बात मान लेने में ही भलाई होती है.
दशरथ मांझी: दशरथ मांझी नाम की इस महान विभूति को कौन भूल सकता है, जिन्हें आजकल ”माउन्टेन मैन” के नाम से भी जाना जाता है. वह बिहार में गया जिले के करीब गहलौर गांव में रहने वाला एक गरीब खेत मजदूर था, और उन्होनें केवल एक हथौड़ा और छेनी लेकर अकेले अपनी हिम्मत के सहारे ही 360 फुट लम्बी, 30 फुट चौड़ी और 25 फुट ऊंचे पहाड़ को काटकर एक सड़क बना डाली. 22 वर्षों के अत्यंत ही कठिन परिश्रम के बाद, दशरथ मांझी द्वारा बनाई सड़क ने अतरी और वजीरगंज ब्लाक की दूरी को 55 किलोमीटर से घटाकर मात्र 15 किलोमीटर ही कर दिया.
गहलौर गांव में 1934 में जन्मे इस सज्जन ने ये साबित किया है कि अगर इंसान ठान ले तो कोई भी काम असंभव नहीं है. एक इंसान जिसके पास पैसा नहीं, कोई ताकत नहीं, मगर उसने इतना बड़ा पहाड़ खोदकर उस में से सड़क बनानी, उनकी जिन्दगी से हमें एक सीख मिलती है कि अगर इंसान दृढ़ निश्चय करले तो हम किसी भी कठिनाई को पार कर सकते है, बस उस काम को करने की दिल में जिद्द और जनून होना चाहिए. उनकी 22 वर्षो की कठिन मेहनत से उन्होंने अकेले ही अपने गांव को शहर से जोड़ने वाली एक ऐसी सड़क बनाई जिसका उपयोग आज आसपास के सभी गांव वाले करते है.
दशरथ मांझी की शादी कम उम्र में ही फाल्गुनी देवी से हो गई थी. एक दिन जब दशरथ मांझी खेत में काम कर रहा था और उसकी पत्नी, नित प्रतिदिन की भांति अपने पति के लिए खाना ले जाते समय पहाड़ से फ़िसलकर गिर गई और गम्भीर रूप में घायल हो गई, और उस वक़्त वह गर्भवती भी थी. दशरथ मांझी उसे उठाकर घर ले आया मगर उसे इलाज़ के लिए शहर ले जाना था, जिसके लिए उसके पास कोई साधन नहीं था. गांव के अमीर ठाकुर लोग जिनके पास गाड़ियां थी, दशरथ मांझी उन सब के पास बारी-बारी से गए और मदद के लिए बिनती की कि उसकी पत्नी को गाड़ी में डालकर अस्पताल पहुंचा दें, मगर पूरे गांव में किसी ने उसकी मदद नहीं की. आख़िर में उसने पत्नी को बैलगाड़ी पर लेटाया और शहर की और चल दिया. देर शाम को जब वह अस्पताल पहुंचा, तब तक बहुत देर हो चुकी थी और डॉक्टरों ने उसकी जांच पड़ताल करके बताया कि उसने पत्नी को अस्पताल लाने में बहुत देर कर दी, खून ज़्यादा बहने से फाल्गुनी का निधन हो गया. अगर फाल्गुनी देवी को समय रहते अस्पताल ले जाया गया होता, तो शायद वो बच जाती. यह बात उसके अन्दर तक इतनी बुरी तरह चुभ गई कि दशरथ मांझी ने संकल्प कर लिया कि, भले ही सरकार या और कोई संस्था उसकी सहायता करें या ना, वह अकेले ही पहाड़ के बीचों बीच से रास्ता निकालेंगे, ताकि देर से डॉक्टरी सहायता ना मिलने की वजह से गांव के किसी और व्यक्ति को मौत न देखनी पड़े. तो ऐसे संकल्प में बंधे हुए उसने गहलौर की पहाड़ियों में से रास्ता बनाना शुरू किया. इन्होंने बताया, “जब मैंने पहाड़ी तोड़ना शुरू किया तो लोगों ने मुझे पागल कहा- कि ऐसे कभी हुआ है कि एक अकेला आदमी इतनी ऊंची पहाड़ी को काटकर, वह भी बिना मशीनों और विस्फोटक पदार्थों के, सड़क बना दे. लेकिन मैंने अपने पक्के निश्चय और भी मजबूत इरादे के चलते हुए यह सब सम्भव कर दिखाया.”
इतने बड़ी परियोजना को पूरा करने के लिए उसे 22 वर्ष (1960-1982) लगे और अतरी और वज़ीरगंज सेक्टर्स की दूरी 55 किमी से घटकर 15 किमी तक रह गई. दशरथ मांझी का यह पहाड़ से भी ज्यादा मजबूत प्रयास एक बहुत बड़ा सराहनीय कार्य है. उसके इतने बड़े कार्य के लिए अख़बारों/मैगज़ीनों/टीवी इत्यादि में चर्चा तो हुई ,मग़र इनाम के नाम पर एक मेहनतकश इंसान को मिला कुछ भी नहीं. बिहार की सरकार ने उसे पांच लाख रूपये देने की घोषणा भी की, मग़र यह धनराशि उसे कभी वितरण नहीं की गई. बिहार की राज्य सरकार ने उनकी इस उपलब्धि के लिए सामाजिक सेवा के क्षेत्र में 2006 में पद्मश्री हेतु उनके नाम का प्रस्ताव भी केन्द्रीय सरकार को भेजा, मग़र उसे यह भी मिला कभी नहीं. कारण- दशरथ मांझी भी एक दलित परिवार से सम्बन्ध रखने वाला इंसान था और यह तो हमारे समाज की एक बहुत बड़ी कुरीति और कुचाल ही कहेंगे, कि दलित लोग जितना मर्जी बड़ा असम्भव कार्य करके दिखा दें, समाज को उसे जितना मर्जी फ़ायदा पहुंचा हो, मगर तथाकथित बड़े लोग कभी सम्मानजनक धनराशि, इनाम और पद प्रदिष्ठा देने में हमेशा से अवेहलना करते ही आये हैं. दशरथ मांझी के साथ भी यही कुछ हुआ. मशहूर फ़िल्म अभिनेता आमिर खान ने अपने एक टीवी सीरियल “सत्यमेव जयते” में उसके इस महान कार्य पर एक एपिसोड भी बनाया, उसे दो-ढाई करोड़ की कमाई भी की मग़र, उसके परिवार को घर बनाने के लिए वादा की हुई धनराशि 15 लाख रूपये कभी नहीं मिले. अगर यही असम्भव सा कार्य दशरथ मांझी की जगह किसी ब्राह्मण या क्षत्रिय ने किया होता तो सरकार ने उसे कब से भारत रत्न प्रदान कर दिया होता और न जाने देश कितनी बड़ी-बड़ी कम्पनियों ने उसे दिल खोलकर कितनी बड़ी-बड़ी धनराशि भी इनाम में दे दी होती. दशरथ माँझी की 17 अगस्त, 2007 को दिल्ली में मृत्यु हो गई थी.
फ्रांस के एक बहुत बड़े विद्वान, राजनैतिक विश्लेषक और दार्शनिक- रूसो ने बहुत वर्ष पहले कहा था कि अगर आप सच्चे दिल से चाहते हो कि आपका देश खूब उन्नति, विकास करे, प्रगति की बुलंदियां छुए और इस पथ पर हमेशा आगे बढ़ता ही रहे तो इसके लिए यह अत्यंत ही आवश्यक है कि समाज में रहने वाले सभी धर्मों और जातियों के लोगों को पढ़ाई-लिखाई के बराबर अवसर दिए जाए. किसी भी क्षेत्र में अच्छा कार्य करने वालों का समय-समय पर यथासम्भव मान-सम्मान व सराहना भी होनी चाहिए, ताकि समाज के अन्य लोगों के लिए यह एक प्रेरणा स्रोत बनते रहें. मगर हमारे देश का एक बहुत बड़ा दुर्भाग्य ही कहेंगे कि यहां पर जातिपाति आधारित अनेकों मतभेद, शोषण और तिरस्कार हज़ारों वर्षों से होते आए हैं, यही कारण है कि हमारा देश अन्य देशों के मुकाबले वैज्ञानिक उन्नति, विकास और प्रगति की श्रेणी में विकासशील देशों से बहुत पिछड़ा हुआ है, हालांकि आबादी की दृष्टि से हम पूरी दुनियां में दूसरे नंबर पर हैं. जितनी जल्दी से जल्दी यह सिलसिला बदला जाएगा/विसंगतियां दूर की जाएंगी, पूरे देश और समाज के लिए उतना ही बेहतर, लाभकारी और हितकारी होगा.
R D Bhardwaj ‘Noorpuri’यह लेख आरडी भारद्वाज ‘नूरपुरी’ ने लिखा है.