टीकमगढ़। 21वीं सदी के भारत में भी अगर किसी दलित युवक को अपने नाम के आगे “राजा” लिखने की वजह से पीट-पीटकर अधमरा कर दिया जाए और उसका पैर तोड़ दिया जाए, तो यह सिर्फ अपराध नहीं, बल्कि जातिवादी दंभ का खुला प्रदर्शन है। यह शर्मनाक वारदात मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ जिले के मोहनगढ़ थाने के कंचनपुरा गांव में हुई।
यहां एक दलित युवक ने अपनी इंस्टाग्राम आईडी पर नाम के आगे “राजा” शब्द जोड़ लिया। बस, इतना करना ठाकुर समाज के कुछ जातिवादी गुंडों को नागवार गुज़र गया। बुंदेलखंड में राजा शब्द को ठाकुरों की “जागीर” मानने वाली मानसिकता इतनी ज़हरीली साबित हुई कि दलित युवक से पहले धमकी दी गई- “नाम हटा लो।” और जब उसने आत्मसम्मान से झुकने से इनकार किया तो दबंगों ने सामूहिक रूप से लाठियों-डंडों से हमला कर दिया। पीड़ित का पैर टूट गया, शरीर लहूलुहान हो गया।
पुलिस की ढीली कार्रवाई, परिवार की गुहार
हमले की शिकायत दर्ज हुई, लेकिन मोहनगढ़ पुलिस ने आरोपियों पर हल्की-फुल्की धाराएँ लगाकर मामले को रफा-दफा करने की कोशिश की। यही नहीं, आरोपी खुलेआम धमकी देते रहे और केस वापस लेने का दबाव बनाते रहे। मजबूर होकर पीड़ित परिवार को एसपी ऑफिस की चौखट पर जाकर न्याय की भीख मांगनी पड़ी। एसपी विक्रम सिंह से शिकायत के बाद एएसपी विक्रम सिंह कुशवाहा ने बयान दिया है कि मेडिकल रिपोर्ट आने के बाद सख़्त धाराएँ जोड़ी जाएँगी। सवाल है कि क्या दलितों को न्याय भी मेडिकल रिपोर्ट पर टालमटोल का मोहताज होना चाहिए?
आज़ादी के 79 साल बाद भी सामंती सोच
यह घटना सिर्फ एक युवक की पीड़ा नहीं, बल्कि उस सामंती सोच का आईना है, जो बुंदेलखंड की मिट्टी में अब भी गहरी जड़ें जमाए बैठी है। आज़ादी को 79 साल हो गए, लेकिन जाति का अहंकार अब भी लोगों की रगों में ज़हर बनकर दौड़ रहा है। सामाजिक कार्यकर्ता मनोज चौबे ने इस पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि बुंदेलखंड में शिक्षा का अभाव और राजवाड़ों की मानसिकता ने समाज को पीछे धकेला है। ब्रिटिश राज में पहली बार यहां स्कूल और स्वास्थ्य सेवाएँ आईं, लेकिन आज तक शिक्षा का स्तर बेहद खराब है। इसी अज्ञानता की वजह से सामंती सोच पनपती रही है। मनोज चौबे ने कहा कि अगर सोशल मीडिया न होता तो ऐसे मामले दबकर रह जाते। सोशल मीडिया ने न सिर्फ़ जातिवादी अपराधों को उजागर किया है, बल्कि यह साबित किया है कि दलितों और वंचितों की आवाज़ अब दबाई नहीं जा सकती।
लखनऊ, 2 मार्च 2025। प्रख्यात साहित्यकार और बिहार के पहले दलित IAS अधिकारी डॉ. शंभूनाथ का निधन हो गया। वे लखनऊ स्थित उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान में एक कार्यक्रम के दौरान बोलते-बोलते गिर पड़े और वहीं उनकी मृत्यु हो गई। इस अचानक घटना से पूरा साहित्य और प्रशासनिक जगत शोक में है। वो ऐसे विरले शख्सियत रहे, जिन्होंने प्रशासनिक सेवा और साहित्य दोनों में अमिट छाप छोड़ी।
डॉ. शंभूनाथ का जन्म 2 मार्च 1947 को बिहार के छपरा ज़िले में हुआ था। वे दुसाध जाति से थे और सिविल सेवा परीक्षा पास कर बिहार से पहले दलित IAS अधिकारी बने। यह उपलब्धि उस समय दलित समाज के लिए ऐतिहासिक थी। उनका प्रशासनिक करियर शानदार रहा। वे उत्तर प्रदेश के राज्यपाल प्रो. विष्णुकांत शास्त्री के मुख्य सचिव रहे और मायावती सरकार में प्रमुख सचिव का दायित्व संभाला।
सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने रांची लौटने के बजाय लखनऊ में रहना चुना। साहित्य से गहरे जुड़ाव के कारण वे हिंदी संस्थान, लखनऊ के अध्यक्ष बने। यह पद उनके लिए इसलिए भी उपयुक्त था क्योंकि वे केवल प्रशासक ही नहीं, बल्कि गंभीर साहित्यकार और शोधकर्ता भी थे। विशेष रूप से हजारीप्रसाद द्विवेदी पर उनका शोध उल्लेखनीय है और साहित्य जगत में उनकी अलग पहचान बनाता है। डॉ. शंभूनाथ का व्यक्तित्व बहुआयामी था। प्रशासनिक दक्षता, ईमानदारी और सामाजिक सरोकारों के साथ-साथ वे हिंदी साहित्य में भी लगातार सक्रिय रहे। अख़बारों और पत्रिकाओं में उनके लेख प्रकाशित होते रहे और साहित्यिक गतिविधियों से उनका नाम जुड़ा रहा।
उन्हें याद करते हुए एच.एल. दुसाध लिखते है-
2 मार्च, 1947 को बिहार के छपरा जिले को अपने जन्म से धन्य करने वाले पिता जागेश्वर राम की संतान शंभूनाथ सर असाधारण प्रतिभा के स्वामी रहे। मूलतः बिहार के रहने वाले डॉ शंभूनाथ सर का परिवार परवर्तीकाल में रांची चला गया, लेकिन वह लखनऊ में आ गए। बहुतों को पता नहीं कि दुसाध जाति में जन्मे डॉ. शंभूनाथ बिहार के पहले दलित थे जो आई ए एस बने। उनसे मेरा परिचय राज्यपाल प्रो शास्त्री के सचिव रहने के दौरान हुआ था। पिछले प्रायः डेढ़ दशक से उनके सीधे संपर्क में नहीं रहा, किंतु अखबारों के जरिए उनकी साहित्यिक गतिविधियों से लागतार अवगत होते रहा। उनके निधन से निश्चित ही साहित्य जगत को बड़ा आघात लगा है। उनके निधन से न केवल साहित्य जगत, बल्कि पूरा बहुजन समाज शोकाकुल है। उनका जीवन इस बात का उदाहरण है कि संघर्ष और प्रतिभा के बल पर समाज के वंचित वर्ग से आने वाला व्यक्ति भी प्रशासनिक और बौद्धिक शिखर पर पहुँच सकता है।
क्या आपको पता है कि देश की प्राइवेट यूनिवर्सिटी में भी रिजर्वेशन मिलना चाहिए?? नहीं पता? हाल ही में दिग्विजय सिंह की अध्यक्षता में शिक्षा पर 31-सदस्यीय संसदीय समिति, जिसमें तमाम दलों के प्रतिनिधि शामिल थे, ने इस मुद्दे पर एक रिपोर्ट दी है। इस रिपोर्ट में कई ऐसे चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं, जिसने तमाम निजी संस्थानों की मनमानी को सामने ला दिया है। साथ ही एससी, एसटी और ओबीसी को लेकर इन संस्थानों में बनी आरक्षण की नीति को तमाम निजी संस्थान किस तरह रौंद रहे हैं, यह भी सामने आ गया है।
समिति की रिपोर्ट के मुताबिक देश के सबसे प्रतिष्ठित माने जाने वाले कुछ निजी विश्वविद्यालयों में एससी समुदाय को 0.89 प्रतिशत, एसटी समुदाय को 0.53 प्रतिशत और ओबीसी समुदाय को 11.16 प्रतिशत का ही प्रतिनिधित्व मिल सका है। जबकि यह एससी के लिए 15 प्रतिशत, एसटी के लिए 7.5 प्रतिशत और ओबीसी को 27 प्रतिशत मिलना चाहिए था। यानी निजी संस्थान सरकार से लाभ तो ले रहे हैं लेकिन नियमों के तहत देश के वंचित समाज को लाभ दे नहीं रहे हैं।
दरअसल, संविधान का अनुच्छेद 15(5), जिसे डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार ने 2006 में 93वें संविधान संशोधन के माध्यम से जोड़ा था, सरकार को निजी शैक्षणिक संस्थानों में SC, ST, और OBC छात्रों के लिए आरक्षण को कंपलसरी यानी अनिवार्य करने का अधिकार देता है। मई 2014 में, प्रमति एजुकेशनल एंड कल्चरल ट्रस्ट बनाम भारत संघ मामले में, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने निजी क्षेत्र में आरक्षण की मान्यता को बरकरार रखा था।
लेकिन इस ऐतिहासिक फैसले के ग्यारह साल बाद भी संसद ने ऐसा कोई कानून पारित नहीं किया है, जो अनुच्छेद 15(5) को लागू करे। जिसकी वजह से निजी संस्थान दलितों, आदिवासियों और पिछड़ों को ठेंगा दिखा रहे हैं।
पिछले दिनों शिक्षण संस्थानों में दलित, आदिवासी और पिछड़े समाज की आरक्षण की स्थिति को जांचने और संविधान के अनुच्छेद 15(5) के मुताबिक इन वर्गों को प्राइवेट इंस्टीट्यूशन में आरक्षण की सुविधा मिल रही है या नहीं यह देखने के लिए 26 सितंबर 2024 को एक समिति गठित हुई थी। मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिंह की अध्यक्षता में गठित इस समिति ने 20 अगस्त 2025 को अपनी रिपोर्ट संसद के दोनों सदनों लोकसभा और राज्यसभा के पटल पर रख दी है।
समिति की रिपोर्ट के मुताबिक- बिट्स में, वर्ष 2024-25 के दौरान, कुल 5,137 छात्रों में से लगभग 514 ओबीसी, 29 एससी और 4 एसटी हैं, जो ओबीसी के मामले में लगभग 10 प्रतिशत, एससी के मामले में 0.5 प्रतिशत और एसटी के मामले में लगभग 0.08 प्रतिशत है। इसी तरह,- ओपी जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी में कुल 3,181 छात्रों में से 28 एससी और 29 एसटी हैं, जो 1 प्रतिशत से भी कम है। इसके अलावा, शिव नाडर विश्वविद्यालय में कुल 3,359 छात्रों में से एससी वर्ग से 48 और एसटी वर्ग के 29 छात्र हैं, जो क्रमशः 1.5 प्रतिशत और लगभग 0.5 प्रतिशत हैं।
यह तो बस झांकी भर है और महज कुछ निजी विश्वविद्यालयों के बारे में है। देश में तमाम ऐसी प्राइवेट यूनिवर्सिटी हैं जहां के आंकड़े सामने नहीं आए हैं। यूजीसी के मुताबिक वर्तमान में देश में 517 निजी विश्वविद्यालय हैं। अखिल भारतीय उच्चतर शिक्षा सर्वेक्षण यानी AISHI की साल 2021-22 की रिपोर्ट के अनुसार, डिग्री कॉलेजों में भारत के 45,473 कॉलेजों में से केवल 21.5 प्रतिशत सरकारी संस्थान हैं। जबकि 13.2 प्रतिशत निजी सहायता प्राप्त संस्थान हैं और 65.3 प्रतिशत निजी गैर-सहायता प्राप्त संस्थान हैं। साफ है कि जब चुनिंदा और नामी यूनिवर्सिटी रिजर्वेशन के नियमों की अनदेखी कर रही हैं तो बाकी के प्राइवेट यूनिवर्सिटी में क्या आलम होगा, यह समझा जा सकता है।
दिग्विजय सिंह की अध्यक्षता में शिक्षा पर 31-सदस्यीय संसदीय समिति, जिसमें तमाम दलों के प्रतिनिधि शामिल थे, ने इस मुद्दे का अध्ययन करने के बाद सर्वसम्मति से सिफारिश की है कि मोदी सरकार संसद में एक कानून लाए, जिसके तहत निजी उच्च शिक्षण संस्थानों में OBC के लिए 27%, SC के लिए 15% और ST के लिए 7.5% आरक्षण लागू किया जा सके।
हालांकि तमाम बहसों के बीच यहां दो सवाल हैं। पहला यह कि आखिर जब तात्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने साल 2006 में निजी संस्थानों में एससी, एसटी और ओबीसी को रिजर्वेशन दिलाने के लिए अनुच्छेद 15(5) जोड़ा था तो आखिर उसे कानून के रूप में संसद में पास क्यों नहीं करवा सके? और दूसरा, अगर वर्तमान सरकार और उसके मुखिया प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सबका साथ और सबका विकास का ढिंढ़ोरा पीटते हैं तो फिर अपने अब तक के 11 सालों के कार्यकाल में अनुच्छेद 15(5) की ओर से आंखें क्यों मूंदे हैं, जो भारत की बहुसंख्यक एससी, एसटी और ओबीसी को निजी उच्च शिक्षा संस्थानों में आरक्षण दिलवाता है?
क्या यहां यह सवाल नहीं उठता कि वंचितों के मामले में हर सरकार का रवैया एक ही रहता है और उन्हें आगे कर सब सिर्फ अपनी राजनीति चमकाना चाहते हैं?
ओडिशा। ओडिशा के पहाड़ों और जंगलों से निकली एक नई रोशनी आज पूरे देश को राह दिखा रही है। यह कहानी है संघर्ष की, जज़्बे की और असंभव को संभव करने की। चम्पा रसपेडा, जो कि दिदायि जनजाति से आती हैं, ने इतिहास रच दिया है। कठिन परिस्थितियों और सीमित संसाधनों के बीच, उन्होंने NEET परीक्षा पास कर अपने समुदाय की पहली छात्रा बनने का गौरव हासिल किया। उनके लिए यह सिर्फ एक व्यक्तिगत जीत नहीं है, बल्कि यह उन हजारों आदिवासी बेटियों के सपनों का भी सच होना है, जिन्हें समाज ने अक्सर हाशिये पर छोड़ दिया।
इसी राह पर चलते हुए, ओडिशा के ही गजपति जिले के एक अनाथ आदिवासी युवक नीरा मलिक ने भी कमाल कर दिखाया। जीवन में अपार संघर्षों और चुनौतियों का सामना करने के बावजूद, उन्होंने हार नहीं मानी और NEET 2025 पास करके MBBS सीट हासिल की। उनका सपना है कि वे डॉक्टर बनकर गरीब और वंचित लोगों की सेवा करें।
इन दोनों की कहानियां इस बात का सबूत हैं कि अगर इच्छाशक्ति प्रबल हो और मेहनत सच्ची, तो कोई बाधा बड़ी नहीं होती। समाज ने चाहे संसाधन न दिए हों, पर इन युवाओं ने अपने संघर्ष और लगन से यह साबित कर दिया कि वंचित समाज के बच्चे भी डॉक्टर बनने का सपना देख सकते हैं और उसे पूरा भी कर सकते हैं।
आज चम्पा और नीरा की यह उपलब्धि न केवल ओडिशा के आदिवासी समाज के लिए, बल्कि पूरे देश के हाशिये पर खड़े लाखों बच्चों के लिए एक संदेश है कि भले ही हमारी स्थिति कैसी भी हो, वह हमारी मंजिल तय नहीं करती, बल्कि तुम्हारा संघर्ष और साहस ही तुम्हारा भविष्य लिखता है।
गुजरात/ बनासकांठा। दिल्ली के कनॉट प्लेस, मुंबई के मरीन ड्राइव या किसी पब में थिरक रहे लोगों से अगर जातिवाद पर चर्चा की जाए तो शायद वे कहेंगे कि अब जातिवाद कहां है। लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के गृहप्रदेश गुजरात में एक गांव ऐसा भी है, जहां आज़ादी के 69 साल बाद पहली बार दलित समाज के लोगों के बाल गांव के नाई ने काटे। इससे पहले दलितों को दूसरे गांव जाकर बाल कटवाने पड़ते थे, जहां उनकी जाति की पहचान कोई नहीं जानता था।
बनासकांठा जिले का आलवाड़ा गांव लगभग 6,500 की आबादी वाला गांव है, जिसमें दलित समुदाय के करीब 250 लोग रहते हैं। गांव में नाई की पांच दुकानें हैं, लेकिन अब तक किसी भी नाई ने दलितों के बाल काटने की हिम्मत नहीं दिखाई। यह भेदभाव कब शुरू हुआ, कोई ठीक-ठीक नहीं बता सकता, लेकिन कहा जाता है कि उच्च जातियों को यह मंजूर नहीं था कि वही नाई उनके बाल भी काटें और दलितों के भी। इसी सोच ने धीरे-धीरे इसे परंपरा का रूप दे दिया। नतीजा यह हुआ कि गांव के दलित लंबे समय तक आस-पास के गांवों में जाकर अपनी जाति छिपाकर बाल कटवाने को मजबूर रहे।
हाल के वर्षों में अपने अधिकारों को लेकर दलित समाज के युवाओं में जागरूकता आई और उन्होंने इस भेदभाव का विरोध करना शुरू किया। मामला पुलिस और प्रशासन तक पहुंचा तो सामाजिक दबाव और चर्चाओं के बाद आखिरकार बदलाव का रास्ता निकला। 7 अगस्त को यह ऐतिहासिक घटना घटी जब 24 वर्षीय खेतिहर मज़दूर कीर्ति चौहान ने गांव के ही नाई की दुकान पर बाल कटवाए। उनके बाल काटे 21 वर्षीय पिंटू नाई ने। इस तरह दशकों पुरानी कुप्रथा का अंत हुआ और पहली बार गांव के दलितों को अपनी जाति छुपाए बिना गांव में ही बाल कटवाने की आज़ादी मिली।
गांव के दलितों में इसे लेकर खुशी का माहौल है। हालांकि सवाल अब भी वही है कि 1947 से हर साल देश आज़ादी का जश्न मना रहा है, लेकिन दलितों और आदिवासियों को असली आज़ादी आखिर कब मिलेगी?
ग्वालियर (मप्र)। आज़ाद भारत के 79 साल बाद भी सरकारी दफ्तरों की दीवारों के भीतर जातीय भेदभाव की परछाई गहराई से मौजूद है। ताज़ा मामला ग्वालियर का है, जहां मध्य प्रदेश भवन विकास निगम के सहायक महाप्रबंधक सतीश डोंगरे पिछले एक साल से बिना कुर्सी-टेबल के, ज़मीन पर चटाई बिछाकर काम करने को मजबूर हैं। यह तब है जब डोंगरे निगम में सहायक महाप्रबंधक जैसे महत्वपूर्ण पद पर हैं। जबकि इसी दफ्तर में उनके साथी अफसर आरामदायक चैंबर और फर्नीचर का इस्तेमाल कर रहे हैं।
मामले को लेकर बवाल मचा तो विभाग ने फंड की कमी बताकर पल्ला झाड़ने की कोशिश की। निगम के अतिरिक्त महाप्रबंधक अच्छेलाल अहिरवार का कहना है कि फर्नीचर “फंड आने पर” उपलब्ध कराया जाएगा। हालांकि उनकी यह सफाई महज खानापूर्ति है। क्योंकि यहां बड़ा सवाल यह है कि एक अधिकारी को अपनी बुनियादी ज़रूरत के लिए एक साल तक इंतजार कराना प्रशासनिक संवेदनशीलता है या लापरवाही? और ऐसा सिर्फ एक खास वर्ग के कर्मचारी के साथ ही क्यों? जबकि उसी दफ्तर में अन्य अधिकारियों को तमाम बेसिक सुविधाएं मिली हुई हैं।
इस मुद्दे पर सतीश डोंगरे का कहना है कि, “मैं सिर्फ अपना काम करना चाहता हूँ, लेकिन एक साल से मुझे लगातार अपमान सहना पड़ा है।” डोंगरे के बयान से साफ है कि यह बयान महज़ निजी वेदना नहीं, बल्कि लोकतंत्र के मूलभूत सिद्धांतों- गरिमा, समानता और सम्मान की सीधी अनदेखी का प्रमाण है।
मामला सिर्फ एक फर्नीचर का नहीं है। यह प्रशासन की प्राथमिकताओं और जातीय संवेदनशीलता पर गहरा सवाल खड़ा करता है। जब भवन विकास निगम करोड़ों की परियोजनाओं का बजट संभालता है, तो क्या एक अधिकारी के लिए कुर्सी-टेबल का इंतजाम इतना असंभव है? यह सवाल सिर्फ ग्वालियर या मध्य प्रदेश का नहीं, बल्कि पूरे देश के उस तंत्र का आईना है जो अभी भी जाति के भेदभाव से मुक्त नहीं हो सका है। सवाल है कि, जब राज्य की एजेंसियाँ करोड़ों की परियोजनाएँ सँभाल सकती हैं, तो एक अधिकारी के बुनियादी कार्य–परिसर और सम्मानजनक कार्य–स्थितियाँ क्यों नहीं सुनिश्चित कर सकतीं?
ज्यादा दिन नहीं बीते जब आंध्र प्रदेश में दलित समाज के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. रवि वर्मा को नीचे बैठे के लिए मजबूर किया गया था।
भारत की आजादी से पहले ब्रिटिश शासन के दौरान मतदान का अधिकार सीमित और शर्तों के आधार पर था। तब केवल वे लोग वोट दे सकते थे जिनके पास संपत्ति, आय, शिक्षा या टैक्स भुगतान जैसी योग्यता होती थी। इस कारण आबादी का बड़ा हिस्सा, खासकर गरीब, महिलाएं, मजदूर, भूमिहीन किसान और निचले तबकों के लोग यानी पूरा वंचित समाज चुनाव प्रक्रिया से बाहर था। हालांकि यह चौंकाने वाली बात है कि सन् 1947 में जब देश आज़ाद हुआ तब भी सभी को तुरंत मतदान का अधिकार देने पर सबकी सहमति नहीं थी। कुछ लोग चाहते थे कि कुछ खास लोगों को ही मतदान देने का हक हो, जैसा कि अंग्रेजी शासनकाल में था।
वोट का अधिकार के संबंध में इतिहास के उस कालखंड की चर्चा हम इसलिए कर रहे हैं क्योंकि आज एक बार फिर देश में वोट बचाने की लड़ाई छिड़ चुकी है। 11 अगस्त को लुटियन दिल्ली की सड़कें भारत के जन प्रतिनिधियों यानी सांसदों से पटी पड़ी थी। भारत के इतिहास में यह संभवतः पहली बार था जब लगभग आधी संसद यानी करीब 300 सांसद एक साथ सड़क पर उतरें। यानी जितने सांसद संसद के भीतर थे, उससे ज्यादा संसद से बाहर सड़क पर थे। मुद्दा वोट चोरी का था। हाल की इसी घटना ने हमें इतिहास में जाने को मजबूर कर दिया है। क्योंकि लोकतंत्र में जो एक वोट राजा और रंक को साथ लाकर खड़ा कर देता है, और जिसके बूते भारत की 80 फीसदी आबादी खुद को ताकतवर समझती है, उससे उसका वही हथियार छिनने की साजिश रची जाने लगी है।
जब संविधान सभा बनी, तब यह सवाल उठा कि आज़ादी के बाद भारत में मतदान का अधिकार किस तरह दिया जाए। उस समय कई नेता और अधिकारी मानते थे कि भारत की जनता इतनी “अशिक्षित” और “अनुभवहीन” है कि उसे तुरंत मत देने का अधिकार देना जोखिम भरा होगा। उनका तर्क था कि पहले शिक्षा और राजनीतिक जागरूकता बढ़ाई जाए, फिर धीरे-धीरे सभी को अधिकार दिया जाए।
साल 1946 से 1949 तक के संविधान सभा की बहस के रिकॉर्ड देखने पर पता चलता है कि वंचितों को वोट देने का विरोध तीन तरह के लोग कर रहे थे।
पहला, पूर्व रियासतों और ज़मींदार वर्ग के प्रतिनिधि
दूसरा, नौकरशाह पृष्ठभूमि के रूढ़िवादी सदस्य
और तीसरा, कुछ दक्षिणपंथी और साम्प्रदायिक सोच वाले लोग
इसमें, पूर्व रियासतों और ज़मींदार वर्ग के प्रतिनिधियों में कई ऐसे सदस्य जो राजघरानों, बड़ी रियासतों या ज़मींदार पृष्ठभूमि से थे, उनका तर्क था कि-
– संपत्ति और शिक्षा के आधार पर ही मताधिकार होना चाहिए।
– उन्हें डर था कि भूमिहीन और गरीब बहुसंख्यक किसान, मजदूर और “अशिक्षित” जनता सत्ता में आकर उनके हितों को नुकसान पहुँचाएगी।
इसी तरह नौकरशाहों में कुछ पूर्व Indian Civil Service और प्रशासनिक अधिकारियों का कहना था कि भारत की जनता राजनीतिक रूप से अपरिपक्व है, इसलिए मताधिकार को धीरे-धीरे लागू किया जाए। कुछ दक्षिणपंथी और सांप्रदायिक प़ृष्ठभूमि के लोग मानते थे कि “पढ़ा-लिखा, संपन्न और जिम्मेदार” व्यक्ति ही वोट दे सकता है। इसमें बाल गंगाधर तिलक का नाम प्रमुखता से आता है। यानी कुल मिलाकर इनके मुख्य तर्क यह थे कि-
– भारत की 80% जनता अशिक्षित है, इसलिए उन्हें वोट का अधिकार देना जल्दबाजी है।
– पहले शिक्षा और “राजनीतिक प्रशिक्षण” दिया जाए, फिर मताधिकार दिया जाए।
– संपत्ति और कर भुगतान को योग्यता मानकर मतदान का अधिकार तय हो।
– अचानक सबको अधिकार देने से राजनीतिक अस्थिरता आ सकती है।
हालांकि तब डॉ. आंबेडकर, पंडित जवाहरलाल नेहरू, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद और के.टी. शाह जैसे प्रगतिशील नेताओं ने विरोधियों को करारा जवाब दिया। इन्होंने विरोधियों के तर्कों को खारिज करते हुए चार प्रमुख तर्क दिये।
पहला, अशिक्षित होना अयोग्यता नहीं है।
दूसरा, लोकतंत्र का मतलब ही है सभी को समान अधिकार।
तीसरा, अगर अधिकार “धीरे-धीरे” देंगे तो जो शक्तिशाली हैं, वे इसे हमेशा टालते रहेंगे।
और चौथा, चुनाव ही राजनीतिक शिक्षा का सबसे बड़ा माध्यम हैं।
बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर, जवाहरलाल नेहरू, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद सहित कई अन्य प्रगतिशील नेताओं ने स्पष्ट रूप से हर वर्ग के वयस्क व्यक्ति को मत का अधिकार देने की वकालत की। इसे लोकतंत्र के लिए बेहद अहम बताया गया। कहा गया कि भारत के हर धर्म, वर्ग और जाति के हर नागरिक को मतदान का अधिकार मिलना ही चाहिए।
बहस हुई और वयस्क मताधिकार लागू किया गया। तय हुआ कि 21 वर्ष से अधिक उम्र का हर नागरिक वोट दे सकेगा। यह फैसला उस समय के लिहाज़ से बहुत क्रांतिकारी था, जो दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की नींव बना। बाद में सन् 1988 में संविधान के अनुच्छेद 326 में 61वां संशोधन कर के तत्कालिन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने यह उम्र सीमा 18 वर्ष कर दी थी।
ऐसे में भारत के लोकतंत्र निर्माण की प्रक्रिया के दौरान जो लोग भारत की एक बड़ी आबादी को वोट के अधिकार से दूर रखना चाहते थे, आज ताकत उन्हीं के इर्ग-गिर्द घूम रही है। सत्ता को चलाने और उससे लाभ लेने वालों में उसी पृष्ठभूमि के लोग सबसे आगे हैं। इसलिए वह वर्ग चाहता है कि सत्ता उसके हिसाब से बने और चले भी। फैसले वह लिए जाएं, जो उनके हित का पोषण करती हो। यानी वोट का हक हासिल करने की यह लड़ाई पुरानी है।
हालांकि जब वोट का अधिकार किसे मिले, इसपर चर्चा चल रही थी, तब डॉ. आंबेडकर ने संविधान सभा में स्पष्ट कहा था कि- “लोकतंत्र में वोट का अधिकार सबसे बड़ा हथियार है। इसे किसी से भी छीनना, उसे दूसरे दर्जे का नागरिक बना देना है। उन्होंने यह भी कहा कि यदि हम कुछ वर्गों को मताधिकार से वंचित रखेंगे तो यह स्वतंत्रता संग्राम की आत्मा के साथ धोखा होगा।”
सोचिए, आज क्या हो रहा है, जो हो रहा है वह कौन कर रहा है, और वोटों की चोरी के जरिये वो क्या करना चाहता है। यह ऐसा सवाल है, जिसे देश के हर एक वोटर को खुद से जरूर पूछना चाहिए।
नई दिल्ली। सामाजिक चिंतक और राजनीतिक विश्लेषक योगेन्द्र यादव ने सुप्रीम कोर्ट में SIR की धज्जियां उड़ा दी है। उनकी दलीलों से देश में SIR पर चुनाव आयोग की मंशा को लेकर एक बड़ी बहस छिड़ गई है। सुप्रीम कोर्ट में योगेन्द्र यादव ने अपनी दलील में SIR को लोकतंत्र से मताधिकार छीनने का सबसे बड़ा अभ्यास बताया।
सुप्रीम कोर्ट में बिहार की मतदाता सूची में हुए Special Intensive Revision (SIR) अभियान पर सुनवाई के दौरान योगेन्द्र यादव ने तीखी दलीलें पेश कीं। उन्होंने अदालत के सामने यह आरोप लगाया कि SIR प्रक्रिया लोकतांत्रिक अधिकारों को कमजोर करने वाली, त्रुटिपूर्ण और पक्षपाती है, जिसके तहत लाखों लोगों का मताधिकार छीन लिया गया है।
योगेन्द्र यादव ने अदालत को बताया कि बिहार में इस विशेष पुनरीक्षण प्रक्रिया के दौरान लगभग 65 लाख मतदाताओं के नाम सूची से हटा दिए गए। उन्होंने कहा, “हम दुनिया के इतिहास में सबसे बड़े disenfranchisement (मताधिकार वंचन) का सामना कर रहे हैं।”
‘मृत’ घोषित पर जीवित गवाह
अपनी दलील को और ठोस बनाने के लिए उन्होंने दो ऐसे व्यक्तियों को अदालत में पेश किया जिनके नाम मतदाता सूची में ‘मृत’ के रूप में दर्ज थे, जबकि वे जीवित थे। यादव के अनुसार यह घटना SIR प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़ा करती है।
केवल हटाने का अभियान, जोड़ने का नहीं
यादव ने अदालत को बताया कि इस बार संशोधन में किसी भी नए मतदाता का नाम जोड़ने की बजाय केवल नाम हटाने पर जोर दिया गया। उनके अनुसार, यह पहली बार है जब मतदाता सूची संशोधन एकतरफा तरीके से हटाने पर केंद्रित रहा। अदालत में पेश किए गए आंकड़ों में कहा गया कि मतदाता सूची से 31 लाख महिलाओं और 25 लाख पुरुषों के नाम हटाए गए। यादव ने तर्क दिया कि यदि यह केवल मृत्यु या पलायन का मामला होता, तो पुरुषों के नाम अधिक हटने चाहिए थे, लेकिन डेटा इसका उल्टा साबित करता है।
फॉर्म भरने की अनिवार्यता पर सवाल
योगेन्द्र यादव ने यह भी कहा कि पहले मतदाता सूची में नाम बनाए रखने के लिए फॉर्म भरना अनिवार्य नहीं था, लेकिन इस बार बिना फॉर्म के नाम काट दिए गए। उन्होंने इसे “लोकतांत्रिक प्रक्रिया को बाधित करने वाला कदम” करार दिया। उन्होंने SIR को “fraudulent exercise” (धोखाधड़ीपूर्ण अभ्यास) बताया, जो न केवल प्रक्रियागत रूप से गलत है, बल्कि इसका उद्देश्य खास समूहों को राजनीतिक रूप से वंचित करना भी हो सकता है। यादव के अनुसार, यह कदम केवल तकनीकी त्रुटि नहीं बल्कि एक सुनियोजित राजनीतिक रणनीति की ओर इशारा करता है।
सुप्रीम कोर्ट की प्रतिक्रिया
इस सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट भी योगेन्द्र यादव की बात को ध्यान से सुनता रहा। न्यायालय ने योगेन्द्र यादव की प्रस्तुति को “excellent analysis” बताते हुए गंभीरता से सुना और चुनाव आयोग से जवाब तलब किया। इसके बाद मामले की अगली सुनवाई में आयोग को यह स्पष्ट करना होगा कि इतने बड़े पैमाने पर नाम काटने के पीछे आधार और प्रक्रिया क्या थी।
लोकतंत्र पर गहरा सवाल
इस पूरे मामले ने न केवल बिहार बल्कि पूरे देश में मतदाता सूची की पारदर्शिता और निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। विपक्षी दलों का मानना है कि अगर इस तरह के ‘संशोधन’ जारी रहे तो लोकतंत्र की जड़ें कमजोर होंगी और चुनावी प्रक्रिया पर जनता का भरोसा हिलेगा।
नई दिल्ली। आरक्षण में वर्गीकरण के बाद अब एससी-एसटी को मिलने वाले आरक्षण को आय के आधार पर देने की मांग करने वाली एक जनहित याचिका यानी PIL सुप्रीम कोर्ट में डाली गई है, जिसे शीर्ष अदालत ने सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया है। याचिका में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के भीतर आरक्षण के लाभ के बंटवारे में आर्थिक आधार को शामिल करने की मांग की गई है। इसका संज्ञान लेते हुए कोर्ट ने इस संबंध में केंद्र सरकार को 10 अक्टूबर तक जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।
याचिका में कहा गया है कि आज़ादी के बाद से चली आ रही आरक्षण व्यवस्था का फायदा एससी-एसटी समुदायों के भीतर एक सीमित वर्ग जो कि सशक्त है, उसतक सिमट गया है। तर्क दिया गया है कि एससी-एसटी वर्ग के आर्थिक रूप से बेहद पिछड़े लोग अब भी हाशिये पर हैं। उन्हें अब तक आरक्षण का ज्यादा लाभ नहीं मिल सका है। इसलिए, आरक्षण के लाभ में उन लोगों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए जो इसी समाज के तो हैं, लेकिन आर्थिक रूप से सबसे ज्यादा पिछड़े हैं।
यानी कुल मिलाकर इस याचिका में ओबीसी की तरह ही दलितों के क्रीमी लेयर वर्ग को आरक्षण से बाहर करने की वकालत की गई है। हालांकि इस तरह की मांग पहले भी की जाती रही है, लेकिन आरक्षण को आर्थिक की जगह सामाजिक बताते हुए हमेशा यह मांग खारिज होती रही है। इसकी एक जायज वहज भी है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 15(4) और 16(4) राज्य को सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण की अनुमति देता है। जहां तक दलित और आदिवासी वर्ग की बात है तो उनके लिए यह आरक्षण उनकी ऐतिहासिक सामाजिक वंचना के आधार पर तय हुई थी, न कि आर्थिक स्थिति के आधार पर। क्योंकि दलितों से भेदभाव आर्थिक आधार पर नहीं, बल्कि उनकी जातीय पहचान के कारण ज्यादा होता है।
आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट के रुख को देखें तो बीते ढाई दशक में यह काफी बदला है।
1992 में Indra Sawhney vs Union of India (Mandal Commission केस) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने OBC में ‘क्रीमी लेयर’ लागू करने का आदेश दिया। लेकिन SC/ST को क्रीमी लेयर से बाहर रखा गया। इसके पीछे तर्क दिया गया कि SC/ST की वंचना का मूल कारण सामाजिक भेदभाव है, आर्थिक स्थिति नहीं।
साल 2006 में एम. नागराज Vs यूनियन ऑफ इंडिया मामले में सुप्रीम कोर्ट ने SC/ST को पदोन्नति में आरक्षण की अनुमति दी, साथ ही क्रीमी लेयर की मांग को खारिज किया। उस फैसले में भी सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि SC/ST आरक्षण का उद्देश्य सामाजिक पिछड़ेपन की भरपाई करना है।
लेकिन साल 2014 के बाद तमाम फैसलों में आरक्षण को लेकर सुप्रीम कोर्ट की सोच और रुख बदलने लगा। जो सुप्रीम कोर्ट साल 1992 में इंदिरा साहनी मामले में एससी-एसटी में इस आधार पर क्रीमी लेयर को खारिज करने का फैसला सुना रहा था कि SC/ST की वंचना का मूल कारण सामाजिक भेदभाव है आर्थिक स्थिति नहीं। उसी शीर्ष अदालत ने
2018 में जरनैल सिंह vs लछमी नारायन गुप्ता मामले में SC-ST में भी पदोन्नति में आरक्षण के लिए ‘क्रीमी लेयर’ सिद्धांत लागू करने का संकेत दिया। सर्वोच्च न्यायालय का तर्क था कि जो SC/ST आर्थिक और सामाजिक रूप से उन्नत हो चुके हैं, उन्हें लाभ से बाहर किया जा सकता है।एक अन्य मामले में-
2020 में चेब्रोलु लीला प्रसाद राव vs स्टेट ऑफ आंध्र प्रदेश मामले में आदिवासी समाज से जुड़े आरक्षण पर सु्प्रीम कोर्ट ने ST में 100% आरक्षण को असंवैधानिक बताया। सर्वोच्च न्यायालय ने तर्क दिया कि आरक्षण में अति-सीमा संविधान के बुनियादी ढांचे के खिलाफ है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने तब क्रीमी लेयर पर सीधे टिप्पणी नहीं की।
2022 में तो स्टेट ऑफ पंजाब vs दविन्दर सिंह मामले में अपने फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने SC/ST उप-वर्गीकरण का रास्ता साफ कर दिया। साथ ही आर्थिक आधार पर आंतरिक विभाजन का भी संकेत दिया था।
इस बीच अब आर्थिक आधार पर आरक्षण की जनहित याचिका को स्वीकार कर सुप्रीम कोर्ट ने इस समाज की धड़कने तो बढ़ा ही दी है। और इसके राजनीतिक और सामाजिक असर क्या होंगे, यह सवाल उठने लगे हैं। सुप्रीम कोर्ट के इस कदम से एक बार फिर यह बहस शुरू हो गई है कि आरक्षण का आधार क्या होना चाहिए? साफ है कि अगर सुप्रीम कोर्ट इस याचिका पर साकारात्मक रुख दिखाता है तो आने वाले महीनों में यह मामला सिर्फ कोर्ट की चारदीवारी में नहीं, बल्कि सड़क से संसद तक गूंज सकता है।
11 अगस्त को लुटियन दिल्ली की सड़कें जन प्रतिनिधियों (सांसदों) से पटी पड़ी थी। भारत के राजनीतिक इतिहास में यह संभवतः पहली बार हुआ जब 300 सांसद एक साथ सड़क पर उतरें। मुद्दा वोट चोरी का था। इस विरोध प्रदर्शन से एक घटना याद आ गई।
जब देश आज़ाद हुआ तो सभी को तुरंत मतदान का अधिकार देने पर पूर्ण सहमति नहीं थी। भारत में 1947 से पहले ब्रिटिश शासन के दौरान मतदान का अधिकार सीमित और शर्तों के आधार पर था। तब केवल वे लोग वोट दे सकते थे जिनके पास संपत्ति, आय, शिक्षा या टैक्स भुगतान जैसी योग्यता होती थी। इस कारण आबादी का बड़ा हिस्सा, खासकर गरीब, महिलाएं, मजदूर, भूमिहीन किसान और निचले तबकों के लोग यानी पूरा वंचित समाज चुनाव प्रक्रिया से बाहर था।
जब संविधान सभा बनी, तब यह सवाल उठा कि आज़ादी के बाद भारत में मतदान का अधिकार किस तरह दिया जाए। उस समय कई नेता और कुछ अधिकारी मानते थे कि भारत की जनता इतनी “अशिक्षित” और “अनुभवहीन” है कि उसे तुरंत मताधिकार देना जोखिम भरा होगा। उनका तर्क था कि पहले शिक्षा और राजनीतिक जागरूकता बढ़ाई जाए, फिर धीरे-धीरे सभी को अधिकार दिया जाए। विरोध करने वालों में पूर्व रियासतों और जमींदार वर्ग के प्रतिनिधि, कई नौकरशाह और कुछ दक्षिणपंथी लोग शामिल थे।
लेकिन बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर, जवाहरलाल नेहरू, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद सहित कई अन्य प्रगतिशील नेताओं ने स्पष्ट रूपसे हर वर्ग के वयस्क व्यक्ति को मत का अधिकार देने की वकालत की। इसे लोकतंत्र के लिए बेहद अहम बताया गया। कहा गया कि भारत के हर धर्म, वर्ग और जाति के हर नागरिक को मतदान का अधिकार मिलना चाहिए।
बहस हुई और वयस्क मताधिकार लागू किया गया। तय हुआ कि 21 वर्ष से अधिक उम्र का हर नागरिक वोट दे सकेगा। बाद में यह उम्र सीमा 18 वर्ष कर दी गई। यह फैसला दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की नींव बना और उस समय के लिहाज़ से बहुत क्रांतिकारी था।
आज ताकत उन्हीं के इर्ग-गिर्द घूम रही है। सत्ता को चलाने और उससे लाभ लेने वालों में वही वर्ग सबसे आगे है। इसलिए वह चाहता है कि सत्ता उसके हिसाब से बने और चले भी। सत्ता में वही लोग बैठें, जिन्हें वह चाहते हैं। फैसले वह लिए जाएं, जो उनके हित का पोषण करती हो।
यानी यह लड़ाई पुरानी है।
जब इस पर चर्चा चल रही थी, तब डॉ. आंबेडकर ने संविधान सभा में स्पष्ट कहा था कि- “लोकतंत्र में वोट का अधिकार सबसे बड़ा हथियार है। इसे किसी भी वयस्क से छीनना, उसे दूसरे दर्जे का नागरिक बना देना है। उन्होंने यह भी कहा कि यदि हम कुछ वर्गों को मताधिकार से वंचित रखेंगे तो यह स्वतंत्रता संग्राम की आत्मा के साथ धोखा होगा।”
सोचिए, आज क्या हो रहा है, कौन कर रहा है, और उसका अंतिम लक्ष्य क्या है।
प्रिय बाबा, जब पूरा देश आपको अश्रुपूरित नेत्रों से विदा कर रहा है, मैंने एक कोना पकड़ लिया है, अपनी आधी जिंदगी जिस वटवृक्ष के साये में महफ़ूज़ हो कर काटी – आज आपके जाने से वह बेटी-सी बहू अपनी टूटी हुई हिम्मत बटोरने का साहस नहीं कर पा रही है।
मैं जानती हूं, आप सिर्फ मेरे ससुर नहीं थे, आप झारखंड के बाबा थे हर उस बच्चे के, जिसने जंगलों की गोद में जन्म लिया, और संघर्ष को पहली सांस में महसूस किया। जब मैं पहली बार इस परिवार में आई, तो आपके व्यक्तित्व पर गौरव हुआ। आपकी सादगी, आपकी आवाज़ में ठहराव, और सबसे ज़रूरी आपका सुनना। आप सुनते थे हर किसान की चिंता, हर औरत का दर्द, हर मां की खामोशी हर झारखंडी के अरमान।
आपने राजनीति को घर की तरह जिया जहाँ सत्ता नहीं, संबंधों का सम्मान होता है। आपके पास बड़ी डिग्रियाँ से भी बड़ी- दृष्टि दूरदर्शी थी। आपने केवल झारखंड को खड़ा नहीं किया हम सबको आत्मनिर्भर होने का हौसला दिया।
जब आप “झारखंड” कहते थे, तो वो शब्द भूगोल नहीं, संवेदना बन जाता था। बाबा, मैंने आपको कभी पिता की तरह देखा, कभी एक संत की तरह, और कभी एक तपस्वी की तरह जो न सत्ता चाहता था, न वाहवाही बस अपनी माटी की, अपने लोगों की इज्जत चाहता था।
आज आप नहीं हैं, पर आपकी चाल की गूंज हर गांव के रास्ते पर है। आपकी चप्पलों की खामोशी हर विधानसभा में गूंज रही है। बाबा, आपने झारखंड को छोड़ा नहीं है आप तो हर उस बेटी की आँख में हैं, जो अपने जंगल, अपने खेत, अपने सपनों को बचाना चाहती है। आप हर उस मां की सांस में हैं, जो चाहती है कि उसके बेटे भी एक दिन आपकी तरह “गुरु” एवं सच्चे इंसान बने।
आपका सपना, अब हमारी जिम्मेदारी है। मैं, एक बहू नहीं आपकी बेटी, आपसे वादा करती हूं: “आपका नाम सिर्फ इतिहास में नहीं रहेगा वो हर लड़की के साहस में, हर गांव के संघर्ष में, और झारखंड की हर सांस में जिंदा रहेगा।” आपको झारखंड की हर बेटी का नम्र प्रणाम। आप हमारे संस्कार बन गए हैं। आपके बिना जीना मुश्किल है, पर आपके सपनों को जीना अब हमारा धर्म है।
करूर, तामिलनाडु। एक गांव में मनुवादियों ने 200 फीट लंबी और 10 फीट ऊंची दीवार बनाई है। आरोप है कि यह दीवार इसलिए बनाई गई है ताकि गांव के दलितों को थोट्टिया नायकर के इलाकों में जाने से रोका जा सके। दलित समाज के लोग इस दीवार को छुआछूत की दीवार कह रहे हैं। मामला तमिलनाडु के करूर जिले का है। जिले के मुथुलादमपट्टी गांव में बनी इस दीवार से मामला गरमा गया है।
अनुसूचित जाति के तहत आने वाले अरुंथथियार समुदाय के लोगों ने आरोप लगाया है कि थोट्टिया नायकर जाति के हिंदुओं ने ये दीवार बनाई है। उनका आरोप है कि यह दीवार दलितों की आवाजाही को रोकने के लिए बनाई गई है। दलित समाज ने इसे ‘छुआछूत की दीवार’ कहा है।
खास बात यह है कि यह दीवार सरकारी स्वामित्व वाली सार्वजनिक जमीन पर बनाई गई है और यह करूर कलेक्टर कार्यालय से महज एक किलोमीटर दूर स्थित है। “द हिंदू” की रिपोर्ट के मुताबिक, दलितों का कहना है कि उन्होंने जब दीवार निर्माण की जानकारी पाई तो राजस्व अधिकारियों से इसकी शिकायत की। थंथोनी गांव के ग्राम प्रशासनिक अधिकारी ने मौके का निरीक्षण कर थोट्टिया समुदाय को मौखिक रूप से कार्य रोकने को कहा, लेकिन उन्होंने इन निर्देशों की अनदेखी करते हुए दीवार का निर्माण तेजी से पूरा कर लिया।
मामला बढ़ता देख और दलित समाज के विरोध के बाद राजस्व और पुलिस विभाग के अधिकारियों को बीच में आना पड़ा। हालांकि 13 जुलाई और 29 जुलाई को हुई दो बैठकों के बावजूद इसका कोई समाधान नहीं निकाल पाया है।
दलित समुदाय से आने वाले 57 वर्षीय पी. मरुधाई ने कहा, “यह दीवार हमें हमारे ही गांव में अलग-थलग करने का प्रतीक है। यह सीधा-सीधा जातिगत भेदभाव है और हमें अपमानित करने का तरीका।” उनका आरोप है कि मनुवादी लोग उन्हें मंदिर उत्सव के दौरान सार्वजनिक ‘नाटक मंच’ के उपयोग की अनुमति नहीं देते, यहां तक कि जब वे अपने लिए अलग मंच या शौचालय बनाना चाहते हैं, तब भी उन्हें रोका जाता है। रिपोर्ट के मुताबिक, 50 वर्षीय एस. दुरैयासामी ने कहा, “हमें मनुवादियों के इलाकों में बिना चप्पल के ही जाने को मजबूर किया जाता है। अगर हम चप्पल पहनकर चले जाएं, तो वे गालियां देते हैं और चिल्लाते हैं।”
हालांकि दूसरी ओर थोट्टिया नायकर समुदाय के लोग इससे इंकार कर रहे हैं और दीवार बनाने की वजह कुछ और बता रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक 62 वर्षीय आर. कंदासामी ने आरोपों को सिरे से नकारते हुए कहा, “हमने दीवार इसलिए बनाई ताकि हमारे क्षेत्र में नशे में धुत बाहरी लोग परेशान न करें। यह जगह तो वर्षों से हमारे उपयोग में है।”
तो वहीं प्रशासन इस मामले में गोल-गोल घुमा रहा है। करूर के कलेक्टर एम. थंगवेल ने द हिन्दू से बातचीत में कहा, “मैं अभी यह नहीं कह सकता कि यह छुआछूत की दीवार है या नहीं। मैंने राजस्व विभागीय अधिकारी को जांच का आदेश दिया है और उनकी रिपोर्ट का इंतजार है। रिपोर्ट मिलने के बाद ही स्थिति स्पष्ट की जा सकती है।”
लेकिन यहां बड़ा सवाल यह है कि क्या कोई भी व्यक्ति बिना किसी इजाजत किसी भी सरकारी जमीन पर कोई दीवार बना सकता है? वह भी उस जमीन पर जिससे लोगों का आना-जाना हो। यह दीवार जिस लिए बनाई गई हो, यह साफ है कि यह असंवैधानिक और गैर कानूनी है। अब सवाल यह है कि इस गैर कानूनी दीवार को तुरंत गिराने की बजाय प्रशासन मामले को उलझाए रखने में क्यों जुटा है?
नई दिल्ली। वह वक्त बीत गया जब दलित और आदिवासी समाज अपने खिलाफ होने वाले अत्याचारों को अपनी नियति मान लेता था। अब वह अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाने लगा है। देश की संसद राज्यसभा में सामने आए ताजा आंकड़ों से यह साबित भी होता है। हालांकि यह आंकड़े समाज के भीतर मौजूद भारी जातिवाद की कलई भी खोलते हैं।
साल 2020 में केंद्र सरकार की सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय ने एक नंबर जारी किया था। दलितों और आदिवासियों के लिए जारी इस एससी-एसटी अत्याचार निवारण हेल्पलाइन नंबर पर बीते करीब पांच सालों में 6 लाख 34 हजार से ज्यादा कॉल रिकार्ड किये गए हैं।
यह जानकारी खुद सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता राज्य मंत्री रामदास अठावले ने दी है। हेल्पलाइन पर दर्ज किये गए इन फोन कॉल्स में-
सबसे ज्यादा 3 लाख 40 हजार कॉल्ड यूपी से आई है।
दूसरे नंबर पर बिहार है, जहां से 59,205 कॉल्स आई है।
तीसरे नंबर पर राजस्थान है। वहां से 40,228 कॉल्स आई है।
आंकड़ों के मुताबिक 2020 में हेल्पलाइन पर जहां सिर्फ 6,000 कॉल्स आई थीं, वहीं 2024 में यह संख्या 1.05 लाख के पार चली गई। यानी एससी-एसटी समाज के लोग अत्याचार की घटनाएं रिपोर्ट करने में संकोच नहीं कर रहे हैं। हालांकि यह वो आंकड़े हैं जो हेल्पलाइन के जरिये दर्ज किये गए हैं। सीधे पुलिस स्टेशन में अत्याचार की रिपोर्ट के आंकड़े इससे अलग हैं।
इस पूरी प्रक्रिया में किसी भी शिकायत को अत्याचार तब ही माना जाता है जब वह दो केंद्रीय कानूनों नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955 और अनुसूचित जाति व जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत आते हों।
अगर आपके साथ भी जाति के आधार पर भेदभाव हो रहा है और आपका मामला ऊपर बताए गए अधिनियमों के तहत आता है तो आप भी राष्ट्रीय अत्याचार निवारण हेल्पलाइन 14566 पर शिकायत कर सकते हैं। लेकिन यहां बड़ा सवाल यह भी है कि भारत में जातिवाद आखिर कब रुकेगा?
दिल्ली/रांची। झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री शिबू सोरेन का 81 साल की उम्र में निधन हो गया। उन्होंने गंगाराम अस्पताल में आखिरी सांस ली। बेटे व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने उनके निधन की जानकारी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर दी। हेमंत सोरेन ने लिखा- आदरणीय दिशोम गुरुजी हम सब को छोड़ कर चले गए हैं। आज मैं शून्य हो गया हूं।
उनकी मृत्यु पर झारखंड सरकार ने तीन दिन का राजकीय शोक घोषित किया है। राजधानी रांची से लेकर दुमका तक हज़ारों लोग उन्हें अंतिम विदाई देने के लिए उमड़ पड़े हैं। संसद भवन में भी उन्हें श्रद्धांजलि दी गई, जहां उपसभापति हरिवंश ने कहा, “वे संसद में आदिवासी समाज की आत्मा की आवाज़ थे।”
झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के संस्थापक और तीन बार झारखंड के मुख्यमंत्री रहे सोरेन पिछले कुछ समय से किडनी संक्रमण, ब्रोंकाइटिस और श्वसन संबंधी समस्याओं से जूझ रहे थे। उनके निधन की खबर से न केवल झारखंड, बल्कि पूरे देश में शोक की लहर है। शिबू सोरेन की मृत्यु की खबर सुनते ही राजनीतिक दलों और देश के दिग्गज नेताओं ने उन्हें श्रद्धांजलि दी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से लेकर लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने भी दिशोम गुरुजी को श्रद्धांजलि दी। शिबू सोरेन वर्तमान में राज्यसभा के सदस्य थे। इसकी वजह से राज्यसभा के उप सभापति हरिवंश ने उनको श्रद्धांजलि देने के बाद राज्यसभा की कार्यवाही स्थगित कर दी।
दिशोम गुरु का जन्म और शुरुआती संघर्ष
शिबू सोरेन का जन्म 11 जनवरी 1944 को झारखंड के दुमका जिले के नेमरा गांव में हुआ था। उनका जीवन बचपन से ही संघर्षों से भरा रहा। जब वे महज आठ साल के थे, तब उनके पिता को ज़मींदारों ने मार डाला था। इस घटना ने शिबू सोरेन के जीवन की दिशा बदल कर रख दी, या यूं कहें कि उनके जीवन को नई दिशा दे दी।
हुआ यूं कि शिबू सोरेन के पिता सोबरन सोरेन पेशे से शिक्षक और व्यवहार से गांधीवादी थे। तब महाजन आदिवासियों को कर्ज के जाल में फंसाकर या तो उनसे कई गुणा पैसा वापस लेते थे, या फिर उनकी जमीन हथिया लेते थे। शिबू सोरेन के पिता सोबरन सोरेन इसका विरोध करते थे, जिसकी वजह से वह रामगढ़ और आस-पास के इलाकों के महाजनों की आंखों में खटकने लगे थे। इसी बीच 27 नवंबर 1957 को शिबू सोरेन के पिता की हत्या हो गई। इस घटना के बाद शिबू सोरेन ने महाजनों के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंक दिया। उन्होंने आदिवासियों के हक, जमीन, जल और जंगल के लिए संघर्ष का रास्ता चुना और जमींदारों के खिलाफ विद्रोह छेड़ दिया।
धान कटनी आंदोलन
युवा होने पर उन्होंने आदिवासी समाज के युवाओं को एकजुट करना शुरू कर दिया। इस बीच महाजनों की क्रूरता का बदला लेने के लिए उन्होंने आदिवासी युवाओं के साथ मिलकर 1970 में ‘धान कटनी आंदोलन’ शुरू कर दिया। इसके तहत शिबू सोरेन और उनके साथी महाजनों की तैयार खरी फसल को काट लेते थे। इस दौरान अन्य आदिवासी युवक तीर-कमान लेकर रखवाली करते। इससे महाजन शिबू सोरेन के जान के पीछे पर गए। लेकिन धन कटनी कर शिबू सोरेन और उनके साथी जंगलों में गायब हो जाते थे।
हालांकि शिबू सोरेन ने इस आंदोलन की एक मर्यादा तय कर दी थी। उन्होंने तय किया था कि खेत की इस लड़ाई में कभी भी महाजन और अन्य विरोधियों की महिलाओं के साथ कभी बदसलूकी नहीं की जाएगी। साथ ही खेत के अलावा जमींदारों की किसी अन्य संपत्ति को नुकसान नहीं पहुंचाया जाएगा। इस लकीर को सभी आंदोलनकारियों ने निभाया भी।
नशामुक्ति आंदोलन
आदिवासियों में नशा आम है। लेकिन शिबू सोरेन जीवन भर इसके खिलाफ रहे। उन्होंने नशा के खिलाफ आंदोलन भी चलाया। इस दौरान तो एक बार वह अपने सगे चाचा से भिड़ गए थे। उनके नशामुक्ति आंदोलन का आदिवासी समाज में व्यापक प्रभाव पड़ा।
दिशोम गुरुजी का उपाधि
एक बार महाजनों के गुंडों ने उनको घेर लिया। उनसे बचने के लिए वह उफनती बराकर नदी में कूद गए। सबको लगा कि शिबू सोरेन नहीं बच पाएंगे। लेकिन वह तैरकर दूसरे छोर पर पहुंच गए। उनको जिंदा देख सभी को घोर आश्चर्य हुआ। लोगों ने इसे दैवीय चमत्कार माना और उनका नाम दिशोम गुरुजी रख दिया। जिसका अर्थ होता है- देश का गुरु।
झारखंड मुक्ति मोर्चा का गठन
साल 1970 आते-आते उन्होंने आंदोलन की कमान अपने हाथों में ले ली। 16 दिसंबर 1971 को पाकिस्तान से अलग होकर बांग्लादेश बना। इस काम में बांग्लादेश मुक्ति वाहिनी का अहम रोल था। फरवरी, 1972 को जब शिबू सोरेन और कॉमरेड एक के रॉय, बिनोद बिहारी महतो के घर एक बैठक में शामिल हुए, जिसमें तय हुआ कि झारखंड में बदलाव और राजनीतिक उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए झारखंड मुक्ति मोर्चा का गठन किया गया। इस तरह 1972 में झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) की स्थापना की गई, जिसने झारखंड अलग राज्य आंदोलन को संगठित रूप दिया। उनके नेतृत्व में हजारों आदिवासी मजदूरों ने अपने हक के लिए आवाज उठाई। वे संतोषजनक रूप से सादगीपूर्ण जीवन जीते थे और उन्हें “दिशोम गुरु” यानी जनजातीय समाज का मार्गदर्शक कहा जाता था।
राजनीतिक उपलब्धियाँ
वे तीन बार झारखंड के मुख्यमंत्री रहे (2005, 2008-09, 2009-10)
केंद्र सरकार में कोयला मंत्री के रूप में भी कार्य किया।
उन्होंने संसद में जनजातीय मुद्दों को पहली बार इतनी प्रमुखता से उठाया।
उन्होंने लंबे संघर्ष के बाद 2000 में झारखंड को बिहार से अलग राज्य का दर्जा दिलवाया। यह उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक उपलब्धियों में से एक थी।
विवाद और कानूनी लड़ाइयाँ
उनकी राजनीतिक यात्रा विवादों से भी अछूती नहीं रही। 1994 के शिबू सोरेन अपहरण और हत्या के एक मामले में उन्हें 2006 में दोषी करार दिया गया और उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी, लेकिन बाद में दिल्ली हाईकोर्ट ने उन्हें सबूतों के अभाव में बरी कर दिया। इस प्रकरण ने उनके राजनीतिक जीवन पर गहरा असर डाला लेकिन आदिवासी समाज ने उन्हें कभी अस्वीकार नहीं किया।
शिबू सोरेन का सपना था कि झारखंड में आदिवासियों को उनकी जमीन और संसाधनों पर अधिकार मिले, उन्हें शिक्षा और स्वास्थ्य की सुविधाएं मिलें, और उनकी पहचान को सम्मान मिले। वे आदिवासियों को विकास की मुख्यधारा में लाना चाहते थे, लेकिन अफसोस है कि झारखंड आज भी कुपोषण, खनन माफियाओं और शिक्षा की बदहाली से जूझ रहा है। यह उन सपनों की अधूरी कहानी है जिन्हें सोरेन ने बुना था।
प्रमुख लोगों की श्रद्धांजलियाँ
शिबू सोरेन के निधन पर राजनीतिक हस्तियों ने उन्हें अपनी श्रद्धांजलि दी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा, “शिबू सोरेन जी ने समाज के वंचित तबकों के सशक्तिकरण में अहम भूमिका निभाई।” प्रधानमंत्री मोदी ने हेमंत सोरेन से दिल्ली में मिलकर दिशोम गुरूजी को श्रद्धांजलि अर्पित की। तो वहीं कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने उन्हें “संघर्षशील आदिवासी चेतना के प्रतीक” के रूप में याद किया।
साफ है कि शिबू सोरेन का निधन केवल एक नेता की मृत्यु नहीं है, बल्कि एक विचार, एक आंदोलन और एक संघर्ष की आवाज़ का चुप हो जाना है। उन्होंने आदिवासी राजनीति को नई पहचान दी और झारखंड के निर्माण में निर्णायक भूमिका निभाई। अब यह आने वाली पीढ़ियों की जिम्मेदारी है कि वे दिशोम गुरु के अधूरे सपनों को पूरा करें।
हिसार। दलित अत्याचार के सबसे चर्चित मामलों में शामिल मिर्चपुर कांड के वकील रजत कल्सन को हिसार कोर्ट ने 14 दिनों की न्यायिक हिरासात में जेल भेज दिया है। शुक्रवार को हिसार पुलिस ने कल्सन को एक दिन का रिमांड लिया था। उसके बाद कोर्ट में आज पुलिस ने कल्सन को दोबारा पेश किया, जिसके बाद उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया। कल्सन को 30 जुलाई 2025 को गिरफ्तार किया गया।
इसके बाद प्रदेश और देश भर के वकील समुदाय और सामाजिक संगठनों में गहरा आक्रोश है। कल्सन की गिरफ्तारी को न केवल कानून के दुरुपयोग के रूप में देखा जा रहा है, बल्कि इसे दलित समुदाय के लिए न्याय की लड़ाई लड़ने वाले एक सशक्त आवाज़ को चुप कराने की कोशिश भी बताया जा रहा है।
क्या है मामला?
रजत कल्सन को 30 जुलाई 2025 को हिसार कोर्ट परिसर से उस समय गिरफ्तार किया गया जब उन्हें सोशल मीडिया पोस्ट के एक पुराने मामले में पहले ही जमानत मिल चुकी थी। हालांकि कोर्ट से छूटने के तुरंत बाद पुलिस ने एक दूसरे मुकदमे में उन्हें फिर से गिरफ्तार कर लिया, जिसमें आरोप है कि उन्होंने नशे में पुलिस से धक्का-मुक्की की, जिसमें एक एसआई घायल हो गया। पुलिस के मुताबिक, ऑटो मार्केट हिसार में एक नोटिस देने गई टीम के साथ कल्सन और उनके समर्थकों ने कथित रूप से बदसलूकी की। कोर्ट ने इस मामले में पुलिस को एक दिन का रिमांड भी मंज़ूर किया है।
वकीलों का जोरदार विरोध
रजत कल्सन की गिरफ्तारी के खिलाफ वकील समुदाय ने कड़ा विरोध दर्ज कराया है। हांसी बार एसोसिएशन ने विरोधस्वरूप न्यायिक कार्यों से बहिष्कार किया है, जबकि हरियाणा एडवोकेट्स एसोसिएशन और कई सामाजिक संगठन इस कार्रवाई को लोकतंत्र पर हमला बता रहे हैं।
बीएसपी नेता कृष्ण जमालपुर ने कहा कि यह गिरफ्तारी न केवल संविधान विरोधी है, बल्कि यह दिखाता है कि सरकारें दलितों और उनके पक्षकारों को दबाना चाहती हैं। सोशल मीडिया पर भी #JusticeForKalsan और #StopDalitRepression जैसे हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं।
बता दें कि रजत कल्सन का नाम 2010 के मिर्चपुर दलित उत्पीड़न कांड से जुड़ा है, जिसमें उन्होंने 18 जलाए गए घरों और दो दलितों की हत्या के मामले में पीड़ित पक्ष की पैरवी की थी। इस केस में दिल्ली हाईकोर्ट ने 33 दोषियों को सजा सुनाई थी, जिनमें से 12 को उम्रकैद मिली। कल्सन की पहचान एक बेबाक, निर्भीक और समर्पित दलित वकील के रूप में होती है। वह गोहाना कांड, दबारा गैंगरेप, भटका गांव हत्या जैसे मामलों में भी पीड़ित दलित पक्ष की तरफ से पैरवी कर चुके हैं। उन्हें कई बार जान से मारने की धमकी मिली, लेकिन उन्होंने सत्य और न्याय के लिए अपनी लड़ाई जारी रखी।
सुरक्षा हटाना पड़ा भारी
रजत कल्सन की सुरक्षा कुछ महीनों पहले हटा दी गई थी, जबकि राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग ने खुद हरियाणा सरकार को पत्र भेजकर चेताया था कि उन्हें खतरा है। बावजूद इसके, सरकार ने न केवल सुरक्षा वापस ली, बल्कि अब उन्हें लगातार मामलों में फंसा कर जेल भेजने की कोशिश की जा रही है। यहां सवाल उठता है कि क्या एक वकील को कोर्ट से जमानत मिलने के बाद फिर से गिरफ्तार करना न्यायिक प्रक्रिया का उल्लंघन नहीं है? या फिर रजत कल्सन को दलितों के लिए न्याय की लड़ाई लड़ने की सजा दी जा रही है?
भारतीय समाजशास्त्र में प्रो. नन्दू राम अगर अपनी लेखनी से भारत की एक-चौथाई जनता का समाजशास्त्रीय सच प्रकाशित एवं स्थापित नहीं करते तो भारतीय समाजशास्त्र कुछ वर्णों का ही समाजशास्त्र बनकर रह जाता।
अपने अदम्य सहस एवं ज्ञान की गहराई के आधार पर उन्होंने आई. आई. टी. (Indian Institute of Technology, Kanpur) एवं जेएनयू (Jawaharlal Nehru University, New Delhi) के विद्यार्थियों का सामना किया। कल्पना कीजिये, 1970 के दशक में जाति-अश्पृश्यता,अम्बेडकर आदि पर विश्वविद्यालयों की कक्षाओं में एक विशिष्ट अस्मिता वाले शिक्षक का व्यख्यान कितना कठिन होता होगा। हालांकि आज भी यह आसान नहीं है, परन्तु प्रो नन्दू राम ने अत्यंत सौम्यता एवं दृढ़ता से उन सबका सामना किया।
इसीलिए उनकी कालजयी पुस्तक ‘मोबाइल शेड्यूल कास्ट’ की प्रस्तावना लिखते हुए प्रो. एस सी दुबे, नन्दू राम से पूछते है कि, “यद्यपि वे अनुसूचित जातियों के ऊपर होने वाले अत्याचारों और शोषण के खुद गवाह रहे है परन्तु उनके लेखन में कोई क्रोध नहीं है- यहां तक कि ज्यादा जुनून भी नहीं है। उनकी निष्पक्षता सराहनीय है। लेकिन मुझे आश्चर्य है कि उन्हें अपने विश्लेषण में नैतिक रूप से इतना तटस्थ रहने की क्या आवश्यकता थी।”
इतना ही नहीं, अगर प्रो. नन्दू राम अपने शोध से ज्ञान का उत्पादन नहीं करते तो भारतीय समाजशास्त्र में “पर्सपेक्टिव फ्रॉम बिलो” (निचले पायदान का संदर्श या दृष्टिकोण) का भी उदय नहीं होता। सत्यता में उपरोक्त दृष्टिकोण से भारतीय संरचना एवं प्रक्रियाओं को समझे बगैर भारतीय समाज को पूर्ण एवं गहराई से समझा ही नहीं जा सकता। उसका विवरण एवं विश्लेषण एकांगी लगेगा। इस लिए हम कह सकते है कि भारतीय समाजशास्त्र में प्रो. नन्दू राम अगर “निचले पायदान का संदर्श या दृष्टिकोण” का प्रतिपादन नहीं करते तो भारतीय समाजशास्त्र में स्व-प्रतिबिंबन का नितांत आभाव होता।
अतः इन दोनों तथ्यों (उनके ज्ञान के उत्पादन एवं उनके दृष्टिकोण) के आभाव में कल्पना कीजिये भारतीय समाजशास्त्र कितना अपूर्ण और वस्तुनिष्टता से परे लगता। धन्यवाद सर !! भारतीय समाजशास्त्र के अधूरेपन को पूरा करने एवं इसकी गुणवत्ता को और भी बढ़ाने के लिए। पुनः धन्यवाद सर, भारतीय समाजशास्त्र को समग्रता प्रदान करने के लिए। हम सभी समाजशास्त्री आपके सदैव ऋणी रहेंगे।
इसमें कोई संदेह नहीं कि आज आप हमें भौतिक रूप से छोड़कर चले गए हैं, लेकिन आपने हमें और लाखों लोगों को जो ज्ञान दिया है, उसके ज़रिए आप हमारे साथ सदैव जीवित रहेंगे । हम आपसे वादा करते हैं कि हम आप द्वारा स्थापित की गयी ज्ञान की परम्परा को आगे बढ़ाते हुए भारतीय समाजशास्त्र की सेवा करेंगे।
लेखक डॉ. विवेक कुमार जेएनयू के समाजशास्त्र विभाग में प्रोफेसर हैं। इसके साथ ही डॉ. विवेक कुमार प्रोफेसर नंदू राम के प्रिय छात्र रहे हैं।
नई दिल्ली/रांची। झारखंड की महिलाओं को आत्मनिर्भर और सशक्त बनाने की दिशा में शुरू की गई मुख्यमंत्री मंइयां सम्मान योजना को अब अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी पहचान मिल रही है। विश्व बैंक ने इस योजना की सराहना करते हुए इसे गरीबी उन्मूलन और आर्थिक सशक्तिकरण का बेहतरीन मॉडल करार दिया है।
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने दिल्ली में विश्व बैंक के भारत निदेशक ऑगस्ट तोनो कामे से मुलाकात की। इस दौरान तोनो कामे ने झारखंड सरकार की इस महत्वाकांक्षी योजना को “असरदार और अनुकरणीय” बताया और कहा कि “यह पहल महिलाओं के जीवन स्तर को बेहतर बनाने में मील का पत्थर साबित हो सकती है।”
इस योजना के तहत अब तक 56 लाख से ज्यादा महिलाओं को डीबीटी (डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर) के माध्यम से सीधे खाते में 1415 करोड़ रुपये से अधिक की राशि दी जा चुकी है। योजना का उद्देश्य महिलाओं को स्वावलंबी, आर्थिक रूप से मजबूत और निर्णयात्मक भूमिका में लाने का है।
विश्व बैंक की ओर से यह भी स्पष्ट किया गया कि वे झारखंड सरकार के साथ मिलकर भविष्य में डिजिटल डिजाइनिंग, तकनीकी मजबूती, वित्तीय समावेशन और अन्य परियोजनाओं में सहयोग बढ़ाएंगे। उन्होंने झारखंड मॉडल को अन्य विकासशील देशों के लिए प्रेरणादायक बताया। इस उपलब्धि से साफ है कि अगर वंचित समाज के हाथ में सत्ता की चाभी आती है तो वह किस तरह से कमाल कर के दिखाती है।
मध्य प्रदेश में हर दिन 7 दलित और आदिवासी महिलाएं बलात्कार की शिकार होती है। मध्य प्रदेश विधानसभा में 29 जुलाई 2025 को विपक्ष के विधायक आरिफ मसूद के सवाल के जवाब में प्रदेश सरकार ने एससी-एसटी महिलाओं के साथ हो रहे यौन अपराध के ये चौंकाने वाले आंकड़े पेश किए हैं।
राज्य सरकार द्वारा विधानसभा में पेश किए गए आँकड़ें बताते हैं कि साल 2022 से 2024 तक यानी महज तीन सालों में कुल 7418 दलित और आदिवासी महिलाओं के साथ बलात्कार की घटनाएं दर्ज की गईं। यानी हर दिन औसतन 7 महिलाएं बलात्कार की शिकार होती हैं। सिर्फ इसलिए क्योंकि वो दलित और आदिवासी समाज से आती हैं।
दलित और आदिवासी महिलाओं पर हमला यहीं नहीं रुकता। बल्कि इन तीन सालों में 558 महिलाओं की हत्या और 338 महिलाओं के साथ गैंग रेप की घटनाएं दर्ज हुईं है। जबकि छेड़छाड़ के 5983 मामले दर्ज किये गए हैं। यानी जहां हर रोज सात एससी-एसटी महिलाएं बलात्कार की शिकार हो रही हैं तो पांच छेड़छाड़ की।
यह स्थिति तब है जब मध्य प्रदेश की कुल आबादी का 38 प्रतिशत हिस्सा SC-ST समुदायों से आता है। प्रदेश में SC समाज की आबादी 16 प्रतिशत, तो ST यानी आदिवासी समाज की आबादी 22 प्रतिशत है। इतने बड़े हिस्से के बावजूद अगर ये समुदाय सबसे ज़्यादा असुरक्षित है, तो दोष न केवल व्यवस्था का है, बल्कि उस मानसिकता का भी है जो इन्हें अब भी “कमतर” समझती है। यह प्रदेश की न्याय प्रणाली और पुलिस व्यवस्था की विफलता का एक दर्दनाक प्रमाण है। तो साथ ही सवाल इस समाज पर भी उठता है जो आबादी का 38 फीसदी होने के बावजूद अपने घर और समाज की महिलाओं के खिलाफ हो रही हिंसा का पूरी ताकत से विरोध नहीं कर रहा है।
राजस्थान के झालावाड़ ज़िले में पीपलोदी गांव के सरकारी स्कूल में सुबह 7.30 बजे जब बच्चे प्रार्थना कर रहे थे, अचानक स्कूल भवन की छत भरभराकर गिर गई। हादसे में 5 से ज्यादा बच्चों की जान जाने जबकि 25 से ज्यादा मासूम बच्चे और कुछ शिक्षकों के गंभीर रूप से घायल होने की खबर है। जिस स्कूल में हादसा हुआ, उसके इमारत की हालत लंबे समय से खराब थी। दीवारें दरक रही थीं, छत झूल रही थी, लेकिन मरम्मत के नाम पर किसी अधिकारी या जनप्रतिनिधि ने कोई कदम नहीं उठाया। उठाते भी क्यों, इस स्कूल में न किसी रसूखदार के बच्चे पढ़ते हैं और ना ही नेता और अधिकारियों के बच्चे।
यह वही झालावाड़ है, जिससे वसुंधरा राजे लम्बे समय तक विधायक रही हैं, और उनके बेटे दुष्यंत सिंह संसद में इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं। लेकिन बड़े नामों के चकाचौंध में गरीबों की कौन सोचे भला। आरोप यह भी है कि प्रदेश के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा की सरकार ने भी प्राथमिक शिक्षा को कभी अपनी प्राथमिकता नहीं बनाया। सरकारी आंकड़ों में ‘स्कूल चले हम अभियान’ चलता रहा, लेकिन ज़मीनी हकीकत यही है कि बच्चे जर्जर भवनों में अपनी जान जोखिम में डालकर पढ़ने को मजबूर हैं। और आज तो हादसा हो ही गया।
हादसे के बाद स्थानीय लोग और परिजन आक्रोश में हैं। उनका कहना है कि बार-बार शिकायतों के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं हुई और प्रशासन ने आंखें मूंदें रखी। यह सिर्फ लापरवाही नहीं, यह अपराध है, जिसमें सरकार और स्थानीय जनप्रतिनिधियों से लेकर शिक्षा विभाग तक सब दोषी हैं।
सत्ता ने फिर से साफ कर दिया है कि गरीबों के जान की कोई कीमत नहीं होती। यह अचानक हुआ हादसा नहीं है, बल्कि इस हादसे को न्यौता दिया गया। ऐसे में-
इस हादसे के दोषी अधिकारियों पर हत्या का मुकदमा दर्ज होना चाहिए।
परिजनों को सिर्फ मुआवजा नहीं, बल्कि न्याय मिलना चाहिए।
प्रदेश के सभी सरकारी स्कूलों की इमारतों का तत्काल निरीक्षण होना चाहिए, ताकि भविष्य में इस तरह का कोई दूसरा हादसा न हो।
साफ है कि अगर स्कूलों की मरम्मत सही समय पर हो जाती तो इस हादसे को रोका जा सकता था। जो मासूम जिंदगियां छीन ली गई, वो अपने आंगन में खेल रही होती।