हर युद्ध,गृहयुद्ध की कीमत जैसे देश काल परिस्थिति निर्विशेष स्त्री को ही चुकानी पड़ती है, उसी तरह दुनिया में कहीं भी युद्ध हो तो उससे आखिरकार हिमालय लहूलुहान होता है. उत्तराखंड के कुमायूं गढ़वाल रेजीमेंट या डोगरा रेजीमेंट,नगा रेजीमेंट या असम राउफल्स सबसे कठिन युद्ध परिस्थितियों का मुकाबला तो करती ही है, गोरखा रेजीमेंट की टुक़ड़ियां अब भी ब्रिटिश सेना में शामिल है. हाल के खाड़ी युद्ध और अफगानिस्तान युद्ध में भी हिमालय जख्मी हुआ है, बाकी युद्ध, गृहयुद्ध का मतलब सौ बेटों की मृत्यु का सामना करने वाली माता गांधारी का शोक है या फिर कुरुक्षेत्र का शाश्वत विधवा विलाप है.
हम अपने बेटों को शहीद बनाने पर आमादा क्यों हैं? बंद ताबूत में तिरंगे में लिपटी अनगिनत लाशें हमारी देशभक्ति के लिए इतना अनिवार्य क्यों है? साठ के दशक में हरित क्रांति के बावजूद हालात भुखमरी हुई थी. तबसे लेकर भूख का भूगोल बढ़ती हुई जनसंख्या के साथ लगातार सीमाओं के आर-पार इस खंडित महादेश का सबसे बड़ा सच है. इस भूख के खिलाफ सही मायने में अभी कोई लड़ाई शुरु हो नहीं पायी है. आम जनता के हकहकूक के लिए कहीं कोई मोर्चा नहीं है. 1971 में भारत-पाक युद्ध के नतीजे से सिर्फ बांग्लादेश आजाद हो गया, ऐसा नहीं है. खुला युद्ध फिर नहीं हुआ, सच है लेकिन हम लगातार पाकिस्तान और चीन के साथ छायायुद्ध लड़ रहे हैं. शहादतों का सिलसिला कभी थमा ही नहीं. उसी युद्ध के नतीजे के तहत समूचा अस्सी के दशक में पूरा देश गृहयुद्ध की आग में जलता रहा और सिखों का नरसंहार के साथ साथ गुजरात नरसंहार तक नरसंहारों का अटूट सिलसिला हमारे अंध राष्ट्रवाद का अखंड युद्धोन्माद है. यही सियासत है और मजहब भी यही है.
1962 में हम चीन से युद्ध हार गये, तब भी हिमालय सबसे ज्यादा लहूलुहान हुआ. उस युद्ध के बाद हमारी समूची उत्पादन प्रणाली और अर्थव्यवस्था बदल गयीं. आम जनता की बुनियादी जरुरतों और बुनियादी सेवाओं को नजरअंदाज करते हुए तब से लेकर आज तक हम लगातार युद्धाभ्यास कर रहे हैं. हमने इस युद्धोन्माद की वजह से समूचे देश को परमाणु चूल्हों के हवाले कर दिया है. हमारे बजट में रक्षा और आंतरिक सुरक्षा पर भारी खर्च और राष्ट्रवाद, देशभक्ति की पवित्र संवेदनशील भावनाओं की आड़ में सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार हो रहा है. इसी अंध राष्ट्रवाद की लहलहाती फसल कालाधन है जो विदेशी बैंकों में जमा है और किसी अपराधी के किलाफ जांच इसलिए नहीं हो सकती के यह कालाधन रक्षा घोटालों का है. युद्ध परिस्थितियों में आपातकाल के समय अभिव्यक्ति की कोई स्वतंत्रता नहीं होती है और अंध राष्ट्रवाद में विवेक कहीं खो जाता है. इसलिए रक्षा घोटालों में अब तक किसी को सजा हुई नहीं है.
अमेरिका के युद्धों में भी वहां के राजनेता और राष्ट्रनेता अरबों की सौदेबाजी करते रहे हैं. हाल में इसके तमाम खुलासा हुए है कि कैसे निजी और कारपोरेट हित में सिर्फ अमेरिका को नहीं, सिर्फ नाटो को नहीं, पूरी दुनिया को अमेरिकी राष्ट्रपतियों ने युद्ध के हवाले किया है. मसलन तेल युद्ध का सच अब जगजाहिर है. अमेरिकी राष्ट्रवाद की आड़ में वहां की अर्थव्यवस्था बाकायदा युद्धक अर्थ व्यवस्था है. दुनियाभर में युद्ध और गृहयुद्ध में अमेरिकी हित निर्णायक होते रहे हैं. बाकी दुनिया की तरह इस महादेश के तमाम युद्धों और गृहयुद्धों की जड़ में वही अमेरिकी हित हैं जो सभी पक्षों को युद्ध गृहयुद्ध का जरुरी ईंधन समान भाव से मुहैय्या कराता है और अल कायदा, तालिबान और आइसिस अमेरिकी अवैध संताने हैं. इस महादेश के राष्ट्रनेताओं के कारनामों का खुलासा हो, हमारे कारपोरेट लोकतंत्र में इसकी कोई संभावना नहीं है. हमने उसी अमेरिका के साथ परमाणु संधि करके और फिर रक्षा क्षेत्र में विदेशी निवेश का जो रास्ता तैयार कर दिया है, उसकी नियति फिर युद्ध है क्योंकि रक्षा क्षेत्र में निजी, कारर्पोरेट और विदेशी हितों के समरस समावेश से हमारी अर्थव्यवस्था भी अब युद्धक अर्थव्यवस्था बन गई है.
गौर कीजिये, भारत में मौजूदा युद्धोन्माद कितना प्रायोजित है. हम पाकिस्तान के प्रति भारत की घृणा या कश्मीर मसले के मजहबी सियासत या सियासती मजहब की चर्चा यहां नहीं कर रहे हैं और यह भी नहीं कह रहे हैं कि इन युद्ध परिस्थितियों का आने वाले चुनावों में राजनीतिक परिणाम किसके हित में निकलेंगे. मसलन यूपी,पंजाब और उत्तराखंड में क्या क्या हो सकता है? मसला यह है कि कार्पोरेट हितों से प्रायोजित इस युद्धोन्माद का मुक्तबाजारी अर्थव्यवस्था से कितना और किस हद तक संबंध है सियासत और मजहब की बातें छोड़ दें तो शायद हम निरपेक्ष विवेक से इस युद्धोन्माद के औचित्य की विवेचना कर सकते हैं कि कैसे उपभोक्ता सामग्री की तरह हमारे शहीद बेटों की शहादत का इतने व्यापक पैमाने पर सुनियोजित विज्ञापन दसों दिशाओं में हो रहा है ताकि हमारे जो बेटे अब तक शहीद न हुए हों, वे शहीद बना दिये जा सकें. हमारा राष्ट्रवाद उसी कारर्पोरेट विज्ञापन अभियान का अभिन्न हिस्सा है.
कहने को भारत की तरह पाकिस्तान में लोकतंत्र है और वहां भी चुनाव होते हैं. हम पाकिस्तान को आतंकवादी या फौजी हुकूमत कहने को आजाद हैं. हम कश्मीर मसले पर सीधे पाकिस्तान को जिम्मेदार ठहरा कर बाकी सारा किस्सा नजरअंदाज कर सकते हैं. चूंकि दो राष्ट्र सिंद्धांत के तहत देश का बंटवारा हुआ और पाकिस्तान इस्लामी राष्ट्र बना लेकिन भारत तो हिंदू राष्ट्र नहीं है, हम यह अब दावे के साथ नहीं कह सकते. राजनीतिक समीकरण बेहद आसान है और राष्ट्रवाद सीमाओं के आर पार उसी भारत विभाजन की विरासत है, जिसे हम जुए की तरह पिछले सात दशकों से ढो रहे हैं और अपनी आजाद जिंदगी की नई शुरुआत कर ही नहीं सके हैं. जितना युद्धोन्माद भारत में है, उससे कम पाकिस्तान में नहीं है. भारत के मुकाबले पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था की हालत बेहद संगीन है. उत्पादन में हो न हो, हथियारों की पारमाणविक दौड़ में पाकिस्तान किसके दम पर भारत की बराबरी कर रहा है, उस पर सिलसिलेवार गौर करने की जरुरत है क्योंकि सबसे बड़े उस दुश्मन के हवाले हमने अपनी रक्षा और आंतरिक सुरक्षा दोनों सौंप दिये हैं.
सियासत और मजहब से के तंग दायरे से निकलकर इस युद्धोन्माद की युद्धक अर्थव्यवस्था और उसके कारर्पोरेट दांव को समझें और फिर यह विवेचना भी कर लें कि हम अपने बेटों को शहीद बनाने पर आमादा क्यों हैं? सबसे मुश्किल यह है कि इस महादेश में वियतनाम युद्ध विरोधी या इराक अफगानिस्तान युद्ध विरोधी किसी आंदोलन की कोई गुंजाइश नहीं है. हमारे पास बंद ताबूत में तिरंगे में लिपटी अपने बेटों की लाशों के इंतजार के सिवाय फिलहाल कोई दूसरा विकल्प नहीं है और बहुसंख्य जनती उसी शहादत की जमीन पर युद्धोन्माद का यह कारर्पोरेट जश्न मना रहा है. अंधराष्ट्रवाद और भ्रष्टाचार के दौर में शहीद होते जवान!
हर युद्ध,गृहयुद्ध की कीमत जैसे देश काल परिस्थिति निर्विशेष स्त्री को ही चुकानी पड़ती है, उसी तरह दुनिया में कहीं भी युद्ध हो तो उससे आखिरकार हिमालय लहूलुहान होता है. उत्तराखंड के कुमायूं गढ़वाल रेजीमेंट या डोगरा रेजीमेंट,नगा रेजीमेंट या असम राउफल्स सबसे कठिन युद्ध परिस्थितियों का मुकाबला तो करती ही है, गोरखा रेजीमेंट की टुक़ड़ियां अब भी ब्रिटिश सेना में शामिल है. हाल के खाड़ी युद्ध और अफगानिस्तान युद्ध में भी हिमालय जख्मी हुआ है, बाकी युद्ध, गृहयुद्ध का मतलब सौ बेटों की मृत्यु का सामना करने वाली माता गांधारी का शोक है या फिर कुरुक्षेत्र का शाश्वत विधवा विलाप है.
हम अपने बेटों को शहीद बनाने पर आमादा क्यों हैं? बंद ताबूत में तिरंगे में लिपटी अनगिनत लाशें हमारी देशभक्ति के लिए इतना अनिवार्य क्यों है? साठ के दशक में हरित क्रांति के बावजूद हालात भुखमरी हुई थी. तबसे लेकर भूख का भूगोल बढ़ती हुई जनसंख्या के साथ लगातार सीमाओं के आर-पार इस खंडित महादेश का सबसे बड़ा सच है. इस भूख के खिलाफ सही मायने में अभी कोई लड़ाई शुरु हो नहीं पायी है. आम जनता के हकहकूक के लिए कहीं कोई मोर्चा नहीं है. 1971 में भारत-पाक युद्ध के नतीजे से सिर्फ बांग्लादेश आजाद हो गया, ऐसा नहीं है. खुला युद्ध फिर नहीं हुआ, सच है लेकिन हम लगातार पाकिस्तान और चीन के साथ छायायुद्ध लड़ रहे हैं. शहादतों का सिलसिला कभी थमा ही नहीं. उसी युद्ध के नतीजे के तहत समूचा अस्सी के दशक में पूरा देश गृहयुद्ध की आग में जलता रहा और सिखों का नरसंहार के साथ साथ गुजरात नरसंहार तक नरसंहारों का अटूट सिलसिला हमारे अंध राष्ट्रवाद का अखंड युद्धोन्माद है. यही सियासत है और मजहब भी यही है.
1962 में हम चीन से युद्ध हार गये, तब भी हिमालय सबसे ज्यादा लहूलुहान हुआ. उस युद्ध के बाद हमारी समूची उत्पादन प्रणाली और अर्थव्यवस्था बदल गयीं. आम जनता की बुनियादी जरुरतों और बुनियादी सेवाओं को नजरअंदाज करते हुए तब से लेकर आज तक हम लगातार युद्धाभ्यास कर रहे हैं. हमने इस युद्धोन्माद की वजह से समूचे देश को परमाणु चूल्हों के हवाले कर दिया है. हमारे बजट में रक्षा और आंतरिक सुरक्षा पर भारी खर्च और राष्ट्रवाद, देशभक्ति की पवित्र संवेदनशील भावनाओं की आड़ में सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार हो रहा है. इसी अंध राष्ट्रवाद की लहलहाती फसल कालाधन है जो विदेशी बैंकों में जमा है और किसी अपराधी के किलाफ जांच इसलिए नहीं हो सकती के यह कालाधन रक्षा घोटालों का है. युद्ध परिस्थितियों में आपातकाल के समय अभिव्यक्ति की कोई स्वतंत्रता नहीं होती है और अंध राष्ट्रवाद में विवेक कहीं खो जाता है. इसलिए रक्षा घोटालों में अब तक किसी को सजा हुई नहीं है.
अमेरिका के युद्धों में भी वहां के राजनेता और राष्ट्रनेता अरबों की सौदेबाजी करते रहे हैं. हाल में इसके तमाम खुलासा हुए है कि कैसे निजी और कारपोरेट हित में सिर्फ अमेरिका को नहीं, सिर्फ नाटो को नहीं, पूरी दुनिया को अमेरिकी राष्ट्रपतियों ने युद्ध के हवाले किया है. मसलन तेल युद्ध का सच अब जगजाहिर है. अमेरिकी राष्ट्रवाद की आड़ में वहां की अर्थव्यवस्था बाकायदा युद्धक अर्थ व्यवस्था है. दुनियाभर में युद्ध और गृहयुद्ध में अमेरिकी हित निर्णायक होते रहे हैं. बाकी दुनिया की तरह इस महादेश के तमाम युद्धों और गृहयुद्धों की जड़ में वही अमेरिकी हित हैं जो सभी पक्षों को युद्ध गृहयुद्ध का जरुरी ईंधन समान भाव से मुहैय्या कराता है और अल कायदा, तालिबान और आइसिस अमेरिकी अवैध संताने हैं. इस महादेश के राष्ट्रनेताओं के कारनामों का खुलासा हो, हमारे कारपोरेट लोकतंत्र में इसकी कोई संभावना नहीं है. हमने उसी अमेरिका के साथ परमाणु संधि करके और फिर रक्षा क्षेत्र में विदेशी निवेश का जो रास्ता तैयार कर दिया है, उसकी नियति फिर युद्ध है क्योंकि रक्षा क्षेत्र में निजी, कारर्पोरेट और विदेशी हितों के समरस समावेश से हमारी अर्थव्यवस्था भी अब युद्धक अर्थव्यवस्था बन गई है.
गौर कीजिये, भारत में मौजूदा युद्धोन्माद कितना प्रायोजित है. हम पाकिस्तान के प्रति भारत की घृणा या कश्मीर मसले के मजहबी सियासत या सियासती मजहब की चर्चा यहां नहीं कर रहे हैं और यह भी नहीं कह रहे हैं कि इन युद्ध परिस्थितियों का आने वाले चुनावों में राजनीतिक परिणाम किसके हित में निकलेंगे. मसलन यूपी,पंजाब और उत्तराखंड में क्या क्या हो सकता है? मसला यह है कि कार्पोरेट हितों से प्रायोजित इस युद्धोन्माद का मुक्तबाजारी अर्थव्यवस्था से कितना और किस हद तक संबंध है सियासत और मजहब की बातें छोड़ दें तो शायद हम निरपेक्ष विवेक से इस युद्धोन्माद के औचित्य की विवेचना कर सकते हैं कि कैसे उपभोक्ता सामग्री की तरह हमारे शहीद बेटों की शहादत का इतने व्यापक पैमाने पर सुनियोजित विज्ञापन दसों दिशाओं में हो रहा है ताकि हमारे जो बेटे अब तक शहीद न हुए हों, वे शहीद बना दिये जा सकें. हमारा राष्ट्रवाद उसी कारर्पोरेट विज्ञापन अभियान का अभिन्न हिस्सा है.
कहने को भारत की तरह पाकिस्तान में लोकतंत्र है और वहां भी चुनाव होते हैं. हम पाकिस्तान को आतंकवादी या फौजी हुकूमत कहने को आजाद हैं. हम कश्मीर मसले पर सीधे पाकिस्तान को जिम्मेदार ठहरा कर बाकी सारा किस्सा नजरअंदाज कर सकते हैं. चूंकि दो राष्ट्र सिंद्धांत के तहत देश का बंटवारा हुआ और पाकिस्तान इस्लामी राष्ट्र बना लेकिन भारत तो हिंदू राष्ट्र नहीं है, हम यह अब दावे के साथ नहीं कह सकते. राजनीतिक समीकरण बेहद आसान है और राष्ट्रवाद सीमाओं के आर पार उसी भारत विभाजन की विरासत है, जिसे हम जुए की तरह पिछले सात दशकों से ढो रहे हैं और अपनी आजाद जिंदगी की नई शुरुआत कर ही नहीं सके हैं. जितना युद्धोन्माद भारत में है, उससे कम पाकिस्तान में नहीं है. भारत के मुकाबले पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था की हालत बेहद संगीन है. उत्पादन में हो न हो, हथियारों की पारमाणविक दौड़ में पाकिस्तान किसके दम पर भारत की बराबरी कर रहा है, उस पर सिलसिलेवार गौर करने की जरुरत है क्योंकि सबसे बड़े उस दुश्मन के हवाले हमने अपनी रक्षा और आंतरिक सुरक्षा दोनों सौंप दिये हैं.
सियासत और मजहब से के तंग दायरे से निकलकर इस युद्धोन्माद की युद्धक अर्थव्यवस्था और उसके कारर्पोरेट दांव को समझें और फिर यह विवेचना भी कर लें कि हम अपने बेटों को शहीद बनाने पर आमादा क्यों हैं? सबसे मुश्किल यह है कि इस महादेश में वियतनाम युद्ध विरोधी या इराक अफगानिस्तान युद्ध विरोधी किसी आंदोलन की कोई गुंजाइश नहीं है. हमारे पास बंद ताबूत में तिरंगे में लिपटी अपने बेटों की लाशों के इंतजार के सिवाय फिलहाल कोई दूसरा विकल्प नहीं है और बहुसंख्य जनती उसी शहादत की जमीन पर युद्धोन्माद का यह कारर्पोरेट जश्न मना रहा है. भगवानों को घूस देना भ्रष्टाचार की असली जड़
भ्रष्टाचार भारत में एक सांस्कृतिक मसला है. भारतीयों को इसमें कुछ भी अजीब नहीं लगता. वे भ्रष्टों को सुधारने की कोशिश नहीं करते, उन्हें सहन करते रहते हैं. भारतीय भ्रष्ट क्यों है, इसे समझने के लिए आइए उनके आचरणों और प्रवृतियों पर एक नजर डालें. पहली बात, भारत में धर्म सौदेबाजी का स्वरूप लिए हुए. भारतीय अपने देवी-देवताओं को तरह का चढ़ावा चढ़ाते हैं और बदले में उनसे खास तरह का इनाम चाहते हैं. ऐसा व्यवहार बताता है कि नाकाबिल लोग अपने लिए पक्षपात की कामना कर रहे है. मंदिर से बाहर दुनिया में ऐसी सौदेबाजी को ”रिश्वत” कहते हैं.
अमीर भारतीय मंदिरों में कैश नहीं देता, वह सोने का मुकुट या ऐसे ही आभूषण वगैरह देता है. उसके उपहार गरीबों का पेट नहीं भर सकते, वे तो देवता के लिए ही होते हैं. उसे लगता है कि अगर यह किसी जरूरतमंद व्यक्ति को मिल गया तो बेकार चला जाएगा. जून 2009 में कर्नाटक के एक मंत्री जी जर्नादन रेड्डी ने तिरूपति मंदिर में 45 करोड़ रूपए मूल्य का सोने और हीरे से बना मुकुट दान किया. भारत के मंदिरों में इतना धन इकट्ठा होता है कि व समझ ही नहीं पाते, इसका क्या करें. मंदिरों के तहखानों में अरबों की संपत्ति पड़ी-पड़ी जंग खा रही है. यूरोपीय भारत आए तो उन्होंने स्कूल बनवाए , लेकिन भारतीय यूरोप-अमेरिका जाते हैं तो वे मंदिर बनवाते है.
भारतीयों को लगता है कि जब भगवान भी कुछ भला करने के लिए चढ़ावा स्वीकार करते है तो हमारे ऐसा करने में क्या हर्ज है. यही वजह है कि भारतीय इतनी आसानी से भ्रष्टाचार में शामिल हो जाते हैं. भारतीय संस्कृति ऐसे आचरण के लिए गुंजाइश बनाती है. इसमें नैतिक तौर पर कलंक जैसी कोई बात नहीं होती. पूर्णतया भ्रष्ट जयललिता इसलिए सत्ता में वापस लौट आती है. पश्चिम में आप इसकी कल्पना तक नहीं कर सकते.
भ्रष्टाचार को लेकर भारत की नैतिक अस्पष्टता इसके इतिहास में भी झलकती है. इसका इतिहास ऐसी घटनाओं से भरा है जिनमें शहरो और राज्यों के पहरेदारों ने पैसे खाकर हमलावरों के लिए गेट खोल दिए और सेनापतियों ने रिश्वत लेकर समर्पण कर दिया. भारतीयों के भ्रष्ट चरित्र की वजह से इस महादेश में युद्ध काफी कम में हुए.
प्राचीन यूनान और आधुनिक यूरोप के मुकाबले भारतीयों ने काफी कम लड़ाइयां लड़ी है. नादिरशाह को तुर्की में भीषण लड़ाई लड़नी पड़ी. मगर भारत में लड़ने की जरूरत ही नहीं पड़ी. सेनाओं को विदा करने के लिए यहां रिश्वत ही काफी थी. पैसे खर्च करने को तैयार कोई भी हमलावर भारत के राजाओं को सत्ता से बेदखल कर सकता था, भले उनके पास दसियों हजार की फौज क्यों न हो. पलासी की लड़ाई में भी भारतीयों की तरफ से कोई प्रतिरोध नहीं हुआ. क्लाइव ने मीर जाफर की मुट्ठी गर्म कर दी और पूरा बंगाल 3000 लोगों के सामने बिछ गया.
सवाल उठता है कि भारत में ऐसी सौदेबाजी की संस्कृति क्यों है, जबकि अन्य सभ्य देशों में यह नहीं है? भारतीयों का इस मान्यता में यकीन नहीं है कि अगर सभी लोग नैतिक आचरण करें तो सबकी उन्नति होगी. उनकी जाति व्यवस्था उन्हें एक-दूसरे से अलग करती है. वे नहीं मानते कि सभी मनुष्य समान है. इसकी परिणति उनके विभाजन और अन्य धर्मो की ओर पलायन में हुई. कई हिंदुओं ने सिख, जैन, बौद्ध आदि के रूप में अपने अलग धर्म बना लिए और बहुत सारे ईसाइयत तथा इस्लाम की ओर चले गए. इस सबका नतीजा यह हुआ कि भारतीयों का एक-दूसरे पर विश्वास नहीं रहा. भारतीय तो यहां कोई रहा ही नहीं. हिंदू , मुस्लिम, ईसाई जितने चाहो ढूंढ लो. भारतीय भूल गए कि 1400 साल पहले वे सब एक ही पंथ के थे. यह विभाजन एक बीमार संस्कृति के रूप में सामने आया. असमानता ने भ्रष्ट समाज को जन्म दिया. नतीजा यह है कि भारत में हर कोई हर किसी के खिलाफ है, सिवाय भगवान के और भी रिश्वतखोर है. बीबीएयू में सुरक्षित नहीं है दलित छात्र, हुई गला दबाकर मारने की कोशिश!
लखनऊ. बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय(बीबीएयू) के खेल संयोजक मनोज धधवाल पर एक दलित छात्र ने गला दबाकर जान से मारने का आरोप लगाया है. दलित छात्रों का कहना है कि कुछ दिनों पहले बीबीएयू में गलत तरीके से 8 दलित छात्रों को निष्कासित किए जाने के बाद लगातार प्रदर्शन से बौखलाए खेल संयोजक ने जान से मारने की कोशिश की. घटना के विरोध में और निष्कासन वापस कराने के लिए विश्वविद्यालय के गेट पर आरक्षण बचाओ संघर्ष समिति और छात्रों ने विशाल धरना प्रदर्शन किया. प्रदर्शन के आगे बीबीएयू प्रशासन ने घुटने टेके और कुलपति के निर्देश पर प्रोफेसर आर.वी. राम ने गेट पर आकर संघर्ष समिति और छात्रों ज्ञापन लिया.
कुलपति की तरफ से प्राक्टर रामचन्द्र ने आश्वासन दिया है कि 3-4 दिन में दलित छात्रों को न्याय मिलेगा. उन्होंने संघर्ष समिति से कहा कि निष्कासन वापसी का मामला अन्तिम चरण में और जल्द ही निष्कासन वापसी होगा. आरक्षण बचाओ संघर्ष समिति ने ऐलान किया कि अगर न्याय नही मिला तो एचआरडी मंत्रालय सहित भाजपा के मंत्रियों का घेराव किया जाएगा और बीबीएयू के छात्र चक्का जाम करेंगे. आरक्षण बचाओ संघर्ष समिति के संयोजकों ने प्रदर्शन को सम्बोधित करते हुए यह ऐलान किया कि कुलपति द्वारा दिये गये आश्वासन के अनुसार यदि जल्द ही निष्कासन वापस न हुआ तो बीबीएयू विश्वविद्यालय में फिर से बड़ा प्रदर्शन किया जायेगा और जरूरत पड़ी तो मानव संसाधन विकास मंत्रालय का भी व्यापक घेराव किया जाएगा.
गौरतलब है कि बीबीएयू में कुलपति से दो पक्षीय वार्ता के बाद भी अभी तक दलित छात्रों को न्याय नहीं दिया गया, जबकि कुलपति द्वारा आरक्षण बचाओ संघर्ष समिति को यह आश्वासन दिया गया था कि 20 सितम्बर तक सभी दलित छात्रों का निष्कासन वापस ले लिया जायेगा. सभी निष्कासित दलित छात्रों अजय कुमार, श्रेयात बौद्ध, संदीप शास्त्री, संदीप गौतम, रामेन्द्र नरेश, जय सिंह, अश्वनी रंजन व सुमित कुमार ने भी आंदोलन में भाग लिया. परिजन के निधन पर दलित का मुंडन करने से नाई ने किया इनकार, केस दर्ज
मंदसौर। मध्यप्रदेश के मंदसौर में परिजन के निधन पर दलित का मुंडन करने से इनकार करने का मामला सामने आया है. शिकायत के बाद पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ केस दर्ज किया. 35 दिन में दलित व सवर्ण के आमने-सामने होने का यह तीसरा मामला है. इससे पहले 15 अगस्त को दलित सरपंच द्वारा लाई नुक्ती नहीं बांटने व दलित समाज की झांकी को आगे नहीं निकलने देने के मामले हो चुके हैं. दलित-सवर्ण विवाद को लेकर प्रदेश के संवेदनशील जिलों में शामिल मंदसौर में हर माह ऐसा एक मामला हो रहा है. जिम्मेदार अधिकारी मामलों में न्याय दिलाने व संभाग में सबसे अधिक सजा दिलाने का दावा कर रहे हैं.
माल्याखेरखेड़ा निवासी गोवर्धन ने बताया कि उनके भाई की पत्नी का 19 सितंबर को निधन हो गया था. उसी दिन मुक्तिधाम पर मुंडन कराने की प्रथा है. इसके चलते गांव के ही सलून संचालक भोला नारायण को मुक्तिधाम पर बुलाया. उसने आने से इनकार कर दिया. इस पर दूसरे से मुंडन कराया. अगले दिन जब उससे इसका कारण पूछा तो उसने व उसके बेटे ईश्वर ने दलित समाज का होने के चलते नहीं आने की बात कही और गाली-गलौज की. गोवर्धन की शिकायत पर नाहरगढ़ पुलिस ने 20 सितंबर को केस दर्ज किया.
मेघवाल समाज के प्रदेश अध्यक्ष राजेंद्र सूर्यवंशी का कहना है जिले में करीब 15 मामले ऐसे हैं जिनमें दलितों पर अत्याचार हुआ और उन्होंने केस भी दर्ज कराया है. दो मामले इसी माह के हैं जिनकी शिकायत की है. नहीं चाहिए ऐसा विकास जो सेना के जवानों को शहीद कर दे!
70 वर्ष की आजादी के बाद भी जिस देश की 85 प्रतिशत आबादी सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक व्यवस्था का हिस्सा नहीं बन पायी हो और उसमें भी हम जैसी अधिकांश आबादी की जुबान पर यह जुमला “कोई होहिं नृप हमें का हानि” घर कर गया हो तो वह देश या समाज अपना सर उठाकर कैसे चल सकता है? यह हम सब कुछ जागरूक लोगों के समक्ष एक विचारणीय प्रश्न है.
हम नट, मुसहर, डोम, मेहतर और बंजारा इत्यादि अति अछूत लोग भी तो इंसान हैं और इस 70 वर्षीय आजाद भारत के नागरिक भी हैं. सबकी तरह हमारे भी मुंह, नाक, आंख, कान, हाथ और पैर हैं. दिल और दिमाग भी है. हमारे भी बाल-बच्चे है और कठिन से कठिन काम कर देने की क्षमता भी हम्ही में है. हां! यह बात अलग है कि तुम्हारे ही घृणित षड्यंत्र की वजह से हम पीढ़ी-दर-पीढ़ी अनपढ़ गंवार रहते चले आ रहे हैं और आज भी हमारी किसी को कोई चिंता नहीं है. हम सभी मानवीय अधिकारों से वंचित भी हैं. अगर सछूत शूद्रों से हमें अलग कर दो तो हमारी जनसंख्या भी इतनी नहीं कि हम किसी को चुनाव में जीता-हरा सकें और शायद यही वजह है कि हमारी कोई खबर भी नहीं लेता. हम निसहाय पड़े हुए हैं. लेकिन हमें इस भयानक परिस्थिति में छोड़कर तुम भी तो चैन की सांस नहीं ले पा रहे हो.
विकास, विकास, विकास. किसके विकास की बात करते हो? जीडीपी ग्रोथ इतना हो गया. अगले वर्ष उतना हो जाएगा. बुलेट ट्रेन चलने लगेगी. सांसद-विधायकों के वेतन ढाई-तीन लाख हो जाएंगे. चमचमाती सड़कें हो जाएंगी. सैकड़ों की संख्या में स्मार्ट सिटी दिखने लगेंगी. तो बताओ, हमारे जैसे करोड़ों कंगलियों का क्या हो जाएगा? आजादी मिलने के बाद तुम बड़े-बड़े लोगों ने अपनी व्यवस्था कर लिया. जज-कलक्टर तुम्हीं बनोगे. सीओ-बीडीओ तुम्हीं बनोगे और दारोगा-डीएसपी-एसपी तुम्ही बनोगे. क्लर्क और चपरासी भी तुम्हीं बनोगे. मतलब सबकुछ तुम्ही बनोगे और सबकुछ तुम्हें ही चाहिए.
बड़ी चिंता है हमारे घर की. हमारे राशन कार्ड की. अब 70 वर्ष की आजादी के बाद हमारे भी बच्चों की पढ़ाई की बात करने लगे हो. छिः छिः शर्म भी नहीं आती. हमारे नाम पर विदेशों से धन लाते हो और उसे भी गटक जाते हो. जो हमारे हित की बात करता है उसे जातिवादी कहते हो और जो हमारे लिये संघर्ष करता है उसे नक्सली कहते हो. नक्सली कहकर हम भूखे-नंगे आदिवासियों को अपनी जमीन से हमें बेदखल करते आ रहे हो और अब सुन रहे हैं आतंकवादी करार देकर हमारे सफाये की योजना भी बना रहे हो. करो जो जी में आए हमारी मेहनत पर गुलछरे उड़ाने वालों. हमारी भी तो कोई सुनेगा. एक बार बाबासाहेब ने सुना तो तुम्हारी हेंकड़ी गुम हो गई और इस बार कोई सुन लिया तो पता नहीं चलेगा कि तुम कहां गुम हो गए.
हमारा विकास चाहते हो? झूठ! बिल्कुल झूठ. सब कुछ तो लूट लिया. तुम लिए रहो अपना सब कुछ पढ़े-लिखे योग्य लोग जो हो. हम तो अनपढ़-गंवार अयोग्य और अधम, अछूत, पापी, चंडाल लोग हैं. हम तो जज-कलक्टर नहीं बन सकते. एसपी-डीएसपी भी नहीं बन सकते. क्लर्क बनने के योग्य भी तो नहीं बनाया. चलो! हमारे विकास की भी अब चिंता छोड़ दो. चलो! और कुछ नहीं बना सकते तो हमें केवल चपरासी बना सकते हो तो बना दो. हम नट, मुसहर, मेहतर, डोम, बंजारा, हलखोर इत्यादि ऐसी अत्यंत अछूत जातियों के हर घर से केवल एक चपरासी. हर सरकारी-गैर सरकारी कार्यालयों में चपरासी का पद हमारे लिये सुरक्षित कर दो. देखो! छुआ-छूत का भी कैसे सफाया हो जाता है. योग्यता का बहाना मत बनाना. देखो हम सब कुछ कर लेंगे. जमीन खरीदकर अपना घर बना लेंगे. छह माह में हम साफ-साफ कपड़ा भी बिल्कुल तुम्हारी ही तरह पहनना भी सीख जाएंगे. अपने बच्चों को पढ़ा लेंगे. और इससे घर-घर शिक्षा की लौ भी जल उठेगी. तुमसे दो वर्ष बाद आजाद हुए चीन के समकक्ष भारत भी पूरी तरह मजबूत होकर दुनिया के नक्शे पर उभरेगा. फिर कोई आंख उठाकर भारत की ओर गुर्राने की हिम्मत भी नहीं करेगा. आज तो कोई भी आंखे लाल कर वापस लौट जाने की हिम्मत रखता है. पाकिस्तान तो रोज 56 इंच की छाती को 56 सेंटीमीटर का बनाकर चला जाता है. और हम रटा-रटाया वही जुमला “इसबार नहीं छोड़ेंगे” कह-कहकर टुकुर-टुकुर ताकते रह जाते हैं. तब तक वह दूसरा धमाका भी करके चला जाता है और आंखे भी तरेरने लगता है.
कैसी है तुम्हारी खुफिया एजेंसी और कैसे तुम हो कि 20-25 किलोमीटर तुम्हारी सीमा में घुसकर तुम्हारी सैनिक छावनियों को भी धूल में मिलाते रहता है. हमारी बहादुर सेना तुम्हारे आदेश की मोहताज बन हाथ पर हाथ धरे बैठी रहती है. पठानकोट फिर उरी और तुम आंसू के केवल दो बूंद बहाकर दुनियावालों को गोलबंद करने के बहाने अपनी नपुंसकता का परिचय देते रहते हो. हम अछूत पढ़े-लिखे नहीं लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हम समझदार भी नहीं हैं. देश की यह दुर्गति देख हमें भी दुख होता है. आखिर हमारा भी तो यही देश है. हम भी तो इसी मिट्टी में पले-बढ़े हैं. काश! संकीर्ण जातीय दुर्भावनाओं से ऊपर उठकर हमें भी अपने साथ चलना सिखाया होता तो मुझे लगता है तुम्हें दुनियावालों के सामने हाथ-पैर फैला-फैलाकर भीख मांगने के लिये विवश नहीं होना पड़ता बल्कि दुनियावाले तुम्हारी चौखट पर माथा टेकने को मजबूर होते. बौद्धयुगीन् काल को याद करो. हमारी गौरव-गाथा आज भी दुनियावाले गाते नहीं थकते. लेकिन महात्मा बुद्ध का वह समता, स्वतन्त्रता और भाईचारे का संदेश तुम्हें आज भी मंजूर नहीं. तुम तो उच्च-नीच वर्ण और जातीय व्यवस्था के निर्माणकर्ता और आज भी पोषक बने हुए हो. यह समझते क्यों नहीं कि जबतक हमें नीच समझते रहोगे, दुनियावाले तुम्हें चिढ़ाते रहेंगे और तुम 56 इंच का सीना लेकर भी उनके चौखट पर नाक रगड़ते रहने के लिये मजबूर बने रहोगे. इतिहास के आइने में दलित-आदिवासी महिलाएं
मेरे दिमाग में कई बार आया कि आदिवासी औरतों के चित्र ही निर्वस्त्र ही क्यों देखने को मिलते हैं…कुछ इलाकों में आज भी आदिवासी औरतें लगभग निर्वस्त्र सी रहती हैं. क्यों? यह भी सोचा कि शायद धनाभाव इसका कारण रहा हो… कभी यह भी कि कहीं इस प्रकार नंगे बदन रहना उनकी सभ्यता और संस्कृति का हिस्सा ही न हो… उनकी आदत का हिस्सा भी तो हो सकता है…. किंतु कभी सवर्णों ने इस साजिश के बारे में नहीं सोचा कि आदिवासी महिलाओं को ही नहीं, अपितु अपने परिवार की महिलाओं को भी ऐसा करने के लिए मजबूर किया जाता था.
फेसबुक पर आई एक पोस्ट से जाना कि अठारहवीं सदी तक दक्षिणी भारत की किसी विशेष जाति की महिलाओं को वक्ष ढकने का अधिकार नहीं था. यह अधिकार सवर्णों ने छीन रखा था. समय के गुजरने के साथ-साथ यह कुप्रथा संस्कृति का हिस्सा बन गई. ऐसा नहीं था कि तब का समाज इस प्रथा के खिलाफ नहीं था किंतु सामाजिक हालातों के चलते आवाज नहीं उठा पाता था. आर अनुराधा जी ने भी ‘जनसत्ता’ 25 अगस्त, 2012 के अंक में छ्पी खबर को माध्यम बनाकर हाल ही में ‘जनसत्ता’ में ही माध्यम से इस बात को बड़ी ही हैरत के साथ प्रस्तुत किया है कि केरल जैसे प्रगतिशील माने जाने वाले राज्य में महिलाओं को अंगवस्त्र या ब्लाउज पहनने का हक पाने के लिए पचास साल से ज्यादा संघर्ष करना पड़ा.
इतिहास बताता है कि सर्वप्रथम केरल के त्रावणकोर इलाके में तन ढकने का अधिकार पाने के लिए विद्रोह के बाद 26, जुलाई 1859 को वहां के महाराजा ने अवर्ण औरतों को शरीर के ऊपरी भाग पर कपड़े पहनने की इजाजत दी थी. यह अजीब लग सकता है… पर केरल जैसे प्रगतिशील माने जाने वाले राज्य में भी महिलाओं को अंगवस्त्र या ब्लाउज पहनने का हक पाने के लिए 50 साल से ज्यादा का संघर्ष करना पड़ा. इसलिए वहां की महिलाओं के लिए 26 जुलाई का दिन बहुत ही महत्वपूर्ण है. इसी दिन 1859 में इस कुरूप परंपरा की चर्चा में खासतौर पर निचली जाति ‘नादर’ की स्त्रियों का जिक्र होता है क्योंकि अपने वस्त्र पहनने के हक के लिए उन्होंने ही सबसे पहले विरोध जताया था. ‘नादर’ की ही एक उपजाति ‘नादन’ पर ये बंदिशें उतनी नहीं थीं जितनी ‘नादर’ जाति की औरतों पर थीं. उस समय न सिर्फ अवर्ण बल्कि नंबूदिरी ब्राह्मण और क्षत्रिय ‘नायर’ जैसी जातियों की औरतों पर भी शरीर का ऊपरी हिस्सा ढकने से रोकने के कई नियम थे. नंबूदिरी औरतों को घर के भीतर ऊपरी शरीर को खुला रखना पड़ता था. वे घर से बाहर निकलते समय ही अपना सीना ढक सकती थीं. लेकिन मंदिर में उन्हें ऊपरी वस्त्र खोलकर ही जाना होता था. नादर औरतों को ब्राह्मण पुरुषों के सामने अपना वक्ष खुला रखना होता था. सबसे बुरी स्थिति दलित औरतों की थी जिन्हें सब जगह अंगवस्त्र पहनने की मनाही थी. पहनने पर उन्हें सजा भी दी जाती थी. यहां ध्यान देने की बात है कि एक महारानी जो स्वयं एक औरत थी… कितनी अय्याश रही होगी? एक घटना बताई जाती है कि जब एक निम्न जाति की महिला अपना सीना ढक कर महल में आई तो रानी ‘अत्तिंगल’ ने उसके स्तन कटवा देने का आदेश दे डाला था.
…यह जानकर आपको कैसा लगता है? पुरुष ही औरत का शोषक नहीं, बल्कि महिलाओं के शोषण करवाने में महिलाओं की भी हमेशा से खासी भूमिका रही है. शायद औरतों का ये साज-श्रंगार उसी मानसिकता का प्रमाण है… उनकी इस भूमिका के चलते ही पुरुष पहलवान हो गए. इस माने में महिलाओं के शोषण के मामले में महिलाएं भी उतनी ही दोषी हैं जितने कि पुरुष… औरतें आज तक ये ही नहीं जान पाईं कि उनको जितनी पुरुष की जरूरत है, उससे ज्यादा पुरुष को औरतों की जरूरत है. यही मानसिकता व्यभिचार को जन्म देती है.
इस अपमानजनक रिवाज के खिलाफ 19 वीं सदी के शुरू में आवाजें उठनी शुरू हुईं. 18वीं सदी के अंत और 19वीं सदी के शुरू में केरल से कई मजदूर, खासकर ‘नादर’ जाति के लोग, चाय बागानों में काम करने के लिए श्रीलंका चले गए. बेहतर आर्थिक स्थिति, धर्म बदल कर ईसाई बन जाने और यूरोपीय असर की वजह से इनमें जागरूकता ज्यादा थी और ये औरतें अपने शरीर को पूरा ढकने लगी थीं. धर्म-परिवर्तन करके ईसाई बन जाने वाली नादर महिलाओं ने भी इस प्रगतिशील कदम को अपनाया. इस तरह महिलाएं अक्सर इस सामाजिक प्रतिबंध को अनदेखा कर सम्मानजनक जीवन पाने की कोशिश करती रहीं.
यह कुलीन मर्दों को बर्दाश्त नहीं हुआ. ऐसी महिलाओं पर हिंसक हमले किए जाने लगे. जो भी इस नियम की अवहेलना करती, उसे बीच बाजार अपने ऊपरी वस्त्र उतारने को मजबूर किया जाता था. अवर्ण औरतों को छूना न पड़े इसके लिए सवर्ण पुरुष लंबे डंडे के सिरे पर छुरी बांध लेते और किसी महिला को ब्लाउज या कंचुकी पहना देखते तो उसे दूर से ही छुरी से फाड़ देते. यहां तक कि वे औरतों को इस हाल में रस्सी से बांध कर सरेआम पेड़ पर लटका देते ताकि दूसरी औरतें ब्लाउज या कंचुकी पहनने से डरने लगें. यह वह समय था कि जब अंग्रेजों के राजकाज का भी असर बढ़ रहा था. 1814 में त्रावणकोर के दीवान कर्नल मुनरो ने आदेश निकलवाया कि ईसाई ‘नादन’ और ‘नादर’ महिलाएं ब्लाउज पहन सकती हैं. लेकिन इसका कोई फायदा नहीं हुआ. उच्च वर्ण के पुरुष इस आदेश के बावजूद लगातार महिलाओं को अपनी ताकत और असर के सहारे इस शर्मनाक अवस्था की ओर धकेलते रहे.
आठ साल बाद फिर ऐसा ही आदेश निकाला गया. एक तरफ शर्मनाक स्थिति से उबरने की चेतना का जागना और दूसरी तरफ समर्थन में अंग्रेजी सरकार का आदेश. फलत: ज्यादातर महिलाओं ने कपड़े पहनने शुरू कर दिए. इधर उच्च वर्ण के पुरुषों का प्रतिरोध भी उतना ही तीखा हो गया. बताया जाता है कि ‘नादर-ईसाई’ महिलाओं का एक दल निचली अदालत में ऐसे ही एक मामले में गवाही देने पहुंचा. उन्हें दीवान मुनरो की आंखों के सामने अदालत के दरवाजे पर अपने अंग वस्त्र उतार कर रख देने पड़े. तभी वे भीतर जा पाईं. ऐसा होने पर कपड़े पहने जाने के लिए शुरू हुए संघर्ष ने हिंसक रूप ले लिया था.
सवर्णों के साथ-साथ, वहां का राजा तक भी औरतों द्वारा कपड़े न पहने जाने की परंपरा निभाने के पक्ष में था. आदेश था कि महल से मंदिर तक राजा की सवारी निकले तो रास्ते पर दोनों ओर नीची-जातियों की अर्धनग्न कुंवारी महिलाएं फूल बरसाती हुई खड़ी रहनी चाहिएं. उस रास्ते के घरों के छज्जों पर भी राजा के स्वागत में अर्धनग्न औरतों को ख़ड़ा रखा जाता था. राजा और उसके काफिले के सभी पुरुष इन दृष्यों का भरपूर आनंद लेते थे. राजा भी और गुलाम भी.
आखिर 1829 में इस मामले में एक महत्वपूर्ण मोड़ आया. कुलीन पुरुषों की लगातार नाराजगी के कारण राजा ने आदेश पारित कर दिया कि किसी भी अवर्ण जाति की औरत अपने शरीर का ऊपरी हिस्सा ढक नहीं सकती. अब तक ईसाई औरतों को जो थोड़ा समर्थन दीवान के आदेशों से मिल रहा था, वह भी खत्म हो गया. अब हिंदू-ईसाई सभी वंचित महिलाएं एक हो गईं और कुलीन पुरुषों के खिलाफ विरोध की ताकत बढ़ गई. सभी जगह महिलाएं जबरन बिना किसी भय के पूरे कपड़ों में घर से बाहर निकलने लगीं. इस पूरे आंदोलन का सीधा संबंध भारत की आजादी की लड़ाई के इतिहास से भी है. विरोधियों ने ऊंची जातियों के लोगों ने कमजोर जातियों की दुकानों में एकत्र सामान को लूटना शुरू कर दिया. इस तरह राज्य में शांति पूरी तरह भंग हो गई. दूसरी तरफ नारायण गुरु और अन्य सामाजिक, धार्मिक गुरुओं ने भी इस सामाजिक रूढ़ि का विरोध किया.
कहा जाता है कि तब मद्रास के कमिश्नर ने त्रावणकोर के राजा को खबर भिजवाई कि महिलाओं को कपड़े न पहनने देने और राज्य में हिंसा और अशांति को न रोक पाने के कारण उसकी बदनामी हो रही है. अंग्रेजों और नादर आदि अवर्ण जातियों के दबाव में आखिर त्रावणकोर के राजा को घोषणा करनी पड़ी कि सभी महिलाएं शरीर का ऊपरी हिस्सा वस्त्र से ढक सकती हैं. 26 जुलाई 1859 को राजा के एक आदेश के जरिए महिलाओं के ऊपरी वस्त्र न पहनने के असामाजिक कानून को बदल दिया गया. आखिर कई स्तरों पर विरोध के चलते त्रावणकोर की महिलाओं ने तो अपने वक्ष ढकने जैसा बुनियादी हक हासिल कर लिया, किंतु आदिवासी इलाकों में निर्वस्त्र रहने का प्रभाव आज भी देखने को मिलता है. अंडमान निकोबार द्वीप समूह की आदिवासी प्रजातियों में तो आज भी लोग निर्वस्त्र रहते हैं. जहां कहीं कपड़े पहनने का रिवाज आ भी गया है तो उनके कपड़ों की बनावट निर्वस्त्र रहने जैसी ही देखने को मिलती है.
हमारे देश में, विकृत मानसिकता वालों की भी कमी नही है जो इस खुलासे को अपने स्वार्थ के हेतु निराधार अफवाह फैलाने का कारण मानते हैं. वो उल्टे ऐसे खुलासे करने वालों को ही विकृत मानसिकता वाले लोगों मे शामिल करते हैं… खेद की बात तो ये है कि उनमें ज्यादातर तथाकथित सवर्ण वर्ग की महिलाएं हैं जिन्हें खुद भी उसी प्रताड़ना का शिकार होना पड़ता था/है. जिसका शिकार निम्न वर्ग की महिलाओं को होना पड़ता था/है… घर के भीतर ही सही. कुछ लोग इसे समाज में विद्वेष फैलाने की कोशिश मान रहे हैं तो कुछ इसे जागरुकता की संज्ञा से नवाज़ रहे हैं… कुछ लोग इस खुलासे को वोटों की राजनीति से जोड़कर देखते हैं… जो सही भी हो सकता है और नहीं भी. कुछ लोग इस खुलासे को सवर्णों के विरोध में की जा रही साजिश के रूप में देख रहे हैं. कुछ का कहना है कि कल कैसा था…. कल क्या हुआ… इसे लेकर हम आज क्यूं चर्चा करें? उनका तर्क है कि अंडमान निकोबार द्वीप समूह की आदिवासी प्रजातियों के लोग तो आज भी निर्वस्त्र रहते हैं. अब कोई यह तो बताए कि उनसे उनके वस्त्र किसने छीने… ऐसा कहने वाले लोग ये भूल रहे हैं कि अंडमान निकोबार द्वीप समूह की आदिवासी प्रजातियों की केवल महिलाएं ही निर्वस्त्र नहीं रहतीं… पुरुष भी निर्वस्त्र रहते हैं. इसे पुरुष–सत्ता का प्रमाण कैसे माना जा सकता है? दरअसल यह आर्थिक तंगी का परिणाम है… और कुछ नहीं.
यह जानकर, क्या आपको नहीं लगता कि सवर्ण जातियों के लोग ही क्यों तमाम वर्गों के पुरुष आदिकाल से ही दिमागी तौर पर स्त्री-देह के प्रति आसक्त रहे हैं… कम–ज्यादा का अंतर हो सकता है… बस. यदि ऐसा न होता तो निम्न जातियों के पुरुष भी निम्न जातियों की औरतों के हिमायत में खड़े नजर आते…. किंतु ऐसा नहीं हुआ. पुरुष की इस प्रकार की मानसिकता ही आज भी औरतों के प्रति घातक बनी हुई है. पुरुष को यूं ही स्त्री विरोधी नहीं माना जाता… पुरुषों की हरकतें हमेशा से ही कुछ ऐसी रही हैं जिनके चलते समूचे समाज को पुरुषवादी सोच का धनी कहा जाता है.
इतिहास की इस कड़बाहट को महिलाओं की वर्तमान स्थिति के बल पर नकारा नहीं जाना चाहिए. औरतों की आज जो भी सामाजिक अवस्था है ….वह केवल शिक्षा के प्रचार-प्रसार के चलते राजनीति और सरकारी नौकरियों की भागीदारी के कारण है. यह भी सच बात है कि वर्तमान में शिक्षित अथवा अशिक्षित, दोनों प्रकार की महिलाएं अनेक बार पुरुष पर भारी पड़ रही हैं… खासकर नौकरीशुदा पुरुषों के मामले में…. वो तमाम की तमाम सम्पत्ति को केवल और केवल अपनी पत्नि के नाम ही करते हैं… उसका परिणाम ये होता है कि अंत समय में पति “बेचारा” बनकर अकेला रह जाता है… बच्चे मम्मी के साथ हो जाते हैं… संपत्ति का मोह जो बना रहता है और कुछ नहीं. पिता जैसे उधार की वस्तु बन जाता है. इसे पुरुष की कमजोरी भी माना जा सकता है. किंतु कुल मिलाकर औरत की सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र में कोई खास अंतर नहीं आया है. सामान्य तौर पर आज भी औरत को जैसे पुरुष की सम्पत्ति ही माना जाता है. उसे आज भी सामाजिक सम्मान मिलना किसी सपने से कम नहीं. उसकी सामाजिक मामलों आज भी जैसे साझेदारी नहीं है.
खैर! आज जबकि समाज को शिक्षा और विकास की बातों पर ध्यान देना चाहिए. हम ऐसी बातें फैला कर किसी एक वर्ग के पुरुषों की खिलाफत कर रहे हैं… ऐसा नहीं है. हां! ये ठीक है कि हमें अफवाहें फैलाने के बदले इतिहास को लेकर समाज को शिक्षा और विकास की बातों पर ध्यान देना चाहिए…. किंतु इतिहास को सिरे से नकारना भी बेहतर समाज बनाने की प्रक्रिया के लिए घातक हो सकता है क्योंकि इतिहास हमें आगे का उन्नत मार्ग तलाशने का सबक देता है.
– लेखक लेखन की तमाम विधाओं में माहिर हैं. स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त होकर इन दिनों अधिकार दर्पण नामक त्रैमासिक के संपादन के साथ स्वतंत्र लेखन में रत हैं. संपर्क- 9911414511 मौत से जूझ रहा भाजपा का सबसे बड़ा दलित नेता, पार्टी के पास सुध लेने का समय नहीं
सोनभद्र। दलितों के मुद्दे को लेकर मोदी सरकार हर बार गंभीर होने की बात करती है. हैदराबाद की सभा में मोदी ने दलित हिंसा को लेकर यहां तक कह दिया था कि दलितों की जगह मुझे गोली मार दो. मगर मोदी का यह बयान चुनावी घोषणाओं जैसा जुमला ही साबित हुआ. मोदी की पार्टी के ही दलित नेता आज अस्पताल में जीवन मौत के बीच संघर्ष कर रहे हैं, मगर उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं है.
भाजपा के पूर्व राज्य मंत्री व सांसद रहे कद्दावर दलित नेता सूबेदार प्रसाद पिछले एक सप्ताह से मोदी के संसदीय क्षेत्र में स्थित एक निजी अस्पताल में अपने जीवन के आखिरी पड़ाव पर जीवन सुरक्षा उपकरणों के सहारे हैं. 85 वर्ष की उम्र के पूर्व मंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता सूबेदार प्रसाद अपने सरल स्वभाव को लेकर लोगों के बीच मंत्री जी के नाम से पुकारे जाते हैं.
दलित समुदाय से आने वाले सूबेदार प्रसाद उन दिनों जनसंघ में शामिल हुए थे जब बड़ी जाति के लोगों का दबदबा था लेकिन अपनी कर्मठता सरल स्वभाव के चलते उन्होंने न केवल तत्कालीन मिर्जापुर जनपद के दक्षिणी इलाके में रामप्यारे पनिका जैसे धाकड़ आदिवासी नेता के रहते तीन बार विधानसभा का चुनाव जीता और 1969 से लगातार तीन बार विधायक रहे और जनता पार्टी की सरकार में उद्योग मंत्री का पद संभाला.
जनसंघ के समर्पित नेता और लोकप्रिय विधायक होने के कारण आपातकाल में इंदिरा सरकार ने उन्हें 19 माह जेल में भी रखा. अपनी लोकप्रियता के चलते सूबेदार प्रसाद ने 1989 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के कद्दावर नेता रामप्यारे पनिका को इतने बड़े अंतर से हराया कि वे अपनी जमानत नहीं बचा सके.
सूबेदार प्रसाद के बारे में लोग आज भी बात करते है कि 70 के दशक में वन विभाग द्वारा इलाके के हजारों आदिवासियों किसानो की भूमि को धारा 20 के तहत उनसे जबरिया छिना जा रहा था तब सूबेदार प्रसाद ने ही इसका न केवल प्रबल विरोध किया बल्कि उनकी भूमि को वापस भी दिलाया वरना क्षेत्र में बहुत बड़ी संख्या में गरीब आदिवासी व किसान बिना जमीन के हो जाते. बिहारः जापान की मिहो तनबरा बुद्ध की धरती पर खोलेंगी स्कूल और अस्पताल
मुजफ्फरपुर। जापान की महिला समाजसेवी मिहो तनबरा भारत-जापान रिश्तों का एक नया अध्याय लिख रही हैं. मुजफ्फरपुर के एक सुदूर गांव चोचहां में मिहो तनबरा 5.5 करोड़ रुपये की लागत से एक इन्टरनेशनल प्लस टू स्कूल खोल रही हैं. 20 सितंबर को उन्होंने खुद अपने हाथों से आधारशिला रखी. मिहो की योजना स्कूल के साथ-साथ एक सुपर स्पेशलिटी अस्पताल खोलने की भी है. जापान की समाजसेवी की इस पहल से गांव के लोग काफी खुश हैं.
तथागत बुद्ध के आदर्शों से प्रभावित मिहो जापान से बार-बार वैशाली आती रहती हैं. पेशे से उद्योगपति और स्वभाव से समाजसेवी मिहो बुद्ध के देश के लिए कुछ करना चाहती हैं. अपनी इसी सोच को साकार करने के लिए मिहो मुजफ्फरपुर की संस्था बुद्धा एजुकेशनल फाउन्डेशन के साथ मिलकर फिलहाल एक प्लस टू स्कूल और एक सुपर स्पेशियालिटी अस्पताल खोल रही हैं. स्कूल भवन का निर्माण शुरु हो गया है जिसकी पूरा खर्चा मिहो की संस्था कर रही है. संस्था ने इसके लिए 1.3 करोड़ की राशि का भुगतान भी कर दिया है.
मिहो तनबरा ने कहा कि मैं भारत देश की काफी इज्जत करती हूं क्योंकि भारत का इतिहास काफी पुराना है. मैं तथागत बुद्ध, दलाई लामा और मदर टेरेसा की काफी इज्जत करती हूं. भारत के लिए कुछ करने में मैं गर्व महसूस कर रही हूं. भारत एक महान देश है. मेरी दो योजनाएं हैं एक है स्कूल बनाना और दूसरा अस्पताल. गांव में मिहो तनबरा का भव्य स्वागत किया गया जिसमें बुद्धिजीवी महिलाएं और बच्चे भी शामिल हुए. मिहो की संस्था भारतीय कृषि के क्षेत्र में बेहतरी के लिए भी योजना बना रही है. वैवाहिक रीतियों में सामाजिक बुराइयां
बुन्देलखण्ड क्षेत्र जिसे कहते है वो उत्तरप्रदेश और मध्यप्रदेश को मिला के बना हुआ है और एक ऐसा क्षेत्र है जहां पर शादी किसी यज्ञ से कम नहीं होती है. इस क्षेत्र में कन्यादान सबसे बड़ा दान माना जाता है. यहां लड़की का जन्म होना लक्ष्मी का घर आना माना जाता है. अगर पहली संतान लड़की हुए तो घर में शुभ समझा जाता है. पर ये भी जाति व्यवस्था का शिकार है. किसी जाति में लड़की का होना सिर झुकाने के बराबर माना जाता है और मां की अच्छे से देखभाल नहीं होती है. लड़की के पैदा होते ही पूरा परिवार उसकी शादी की चिंता सताने लगती है. उसकी शादी के लिए धन इकट्ठा करने में जुट जाते है. कभी कभी ये देखा गया है कि बाप सब बुराईयां छोड़ देता है बेटी के पैदा होते ही और कुछ बाप ऐसे भी मिलेंगे यहाँ जो बेटी पैदा होते ही उन्हें नींद नहीं आती और नशा करने लग जाते है यह सोंच कर कि एक आर्थिक बोझ हो गया. यानि यहां लड़की को बोझ भी समझा जाता है. ये बोझ कई तरह का होता है. इनमे से एक है लड़के वालों के सामने घुटने टेकने के बराबर, दहेज़ का दंश, रिश्तों का जाल, उल्टा सीधा रिश्तों का जाल (फसन). लड़की का रंग रूप, कद और शिक्षा, आदि. वैसे लड़की अगर रुपवती और गुणवती हो और अगर बाप धनी हो तो धनवती भी बन जाती है और लड़के वाले ऐसे लड़की वालों को खोजते है. अगर लड़की एकलौती बेटी हो तो उस लड़की का कद लोभी लोग और ऊंचा कर देते है, और अगर एकलौती संतान हो तो लोभी लड़के वाले तो उस लड़की को धरती की लक्ष्मी ही मान लेते है और फिर क्या रंग क्या रूप “सब चलता है” वाली सोंच में बदल जाता है.
विवाह दो व्यक्तियों का मिलन ही नहीं बल्कि दो परिवारों का मिलन भी होता है. इन दोनों परिवारों के रिस्तेदार, रहन-सहन, खान पान और सुख दुख में साथ बटाना भी पड़ता है. शादी के बाद रिश्ता स्थाई और सत्य बन जाता है. शादी कभी-कभी एक समझौता भी होता है और कभी-कभी बोझ भी बन जाती है. अगर दोनों पक्ष एक दूसरे के लिए अपनापन समझें और दोनों की ओर से सहानुभूति और सहायता की झलक दिखे तो ऐसी शादियां दोनों घरों को स्वर्ग बना देती है.
जहां शादियां दो घरों को जोड़ती है वही कुछ बुराईयां भी होती है, दोनों परिवार में खलबली भी मचा देती है. बुन्देलखण्ड में शादी के लिए लड़का वाला लड़की के घर कई बार आता जाता है. कभी मामा-मामी देखेंगे, कभी बुआ-फूफा देखेंगे, फिर लड़के के जीजा-जीजी देखेंगे और अब तो लड़के के दोस्त कहा पीछे है. जितनी बार जायेंगे लड़की वाले को एक से बढ़कर एक स्वागत करना पड़ता है. अगर किसी की सेवा अच्छे नहीं हुए तो रिश्ता तो दूर फिर उस लड़की का अपने किसी रिश्तेदारी में भी नहीं होने देंगे. वैसे अगर लड़का ही अपनी मर्जी से लड़की देखकर शादी करे तो रिश्तेदार और पारिवारिक लोग लड़के का जीना दूभर कर देते है. ये एक सामाजिक बुराई है जिसे लड़की वाले को झेलना पड़ता है. हालांकि, लड़की वाला भी लड़का वाला होता है और लड़की वाला भी किसी लड़की का बाप व रिश्तेदार होता है. लेकिन जब अपनी लड़की की शादी करता है तब उसको याद आता है की वो लड़की वाला है. अगर हर लड़की वाला और हर लड़का वाला ये याद रखे की वो भी ये सब करना चाहता है और नहीं करना चाहता तो सायद ये बात सामाजिक बुराई न लगे. पर जब मैं अपनी बहन बेटी की शादी के लिए दहेज़ देता हु तो उस से कहीं ज्यादा अपने लड़के की शादी में लेना चाहता हुं. या जब मैं दहेज़ देता हु तो मुझे दहेज़ बहुत भारी पड़ता है और जब मैं दहेज़ लेता हूँ तो दहेज़ कम लगता है. बहुत से ऐसे किस्से भी देखे जाते है कि लड़का वाला ये भूल जाता है की वो भी किसी लड़की की शादी करेगा या किया था. सामान्यतः हर शादी में चार मह्त्वपूर्ण रश्में हैं- फलदान या बयाना या छेंकना, तिलकोस्तव, टिका व द्वारचार, खोरवा देना जो लड़की वाला करता है और दो मुख्य रश्में है- गोद भराई या ओली करना और गहनों का चढ़ावा करना जो लड़के वाला लड़की के यहां ही करता है. ये सभी रश्में लेन-देन पर ही टिका होता है. हर बार पैसों को ऐसे गिना जाता है जैसे कोई बैंक केशियर लोन दे रहा हो और लड़का वाला कर्ज ले रहा हो.
ये हुई दहेज़ की बात. उस से भी बढ़कर शादी में सामाजिक बुराईयां और भी है – जैसे बरातियों का बन्दूक और आतिशबाजी लाना, बरातियों का स्वागत पैर धुलकर, मंडप के नीचे पयपुजी होना, कलेवा में दूल्हे का नाराज होना, दहेज़ के लिए नोकझोक होना, लड़की की बहन का दूल्हा के जूते चुराना फिर मनमाफिक मांग पूरा न होने पर लड़की वालों का लड़के वालों पर प्रतिक्रिया करना, इत्यादि. और अगर शादी में कोई गुस्सा ना हो तो मानो शादी सफल हुए नहीं. गुस्सा होने वालों में दूल्हा-दुल्हन का जीजा, फूफा और मामा होते है. कुछ वैवाहिक सामाजिक रीतियां जो कुरीतियों बन गयी है कि व्याख्या नीचे करता हूं-
बारात में बन्दूक और आतिशबाजी का खतरनाक खेल: यहाँ लड़का वाला ये दिखाने की कोशिश करता है मैं कितना पैसों से और हथियारों से शक्तिशाली हूं. अक्सर सुना जाता है कुछ लोगों की मृत्यु शादी की फायरिंग से हो गयी. आतिशबाजी का खेल तो और खतरनाक दिखता है जो कि ध्वनि प्रदुषण और वायु प्रदुषण दोनों बढ़ाता है. इसका ख्याल नहीं अंजान लोगों को और न ही किसी पर्यावरण विद्वानों को होता है. क्या ये रीति कुरीति नहीं है/ क्या अब इसकी जरुरत बुंदेलखंड के लोगों को है जहाँ शिक्षा का स्तर और महिलायों और बच्चों का स्वास्थ्य ठीक न हो और खाने को तरश जाते हो/ और सबसे बड़ी विडंबना यह कि दोनों पछ के लोग कर्ज भी लेकर ये दिखावा करते है.
खर्च और कर्ज का खेल: ये जो खर्च और कर्ज का रिश्ता है बहुत ही पेचीदा बन जाता है उन गरीबों के लिए जो ये सब नहीं कर सकते. कभी-कभी दोनों पछ इसलिए मायुस हो जाते है क्योंकि उन्होंने किसी पड़ोसी के लड़का या लड़की के बराबर खर्च नहीं कर पाए. और कुछ लोग ताना मारते है कि मैंने तो पानी की तरह पैसा बहाया अपनी लड़की या अपने लड़के की शादी में. शादी में जरुरत से ज्यादा खर्च कहां तक कारगर है और ये किनके लिए है. सोचने समझने की बात और इन सब परम्पराओं का हर साल बढ़ता ही नजर आता है.
राजस्थानः शहीद की अंतिम विदाई के लिए मुख्यमंत्री के पास टाइम नहीं
नई दिल्ली। उरी में आंतकी हमले में शहीद हुए निंब सिंह रावत के शव का अंतिम संस्कार उनके पैतृक गांव राजसमंद के राजवा में राजकीय और सैन्य सम्मान के साथ किया गया. शहीद की अंतिम विदाई में जनसैलाब उमड़ा. इस दौरान सीएम या बीजेपी नेता के नहीं पहुंचने को लेकर राजस्थान के शिक्षा मंत्री कालीचरण सर्राफ ने गलतबयानी कर दी.
दरअसल, राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे या भाजपा की ओर से प्रदेश अध्यक्ष शहीद को श्रद्धांजलि देने नहीं पहुंचे. इसी सवाल पर राजस्थान के शिक्षा मंत्री कालीचरण सर्राफ उखड़ पड़े. सर्राफ से जब इनके नहीं आने का कारण पूछा गया तो उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री के पास पहले से काफी काम है.
उन्होंने कहा, मुख्यमंत्री फ्री नहीं हैं, प्रतिनिधि को भेज दिया. जब ये कहा गया कि कांग्रेस के अध्यक्ष सचिन पायलट श्रद्धांजलि देने गए, तब सर्राफ ने जवाब दिया कि सचिन पायलट के पास अभी काम क्या है, वह फ्री हैं. वह सरकार में नहीं हैं इसलिए उनको तो जाना ही चाहिए. लेकिन हम सरकार में हैं, मुख्य़मंत्री के पास कई काम हैं.
उरी में शहीद हुए निंब सिंह रावत 13 महीने बाद ही रिटायर होकर घर आने वाले थे. लेकिन निंब सिंह के 46 वें जन्मदिन पर 20 सितंबर को राजसमंद के राजवा गांव में शहीद का शव आया तो परिवार के सब्र का बांध टूट गया. निंब सिंह की बेटी ने कहा कि वे टूटेगी नहीं, खुद सेना और पुलिस में भर्ती होकर आंतकियो से लोहा लेगी.
14 साल की सबसे बड़ी बेटी दीपिका ने कहा कि उसे गर्व है पिता देश के लिए शहीद हुए, लेकिन वे पिता की मौत का बदला लेने के लिए सेना में भर्ती होगी, हाथ में बंदूक उठाएगी और हमले के लिए जिम्मेदार आंतकियों से बदला लेगी. बेटी ने कहा सरकार मेरे पिता की शहादत के लिए जिम्मेदार आंतकियों का सफाया करे. राजभर समाज ने शक्ति प्रदर्शन कर बसपा को दिया समर्थन
मऊ। उत्तर प्रदेश चुनाव के मद्देनजर पार्टी में गठित तमाम भाईचारा कमेटियां अपने समाज को इकट्ठा करने में जुटी हुई हैं. इसी क्रम में राजभर समाज ने उत्तर प्रदेश के मऊ में एक कार्यक्रम आयोजित कर बहुजन समाज पार्टी के प्रति अपना समर्थन जताया. मऊ के रेलवे मैदान में आयोजित कार्यक्रम में राजभर समाज के लोग हजारों की संख्या में पहुंचे थे.
इस दौरान कार्यक्रम के मुख्य अतिथि एवं बसपा के प्रदेश अध्यक्ष रामअचल राजभर ने कार्यक्रम में मौजूद कार्यकर्ताओं से बहन मायावती जी को फिर से मुख्यमंत्री बनाने का आवाह्न किया. उन्होंने कहा कि पिछड़े समाज का हित बहुजन समाज पार्टी में ही सुरक्षित है. इसी पार्टी ने राजभर समाज को अधिकार और सम्मान दिया है. उनके आवाह्न पर राजभर समाज के कार्यकर्ताओं ने हाथ उठाकर बसपा को समर्थन देने की बात कही. कार्यक्रम के लिए राजभर समाज के 60-70 हजार कार्यकर्ताओं के पहुंचने से उत्साहित रामअचल राजभर ने उनका धन्यवाद जताया.
विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष सुखदेव राजभर ने कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए राजभर समाज के लोगों को चेताया कि भाजपा राजभर समाज और पिछड़ी जाति के अन्य लोगों को उकसाने और बरगलाने का काम कर रही है. इससे सावधान रहने की जरूरत है. उन्होंने राजभर समाज को बहुजन समाज पार्टी और इसकी मुखिया मायावती के समर्थन में खड़े होने का आवाह्न किया. वरिष्ठ राजभर नेता ने रामअचल राजभर के प्रयासों की भी काफी तारीफ की.
गौरतलब है कि यह कार्यक्रम बहुजन समाज पार्टी की तरफ से भाईचारा सम्मेलन था. कार्यक्रम का आयोजन बहुजन समाज पार्टी के मऊ जिला ईकाई की ओर से किया गया था. कार्यक्रम में राजभर समाज के प्रमुख व्यक्ति भीम राजभर (पूर्व प्रत्याशी), मिट्ठू राजभर, भारत राजभर, संतोष राजभर और मऊ जिलाध्यक्ष राजीव राजू, डॉ. रामाशंकर राजभर (पूर्व मंत्री) और कालीचरण राजभर (पूर्व विधायक), रामकिसुन राजभर, डॉ. पंचम राजभर एवं राजेश राजभर भी मौजूद थे. इससे पहले कार्यक्रम में मौजूद सर्वसमाज के बसपा कार्यकर्ताओं ने प्रदेश अध्यक्ष रामअचल राजभर का 40 किलो की माला और चांदी का मुकुट पहनाकर स्वागत किया. गुजरातः दलित उत्पीड़न के खिलाफ भड़का आक्रोश
पुष्कर। बढ़ते दलित और महिला अत्याचारों के विरूद्ध सोमवार को अनुसूचित जाति-जनजाति अधिकार मंच ने विरोध प्रदर्शन किया. मंच के बैनर तले दलित समाज ने सरकार और पुलिस को चेताया की यदि दलित और महिला अत्याचार के मामलों में पुलिस चुप्पी साधे हुए रही तो निर्णायक आंदोलन किया जाएगा. इससे पहले अम्बेडकर सर्किल पर सैकड़ो दलित समुदाया के लोग एकत्रित हुए. यहां पर उन्होंने बाबा साहेब अम्बेडकर की प्रतिमा के सामने सरकार और पुलिस की सद्बुद्धि के लिए यज्ञ में आहूतिया दी.
इसके बाद मंच के अध्यक्ष छितर मल टेपन के नेतृत्व में तहसील कार्यालय तक एक विरोध रैली के रूप में पहुंचे. रैली में आक्रोशित दलितों ने एसपी और आईजी के नाम की तख्ती गधो के गले में पहनाकर कर व्यवस्था पर कटाक्ष किया. रैली के दौरान दलित समाज ने सरकार और पुलिस के विरूद्ध जमकर नारेबाजी की और सरकार का पुतला जलाकर तहसीलदार प्रदीप कुमार चौमाल को राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और राज्यपाल के नाम का ज्ञापन सौंपा.
ज्ञापन में आरोप लगाया गया की कानून के रखवाले ही अपराधियों से गठजोड़ किए हुए है. ऐसे एसपी और आईजी को तुरंत प्रभाव से हटाया जाये. मंच के अध्यक्ष छितरमल टेपन ने बताया की प्रदेश में 8 दलितों की हत्या हो चुकी है लेकिन एक भी आरोपी नहीं पकड़े गए है. शुक्र है मेरे बिजनौर ने खुद को संभाल लिया
मेरे बिजनौर ने ख़ुद को तुरंत संभाल लिया इसके लिए उसे सलाम. वरना साज़िश तो बड़ी थी. बिजनौर का मूल स्वभाव अमन पसंद है, हालांकि बीच-बीच में कुछ लोग माहौल ख़राब करने की कोशिश करते रहते हैं. इस बार भी यही कोशिश हुई. पेदा गांव की घटना में तो तथ्यों से भी खिलवाड़ किया गया. यहां छेड़छाड़ भी मुस्लिम समुदाय की लड़की के साथ की गई और फिर हमला भी मुस्लिम समुदाय पर किया गया. लेकिन शुरुआत में शहर और आसपास यह अफवाह फैलाई गई कि जाटों की लड़की के साथ छेड़छाड़ हुई. इस तरह कुछ नेताओं ने इसे ‘क्रिया की प्रतिक्रिया’ भी साबित करने की कोशिश की. लेकिन उनकी यह कोशिश नाकाम रही.
शुक्रवार (16 सितंबर) को कई अख़बारों की वेबसाइट में भी इसे कुछ इसी तरह पेश करने की कोशिश की गई और इस घटना को दो समुदाय के बीच झड़प और संघर्ष का नाम दिया गया. दो समुदाय के बीच संघर्ष या झड़प उसे कहते हैं जिसमें दोनों समुदाय के लोग घायल हों, लेकिन यहां तो सिर्फ़ एक ही समुदाय (मुस्लिम) के लोग मारे गए और घायल हुए. बाकायदा सुनियोजित ढंग से उनके ऊपर हमला किया गया. इसमें कुछ स्थानीय पुलिस वालों की भूमिका भी संदिग्ध रही. वो तो शुक्र मनाइए कि तुरंत एसपी-डीएम के साथ प्रदेश स्तर के आला अधिकारी सक्रिय हो गए और बिजनौर के अमन पसंद लोगों ने भी इसे बहुत तूल नहीं दिया, जिससे बात संभल गई, वरना बिजनौर को भी मुज़फ़्फ़रनगर बनाया जा सकता था.
ख़ैर बिजनौर अब शांत है और रोजमर्रा के काम चल रहे हैं. मृतकों को सुरक्षा के बीच सपुर्दे-ख़ाक कर दिया गया है. बिजनौर का माहौल ख़राब करने वालों की साज़िश तो सफल नहीं हुई, लेकिन आगे बहुत संभलकर रहने की ज़रूरत है, क्योंकि गाय के बाद अब छेड़छाड़ को हथियार बनाकर जगह-जगह माहौल ख़राब करने की कोशिश की जाती रहेगी. यूपी चुनाव तक तो यह प्रक्रिया काफी तेज़ रहने वाली है. यूपी के कई शहरों से इस तरह छिटपुट हिंसा और तनाव की ख़बरें कई दिनों से आ भी रही हैं. इस दौरान न केवल सयंम से रहने की ज़रूरत है, बल्कि अफवाह से भी बचने की ज़रूरत है. सोशल मीडिया पर भी ऐसी घटनाओं पर कुछ लिखने से पहले तथ्यों की सही से जांच कर सही तथ्य अन्य लोगों के सामने लाने चाहिए, ताकि अफवाह फैलाने वालों को मुंह तोड़ जवाब मिले और उनकी साज़िश सफल न हो.
– लेखक के फेसबुक वॉल से. लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. गुजरातः जिग्नेश मेवानी सहित 200 लोगों को पुलिस ने किया नजरबंद
अहमदाबाद। उना दलित अत्याचार लड़त समिति के कन्वीनर जिग्नेश मेवानी सहित 200 लोगों को पुलिस ने नजरबंद किया. ये लोग धोलका की जमीन को लेकर विरोध प्रदर्शन कर रहे थे. नजरबंदी के दौरान दो महिला बेहोश हो गई. मेडिकल ट्रीटमेंट के लिए जब एंबुलेंस को बुलाया गया तो एंबुलेंस भी नहीं आई.
प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि प्रशासन ने जानबूझ कर एंबुलेंस नहीं भेजी. इस घटना से गुजरात मॉडल का घटिया चेहरा सामने आया है. जमीन की मांग को लेकर 50 दलितों ने दुबारा अहमदाबाद कलेक्टर ऑफिस को घेरा तो पुलिस ने इन्हें भी नजरबंद कर दिया. पुलिस हिरासत में दलित युवक की मौत, थाना प्रभारी बोला- हां मैंने मारा… कर लो जो करना है
जांजगीर। दलित युवक की पुलिस चौकी में मौत के बाद बवाल खड़ा गया है. इस मामले को गंभीरता से लेते हुए एसपी अजय यादव ने मुलमुला थाने के थाना प्रभारी उप निरीक्षक जितेन्द्र सिंह राजपूत और दो आरक्षक सुनील धु्रव व दिलहरण मिरी को कर्तव्य के प्रति लापरवाही बरतने के आरोप में निलंबित कर दिया है. आरोप है कि थाना प्रभारी ने जातिगत भेदभाव के आधार पर दलित युवक से मारपीट की. थाना प्रभारी ने युवक को इतना पीटा की उसकी मौत हो गई. मौत की खबर सुनकर जब परिजनों ने विरोध किया तो थाना प्रभारी उन्हें भी धमकी देने लगा और कहा कि हां मैंने मारा… कर लो जो करना है. यह सुन परिजनों और ग्रामीणों आक्रोश फैल गया. मृतक सतीश नोरगे के शव पर चोट के गहरे जख्म पुलिस की बेरहम पिटाई को बयां कर रहा है. लोगों का आक्रोश भी इसी को लेकर बना हुआ है. युवक के शरीर का अधिकांश हिस्सा पिटाई की वजह से सूजा हुआ है. युवक के शरीर पर काले गहरे धब्बे बने हुए है. रविवार की सुबह से ही नरियरा के समीप एनएच पर आक्रोशित लोगों ने चक्काजाम कर दिया गया.
गौरतलब है कि नरियरा निवासी सतीष नारंगे (34 साल) गुरूवार 15 सितम्बर की सुबह 11 बजे बिजली समस्या को लेकर नरियरा उपकेन्द्र गया था. इस दौरान वहां पर उपस्थित विभाग के उच्च जाति के कर्मचारियों से विवाद हो गया. विवाद बढ़ता देख विद्युत मण्डल के कर्मचारियों ने मुलमुला थाने को इसकी सूचना दी. मौके पर पहुंची पुलिस दलित युवक को अपने साथ थाने ले आयी. जहां युवक की बेरहमी से पिटाई कर लॉकअप में बंद कर दिया. जिसके बाद उसकी तबियत बिगड़ गयी. तबियत बिगड़ते देख उसे पामगढ़ सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र ले जाया गया जहां डॉक्टर ने उसे मृत घोषित कर दिया.
इस घटना की जानकारी मिलते ही परिजन सहित आसपास के लोग बुरी तरह आक्रोशित हो कर पामगढ़ एसडीएम कार्यालय के सामने युवक के शव को रखकर विरोध करने लगे. बढ़ते तनाव की सूचना मिलते ही कलेक्टर एस. भारतीदासन, पुलिस अधीक्षक अजय यादव सहित अन्य बड़े अधिकारी मौके पर पहुंच स्थिति नियंत्रण में करने में लगे हुए थे. परिजनों की मांग है कि मुलमुला थाना प्रभारी सहित पूरे स्टाफ पर हत्या का मामला दर्ज किया जाये.
इस संबंध में मिल रही जानकारी की माने तों मृतक युवक को मुलमुला पुलिस गुरूवार की शाम थाने ले गई थी. जबकि किसी भी आरोपी को लॉकअप में 24 घण्टे से ज्यादा पूछताछ के लिए नहीं रखा जा सकता. ऐसे में मुलमुला पुलिस बिना एफआईआर तथा न्यायायिक आदेश के युवक को लॉकअप में रखा जाना पुलिस की कार्य प्रणाली पर सवालिया निशान लगाता है. बहरहाल आलाधिकारी किसी तरह तनाव खत्म करने के प्रयास में जुटे हुए है.
नरियरा के दलित युवक की पुलिस की पिटाई से हुई मौत को लेकर गृह ग्राम नरियरा में भी स्थिति तनाव पूर्ण होने की जानकारी आ रही है. नारंगे की मृत्यु की जांच के लिए न्यायिक मजिस्ट्रेट की नियुक्ति की जाएगी. इसे लेकर एसपी अजय यादव ने मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को पत्र लिखा है. पत्र में बताया गया है नरियरा निवासी मृतक सतीष नारंगे पिता राजाराम को खूंटीघाट नरियरा पावर सब स्टेशन के संचालक की शिकायत पर 17 सितम्बर को थाना मुलमुला लाया गया था. पुलिस अभिरक्षा में उसे स्वास्थ केन्द्र भेजा गया था. स्वास्थ केन्द्र में चिकित्सा अधिकारी द्वारा सतीष नारंगे को मृत घोषित किया गया. दलित कलाकार खोल रहे हैं एकजुटता का नया मोर्चा
दलितों को समाज में बराबरी का दर्जा दिलाने की मुहिम लिए तमाम दलित कलाकार 15 सितंबर को एक मंच पर आए. इन कलाकारों में शीतल साठे, गिन्नी माही, संजय राजौरा और सुजत अंबेडकर शामिल हैं, जिन्होंने मिलकर दिल्ली के मावलंकर हॉल में एक इवेंट किया. आर्टिकल-14: लड़ाई बराबरी की- स्टैंड अप फॉर इक्वल राइट्स\”” नामक इस इवेंट में इन सभी ने दलितों के हक की आवाज उठाई. कई दलित संगठनों और दलित स्वाभिमान संघर्ष के अंतर्गत काम कर रहे कई वर्कर्स एसोसिएशन के लोग भी इसका हिस्सा बने. इसमें जो कलाकार शामिल हुए उनसे मिलिए-
शीतल साठे
शीतल साठे पुणे, महाराष्ट्र से हैं. दलित अधिकारों के लिए संघर्षरत और लोक गायिका, शीतल साठे ने 17 साल की उम्र से ही संगीत के जरिए दलितों को समाज में बराबरी दिलाने की मुहिम आरंभ कर दी थी. साठे, ”कबीर कला मंच” से ताल्लुक रखती हैं. इसी से उनके पति सचिन माली भी जुड़े हैं. तीन साल पहले 2013 में उन्हें महाराष्ट्र विधानसभा के सामने से तब गिरफ्तार किया गया था जब वे आठ माह की गर्भवती थीं. साठे पर माओवादियों को सपोर्ट करने का आरोप लगता रहा है. इस कार्यक्रम में हिस्सा लेने के लिए वो तीन साल बाद अपने बेटे को लेकर दिल्ली पहुंची थी.
सुजत अम्बेडकर
सुजत पेशे से ड्रमर हैं. वे बाबासाहेब अम्बेडकर के पोते हैं और दलितों के लिए आवाज उठाते रहे हैं. उन्होंने इस इवेंट का नाम \””आर्टिकल 14\””, भारतीय संविधान के आर्टिकल 14 के नाम पर चुना है.
गिन्नी माही
गुरकनवाल भारती अब गिन्नी माही के नाम से जानी जाती हैं. ये जालंधर में रहती हैं, दलित हैं और दलितों को केंद्र में रखकर ही गाती हैं. वे संत रविदास और बाबासाहेब अंबेडकर को अपना आइडल मानती हैं. वे भी दलितों के अधिकारों की बात करती हैं. गिन्नी सोशल मीडिया पर खासी पसंद की जा रही हैं. उनके गानों में जातिवाद, वित्तीय असामनता, सामाजिक असमानता आदि प्रमुख मुद्दे होते हैं.
संजय राजौरा
नई दिल्ली में जन्मे संजय राजौरा पेशे से कमेडियन हैं. इससे पहले वे सॉफ्टवेयर इंडस्ट्री में दस साल तक काम कर चुके हैं और इस लाइन के इंजीनियर्स के जीवन पर काफी कॉमेडी करते हैं. इसके अलावा वे राजनीति, धर्म, समाजिक असमानता आदि विषयों पर भी काफी जोक्स सुनाते हैं.
क्या है मांग
ये सभी कलाकार लंबे समय से दलितों को समाज में एक समान अधिकार दिलाने की बात करते रहे हैं. इसके लिए ये अपने संगीत, गायन, लेखन आदि का सहारा लेते हैं. इनमें से कुछ पर सामाजिक असमानता बढ़ाने व माओवादियों को सपोर्ट करने के आरोप भी लगते रहे हैं. एक देश एक चुनाव: लोकतंत्र की हत्या का प्रस्ताव
2014 में हुए लोकसभा चुनावों में यदि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीति और नीयत पर भरोसा करने वालों की देश में कमी होती, तो वे 282 सीटों पर कब्ज़ा कर के लोकसभा में न पहुंचे होते. किंतु उनके प्रधानमंत्री बनने के पहले और बाद के मोदी जी और उनके सबसे बड़े बफादार अमित शाह द्वारा जिस तरह की जुमलेबाजी और बीजेपी की पैत्रिक संस्था द्वारा किसी न किसी बहाने जिस प्रकार से अराजकता/जातीय हिंसा को बढ़ावा दिया जा रहा है, मोदी जी और उनके समर्थक घटकों से समाज के आम आदमी का दम घुटने लगा है.
लगता तो ये है कि मोदी जी की सरकार और सरकार के समर्थक हिन्दूवादी संगठनों ने 2019 में होने वाले चुनावों के मद्देनजर मतदाता के जड़ों में मट्ठा डालने का काम शुरु कर दिया है. इस कमी को पूरा करने के लिए मोदी जी का तानाशाही आचरण उजागर होने लगा है. यूं तो हमारे देश में लोकसभा और विधान सभाओं के चुनाव एक साथ कराने की चर्चा वर्षों से चली आ रही थी किंतु अपनी सरकार के दो साल पूरे होते ही, मोदी जी ने अपनी जिस मुहिम को तेज़ करने का कवायद की है, वह है लोकसभा, विधानसभा, नगर निकायों और पंचायतों के चुनाव एक साथ कराना.
इस संबंध में मोदी जी का यह तर्क ज़रा भी यक़ीन करने लायक नहीं है कि वे चाहते हैं कि राजनीतिज्ञों को कभी कहीं, कभी कहीं, होने वाले चुनावों की उठापटक में ज़्यादा वक़्त देने के बजाय सामाजिक कार्यों पर ध्यान देने के लिए समय मिलेगा और राजनीतिक संस्थानों के चुनाव अलग-अलग कराने पर होने वाले सरकारी खर्च में हज़ारों करोड़ रुपयों की बचत भी होगी. सिद्धांततः मोदी जी की इन दोनों दलीलों से पवित्रता की ख़ुशबू आती है, लेकिन मोदी जी अगर इतने ही सतयुगी होते तो फिर बात ही क्या थी? इसलिए उनके ये तर्क मानने को मन नहीं करता.
असल में मोदी जी को चिंता हो रही है कि 2019 में होने वाले लोकसभा चुनावों में उनकी काठ की हाँडी का क्या होगा. दोबारा चढ़ेगी कि नहीं? सत्ता के मद में शायद मोदी जी भूल गए कि काठ की हाँडी चूल्हें पर एक बार ही चढ़ पाती है. इस माने में मोदी जी की चिंता जायज ही है. इसलिए गुजरात से दिल्ली की छलांग लगाने की तैयारी के दौर में ही उन्होंने दिमाग़ बना लिया था कि दूसरी बार सिंहासन कब्जाने के लिए उन्हें देश भर में सारे चुनाव एक साथ करवाने का दांव खेलना होगा. इसलिए भारतीय जनता पार्टी ने लोकसभा के पिछले चुनाव के लिए ज़ारी अपने घोषणा पत्र में चुपके से यह लिख दिया था कि सरकार में आने के बाद वह “लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने का तरीक़ा निकालेगी.” इसका सीधा सा अर्थ है कि लोकसभा में ये प्रस्ताव आसानी से पास हो जाएगा किंतु राज्यसभा में जरूर पास नहीं हो पाएगा. तब मोदी जी को एक मुद्दा मिल जाएगा कि हमने जो वायदे जनता से किए थे, उन्हें विपक्ष लागू करने में टाँग अड़ा रही है. वैसे भी संविधान में संशोधन करने के लिए दो तिहाई सांसदों के समर्थन की जरूरत होती है. बीजेपी के साथ शायद इतना समर्थन नहीं है, यदि होता तो वो इस प्रस्ताव को केवल हवा में न उछालते, अब तक प्रस्ताव को लागू करा चुके होते. लगता तो यह है कि इस मुद्दे को हवा देने का आशय केवल और केवल अपनी नाकामियों का ठीकरा विपक्ष के सिर पर मढ़ना और अपने चिरपरिचित अंदाज में मतदाता को पुन: मूर्ख बनाने का एक प्रयास है.
बीजेपी की सरकार बनने के बाद मोदीजी ने ख़ामोशी से अन्दरखाने अपना यह काम ज़ारी रखा. आर एस एस ने कस्बों और गांवों तक अपनी शाखाओं का तेज़ी से न केवल विस्तार करना शुरू किया अपितु किसी न किसी बहाने समाज में अराजकता फैलाने का काम शुरु कर दिया. मोदी ने भाजपा की राष्ट्रीय कार्यसमिति की एक बैठक में सभी चुनाव एक साथ कराने की अपनी योजना को पूरी तरह से समझाया और फिर सभी राजनीतिक दलों की एक बैठक में भी इस पर ज़ोर दिया कि बड़े-छोटे सभी चुनावों का एक साथ होना क्यों ज़रूरी है.
असल मे तमाम नुस्खे आजमाने के बाद भी बिहार और कई अन्य राज्यों के विधान सभाओं के चुनावों में मात खाने के तुरंत बाद दिसंबर 2015 में प्रधानमंत्री मोदी ने “एक देश एक चुनाव” के मद्दे की जोर-शोर से वकालत करते हुए एक ठोस क़दम उठाया. और एक संसदीय समिति गठित की और लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने की संभावनाओं के बारे में अपनी रिपोर्ट देने को कहा. संसद में कार्मिक, जन-शिक़ायतें और क़ानून-न्याय मंत्रालय की स्थायी समिति ने जो रपट पेश की वह कहती है कि “बार-बार होने वाले चुनावों की परेशानियों से लोगों और सरकारी मशीनरी को राहत दिलाने का समाधान खोजा जाएगा.“ रपट में यह भी कहा गया कि “अगर भारत को एक मज़बूत लोकतांत्रिक देश के नाते विकास की दौड़ में दुनिया के अन्य देशों से मुक़ाबला करना है तो देश को आए दिन होने वाले चुनावों से निज़ात पानी ही होगी.”
संसदीय समिति की रपट में एक साथ चुनाव कराने के तीन फ़ायदों पर ज़ोर दिया गया…. एक- इससे बार-बार चुनाव कराने पर अभी खर्च होने वाले सरकारी धन में काफी कमी आएगी; दो- चुनावों के समय लगने वाली आचार-संहिता की वज़ह से रुक जाने वाले कामों से होने वाला नुक़सान कम हो जाएगा; और तीन- सरकारी अमले के चुनाव के काम में लग जाने की वज़ह से सार्वजनिक सेवा के बाक़ी ज़रूरी कामों पर प्रतिकूल असर नहीं पड़ेगा. समिति के मतानुसार यदि देश में लोकसभा और विधान सभाओं के चुनाव एक साथ होंगे तो इस परेशानियों से निजात मिल सकती है. रपट में विस्तार से यह भी बताया गया है कि लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव अंततः एक साथ कराने की स्थिति कैसे लाई जाए और इस बीच किस तरह विधानसभाओं के कार्यकाल को समायोजित किया जाए…..
इस प्रकार की आंकड़ेबाजी से सहमत हुआ जा सकता है किन्तु इस प्रस्ताव के व्यावहारिक पक्ष पर समिति ने कोई बात नहीं की कि यदि ऐसा हो जाता है तो केन्द्र और राज्य सरकारों का व्यवहार क्या होगा. इस प्रस्ताव के पीछे की सत्ताशीन राजनीतिक दल की मंशा को सियासी अखाड़े का कोई भी खिलाड़ी बड़ी सहजता से भाँप सकता है. कहना अतिशयोक्ति न होगा कि यदि केंद्र और राज्यों की सरकारों के लिए चुनाव एक साथ होंगे तो मतदाता एक ही राजनीतिक दल के पक्ष में मतदान करना पसंद करता है. यह एक आम अवधारणा है. इसमें कोई रहस्य की बात नहीं. ऐसा होने पर केन्द्र और राज्यों में किसी एक ही दल की सरकारें बनने की संभावना को नहीं नकारा जा सकता. जो न लोकतंत्र की परिभाषा को नकारता है अपितु लोकतंत्र की हत्या का द्योतक है. 1999 से अब तक देश लोकसभा और विधान सभाओं में एक साथ हुए चुनावों के आँकड़े इस बात का प्रमाण हैं. राजनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ होने पर 77 प्रतिशत मतदाताओं ने लोकसभा और राज्य विधान सभाओं लिए एक ही पार्टी को वोट देना पसंद किया. मोदी इतने भोले तो नहीं हैं कि इस सत्य से अवगत न हों. इसलिए संविधान की तमाम व्यवस्थाओं से इतर 2019 में सभी चुनाव एक साथ कराने की उनकी ललक आसानी से समझी जा सकती है.
चिरपरिचित संविधान विशेषज्ञ माननीय आर. एल. केन के अनुसार संविधान की धारा 83 (2) में लोकसभा का कार्यकाल उसकी पहली बैठक से पांच साल तक के लिए तय है. इसी तरह धारा 172 (1) विधानसभाओं को भी पांच साल के कार्यकाल का अधिकार देती है. सामान्य स्थिति में यह कार्यकाल पूरा होना ही चाहिए. लोकसभा और विधानसभाएं समय से पहले भंग की जा सकती हैं. प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री यह भी तय कर सकते हैं कि चुनाव कब कराए जाएं. लेकिन एक साथ चुनाव कराने के मक़सद से विधानसभाओं को समय से पहले भंग करना संविधान का दुरुपयोग ही माना जाएगा. असामान्य स्थित में राष्ट्रपति को किसी विधानसभा का कार्यकाल एक साल तक बढ़ाने का अधिकार है.
अब जबकि काँग्रेस पार्टी द्वारा नियत किए गए वर्तमान राष्ट्रपति ने ही मोदी जी के “एक देश एक चुनाव” से सहमति व्यक्त कर दी है तो हमें 2017 के जुलाई-अगस्त में सत्तारूढ़ भाजपा की कृपा से मिलने राष्ट्रपति से “एक देश एक चुनाव” के नकार की कैसे आशा की जा सकती. जाहिर है कि अगला राष्ट्रपति निश्चित रूप से आर एस एस द्वारा ही प्रस्तावित होगा, बीजेपी की शायद राष्ट्रपति के चुनाव में केवल और केवल सहमति ही होगी. यह केवल शंका ही नहीं अपितु ऐसा सोचने के पीछे बीजेपी के सुब्रह्मनियम स्वामी का वो बयान है जिसमें उन्होंने दिल्ली के उप-राज्यपाल नजीब जंग को हटाकर संघ के किसी व्यक्ति को दिल्ली के उप-राज्यपाल बनाने की वकालत की है. यहां एक सवाल उठना जरूरी है कि क्या किसी एक राजनीतिक दल की इच्छा पूरी करने के लिए अपने इस विशेषाधिकार का इस्तेमाल करना, क्या किसी भी राष्ट्रपति के लिए संवैधानिक और नैतिक नज़रिए से उचित होगा?
भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त नसीम जैदी ने भी भारत में लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव को एक साथ करवाने पर जोर दिया है, हालाँकि इसके लिए सभी राजनीतिक दलों का एकमत होने के साथ-साथ संवैधानिक संशोधन भी जरूरी है. उन्होंने यह भी कहा कि यदि ऐसा हो जाता है तो चुनाव आयोग लोकसभा चुनाव और राज्य विधानसभा के चुनावों को एक साथ करवाने के लिए तैयार है.
न्यूज़-व्यूज़ इंडिया के संपादक के अनुसार, “लोकसभा और विधान सभाओं के एक साथ चुनाव कराने में कई और भी व्यवहारिक दिक्कतें आएंगी. एक ही दिन पूरे देश में चुनाव कराने के लिए पुलिस और अर्द्ध-सैनिक बलों की क़रीब चार हज़ार कंपनियां लगेंगी. अभी सरकार बमुश्किल एक हज़ार कंपनियों का इंतज़ाम कर पाती है. चार गुना ज़्यादा पुलिस-बल एकाएक हवा में से तो पैदा हो नहीं सकता. इसके लिए पैसा कहां से आएगा. एक ही दिन में सभी जगह चुनाव कराने के लिए लगने वाली मतदान मशीनों का इंतज़ाम भी एक मुद्दा है. एक साथ चुनाव कराने पर राज्यों में स्थानीय मुद्दे, राष्ट्रीय मुद्दों के शोर में ग़ुम हो सकते हैं या इसके उलट स्थानीय मुद्दे इतने हावी हो सकते हैं कि केंद्रीय मसलों का कोई मतलब ही न रहे.” ….
हाँ! इस योजना को लागू किए जाने की वकालत करना राजनीतिक दलों के हित में तो हो सकता है किंतु देश और देश की जनता के हित में कतई लाभकारी नहीं हो सकता. उदाहरण के रूप में 2014 के लोकसभा चुनावों को ही लिया जा सकता है. मानलो कि यदि इस वर्ष के लोकसभा चुनावों के साथ-साथ विधान सभाओं के चुनाव भी होते तो जनता का मत महज एक तरफ ही जाता. केन्दीय सरकार के मुद्दे और राज्य सरकारों के मुद्दे अलग-अलग न होकर घालमेल का शिकार हो जाते. इतना ही नहीं, यह भी जब केन्द्र में सत्तारूढ़ बीजेपी के चलते सरकार दो साल पूरे होने तक समाज में, बीजेपी की पैत्रिक संस्था आर एस एस का फैला आतंक किस हद तक चला जाता यदि राज्य सरकारें भी बीजेपी की ही होतीं तो देश की क्या हालत होती, इसका सहज ही अन्दाजा लगाया जा सकता है.
सारांशत: कहा जा सकता है कि “एक देश एक चुनाव” की व्यवस्था देश में अधिनायकवाद या यूं कहें कि हिटलशाही और तानाशाही को ही जन्म देगी. देश में चौतरफा अराजकता का माहौल होगा. सत्तारूढ़ राजनीतिक दल का आचरण लोकतांत्रिक न होकर पूरी तरह अलोकतांत्रिक हो जाएगा. या यूं कहें कि यदि “एक देश एक चुनाव” की व्यवस्था देश में लागू हो जाती है तो यह लोकतंत्र की हत्या का प्रस्ताव ही सिद्ध होगा.
– लेखक लेखन की तमाम विधाओं में माहिर हैं. स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त होकर इन दिनों अधिकार दर्पण नामक त्रैमासिक के संपादन के साथ स्वतंत्र लेखन में रत हैं. संपर्क- 9911414511 मनुवाद के कंधों पर मानवतावाद का जनाजा
घटना पिछले दिनों की है। मध्य प्रदेश के मुरैना जिले के एक गांव में दबंग जातियों के लोगों ने एक मृतक दलित महिला का शमशान घाट पर अंतिम संस्कार नहीं होने दिया। क्योंकि शमशान घाट की जमीन पर दबंग जातियों के लोगों का कब्जा है, इतना ही नहीं उस जमीन पर दबंगों की फसल लहलहा रही है। जबकि खबर यह भी है कि गांव में ही तीन शमशान घाट मौजूद हैं। पर मजबूरन उक्त दलित महिला के शव का दाह संस्कार मृतका के घर के सामने ही करना पड़ा। दूसरी घटना उड़ीसा के कालाहांडी की है। कालाहांडी में दाना मांझी टीबी से पीड़ित पत्नी का इलाज सरकारी अस्पताल में करा रहा था। इलाज के दौरान दाना मांझी की पत्नी की मौत हो गयी। पत्नी के शव को गांव ले जाने हेतु एंबुलेस उपलब्ध कराने के लिए अस्पताल प्रशासन से गुहार लगायी, जो प्रशासन ने अनसुनी कर दी। फिर विवश होकर दाना मांझी पत्नी के शव को चादर और चटाई में लपेट कर कंधे पर रखकर चल दिया। 12 किमी से अधिक का सफर करने के दौरान जागरूक इंसान के रूप में उसे कुछ फरिस्ते मिले, जिन्होंने स्थानीय प्रशासन की मदद से एंबुलेंस बुलाकर शव को उसके गांव मेलघरा पहुँचाया।
तीसरी घटना भी उड़ीसा की ही है। बालासोर का सरकारी अस्पताल तो एंबुलेस के बजाए डंडों से काम चलाता है। खासतौर से वंचित वर्ग के मामले में। बालासोर के उक्त अस्पताल में अल्पसंख्यक वर्ग की एक बुजुर्ग महिला की मौत के बाद, कर्मचारियों ने मृतक महिला की हड्डियॉं तोड़कर पहले तो उसकी गठरी बनायी और फिर शव को डंडे पर लटकाकर रेलवे स्टेशन तक लाया गया, ताकि उसे पोस्टमार्टम के लिए दूसरे स्थान पर पहुँचाया जा सके। हाल ही में मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले के करैरा कस्बे में अलपसंख्यक वर्ग के एक व्यक्ति की तालाब में डूबने से मौत होने पर एंबुलेस को कई बार फोन किया, जब एंबुलेस नहीं आयी, तो मृतक का बेटा शव को हाथ ठेले में रखकर अस्पताल ले गया। देश में आमतौर पर ट्रैक्टर-ट्रॉली का प्रयोग कृषि कार्यों एवं सामान को लाने ले जाने के लिए किया जाता है, पर एक राष्ट्रीय समाचार पत्र में चित्र सहित प्रकाशित एक समाचार के अनुसार, अस्पताल के कर्मचारियों द्वारा एक आदिवासी के शव का पोस्टमार्टम ट्रैक्टर ट्रॉली में रखकर किया जा रहा था।
हम चाहें राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की कामयाबी के लाख डंके बजाएं पर उक्त घटनाओं से लगता है कि आजादी के लगभग सात दशक बाद भी हमारा समाज वंचित वर्ग खासतौर से … दलितों एवं आदिवासियों के प्रति मानवीय संवेदनाओं से शून्य होता जा रहा है। पाशुविक व्यवहार की ऐसी घटनाएं हमारे समाज की आधुनिक सोच के दावों को खोखला साबित कर रही हैं। वंचित वर्ग खासतौर से दलितों एवं आदिवासियों के शवों के अंतिम संस्कार से जुड़े विवादित मामले सिर्फ सामाजिक ही नहीं हैं, बल्कि इन्हें सरकारी एवं राजनीतिक संरक्षण मे घटित होते हैं। शहरी क्षेत्रों में भी जातीय एवं वर्णव्यवस्था के अनुसार शवदाहगृहों का आवंटन किया जा रहा है। मसलन् माननीय राजस्थान उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को फटकार लगायी थी, कि जयपुर नगरपालिका द्वारा संचालित शवदाहगृहों में सभी वर्गों के लिए अंतिम संस्कार की समुचित सुविधाएं उपलब्ध करायी जाएं। यहॉं बताते चलें कि जयपुर नगरपालिका ने अंतिम संस्कार के लिए जातीय एवं वर्णव्यवस्था के आधार पर शवदाहगृहों का आवंटन किया है। जबकि शहरों में सरकार द्वारा स्थापित शवदाहगृहों पर सभी जातियों एवं वर्गों का समान अधिकार होता है।
फिर भी दबंग जातियां दलितों-आदिवासियों को सार्वजनिक शवदाहगृहों पर अंतिम संस्कार नहीं करने देतीं। जिसके कारण दलितों के शवदाहगृह अलग होते हैं। देश में खास तौर पर ग्रामीण क्षेत्रों में अंतिम संस्कार के लिए लोगों ने जातीय या सामुदायिक आधार पर शवदाहगृह निर्धारित कर रखे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों के शवदाहगृह बेशक ग्राम सभा की जमीन पर होते हैं पर गांवों में जातिवाद की जड़ें इतनी अधिक गहरी होती हैं कि उनका संचालन अलग-अलग जातियों एवं समुदायों द्वारा किया जाता है। शवदाहगृहों के मामले में गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, झारखण्ड, आंध्रप्रदेश, कनार्टक एवं तमिलनाडू आदि राज्यों में भी लगभग एक जैसा हाल है। गुजरात राज्य ग्राम पंचायत समाज न्याय समिति की सर्वेक्षण रिपोर्ट के अनुसार देश का विकास मॉडल माने जाने वाले गुजरात राज्य के 650 गांवों में से करीब 400 गांवों में दलितों के लिए शवदाहगृहों की व्यवस्था नहीं है। लगता है कि मनुवाद के कंधों पर मानवतावाद का जनाजा निकल रहा है।
गुजरात में उना घटना के बाद दलित भय के वातावरण में जी रहे हैं। खास तौर से गुजरात में मरे पशुओं की खाल उतारने का काम करने वाली दलित जातियों के सामने आगे कुआं और पीछे खाई वाली स्थिति बनी हुई है। यानि कि वह मृत गाय की खाल उतारते हैं तो भी उन्हें सामाजिक उत्पीड़न झेलना पड़ता है और खाल उतारने से मना करते हैं तो भी उनका उत्पीड़न हो रहा है। यानि कि चित्त भी दबंग जातियों की और पट्ट भी। कई घटित घटनाओं की प्रतिक्रिया में दलितों, आदिवासियों एवं मुस्लिमों द्वारा एकजुट होकर विरोध प्रदर्शन करना हिन्दुत्वीय ताकतों के लिए खतरे की घंटी है। बाबा साहब डा0 अम्बेडकर ने महाराष्ट्र में महाड तालाब का पानी प्राप्त करने के लिए सांकेतिक आंदोलन विषमतावादी समाज को यह संदेश देने के लिए किया था कि जब दबंग जातियों के पशु उक्त तालाब का पानी पी सकते हैं, तो दलित वर्ग के लोग उस तालाब से पानी प्राप्त क्यों नहीं कर सकते। क्या दबंग जातियॉं दलितों को पशुओं से भी बदतर समझती हैं। दलितों-आदिवासियों के अधिकारों एवं उनके संरक्षण की संवैधानिक व्यवस्थाओं के वाबजूद समाज में दलितों एवं आदिवासियों के प्रति पाशुविक मानसिकता के लोग आज भी मौजूद है।
यही कारण है कि ऐसी क्रूरतम घटनाएं आए दिन कहीं न कहीं पर घटित होती रहती हैं।
उक्त घटनाएं मात्र कुछ समय के लिए मीडिया की खबरें तो बनती हैं, पर वे पीड़ितों को न्याय दिलाने के अंजाम तक नहीं पहुँच पाती हैं। क्योंकि ऐसी घटनाओं में अधिकांशतः स्थानीय प्रशासन पीड़ित दलितों एवं आदिवासियों के हितों के विपरीत दबंगों जातियों की दबंगई के आगे घुटने टेक देता है। ऐसी घटनाओं की प्रतिक्रिया में मध्य प्रदेश सरकार ने निर्णय लिया है कि अगर कोई भी व्यक्ति दलितों को श्मशान घाट, कब्रिस्तान और मंदिर आदि का इस्तेमाल करने से रोकता है, तो सरकार पीड़ित परिवार को एक लाख रूपये का अनुदान देगी। अगर कोई सरकारी कर्मचारी या अधिकारी दलितों या आदिवासियों का उत्पीड़न करता है तो राज्य सरकार 2 लाख रूपये का मुआवजा एवं मृतक के आश्रितों को प्रति माह पॉंच हजार रूपये की स्थायी पेंशन देगी। यानि कि ओहदे में जितना बड़ा व्यक्ति दलितों एवं आदिवासियों का उत्पीड़न करेगा। पीड़ित परिवारों को उतना ही अधिक मुआवजा मिलेगा। यह कैसा न्यायिक मापदंड है। हमारे शासक वर्ग को यह बात समझ लेनी चाहिए कि दलित एवं आदिवासियों के उत्पीड़न की घटनाओं पर मुआवजों या अनुदानों की रोटियॉं सेकने का राजनीतिक खेल से उक्त वर्ग ऊब चुका है।
आज उक्त वर्ग इतना जागरूक हो चुका है कि कई ऐसे मामलों में पीड़ित परिवार सरकारी मुआवजां या अनुदानों को ठुकरा चुके हैं। देश में अम्बेडकर विरोधी विचारधारा का पोषण करने वाली ताकतें स्वयं को अम्बेडकरवादी होने के ढ़ोंग की लाईन में खड़ी हैं। जिसके चलते चंद तथाकथित दलित नेता ऐसी ताकतों के दलित मुखौटे बनने को आतुर नजर आ रहे हैं। आज कहीं डा0 अम्बेडकर से जुड़े विदेशी स्थलों को खरीदा जा रहा है, तो कहीं डा0 अम्बेडकर द्वारा स्थापित बुद्ध भूषण प्रेस की ऐतिहासिक इमारत को ढ़हाकर उसे फिर से विकसित करने के प्रयास हो रहे हैं। इन तमाम प्रयासों का डा0 अम्बेडकर की वैचारिक स्मृतियों से कोई खास सरोकार नहीं हैं। क्योंकि इस बीच उनके विचारों को अमलीजामा पहनाने की चर्चा लगभग गायब है। और ऐसे कोई प्रयास भी नजर नहीं आ रहे हैं। डा0 अम्बेडकर चाहते थे कि उक्त उत्पीड़ित वर्गों को मात्र मुआवजा नहीं, इंसाफ भी चाहिए। क्या दलितों एवं आदिवासियों के उत्पीड़न की घटनाओं के प्रति निष्ठुर होता जा रहा हमारा शासक वर्ग, उक्त पीड़ित वर्ग को इंसाफ दिलाने की गारंटी देने को तैयार है। शाकाहार और मांसाहार की बहस
शाकाहार और मांसाहार में तुलनात्मक मेरिट की ही बात है तो ध्यान रखियेगा कि दुनिया में सारा ज्ञान विज्ञान तकनीक मेडिसिन चिकित्सा यूनिवर्सिटी शासन प्रशासन संसदीय व्यवस्था व्यापार उद्योग इत्यादि यूरोप के मांसाहारियों ने ही दिया है. भारत सहित अन्य मुल्कों को भी लोकतन्त्र, शिक्षा, विज्ञान और मानव अधिकार सिखाने वाले यूरोपीय ही थे. आज भी वे ही सिखा रहे हैं. मुल्क जिन भी व्यवस्थाओं से चल रहा हा वो सब उन्ही की देन है.
अपने वेदों और पुराणों को भी ठीक से देखिये, देवताओ सहित ऋषि मुनि पुरोहित राजा और सभी देवियाँ मांसाहारी हैं. शाकाहारी खुद हजारो साल तक गुलाम रहे हैं और गुलामियों और भेदभाव को पैदा करने में विश्व रिकॉर्ड बनाते रहे हैं.
शाकाहार की बहस असल में मुल्क को कमजोर कुपोषित और मानसिक रूप से दिवालिया बनाती है. शाकाहार में अव्वल तो आवश्यक पोषण होता ही नहीं या फिर इतना महंगा होता है कि भारत जैसे गरीब मुल्क में इसकी मांग करना गरीबों का मजाक है. पूरी दुनिया में भारत डाइबिटीज केपिटल बना हुआ है. कारण एक ही है, भारतीय थाली से प्रोटीन छीन लिया गया है. सबसे कमजोर और बोगस भोजन भारत का ही है. रोटी, चावल, घी, तेल, मक्खन, दूध दही शक्कर नमक सहित सभी अनाज सिर्फ फेट स्टार्च और कारबोहाइड्रेट देते हैं. बस चुल्लू भर दाल में ही थोडा सा प्रोटीन है वो भी अब आम आदमी की औकात के बाहर चली गयी है.
इसीलिये भारत लंबे समय से कमजोर, ठिगने, मन्दबुद्धि और डरपोक लोगों का मुल्क रहा है. भारत की 15 प्रतिशत से ज्यादा आबादी पुलिस या सेना की नौकरी के लायक ही नहीं होती. मुल्क की जनसंख्या में इतने बड़े अनफिट प्रतिशत का उदाहरण पूरी दुनिया में और कहीं नहीं है. याद कीजिये मुट्ठी भर मुगलों और अंग्रेजों ने इस मुल्क पर हजारों साल राज किया था. ये शाकाहार की महिमा है. हालाँकि इसमें जाति और वर्ण व्यवस्था का भी हाथ है जिसने फ्री नॅचुरल सिलेक्शन को असंभव बनाकर पूरे मुल्क के जेनेटिक पूल को जहां का तहाँ कैद कर दिया है और समाज को हजारों टुकड़ों में तोड़ डाला है. इस देश में कोई जेनेटिक मिक्सिंग और सुधार नहीं हो सका है.
बाकी सौंदर्यबोध के नाते आप शाकाहारी हैं तो ठीक है, आपकी मर्जी… लेकिन उससे आप महान नहीं बन जाते, न ही मांसाहारी नीच हो जाते हैं. अपनी महानता दूसरों पर थोपकर उनसे बदलने का आग्रह करना भी हिंसा है. मांसाहारियों ने शाकाहारियों की थाली को लेकर कभी बवाल नहीं किया. लेकिन शाकाहारियों को जाने क्या दिक्कत होती है उनकी नजर हमेशा भटकती रहती है. आपका स्वर्ग तो पक्का है, अकेले वहां जाकर खुश रहो न भाई, दूसरों की हांडी में झाँकने की क्या जरूरत है?
शाकाहार और शुचिता का दावा करने वालों का आचरण देखिये. वे हजारों साल से इंसान का खून चूस रहे हैं. उनके देवी देवताओं को देखिये, वे हमेशा तीर तलवार लिए खड़े हैं. उनकी देवियां प्याले भर भर खून पी रही हैं. जिनको मांसाहारी कहा जाता है उनका एकमात्र मसीहा बिना तीर तलवार गंडासे के नंगा होकर सूली पर लटका है और सबको माफ़ करते हुए विदा ले रहा है. और जिन लोगों को आतंकी या खूंख्वार कहकर लांछित किया गया है; उन्होंने अपने खुदा की कोई तस्वीर और मूर्ति तक नहीं बनाई है.
– लेखक भोपाल में रहते हैं. सामयिक विषयों पर लेखन भी करते हैं।
… तो जेएनयू की लाल दीवारों पर चटख नीली स्याही पुत जाएगी
अम्बेडकरी आंदोलन से जुड़े लोगों के लिए जेएनयू छात्रसंघ के नतीजे एक नई उम्मीद लेकर आए हैं. अम्बेडकर-फुले विचारधारा के वाहक ””””””””बिरसा अम्बेडकर फुले स्टूडेंट एसोसिएशन”””””””” यानि बपसा ने जिस तरह से छात्रसंघ चुनाव में प्रदर्शन किया है, उसने यह साफ कर दिया है कि अगली बार अगर अम्बेडकर-फुले की विचारधारा से जुड़े सभी छात्र साथ आ गए तो जेएनयू की लाल दीवारों पर चटख नीली स्याही पुत जाएगी और जेएनयू में नीला झंडा लहराएगा.
चुनाव के नतीजे को ध्यान से देखें तो प्रमुख मुकाबलों में बपसा ने कुछ में भाजपा और कांग्रेस के उम्मीदवारों पर बढ़त हासिल की है. चुनावी नतीजे में सभी चारों प्रमुख सीटों पर हालांकि लेफ्ट गठबंधन ने जीत हासिल कर ली है, लेकिन बपसा ने हार जाने के बावजूद लेफ्ट का पसीना निकाल दिया. जिस तरह से वोटों की गिनती होनी शुरू हुई. उससे शुरुआती कयास लगाने जाने लगे थे कि बपसा एक या दो सीटों को जीत जाएगी. हालांकि ऐसा हो ना सका. लेकिन बपसा ने अपने प्रदर्शन के आधार पर प्रतिद्वंदी छात्र संगठनों को यह चेतावनी और चुनौती दे डाली है कि वो बपसा को हल्के में ना ले. बपसा से जुड़े छात्रों और चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों को इस चुनाव के नतीजों को चुनौती के रुप में लेना चाहिए और जमकर मेहनत करनी चाहिए. अगर उन्होंने अपनी इस उम्मीद को मेहनत के पसीने से सींच लिया तो इसमें कोई शक नहीं की जेएनयू छात्रसंघ चुनाव में अगली बार नीला झंडा लहराएगा. इस प्रक्रिया में इस विचारधारा से जुड़े विश्वविद्यालय के अन्य प्रोफेसरों को भी छात्रों का मार्गदर्शन करना चाहिए.
इसका एक दूसरा पहलू यह भी हो सकता है कि देश के अन्य विश्वविद्यालयों में भी बपसा के झंडे तले छात्र एकत्र होने लगे और यह छात्र संगठन देश के तमाम विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले फुले-अम्बेडकरी विचारधारा के छात्रों के लिए एक अवसर मुहैया करा दे. दलित दस्तक में बपसा के बारे में खबर प्रकाशित होने पर इलाहाबाद विश्वविद्यालय से वहां बपसा की ईकाइ के गठन को लेकर दलित दस्तक के पास फोन भी आ चुका है. बपसा को इस दिशा में भी सोचना होगा. 
