भाजपा की नजरें बिहार मुख्यमंत्री की कुर्सी पर

Bihar

पटना। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी शनिवार को बिहार के दौरे पर हैं. मोदी ने पटना विश्वविद्यालय के शताब्दी समारोह में भाग लिया. उसके बाद मोकामा में कुछ राष्ट्रीय राजमार्ग के निर्माण के अलावा कुछ नए पुलों का कार्यारंभ भी किया. लेकिन मोदी के स्वागत में लगाए गए पोस्टरों ने बिहार की सियासत को नया रूप दे दिया है.

दरअसल, मोदी की स्वागत में पटना में जगह-जगह पोस्टर बैनर लगे हैं. लेकिन बिहार में बहार लाने का दावा करने वाले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की तस्वीर ही इन पोस्टरों से गायब है. इनमें भाजपा अपने सभी सहयोगियों पर भारी पड़ रही है. सबसे ज़्यादा परिवर्तन इस बार ये देखने को मिल रहा है कि भाजपा नेताओं द्वारा लगाए गए होर्डिंग में नीतीश कुमार का चेहरा भी ग़ायब है.

इस सरकारी कार्यक्रम में भाजपा अपने सभी सहयोगियों पर भारी पड़ती दिखी. दोबारा दोस्ती की गाथा लिखने के बाद नीतीश कुमार के साथ पीएम का ये पहला कार्यक्रम था. लेकिन पोस्टरों में चारों ओर सिर्फ मोदी ही छाए रहे. नीतीश के साथ-साथ जेडीयू के नेता और कार्यकर्ता मूकदर्शक ही बने दिख रहे थे.

पीएम के आने से भले ही नीतीश की नगरी में आज उत्साह का माहौल दिख रहा था. लेकिन जिस तरह से भाजपा के नेता अपनी डपली बजा रहे हैं और होर्डिंग के जरिए पटना की सड़कों पर सियासत की नई सूरत दिखा रहे हैं. उससे साफ जाहिर है कि भाजपा आने वाले दिनों में बिहार की सियासत में अपने बूते आगे बढ़ने का मन बना चुकी है.

जन्मदिन विशेष। जानिए गौतम गंभीर के बारे में कुछ खास बातें

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नई दिल्ली: टीम इंडिया के धमाकेदार बल्लेबाजी गौतम गंभीर आज यानि कि 14 अक्टूबर को जन्मदिन है। चाहें इन दिनों यह खिलाड़ी टीम से बाहर हैं, लेकिन एक समय में इन्होंने अपनी धमाकेदार पारी से सभी का दिल जीत लिया था। आइए, जानते है इनसे जुड़ी कुछ खास बाते- 10 साल की उम्र में ही खेलना शुरु किया था क्रिकेट उनके पिता दीपक गंभीर टेक्सटाइल बिजनेसमैन हैं और मां का नाम सीमा है। गंभीर को बचपन से ही क्रिकेट का क्रेज हैं और उन्होंने 10 साल की उम्र में ही क्रिकेट खेलना शुरू कर दिया था। जिसके बाद 22 साल की उम्र में उन्होंने टीम इंडिया के लिए डेब्यू किया और धमाकेदार पारियां खेलकर फैंस के दिलों में जगह बनाई। वनडे करियर 2003 में अपने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट करियर का आगाज करने वाले गौतम गंभीर ने अब तक 147 मैच खेले है, जिसमें उन्होंने 5238 रन बनाए और इस धमाकेदार पारियों में 11 शतक और 34 अर्धशतक लगाए। टेस्ट करियर 2004 में इन्होंने टेस्ट करियर में कदम रखा और अब तक 58 मैचों में 4154 रन बना चुके हैं, जिसमें 9 शतक और 1 दोहरा शतक भी शामिल है। पहला टेस्ट मैच अॉस्ट्रेलिया के खिलाफ खेला गया था। टी 20 और IPL करियर टी 20 फॉमेट की बात करें तो इस फॉर्मेंट में भी यह पीछे नहीं रहे। इन्होंने कुल 37 मैच खेला और जिसमें 932 रन बनाए, इसके अलावा इन्होंने आईपीएल में काफी धूम मचाई और 148 मैचों में 4133 रन बनाए। दो वर्ल्डकप के फाइनल में शानदार बल्लेबाजी दक्षिण अफ्रीका में हुए पहले टी-20 वर्ल्डकप में भारत की खिताबी जीत में गौतम गंभीर की बल्लेबाजी थी। इस टूर्नामैंट में उन्होंने 3 अर्धशतक लगाए। इसके अलावा 2011 के वर्ल्डकप फाइनल में भी उन्होंने श्रीलंका के खिलाफ सबसे बड़ी पारी खेली। इस मैच में उन्होंने 97 रनों की पारी खेली।

गौरी लंकेश की हत्या में शामिल संदिग्ध की पहचान, SIT ने जारी किए स्केच

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Gauri

नई दिल्ली। वरिष्ठ पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या में शामिल तीन संदिग्धों के स्केच जारी हुए है. ये स्केच एसआईटी ने जारी किए हैं. फिलहाल पुलिस को इसकेअलावा कोई भी अहम सुराग नहीं मिला है. लिहाजा अब पुलिस ने मामले में तीन संदिग्धों के स्केच जारी कर लोगों से मदद की गुहार लगाई.

पुलिस SIT प्रमुख बीके सिंह ने स्केच जारी करते हुए कहा कि जानकारी के आधार पर हमने ये स्केच जारी किए हैं. हम लोगों से सहयोग चाहते हैं और इसीलिए संदिग्धों के इन स्केच को जारी कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि हमारे पास मामले का वीडियो भी है, जिसको भी जारी कर रहे हैं. मामले में हमने अभी तक 200 से 250 लोगों से पूछताछ की है.

बीके सिंह ने कहा कि दो संदिग्धों के स्केच में काफी समानता है. इनको दो अलग-अलग कलाकारों ने प्रत्यक्षदर्शियों की जानकारी के आधार पर बनाया है. उन्होंने कहा कि पहनावे के आधार पर यह स्पष्ट नहीं किया जा सकता है कि संदिग्ध किस धर्म के हैं. गुमराह करने के लिए भी तिलक या कुंडल पहने जा सकते हैं. पुलिस का कहना है कि मामले की जांच चल रही है और अपराधियों को जल्द जेल भेजा जाएगा.

गौरी लंकेश साप्ताहिक मैग्जीन ‘लंकेश पत्रिके’ की संपादक थीं. इसके साथ ही वो अखबारों में कॉलम भी लिखती थीं. टीवी न्यूज चैनल डिबेट्स में भी वो एक्टिविस्ट के तौर पर शामिल होती थीं. लंकेश के दक्षिणपंथी संगठनों से वैचारिक मतभेद थे. इस मशहूर हत्याकांड की जांच एसआईटी कर रही है. इससे पहले पुलिस के हाथ सीसीटीवी फुटेज लगे थे, जिसमें बाइक सवार हमलावर हेलमेट पहने नजर आए थे. पुलिस के मुताबिक हमलावर पूरी बांह की शर्ट और पैंट पहने हुए थे. अब तक पुलिस 600 से ज्यादा डिजिटल वीडियो रिकॉर्डिंग का विश्लेषण कर चुकी है. इसके साथ ही 200 से 250 लोगों से भी पूछताछ की गई थी.

पुलिस जांच में यह बात भी सामने आई थी कि वारदात को अंजाम देने से पहले हमलावरों ने गौरी के घर की रेकी थी. बाइक से गौरी के घर के तीन चक्कर लगाए थे. मुख्य आरोपी की उम्र करीब 35 साल बताई जा रही है. हालांकि पुलिस ने इस बात की पुष्टि करने से इनकार कर दिया कि गौरी लंकेश की हत्या में उसी तरह के हथियार का इस्तेमाल किया गया, जिस तरह का एमएम कलबुर्गी की हत्या करने के लिए किया गया था.

चोरी के तीन दिन बाद मिली केजरीवाल की कार

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Ak car

नई दिल्ली। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की चोरी हुई वेगनआर कार बरामद कर ली गई है. गाजियाबाद पुलिस ने यह कार मोहननगर से बरामद कर ली है. पुलिस को कार के अंदर से एक तलवार भी मिली है. चोर ने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की बहुचर्चित नीली वैगनआर कार पर ही गुरुवार को हाथ साफ कर दिया था. वह भी दिल्ली सचिवालय के बाहर से.

हैरानी की बात यह थी कि चोर दिनदहाड़े मुख्यमंत्री दफ्तर के बाहर से ही कार ले उड़ा और सुरक्षा के सारे इंतजाम धरे रह गए. चोरी की ये वारदात गुरुवार दोपहर दो बजे के आसपास हुई. चोरी की रिपोर्ट आईपी स्टेट थाने में दर्ज कराई गई थी.

आपको बता दें कि आम आदमी पार्टी की कार्यकर्ता वंदना सिंह इस कार को लेकर सचिवालय किसी काम से आई थीं. आमतौर पर कार की एंट्री सचिवालय के अंदर हो जाती थी और कार अंदर ही पार्क होती थी, लेकिन वंदना के मुताबिक गुरुवार को किसी वजह से कार का पास नहीं बन पाया, इसीलिए उसे उन्होंने गेट नंबर 6 और 8 के बीच सड़क किनारे ही पार्क कर दिया गया था.

थोड़ी देर बाद वंदना लौटीं, तो कार वहां से गायब थी. आसपास तलाश किया, लेकिन कार कहीं नहीं मिली. इसके बाद आईपी स्टेट पुलिस थाने में सूचना दी गई. पहले संभावना जताई गई कि कहीं कार को ट्रैफिक पुलिस नो पार्किंग की वजह से टो करके न ले गई हो, लेकिन कार जब वहां भी नहीं मिली, तो चोरी की एफआईआर दर्ज कराई गई थी.

डीएल-3-सीजी 9769 रजिस्ट्रेशन नंबर वाली नीले कलर की ये कार 2013 में उस वक्त चर्चा में आयी थी, जब केजरीवाल पहली बार चुनाव मैदान में उतरे थे. केजरीवाल ने आम आदमी और सादगी को अपनी पहचान बनाया था और चुनाव प्रचार में वो इसी कार का इस्तेमाल करते थे, इसी वजह से इस कार की पहचान भी आम आदमी की कार के तौर पर बन गई थी.

Amazon और Flipkart का दिवाली धमाका

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नई दिल्ली। दिवाली का त्योहार करीब आने के साथ ही देशभर के ग्राहकों के लिए तमाम सामानों पर भारी डिस्काउंट का दौर चल पड़ा है. ऐसे में दिग्गज ऑनलाइन शॉपिंग कंपनियां भी नए नए ऑफर लाकर लोगों को आकर्षित कर रही हैं और अपनी कमाई भी कर रही हैं. इसी के मद्देनजर आज अमेजॉन और फ्लिपकार्ट पर सेल शुरु हो गई है.

अमेजॉन पर आज से ग्रेट इंडियन फेस्टिवल सेल शुरु होगी और 17 अक्टूबर तक चलेगी. इस सेल में कई स्मार्टफोन्स पर 40 फीसदी से ज्यादा की छूट दी जा रही है. मोबाइल और एक्सेसरी कैटेगरी में 50 फीसदी छूट दी जा रही है. वहीं दूसरी एक्सेसरीज पर 80 फीसदी, पावर बैंक पर 65 फीसदी और मोबाइल कवर पर 80 फीसदी छूट दी जा रही है. सेल में ग्राहकों को टेलीविजन पर 40 फीसदी, लैपटॉप पर 20 फीसदी और हेडफोन व स्पीकर पर 60 फीसदी की छूट ऑफर की जा रही है. सेल में शाओमी, लेनोवो, वनप्लस, ऐपल, सैमसंग, एलजी के स्मार्टफोन पर छूट मिल रही है. एस.बी.आई. के क्रेडिट और डेबिट कार्ड से खरीददारी करने पर ग्राहकों को 10 फीसदी छूट दी जा रही है. 30 हजार से ज्यादा के प्रोडक्ट पर नो-कॉस्ट ई.एम.आई. का ऑफर दिया जा रहा है. अमेजॉन पे के जरिए खरीददारी करने पर ग्राहकों को 500 रुपए का कैशबैक दिया जा रहा है.

फ्लिपकार्ट की सेल 14 अक्टूबर से शुरु होकर 17 अक्टूबर तक चलेगी. कंपनी इलेक्ट्रॉनिक प्रोडक्ट पर 70 फीसदी तक का डिस्काउंट दे रही है. ऐपल और सैमसंग के प्रीमियम रेंज फोन की बात करें तो कंपनी की तरफ से आईफोन 6 और आईफोन 7 पर भी छूट दी जाएगी. इसके अलावा सैमसंग गैलेक्सी S7 पर भी आप ऑफर का फायदा उठा सकते हैं. 4 दिन चलने वाली बिग दिवाली सेल के दौरान हर दिन दोपहर 12 बजे एक फ्लैश सेल भी चलेगी. इस दौरान 8,999 रुपए वाले पैनासोनिक एलुगा रे X को 6,999 रुपए में बेचा जाएगा. सेल में जो ग्राहक HDFC बैंक के क्रेडिट कार्ड/ डेबिट कार्ड से शॉपिंग करेंगे, उन्हें 10 प्रतिशत अतिरिक्त डिस्काउंट दिया जाएगा.

…तो इसलिए बाबासाहेब ने ली थी ये 22 प्रतिज्ञाएं

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Ambedkar

आज का दिन इतिहास के पन्नों में इसलिए खास है, क्योंकि आज ही के दिन संविधान निर्माता बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर ने अपने 3,80,000 साथियों के साथ हिन्दू धर्म को त्याग कर बौद्ध धर्म अपना लिया था. 1950 के दशक में ही बाबासाहेब बौद्ध धर्म के प्रति आकर्षित हुए और बौद्ध सम्मेलन में भाग लेने श्रीलंका (तब सीलोन) गए. 14 अक्टूबर 1956 को नागपुर में उन्होंने अपने लाखों समर्थकों के साथ बौद्ध धर्म ग्रहण किया.

इस मौके पर उन्होंने जो 22 प्रतिज्ञाएं लीं उससे हिंदू धर्म और उसकी पूजा पद्धति को उन्होंने पूर्ण रूप से त्याग दिया. डॉक्टर अम्बेडकर के साथ लाखों दलितों ने बौद्ध धर्म अपनाया और ये पूरी दुनिया में धर्म परिवर्तन की सबसे बड़ी घटना थी. हालांकि खुद उन्होंने इसे धर्म परिवर्तन नहीं बल्कि धर्म-जनित शारीरिक, मानसिक व आर्थिक दासता से मुक्ति बताया.

अम्बेडकर का जन्म हिन्दू जाति में अछूत और निचली मानी जाने वाली महार जाति में हुआ था. उन्होंने हिन्दू धर्म में व्याप्त छूत प्रथा को खत्म करने के लिए न सिर्फ सामाजिक बल्कि कानूनी रास्ता भी अख्तियार किया. वे मानते थे कि कानून में बदलाव लाकर ही दिल और दिमाग में बदलाव संभव है. उनके बौद्ध धर्म अपनाने के पीछे बौद्ध धर्म में छुआछूत और जाति प्रथा जैसी कुरीति का न होना था.

हिंदू पैदा तो हुआ हूं, लेकिन हिंदू मरूंगा नहीं बाबासाहेब जिस ताकत के साथ दलितों को उनका हक दिलाने के लिए उन्हें एकजुट करने और राजनीतिक-सामाजिक रूप से उन्हें सशक्त बनाने में जुटे थे, उतनी ही ताकत के साथ उनके विरोधी भी उन्हें रोकने के लिए जोर लगा रहे थे. लंबे संघर्ष के बाद जब अम्बेडकर को भरोसा हो गया कि वे हिंदू धर्म से जातिप्रथा और छुआ-छूत की कुरीतियां दूर नहीं कर पा रहें तो उन्होंने वो ऐतिहासिक वक्तव्य दिया जिसमें उन्होंने कहा कि मैं हिंदू पैदा तो हुआ हूं, लेकिन हिंदू मरूंगा नहीं.

बौद्ध धर्म की दीक्षा लेने के लिए 22 प्रतिज्ञाएं:-

1. मैं ब्रह्मा, विष्णु और महेश को कभी ईश्वर नहीं मानूंगा और न ही मैं उनकी पूजा करूंगा.

2. मैं राम और कृष्ण को कभी ईश्वर नहीं मानूंगा, और न ही मैं उनकी पूजा करूंगा.

3. मैं गौरी, गणपति जैसे हिंदू धर्म के किसी देवी देवता को नहीं मानूंगा और न ही उनकी पूजा करूंगा.

4. ईश्वर ने कभी अवतार लिया है, इस पर मेरा विश्वास नहीं.

5. मैं ऐसा कभी नहीं मानूंगा कि तथागत बौद्ध विष्णु के अवतार हैं. ऐसे प्रचार को मैं पागलपन और झूठा समझता हूं.

6. मैं कभी श्राद्ध नहीं करूंगा और न ही पिंडदान करवाऊंगा.

7. मैं बौध धम्म के विरुद्ध कभी कोई आचरण नहीं करूंगा.

8. मैं कोई भी क्रिया-कर्म ब्राह्मणों के हाथों से नहीं करवाऊंगा.

9. मैं इस सिद्धांत को मानूंगा कि सभी इंसान एक समान हैं.

10. मैं समानता की स्थापना का यत्न करूंगा.

11. मैं बुद्ध के आष्टांग मार्ग का पूरी तरह पालन करूंगा.

12. मैं बुद्ध के द्वारा बताई हुई दस परिमिताओं का पूरा पालन करूंगा.

13. मैं प्राणी मात्र पर दया रखूंगा और उनका लालन-पालन करूंगा.

14. मैं चोरी नहीं करूंगा.

15. मैं झूठ नहीं बोलूंगा.

16. मैं व्याभिचार नहीं करूंगा.

17. मैं शराब नहीं पीऊंगा.

18. मैं अपने जीवन को बुद्ध धम्म के तीन तत्वों-अथार्त प्रज्ञा, शील और करुणा पर ढालने का यत्न करूंगा.

19. मैं मानव मात्र के विकास के लिए हानिकारक और मनुष्य मात्र को उच्च– नीच मानने वाले अपने पुराने हिंदू धर्म को पूर्णत: त्यागता हूं और बुद्ध धम्म को स्वीकार करता हूं.

20. यह मेरा पूर्ण विश्वास है कि गौतम बुद्ध का धम्म ही सही धम्म है.

21. मैं यह मानता हूं कि अब मेरा नया जन्म हो गया है.

22. मैं यह प्रतिज्ञा करता हूँ कि आज से मैं बुद्ध धम्म के अनुसार आचरण करूंगा.

आजतक से साभार

यूनेस्को से बाहर हुआ अमेरिका

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ट्रंप

वाशिंगटन। अमेरिका ने गुरुवार को यूनेस्को से बाहर होने की घोषणा कर दी. अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र की इस सांस्कृतिक संस्था पर इजरायल विरोधी रूख अपनाने का आरोप लगाया है.

पेरिस स्थित यूनेस्को ने 1946 में काम करना शुरू किया था और यह विश्व धरोहर स्थल को नामित करने को लेकर मुख्य रूप से जाना जाता है. यूनेस्को से बाहर होने का अमेरिका का फैसला 31 दिसंबर 2018 से प्रभावी होगा. तब तक अमेरिका यूनेस्को का एक पूर्णकालिक सदस्य बना रहेगा.

विदेश विभाग की प्रवक्ता हीथर नाउर्ट ने कहा, ‘‘यह फैसला यूं ही नहीं लिया गया है बल्कि यह यूनेस्को पर बढ़ती बकाया रकम की चिंता और यूनेस्को में इजरायल के खिलाफ बढ़ते पूर्वाग्रह को जाहिर करता है. संस्था में मूलभूत बदलाव करने की जरूरत है.’’ उन्होंने कहा कि विदेश विभाग ने यूनेस्को महानिदेशक इरीना बोकोवा को संस्था से अमेरिका के बाहर होने के फैसले की सूचना दी और यूनेस्को में एक स्थायी पर्यवेक्षक मिशन स्थापित करने की मांग की है.

प्रवक्ता ने कहा कि अमेरिका ने महानिदेशक को गैर सदस्य पर्यवेक्षक के तौर पर यूनेस्को के साथ जुड़े रहने की अपनी इच्छा जाहिर की है ताकि संगठन द्वारा उठाए जाने वाले कुछ अहम मुद्दों पर अमेरिकी विचार, परिप्रेक्ष्य और विशेषज्ञता में योगदान दिया जा सके. इन मुद्दों में विश्व धरोहर की सुरक्षा, प्रेस की स्वतंत्रता की हिमायत करना और वैज्ञानिक सहयोग एवं शिक्षा को बढ़ावा देना भी शामिल है.

3 लाख युवाओं को नौकरी के लिए विदेश भेजेगी मोदी सरकार, जल्द करें आवेदन

मोदी सरकार देश के युवाओं को एक खास तोहफा देने की तैयारी कर रही है. जहां केंद्र सरकार 3 लाख युवाओं को जापान भेजने की योजना बना रही है. इन युवाओं को वहां ऑन-जॉब ट्रेनिंग के लिए भेजा जाएगा. सरकार के मुताबिक इन युवाओं को 3 से 5 साल के लिए यहां भेजा जाएगा. इस दौरान इन युवाओं का पूरा खर्च जापान सरकार उठाएगी. यही नहीं, ट्रेनिंग पूरी होने के बाद यहां कुछ युवाओं को नौकरी भी दी जाएगी.

केंद्रीय कौशल विकास मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने बताया कि भारत सरकार कौशल विकास योजना के तहत 3 लाख युवाओं को जापान भेजेगी. यहां इन युवाओं को ऑन-जॉब स्किल ट्रेनिंग दी जाएगी. उन्होंने कहा कि केंद्रीय कैबिनेट ने भारत और जापान के बीच ‘टेक्न‍िकल इंटर्न ट्रेनिंग प्रोग्राम (TITP) के लिए समझौता ज्ञापन करने को मंजूरी दे दी है.

3 लाख युवाओं को अगले तीन साल के दौरान जापान भेजा जाएगा. जिसमें 50 हजार से भी ज्यादा युवाओं को जापान में नौकरी करने का मौका दिया जाएगा. वहीं जब ये युवा जापान से ट्रेनिंग लेकर वापस स्वदेश लौटेंगे, तो वह भारतीय इंडस्ट्र‍िय क्षेत्र में अपना योगदान देंगे. जापान की जरूरतों के मुताबिक इन युवाओं को पारदर्शी तरीके से चुना जाएगा. अगर आप की इसमें रुचि है, तो आप कौशल विकास मंत्रालय की आधिकारिक वेबासइट पर नजर बनाए रखें. यहां आपको इस संबंध में अपडेट्स मिलती रहेंगी.

धम्म चक्र प्रवर्तन दिवस विशेषः भारत में बौद्ध धर्म के पुनरुत्थान के छह दशक

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बोधिसत्व भारत रत्न बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने सन् 1956 में विजयदशमी के दिन नागपुर में अपने लाखों अनुयायियों के साथ धम्म दीक्षा ली थी. यह वह तारीख थी, जब भारत में धम्म कारवां को नयी गति और दिशा मिली थी. अब उस तारीख के छह दशक पूरे हो चुके हैं. ऐसे में यह सवाल एक बार फिर आता है कि आखिर बाबासाहेब ने धर्म परिवर्तन क्यों किया और धम्म कारवां क्यों आरंभ किया? नई पीढ़ी के युवाओं के लिए इस सवाल का जवाब ज्यादा जरूरी है, ताकि वो बाबासाहेब को एक धम्मचक्र गतिमान करने वाले विभूति के रूप में भी देख सकें.

असल में डॉ. अम्बेडकर ने अमेरिका के कोलम्बिया विश्वविद्यालय में अपनी पढ़ाई के दौरान यह निष्कर्ष निकाल लिया था कि भारत में प्रचलित जातिगत असमानता दलितों के पिछड़े होने का मुख्य कारण है. 9 मई, 1916 को कोलम्बिया विश्वविद्यालय में आयोजित एक सेमिनार में अपने रिसर्च पेपर ‘भारत में जातियां-उनकी संरचना, उद्भव एवं विकास’ के जरिए डॉ. अम्बेडकर ने यह साबित कर दिया था कि कुछ स्वार्थी लोगों ने जातिगत असमानता की व्यवस्था को शास्त्र सम्मत दिखाने की कोशिश की है और ये धारणा फैलाई है कि शास्त्र गलत नहीं हो सकते. भारत लौटने के बाद उन्होंने दलितों के मानवाधिकारों के लिए अलग-अलग मोर्चे पर प्रयास करना शुरू कर दिया. महाड सत्याग्रह द्वारा सार्वजनिक तालाबों से पानी पीने के अधिकार, कालाराम मंदिर में दलितों के प्रवेश का अधिकार, अंग्रेजी सरकार के सामने दलितों के लिए वयस्क मताधिकार का अधिकार, गोलमेज सम्मेलन में पृथक निर्वाचन के अधिकार की लड़ाई ऐसी ही कोशिश थी.

1932 में ब्रिटिश सरकार ने दलितों के लिए पृथक निर्वाचन क्षेत्र की घोषणा भी कर दी थी लेकिन महात्मा गांधी द्वारा आमरण-अनशन करने के कारण डॉ़ अम्बेडकर को तरह-तरह की धमकियां मिली. तब डॉ. अम्बेडकर को मजबूर होकर पूना पैक्ट स्वीकार करना पड़ा और दलितों के लिए आरक्षण के बदले में पृथक निर्वाचन का हक छोड़ना पड़ा. इस संघर्ष के दौरान डॉ. अम्बेडकर इस निष्कर्ष पर पहुंच चुके थे कि हिन्दू धर्म में रहकर दलितों को राजनैतिक आजादी का अधिकार भले ही मिल जाए लेकिन उनको आर्थिक और सामाजिक बराबरी का हक नहीं मिल सकता. इसलिए 1935 में येवला (नाशिक) में डॉ. अम्बेडकर ने घोषणा की थी कि वह हिन्दू धर्म में पैदा हुए थे यह उनके वश की बात नहीं थी लेकिन हिन्दू रहकर वह मरेंगे नहीं, यह उनके वश में है. डॉ. अम्बेडकर ने धर्म-परिवर्तन का निश्चय येवला की सभा में ही कर लिया था.

धर्म परिवर्तन पर विचार करने के लिए 30 एवं 31 मई 1936 को बंबई में आयोजित महार परिषद को संबोधित करते हुए डॉ. अम्बेडकर ने कहा थाः -‘धर्म परिवर्तन कोई बच्चों का खेल नहीं है. यह ‘मनुष्य के जीवन को सफल कैसे बनाया जाय’ इस सरोकार से जुड़ा प्रश्न है… इसको समझे बिना आप धर्म परिवर्तन के संबंध में मेरी घोषणा के वास्तविक निहितार्थ का अहसास कर पाने में समर्थ नहीं होंगे. छुआछूत की स्पष्ट समझ और वास्तविक जीवन में इसके अमल का अहसास कराने के लिए मैं आप लोगों के खिलाफ किये जाने वाले अन्याय और अत्याचारों की दास्तान का स्मरण कराना चाहता हूं. सरकारी स्कूलों में बच्चों का दाखिला कराने का हक जताने पर या सार्वजनिक कुंओं से पानी भरने का अधिकार जताने पर या घोड़ी पर दूल्हे को बैठाकर बारात को जुलूस की शक्ल में सार्वजनिक रास्तों से घुमाने के अधिकार आदि का इस्तेमाल करने पर आप लोगों को सवर्ण हिन्दुओं द्वारा मारे-पीटे जाने के उदाहरण तो बहुत आम हैं. लेकिन ऐसी और भी अनेक वजहें हैं जिनके कारण दलितों पर सवर्ण हिन्दुओं द्वारा अत्याचार और उत्पीड़न का कहर ढाया जाता है… खरी बात पूछूं तो बताइये कि इस समय हिन्दुओं और आप लोगों के बीच क्या किसी प्रकार के समाजिक संबंध हैं?

जिस तरह मुसलमान हिन्दुओं से भिन्न हैं; उसी तरह दलित लोग भी हिन्दुओं से नितान्त भिन्न हैं. जिस तरह मुसलमानों और ईसाइयों के साथ हिन्दुओं का रोटी-बेटी का कोई सम्बन्ध नहीं होता है उसी तरह आप लोगों के साथ भी हिन्दुओं का किसी भी प्रकार का रोटी-बेटी का कोई संबंध नहीं है… आपका समाज और उनका समाज दो बिल्कुल अलग-अलग समूह हैं… हालांकि आप लोगों ने धर्मांतरण के महत्व को नहीं समझा है लेकिन निस्संदेह रूप से आप लोगों ने नामान्तरण यानि नाम परिवर्तन के महत्व को समझ ही लिया है. अगर आप लोगों में से किसी व्यक्ति से उसकी जाति के बारे में सवाल कर दिया जाता है कि वह किस जाति का है तो वह दलित होने के रूप में अपना उत्तर देता है, लेकिन वह महार है या भंगी है, ऐसा बताने में संकोच करता है. जब तक कुछ विशेष परिस्थितियों की मजबूरी न हो तब तक कोई भी व्यक्ति अपना नाम नहीं बदल सकता. ऐसे नाम परिवर्तन का कारण यह है कि एक अनजान आदमी तो दलित और सवर्ण के बीच कोई अन्तर कर नहीं सकता. और जब तक एक हिन्दू को किसी व्यक्ति की जाति का पता नहीं चल जाता तब तक उस व्यक्ति के दलित होने के कारण वह हिन्दू उस व्यक्ति के खिलाफ अपने मन में नफरत का भाव नहीं भर सकता. सवर्ण हिन्दुओं को जब तक साथ यात्रा कर रहे दलितों की जातियों की जानकारी नहीं होती है तब तक तो यात्रा के दौरान वे बड़े दोस्ताना अंदाज में व्यवहार करते हैं, लेकिन जैसे ही किसी हिन्दू को यह पता चलता है कि वह जिस व्यक्ति से बातचीत कर रहा है वह दलित है; तो उसका मुंह और मन तुरंत कसैला हो जाता है. आप लोगों के लिए इस तरह के अनुभव नये नहीं हैं. …

जब तक आप हिन्दू धर्म में बने रहेंगे तब तक आपको अपने जाति नाम को छिपा कर नाम-परिवर्तन करते रहने पर निरन्तर मजबूर होना पड़ेगा… इसलिए मैं आप लोगों से यह पूछता हूं कि बजाय इसके कि आप आज एक नाम बदलें, कल दूसरा नाम बदलें और पेंडुलम की तरह लगातार ढुलमुल हालत में बने रहें, आप लोगों को धर्म परिवर्तन करके अपना नाम स्थाई रूप से क्यों नहीं बदल लेना चाहिये?’ डॉ. अम्बेडकर द्वारा कही गई उपरोक्त बातें कमोबेश आज भी उतनी ही सत्य हैं जितनी कि सन् 1935 में थी.

इसी सभा में धर्म परिवर्तन की आवश्यकता के बारे में बोलते हुए डॉ. अम्बेडकर ने कहा:-

‘मुझे उस प्रश्न पर बस आश्चर्य ही होता है जिसे कुछ हिन्दू कुछ इस तरह उठाते हैं कि केवल धर्म-परिवर्तन से क्या होने वाला है? भारत में वर्तमान समय के सिक्खों, मुसलमानों और ईसाईयों में से अधिसंख्य लोग तो पहले हिन्दू ही थे और उन में भी शूद्रों और दलितों की तादाद ही सबसे ज्यादा है…अगर ऐसा है भी तो धर्म-परिवर्तन के बाद उनकी स्थिति में एक स्पष्ट प्रगति साफ दिखती है… समस्या पर गहन चिंतन-मनन करने के बाद हर किसी को यह मानना पड़ेगा कि दलितों के लिये धर्म-परिवर्तन उसी प्रकार जरूरी है जिस प्रकार भारत के लिए स्वराज जरूरी है. दोनों का अंतिम लक्ष्य तो एक जैसा ही है, दोनों के लक्ष्य में कोई फर्क नहीं है और वह अंतिम लक्ष्य है स्वतंत्रता प्राप्त करना.

20 वर्षों तक सभी धर्मों का गहन अध्ययन करने के बाद डॉ. अम्बेडकर इस निश्चय पर पहुंचे कि बौद्ध धर्म सबसे उपयुक्त है, क्योंकि बौद्ध धर्म का जन्म भारत में ही हुआ है और बौद्ध धर्म समानता, करूणा, मैत्री, अहिंसा और भाई-चारे और वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने का संदेश देता है. इसमें ऊंच-नीच और छुआछूत के लिए कोई जगह नहीं है. जीवन के सभी पहलुओं पर विचार करने के पश्चात डॉ. अम्बेडकर ने 5 लाख अनुयायियों के साथ 14 अक्टूबर, 1956 को बौद्ध धम्म की दीक्षा लेकर बौद्धधम्म के प्रचार-प्रसार को नई गति प्रदान की. उन्होंने 22 प्रतिज्ञाओं का एक नया फार्मूला दिया.

भगवान बुद्ध ने ढाई हजार साल पहले अषाढ़ पूर्णिमा के दिन धम्म चक्र प्रवर्तन करके धम्म कारवां की शुरूआत की थी. डॉ. अम्बेडकर ने सन 1956 में विजयदशमी के दिन अपने लाखों अनुयायियों के साथ धम्म दीक्षा लेकर धम्म चक्र का अनुपर्वतन किया. धम्म कारवां आज काफी फल-फूल चुका है. 1956 में पांच लाख लोगों की संख्या आज करोड़ों में पहुंच गई है. अंग्रेजी अखबार द टाईम्स ऑफ इंडिया (नई दिल्ली संस्करण,10 नवंबर 2006) में प्रकाशित एक रपट के अनुसार भारत वर्ष में सन 2006 में 30 लाख लोगों ने बौद्ध धम्म की दीक्षा ली. 2001 की जनगणना के वक्त बढ़कर यह लगभग 81 लाख हो चुकी थी. जो कि 2011 की आखिरी जनगणना के प्रारंभिक अनुमानों के अनुसार 97 लाख पहुंच गई हैं. हालांकि कुछ विशेषज्ञ भारत में बौद्धों की संख्या 3 करोड़ 50 लाख से भी अधिक मानते हैं. उनका मानना है कि जनगणना में वास्तविक संख्या इसलिए सामने नहीं आ पाती हैं क्योंकि काफी लोग बौद्ध होते हुए भी अपने को आधिकारिक दस्तावेजों में बौद्ध नहीं घोषित करते.

अमेरिका और यूरोप में भी बौद्ध धम्म बहुत तेजी से बढ़ती हुई जीवनशैली बनता जा रहा है. डॉ. अम्बेडकर ने धम्म दीक्षा लेते हुए कहा था कि वो एक नए किस्म का धम्म कारवां आरंभ करने जा रहे हैं, जिसमें बौद्ध भिक्षु शील सदाचार का पालन करते हुए सामाजिक और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का कार्य करेंगे. इससे प्रभावित होकर एशिया के अन्य देशों में भी बौद्ध पुनर्जागरण तेजी से हुआ. जिनेवा आधारित ‘अंतर्राष्ट्रीय धार्मिक व आध्यात्मिक संगठन’ ने 2009 का ‘विश्व के सर्वश्रेष्ठ धर्म का सम्मान’ बौद्ध धम्म को प्रदान किया.

धम्म दीक्षा लेने वालों के जीवन में बहुत परिवर्तन आया है और उनका चहुमुंखी विकास हुआ है. मशहूर समाजशास्त्री डी. एस. जनबन्धू और गौतम गावली द्वारा महाराष्ट्र में किए गए समाजशास्त्रीय सर्वेक्षण के अनुसार जिन लोगों ने धम्म दीक्षा ली उनमें एक नई पहचान और आत्मसम्मान की भावना विकसित हुई, जिससे उनके सामाजिक, आर्थिक और मानसिक स्तर में काफी सुधार आया. इन नवदीक्षित लोगों ने राष्ट्र निर्माण में बहुत महत्वपूर्ण योगदान दिया. इसी प्रकार का एक शोध भारतीय प्रशासनिक सेवा के वरिष्ठ अधिकारी डॉ. संजय चहांडे ने किया और वो भी इसी निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि धम्म दीक्षा लेने वालों का विकास धम्म दीक्षा न लेने वालों की तुलना में अधिक हुआ है. डॉ. संजय चहांडे ने इस विषय पर पीएचडी की है और वे इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि बौद्ध धर्म अपनाने के बाद दलितों के सामाजिक और आर्थिक जीवन में काफी अच्छे बदलाव आए हैं. उनका आत्मविश्वास बढ़ा है, जिसके कारण उन्होंने जीवन के हर क्षेत्र में प्रगति की है.

एक सर्वे के अनुसार ताईवान में बौद्ध अनुयायियों की संख्या सन् 1980 में 8 लाख थी जो 2001 में बढ़कर 55 लाख और 2006 में बढ़कर 80 लाख हो गई. इस तरह 26 सालों में ताईवान में बौद्ध अनुयायियों की संख्या दस गुणा बढ़ी है. इसी अवधि में ताईवान में बुद्ध विहारों की संख्या 1157 से बढ़कर 4500 और बौद्ध भिक्षुओं की संख्या 3470 से बढ़कर 10 हजार पहुंच गई. ताईवान में भिक्षु और भिक्षुनियां अनेक प्रकार के समाजिक कार्य, स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा जैसे व्यक्ति विकास के काम कर रहे हैं. इसी तरह चीन में बौद्ध धर्म मानने वालों की संख्या 10 करोड़ से भी अधिक हो गई है. थाईलैंड में 90 प्रतिशत से भी अधिक जनसंख्या बौद्ध धर्म मानने वालों की है. यही स्थिति श्रीलंका, म्यामांर और भूटान जैसे देशों की है.

भगवान बुद्ध के कारण एशिया के अधिकतर देश भारत को बहुत पवित्र मानते हैं और भारत की यात्रा करना अपना धर्म समझते हैं. जापान, कोरिया, थाईलैंड, चीन, म्यांमार, श्रीलंका, ताईवान सहित अनेकों देशों के करोड़ों लोगों के मन में एक लालसा रहती है कि जीवन में कम से कम एक बार बोधगया, सारनाथ, कुशीनगर, श्रावस्ती, संकिशा और सांची के दर्शन कर पाएं. इसलिए भारतवर्ष के लिए बुद्ध और उनकी शिक्षाओं द्वारा पूरे एशिया का अगुवा बनने का सुनहरा अवसर है.

तमाम वर्ग और धर्म के लोगों ने बौद्ध धम्म अपनाया हालांकि दूसरी ओर धम्म कारवां की लोकप्रियता से डरे कुछ लोगों और संगठनों द्वारा अनेकों दुष्प्रचार करने की घटना भी सामने आई हैं. इसमें एक दुष्प्रचार यह किया जा रहा है कि बौद्धधर्म केवल दलित अपना रहे हैं. जबकि हकीकत इससे अलग है. भगवान बुद्ध दलित नहीं थे. उनके प्रथम पांचों शिष्य ब्राह्मण थे. उसके बाद यश और उसके 54 साथी व्यापारी वर्ग से थे. उसके बाद धम्मदीक्षा लेने वाले उरूवेला कश्यप, नदी कश्यप, गया कश्यप और उनके 1000 शिष्य सभी ब्राह्मण थे. राजा बिबिंसार और राजा प्रसेनजित तथा शाक्य संघ के लोग सभी के सभी क्षत्रिय थे. वर्तमान समय में बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले महापंडित राहुल सांस्कृत्यायन, धर्मानंद कौशाम्बी, डी डी कौशाम्बी पूर्व में ब्राह्मण थे. इसी तरह भदन्त आनंद कौशलायन, आचार्य सत्यनारायण गोयनका, भन्तेसुरई सशई, अमेरिका के मशहूर फिल्म अभिनेता रिचर्ड गेरे, फिल्म प्रोड्यूसर टीना टर्नर कोई भी दलित वर्ग से नहीं है. इसलिए बौद्ध धर्म के विरोधियों के इस मिथ्या प्रचार को कि बौद्ध धर्म दलितो का धर्म होता जा रहा रोका जाना चाहिए.

वैसे भी भूमंडलीकरण के कारण लोगों में आर्थिक समृद्धि आने के साथ मानसिक तनाव बढ़ेगा और दुनिया में अशांति भी बढ़ेगी. इन सबसे निपटने में बुद्ध की शील-समाधि और प्रज्ञा पर आधारित शिक्षाएं बहुत काम आएगी क्योंकि दुनिया को ‘युद्ध’ की नहीं ‘बुद्ध’ की आवश्यकता है.

लेखक एक बौद्ध विचारक, साहित्यकार और सामाजिक चिंतक हैं.

13 साल से न्याय की आस में धरना दे रहे एचटी ग्रुप से निकाले गए मीडियाकर्मी की धरनास्थल पर मौत

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नई दिल्ली। हिंदुस्तान टाइम्स के सामने पिछले 13 साल से न्‍याय की आस में बैठे रविंद्र ठाकुर बृहस्पतिवार सुबह धरना स्थल पर मृत पाए गए. लगभग 56-57 वर्षीय रविंद्र ठाकुर मूल रुप से हिमाचल प्रदेश के रहने वाले हैं. बाराखंभा पुलिस को रविंद्र के परिजनों का इंतजार है, जिससे वह उनके शव का पोस्टमार्टम करवा सके. हिंदुस्तान टाइम्स ने 2004 में लगभग 400 कर्मियों को एक झटके में सड़क पर ला कर खड़ा कर दिया था. इसमें रविंद्र ठाकुर भी शामिल थे. इसके बाद शुरू हुई न्याय की जंग में रविंद्र ने अपने कई साथियों को बदहाल हालत में असमय दुनिया छोड़ते हुए देखा. बदहाली के दौर से गुजर रहे इनके कुछ साथियों ने तो खुदकुशी करने जैसे आत्मघाती कदम तक उठा लिए. अपने कई साथियों को कंधे देने वाला यह शख्‍स खुद इस तरह इस दुनिया से रुखसत हो जाएगा किसी ने सोचा भी ना था.

रविंद्र ने पिछले 13 सालों में कई उतार-चढ़ाव देखे. कभी किसी कोर्ट से राहत की खबर के बाद चेहरे पर खुशी की लहर, तो कभी प्रबंधन द्वारा स्‍टे ले लेने पर चेहरे पर उपजी निराशा. रविंद्र के लिए तो कस्तूबरा गांधी मार्ग में हिंदुस्‍तान टाइम्स के कार्यालय के बाहर स्थित धरना स्थल ही जैसे घर बन गया हो. उसके साथियों के अनुसार वह पिछले कई सालों से अपने घर भी नहीं गए थे. वह रात में धरनास्थल पर ही सोते थे.

रोजगार का कोई अन्य साधन न होने की वजह से वह अपने साथियों व आसपास स्थित दुकानदारों पर निर्भर थे. कभी मिला तो खा लिया, नहीं मिला तो भूखे ही सो गए. इस फाकामस्‍ती के दौर में वह जल्द-जल्द बीमारी की पकड़ में भी आने लगे थे. परंतु उन्होंने कभी धरनास्थल नहीं छोड़ा. पिछले 13 साल से धरना स्‍थल पर रहने वाले रविंद्र ठाकुर की मौत की खबर पाकर वहां पहुंचे साथियों ने बताया कि उनके परिजनों के बारे में कोई जानकारी नहीं है. बस वे इतना ही जानते हैं कि उसका घर हिमाचल प्रदेश और पंजाब की सीमा पर कहीं स्थित है.

अपने कई साथियों को कंधे देने वाले इस शख्‍स की आत्‍मा को आज खुद अपनी पार्थिव देह के अंतिम संस्‍कार के लिए अपने परिजनों के कंधे की तलाश है. इस खबर को पढ़ने वालों से अनुरोध है कि वह इसको शेयर या फारवर्ड जरुर करें, जिससे असमय काल के गाल में गए जुझारु रविंद्र ठाकुर को उनकी अंतिम यात्रा में उनके परिजनों का कंधा मिल सके.

भड़ास4मीडिया से साभार

राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग ने BBAU के कुलपति को भेजा नोटिस

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नई दिल्ली। राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग ने बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय (बीबीएयू) के कुलपति को एक नोटिस भेजा है. यह नोटिस कुलपति की लापरवाही और आयोग द्वारा बुलाई गई बैठक में शामिल न होने पर भेजा गया है.

दरअसल, बीबीएयू प्रशासन द्वारा आरक्षण को ताक पर रख कर रोस्टर में गड़बड़ी और 100 से ज्यादा अध्यापकों की गलत तरीके से भर्ती की गई थी. जिसकी कार्रवाई राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग में 6 जुलाई 2017 को हुई. इस बैठक में जांच के लिए एक कमेटी का गठन किया गया. कमेटी के सदस्यों में आयोग चेयरमैन, मानव संसाधन विकास मंत्रालय और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अधिकारी शामिल हैं.

अगली बैठक 27 जुलाई को आयोग के चेयरमैन राम शंकर कठेरिया के चैम्बर में रखी गई. जिसमें बीबीएयू प्रशासन को नियम और कानून के हिसाब से काम करने की हिदायत दी और रोस्टर-भर्ती प्रकिया के दस्तावेज दिखाने के आदेश दिए. लेकिन बीबीएयू प्रशासन जांच में आयोग को सहयोग नहीं दे रहा है.

12 अक्टूबर 2017 को बीबीएयू के कुलपति के साथ बैठक होनी थी, लेकिन कुलपति बैठक में शामिल नहीं हुए. इसके बाद बैठक में कमेटी ने फैसला लिया गया कि बीबीएयू के कुलपति ने आरक्षण की नीतियों को ताक पर रखकर 100 से अधिक टीचिंग पर भर्ती की गई. आयोग ने कहा है कि बीबीएयू में बिना मानव संसाधन मंत्रालय और यूजीसी की सलाह या सहमति के कोई भर्ती प्रकिया नहीं करेगा. लेकिन बीबीएयू के कुलपति ने आयोग के निर्देशों की अवेहलना कर रहे हैं और नोटिस मिलने के बावजूद भी सांख्यकीय विभाग में साक्षत्कार ले रहे हैं

जानिए कैसी रही अनुपम खेर-जिम्मी शेरगिल स्टारर रांची डायरीज़

ये फिल्म एक गुड़िया की कहानी है, इसमें सौंदर्या और उनके दोस्त ताहा शहर और हिमांश जैसे कालाकार प्रमुख भूमिकाओं में हैं. हिमांश कोहली फिल्म में मोनू की भूमिका में हूं, जो एक छोटे शहर से मैकेनिक है और इसे अपने जीवन में बड़ा बनाने की इच्छा रखता है. फिल्म के ट्रेलर को देखकर लगता है कि फिल्म छोटे शहर से आए लोगों के बड़े बनने की कोशिश करने की कहानी है. जिसमें कॉमेडी का भी पुट है.

फिल्म का ट्रेलर देखर लगता है कि कहानी बैंक रौबरी, एटीएम से चोरी और किडनेपिंग जैसी घटनाओं से होते हुए आगे बढ़ती है. जिसके बाद जिम्मी शेरगिल जैसा पुलिस अफसर उनके पीछे पड़ जाता है. फिल्म का निर्देशन सात्विक मोहंती ने किया है. अनुपम खेर निर्मित इस फिल्म में जिम्मी शेरगिल, हैरी बाला और प्रदीप सिंह जैसे स्टार कलाकार्स भी शामिल हैं.

आज कोई भी बड़ी फिल्म रिलीज़ हुइ जिसका फायदा इस फिल्म को मिल सकता है. हालांकि वरूण धवन स्टारर जुड़वा 2 को दर्शकों का भरपूर प्यार मिल रहा है और रिलीज़ के तीसरे हफ्ते में भी फिल्म ज्यादातर स्क्रीन्स पर जारी है. जुड़वा 2 से टक्कर लेने के लिए रांची डायरीज़ फिल्म को अच्छे रीव्यूज़ का इंतज़ार है.

BRD मेडिकल कॉलेज में पिछले 24 घंटों में हुई 15 मासूमों की मौत

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इंसेफेलाइटिस

गोरखपुर। उत्तर प्रदेश के गोरखपुर के बाबा राघवदास मेडिकल कॉलेज (बीआरडी) में मासूमों की मौतों का सिलसिला जारी है. यहां 24 घंटों के भीतर ही 15 मासूमों ने दम तोड़ दिया. इसमें तीन की मौत की वजह इंसेफेलाइटिस से पीड़ित होना बताया गया है. जबकि इस दौरान इंसेफेलाइटिस के सात नए मरीज भर्ती हुए हैं. इंसेफेलाइटिस की वजह से दम तोड़ने वालों में देवरिया का रितिक (4), रूबीन (2), कमलावती के नाम शामिल हैं.

इसके अलावा विभिन्न वजहों से बारह अन्य बच्चों की भी मौत हो गई. वहीं बीते चौबीस घंटे के दौरान भर्ती मरीजों में बिहार के एक, देवरिया के तीन और सिद्धार्थनगर का एक, कुशीनगर के दो मरीज शामिल हैं. मेडिकल कॉलेज में जनवरी से अब तक इंसेफेलाइटिस से करीब 335 बच्चों की मौतें हो चुकी है, जबकि अभी 95 मरीजों का इलाज चल रहा है.

इंडियन एक्सप्रेस की खबर के मुताबिक हॉस्पिटल के कुछ और रिकॉर्ड्स सामने आए हैं. रिकॉर्ड्स की माने तो यहां पिछले चार दिनों में 333 से 360 मरीज दाखिल हुए हैं और रोज 10 से 12 की मौत हो रही है. 7 अक्तूबर को 12, 8 को 20, 9 को 18 और 10 को 19 की मौत हुई है.

बताया जा रहा है कि ये ज्यादार मौतें हॉस्पिटल के नियोनेतल इंटेनसीव केयर यूनिट (एनआईसीयू) में हो रही है, जिसके पीछे कई कारण हैं. इससे पहले अगस्त के दूसरे हफ्ते में करीब 60 लोगों की मौत हुई थी, जिसमें अधिकतर मासूम थे. मासूम की एक साथ हुई मौतों के बाद यूपी की योगी सरकार सवालों के घेरे में आ गई थी. जांच में अस्पताल की बड़ी लापरवाही का खुलासा हुआ था और डॉक्टरों की बड़ी लापरवाही भी सामने आई थी.

किताब का विरोध करने वालो ने कांचा इलैया के खिलाफ दर्ज करवाई FIR

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हैदराबाद। दलित लेखक और बुद्धिजीवी कांचा इलैया के खिलाफ हैदराबाद में मामला दर्ज किया गया है. इलैया पर यह मामला उनकी किताब ‘समाजिका स्मगलुरलू कोमातोल्लू’ लिखने पर किया गया है. इलैया ने इस किताब में हिंदू समाज की कुरीतियों और कुप्रथाओं के बारे में लिखा है.

एक छात्र ने आरोप लगाया है कि उनकी पुस्तक ‘समाजिका स्मगलुरलू कोमातोल्लू’ ने न केवल वैश्य समुदाय बल्कि सभी हिंदू समुदायों पर निशाना साधा और इससे हिंदुओं की भावनाएं आहत हुईं.

मलकाजगिरि पुलिस थाने के निरीक्षक जानकी रेड्डी ने कहा कि उन्होंने कहा कि 22 वर्षीय शिकायतकर्ता ने एक स्थानीय अदालत का दरवाजा खटखटाया था और उसके निर्देश के आधार पर पुलिस ने कल इलैया के खिलाफ एक मामला दर्ज किया. उन्होंने कहा कि मामला भारतीय दंड संहिता की धारा 153ए, 295ए और अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार रोकथाम) कानून के तहत दर्ज किया गया है.

पिछले महीने से पूरे तेलंगाना राज्य में इलैया के खिलाफ आर्य वैश्य समुदाय की ओर से विरोध प्रदर्शन किये जा रहे हैं. कांचा ने पिछले महीने यह आरोप लगाते हुए पुलिस में एक शिकायत दर्ज करायी थी कि चार व्यक्तियों ने वारंगल जिले के पारकल में उनके वाहन पर हमला किया और उनकी हत्या करने का प्रयास किया.

कथित हमले से आर्य वैश्य और दलितों के बीच तनाव उत्पन्न हो गया था और वे आमने-सामने आ गए थे. यद्यपि पुलिस ने समूहों को तितर-बितर कर दिया था जिससे मामले पर काबू पा लिया गया था. एक अधिकारी ने कहा था कि समुदाय इलैया पर उनकी पुस्तक को लेकर नाराज है और लेखक से माफी की मांग कर रहा है.

ग्लोबल हंगर इंडेक्स में 100वें स्थान पर भारत

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नई दिल्ली। सबका साथ, सबका विकास के साथ बनी मोदी सरकार की पोल खोलने वाली एक रिपोर्ट सामने आई है. इस रिपोर्ट में भारत को 119 देशों के वैश्वविक भूख सूचकांक में 100वें स्थान पर रखा गया है. यह रिपोर्ट इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टिट्यूट (IFPRI) ने तैयार की है.

रिपोर्ट के आने के बाद भारत सरकार की गरीबी और विकास से जुड़ी नीतियों पर सवाल भी उठने लगे हैं. केंद्रीय मंत्री कह रहे हैं जीडीपी ग्रोथ हो रही है लेकिन यह रिपोर्ट कुछ और ही हकीकत पेश कर रही है. रिपोर्ट में कहा गया है कि देश में भूख का स्तर गंभीर है. बच्चे खाने की वजह से कुपोषित हो रहे हैं. सामाजिक क्षेत्र को इसके प्रति मजबूत प्रतिबद्धता दिखाने की जरूरत है.

पिछले वर्ष भारत इस सूचकांक में 97वें स्थान पर था. जो इस साल खिसक कर 100वें स्थान पर आ गया है.  IFPRI ने एक बयान में कहा कि119 देशों में भारत 100वें स्थान पर है. पूरे एशिया में सिर्फ अफगानिस्तान और पाकिस्तान उससे पीछे हैं. उन्होंने कहा कि 31.4 के साथ भारत का 2017 का ग्लोबल हंगर इंडेक्स गंभीर श्रेणी में है.

रिपोर्ट के मुताबिक भारत की रैंकिंग चीन (29), नेपाल (72), म्यांमार (77), श्रीलंका (84) और बांग्लादेश (88) से भी पीछे है. पाकिस्तान और अफगानिस्तान क्रमश: 106वें और 107वें स्थान पर हैं.

अब 12 साल तक नहीं देना पड़ेगा बिजली का बिल, जानिए कैसे

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नई दिल्ली। अगर आपसे कहा जाए कि आपको 12 साल तक बिजली बिल देने की जरुरत नहीं है. तो आपकी खुशी का ठिकाना नहीं रहेगा. तो लिजिए हम आपको खुश कर देने वाली खबर दिखा रहे हैं. दरअसल बाजार में एक ऐसा डिवाइस आने वाला है जो लोगों को फ्री में बिजली मुहैया कराएगा. यह डिवाइस आपको लगातार 12 साल तक फ्री में बिजली देने में सक्षम है.

इस डिवाइस को बनाने वाले देश के जाने माने उद्योगपति और समाजसेवी मनोज भार्गव हैं. इन्होने दिल्ली में एक इवेंट के दौरान इसका लाइव डेमो दिखाया है. पोर्टेबल “सोलर डिवाइस हंस 300 पावरपैक” न केवल बिजली बनाता है बल्कि इसमें बिजली स्टोर भी होती है. भार्गव का कहना है कि इस डिवाइस से भारी तादाद में जरुरतमंद लोगों को बिजली उपलब्ध कराई जा सकती है.

इस पावरपैक से पैदा होने वाली बिजली से एक घर के लिए बल्ब, टीवी, पंखे जैसी जरुरत की चीजें चलाई जा सकती है. इस पावरपैक को 130 घंटे और 300 घंटे के वैरिएंट में लाया गया है. बाजार में इसकी किमत 10,000 रुपए और 14,000 रुपए रखी गई है. इसमें सबसे खास बात ये है इसके लिए कंपनी की ओर से 12 सालों की गारंटी भी दी जा रही है.

भारत में जन्मे अरबपति उद्यमी और समाजसेवी मनोज भार्गव ने मंगलवार को नई दिल्ली में एक इवेंट के दौरान डॉक्यूमेंट्री फिल्म- बिलियन्स इन चेंज 2 में दिखाए गए नए अविष्कारों का लाइव डेमो दिखाया. बिलियन्‍स इन चेंज 2 इस तरह की आई पहली डॉक्‍यूमेंट्री की अगली कड़ी है और इसमें पूरी तरह से नए पांच आविष्‍कारों की जानकारी दी गई है जो कि बुनियादी जरूरतों का सीधा समाधान करते हैं.

इवेंट के दौरान भार्गव ने पोर्टेबल सोलर डिवाइस हंस 300 पावरपैक और हंस सोलर को भारतीय बाजार में उतारने की जानकारी दी.