पंजाबः कॉलेज में एससी/एसटी छात्रों के लिए अलग बायोमेट्रिक उपस्थिति, विरोध

0
लुधियाना। पंजाब के जगराओं में लाजपत राय डीएवी कॉलेज के एससी/एसटी छात्र कॉलेज प्रशासन के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं. यह प्रदर्शन दलित छात्रों की बायोमेट्रिक अटेंडेंस व्यस्था के विरोध में किया जा रहा है. दलित छात्रों ने एससी/एसटी एक्ट के तहत प्रिंसिपल के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने की मांग की है. एससी/एसटी छात्रों ने आरोप लगाया है कि प्रशासन की इस हरकत ने हमें नीचा दिखाया है. हमसे भेदभाव किया है. सोमवार को कॉलेज प्रिंसीपल डॉ. करन शर्मा को सस्पेंड कर दिया गया है. गौरतलब है कि कॉलेज प्रशासन ने दलित छात्रों के लिए बायोमेट्रिक अटेंडेंस की व्यवस्था कर दी है. बायोमेट्रिक उपस्थिति व्यवस्था का प्रयोग सिर्फ एससी/एसटी छात्रों के लिए ही किया गया जिससे की उनकी उपस्थिति के आधार पर छात्रवृत्ति दी जा सके. एससी/एसटी छात्र इसका विरोध कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि बायोमेट्रिक उपस्थिति व्यवस्था के आधार पर छात्रवृत्ति देने का नियम बिल्कुल गलत है. बायोमेट्रिक उपस्थिति व्यवस्था करनी है तो सभी तबको के छात्र के लिए की जाए. किसी छात्र विशेष के लिए नहीं.

बाबा साहेब की अंगुली का इशारा संसद की तरफ है

बाबा साहेब ने ”कांग्रेस और गांधी ने अछूतों के लिये क्या किया’ में कहा है कि सत्ता ही जीवन शक्ति है. अतः उन्हें (दलितों को) शासक जमात बनाना है और सत्ता अपने हाथ में  लेनी है, वरना जो अधिकार मिले हैं, वे कागजी रह जायेंगे. चुनाव जीवन-मृत्यु का प्रश्न है. कांग्रेस दलितों पर होने वाले अन्याय व अत्याचारों को रोक नहीं सकती. आपकी उठी हुई अंगुली निरन्तर यही प्रेरणा देती है कि सत्ता के इस मंदिर (अंगुली का इशारा संसद की ओर है) पर कब्जा करो. एक सत्ताधारी व्यक्ति दूसरों के लिये बहुत कुछ कर सकता है. सत्ताधारी के पास असीमित अधिकार और देश के खजाने की चाभी होती है जिसे वह खर्च करने को स्वतन्त्र होता है. वह अपने विवेक से धन को जनता की खुशहाली के लिये खर्च कर सकता है, जनता के भले के लिये कानून बना सकता है और प्रशसन के जरिये कानून लागू करवा सकता है क्योंकि लोकतंत्र में सर्वोच्च शक्ति जनप्रतिनिधियों के पास निहित होती है. संविधान प्रदत्त आरक्षण के चलते सभी राजनैतिक पार्टियां अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति के लोगों को आरक्षित सीटों पर टिकट देने हेतु विवश हैं. ये उम्मीदवार चाहे जाति के वोटों से जीतें चाहे पार्टी के बंधे हुए वोटों से, कार्य पार्टी के तयशुदा एजेंडे के हिसाब से ही करते हैं. फिर जाति अथवा वर्ग मायने नहीं रखता है. ये सम्बन्धित पार्टियों के अपने-अपने वर्ग या जाति में प्रतिनिधि मात्र होते हैं जो कि पार्टी की छवि को अच्छी बनाकर रखते हैं और पार्टी के वोटों को बांध कर रखते हैं. अगर ये अपने हिसाब से जाति की आवश्यकताओं को देखकर, महसूस करके कोई ऐसा कार्य कर बैठते हैं या घोषणा कर देते हैं जो कि पार्टी की गाईड लाईन के विपरीत हो तो इनका पार्टी में रहना मुश्किल हो जाता है, माफी मांगनी पड़ती है, अगली बार टिकट नहीं मिलता है या पार्टी से निकाल दिया जाता है. अगर दलित समाज के तथाकथित प्रतिनिधि अपने समाज की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर कार्य करते, लोगों के हित के लिये अपना कार्यकाल बिताते, तो क्या आजादी के लगभग 70 साल बाद भी दलितों को आधारभूत सुविधाओं के लिये जूझना पड़ता? दलितों की बस्तियों में आज भी पानी, बिजली, सड़क, नाली, पर्याप्त साफ-सफाई, सामुदायिक भवन, अस्पताल, विद्यालय, डाकघर और इसी प्रकार की अन्य सुविधाओं का नितान्त अभाव देखा जा सकता है. दलितों के रोजगार के पर्याप्त अवसर नहीं है, बेरोजगारी है. ये सब परेशानियां तो उस समय भी थीं जब भारत आजाद हुआ था. तब से आज तक निरन्तर दलितों के प्रतिनिधि भी चुने जा रहे हैं और काम भी कर रहे हैं. फिर यह सब क्यों? इसका कारण वही है जो पूर्व में बता चुके हैं. दलित समाज का दुर्भाग्य रहा कि बाबा साहेब मात्र 65 साल की उम्र में ही काल के ग्रास बन गये. भारत की स्वाधीनता के बाद उनको दलितों के लिये कार्य करने का मौका ही नहीं मिला. उनके देहावसान के बाद उनकी राजनैतिक पार्टी रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इण्डिया के टुकडे-टुकडे हो गये और उनके अनुयायी (न कि उत्तराधिकारी) अलग-अलग पार्टियों में चले गये, सवर्ण लड़कियों से शादियां कर ली, अपने घर-परिवार बसा लिये. जिस कांरवे की शुरुआत बाबा साहेब ने की थी, वह बिखरने लगा. उनके बाद जिन-जिन नेताओं पर दलितों  को भरोसा था और जो दलितो का भला कर भी सकते थे, वे सत्ता पाने के लिये दल-बदलू साबित हुए. फुटबाल की तरह कभी इस पार्टी में तो कभी उस पार्टी में. इनका कोई जमीर, कोई धर्म कोई आत्मविश्वास नहीं रहा. यह आज तक निरन्तर जारी है. जो लोग दलित हितों के पैरोकार बनते थे, दलित विरोधियों को पानी पी-पी कर कोसा करते थे, जब इन्हीं दलित विरोधी पार्टियों की तरफ से इनको लालच दिया गया तो झट इनके साथ हो गये और सब कुछ भूल गए. इसी प्रकार राज्यसभा में जाने वाले विभिन्न पार्टियों की तरफ से दलित समाज के लोग हैं जो इनके रिक्त स्थानों को भरने के अलावा कोई महत्त्वपूर्ण कार्य नही करते हैं. बसपा को छोड़कर आज ऐसी कोई राजनैतिक पार्टी नहीं दिखती है जो दलितों के हितों की रक्षा करने वाली हो. सबको वोट लेने और शासन करने की पड़ी है, परन्तु जहां-जहां दलितो के हित मारे जा रहे हैं, वहां सब मौन हैं. एक छोटा सा उदाहरण देता हूं. किसी जमाने में पीएमटी, पीइटी आदि परीक्षाओं में एससी-एसटी के विद्यार्थियों को आधा शुल्क देना पड़ता था. कुछ सालों से बराबर ही देना पड़ रहा है, जबकि दलितों के एमपी, एमएलए, मंत्री-सब चुने जाते हैं. दरअसल इन नेताओं का रोल कठपुतली से अधिक कुछ नहीं होता है. ये दलितों के हित सम्बन्धी मामलों में हाईकमान के निर्देशों का इंतजार करते हैं और तदानुसार कार्य करते हैं. हाल ही में दलित समाज के कुछ लोग सत्ताधारी पार्टी की ओर से राज्यसभा में सांसद चुने गये हैं. मेरा उनसे सीधा सवाल है-क्या आप इस पार्टी में रहते हुए उन सिद्धान्तों की रक्षा कर पायेंगे जो जीवन भर आदर्शो के रुप में आपने दलितों के सामने रखे? मान लीजिये, आप तो दलित समाज के मोहल्ले में सरकारी विद्यालय खुलवाना चाहते हैं, परन्तु वहां पहले से ही आपकी ही पार्टी के बड़े नेता का ऊंची फीस वाला प्राईवेट स्कूल है. आपकी पार्टी आपको विद्यालय खुलवाने देगी? आजकल प्राईवेट स्कूल मनमानी फीस वसूल कर रहे हैं और महंगी-महंगी किताबें थोप रहे हैं. कहना न होगा कि यह सब नेताओं की मिली भगत बिना संभव नहीं है. क्या आप जनता को इन शिक्षा माफियाओं से मुक्त करा पायेंगे? यह दलितों का दुर्भाग्य है कि आज उनका रोना रोने वाला कोई नहीं है. जिनसे थोड़ी बहुत आस थी, वे सामाजिक इंजीनियरिंग के चक्कर में ऐसे पड़े कि बैक पर बैक आती गई और आज उनकी डिग्री कैंसिल होने की नौबत आ गई. गर्मागर्म खाने के चक्कर में मुंह जला बैठे, लोगों की आशाओं पर तुषारापात हो गया और हाथी का गणेश हो गया. ये अपने सिद्धान्तों पर अटल रहते तो शायद अच्छा रहता, पर चौबेजी छब्बे जी बनने के चक्कर में दुबे जी रह गए. अब बाबा साहेब की उठी हुई अंगुली को कौन विश्राम दे पायेगा, यह तो भविष्य बतायेगा लेकिन इतना निश्चित है कि सत्ता को पाने के लिये दलितों को एक होना ही पड़ेगा, अन्यथा सत्तर साल निकल गये, सत्तर और निकल जायेंगे. श्याम सुंदर बैरवा सहायक प्रोफेसर है. संपर्क सूत्रः- 8764122431

अम्बेडकर बालपोथी में A से अम्बेडकर, B से बुद्ध

0
अहमदाबाद। गुजरात के अहमदाबाद जिले के दलित बहुल इलाकों में अब बाबासाहेब अम्बेडकर बालपोथी पढ़ाई जा रही है. इन इलाकों में रहने वाले लोगों में अम्बेडकर बालपोथी की मांग तेजी से बढ़ी है. खास बात यह है कि इसे किसी स्कूल ने शुरू नहीं किया है, बल्कि इस किताब के हिन्दी और गुजराती संस्करण के लेखक धीरज प्रियदर्शी पेशे से दर्जी हैं. उन्होंने बड़ी सावधानी से मुख्यधारा की किताबों के ढांचे को तोड़ने की कोशिश की है और उसकी जगह पर इंग्लिश अलफाबेट में दलित प्रतीक चिन्हों का इस्तेमाल किया है. इस बालपोथी में A से अम्बेडकर और B से बुद्ध पढ़ाया जा रहा है. इस किताब की खासियत यह है कि ये बच्चों को हिन्दू प्रतीक चिन्हों से दूर ले जाती है और उसकी जगह पर बौद्ध प्रतीकों और बाबासाहेब अम्बेडकर के जीवन के बारे बताती है. इस किताब में बाबासाहेब से जुड़े प्रसंगों का सहारा लिया गया है. अम्बेडकर बालपोथी के इंग्लिश संस्करण को राजस्थान की कुसुम मेघवाल ने लिखा है. इसमें A का मतलब अम्बेडकर और B का मतलब बुद्ध है. इसी तरह धीरज द्वारा तैयार किए गए हिन्दी की किताब में ‘अ’ से अत्याचार और ‘क’ से कलम पढ़ाया गया है. अम्बडेकर साहित्य पर लाइब्रेरी चलाने वाले धीरज कहते हैं, ”क” से कमल की जगह के से कलम सीखना हमारे बच्चों के लिए ज्यादा बेहतर है. –  साभार नवभारत टाइम्स

क्रान्तिकारी परिवर्तन का दस्तावेज़ है ‘गुलामगिरी’

दरअसल हिंद स्वराज एक ऐसी किताब है, जिसने भारत के सामाजिक राजनीतिक जीवन को बहुत गहराई तक प्रभावित किया. बीसवीं सदी के उथल पुथल भरे भारत के इतिहास में जिन पांच किताबों का सबसे ज़्यादा योगदान है, हिंद स्वराज का नाम उसमें सर्वोपरि है. इसके अलावा जिन चार किताबों ने भारत के राजनीतिक सामाजिक चिंतन को प्रभावित किया उनके नाम हैं, भीमराव अंबेडकर की जाति का विनाश मार्क्सव और एंगेल्स की कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो, ज्योतिराव फुले की गुलामगिरी और वीडी सावरकर की हिंदुत्व. अंबेडकर, मार्क्स और सावरकर के बारे में तो उनकी राजनीतिक विचारधारा के उत्तराधिकारियों की वजह से हिंदी क्षेत्रों में जानकारी है. क्योंकि मार्क्सक का दर्शन कम्युनिस्ट पार्टी का, सावरकर का दर्शन बीजेपी का और अंबेडकर का दर्शन बहुजन समाज पार्टी का आधार है लेकिन 19 वीं सदी के क्रांतिकारी चितंक और वर्णव्यवस्था को गंभीर चुनौती देने वाले ज्योतिराव फुले के बारे में जानकारी की कमी है. ज्योतिराव गोविंदराव फुले का जन्म पुणे में हुआ था और उनके पिता पेशवा के राज्य में बहुत सम्माननीय व्यक्ति थे. लेकिन ज्योतिराव फुले अलग किस्म के इंसान थे. उन्होंने दलितों के उत्थान के लिए जो काम किया उसकी तुलना किसी से नहीं की जा सकती. उनका जन्म 1827 में पुणे में हुआ था, माता पिता संपन्न थे लेकिन महात्मा फुले हमेशा ही गरीबों के पक्षधर बने रहे. उनकी महानता के कुछ खास कार्यों का ज़‍िक्र करना ज़रूरी है. 1848 में शूद्रातिशूद्र लड़कियों के लिए एक स्कूल की स्थापना कर दी थी. आजकल जिन्हें दलित कहा जाता है, महात्मा फुले के लेखन में उन्हें शूद्रातिशूद्र कहा गया है. 1848 में दलित लड़कियों के लिए स्कूल खोलना अपने आप में एक क्रांतिकारी कदम है. क्योंकि इसके 9 साल बाद बंबई विश्वविद्यालय की स्थापना हुई. उन्होंने 1848 में ही मार्क्सक और एंगेल्स ने कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो का प्रकाशन किया था. 1848 में यह स्कूल खोलकर महात्मा फुले ने उस वक्त के समाज के ठेकेदारों को नाराज़ कर दिया था. उनके अपने पिता गोविंदराव जी भी उस वक्त के सामंती समाज के बहुत ही महत्वपूर्ण व्यक्ति थे. दलित लड़कियों के स्कूल के मुद्दे पर बहुत झगड़ा हुआ लेकिन ज्योतिराव फुले ने किसी की न सुनी. नतीजतन उन्हें 1849 में घर से निकाल दिया गया. सामाजिक बहिष्कार का जवाब महात्मा फुले ने 1851 में दो और स्कूल खोलकर दिया. जब 1868 में उनके पिताजी की मृत्यु हो गयी तो उन्होंने अपने परिवार के पीने के पानी वाले तालाब को अछूतों के लिए खोल दिया. 1873 में महात्मा फुले ने सत्यशोधक समाज की स्थापना की और इसी साल उनकी पुस्तक गुलामगिरी का प्रकाशन हुआ. दोनों ही घटनाओं ने पश्चिमी और दक्षिण भारत के भावी इतिहास और चिंतन को बहुत प्रभावित किया. महात्मा फुले के चिंतन के केंद्र में मुख्य रूप से धर्म और जाति की अवधारणा है. वे कभी भी हिंदू धर्म शब्द का प्रयोग नहीं करते. वे उसे ब्राह्मणवाद के नाम से ही संबोधित करते हैं. उनका विश्वास था कि अपने एकाधिकार को स्थापित किये रहने के उद्देश्य से ही ब्राह्मणों ने श्रुति और स्मृति का आविष्कार किया था. इन्हीं ग्रंथों के जरिये ब्राह्मणों ने वर्ण व्यवस्था को दैवी रूप देने की कोशिश की. महात्मा फुले ने इस विचारधारा को पूरी तरह ख़ारिज़ कर दिया. फुले को विश्वास था कि ब्राह्मणवाद एक ऐसी धार्मिक व्यवस्था थी जो ब्राह्मणों की प्रभुता की उच्चता को बौद्घिक और तार्किक आधार देने के लिए बनायी गयी थी. उनका हमला ब्राह्मण वर्चस्ववादी दर्शन पर होता था. उनका कहना था कि ब्राह्मणवाद के इतिहास पर गौर करें तो समझ में आ जाएगा कि यह शोषण करने के उद्देश्य से हजारों वर्षों में विकसित की गयी व्यवस्था है. इसमें कुछ भी पवित्र या दैवी नहीं है. न्याय शास्त्र में सत की जानकारी के लिए जिन 16 तरकीबों का वर्णन किया गया है, वितंडा उसमें से एक है. महात्मा फुले ने इसी वितंडा का सहारा लेकर ब्राह्मणवादी वर्चस्व को समाप्त करने की लड़ाई लड़ी. उन्होंने अवतार कल्पना का भी विरोध किया. उन्होंने विष्णु के विभिन्न अवतारों का बहुत ही ज़ोरदार विरोध किया. कई बार उनका विरोध ऐतिहासिक या तार्किक कसौटी पर खरा नहीं उतरता लेकिन उनकी कोशिश थी कि ब्राह्मणवाद ने जो कुछ भी पवित्र या दैवी कह कर प्रचारित कर रखा है उसका विनाश किया जाना चाहिए. उनकी धारणा थी कि उसके बाद ही न्याय पर आधारित व्यवस्था कायम की जा सकेगी. ब्राह्मणवादी धर्म के ईश्वर और आर्यों की उत्पत्ति के बारे में उनके विचार को समझने के लिए ज़रूरी है कि यह ध्यान में रखा जाए कि महात्मा फुले इतिहास नहीं लिख रहे थे. वे सामाजिक न्याय और समरसता के युद्घ की भावी सेनाओं के लिए बीजक लिख रहे थे. महात्मा फुले ने कर्म विपाक के सिद्धांत को भी ख़ारिज़ कर दिया था, जिसमें जन्म जन्मांतर के पाप पुण्य का हिसाब रखा जाता है. उनका कहना था कि यह सोच जातिव्यवस्था को बढ़ावा देती है इसलिए इसे फौरन ख़ारिज़ किया जाना चाहिए. फुले के लेखन में कहीं भी पुनर्जन्म की बात का खंडन या मंडन नहीं किया गया है. यह अजीब लगता है क्योंकि पुनर्जन्म का आधार तो कर्म विपाक ही है. महात्मा फुले ने जाति को उत्पादन के एक औज़ार के रूप में इस्तेमाल करने और ब्राह्मणों के आधिपत्य को स्थापित करने की एक विधा के रूप में देखा. उनके हिसाब से जाति भारतीय समाज की बुनियाद का काम भी करती थी और उसके ऊपर बने ढांचे का भी. उन्होंने शूद्रातिशूद्र राजा, बालिराज और विष्णु के वामनावतार के संघर्ष का बार-बार ज़‍िक्र किया है. ऐसा लगता है कि उनके अंदर यह क्षमता थी कि वह सारे इतिहास की व्याख्या बालि राज-वामन संघर्ष के संदर्भ में कर सकते थे. स्थापित व्यवस्था के खिलाफ महात्मा फुले के हमले बहुत ही ज़बरदस्त थे. वे एक मिशन को ध्यान में रखकर काम कर रहे थे. उन्होंने इस बात के भी सूत्र दिये, जिसके आधार पर शूद्रातिशूद्रों का अपना धर्म चल सके. वे एक क्रांतिकारी सामाजिक परिवर्तन की बात कर रहे थे. ब्राह्मणवाद के चातुर्वर्ण्यह व्यवस्था को उन्होंने ख़ारिज़ किया, ऋग्वेद के पुरुष सूक्त का, जिसके आधार पर वर्णव्यवस्था की स्थापना हुई थी, को फर्ज़ी बताया और द्वैवर्णिक व्यवस्था की बात की. महात्मा फुले एक समतामूलक और न्याय पर आधारित समाज की बात कर रहे थे इसलिए उन्होंने अपनी रचनाओं में किसानों और खेतिहर मजदूरों के लिए विस्तृत योजना का उल्लेख किया है. पशुपालन, खेती, सिंचाई व्यवस्था सबके बारे में उन्होंने विस्तार से लिखा है. गरीबों के बच्चों की शिक्षा पर उन्होंने बहुत ज़ोर दिया. उन्होंने आज के 150 साल पहले कृषि शिक्षा के लिए विद्यालयों की स्थापना की बात की. जानकार बताते हैं कि 1875 में पुणे और अहमदनगर जिलों का जो किसानों का आंदोलन था, वह महात्मा फुले की प्रेरणा से ही हुआ था. इस दौर के समाज सुधारकों में किसानों के बारे में विस्तार से सोच-विचार करने का रिवाज़ नहीं था लेकिन महात्मा फुले ने इस सबको अपने आंदोलन का हिस्सा बनाया. स्त्रियों के बारे में महात्मा फुले के विचार क्रांतिकारी थे. मनु की व्यवस्था में सभी वर्णों की औरतें शूद्र वाली श्रेणी में गिनी गयी थीं. लेकिन फुले ने स्त्री पुरुष को बराबर समझा. उन्होंने औरतों की आर्य भट्ट यानी ब्राह्मणवादी व्याख्या को ग़लत बताया. फुले ने विवाह प्रथा में बड़े सुधार की बात की. प्रचलित विवाह प्रथा के कर्मकांड में स्त्री को पुरुष के अधीन माना जाता था लेकिन महात्मा फुले का दर्शन हर स्तर पर गैरबराबरी का विरोध करता था. इसीलिए उन्होंने पंडिता रमाबाई के समर्थन में लोगों को लामबंद किया, जब उन्होंने धर्म परिवर्तन किया और ईसाई बन गयीं. वे धर्म परिवर्तन के समर्थक नहीं थे लेकिन महिला द्वारा अपने फ़ैसले खुद लेने के सैद्घांतिक पक्ष का उन्होंने समर्थन किया. महात्मा फुले की किताब गुलामगिरी बहुत कम पृष्ठों की एक किताब है, लेकिन इसमें बताये गये विचारों के आधार पर पश्चिमी और दक्षिणी भारत में बहुत सारे आंदोलन चले. उत्तर प्रदेश में चल रही दलित अस्मिता की लड़ाई के बहुत सारे सूत्र गुलामगिरी में ढूंढ़े जा सकते है. आधुनिक भारत महात्मा फुले जैसी क्रांतिकारी विचारक का आभारी है. लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.

छत्तीसगढ़ः नाई समाज ने किया सवर्णों का बहिष्कार

0
अब तक हम यह खबर पढ़ते-सुनते आ रहे हैं कि सवर्णों ने दलितों का बहिष्कार कर दिया है. लेकिन एक खबर ऐसी आई है जिसने यह साबित किया है कि अगर कमजोर जातियों के बीच एकता हो जाए तो मनुवादी गुंडों को भी नाकों चने चबवा सकती है. घटना छत्तीसगढ़ की है. छत्तीसढ़ राज्य में एक गांव है हीरापुर. इस गांव के नाई समाज के लोगों ने सवर्णों का ही बहिष्कार कर दिया है. इस घटना से पूरे गांव के सवर्णों को करारा जवाब मिला है. मामला असल में छह महीने पुराना है. गांव के दो नाबालिग लड़कों का आपस में झगड़ा हो गया. दोनों लड़के अलग-अलग समुदाय के थे. इसमें नाई समाज का भी लड़का शामिल था. इस मामले ने काफी तूल पकड़ा. नाई समाज के लोगों को इंसाफ नहीं मिला तो उन्होंने बदला लेने का दूसरा तरीका निकाल लिया. असल में मामला हल होता नहीं देख नाई समाज के लोगों ने सवर्ण समाज के लोगों के बाल काटने बंद कर दिए और उनका बहिष्कार कर दिया. इससे सवर्णों में खलबली मच गई. पहले तो नाई समाज के लोगों को दबाने और डराने की कोशिश की गई, लेकिन सारा नाई समाज एक-दूसरे का हाथ थामे एकजुट खड़ा हो गया. हीरागांव के समर्थन में पड़ोस के परसुदा और खुरथुली के लोग भी आ गए. आखिरकार जातिवादी गुंडों की एक ना चली. आलम यह है कि अब यहां के सवर्ण अब खुद ही एक-दूसरे के दाढी बाल काटते हैं. यहां तक कि पिछले दिनों सवर्ण समाज के घर में मृत्यु होने के बावजूद हिन्दू रीति के मुताबिक दसवें दिन बाल काटने के लिए भी नाई समाज के लोग नहीं पहुंचे और सवर्ण समाज के लोगों को आपस में ही यह विधि करनी पड़ी.

देश ने पहली महिला अध्यापिका को भुला दिया?

0
मेरे मायनों में शिक्षक वह होता है जो आपको जीवन जीने की विद्या सिखाता है. किसी बच्चे के लिए सबसे पहली शिक्षिका उसकी मां होती है, वही उसे शिक्षक का आभास कराती है. एक समाज दो लोगों से मिलकर बनता है, ””स्त्री और पुरूष””. एक अच्छे समाज का निर्माण तब होता है जब स्त्री और पुरूषों को समान अधिकार मिले. हमारे देश में स्त्री समाज सदियों से शिक्षा से वंचित रहा है. उस समय धार्मिक अंधविश्वास, रूढ़िवाद, अस्पृश्यता, दलितों और खासतौर से सभी वर्गो की महिलाओं पर मानसिक और शारीरिक अत्याचार अपने चरम पर थे. बाल-विवाह, सती प्रथा, बेटियों को जन्मते ही मार देना, विधवा स्त्री के साथ तरह-तरह के अनुचित व्यवहार, अनमेल विवाह, बहुपत्नी विवाह आदि प्रथाएं समाज में व्याप्त थी. समाज में ब्राह्मणवाद और जातिवाद का बोलबाला था. ऐसे समय में मां सावित्रीबाई फुले और ज्योतिबाफुले का इस अन्यायी समाज और उसके अत्याचारों के खिलाफ खड़ा हो जाना एक क्रांति का आगाज था. मां सावित्रीबाई फुले ने अपने निस्वार्थ प्रेम, सामाजिक प्रतिबद्धता, सरलता तथा अपने अनथक-सार्थक प्रयासों से महिलाओं और शोषित समाज को शिक्षा पाने का अधिकार दिलवाया. मां सावित्रीबाई फुले ने धार्मिक अंधविश्वास व रूढ़ियां तोड़कर निर्भयता और बहादुरी से घर-घर गली घूमकर संपूर्ण स्त्री व दलित समाज के लिए शिक्षा की क्रान्ति ज्योति जलाई, धर्म-पंडितों ने उन्हें अश्लील गालियां दी, धर्म डुबोने वाली कहा तथा कई लांछन लगाये, यहां तक कि उन पर पत्थर एवं गोबर तक फेंका गया. मां सावित्रीबाई द्वारा लड़कियों के लिए चलाए गए स्कूल बंद कराने के लिए अनेकों प्रयास किए जाते थे. मां सावित्रीबाई डरकर घर बैठ जाएं. इसलिए उन्हें उच्च वर्गीय द्वारा अनेक विधियों से तंग किया जाता था. एक बार तो उनके ऊपर एक व्यक्ति ने शारीरिक हमला भी किया, तब मां सावित्रीबाई फुले ने बड़ी बहादुरी की और उस व्यक्ति का मुकाबला करते हुए उसे दो-तीन थप्पड़ कसकर जड़ दिए. थप्पड़ खाकर वह व्यक्ति इतना शर्मशार हो गया कि फिर कभी उन्हें स्कूल जाने से रोकने का प्रयास नहीं किया. मां सावित्रीबाई फुले ने अपने अथक प्रयासों द्वारा शिक्षा पर षड्यंत्रकारी तरीके से एकाधिकार जमाए बैठी ऊंची जमात की जमीन हिला डाली. मां सावित्रीबाई फुले को देश की पहली भारतीय स्त्री अध्यापिका बनने का ऐतिहासिक गौरव हासिल है. मां सावित्रीबाई फुले ने न केवल शिक्षा के क्षेत्र में अभूतपूर्व काम किया अपितु भारती. स्त्री की दशा सुधारने के लिए उन्होंने 1852 में महिला मण्डल का गठन कर भारतीय महिला आंदोलन की प्रथम अगुवाई भी की. इस महिला मण्डल ने बाल विवाह, विधवा होने के कारण स्त्रियों पर किए जा रहे जुल्मों के खिलाफ स्त्रियों को तथा अन्य समाज को मोर्चाबंद कर सामाजिक बदलाव के लिए संघर्ष किया. उस समय में हिंदू स्त्री को विधवा होने पर उसका सिर मूंड दिया जाता था. मां सावित्रीबाई फुले ने नाईयों से विधवाओं के बाल न काटने अनुरोध करते हुए आंदोलन चलाया जिसमें काफी संख्या में नाईयों ने भाग लिया और विधवा स्त्रियों के बाल न काटने की प्रतिज्ञा ली. इतिहास गवाह है कि भारत क्या पूरे विश्व में ऐसा सशक्त आन्दोलन नहीं हुआ जिसमें औरतों के ऊपर होने वाले शारीरिक और मानसिक अत्याचार के खिलाफ स्त्रियों के साथ पुरूष जाति प्रत्यक्ष रूप से जुड़ी हो. इतिहास गवाह हैं कि हमारे समाज में स्त्रियों की कीमत एक जानवर से भी कम थी. स्त्री विधवा होने पर उसके परिवार के पुरूष जैसे देवर, जेठ, ससुर व अन्य संबंधियों द्वारा उसका शारीरिक शोषण किया जाता था. जिसके कारण वह कई बार मां बन जाती थी. बदनामी से बचने के लिए विधवा या तो आत्महत्या कर लेती थी या फिर अपने अवैध बच्चे को मार डालती थी. अपने अवैध बच्चे के कारण वह खुद आत्महत्या न करें तथा अपने अजन्में बच्चे को भी ना मारे. इस उद्देश्य से मां सावित्रीबाई फुले ने भारत का पहला ”बाल हत्या प्रतिबंधक गृह” तथा निराश्रित असहाय महिलाओं के लिए अनाथाश्रम खोला. स्वयं सावित्रीबाई फुले ने आत्महत्या करे जाती हुई एक विधवा ब्राह्मण स्त्री काशीबाई जो कि विधवा होने के बाद भी मां बनने वाली थी को आत्महत्या करने से रोककर उसकी प्रसूति अपने घर में करवा कर उसके बच्चे को यशवन्त को अपने दत्तक पुत्र के रूप में गोद लिया. दत्तक पुत्र यशवन्त राव को खुद पाल-पोसकर डॉक्टर बनाया. उस अनाथालय की सम्पूर्ण व्यवस्था मां सावित्रीबाई फुले सम्भालती थी, अनाथालय के प्रवेश द्वार पर मां सावित्रीबाई फुले ने एक बोर्ड टंगवा दिया, जिस पर लिखा था, विधवा बहने, यहां आकर गुप्त रीति से और सुरक्षित तरीके से अपने बालक को जन्म दे सकती हैं, आप चाहे तो अपने बालक को ले जा सकती हैं या यहां रख सकती हैं, आपके बालक को यहां अनाथाश्रम एक मां की तर रखेगा और उसकी रक्षा करेगा. एक-दो वर्षो में ही इस आश्रम में सौ से ज्यादा विधवाओं ने अपने नाजायज बच्चों को जन्म दिया, मां सावित्रीबाई फुले का जीवन एक ऐसी मशाल है, जिन्होंने स्वयं प्रज्वलित होकर भारतीय नारी को पहली बार सम्मान के साथ जीना सिखाया. मां सावित्रीबाई के प्रयासों से सदियों से भारतीय नारियां जिन पुरानी कुरीतियों से जकड़ी हुई थी उन्होंने उन बंधनों से उनकों मुक्त कराया तथा पहली बार भारतीय नारी ने पुरूषों के साथ कदम से कदम मिलाकर खुली हवा में सांस ली. महिलाओं को उनको सानिध्य में शिक्षा का अधिकार मिला.

”चमार रैप” ये किस बदलाव की आहट है?

0
कभी पहचान छुपाने वाली दलित जातियों में उसपर गर्व करने की पहल ज़ोर पकड़ रही है और धीरे-धीरे हुई शुरुआत ने समाज को साथ लेना शुरू कर दिया है. जालंधर पंजाब के सबसे अधिक दलित आबादी वाले जिलों में से एक है और यहां बड़ी तादाद में मौजूद चमड़े का काम करने वाली जाति को – जिन्हें दलितों में गिना जाता है; अब अपनी जात बताने में शर्म नहीं. जाति से जुड़े संगठनों ने अपने बैनर्स पर सबसे ऊपर लिखना शुरू कर दिया है ””गर्व से अपनी जाति के बारे में कहो.”” धीरे-धीरे एक पूरी पीढ़ी इस बात पर गर्व महसूस करने लगी और जो नाम एक अपमान के तौर पर उनकी तरफ उछाला जाता था, उसकी बाज़ी उन्होंने पलट दी. हालात ये हैं कि अब बात होती है ””चमार रैप”” की. और, दलित परिवार में जन्मी 18 साल की गुरकंवल भारती – जो यूट्यूब और फ़ेसबुक पर गिन्नी माही के नाम से अधिक मशहूर हैं, आज चमार रैप क्वीन मानी जाती है. हुंदे असले तो बध डेंजर चमार (हथियारों से अधिक खतरनाक हैं चमार), गिन्नी का ऐसा वीडियो है जिसे यूट्यूब के अलग-अलग चैनल्स पर लाखों की तादाद में हिट्स मिले हैं. रविदास समुदाय के परिवार से संबंधित गिन्नी का कहना है कि उसे अगर एक दमदार आवाज़ मिली है तो वह अपनी आवाज़ से ही लोगों को सामाजिक पिछड़ेपन से बाहर निकालने के लिए प्रयास करती रहेगी. एक हज़ार से अधिक स्टेज शो और गायन कार्यक्रमों में हिस्सा ले चुकीं गिन्नी ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि 11 साल की उम्र से गायन शुरू कर आज वह 22 से अधिक गीत रिकॉर्ड करवा चुकी है और उनके वीडियो भी बने हैं. वह अपने हर गीत में एक संदेश देना चाहती है और अब तक अपने लक्ष्य में सफल भी रही है. गिन्नी ने बताया कि स्कूल और कॉलेज में भी उसे काफी सहयोग मिलता है. स्कूल और कॉलेज में टीचर्स उसे गायन में प्रोत्साहित करते हैं. सहपाठियों से भी प्रोत्साहन मिलता है. डेंजर चमार का आइडिया भी उसे एक स्टूडेंट से ही मिला था जो कि आज उसका सबसे हिट म्यूजिक वीडियो बन चुका है. आसपास और गायन कार्यक्रमों में गायन करने के बाद अब गिन्नी को पंजाबी फिल्मों से भी ऑफ़र आने लगे हैं और जल्द ही वह पंजाबी फिल्मों में प्ले बैक सिंगिंग भी करती दिखेंगी. अभी तक अपने स्तर पर ही संगीत सीखने वाली गिन्नी अब संगीत की शिक्षा भी लेना चाहती है ताकि गायिकी में और सुधार ला सके. गिन्नी के पिता राकेश माही का कहना है कि गिन्नी को मिली सफ़लता ने उनकी समुदाय के अन्य बच्चों को भी प्रेरित किया है और वे भी अब गायन में आना चाहते हैं. उनके आसपास के परिवारों में गिन्नी की सफलता के चर्चे हैं और बच्चे भी गिन्नी से लगातार उनके नए गीतों के बारे में पूछते रहते हैं. समुदाय के कार्यक्रमों में भी गिन्नी को विशेष सम्मान मिल रहा है और गिन्नी को भी छोटी उम्र से ही ये सब अच्छा लगता है. हालांकि वह अभी भी अपनी पढ़ाई को प्राथमिकता देती है. सिर्फ 18 साल की उम्र में गिन्नी राजनीतिक और सामाजिक तौर पर भी काफी जागरूक है और वह अच्छी तरह से जानती है कि बाबासाहब भीमराव अंबेडकर ने संविधान लिखा और संविधान में दलितों को आरक्षण देकर उनका सामाजिक उत्थान किया.वह अपने गीतों में भी अपने आप को बाबा साहब की बेटी ही क़रार देती है. प्लस टू में 77 प्रतिशत अंक लेकर अब गिन्नी कॉलेज में पढ़ाई कर रही है और वह पंजाब और पूरे देश में दलितों के उत्थान के लिए काम करने के साथ ही बॉलीवुड में प्ले बैक सिंगर भी बनना चाहती है. गर्व से कहो हम चमार हैं, पुत्त चमारा दें, की सोच को पूरे समाज तक पहुंचाने के लिए इस समुदाय के गायकों की एक पूरी पीढ़ी सक्रिय है जो कि चर्चे चमारा दें, डेंजर चमार आदि गीतों से अपने समाज को अपने पर गर्व करने के लिए प्रेरित कर रही है. पंजाब में जिस तरह से ये जाति अपने आप को अपनी पहचान और गुरु रविदास और बाबा साहब पर गर्व करने के लिए प्रेरित कर रही है, उतना कोई नहीं कर पा रहा. और, ये एक नए तरह का बदलाव है जो कि अब रफ़्तार पकड़ रही है.

जेएनयूः फुले अम्बेडकरवादी छात्र संगठन ”बपसा” भी चुनाव मैदान में

0
नई दिल्ली। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्र संघ चुनाव में अम्बेडकरवादी छात्र यूनियन बिरसा अम्बेडकर फुले स्टूडेंट्स एसोशिएशन(बपसा) भी चुनाव मैदान में है. यह पहली बार है जब यह संगठन जेएनयू के छात्रसंघ चुनाव में हिस्सा ले रहा है. बपसा का दावा है कि उनके पर्चा दाखिल करने से मनुवादी और कम्यूनिस्ट छात्र नेताओं के होश उड़ गये हैं. बपसा से जेएनयू अध्यक्ष पद के उम्मीदवार सोंपिंपल राहुल पुनाराम, उपाध्यक्ष पद के लेए बंशीधर दीप, सचिव पद के लिए पल्लिकोंडा मनीकांत और सह सचिव के लिए आरती प्रजापति उम्मीदवार हैं. बपसा का दावा है कि उसने पूरे जेएनयू में बहुजन छात्र राजनीति का बिगुल बजा दिया है और इस बार जेएनयू में कम्युनिस्ट पार्टियों और ब्राह्मणवादी पार्टियों का खाता खुलना मुश्किल है. चुनाव की इस गहमागहमी में अम्बेडकरवादी छात्र यूनियन बपसा का निशाना बहुजन समाज के छात्रों के वोटों पर होगा. अब तक ये वोट खासतौर पर कम्युनिस्ट संगठनों को जाते रहे हैं. लेकिन इस बार बपसा ने भी मोर्चा खोल दिया है. जेएनयू में छात्रसंघ का चुनाव 9 सितंबर को होगा.

दलित-मुसलमानों को अखबार पढ़ना छोड़ देना चाहिए!

उत्तर प्रदेश में होने जा रहे विधान सभा चुनाव तक क्या दलित-मुसलमानों को अख़बार पढ़ना छोड़ देना चाहिए? क्या उन्हें सवर्ण नेताओं और मीडिया से दुरी बना लेनी चाहिए? क्या दलितों और मुसलमानों को ऐसी किसी रैली या जनसभा में नहीं जाना चाहिए, जहां की अगुआई सवर्ण या मनुवादी विचारधारा को पोषित करने वाला प्रवचन सुना रहा हो? इस तरह के कई सवाल दलित-मुस्लिम बुद्धिजीवियों के मन में उठ रहे हैं और इन सबका एक ही समाधान है कि दलित-मुस्लिमों को उत्तर प्रदेश में होने जा रहे विधानसभा चुनाव तक अखबार नहीं पढ़ना चाहिए. खासकर दलितों को तो बिल्कुल नहीं पढना चाहिए. एक फ़िल्म का गाना है, जिसमे एक प्रेमी अपनी प्रेमिका से जुदा होने के बाद गाता है कि ये दुनिया, ये महफ़िल मेरे काम की नहीं. इस गाने को मिशाल के तौर पर मानें तो बहुजन समाज (दलित, पिछड़ा और मुस्लिम) को 6 महीने के लिये अपने घर में अख़बार मांगना बंद कर देना चाहिए. अपने घर में रखे टेलीविजन को रिचार्ज नहीं करवाना चाहिए और रिचार्ज भी कराएं तो कॉमेडी सीरियल, फ़िल्म या कोई रियलिटी प्रोग्राम या फिर डिस्कवरी चैनल देंखने चाहिए. क्योंकि ख़बरें उनके काम की नहीं रहीं. दलित-मुसलमानों को टीवी या अख़बार देखना-पढ़ना इसलिए बन्द कर देना चाहिए, क्योंकि दोनों में ही काम करने वाले मीडियाकर्मी बहुतायत में सवर्ण हैं, जो मनुवादी सोच से ग्रसित हैं. यह विधानसभा चुनाव तक वही दिखाना और पढ़ाना चाहते हैं, जिससे हिंदुत्व को मजबूती मिले, मनुवाद को बढ़ावा मिले और इन दोनों का ठेका बीजेपी ने ले रखा है. बीजेपी हर हाल में उत्तर प्रदेश में अगली सरकार बनाने का सपना देख रही है. बीजेपी के लिए उत्तर प्रदेश में सरकार बनाना जरुरी इसलिए भी है, क्योंकि तेजी से ढह रही हिंदुत्व की दीवार को लोकसभा चुनाव (2019) में बचा पाना मुश्किल होगा और बीजेपी केंद्र की सत्ता से बेदखल हो जायेगी. क्योंकि उत्तर प्रदेश में दलित-मुस्लिम मतदाताओं की खिचड़ी स्वादिष्ट बन गई तो यह खिचड़ी लोकसभा चुनाव में भी पकेगी और सारे ओपिनियन पोल धराशायी हो जाएंगे. टीवी-अख़बार से दुरी बनानी इसलिए जरुरी है कि मनुवादी मीडिया यह जान चुका है कि यूपी में दलित-मुस्लिम गठजोड़ तेजी से बन रहा है और यही वजह है कि विधानसभा चुनाव से एक साल पहले से ही उत्तर प्रदेश में ओपिनियन पोल टीवी में दिखाए जा रहे और अख़बार में पढ़ाये जा रहे हैं. इस ओपिनियन पोल में समाजवादी पार्टी को सबसे आगे और बीजेपी को दूसरे नम्बर पर दिखाया जा रहा है. 3 सितम्बर को सी-वोटर ने अपना सर्वे जारी किया. इसमें समाजवादी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी के बीच काटें की टक्कर होने का दावा किया गया है. सिर्फ इतना ही नहीं, सर्वे में दावा किया गया है कि 2017 विधानसभा चुनाव में बीजेपी को सबसे ज्यादा 27.79 प्रतिशत वोट मिलेंगे, जबकि सपा को 27.51 प्रतिशत वोट मिलेंगे, लेकिन सीटें सपा ज्यादा जीतेगी. इस सर्वे में बीएसपी यानी सुश्री मायावती को तीसरे नम्बर पर रहने का दावा किया गया है और उसे 25.44 प्रतिशत वोट मिलने की संभावना जताई गई है. सी-वोटर ने यूपी के लोगों से पसंदीदा मुख्यमंत्री पर भी वोट कराया है. इसमें अखिलेश यादव 32.8 प्रतिशत वोट पाकर सबसे ज्यादा पसंदीदा मुख्यमंत्री बने हुए हैं, जबकि मायावती 28.2 प्रतिशत वोट के साथ दूसरे स्थान पर हैं. लेकिन सर्वे में यह भी कहा गया है कि मायावती दूसरे स्थान पर इसलिए बनीं हुई हैं, क्योंकि बीजेपी ने अभी तक मुख्यमंत्री फेस (चेहरे) की घोषणा नहीं की है. यदि बीजेपी कोई स्थानीय दमदार चेहरे को मुख्यमंत्री के तौर पर प्रोजेक्ट करती है, तो मायावती को और नुकसान हो सकता है. सी-वोटर ने सर्वे में दिखाने की कोशिश कि है कि यूपी में बीजेपी की पकड़ लगातार मजबूत होती जा रही है और यूपी के 70 प्रतिशत लोग प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी के कामकाज से खुश हैं. मतलब कि मनुवादी मीडिया ने यूपी चुनाव में बीजेपी को मोदी चेहरे का लाभ मिलने का दावा किया है. अगर सर्वे के दावों को स्वीकार किया जाये तो यूपी में अगली सरकार त्रिशंकु बनेगी और सरकार सपा और भाजपा के गठबंधन से बनेगी. दलित-मुस्लिम समुदाय के लोगों को यही गंभीरता से सोचने की जरुरत है कि आखिर क्यों यूपी में ही यह सर्वे दिखाए जा रहे हैं. दूसरे प्रदेशों में भी चुनाव होने हैं और वहां भी दिखाने चाहिए. इसका सीधा सा मतलब यह है कि दिल्ली का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर गुजरता है. बीजेपी को यूपी के लोगों की चिंता नहीं है, बल्कि उसे दिल्ली की चिंता है, क्योंकि केंद्र की सत्ता हाथ में रहती है, तो हिंदुत्व के मनुवाद को बढ़ाने में आसानी रहेगी. दलितों-मुसलामानों को दबाने, पीछे धकेलने में आसानी रहेगी, जैसा कि देश भर में दलितों और मुसलामानों के साथ हो रहा है. इसमें बीजेपी को सपा की या फिर सपा को बीजेपी की जरुरत क्यों पड़ रही है. आखिर दोनों परदे के पीछे एक साथ क्यों खड़े हैं? क्यों मोदी सरकार और अखिलेश सरकार एक दूसरे की गुपचुप तरीके से मदद कर रही है? क्यों दोनों ही बीएसपी को तीसरे नम्बर पर बता रही हैं, तो इसका एकमात्र जवाब है कि दोनों को पता है कि अगले साल यूपी में बीएसपी की सरकार और मायावती मुख्यमंत्री बनने जा रही हैं. अब से कुछ माह पहले भी टीवी चैनलों पर सर्वे चला था जिसमे बीएसपी की सरकार बनने का दावा किया गया था, लेकिन उस सर्वे के बाद आये दो-तीन सर्वे में बीएसपी को तीसरे नम्बर पर दिखाया जा रहा है. जहां तक राजनीतिक समझ कहती है जो सत्ता में रहता है, वोटर की नजर में चुनाव के दौरान सबसे कमजोर होता है. सपा यूपी में सत्ता में है और साढ़े 4 साल की सरकार में 200 से ज्यादा सामुदायिक दंगे, हर रोज दलित महिलाओं से रेप, छेड़छाड़ और पिटाई की घटनाएं हो रही हैं. हर तरफ गुंडाराज है. मुलायम सिंह खुद कबूल करते हैं कि उनकी पार्टी के कार्यकर्ता गुंडई कर रहे हैं, जमीनों पर कब्ज़ा सहित माफियाओं का बोलबाला है. मुलायम सिंह आगाह कर चुके हैं कि सम्भले नहीं तो सत्ता में लौटना नामुमकिन है. इतनी चेतावनी के बाद भी प्रदेश में गुंडाराज कायम है, जबकि केंद्र की सत्ता में बैठी बीजेपी को यूपी में 2012 के मोदी लहर का लाभ मिलने की उम्मीद धूमिल पड़ गई है. हम यूं कह सकते हैं कि दलित और मुस्लिम वर्ग बीजेपी के हिंदुत्ववादी मनुवादी विचारधारा से पिछले 2 साल से इस कदर दुखी है कि वह मायावती और बसपा से उम्मीदें लगा चुका है. यही कारण है कि बार बार मोदी जी को दलित और आम्बेडकर प्रेम का दिखावा करना पड़ता है. कहना पड़ता है कि उनके दलित प्रेम को देखकर कुछ सवर्णों को जलन होती है. इन दो सालों के मोदी युग को भी दलित-मुसलमान देख चुके हैं और जान चुके हैं कि आगे क्या होगा? सर्वे में बीएसपी को क्यों तीसरे स्थान पर दिखाया जा रहा है, यह बात गले से नहीं उतर रही है, क्योंकि मायावती एक ऐसी शासक हैं जिनके मुख्यमंत्री रहने के दौरान गुंडे प्रदेश छोड़कर भाग जाते हैं. पुलिस प्रशासन को ईमानदारी से काम करने की छूट होती है और किसी सरकारी ऑफिस में बीएसपी कार्यकर्ता को जाने या सिफारिश करने पर पाबन्दी होती है. मतलब यह कि बीएसपी की सरकार वही करती है, जो संविधान कहता है. हो सकता है कि अगले एक दो महीने में और भी सर्वे आएंगे और उसमे बीएसपी को और कमजोर दिखाया जायेगा. आखिर क्यों? क्या यही सच्चाई है या फिर कोई साजिश है. अगर बुद्धिजीवी वर्ग दिमाग पर जोर दें, तो साफ पता चलता है कि यह मात्र साजिश है. मनुवादियों को पता है कि दलित और मुस्लिम समुदाय अभी पूरी तरह से जागरूक नहीं हुआ है. दोनों समुदयों में जो पढ़े लिखे लोग हैं, उनमें 50 प्रतिशत लोगों के पास राजनीतिक ज्ञान ही नहीं है. वे गलत और सही के बीच फंसे हुए हैं. अब जरुरी यह है कि दलित मुस्लिम वर्ग को इन दोनों की चाल को समझना होगा. बीजेपी और सपा सर्वे के जरिये दलित और मुस्लिम वर्ग को फर्जी सर्वे दिखाकर भ्रमित करना चाहते हैं, ताकि दलित मुस्लिम वोटों का ध्रुवीकरण हो और सीधा लाभ बीजेपी और सपा को मिले. चूंकि ऐसा होता है तो किसी को इतनी सीट नहीं मिलेगी कि वह पूर्ण बहुमत की सरकार बना सकेगा. ऐसे में पूर्व प्लान के तहत बीजेपी और एसपी मिलकर प्रदेश में गठबंधन की सरकार बना सकेंगे. अगर बीजेपी और सपा की सरकार बनती है तो इससे मुस्लिम वर्ग का सबसे ज्यादा नुकसान होगा, क्योंकि सपा सत्ता के लालच में बीजेपी के खिलाफ कुछ बोलेगी नहीं और बीजेपी मुस्लिम मुक्त भारत का अभियान आगे बढ़ाएगी, जबकि दलित वर्ग के लोग उसी हालत में अगले 5 साल तक और जीएंगे, जिस हालत में वर्षों से जीते आ रहे हैं. लेखक नवभारत टाइम्स, ग्रेटर नोएडा में पत्रकार हैं.

रविवार को इलाहाबाद की महारैली को संबोधित करेंगी मायावती, दलित दस्तक भी पहुंचा

0
लखनऊ। बसपा सुप्रीमो मायावती चार सितंबर (रविवार) को इलाहाबाद में “सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय” महारैली को संबोधित करेंगी. इस महारैली का आयोजन इलाहाबाद में अलोपी बाग स्थित परेड मैदान में होगा. इस महारैली में इलाहाबाद मंडल, मिर्जापुर मंडल व वाराणसी मंडल के बड़े नेताओं और समर्थकों का जमावड़ा लगेगा. बसपा अध्यक्ष मायावती की इलाहाबाद रैली में आजमगढ़ की रैली से ज्यादा समर्थक जुटने की उम्मीद है. गौरतलब है कि बसपा अब तक दो महारैली कर चुकी है. जिसमें लाखों की संख्या में समर्थक जुटे थे. आगरा और आजमगढ़ की रैली में बसपा अध्यक्ष मायावती ने सपा सरकार और केंद्र सरकार पर निशाना साधा था. बसपा की रैली में “दलित दस्तक” पत्रिका की टीम रहेगी. अब तक हुई दो रैलियों में भी दलित दस्तक की टीम ने बहुजन समाज के समर्थकों से मिलजुल कर काम करने पर चर्चा की. आप भी इस चर्चा का हिस्सा बनें और दलित दस्तक से मिलें. रैली में दलित दस्तक पत्रिका लेने के लिए अनिल कुमार से 9013942612 पर  संपर्क करें.

मान्यवर कांशीराम और उनके फटे कपड़े

0
बात उन दिनों की है, जब मान्यवर कांशीरामजी बहुजन समाज को संगठित करने के लिए फुले, शाहू, अम्बेडकर की विचारधारा को साथ लेकर संघर्ष कर रहे थे. उस समय उनके पास न पैसा था और न आय का कोई स्त्रोत. किसी फकीर की भांति वे दर-बदर घूमते रहते थे. जब जहां शाम हो जाता वही पर ठिकाना बना लेते थे. जो भी साथ मिला उसके साथ घूमते थे. जिसके यहां जगह मिली वहां पर विश्राम कर लेते थे. उनकी अथक मेहनत जारी थी. कभी कभार तो उन्हें भूखे रहना पड़ता था. जेब में दो चार रुपये पाए गये तो चौराहे पर लगी दुकान से भजियां या मुंगबड़े खाकर और उपर से दो गिलास पानी पीकर पेट की आग को बुझा लेते थे. कपड़े फटे रहते थे. पैर की चप्पल पूरी तरह घिस जाने पर भी बदली नहीं जाती थी. साहब के परिश्रम की कोई सीमा नहीं थी. आज भी उनके नाम और काम से ऊर्जा मिलती है. कुछ लोग उनकी समाज जागृति करने की भावना को समझते थे. ऐसे लोग ही उनका ख्याल रखते थे. किसी को फटी कमीज नजर आयी तो वह दुकान से सस्ती कमीज लाकर उन्हें दे देता. कभी पैंट फटी दिखी तो पैंट लाकर देता था. यह तो बाह्यवस्त्र थे. लोगों की नजर पड़ने पर लाये जाते थे. वैसे तो समाज कार्य करने वालों की हिफाजत करने वालों की भावना बहुत कम लोगों में पायी जाती है. केवल गिने चुने लोग इनके प्रति जागृत हैं. फिर भी बाह्यवस्त्रों के प्रति लोग उदारता बरतते थे. एक समय ऐसा भी आया जब नयी बनियन खरीदने के लिए भी मान्यवर कांशीरामजी के पास पैसे नहीं थे. मगर अंतर्वस्त्र तो किसी को दिखायी नहीं देते. कांशीरामजी के पास केवल दो बनियान थी और दोनों इस कदर फट चुकी थी की उनको बनियान के बजाय ‘चीथड़े’ कहना ज्यादा उचित होगा. उनमें कपड़े कम रह गए थे और छेद ज्यादा थे. नयी बनियान खरीदने के लिए भी मान्यवर कांशीरामजी के पास पैसे नहीं थे. मगर मन का दर्द बताये तो किसे. उनका मन स्वाभिमानी था. और इस स्वाभिमानी मन को लाचार होकर किसी के आगे हाथ फैलाना कतई मंजूर नहीं था. मन और तन तो केवल शोषित, पीड़ित समाज का उत्थान करने हेतु कार्य कर रहा था. एक दिन की घटना है, नहाने के बाद उन्होंने अपनी बनियान कमरे के बाहर सुखाने के लिये रखी. उसी समय कोई कार्यकर्ता उनसे मिलने उनके करोलबाग के कमरे पर आया था. उस कार्यकर्ता ने जब उस चिथड़े हो चुके बनियन को देखा तो उन्हें लगा किसी ने शरारत करने के लिए यह फटी बनियान तार पर रख दी होगी. गुस्से से वह चिल्लाया- ‘अरे !… यह किसकी शरारत है? फेंक दो उस फटे वस्त्र को.’ कमरे में बैठे कांशीरामजी को उसकी आवाज सुनाई दी. तत्काल दौड़कर वे दरवाजे पर आये और कहा- “अरे भई !!! उसे फेकों मत वह मेरी बनियन है…” साहब की बात सुनकर कार्यकर्ता के आंखों में आंसू तैर आये. हजारों दिलों पर राज करनेवाला समाज का वह बादशाह अपने लिए ढंग का एक अंतःवस्त्र नहीं खरीद पा रहा था. मान्यवर कांशीरामजी का वह त्याग देख कार्यकर्ता का दिल भर आया. वह कार्यकर्ता उलटे पांव वापस लौटा. बाजार में जाकर उसने नई बनियान की जोड़ी खरीदी और साहब के सामने रख दिया. उसके आंसुओं की कद्र करते हुए हल्की सी मुस्कान के साथ मान्यवर कांशीरामजी बोले-  भाई ! अभी आप वह फटी बनियान फेंक सकते हो…” आज कल्पना की ऊंची उड़ान भरने के बावजूद हम मान्यवर कांशीरामजी द्वारा झेले गये कष्ट और परिश्रम की कल्पना नहीं कर सकते. कल्पना बौनी हो जायेगी. उनके परिश्रम को नापने का कोई भी मापदंड आज मौजूद नहीं है. उनके कष्ट, उनका परिश्रम, उनकी आकांक्षा, उनके प्रयास, उनका साहस, उनकी निष्ठा, उनका आत्मविश्वास हर ऊंचाई से उपर है. कदम कदम पर ठेस खाने पर भी चेहरे पर की मुस्कान में कोई दरार नहीं पायी गई. प्रस्थापित उच्च वर्णियों ने तो उनके खिलाफ जेहाद छेड़ दिया. किन्तु अपनों ने भी कम जुल्म नहीं ढाए. मगर पत्थर का दिल बनाकर उन्होंने अपना सीना कभी छलनी नहीं होने दिया. मंजिल को पलभर के लिए भी विस्मरण नहीं होने दिया. अंर्तचेतना को एक पल भी नहीं सोने दिया. दुखी मन को बूंद भर आंसुओं के साथ नहीं रोने दिया. ऐसे थे मान्यवर कांशीराम और ऐसा था उनका त्याग. साभार-  (कांशीरामजी TV)

जर्मनी तक पहुंची ”दलित दस्तक” की दस्तक

0
दलित दस्तक की मेहनत और संघर्ष को जर्मनी की मशहूर न्यूज वेबसाइट डॉयचे वेले ने सराहा है. स्वतंत्र पत्रकार अलेत्ता आंद्रे और अभिन्यु कुमार ने दलित दस्तक पत्रिका के संपादक अशोक दास का इंटरव्यू लिया. डॉयचे वेले ने दलित दस्तक पत्रिका के बारे में एक विस्तृत स्टोरी की है और भारत में दलित आंदोलन में दलित दस्तक के योगदान को सराहा है. संपादक के संघर्ष और मेहनत को विश्व स्तर तक पहुंच दिया है. डॉयचे वेले ने अपनी वेबसाइट पर पत्रिका के बारे में लिखा है कि पत्रिका सच में दलित, पिछड़े और शोषित समुदाय के लिए काम करती है. जो खबरें मुख्यधारा की मीडिया नहीं दिखाती, दलित दस्तक उसे लोगों के सामने रखता है. वेले ने कहा है कि दलित दस्तक पत्रिका जब से शुरू (2012) हुई तबसे निम्न तबकों की आवाज बन गई है. बहुजन समाज से संबंधित लोगों के अतिरिक्त उच्च जाति के लोग भी इस पत्रिका को पढ़ते हैं. वेले ने संपादक अशोक दास के जज्बे की सरहाना की. वेले ने वेबसाइट पर लिखा कि अशोक दास ने 2012 में दलित दस्तक पत्रिका की दो हजार प्रतियों से शुरूआत की थी. आज पत्रिका की 25000 प्रतियां हर महीने छपती हैं. तेजी से प्रशंसकों की भीड़ उमड़ी हैं. डॉयचे वेले तक दलित दस्तक के सम्मान के पीछे बहुजन समाज के हमारे पाठकों की अहम भूमिका है. जिन्होंने दलित दस्तक को अच्छी प्रतिक्रिया दी. पाठकों की प्रतिक्रिया और सराहना से दलित दस्तक आज इस मुकाम तक पहुंचा हैं. दलित दस्तक को यहां तक पहुंचाने के लिए पाठकों और प्रशंसकों का आभार. गौरतलब है कि हिंदुस्तान टाइम्स ने दलित दस्तक और संपादक अशोक दास के बारे में विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित की थी. साथ ही एनडीटीवी इंडिया के चर्चित पत्रकार रवीश कुमार ने अपने शो प्राइमटाइम में भी दलित दस्तक का जिक्र कर चुके हैं.

सिर्फ आरएसएस और मनुवादी लोग ही राष्ट्रवादी हैं?

24 अगस्त 2016 को मोदी जी ने बयान दिया कि दलित-पिछड़े राष्ट्रवादी नहीं और राष्ट्रवादियों के अलावा कोई भाजपा के साथ नहीं. मोदी जी के इस बयान पर अनुसूचित जातियों की तीखी प्रतिक्रिया लाजिमी है. तीखी प्रतिक्रिया हुई भी. लेकिन प्रतिक्रिया उनके बयान के इस हिस्से को लेकर ज्यादा हुई कि दलित-पिछड़े राष्ट्रवादी नहीं. अनुसूचित जातियों ने इसे अपना अपमान माना. यहां मोदी जी पर पलटवार किया जा सकता है कि क्या मोदी जी भाजपा की पैतृक संस्था आरएसएस के उन राष्ट्रवादियों की सूची मुहैया करा पाएंगे जिन्होंने अंग्रेजों के विरुद्ध स्वतंत्रता आन्दोलन में भाग लिया था? लेकिन नहीं…मोदी जी के पास ऐसी कोई सूची होगी ही नहीं क्योंकि आरएसएस के ज्यादातर झंडाबरदारों ने न तो स्वतंत्रता आन्दोलन में भाग लिया और न ही शांत ही बैठे, बल्कि आन्दोलनकारियों के विरोध में अंग्रेजों की गुलामी स्वीकार ही की. आन्दोलनकारियों का केवल विरोध ही करते तो गनीमत होती, उन्होंने तो अंग्रेजी-जेलों में बंद आन्दोलनकारियों के विरोध में अंग्रेजों के हक गवाहियां भी दीं. आरएसएस के जितने भी बड़े नाम हैं, उन सबका देश विरोधी चेहरा किसी से छिपा हुआ नहीं है, यहां उनका नाम लेना जैसे देश और समाज के हक में नहीं. मोदी जी को याद रखना चाहिए कि स्वतंत्रता आन्दोलन में भाग लेने वाले आन्दोलनकारियों में सबसे ज्यादा उन्ही जातियों के लोग थे जिन्हें आज अनुसूचित जातियों और पिछड़ा वर्ग के नाम से जाना जाता है. लेकिन उस लड़ाई के इतिहास में उनका नाम कहीं भी नहीं मिलता. कारण कि इतिहासकार भी तो ब्राह्मणवादी शक्तियां ही रही हैं. इतिहास में केवल और केवल ब्राह्मणवादियों के नाम का ही चर्चा किया गया जो समाज की सबसे डरपोक और चालबाज कौम है. जो मिथ्या है. अफसोस तो ये है कि इन ब्राह्मणवादी शक्तियों ने नेता जी सुभाष चन्द्र बोस के नाम को भी नदारत करने की साजिश रच डाली. सरदार भगत सिंह और उधम सिंह जैसे आन्दोलनकारियों की बात की भी गई तो आतंकवादियों के रूप में. मोदी जी का ये कहना कि राष्ट्रवादी तो भाजपा के साथ पहले से ही हैं, लेकिन दलितों और पिछड़ों को बीजेपी के साथ लाने की जरूरत है, बड़ा ही हास्यास्पद है. उनके बयान से तो यही लगता है कि मोदी जी की नजर में केवल 15 प्रतिशत सवर्ण ही राष्ट्रवादी हैं. ऐसा कहते समय मोदी जी भूल गए कि 2014 में हुए लोकसभा चुनाव में मोदी की सफलता में तमाम कारण गिनाने वाले अधिकांश राजनीतिक विश्लेषकों ने जिस बात को खुलकर नकारा है, वह है जाति फैक्टर. उनका मानना है कि मोदी के करिश्माई व्यक्तित्व और विकास  के नारे ने जाति की दीवारों को ध्वस्त कर दिया था. किन्तु राजनीतिक विश्लेषक चाहे जो भी कहें, सच्चाई यह है कि जाति तत्व इस चुनाव में सबसे ज्यादा प्रभावी रहा और मोदी ने बड़ी सूझ-बूझ और चालबाजी से अनुसूचित जातियों को अपने साथ जोड़कर सफलता का स्वाद चखा. 16वीं लोकसभा चुनाव के आकड़ें बताते हैं कि देश भर में 54 प्रतिशत अनुसूचित जातियां और ओबीसी वोट मोदी के खाते में चले गए. ऐसा इसलिए हुआ कि उन्होंने बड़ी सफाई से खुद की अपनी छवि एक ऐसे नीची जाति के नेता के रूप में प्रोजेक्ट की कि जो मोदी जी को जीत ओर ले जा सकता थी. इस क्रम में उनका खुद को नीची जाति का बताना एक असरदार और मारक हथियार साबित हुआ. उन्होंने राम विलास पासवान, डॉ. उदितराज, छेदी पासवान, उपेन्द्र कुशवाहा, अनुप्रिया पटेल, राम कृपाल यादव इत्यादि को जोड़कर जो नई सोशल इंजीनियरिंग रची, उससे केंद्र की सत्ता दिलाने में सबसे प्रभावी रोल अदा करने वाले यूपी-बिहार में 120 में से 104 सीटें भाजपा की झोली में जा गिरीं. जो अनुसूचित जातियों के समर्थन के बिना संभव ही नहीं था. और आज मोदी जी कहते है कि अनुसूचित जातियां और समाज का पिछड़ा वर्ग राष्ट्रवादी नहीं हैं. यह शर्म की बात है किंतु प्रधानमंत्री बनने के बाद अब मोदी जी नीची जाति के थोड़ी ही रह गए हैं, वो इस बात को आज नहीं मानने वाले.. यहां एक सवाल और बराबर बना हुआ है कि समाज की दलित और दमित जातियों को मोदी की सफलता का कितना लाभ मिलेगा. मुझे नहीं लगता कि मोदी समाज की अनुसूचित और दमित जातियों को लाभ पहुंचाने की हालत में आ पाएंगे क्योंकि उनके सिर पर समाज की वर्चस्वशाली जातियों ने न केवल बराबर दबाव बना रखा है जोकि आगे तक रहेगा. मोदी में शायद उन्हें नकारने की ताकत भी कभी पैदा नहीं हो पाएगी क्योंकि उन्हें प्रधानमंत्री बने रहने की पीड़ा ऐसा कुछ करने नहीं देगी. मोदी ही क्यों… तमाम नेता कुर्सी के ही तो भूखे हैं. दलित राजनेता राम विलास पासवान, डॉ उदितराज, छेदी पासवान, उपेन्द्र कुशवाहा, अनुप्रिया पटेल, राम कृपाल यादव इत्यादि भी उसी श्रेणी के नेता हैं जो अनुसूचित और पिछड़ी जातियों के मतदाताओं की छाती पर पैर रखकर सरकार के किसी न किसी अंग के रूप में सत्ता में बने रहने का उपक्रम हैं. इन तथाकथित दलित नेताओं की जुबान को तो जैसे लकवा मार गया है. आरपीआई से आए एक और अठावले जी बीजेपी की सरकार में मंत्री बना दिए गए हैं, उनका विभाग तो कुछ और है किंतु उनको मोदी जी ने जो दायित्व सौंपा है, वो है बसपा के हाथी को छिनने का. अब कोई भाजपा को बताए कि जो अठावले आरपीआई में रहकर हाथी को नहीं बचा पाए, अब उनकी क्या ताकत कि उत्तर प्रदेश में हाथी की सूंड पकड़ पाएंगे. मोदी जी के इस बयान पर न केवल सामाजिक और लेखकीय स्तर पर अपितु राजनीतिक स्तर पर भी बहुत किरकिरी हो रही है. कांग्रेस के राहुल गांधी ने मोदी से पूछा कि क्या दलित और पिछड़े राष्ट्रवादी नहीं हैं? फेसबुक और वाटस-एप पर तो प्रधानमंत्री के इस बयान की लगातार जमकर खिंचाई हो रही है. तरह-तरह के सवाल उठाए जा रहे हैं… तंज कसे जा रहे हैं. वरिष्ठ पत्रकार और सामाजिक चिंतक दिलीप मंडल ने लिखा है,” कार के नीचे कुत्ते का बच्चा वाला बयान छोड़ दें तो नरेंद्र मोदी जी ने इतना अपमान तो मुसलमानों का भी नहीं किया था. शुक्रिया नरेंद्र मोदी, यह बताने के लिए कि एससी और ओबीसी की आपकी नजर में क्या औकात है.” अरविंद शेष ने लिखा है कि अब इससे ज्यादा साफ-साफ मोदी जी और क्या कहेंगे कि ””सवर्ण”” उनके साथ हैं और बाकी बचे पिछड़े और दलित, तो उन्हें वे अपने साथ लाने की कोशिश करेंगे. यानी वे यह मानते हैं कि राष्ट्रवादी का मतलब सवर्ण. राजेश यादव ने चुटकी लेते हुए लिखा है, “भारत के 69 प्रतिशत लोग राष्ट्रद्रोही होते हैं, ये 2014 के पहले के आंकड़े हैं. अभी हाल ही में इस संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है.” जितेंद्र नारायण ने लिखा है- अब तो प्रधानमंत्री ने ही स्पष्ट कर दिया कि पिछड़े और दलित अलग जातियां हैं और राष्ट्रवादियों की अलग जाति है. बेचारे पिछड़े-दलित भाजपाई न घर के हैं न घाट के. कमलेश कुमार ने लिखा है-इससे ज्यादा शर्म की बात और क्या होगी कि देश का प्रधानमंत्री सरेआम देश के 85 प्रतिशत दलित पिछड़े और मुस्लिमो को देशद्रोही बोल रहा है. प्रभाकर भारतीय ने पूछा है – मोदी के अनुसार राष्ट्रवादी की परिभाषा क्या है? क्या केवल संघी और मनुवादी ही राष्ट्रवादी हैं? इतनी सारी प्रतिक्रियाओं के बाद भी मोदी जी की चुप्पी के मायने कोई भी समझ सकता है कि मोदी जी केवल और केवल तथाकथित सवर्ण वर्ग के लिए ही काम कर रहे हैं. मोदी जी के इस प्रकार के बयानों के बाद क्या यह जरूरी नहीं कि अनुसूचित जातियां और पिछड़े वर्ग के लोगों को तथाकथित राष्ट्रवादियों के साथ दूरी बनाकर चलना ही उनके हित में होगा. और यह भी समाज की अनुसूचित जातियों और पिछड़े वर्ग के राजनेताओं को निजी हितों को भूलकर एकजुट होने की आवश्यकता है. यदि ऐसा हो जाता है तो राज्यों की सरकारों पर ही नहीं, राष्ट्र की केन्दीय सरकार पर भी उनका एक छत्र राज होगा, इसमें किसी भी प्रकार की शंका हो ही नहीं सकती. एक और विकल्प भी है भारतीय समाज की अनुसूचित और पिछड़ी जातियों के साथ यदि मुसलमान और आ जाते है तो राजनीतिक तस्वीर कुछ और ही होगी. इस प्रकार के गठजोड़ में कुछ न कुछ तो बाधाएं आएंगी जरूर, फिर भी सुफल की आशा की जा सकती है. मोदी जी के इस बयान को उत्तर प्रदेश के आगामी चुनावों से जोड़कर देखे जाने की जरूरत है. अब अनुसूचित जातियों और समाज के पिछड़े वर्ग के मतदाताओं को यह सोचना ही होगा कि अपने समाज के हितों की रक्षार्थ किसको वोट देना सार्थक रहेगा. मोदी जी चाय बेचने वाले के बेटे हैं और समाज की नीची जाति में पैदा हुए हैं, इस बात के भुलावे में नहीं आना है. वैसे भी प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी जी नीची जाति के थोड़े ही रह गए हैं? लेखक तेजपाल सिंह तेज  एक लेखक हैं.  तेजपाल सिंह तेज को हिन्दी अकादमी (दिल्ली) द्वारा बाल साहित्य पुरस्कार और साहित्यकार सम्मान से सम्मानित किया जा चुका है. इनका संपर्क सूत्र tejpaltej@gmail.com है.

बच्चों को निशुल्क पढ़ाने के लिए नवोदय विद्यालय में कराएं दाखिला

0
नई दिल्ली। जवाहर नवोदय विदयालय में प्रवेश परीक्षा के फॉर्म आ चुके हैं. फॉर्म भरकर जमा करवाने की अंतिम तारिख 15 सितंबर 2016 है. जवाहर नवोदय विद्यालय देश के विभिन्न सरकारी विदयालयों से अलग है. यह देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में स्थापित है. यहां पढ़ने वालो बच्चों को रहना, खाना और पढ़ाई संबंधी चीजें जैसे कॉपी, किताब, यूनिफॉर्म आदि निशुल्क मिलता है. यहां की पढ़ाई राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् (एनसीईआरटी) पर आधारित सीबीएसई बोर्ड से होती है. नवोदय विदयालय में दाखिला प्रवेश परीक्षा के माध्यम से होता है. यहां कक्षा छह से पढ़ाई होती है. बच्चे को कक्षा छह में दाखिला लेने के लिए प्रवेश परीक्षा फॉर्म एक साल पहले ही भरना होता है. मसलन आप का बच्चा अगर अभी पांचवी में है तो उसका फॉर्म भरवा दीजिए. प्रवेश परीक्षा अगले साल जनवरी (2017) में होगी. अगर बच्चा प्रवेश परीक्षा पास करता है तो अगले साल अप्रैल(2017) में दाखिला होगा. यहां प्रवेश परीक्षा में बैठने के लिए अनिवार्य शर्त यह है कि पांचवी कक्षा में अध्ययनरत छात्र ही परीक्षा में बैठेगा ताकि परीक्षा का परिणाम आने तक वो तुरंत कक्षा छह में दाखिला ले सके. इसी तरह कक्षा 9 और कक्षा 11 में दाखिला प्रक्रिया है. प्रवेश परीक्षा फॉर्म आप नजदीकी नवोदय विद्यालय से ले सकते हैं या फिर जवाहर नवोदय की वेबसाइट से भी ले सकते हैं. नवोदय विद्यालय में दाखिले की पूरी प्रक्रिया जानने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें- दाखिला प्रक्रिया जवाहर नवोदय विद्यालय के परीक्षा परिणाम अन्य सभी विद्यालयों से उत्कृष्ट रहा है. यहां संविधान द्वारा दी गई आरक्षण नीति के तहत दाखिला होता है और ग्रामीण परिवार से आए छात्रों को प्रोत्साहित किया जाता हैं. आप भी अपने बच्चे के सुनहरे भविष्य के लिए प्रवेश फॉर्म भरें. नवोदय विद्यालय में शिक्षा निशुल्क मिलने के साथ-साथ मेधावी और एससी/एसटी छात्रों को स्कॉलरशिप भी दी जाती है.

बाबा रामदेव का देश प्रेम!

मल्टीनेशनल कंपनियां तो लुटेरी ठहरी. वह तो आयी ही हैं लाभ कमाने. भला बिना लाभ के लालच में कोई व्यापार करता है? गोलगप्पे वाला भी खोमचा नहीं लगाता बिना लाभ की उम्मीद में. लाखों का विज्ञापन दे कर रामदेव जो बहुराष्ट्रीय कंपनियों के खिलाफ ज़हर उगलते रहते हैं वह देश की मुक्त अर्थ व्यवस्था और सरकार की मेक इन इंडिया, स्टार्ट अप इंडिया, स्टैंड अप इंडिया का मज़ाक ही बना रहे हैं. पर क्या कीजियेगा, भगवा ओढ़ते हैं, पतंजलि के वारिस हैं, और सरकार के नज़दीक भी हैं.  दन्तमंजन से ले कर च्यवनप्राश और दलिया से ले कर आटा तक बेचते हैं. दवा भी बताते हैं उनके वैद्य राज बाल किशन जो वैद्यकी किस आयुर्वेद महाविद्यालय से पढ़े हैं उन्हीं को नहीं पता. पुलिस ने जब छानबीन की तो पता लगा सब फर्जी है और उन्होंने आरोग्य विज्ञान की कोई औपचारिक शिक्षा भी नहीं ली है. 2009 के महाकुम्भ में मैं हरिद्वार में पीएसी का प्रभारी था. काम भी कुम्भ में मुख्य स्नान के दिन ही रहता है. तो समय भी मेरे पास खूब था. पतंजलि आश्रम भी मैं दो बार गया और जब-जब जहां-जहां चर्चा की तो, वहां के किसानों का यह आरोप सुना कि बाबा ने उनकी जमीन जबरदस्ती लिखवा ली. जब इनका आश्रम बन रहा था तो उत्तर प्रदेश सरकार ने (तब उत्तराखंड नहीं बना था) इन्हें जमीन आबंटित की थी. उसी पर इनके आश्रम की शुरुआत हुई. फिर तो यह प्रगति करते ही गए. फिर तो यह भी व्यापारी हो गए और जैसे कि एक महत्वाकांक्षी व्यापारी देर सबेर सरकार का कृपा पात्र बनने की जुगत में रहता है यह भी महाजनो येन गतः स पन्थाः हो गए. इसका इनको लाभ भी मिल रहा हैं. कहीं महाराष्ट्र सरकार इन्हें ज़मीन दे रही है तो कहीं असम तो कहीं गोवा, लब्बो लुबाब यह है कि दिल्लीश्वर और जगदीश्वर की इन पर सतत कृपा बनी हुयी है. योग साधना का इन पर क्या असर पड़ा, यह इसी से स्पष्ट है कि, 6 दिन के अनशन में ही आईसीयू पहुंच गए और मानसिक रूप और इच्छा शक्ति से इतने दुर्बल कि जान बचाने के लिए बृहन्नला का रूप धारण करना पड़ा था एक बार! -लेखक सेवानिवृत आईपीएस अधिकारी हैं.

बिहारः जातिवादी गुंडों ने दलित टोले में घुसकर की महिलाओं से मारपीट और फायरिंग

0
मुजफ्फरपुर। पताही स्थित नवराष्ट्र उच्च विद्यालय में बेंच पर बैठने को लेकर छात्रों के दो गुटों के बीच हुए विवाद में एक गुट विशेष के छात्रों का समर्थन करते हुए लोगों ने दलित टोले में घुसकर मारपीट की. घटना बुधवार की सुबह साढ़े नौ बजे की है. इस दौरान दो राउंड हवाई फायरिंग भी की गई. मारपीट में तीन महिला समेत सात लोग जख्मी हो गये. सभी को इलाज के लिए सदर अस्पताल में भर्ती कराया गया है. घटना के विरोध में पताही दलित टोले के लोगों ने रेवा रोड एनएच 102 को पताही के समीप जाम कर कार्रवाई की मांग करते हुए प्रदर्शन किया. छात्रों को सौंपने की मांग करने लगे. लेकिन स्कूल प्रशासन ने गेट नहीं खोला. मौके पर पहुंची सदर थानाध्यक्ष मंजू सिंह व जिला पार्षद कुमोद पासवान ने सभी को समझा-बुझाकर शांत कराया. थानाध्यक्ष ने कार्रवाई का आश्वासन देकर जाम खत्म कराया. दलित टोले के लोगों का आरोप था कि एक जाति विशेष के छात्र दलित छात्रों को स्कूल में फर्श पर बैठने को कहते हैं. नीचे नहीं बैठने पर मारपीट पर उतारू हो जाते हैं. मंगलवार को विवाद होने पर देख लेने की धमकी दी गई थी. बुधवार की सुबह 15-20 की संख्या में पहुंचे लोगों ने दलित टोले में घुसकर मारपीट शुरू कर दी. इससे टोले में अफरातफरी मच गई. वहीं दलित छात्रों का आरोप था कि इतना सब कुछ होने के बाद भी स्कूल के शिक्षक इसकी अनदेखी करते हैं. लोगों ने स्कूल के शिक्षक पर भी कार्रवाई की मांग की. वहीं सदर थानाध्यक्ष ने स्कूल पहुंचकर एचएम विनोद कुमार ठाकुर से पूरे मामले की जानकारी ली. एचएम का कहना था कि स्कूल के छात्रों के साथ कुछ बाहरी लड़के भी यहां आकर बैठ जाते हैं. उनकी पहचान नहीं हो पाती है. वे ही स्कूल को बदनाम करने में लगे हैं. छात्रों के साथ भेदभाव की बात से उन्होंने इनकार किया. कहा कि छात्रों को यदि कोई अन्य छात्र परेशान करते हैं तो उन्हें इसकी जानकारी देनी चाहिए थी.

बुद्ध की शिक्षाओं से एशिया का अगुवा बन सकता है भारत

बोधिसत्व भारत रत्न बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर ने सन् 1956 में विजयदशमी के दिन नागपुर में अपने लाखों अनुयायियों के साथ धम्म दीक्षा ली थी. यह वह तारीख थी, जब भारत में धम्म कारवां को नयी गति और दिशा मिली थी. असल में डॉ. आंबेडकर ने अमेरिका के कोलम्बिया विश्वविद्यालय में अपनी पढ़ाई के दौरान यह निष्कर्ष निकाल लिया था कि भारत में प्रचलित जातिगत असमानता दलितों के पिछड़े होने का मुख्य कारण है. 9 मई, 1916 को कोलम्बिया विश्वविद्यालय में आयोजित एक सेमिनार में अपने रिसर्च पेपर ‘भारत में जातियाः उनकी संरचना, उद्भव एवं विकास’ के जरिए डॉ. आंबेडकर ने यह साबित कर दिया था कि कुछ स्वार्थी लोगों ने जातिगत असमानता की व्यवस्था को शास्त्र सम्मत दिखाने की कोशिश की है और ये धारणा फैलाई है कि शास्त्र गलत नहीं हो सकते. भारत लौटने के बाद उन्होंने दलितों के मानवाधिकारों के लिए अलग-अलग मोर्चे पर प्रयास करना शुरू कर दिया. महाड सत्याग्रह द्वारा सार्वजनिक तालाबों से पानी पीने के अधिकार, कालाराम मंदिर में दलितों के प्रवेश का अधिकार, अंग्रेजी सरकार के सामने दलितों के लिए वयस्क मताधिकार का अधिकार, गोलमेज सम्मेलन में पृथक निर्वाचन के अधिकार की लड़ाई ऐसी ही कोशिश थी. इस संघर्ष के दौरान डॉ. आंबेडकर इस निष्कर्ष पर पहुंच चुके थे कि हिन्दू धर्म में रहकर दलितों को राजनैतिक आजादी का अधिकार भले ही मिल जाए लेकिन उनको आर्थिक और सामाजिक बराबरी का हक नहीं मिल सकता. इसलिए 1935 में येवला (नाशिक) में डॉ. आंबेडकर ने घोषणा की थी कि वह हिन्दू धर्म में पैदा हुए थे यह उनके वश की बात नहीं थी लेकिन हिन्दू रहकर वह मरेंगे नहीं, यह उनके वश में है. धर्म परिवर्तन पर विचार करने के लिए 30 एवं 31 मई 1936 को बंबई में आयोजित महार परिषद को संबोधित करते हुए डॉ. आंबेडकर ने कहा थाः -‘धर्म परिवर्तन कोई बच्चों का खेल नहीं है. यह ‘मनुष्य के जीवन को सफल कैसे बनाया जाय’ इस सरोकार से जुड़ा प्रश्न है… इसको समझे बिना आप धर्म परिवर्तन के संबंध में मेरी घोषणा के वास्तविक निहितार्थ का अहसास कर पाने में समर्थ नहीं होंगे. छुआछूत की स्पष्ट समझ और वास्तविक जीवन में इसके अमल का अहसास कराने के लिए मैं आप लोगों के खिलाफ किये जाने वाले अन्याय और अत्याचारों की दास्तान का स्मरण कराना चाहता हूं. सरकारी स्कूलों में बच्चों का दाखिला कराने का हक जताने पर या सार्वजनिक कुंओं से पानी भरने का अधिकार जताने पर या घोड़ी पर दूल्हे को बैठाकर बारात को जुलूस की शक्ल में सार्वजनिक रास्तों से घुमाने के अधिकार आदि का इस्तेमाल करने पर आप लोगों को सवर्ण हिन्दुओं द्वारा मारे-पीटे जाने के उदाहरण तो बहुत आम हैं. लेकिन ऐसी और भी अनेक वजहें हैं जिनके कारण दलितों पर सवर्ण हिन्दुओं द्वारा अत्याचार और उत्पीड़न का कहर ढाया जाता है… खरी बात पूछूं तो बताइये कि इस समय हिन्दुओं और आप लोगों के बीच क्या किसी प्रकार के समाजिक संबंध हैं?’ बाबासाहेब ने आगे कहा, ‘जिस तरह मुसलमान हिन्दुओं से भिन्न हैं; उसी तरह दलित लोग भी हिन्दुओं से नितान्त भिन्न हैं. जिस तरह मुसलमानों और ईसाइयों के साथ हिन्दुओं का रोटी-बेटी का कोई सम्बन्ध नहीं होता है उसी तरह आप लोगों के साथ भी हिन्दुओं का किसी भी प्रकार का रोटी-बेटी का कोई संबंध नहीं है… आपका समाज और उनका समाज दो बिल्कुल अलग-अलग समूह हैं… एक अनजान आदमी तो दलित और सवर्ण के बीच कोई अन्तर कर ही नहीं सकता. सवर्ण हिन्दुओं को जब तक साथ यात्रा कर रहे दलितों की जातियों की जानकारी नहीं होती है तब तक तो यात्रा के दौरान वे बड़े दोस्ताना अंदाज में व्यवहार करते हैं, लेकिन जैसे ही किसी हिन्दू को यह पता चलता है कि वह जिस व्यक्ति से बातचीत कर रहा है वह दलित है; तो उसका मुंह और मन तुरंत कसैला हो जाता है.’ बाबासाहेब ने सवाल उठाते हुए कहा कि आखिर ऐसा क्यों होता है? बाबासाहेब ने कहा, ‘अपने को एक मुसलमान, एक ईसाई, एक बौद्ध या एक सिक्ख कहना एक धर्म का परिवर्तन मात्र नहीं है बल्कि एक नाम का भी परिवर्तन है. यही सच्चा नाम परिवर्तन है… जब तक आप हिन्दू धर्म में बने रहेंगे तब तक आपको अपने जाति नाम को छिपा कर नाम-परिवर्तन करते रहने पर निरन्तर मजबूर होना पड़ेगा… इसलिए मैं आप लोगों से यह पूछता हूं कि बजाय इसके कि आप आज एक नाम बदलें, कल दूसरा नाम बदलें और पेंडुलम की तरह लगातार ढुलमुल हालत में बने रहें, आप लोगों को धर्म परिवर्तन करके अपना नाम स्थाई रूप से क्यों नहीं बदल लेना चाहिये?’ डॉ. आंबेडकर द्वारा कही गई उपरोक्त बातें कमोबेश आज भी उतनी ही सत्य हैं जितनी कि सन् 1935 में थी. एक सवाल यह भी उठता है कि बाबा साहेब ने बौद्ध धर्म ही क्यों अपनाया? असल में 20 वर्षों तक सभी धर्मों का गहन अध्ययन करने के बाद डॉ. आंबेडकर इस निश्चय पर पहुंचे कि बौद्ध धर्म सबसे उपयुक्त है, क्योंकि बौद्ध धर्म का जन्म भारत में ही हुआ है और बौद्ध धर्म समानता, करूणा, मैत्री, अहिंसा और भाई-चारे और वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने का संदेश देता है. इसमें ऊंच-नीच और छुआछूत के लिए कोई जगह नहीं है. जीवन के सभी पहलुओं पर विचार करने के पश्चात डॉ. आंबेडकर ने 5 लाख अनुयायियों के साथ 14 अक्टूबर, 1956 को बौद्ध धम्म की दीक्षा लेकर बौद्धधम्म के प्रचार-प्रसार को नई गति प्रदान की. उन्होंने 22 प्रतिज्ञाओं का एक नया फार्मूला दिया. भगवान बुद्ध ने ढाई हजार साल पहले अषाढ़ पूर्णिमा के दिन धम्म चक्र प्रवर्तन करके धम्म कारवां की शुरूआत की थी. डॉ. आंबेडकर ने सन 1956 में विजयदशमी के दिन अपने लाखों अनुयायियों के साथ धम्म दीक्षा लेकर धम्म चक्र का अनुपर्वतन किया था. धम्म कारवां आज काफी फल-फूल चुका है. 1956 में पांच लाख लोगों की संख्या आज करोड़ों में पहुंच गई है. अंग्रेजी अखबार द टाईम्स ऑफ इंडिया (नई दिल्ली संस्करण,10 नवंबर 2006) में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार भारत वर्ष में सन 2006 में 30 लाख लोगों ने बौद्ध धम्म की दीक्षा ली. 2001 की जनगणना के वक्त बढ़कर यह लगभग 81 लाख हो चुकी थी. जो कि 2011 की आखिरी जनगणना के प्रारंभिक अनुमानों के अनुसार 97 लाख पहुंच गई हैं. हालांकि कुछ विशेषज्ञ भारत में बौद्धों की संख्या 3 करोड़ 50 लाख से भी अधिक मानते हैं. उनका मानना है कि जनगणना में वास्तविक संख्या इसलिए सामने नहीं आ पाती हैं क्योंकि काफी लोग बौद्ध होते हुए भी अपने को आधिकारिक दस्तावेजों में बौद्ध नहीं घोषित करते. अमेरिका और यूरोप में भी बौद्ध धम्म बहुत तेजी से बढ़ती हुई जीवनशैली बनता जा रहा है. जिनेवा आधारित ‘अंतर्राष्ट्रीय धार्मिक व आध्यात्मिक संगठन’ ने 2009 का ‘विश्व के सर्वश्रेष्ठ धर्म का सम्मान’ बौद्ध धम्म को प्रदान किया. बौद्ध धम्म को गतिमान रखने की सीख भगवान बुद्ध से ली जा सकती है. गौतम बुद्ध ने छः वर्षों तक ध्यान साधना किया और विपस्सना का आविष्कार किया. विपस्सना करते-करते 35 वर्ष की उम्र में बुद्धत्व को प्राप्त किया. बुद्धत्व प्राप्त करने के पश्चात 45 वर्षो तक शहरों, गांवों, कस्बों में जा-जाकर धम्म का प्रसार किया. भगवान बुद्ध बोधगया से चलकर सारनाथ आए थे और धम्मचक्र प्रवर्तन किया था. वह इस भरोसे में नहीं बैठे रहे कि लोग बोधगया आए और तब वो उनको धम्म सिखाएं. इसीलिए डॉं. आंबेडकर ने ‘इंगेज्ड बुद्धिज्म’ की परिकल्पना की थी. इस परिकल्पना को पूरी दुनिया में मान्यता मिली है. वियतनाम में भिक्खु संघ ने अमेरिका के आक्रमण के खिलाफ पूरी ताकत से विरोध किया और लोगों के बीच जाकर धर्म का प्रचार-प्रसार किया. ताईवान में बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार में वहां के भिक्खुनी संघ ने अहम भूमिका अदा की है. ताईवान में भिक्खुनी संघ स्कूल भी चलाता है, अस्पताल भी चलाता है और लोगों के घरों में जाकर उनकी समस्याओं का निदान भी करता है. ताईवान के उदाहरण को भारत वर्ष में भी दोहराने की आवश्यकता है. यहां भी भिक्खुओं को लोगों से संपर्क करना होगा. लोगों के बीच जाना होगा. उन्हें यह विचार त्यागना होगा कि लोग उनके पास आएंगे तब वो उन्हें धम्म की शिक्षा और दीक्षा देंगे. इस कड़ी में बौद्ध संस्कृति विकसित करना भी जरूरी है. हर सिक्ख रविवार को अनिवार्य रूप से गुरूद्वारा जाता है, ईसाई चर्च जाते है. हर मुसलमान शुक्रवार की नमाज मस्जिद जाकर अता करता है. बौद्ध समाज के लोगों को भी ऐसी परंपरा डालनी होगी. डॉ. आंबेडकर ने स्वयं बुद्ध पूर्णिमा के दिन अपने आवास को सजाना आरंभ किया और उत्सव मनाने की परंपरा आरंभ की. डॉ. आंबेडकर ने 25 नवंबर, 1956 को सारनाथ के मृगदाय वन में 150 भिक्खुओं के समक्ष भाषण दिया था कि प्रत्येक बौद्ध के लिए अनिवार्य है कि वह हर रविवार को बौद्ध विहार में जाए और वहां उपदेश सुने. यदि ऐसा नहीं होगा तो नव दीक्षित बौद्ध को धम्म की जानकारी नहीं हो सकेगी. प्रत्येक क्षेत्र में ऐसे बौद्ध विहारों का निर्माण किया जाए जिसमें सभा करने के लिए काफी स्थान रहे. बौद्ध विहारों को सभामंदिर होना चाहिए. बौद्ध धम्म के अनुयायियों को उपजातिवाद से भी बचने की जरूरत है. डॉ. आंबेडकर का निष्कर्ष था कि जाति की प्रकृति ही विखण्डन और विभाजन करना है. जातीय भावनाओं से आर्थिक विकास रूकता है. इसलिए डॉ. अंबेडकर का लगातार यह प्रयत्न रहा कि भारत में एक ऐसी सांझी संस्कृति का निर्माण हो जिसमें जात-पात के आधार पर लोगों के साथ अन्याय और शोषण न हो और हर नागरिक अपनी क्षमताओं के अनुसार राष्ट्र निर्माण में योगदान दे सके. आपस में उपजातिवाद छोड़कर एक साझा पहचान जो बौद्ध पहचान है उसको अपनाना चाहिए और आपस में रोटी-बेटी का संबंध कायम करना चाहिए, जिससे कि राष्ट्रीय एकता के विकास में सहायता मिले. डॉ. आंबेडकर चाहते थे कि समाज के सभी वर्गों में खान-पान का संबंध विकसित हो. जो लोग धम्म दीक्षा लेने के बाद भी जाति और उप-जाति बनाए रखना चाहते हैं या जात-पात में विश्वास करते हैं वो बौद्ध धर्म का बहुत बड़ा नुकसान कर रहे हैं क्योंकि इससे बौद्ध धर्म में भी जाति का जहर फैल जाएगा. धम्म कारवां की लोकप्रियता से डरे कुछ लोगों और संगठनों द्वारा अनेकों दुष्प्रचार करने की घटना भी सामने आई हैं. इसमें एक दुष्प्रचार यह किया जा रहा है कि बौद्धधर्म केवल दलित अपना रहे हैं. जबकि हकीकत इससे अलग है. भगवान बुद्ध दलित नहीं थे. उनके प्रथम पांचों शिष्य ब्राह्मण थे. उसके बाद यश और उसके 54 साथी व्यापारी वर्ग से थे. उसके बाद धम्मदीक्षा लेने वाले उरूवेला कश्यप, नदी कश्यप, गया कश्यप और उनके 1000 शिष्य सभी ब्राह्मण थे. राजा बिबिंसार और राजा प्रसेनजित तथा शाक्य संघ के लोग सभी के सभी क्षत्रिय थे. वर्तमान समय में बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले महापंडित राहुल सांस्कृत्यायन, धर्मानंद कौशाम्बी, डी डी कौशाम्बी पूर्व में ब्राह्मण थे. इसी तरह भदन्त आनंद कौशलायन, आचार्य सत्यनारायण गोयनका (परिनिर्वाण प्राप्त), भन्तेसुरई सशई, अमेरिका के मशहूर फिल्म अभिनेता रिचर्ड गेरे, फिल्म प्रोड्यूसर टीना टर्नर कोई भी दलित वर्ग से नहीं है. इसलिए बौद्ध धर्म के विरोधियों के इस मिथ्या प्रचार को कि बौद्ध धर्म दलितों का धर्म होता जा रहा रोका जाना चाहिए. इसी तरह एक प्रचार और किया जा रहा है कि भगवान बुद्ध विष्णु के अवतार थे. ऐसा प्रचार पहले भी होता रहा है. बुद्ध को अवतार मानने की बात सबसे पहले संभवतः छठी सदी के दौरान मत्स्यपुराण में की गई, मत्स्य पुराण का एक चरण 700 ईसवीं में महाबलीपुरम में, जहां मध्यकालीन ब्राह्मण पुस्तकों में 10 अवतारों की संकल्पना की गई है, पल्लव स्मारकों में उत्कीर्ण हैं. इस बिषय में नॉरमन कौसिन्स लिखते हैं कि बौद्ध धर्म का निर्माण होने पर हिन्दू धर्म ने उसके साथ होड़ नहीं लगाई, बल्कि उसे सोख लिया. बुद्ध को अवतार के रूप में शामिल करने का मुख्य उद्देश्य बौद्ध धम्म को अवशोषित (सोख) कर उसका ब्राह्मणीकरण करना था, जिसे ब्राह्मण विरोध करके भी दबा नहीं पाए. इस प्रक्रिया में उन्होंने पशु-हिंसा छोड़कर, शाकाहार के आदर्श को अपना लिया. इस प्रक्रिया की अत्यंत चतुर चाल यह थी कि भगवान बुद्ध को वैदिक साहित्य में विष्णु के नवें अवतार के रूप में जबरन शामिल करना. हालांकि कई विद्वानों ने इस दुष्प्रचार का खंडन किया है. डॉ. एम. एल. जोशी के मुताबिक ‘बुद्ध को विष्णु के अवतार के रूप में प्रचारित करने का सटीक कारण यह है कि बुद्ध का व्यक्तित्व इतना महान था कि उसे नजरअंदाज करना किसी भी सूरत में संभव नहीं था. बुद्ध की भारतीय जनमानस में इतनी गहरी पैठ है कि पूरे देश में असंख्य विहारों के हजारों स्तंभों, दीवारों और दरवाजों पर उत्कीर्ण की गई. उनकी शिक्षाएं लगभग न समाप्त होने वाले पालि और संस्कृत साहित्य के अकूत खजाने के माध्यम से फैलाकर लोकप्रिय की गईं. अनेकों राजाओं और महान चिंतकों ने उनके युक्तिवादी व मानवतावादी मिशन को अत्यधिक ससम्मान से अपनाया. असंख्य भारतीय सदियों से उनकी प्रशंसा का गुणगान करते आ रहे हैं.’ सवाल यह भी उठता है कि अगर बुद्ध को श्रद्धावश विष्णु का अवतार माना गया होता तो यह कैसे संभव है कि कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक और बंगाल से लेकर गुजरात तक हजारों हिन्दू मंदिरों में किसी में भी भगवान बुद्ध की मूर्ति नहीं होती? एक और तथ्य जानने योग्य है. बुद्ध का अर्थ ही होता है कि जन्म-मरण के संसार चक्र से पूरी तरह मुक्त हो जाना. अगर कोई दुबारा जन्म लेता है, तो फिर बुद्ध कैसे हुआ? इसलिए बुद्ध को अवतार बताना उनके बुद्धत्व को नकारना है. 19 नबवंर, 1999 को सारनाथ में विपस्सना के प्रधानाचार्य सत्यनारायण गोयन्का और कांचीकामकोटि पीठम के तत्कालीन शंकराचार्य जयेन्द्र सरस्वती ने संयुक्त रूप से प्रेस विज्ञप्ति जारी करके घोषणा की थी कि बुद्ध विष्णु के अवतार नहीं थे. भगवान बुद्ध ने स्वयं ही अवतार के सिद्धांत को नकारा था. बुद्धत्व प्राप्ति के बाद उन्होंने यह उल्हास भरी घोषणा की थी- ‘अयं अन्तिमा जाति’   (अर्थातः यह मेरा अंतिम जन्म है), ‘नत्थिदानि पुनब्भवोति’ (अर्थात अब मेरा पुनर्जन्म नहीं होगा) धम्म के आम आदमी के जीवन में पड़ते प्रभाव और इसकी वैज्ञानिक जीवन पद्धति को देखकर यह कहा जा सकता है कि धम्म कारवां का भविष्य अत्यंत उज्जवल है. धम्म दीक्षा लेने वालों के जीवन में बहुत परिवर्तन आया है और उनका चहुमुंखी विकास हुआ है.मशहूर समाजशास्त्री डी.एस. जनबन्धू और गौतम गवली द्वारा महाराष्ट्र में किए गए समाजशास्त्रीय सर्वेक्षण के अनुसार जिन लोगों ने धम्म दीक्षा ली उनमें एक नई पहचान और आत्मसम्मान की भावना विकसित हुई, जिससे उनके सामाजिक, आर्थिक और मानसिक स्तर में काफी सुधार आया. एक सर्वे के अनुसार ताईवान में बौद्ध अनुयायियों की संख्या सन् 1980 में 8 लाख थी जो 2001 में बढ़कर 55 लाख और 2006 में बढ़कर 80 लाख हो गई. इस तरह 26 सालों में ताईवान में बौद्ध अनुयायियों की संख्या दस गुणा बढ़ी है. इसी अवधि में ताईवान में बुद्ध विहारों की संख्या 1157 से बढ़कर 4500 और बौद्ध भिक्षुओं की संख्या 3470 से बढ़कर 10 हजार पहुंच गई. ताईवान में भिक्षु और भिक्षुनियां अनेक प्रकार के समाजिक कार्य, स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा जैसे व्यक्ति विकास के काम कर रहे हैं. इसी तरह चीन में बौद्ध धर्म मानने वालों की संख्या 10 करोड़ से भी अधिक हो गई है. थाईलैंड में 90 प्रतिशत से भी अधिक जनसंख्या बौद्ध धर्म मानने वालों की है. यही स्थिति श्रीलंका, म्यामांर और भूटान जैसे देशों की है. भगवान बुद्ध के कारण एशिया के अधिकतर देश भारत को बहुत पवित्र मानते हैं और भारत की यात्रा करना अपना धर्म समझते हैं. जापान, कोरिया, थाईलैंड, चीन, म्यांमार, श्रीलंका, ताईवान सहित अनेकों देशों के करोड़ों लोगों के मन में एक लालसा रहती है कि जीवन में कम से कम एक बार बोधगया, सारनाथ, कुशीनगर, श्रावस्ती, संकिशा और सांची के दर्शन कर पाएं. इसलिए भारतवर्ष के लिए बुद्ध और उनकी शिक्षाओं द्वारा पूरे एशिया का अगुवा बनने का सुनहरा अवसर है. बौद्ध धम्म के अनुयायियों को चाहिए कि जहां-जहां भी संभव हो, बौद्ध विहारों का निर्माण कराया जाए और उसमें गांव और कस्बों के सभी लोगों को शामिल किया जाए क्योंकि बुद्ध की शिक्षाओं की जरूरत सिर्फ दलितों को ही नहीं, बल्कि दुनिया के हर उस व्यक्ति को है, जो अपना कल्याण चाहते हैं और जो दुखों से मुक्त होना चाहते हैं.

कच्चे घड़े पर तरना तो मरने से क्या डरनाः मान्यवर कांशीराम

0
घटना उन दिनों की है, जब साहब नागपुर की रैली के लिए आये थे. रविभवन के सरकारी कॉटेज पर रुके थे. रैली दूसरे दिन दोपहर को होनेवाली थी. अत: आज शाम का समय साहब कार्यकर्ताओं के साथ बातचीत में गुजार रहे थे. उस कमरे में कुछ प्रमुख कार्यकर्ता उपस्थित थे. साहब कार्यकर्ताओं से उनका हालचाल पूछ रहे थे. कुछ पार्टी की बातें तो कुछ अवांतर चर्चा चल रही थी. उस समय कुछ बड़े राजनीतिक नेताओं पर जानलेवा हमले किये जाने की खबरे सुर्ख़ियों में थी. उस समय साहब पुरे देश में बगैर सेक्युरिटी से भ्रमण करते थे. इस बात पर चिंता जताते हुए एक कार्यकर्ता ने साहब से कहा, “साहब! आपको अपनी सुरक्षा पर ध्यान देना चाहिए. वक्त अच्छा नहीं है. सिरफिरे मनुवादी आपको नुकसान पहुंचा सकते हैं” इस पर प्रत्यक्ष जवाब न देते हुए मान्यवर कांशीरामजी ने एक  कहानी सुनायी. वे बोले, “हमारे पंजाब में एक कहावत है, ‘कच्चे घड़े पर तरना तो मरने से क्या डरना’  पंजाब में जो दिवाने युवक होते थे वे अपनी नदी पार रहने वाली प्रेमिका को मिलने के लिए बेसब्र होते थे. उस समय नदी पार करने के लिए आज की तरह बोट आदि साधन नही होते थे. लकड़ी की नौका भी उस समय उपलब्ध नही होती थी. अत: दिवाने युवक नदी पार रहनेवाली अपनी प्रेमिका को मिलने के लिए कुम्हार के मटके का इस्तेमाल किया करते थे. वे कुंभार के आंगन से मटका उठाकर उसको पकड़कर नदी पार करते थे. यह मटका उन्हें डूबने से बचाता था.” “बाबासाहब के मिशन को ईमानदारी से आगे बढ़ाया है मैंने. अब अगर मौत भी आ जाए तो मरने का गम नही होगा.” “मगर कभी-कभी गलती से कच्चा मटका उनके हाथ लग जाता था. दिवानगी की धुन में वे कच्चे मटके की ओर ध्यान नही दे पाते थे. और कच्चे मटके के साथ नदी की धार में कूद जाते थे. जब वे मंझधार में पहुंचते थे तो कच्चे मटके की मिट्टी गलने लगती थी. मटके में पानी भर जाता था और प्रेमिका के मिलन को तरसाने वाला वह युवक नदी में डूब जाता था.” मान्यवर कांशीरामजी ने आगे कहा, “मेरी स्थिति भी कुछ इस प्रकार है!  मैं जिस बहुजन समाज को साथ लेकर सम्पूर्ण परिवर्तन के मकसद की ओर तैर रहा हूं, वह समाज कच्चे मटके की तरह है. हमारा समाज आज भी गरीब, निरक्षर और नादान है. अपने अच्छे-बुरे की उसे पहचान नहीं है. कर्तव्य के प्रति वह कठोर नहीं है. जल्द ही मनुवादियों की लालच में आ जाता है. संकुचित स्वार्थ के खातिर आपस में टूट जाता है. ऐसे समाज को साथ लेकर मै तैर रहा हूं. मैंने अपना पूरा जीवन दांव पर लगाया है. मेरी हिफाजत करने की जिम्मेदारी मेरे समाज की है. मगर मेरा समाज आज इस बात के प्रति भी अनजान है. उसमें जागृति का अभाव है. ऐसे में कभी भी मेरे साथ धोखा हो सकता है. मगर मुझे अब इसकी परवाह नहीं है. क्योंकि नदियां पार करने की धुन मेरे सिर पर सवार है. अब किनारा पार करूं या मंझधार में खो जाऊ. मुझे इसकी चिंता नही है.” सब कार्यकर्ता गम्भीरता से साहब की बात सुन रहे थे. साहब बोलते जा रहे थे… उन्होंने आगे कहा, “साथियों, वैसे तो मैंने काफी अंतर तैर लिया है. काफी अंतर पार कर चूका हूं. जो लक्ष्य पाना चाहता था उसके करीब पहुंच चुका हूं. इस देश के बहुजन समाज को काफी आगे बढ़ाया है मैंने. उनके पैरों में चलने की ताकत पैदा कर दी है. बाबासाहब के मिशन को ईमानदारी से आगे बढ़ाया है मैंने. अब अगर मौत भी आ जाए तो मरने का गम नही होगा.” कहते-कहते साहब अचानक भावविभोर हो गये. अनायास उनकी आंखों में आंसू तैरने लगे. उनके साथ सारे कार्यकर्ताओं की आंखे भर आयी.

क्रिकेट में दलित हिस्सेदारी

ब्रिटिश शासन के समय क्रिकेट के इतिहास में भारतीयों की हिस्सेदारी जितनी अजीबोगरीब तरीके से हुई, उतने ही अजीबोगरीब तरीके से क्रिकेट में राजनीति की घुसपैठ से परिस्थितियों का निर्माण होने लगा था. माना जा सकता है कि क्रिकेट खिलाड़ियों में भयंकर प्रतिस्पर्धा होने पर प्रतिभा का हनन हुआ, लेकिन उस प्रतिस्पर्धा की आग में राजनीति ने जो घी का काम किया वह क्रिकेट के इतिहास का दुखद पहलू था. क्रिकेट के खेल में विश्व में भारतीयों द्वारा अर्जित ख्याति के बावजूद इस सांप-सीढ़ी के खेल में जहां कुछ को ख्याति के साथ अकूत धन-दौलत मिली, वहीं कुछ के हिस्से में विफलता के साथ गुमनामी आई. पर राजनीति के साथ जब जाति का तड़का भी लगना शुरू हुआ तो उन नायकों को अंधेरे में धकेल दिया गया, जिन्हें आज सुनील गावसकर और तथाकथित भगवान सचिन तेंदुलकर भी न जानते होंगे. क्रिकेट के द्विज समीक्षाकार और इतिहासकारों को तो इस बारे में कुछ मालूम ही न होगा. इसलिए क्रिकेट के ऐसे सवर्ण जानकारों में अधिकतर ने सोचा ही न होगा कि केंद्र से हाशिये पर गया क्या कभी कोई दलित क्रिकेटर इतना प्रतिभाशाली हो सकता है, जिसके बारे में 1913 में हिंदू टीम का कप्तान बनाए जाने के विशेष सम्मान से जुड़े अभिनंदन समारोह में खुद एमडी पै ने कहा था, ‘कप्तानशिप का यह सम्मान तो टीम में वरिष्ठ और अनुभवी खिलाड़ी मेरे मित्र पी बालू को दिया जाना चाहिए.’ इसे उदारता कहें या कुटिलता, हम इस बहस में नहीं पड़ेंगे. पर इतना अवश्य कहना चाहेंगे कि 1913 से पूर्व और बाद में भी क्रिकेटर एमडी पै की इस भावना को ईमानदारी से हिंदुओं ने नहीं लिया. हिंदू जिमखाना, बंबई के वकील और व्यापारियों ने तो इस उदारता में बिल्कुल हिस्सेदारी नहीं निभाई. एक ब्राह्मण ‘पै’ के स्थान पर दलित जाति का कोई व्यक्ति यानी पालवंकर बालू हिंदू टीम का नेतृत्व करे, यह बात किसी को सहन नहीं थी. ऐसे समय पालवंकर बालू को एक अनिच्छुक विद्रोही भी कहा जा सकता है. इसलिए कि उन्होंने खुले रूप में अपने दावे का इजहार नहीं किया था. लेकिन बरस-दर-बरस प्रतीक्षा के बाद 1920 में पी बालू ने शालीनतापूर्वक एक पत्रकार से बातचीत के दौरान कहा था कि एक वर्ष के लिए ही सही, टीम का नेतृत्व उन्हें दे दिया जाए. हिंदू टीम को दी गई उनकी सेवाओं के बदले यह एक पुरस्कार ही होगा. आइए देखते हैं कि जिस हिंदू टीम को यश और सम्मान दिलाने में एक दलित क्रिकेटर पी बालू ने अपनी पूरी जिंदगी लगा दी, उसके साथ हिंदू टीम और उनके खैरख्वाहों का कैसा व्यवहार रहा. गांधीजी इस घटनाचक्र में कैसे आए! भारत में आरंभिक दौर में अंग्रेज ही क्रिकेट खेलते थे. उस समय हिंदू खिलाड़ियों को किक्रेट खेलने की मनाही थी. बाद के दस वर्षों तक भारतीयों ने क्रिकेट खेलने के लिए आंदोलन भी चलाया, जिसमें वे सफल हुए. क्रिकेट के इतिहास में इसे नस्लीय आधार पर सफलता भी कहा जा सकता है. बालू चमार जाति से थे. उनका जन्म 1875 में धारवाड़ में हुआ था. वहां से उनका परिवार पुणे आ गया और उनके पिता को बंदूकों और कारतूसों की सफाई करने का काम मिल गया. बालू की योग्यता को सबसे पहले पुणे जिमखाना के ब्रिटिश सदस्य ने खोज निकाला, जहां वे नौकर के रूप में कार्यरत थे. यही वह समय था जब बालू और उनके भाई शिवराम को क्रिकेट सीखने का अवसर मिला. बालू को क्रिकेट क्लब में नौकरी भी मिल गई. पगार थी तीन रुपए माहवार. एक बार ऐसा हुआ कि जब अंग्रेज क्रिकेट मैदान में अभ्यास कर रहे थे तो ऐसे ही बालू ने बॉलिंग की, जो अपने आप में जबर्दस्त थी. वही घटना बालू के जीवन में ऐतिहासिक घटना बन गई. प्रतिस्पर्धी दक्खन जिमखाना को क्रिकेट के इतिहास में इस महत्त्वपूर्ण घटना का पता लगने में देर नहीं हुई. तथाकथित उच्च समाज के लोग बालू के पास दौड़े-दौड़े आए. उस समय दक्खन जिमखाना के ब्राह्मण पुणे जिमखाना में ब्रिटिश क्रिकेट टीम को हराना चाहते थे. इसलिए उन्होंने पी. बालू को अपनी टीम में शामिल करने का प्रस्ताव रखा. बालू ने उसे सहर्ष स्वीकार कर लिया. हालांकि ब्रिटिश टीम के साथ उस समय पारसी टीम भी थी. इसे दलित क्रिकेट खिलाड़ी की देशभक्ति की भावना भी कहा जा सकता है. बालू के भीतर सृजन था और संघर्ष भी. एक दलित को अवसर मिला तो वह प्रगति के मार्ग पर बढ़ता गया. सवर्ण जाति के अन्य खिलाड़ी भी उसकी ‘बॉलिंग प्रतिभा’ के कायल हो गए. बालू की प्रतिभा की चर्चा दूर-दूर तक हो गई. हिंदू जिमखाना, बंबई के प्रत्येक सदस्य उस ‘दलित बॉलर’ के बारे में जानने-पहचानने लगे थे. उनके भीतर जिज्ञासा थी और ईर्ष्या भी. जल्दी ही कुछ गुजराती सदस्यों ने उसे अपनी टीम में भर्ती कर लिया. इस समय बालू के साथ उनके छोटे भाइयों शिवराम, गणपत और विट्ठल भी थे. क्रिकेट उस परिवार को जैसे सुखद उपहार में मिला था. फरवरी 1906 में पी बालू और शिवराम ने यूरोपीय क्रिकेट खिलाड़ियों पर अपनी जीत लेते हुए एक कीर्तिमान स्थापित किया. एक भारतीय समाज सुधारक ने इसे निम्न जाति के क्रिकेटर के प्रति हिंदू उदारवाद की संज्ञा देते हुए कहा था, ‘प्राचीन अलगाव और जातिसत्व से अलग करने वाले रिवाजों से मुक्तिदाता के रूप में राष्ट्र के लिए यह महत्त्व की बात है. विशेष रूप में नैतिक व्यवस्थित स्वतंत्रता की दिशा में यह स्वैच्छिक परिवर्तन की भावना है.’ तब के सभी राष्ट्रीय अखबारों की रिपोर्टिंग देखें तो पी बालू को प्रसिद्ध हिंदू क्रिकेटर के रूप में प्रतिभावान शख्सियत लिखा गया है, जिसे खुद एक दलित ने स्वीकार भी किया, लेकिन क्या हिंदू उसे ऐसा सम्मान दे पाए, जैसा बालू और उनके भाई ने क्रिकेट को दिलाया. 1910 से 1920 के बीच वार्षिक टूर्नामेंट के अवसर पर हर वर्ष पी बालू को क्रिकेट टीम का कप्तान बनाए जाने का अभियान कुछ प्रगतिशील हिंदुओं द्वारा छेड़ा जाता था, लेकिन रूढ़िवादी हिंदू कतई यह बर्दाश्त नहीं करते थे कि हिंदू टीम एक दलित के नेतृत्व में चले. यहां यह बताना जरूरी है कि उसी दौरान गांधी राष्ट्रीय फलक पर ‘छुआछूत’ विषय को लेकर लगभग छा चुके थे. समाज परिवर्तन को लेकर हिंदू समाज पर पूरे देश में प्रगतिशील लोगों का दबाव बढ़ रहा था. वहीं अमेरिका, लंदन और जर्मनी से उच्च डिग्रियों और उपाधियों के साथ लौट कर डॉ आंबेडकर ने 25 जून, 1923 में बंबई उच्च न्यायालय में वकालत की अनुमति पाने के संदर्भ में आवेदन किया था. बालू इस समय शीर्ष पर थे. उनकी प्रतिभा और ख्याति के किस्से दलितों के साथ गैर-दलितों के बीच में कहे-सुने जाते थे. आंबेडकर अपनी सभाओं में बालू के बारे में बताते थे. इतिहास के कड़वे सच के साथ एक अच्छी बात यह भी हुई कि बालू को कप्तान बनाने के दबाववश हिंदू जिमखाना के प्रगतिशील लोगों ने समझदारी से काम लिया और पालवंकर बालू को क्रिकेट टीम का उप-कप्तान बना दिया. हिंदू टीम में सद्भावना का विकास हुआ. तीन वर्षों बाद बालू के छोटे भाई विट्ठल को कप्तान बनाया गया. यह ऐतिहासिक वर्ष था, जब हिंदू टीम में किसी दलित को कप्तान बनाया गया. जोश और उत्साह के साथ बालू बंधुओं ने यूरोपियंस टीम के साथ मैच खेला और वे जीते. अंग्रेजों की टीम के खिलाफ हिंदू टीम विजयी हुई. इन्हीं दिनों गांधीजी ने नारा दिया- छुआछूत का उन्मूलन स्वराज के पथ पर प्रशस्त होगा. यह उनकी राष्ट्रीय घोषणा भी थी. हिंदू क्रिकेट टीम की उपलब्धियों का सेहरा बालू के भाई विट्ठल के सिर पर बांध दिया गया था. जोश और उत्साह में क्रिकेट प्रेमी उन्हें कंधों पर उठाए हुए थे. चारों तरफ परिवेश में हुर्रा कप्तान विट्ठल के नारे गूंज रहे थे. जैसे सभी जाति-द्वेष भूल गए हों. 1929 में जब विट्ठल का कैरिअर समाप्त होने को था तब बंबई के एक लेखक ने लिखा था, ‘तीस वर्षों में बालू और उनके भाइयों ने जो कर दिखाया, वह आश्चर्यजनक था. हिंदू क्रिकेट के इतिहास में उनका योगदान सुनहरे पृष्ठों पर अंकित होगा. तीस वर्षों में एक ही परिवार की इतनी सारी उपलब्धियां! अब तक भारत के भीतर और बाहर क्रिकेट के इतिहास में ऐसा कीर्तिमान स्थापित नहीं हुआ था.’ बंगलुरु के समाजशास्त्री रामचंद्र गुहा ने पी बालू को डब्ल्यूजी ग्रेस के समांतर बताया है, जिन्होंने भारत में क्रिकेट का विकास किया था. सामाजिक संदर्भों में पी बालू की उपलब्धियों को अमेरिका के बेसबाल के प्रथम अश्वेत खिलाड़ी जेकी रॉबिनसन के समकक्ष रखा जा सकता है, जिन्होंने पहले की अभेद्य सामाजिक बाधाओं को खेल के माध्यम से तोड़ा था. इतनी सब उपलब्धियां किसी देश और समाज को देने के बावजूद पी बालू के हिस्से में क्या आया? हश्र लगभग वैसा ही हुआ. शोधार्थियों की जानकारी के लिए हम बता दें कि पी बालू की मृत्यु 1955 में हुई थी. वे डॉ. आंबेडकर से पहले पैदा हुए थे और मृत्यु भी उनकी उनसे पूर्व ही हो गई. महत्त्वपूर्ण बात है कि पी बालू गांधीवादी थे. दूसरे, वे डॉ. आंबेडकर के विरोध में ही चुनाव में खड़े हुए थे. तीसरे 1932 में आंबेडकर-गांधी के बीच जो पूना समझौता हुआ, उस पर हस्ताक्षर करने वालों में वे भी एक थे. इतना तो कहना होगा कि इतिहास अपने आप में दोहराया जाता है. उदाहरण के लिए, सचिन तेंदुलकर के बचपन के दोस्त, 19 फरवरी, 1993 को इंग्लैंड के खिलाफ वानखेड़े स्टेडियम, मुंबई में दोहरा शतक बनाने वाले, फिर 13 मार्च, 1993 को जिंबाब्वे के खिलाफ, फिरोज शाह कोटला, दिल्ली में एक हजार टेस्ट रन पूरा करने वाले विनोद कांबली आज क्रिकेट के इतिहास में कहां हैं! हालांकि सचिन के साथ ही कांबली ने कभी सेंट जेवियर स्कूल, फोर्ट मुंबई के खिलाफ 664 रन बनाए थे. लेकिन आज उनके हिस्से में क्या है? अठारह जनवरी, 1972 को कांजूर मार्ग, मुंबई में पैदा हुए विनोद कांबली के बारे में कहा जाता है कि ऊंची इमारतों से घिरे संकरे स्थान पर वे क्रिकेट खेला करते थे. फिर भी उनकी गेंद ऊंची जाती थी, लेकिन वे उतना ऊंचा नहीं उठ सके, जितना उनके दोस्त सचिन तेंदुलकर. बात कुछ भी हो, कारण कुछ भी हो, पर उनके जीवन में भी लगभग पी बालू जैसा ही हुआ. सितंबर 2010 में वे ईसाई बन गए. क्रिकेट से फिल्म, फिल्म से राजनीति, राजनीति से टीवी कमेंट्रेटर, दुखद परिस्थितिवश वे बदलते गए, पर क्या क्रिकेट के रहनुमा बदले? साभारः जनसत्ता

देश में हॉकी को स्टार खिलाड़ी देने वाला कोच, गलियों में बेच रहा है स्पोर्ट्स किट्स

0
गोरखपुर। देश को हॉकी के लिए कई राष्‍ट्रीय और अंतरराष्‍ट्रीय खिलाड़ी देने वाले गोरखपुर के इमरान की जिंदगी खेल के मैदान से निकल सड़कों पर आकर ठहर गई है. जो अब दो जून की रोटी की जुगाड़ में घर-घर जाकर स्पोर्ट्स किट्स बेचने को मजबूर है. पूर्वांचल की माटी से देश के लिए हॉकी को 8 अंतरराष्‍ट्रीय और 50 से अधिक राष्‍ट्रीय खिलाड़ी देने का गौरव हासिल है. इन्‍होंने भारतीय महिला हॉकी टीम की उप कप्तान रहीं निधि खुल्‍लर, संजू ओझा, रजनी चौधरी, रीता पांडेय, प्रवीन शर्मा, सनवर अली, जनार्दन गुप्‍ता और प्रतिभा चौधरी जैसे कई खिलाड़ियों को हॉकी की ट्रेनिंग दी है. बता दें, कि 1973 में रोजी रोटी की तलाश में इमरान गोरखपुर आ गए. यहां के खाद्य कारखाने में स्‍पोटर्स कोटे से नौकरी मिल गई.जहां उन्होंने नौकरी के साथ हॉकी की ट्रेनिंग देना भी जारी रखा. लेकिन अचानक 31 दिसंबर 2002 में खाद्य कारखाना बंद हो गया और नौकरी चली गई. इमरान ने बताया कि उन्हें भारत सरकार की तरफ से 900 रूपए पेंशन मिलता है, लेकिन आज की महंगाई में इतने कम पैसे में क्या घर की दाल रोटी चल सकती है. वहीं हमने खिलाड़ियों के लिए लोअर बनाने का कारखाना शुरू किया, लेकिन पैसे के अभाव में यह भी बंद हो गया. आज के दौर में ये हौनहार कोच घर-घर जाकर स्‍पोर्ट किट बेचते हैं. वैसे ज्यादारतर किट वहां ले जाकर बेचते हैं, जहां कोई टूर्नामेंट हो रहा होता है. किट बेचने पर कमीशन मिलता है. जिससे वो अपने परिवार की जिंदगी की डगर को धक्का दे रहे हैं. इमरान के परिवार में एक बेटा और एक बेटी है. बेटा आमिर प्राइवेट फर्म में 6 हजार की नौकरी करता है, तो दूसरी तरफ बेटी उज्‍मा की पढ़ाई पैसों की वजह से पूरी न‍हीं हो पाई.