त्रिपुरा के गवर्नर बोले- गृहयुद्ध चाहते थे जनसंघ संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी

नई दिल्ली। त्रिपुरा के गवर्नर तथागत रॉय के एक ट्वीट को लेकर बवाल मच गया है. 18 जून को किए गए उनके एक ट्वीट को लेकर यह विवाद हुआ है. अपने ट्वीट में तथागत रॉय ने भारतीय जन संघ (अब भारतीय जनता पार्टी) के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बारे में ट्वीट करते हुए लिखा है कि मुखर्जी हिंदू-मुस्लिम विवाद सुलझाने के लिए गृहयुद्ध चाहते थे.

रॉय ने दावा किया है कि उन्होंने यह बात 1946 में श्यामा प्रसाद मुखर्जी की एक डायरी एंट्री के हिस्से से किया है. अपने इस ट्रवीट के लिए उनकी सोशल मीडिया पर काफी आलोचना भी हुई. कई लोगों ने उनकी गृहयुद्ध भड़काने के लिए आलोचना भी की जिसकी सफाई पेश करते हुए उन्होंने कहा कि वह गृहयुद्ध भड़काने की नहीं बल्कि मुखर्जी की बात को कोट कर रहे थे.

अपने इस ट्वीट के बाद रॉय सोशल मीडिया पर ट्रोल भी हो गए. लोगों ने आलोचना कर कहा कि साम्प्रदायिक हिंसा भड़काने के लिए उनकी गिरफ्तारी की जाए. मामले को लेकर इंडियन एक्सप्रेस ने रॉय से बात करने की कोशिश की लेकिन उनकी तरफ से कोई जवाब नहीं आया. रॉय ने कहा कि वह 70 साल पुरानी एक डायरी के हवाले से यह बात कह रहे थे. उन्होंने लिखा- “गृहयुद्ध की बात भारत के विभाजन से पहले की थी और यह भविष्यवाणी तब सच साबित हो गई जब जिन्न ने इसके सात महीने बाद गृहयुद्ध छेड़ दिया और पाकिस्तान हासिल करने में कामयाब रहे. इन बातों के सच साबित होने का डॉ. मुखर्जी ने अनुमान लगाया था.”

बता दें इससे पहले भी कई बार तथागत राय के ट्विट से विवाद हो गया था. अगस्त 2015 में मुंबई 1993 बम धमाकों के दोषी याकूब मेमन के ट्विट को लेकर विवाद खड़ा हो गया था. उन्होंने ट्वीट में लिखा था कि याकूब मेमन के अंतिम संस्कार में शामिल होने वाले लोग संभावित आतंकवादी हो सकते हैं और उन लोगों पर कड़ी नजर रखनी चाहिए.

सुपरस्टार रजनीकांत जल्द रखेंगें राजनीति में कदम

साउथ के सुपरस्टार रजनीकांत जल्द ही राजनीति में कदम रखने वाले हैं, इसे लेकर महत्वपूर्ण जानकारी सामने आ रही है. रजनीकांत ने 19 जून को हिंदू पीपल्स पार्टी(हिंदू मक्कल काची) के नेताओं के साथ चेन्नई में मुलाकात की. समाचार एजेसीं ANI के मुताबिक पार्टी के महासचिव रविकुमार और नेता अर्जुन सम्पत ने चेन्नई के पोस गार्डन स्थित निवास पर मुलाकात की. मुलाकात को लेकर पार्टी नेता अर्जुन सम्पत ने कहा, “हमने उनसे बातचीत की और उनका जवाब भी काफी अच्छा था. रजनीकांत ने कहा कि वे राज्य और देश के लिए कुछ करना चाहते हैं. वह बहुत जल्दी राजनीति में आने के बारे में सोच रहे हैं. इस मुलाकात को लेकर रजनीकांत ने कहा कि पार्टी के नेता उन्हें अपनी शिष्टाचार भेंट देने पहुंचे थे और यह भेट सामान्य तौर पर थी.

रजनीकांत ने बीती 18 जून को किसानों के लिए एक रिवर इंटरलिंकिंग प्रॉजेक्ट के लिए 1 करोड़ रुपये देने की पेशकश की थी. लेकिन इस मदद को किसान एसोसिएशन के लीडर अय्याकन्नू और कई नेताओं ने लेने से इंकार कर दिया. पैसे वापिस करने की वजह बताते हुए अय्याकन्नू ने कहा था, “वो एक सुपर अभिनेता हैं, अगर वो पीएम को पैसे देंगे तो वो उसे लेकर कुछ करेंगे. लेकिन हमें वो पैसा देंगे तो उसका हम क्या करेंगे?” अय्याकन्नू ने पैसे के इस्तेमाल में असमर्थता जताते हुए यह बातें मीडिया के सामने कहीं. उनका मत था कि प्रॉजेक्ट के लिए मिलने वाली रकम का किसान क्या करेंगे. गौरतलब है हिंदू मक्कल काची पार्टी नेताओं ने रजनीकांत से मुलाकात उनके पैसे ऑफर करने के अगले दिन ही की है.

बीते कई महीनों से रजनीकांत के राजनीति में कदम रखने को लेकर कई सारी खबरें सामने आती रही हैं. बीते महीने ही रजनीकांत के भाई सत्यनारायण राव गायकवाड़ ने बताया था कि रजनीकांत जुलाई महीने के अंत तक राजनीति में एंट्री कर सकते हैं. सत्यनारायण ने कहा था- “यह लोगों की चाहत है कि रजनीकांत राजनीति में आएं. उन्होंने इस बारे में अपने फैन्स से विचार करना भी शुरू कर दिया है.” बहुत जल्दी से इस बारे में बड़ा निर्णय देश के सामने आ जाएगा.

 

एंबुलेंस निकलवाने के लिए पुलिसवाले ने रोका प्रणब मुखर्जी का काफिला

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बेंगलुरू। आपने सोशल मीडिया और टीवी पर एक विज्ञापन जरूर देखा होगा, जिसमें दो पुलिसवालें किसी नेता के काफिले को रोककर एंबुलेंस को जाने देते हैं. लेकिन बमुश्किल ही आपने ऐसा आम जिंदगी पर देखा होगा. लेकिन बंगलुरु में कुछ ऐसा ही हुआ, जब एक ट्रैफिक पुलिस वाले ने एंबुलेंस को जाम से निकलवाने के लिए राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का काफिला ही रुकवा दिया.

दरअसल, राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी शनिवार को बंगलुरु में थे, इस दौरान वहां के ट्रिनिटी सर्किल पर भारी जाम लगा, और एक एंबुलेंस वहां फंस गई. तभी वहां पर तैनात ट्रैफिक पुलिस के सब-इंस्पेक्टर एम.एल. निजलिंगप्पा ने एंबुलेंस को निकलवाने के लिए पूरे ट्रैफिक को रोक दिया और वहीं इस दौरान उन्होंने राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के काफिले को भी रोक दिया था.

निजलिंगप्पा के इस कदम के बाद उनकी चारों ओर तारीफ हो रही है, अब उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा. बंगलुरु ट्रैफिक पुलिस के डिप्टी कमिश्नर की ओर से ट्वीट किया गया है कि उनके इस कदम की हम तारीफ करते हैं, उन्हें इसको लेकर सम्मानित भी किया जाएगा.

फैशन एक कला है, इसे अश्लीलता से न जोड़ें- इमाम सिद्दीकी

सोमवार को कानपुर शहर आए फैशन स्टाइलिस्ट इमाम सिद्दीकी ने बताया कि फैशन सही मायने में अपने आप को बेहतर ढंग से पेश करने की एक कला है. ‘बिग बॉस’ और एमटीवी के शो ‘टाइम आउट’ से चर्चा में आने वाले इमाम सिद्दीकी ने सोमवार को शहर आने का कारण बताते हुए बताया की वे आइएनआईएफडी फैशन इंस्टीट्यूट में मंगलवार  को फैशन वर्कशॉप करेंगे. इसमें वह स्टूडेंटस को फैशन के क्षेत्र से जुड़ी अहम जानकारी देंगे और बतायेगें कि असल मायने में फैशन जिंदगी में इतना अहम किस तरह से है.

इमाम ने बताया कि एक दौर था जब कानपुर को औद्योगिक नगरी कहा जाता था. यहां पर कपड़ों की काफी अच्छी वैरायटी मिला करती थी, लेकिन मौजूदा दौर में ऐसा नहीं है. उन्होंने कहा कि वो जरुर उम्मीद करते हैं कि आने वाले टाइम में कानपुर एक बार फिर अपनी खोई हुई पहचान वापिस हासिल कर पाएगा. राजस्थान के बांसवाड़ा में जन्मे फैशन स्टाइलिस्ट इमाम ने बताया कि वो 12 साल की उम्र से कविता लिखते आ रहे हैं. इसके लिए उनको राष्ट्रपति अवार्ड भी मिला चुका था. उन्होंने कहा कि कविता के माध्यम से वह अपने विचारों को बेहतर तरीके से पेश कर पाते हैं. इमाम ने कहा कि जो लोग फैशन को अश्लीलता से जोड़ते हैं वो पूरी तरह गलत हैं. फैशन एक माध्यम है जिससे व्यक्ति अपने आप को और भी बेहतर ढंग से पेश करता है.

 मुंबई के 26/11 हमले की बात करते हुए इमाम ने कहा कि वो मंजर जब याद आता है तो आज भी रूह कांप उठती है. उन्होंने मुम्बई से जुड़ी ढेरों बातें मीडिया के साथ शेयर करते हुए कहा कि राजस्थान मेरी जन्मभूमि है तो मुम्बई मेरी कर्मभूमि.

 

सस्ते टैरिफ प्लान को लेकर TRAI बनाएगा नए नियम

नई दिल्ली। टेलीकॉम रेगूलेटरी अथॉरिटी ट्राई कस्टमर्स को लुभाने वाले सस्ते टैरिफ को लेकर नए नियम अगले छह हफ्तों में लाने वाली है. ये नियम टैरिफ की दुनिया में पारदर्शिता लाएगा. ये फैसला ट्राई ने ऐसे वक्त लिया जब टेलीकॉम इंडस्ट्री में रिलायंस जियो के आने से टैरिफ कीमतों में भारी गिरावट आई है. इकॉनमिक टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक ट्राई के सेक्रेटरी सुधीर गुप्ता ने कहा कि ‘टैरिफ के बारे में रेग्युलेटरी सिद्धांतों को 30-45 दिन में जारी करने वाला है. ट्राई टेलिकम्युनिकेशन टैरिफ ऑर्डर 1999 की समीक्षा कर रहा है ताकि कीमत को लेकर चल रहा ये विवाद सुलझाया जा सके.” जियो पर देश की बड़ी टेलीकॉम कंपनियां ये आरोप लगाती रही हैं कि जियो बाजार में बेहद सस्ते और फ्री ऑफर इसलिए दे रहा है ताकि वो अन्य कंपनियों के यूजर को अपना नेटवर्क छोड़कर जियो यूजर बनने के लिए लुभा सके. टेलीकॉम कंपनियां जियो पर प्रिडेटरी प्राइसिंग के आरोप लगाती रही हैं. 30 से 45 दिन में ट्राई ये तस्वीर साफ कर देगा कि आखिर किस हद तक सस्ता टैरिफ प्लान उतारें ताकि प्रिडेटरी प्राइसिंग का माहौल खत्म किया जा सके.

पाकिस्तान में आतंकी ठिकानों पर अमेरिका कर सकता है ड्रोन अटैक

वाशिंगटन। आतंकवाद को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पाकिस्तान पर सख्त रूख अपनाने की तैयारी में हैं. अमेरिका, पाकिस्तान में स्थित आतंकी ठिकानों पर सख्त कार्रवाई करने की तैयारी में है. अफगानिस्तान में लगातार हो रहे आतंकी हमलों को ध्यान में रखते हुए अमेरिकी अधिकारियों ने इस बात के संकेत दिए हैं कि आतंक के खिलाफ इस तरह की कार्रवाई की जा सकती है.

समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने नाम न बताने की शर्त पर अमेरिकी अधिकारियों ने बताया कि ट्रंप प्रशासन पाक स्थित आतंकी अड्डों पर अमेरिकी ड्रोन हमलों के दायरे को बढ़ाने के साथ ही पाकिस्तान को दी जाने वाली मदद को रोकने और एक गैर नाटो सदस्य के रूप में उसके दर्जे को कम करने जैसे विकल्पों पर चर्चा कर रहा है.

हालांकि कुछ अधिकार सरकार के इन कदमों के सफल होने को लेकर आशंकित हैं. उनका कहा है कि इससे पहले भी सालों से की जा रही कोशिशें असफल रहीं हैं साथ ही अमेरिका ने भारत से अपने संबंधों को प्रगाढ़ किया है जिसे पाकिस्तान अपना दुश्मन मानता है। अमेरिकी अधिकारी अधिकारी मानते हैं कि अमेरिका पाकिस्तान से बेहतर सहयोग की उम्मीद करता है, ना कि संबंध तोड़ना नहीं. ट्रंप प्रशासन 16 साल से अफगानिस्तान में चले आ रहे युद्ध पर अपनी नीति की समीक्षा कर रहा है.

इस मामले में व्हाइट हाउस और पेंटागन ने अब तक कोई बयान नहीं दिया है. उन्होंने इस समीक्षा के पूरे होने से पहले इस पर कोई भी टिप्पणी करने से इन्कार कर दिया है. वहीं वाशिंगटन में स्थित पाकिस्तानी दूतावास ने भी इसे लेकर कोई टिप्पणी नहीं की है. हालांकि इस बीच पेंटागन प्रवक्ता एडम स्टंप ने एक बयान में कहा है कि अमेरिका और पाकिस्तान राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर साथ हैं. लेकिन जो चर्चा है वो अकेले ही पाकिस्तान में आतंकियों के सुरक्षित अड्डों पर अधिक सकारात्मक कोशिश की तरफ इशारा करती है.

1 जुलाई से देश भर में लागू होगा GST बिल

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भारत सरकार ने GST को पारित करने के लिए कमर कस ली है. यह गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स या वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) 1 जुलाई से लागू होगा. वित्त मंत्री अरुण जेटली ने इस बात का ऐलान करते हुए बताया कि जीएसटी 30 जून और 1 जुलाई की मध्य रात्रि से लागू हो जाएगा. उन्होंने बताया कि इस कार्यक्रम में राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, स्पीकर, पीएम मोदी, पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और एचडी देवगौड़ा मौजूद रहेंगे. जेटली ने बताया कि थोड़े समय तक इस नयी व्यवस्था को अपनाने में कुछ चुनौतियां आ सकती हैं लेकिन धीरे- धीरे यह आदत में आ जायेगा.

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने बताया कि जीएसटी का शुभारंभ कार्यक्रम संसद के सेंट्रल हॉल में किया जायेगा. इस कार्यक्रम के लिए सांसदों, मुख्यमंत्रियों और राज्यों के वित्त मंत्रियों को आमंत्रित किया जा रहा है. उन्होंने कहा कि जीएसटी के माध्यम से केंद्र और राज्यों का राजस्व बढ़ेगा, घोषित अर्थव्यवस्था का आकार भी विस्तृत होगा. थोड़े समय तक नयी व्यवस्था को अपनाने में कुछ चुनौतियां आयेगीं जिसके लिए सरकार विज्ञापनों के माध्यम से भी लोगों को समझाएगी.

जानकारी के अनुसार बॉलीवुड के महानायक अमिताभ बच्चन माल एवं सेवाकर (GST) का प्रचार करते जल्दी नजर आएंगे। यह तय है कि देश में जीएसटी की नई अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था एक जुलाई से लागू होनी है. केंद्रीय उत्पाद एवं सीमाशुल्क विभाग अमिताभ बच्चन को जीएसटी का ब्रांड एंबेसडर बनाएगा. उनके साथ 40 सेकेंड की एक विज्ञापन फिल्म भी शूट कर ली गई है जो सोशल मीडिया और टेलीविजन के माध्यम से देश भर में पहुंचेगी.

 

UN TIR में शामिल हुआ भारत, चीन के OBOR को देगा टक्कर

नई दिल्ली। भारत, संयुक्त राष्ट्र (यूएन) के टीआईआर कनवेंशन में शामिल होने वाला दुनिया का 71वां देश बन गया है. ये कन्वेंशन एक अंतर्राष्ट्रीय कस्टम ट्रांजिट सिस्टम है. इस कन्वेंशन के तहत सदस्य देश अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं पर कस्टम के अंतर्गत अपने माल को बिना किसी कर के आयात और निर्यात कर सकते हैं. टीआईआर कन्वेंशन को यातायात समझौते से बढ़कर देखा जाता है जो कि विदेशिक मामलों में मजबूती लाता है. टीआईआर कन्वेंशन से दक्षिण एशिया एवं उसके बाहर भारत को अपने व्यापार को बढ़ाने में मदद मिलेगी. इससे व्यापारिक केंद्र बनने की भारत की स्थिति मजबूत होगी.

भारत की कई कनेक्टिविटी परियोजनाओं को अलग-अलग देशों की ट्रांसपोर्ट और कस्टम सिस्टम के हिसाब से नहीं होने के कारण परेशानी का सामना करना पड़ता था. टैक्स और ड्यूटी पे किए बिना किसी भी अंतर्राष्ट्रीय सीमा से माल को नहीं ले जाया जा सकता है. टीआईआर को लागू करने के बाद भारत को इन परेशानियों का सामना नहीं करना पड़ेगा. टीआईआर कन्वेंशन एक परिवहन समझौते से बहुत अधिक है और एक मजबूत विदेशी नीति तत्व है.

दुनिया में जहां चीन का ‘वन बेल्ट वन रोड’ (ओबीओआर) परियोजना डोमिनेंटिंग प्रोजेक्ट है. अगर भारत को एक ताकतवर उभरती शक्ति के रूप में आना है, तो भारत को एक बेहतर तरीके से काम करने की जरूरत है. टीआईआर माल परिवहन के लिए मानक है जिसका प्रबंधन विश्व सड़क परिवहन संगठन (आईआरयू) के हाथों में है. आईआरयू ने ही टीआईआर विकसित किया है.

आईआरयू ने टीआईआर किया भारत का स्वागत आईआरयू के महासचिव उमबेर्टो डि प्रेटो ने कहा, ‘मैं देशों के टीआईआर में भारत का स्वागत करता हूं. यह दक्षिण एशिया में परिवहन, व्यापार और विकास के सिलसिले में तालमेल एवं प्रोत्साहन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है. टीआईआर भारत को म्यांमार, थाइलैंड, बांग्लादेश, भूटान और नेपाल के साथ व्यापारिक लेनदेन में मदद करेगा.

अलग-अलग देशों के साथ परिवहन और कस्टम सिस्टम को अलग कर देना भारत की कनेक्टिविटी परियोजनाओं के लिए लगातार समस्याओं में से एक है. एक बार सिस्टम वैश्विक मानदंडों के साथ एकीकृत हो जाते हैं, भारत का मानना ​​है कि डीएमआईसी (दिल्ली-मुंबई औद्योगिक कॉरिडोर) ऑनलाइन आने पर अफ्रीकी और एशियाई बाजारों की सेवा करना आसान हो जाएगा.

जानें क्या है टीआईआर- टीआईआर विश्व व्यापार संगठन के व्यापार सुलह समझौते को लागू करने में भारत की मदद करने में सहायक साबित होगा. यह इसी साल लागू हुआ था. यह अंतर्राष्ट्रीय परिवहन के प्रशासनिक औपचारिकताओं को सरल और सुगम बनाने के लिए 14 नवंबर, 1 9 75 को जिनेवा में लागू किया गया था. टीआईआर कन्वेंशन एक बहुपक्षीय संधि है. यह एक अंतर्राष्ट्रीय परिवहन समझौता है. टीआईआर का अर्थ है “ट्रांसपोर्ट इंटरनैशोक रूटिट्स” या “इंटरनेशनल रोड ट्रांसपोर्ट्स होता है.

टीआईआर कन्वेंशन दक्षिण एशिया में परिवहन, व्यापार और विकास के सिलसिले में तालमेल एवं प्रोत्साहन की दिशा में काम करता है. टीआईआर भारत को म्यांमार, थाइलैंड, बांग्लादेश, भूटान और नेपाल के साथ व्यापारिक समेकन में मदद करेगा. इसके अलावा टीआईआर भारत को ईरान में चाबहार बंदरगाह के मार्फत अंतरराष्ट्रीय उत्तर दक्षिण परिवहन गलियारे में मालढुलाई तथा अफगानिस्तान एवं तेल समृद्ध यूरेशिया क्षेत्र तक माल परिवहन में भी सहायता करेगा.

OBOR से सामना करने के लिए महत्वपूर्ण हथियार चीन 2016 में टीआईआर में शामिल हो गया था, जब विशाल अंतर-क्षेत्रीय कनेक्टिविटी परियोजनाएं शुरू हुईं. भारत को अपनी कनेक्टिविटी महत्वाकांक्षा को बढ़ाने के लिए है, यह एक आवश्यक कदम है. सम्मेलन में शामिल होने से “दक्षिण एशिया को एक प्रमुख आर्थिक बढ़ावा मिलेगा. यह दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी बन सकता है. ऐसा कहा जा रहा है कि यह पूरे एशिया-प्रशांत क्षेत्र में समुद्री परिवहन मार्गों से भारत को जोड़ सकता है.

चीन के ओबीओआर का सामना करने के लिए भारत के पास एक मजबूत हथियार है. इससे भारत के इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपॉर्ट कॉरिडोर (आईएनएसटीसी) और चाबहार प्रॉजेक्ट को नई दिशा मिलेगी, जिस पर भारत काफी लम्बे समय से काम कर रहा है.

दलितों के लिए काम करने वाले बाबूलाल निर्मल को सम्मान

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बारां। राजस्थान के बारां जिले के अटरु क्षेत्र के बाबूलाल निर्मल को दलित हित में 33 वर्षों से काम करने के लिए भारत सरकार ने सम्मान दिया है. बाबूलाल निर्मल को सामाजिक न्याय एंव अधिकारिता मंत्रालय ने डॉ. भीमराव अम्बेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया. बीते महीने की 26 तारीख को राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने उन्हें पांच लाख की राशि एवं शील्ड देकर सम्मानित किया. राष्ट्रपति पुरस्कार विजेता बाबूलाल निर्मल ने कमजोर एवं दलित वर्गों के लिए लगातार अपने आप को समर्पित किया.

दलित हित के कार्यो के लिए अब तक वे 50 से अधिक अवार्ड ले चुके हैं, उन्होंने राजस्थान सहित देश के अन्य राज्यों में अभियान चला रखें हैं. वर्तमान समय में वे दलित साहित्य अकादमी के जिलाध्यक्ष भी हैं.

अपने साथियों के साथ मिलकर उन्होंने बंधुआ मजदूरी से छुटकारा, जिले के सहरिया आदिवासियों को सरकारी योजनाओँ के फायदे दिलाने के साथ-साथ जिले में अडानी पावर प्लांट लगाने के दौरान बेघर हुए 245 दलित परिवारों को भी घर दिलाने जैसे काम करवाएं हैं.

सहरिया समाज के बच्चों को सरकारी नौकरियां दिलाने के लिए उन्होंने सालों तक संघर्ष किया. हाल ही में उन्होंने मेरिट में आने वाले बच्चों का भी सम्मान किया गया. अब जिले में बेघर बूढ़े माता-पिता की सहायता के लिए समिति तैयार की गई है, जो बुजुर्ग और असहाय लोगों की कानूनी मदद करेगी और उन्हें सम्मान दिलाने का भी काम करेगी.

भाजपा की ओर से राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार घोषित हुए रामनाथ कोविंद

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नई दिल्ली। राष्ट्रपति पद के चुनाव में भाजपा उम्मीदवार के नाम पर भाजपा संसदीय बोर्ड की बैठक में फैसला ले लिया गया है. भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने सोमवार को बिहार के राज्यपाल रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के लिए अधिकारिक रुप से घोषणा कर दी है.

रामनाथ कोविंद देश के दूसरे दलित राष्ट्रपति बन सकते हैं. इससे पहले के. आऱ. नारायण भारत के दसवें राष्ट्रपति थे. उन्हें 1997 में राष्ट्रपति बनाया गया था. इससे पहले वे 1992 में उपराष्ट्रपति भी रह चुके हैं. उन्होंने त्रावणकोर विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त करने के बाद लंदन स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स में अर्थशास्त्र की पढ़ाई की थी.

इससे पहले राष्ट्रपति पद के चुनाव में अपने उम्मीदवार के नाम पर फैसला करने के लिए बीते सोमवार को दोपहर 12 बजे भाजपा के संसदीय बोर्ड की बैठक हुई. बैठक में पीएम नरेंद्र मोदी, अमित शाह, सुषमा स्वराज, वेंकैया नायडू समे​त कई वरिष्ठ नेता शामिल हुए.

रामनाथ कोविंद 08 अगस्त 2015 को बिहार के गवर्नर बने थे. वहीं, कोविंद दो बार राज्यसभा सदस्य भी रह चुके हैं. यूपी से 1994 से 2000 और फिर 2000 से 2006 तक राज्यसभा सांसद रहे. इस तरह बीजेपी ने दलित कार्ड खेलकर रामनाथ कोविंद के नाम पर मोहर लगा दी है.

भारत और अफगानिस्तान के बीच शुरू हुआ पहला हवाई कॉरिडोेर

काबुल। अफगानिस्तान और भारत के बीच ‘एयर कार्गो कॉरिडोर’ के उद्घाटन के बाद एक एयरक्राफ्ट 60 टन हींग के साथ नई दिल्ली पहुंचा.

अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ घनी ने काबुल अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर कार्गो विमान को दिल्ली के लिए रवाना कर इस गलियारे का उद्घाटन किया. इस मौके पर एयरक्राफ्ट की अगवानी के लिए विदेश मंत्री सुषमा स्वराज, नागरिक उड्डयन मंत्री गजपति राजू, विदेश राज्यमंत्री एम जे अकबर वहां मौजूद थे.

हवाई कॉरिडोर दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंधों को बढ़ावा देने के साथ चारों ओर से जमीन से घिरे अफगानिस्तान को भारत के बाजारों तक पहुंच देगा. इससे अफगानिस्तान के किसानों को खराब होने वाली वस्तुओं की भारतीय बाजारों तक जल्द और सीधी पहुंच से लाभ होगा.

यह रूट पाकिस्तान को बाईपास करता है. राष्ट्रपति घनी ने कहा, इस रूट से अफगानी निर्यात के लिए और मौके बढ़ेंगे. राष्ट्रपति घनी के सलाहकार सदीकुल्लाह मुजाहिद ने बताया, सोमवार को भारत रवाना हुए विमान से 60 टन औषधीय पौधे भेजे गए. अफगानिस्तान चारों तरफ से पहाड़ों से घिरा हुआ है. इसलिए उसे अपने आयात और निर्यात के लिए पड़ोसी देशों पर निर्भर रहना पड़ता है. चूंकि उसके संबंध पाकिस्तान के साथ ठीक नहीं है. ऐसे में पाकिस्तान अफगानिस्तान के भारत के साथ कारोबार में बाधा खड़ी करता है. ऐसे में इस हवाई गलियारे से पाकिस्तान की इस मनमानी पर रोक लगेगी और दोनों देशों के कारोबार में बढ़ोतरी होगी.

2016 में ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अफगान राष्ट्रपति अशरफ गनी के बीच इस कॉरिडोर पर निर्णय लिया गया था. मोदी ने ट्वीट करके कहा कि भारत और अफगानिस्तान के बीच सीधा हवाई संपर्क समृद्धि की राह खोलेगा. पीएम ने कहा, ‘मैं राष्ट्रपति अशरफ गनी को उनकी इस पहल के लिए धन्यवाद देता हूं.’

राष्ट्रपति बनने के बाद अशरफ गनी पहली बार 2016 में भारत दौरे पर आए थे. तभी एयर कॉरिडोर बनाने का निर्णय लिया था. इससे पहले सड़क के जरिए अफगानिस्‍तान से प्रोडक्‍ट भारत आते हैं. अब तक अपने विदेशी व्‍यापार के लिए अफगानिस्‍तान पड़ोसी देश पाकिस्‍तान के पोर्ट पर निर्भर है. इसे भारत तक पहुंचने के लिए पाकिस्‍तान के जरिए आना पड़ता है लेकिन इस मार्ग से भारत को वहां सामान निर्यात की अनुमति नहीं है. नए एयर कॉरिडोर के जरिए अफगानिस्‍तान और भारत के बीच व्यापार को तीन साल में 800 मिलियन से 1 बिलियन और अगले दस सालों में 10 बिलियन तक पहुंचाने का लक्ष्य है.

अगले हफ्ते कंधार से दूसरी कार्गो 40 टन सूखे फल के साथ भारत आएगा. मांग के अनुसार, हर हफ्ते काबुल और कंधार से अनेकों कार्गो विमान भारत आएंगे. अफगानिस्‍तान में भारतीय राजदूत मनप्रीत वोहरा ने राष्‍ट्रपति अशरफ गनी को कहा, ‘हम विभिन्‍न तरीकों से आपकी सहायता जारी रखेंगे.‘

दलित दस्तक के पांच साल पर प्रोफेसर विवेक कुमार की टिप्पणी

dastakआज के दिन बर्बस साहिर लुधियानवी का शेर याद आता है. मैं तो अकेला ही चला था जानिबे मंजिल मगर लोग साथ आते गए, कारवां बनता गया. साथियों दलित दस्तक के पांच वर्ष पूरे होने पर पूरे बहुजन समाज को बहुत-बहुत साधुवाद. बहुजन समाज को इसलिए साधुवाद क्योंकि अगर बहुजन समाज ने दलित दस्तक का सहयोग न किया होता तो शायद यह पत्रिका वजूद में न आई होती. अतः बहुजन समाज के उन लोगों को अपनी पीठ थपथपानी चाहिए जिन्होंने प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से पत्रिका का सहयोग किया है. पत्रिका का क्या बल्कि उन्होंने अपना और अपने समाज का सहयोग किया है. और एक छोटी सी शुरुआत को पांच वर्षों तक अपनी सोच, अपने जज्बे और खून पसीने की कमाई से सींच कर एक आंदोलन में परिवर्तित कर दिया है. आज हम सभी बहुजन समाज के लोग सर उठा कर यह कह सकते हैं कि दलित दस्तक आंदोलन पढ़े-लिखे बहुजनों के योगदान का आंदोलन है, जो बाबासाहेब के कारवां को आगे बढ़ा रहा है. यह बात और है कि दलित आंदोलन को अभी और बड़ा आंदोलन बनने की आवश्यकता है. अक्सर बहुजन समाज के लोग सहाल देते हैं कि हमें मनुवादी मीडिया के समकक्ष अपना मीडिया खड़ा करना चाहिए. ई-मेल, फेसबुक, एसएमएस एवं व्हाट्सएप पर भी मैसेज लिखे दिखाई देते हैं. ऐसे प्रश्नों के लिए दलित दस्तक छोटा सा ही सही पर पुख्ता और मजबूत जवाब है. पांच वर्षों तक हमने लगातार दलित दस्तक की पहुंच बढ़ाने का काम किया है. हमने दो हजार कॉपियों से मैगजीन शुरू की थी जो आज पंद्रह से बीस हजार तक छापी जा रही है. साथ ही साथ दलित दस्तक अब  www.dalitdastak.com नाम के वेब पोर्टल पर भी मौजूद है, जिसे हर हफ्ते तकरीबन एक लाख से ज्यादा लोग देख-पढ़ रहे हैं. इसका मतलब है कि बात कुछ बनी है और दलित दस्तक आंदोलन आगे बढ़ा है. अब आप सोच रहे होंगे कि दलित दस्तक को हम आंदोलन क्यों कह रहे हैं? हम बार-बार इसे आंदोलन इसलिए कह रहे हैं क्योंकि दलित दस्तक पांच वर्षों से निरंतरता लिए हुए एक सामूहिक प्रयास है. जो विचारधारा के धरातल पर समाज में व्याप्त सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, शैक्षणिक, धार्मिक आदि विषमताओं को दूर करने का प्रयास कर रहा है. यही आंदोलन की परिभाषा है, अर्थात आंदोलन एक सामाजिक प्रक्रिया है जो सामूहिक प्रयास द्वारा निरंतरता से यथास्थितिवाद को बदलने का प्रयास करती है. साथ ही साथ आंदोलन की अपनी आत्मनिर्भर विचारधारा होती है, नेतृत्व होता है और संगठन. दलित दस्तक इन सभी कसौटियों पर खड़ा उतरती है और इसलिए दलित दस्तक एक आंदोलन है. दलित दस्तक आंदोलन ने अपनी विचारधारा के साथ-साथ अपनी अस्मिता (पहचान) को भी आगे बढ़ाया है. बहुजन विचारधारा के तहत कोई एससी/एसटी/ओबीसी और धार्मिक अल्पसंख्यक के साथ काम करते हुए दलित दस्तक ने आज तक अपने मुख्यपृष्ठ पर किसी भी गैर बहुजन व्यक्ति या आंदोलन का चित्र तक नहीं छापा है. दलित दस्तक के संपादक मंडल का यह प्रयास रहा है कि हम अपने बहुजन नायकों एवं नायिकाओं की ही तस्वीर पत्रिका के मुख्य पृष्ठ पर छापें. या उसके आंदोलन से संबंधित एपिसोड को ही छापा जाए. दलित दस्तक के मुख्य पृष्ठ पर गौतम बुद्ध, संत रैदास महाराज, संत कबीर, घासीदास, ज्योतिबा फुले, नरायणा गुरु, अछूतानंद महाराज, शाहूजी महाराज, पेरियार, बाबासाहेब अम्बेडकर, मान्यवर कांशीराम सहित रोहित वेमुला, टीना डाबी, गिन्नी माही, तरन्नुम बौद्ध, हेमंत बौद्ध एवं राजू भारती जैसे बहुजन युवाओं को दलित दस्तक के मुख्य पृष्ठ पर जगह देकर अपनी पहचान स्थापित करने का अनूठा प्रयास किया है. और यह प्रयास आगे भी जारी रहेगा. रही बात अपनी अस्मिता या अपनी पहचान की तो यह बताते हुए हमें हर्ष होता है कि दलित दस्तक ने ‘दलित अस्मिता’ से कभी मुंह नहीं चुराया. डंके की चोट पर अपने मंचों एवं प्रकाशन में इसी पहचान के आधार पर काम किया है. यद्यपि बहुत से लोग संपादक मंडल को आरंभ से ही यह सलाह देते रहे हैं कि हमें दलित अस्मिता से नहीं बल्कि किसी सामान्य पहचान से पत्रिका चलानी चाहिए. उनका मानना था कि दलित नाम होने से पत्रिका को कोई नहीं खरीदेगा और न पढ़ेगा. इस नाम से विज्ञापन नहीं मिलेगा. परंतु साथियों आज पांच वर्ष बाद हमें संतोष है कि हमारी पत्रिका हमारी अस्मिता के साथ ही चल रही है. पत्रिका ही नहीं अब तो वेबसाइट भी आगे बढ़ रही है. साथियों हमें सोचना चाहिए कि जब हिन्दू नाम से राष्ट्रीय समाचार पत्र कामयाब हो सकता है तो दलित नाम से पत्रिका क्यों नहीं कामयाब हो सकती है! अवश्य ही हो सकती है. शर्त बस इतनी सी है कि प्रयास निरंतर और ईमानदारी से किया जाए. और पांच वर्षों में दलित दस्तक ने निरंतर एवं ईमानदारी से यह प्रयास किया है. कुछ साथियों ने यह प्रश्न उठाया है कि दलित दस्तक के लिए विचारधारा एवं अपनी अस्मिता (पहचान) क्यों आवश्यक है? इसका उत्तर जानना हमारे लिए जरूरी है. दलित दस्तक अपने आप में तो आंदोलन है ही परंतु दलित दस्तक वृहत बहुजन आंदोलन का भी हिस्सा है. छोटा ही सही, थोड़ा ही सही, दलित दस्तक व्यापक बहुजन आंदोलन की धार को तेजी देने में प्रयासरत है. यह काम विचारधारा एवं अस्मिता के बगैर नहीं हो सकता. बहुजन आंदोलन का सहयोग केवल और केवल विचारधारा और अस्मिता के खुलेपन से ही किया जा सकता है. दलित दस्तक का ध्येय मुनाफा कमाना नहीं है. दलित दस्तक का मुख्य लक्ष्य है कि किसी तरह अपने छोटे से प्रयास से बहुजन समाज में व्याप्त ज्ञान की भूख को कैसे पूरा किया जाए. अपने प्रयास से कैसे बहुजन आंदोलन के नायक और नायिकाओं से बहुजन समाज का निरंतर साक्षात्कार कराया जाए. कैसे उसकी विचारधारा को आगे बढ़ाया जाए और गाढ़ा किया जाए. कैसे बहुजन समाज की पहचान को साकारात्मक बनाया जाए? और कैसे बहुजन समाज के युवाओं का उत्साह बढ़ाया जाए. हमें आशा है कि इन सभी कृत्यों से बहुजन आंदोलन की नीवों को सींचने का बीड़ा दलित दस्तक ने उठाया है. इन पांच सालों में बात इतनी आगे बढ़ी है कि दलित दस्तक की धमक विदेशों तक में पहुंच गई है. भारत के बाहर भी तमाम देशों में रहने वाले बहुजनों के बीच दलित दस्तक सराही जाने लगी है. अब वहां भी लोग हर महीने पत्रिका का इंतजार करते हैं. यह अपने आप में एक बड़ी बात है कि दिल्ली के एक छोटे से हॉल से शुरू होकर बीते पांच वर्षों में पत्रिका देश के भिन्न-भिन्न हिस्सों से होते हुए देश के बाहर भी अपनी पहचान बनाने में सफल रही है. दलित दस्तक एक उदाहरण प्रस्तुत करना चाहता है कि कैसे छोटे से प्रयास से बहुजन आंदोलन को मजबूती दी जा सकती है. इसलिए साथियों आज अपनी मीडिया के पांच वर्ष के सुअवसर पर हम जब 24 जून को मावलंकर हॉल में एकत्र होने जा रहे हैं तो हम आपसे विनती करेंगे कि आप बहुजन समाज के इस प्रयास की नियत को समझते हुए इसे मजबूती प्रदान करें. चाहे पत्रिका का सदस्य बनकर, या अपनी रचनाएं भेजकर या फिर किसी खबर को हम तक पहुंचा कर या सुझाव भेजकर इस आंदोलन को मजबूत कर सकते हैं. मेरा पूरा विश्वास है कि दलित दस्तक अब तक के बहुजन पत्रकारिता के नवीन प्रतिमान स्थापित करने में अवश्य कामयाब होगी. आइए हम सब मिलकर दलित दस्तक को बहुजन आंदोलन का और मजबूत सिपाही बनाएं. जय भीम- जय भारत नोट- सभी फोटो  27 मई 2012 के दलित दस्तक की लांचिग के हैं.  – लेखक जेएनयू में सामाजिक विज्ञान के प्रोफेसर हैं। दलित दस्तक से शुरुआत से ही जुड़े हैं और संपादक मंडल के महत्वपूर्ण सदस्य हैं।

दलित दस्तक के पांच साल पर प्रोफेसर विवेक कुमार की टिप्पणी

dalit dastak launching
दलित दस्तक लांचिग
आज के दिन बर्बस साहिर लुधियानवी का शेर याद आता है. मैं तो अकेला ही चला था जानिबे मंजिल मगर लोग साथ आते गए, कारवां बनता गया. साथियों दलित दस्तक के पांच वर्ष पूरे होने पर पूरे बहुजन समाज को बहुत-बहुत साधुवाद. बहुजन समाज को इसलिए साधुवाद क्योंकि अगर बहुजन समाज ने दलित दस्तक का सहयोग न किया होता तो शायद यह पत्रिका वजूद में न आई होती. अतः बहुजन समाज के उन लोगों को अपनी पीठ थपथपानी चाहिए जिन्होंने प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से पत्रिका का सहयोग किया है. पत्रिका का क्या बल्कि उन्होंने अपना और अपने समाज का सहयोग किया है. और एक छोटी सी शुरुआत को पांच वर्षों तक अपनी सोच, अपने जज्बे और खून पसीने की कमाई से सींच कर एक आंदोलन में परिवर्तित कर दिया है. आज हम सभी बहुजन समाज के लोग सर उठा कर यह कह सकते हैं कि दलित दस्तक आंदोलन पढ़े-लिखे बहुजनों के योगदान का आंदोलन है, जो बाबासाहेब के कारवां को आगे बढ़ा रहा है. यह बात और है कि दलित आंदोलन को अभी और बड़ा आंदोलन बनने की आवश्यकता है. अक्सर बहुजन समाज के लोग सहाल देते हैं कि हमें मनुवादी मीडिया के समकक्ष अपना मीडिया खड़ा करना चाहिए. ई-मेल, फेसबुक, एसएमएस एवं व्हाट्सएप पर भी मैसेज लिखे दिखाई देते हैं. ऐसे प्रश्नों के लिए दलित दस्तक छोटा सा ही सही पर पुख्ता और मजबूत जवाब है. पांच वर्षों तक हमने लगातार दलित दस्तक की पहुंच बढ़ाने का काम किया है. हमने दो हजार कॉपियों से मैगजीन शुरू की थी जो आज पंद्रह से बीस हजार तक छापी जा रही है. साथ ही साथ दलित दस्तक अब www.dalitdastak.com नाम के वेब पोर्टल पर भी मौजूद है, जिसे हर हफ्ते तकरीबन एक लाख से ज्यादा लोग देख-पढ़ रहे हैं. इसका मतलब है कि बात कुछ बनी है और दलित दस्तक आंदोलन आगे बढ़ा है. अब आप सोच रहे होंगे कि दलित दस्तक को हम आंदोलन क्यों कह रहे हैं? हम बार-बार इसे आंदोलन इसलिए कह रहे हैं क्योंकि दलित दस्तक पांच वर्षों से निरंतरता लिए हुए एक सामूहिक प्रयास है. जो विचारधारा के धरातल पर समाज में व्याप्त सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, शैक्षणिक, धार्मिक आदि विषमताओं को दूर करने का प्रयास कर रहा है. यही आंदोलन की परिभाषा है, अर्थात आंदोलन एक सामाजिक प्रक्रिया है जो सामूहिक प्रयास द्वारा निरंतरता से यथास्थितिवाद को बदलने का प्रयास करती है. साथ ही साथ आंदोलन की अपनी आत्मनिर्भर विचारधारा होती है, नेतृत्व होता है और संगठन. दलित दस्तक इन सभी कसौटियों पर खड़ा उतरती है और इसलिए दलित दस्तक एक आंदोलन है. दलित दस्तक आंदोलन ने अपनी विचारधारा के साथ-साथ अपनी अस्मिता (पहचान) को भी आगे बढ़ाया है. बहुजन विचारधारा के तहत कोई एससी/एसटी/ओबीसी और धार्मिक अल्पसंख्यक के साथ काम करते हुए दलित दस्तक ने आज तक अपने मुख्यपृष्ठ पर किसी भी गैर बहुजन व्यक्ति या आंदोलन का चित्र तक नहीं छापा है. दलित दस्तक के संपादक मंडल का यह प्रयास रहा है कि हम अपने बहुजन नायकों एवं नायिकाओं की ही तस्वीर पत्रिका के मुख्य पृष्ठ पर छापें. या उसके आंदोलन से संबंधित एपिसोड को ही छापा जाए. दलित दस्तक के मुख्य पृष्ठ पर गौतम बुद्ध, संत रैदास महाराज, संत कबीर, घासीदास, ज्योतिबा फुले, नरायणा गुरु, अछूतानंद महाराज, शाहूजी महाराज, पेरियार, बाबासाहेब अम्बेडकर, मान्यवर कांशीराम सहित रोहित वेमुला, टीना डाबी, गिन्नी माही, तरन्नुम बौद्ध, हेमंत बौद्ध एवं राजू भारती जैसे बहुजन युवाओं को दलित दस्तक के मुख्य पृष्ठ पर जगह देकर अपनी पहचान स्थापित करने का अनूठा प्रयास किया है. और यह प्रयास आगे भी जारी रहेगा. रही बात अपनी अस्मिता या अपनी पहचान की तो यह बताते हुए हमें हर्ष होता है कि दलित दस्तक ने ‘दलित अस्मिता’ से कभी मुंह नहीं चुराया. डंके की चोट पर अपने मंचों एवं प्रकाशन में इसी पहचान के आधार पर काम किया है. यद्यपि बहुत से लोग संपादक मंडल को आरंभ से ही यह सलाह देते रहे हैं कि हमें दलित अस्मिता से नहीं बल्कि किसी सामान्य पहचान से पत्रिका चलानी चाहिए. उनका मानना था कि दलित नाम होने से पत्रिका को कोई नहीं खरीदेगा और न पढ़ेगा. इस नाम से विज्ञापन नहीं मिलेगा. परंतु साथियों आज पांच वर्ष बाद हमें संतोष है कि हमारी पत्रिका हमारी अस्मिता के साथ ही चल रही है. पत्रिका ही नहीं अब तो वेबसाइट भी आगे बढ़ रही है. साथियों हमें सोचना चाहिए कि जब हिन्दू नाम से राष्ट्रीय समाचार पत्र कामयाब हो सकता है तो दलित नाम से पत्रिका क्यों नहीं कामयाब हो सकती है! अवश्य ही हो सकती है. शर्त बस इतनी सी है कि प्रयास निरंतर और ईमानदारी से किया जाए. और पांच वर्षों में दलित दस्तक ने निरंतर एवं ईमानदारी से यह प्रयास किया है. कुछ साथियों ने यह प्रश्न उठाया है कि दलित दस्तक के लिए विचारधारा एवं अपनी अस्मिता (पहचान) क्यों आवश्यक है? इसका उत्तर जानना हमारे लिए जरूरी है. दलित दस्तक अपने आप में तो आंदोलन है ही परंतु दलित दस्तक वृहत बहुजन आंदोलन का भी हिस्सा है. छोटा ही सही, थोड़ा ही सही, दलित दस्तक व्यापक बहुजन आंदोलन की धार को तेजी देने में प्रयासरत है. यह काम विचारधारा एवं अस्मिता के बगैर नहीं हो सकता. बहुजन आंदोलन का सहयोग केवल और केवल विचारधारा और अस्मिता के खुलेपन से ही किया जा सकता है. दलित दस्तक का ध्येय मुनाफा कमाना नहीं है. दलित दस्तक का मुख्य लक्ष्य है कि किसी तरह अपने छोटे से प्रयास से बहुजन समाज में व्याप्त ज्ञान की भूख को कैसे पूरा किया जाए. अपने प्रयास से कैसे बहुजन आंदोलन के नायक और नायिकाओं से बहुजन समाज का निरंतर साक्षात्कार कराया जाए. कैसे उसकी विचारधारा को आगे बढ़ाया जाए और गाढ़ा किया जाए. कैसे बहुजन समाज की पहचान को साकारात्मक बनाया जाए? और कैसे बहुजन समाज के युवाओं का उत्साह बढ़ाया जाए. हमें आशा है कि इन सभी कृत्यों से बहुजन आंदोलन की नीवों को सींचने का बीड़ा दलित दस्तक ने उठाया है. इन पांच सालों में बात इतनी आगे बढ़ी है कि दलित दस्तक की धमक विदेशों तक में पहुंच गई है. भारत के बाहर भी तमाम देशों में रहने वाले बहुजनों के बीच दलित दस्तक सराही जाने लगी है. अब वहां भी लोग हर महीने पत्रिका का इंतजार करते हैं. यह अपने आप में एक बड़ी बात है कि दिल्ली के एक छोटे से हॉल से शुरू होकर बीते पांच वर्षों में पत्रिका देश के भिन्न-भिन्न हिस्सों से होते हुए देश के बाहर भी अपनी पहचान बनाने में सफल रही है. दलित दस्तक एक उदाहरण प्रस्तुत करना चाहता है कि कैसे छोटे से प्रयास से बहुजन आंदोलन को मजबूती दी जा सकती है. इसलिए साथियों आज अपनी मीडिया के पांच वर्ष के सुअवसर पर हम जब 24 जून को मावलंकर हॉल में एकत्र होने जा रहे हैं तो हम आपसे विनती करेंगे कि आप बहुजन समाज के इस प्रयास की नियत को समझते हुए इसे मजबूती प्रदान करें. चाहे पत्रिका का सदस्य बनकर, या अपनी रचनाएं भेजकर या फिर किसी खबर को हम तक पहुंचा कर या सुझाव भेजकर इस आंदोलन को मजबूत कर सकते हैं. मेरा पूरा विश्वास है कि दलित दस्तक अब तक के बहुजन पत्रकारिता के नवीन प्रतिमान स्थापित करने में अवश्य कामयाब होगी. आइए हम सब मिलकर दलित दस्तक को बहुजन आंदोलन का और मजबूत सिपाही बनाएं. जय भीम- जय भारत नोट- सभी फोटो 27 मई 2012 के दलित दस्तक की लांचिग के हैं. – लेखक जेएनयू में सामाजिक विज्ञान के प्रोफेसर हैं। दलित दस्तक से शुरुआत से ही जुड़े हैं और संपादक मंडल के महत्वपूर्ण सदस्य हैं।

भीम आर्मी स्थापित दलित नेतृत्व से निराशा का परिणाम

21 मई के कार्यक्रम में जंतर मंतर पर चंद्रशेखर रावण

21 मई, 2017 दलित आंदोलनों के इतिहास में एक खास दिन के रूप में चिन्हित हो गया. इस दिन एक गुमनाम युवा, भीम आर्मी के संस्थापक अध्यक्ष चंद्रशेखर आजाद ‘रावण’ के आह्वान पर दिल्ली के ऐतिहासिक जंतर मंतर पर नयी सदी में दलित शक्ति का जबरदस्त प्रदर्शन हुआ. सुबह से ही लोग लाठियों में नीला झंडा लगाये संसद भवन के निकट जंतर मंतर पर इक्कट्ठा होने लगे. यह अफवाह फैलाये जाने के बावजूद, कि प्रदर्शन कि अनुमति नहीं मिली है, देखते ही देखते जंतर मंतर नीले झंडों से पट गया. जंतर मंतर के इस छोर से उस छोर तक सिर ही सिर. अधिकांश के सिर पर ‘भीम आर्मी’ की  नीली टोपी थी. लाख से अधिक संख्या में पहुंचे लोगों में 80 प्रतिशत के करीब युवा थे जिनमें महिलाओं की संख्या लगभग बराबर थी. इस भीड़ में उस दिन दिल्ली के अधिकांश दलित एक्टिविस्ट, लेखक, प्रोफ़ेसर घर छोड़कर जंतर मंतर आ पहुंचे थे. दलितों के अतिरिक्त प्रगतिशील विचारधारा के गैर-दलित छात्र-एक्टिविस्ट भी अच्छी खासी मात्रा में उपस्थित थे.

   दलित शक्ति के इस अभूतपूर्व प्रदर्शन को कवर करने के लिए अमेरिका, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया, जापान व अन्य कई देशों की मीडिया लाइव करने के उपकरणों के साथ उपस्थित थी, किन्तु भारतीय चैनल नदारद रहे. इनकी कमी को पूरा कर दिया सोशल मीडिया को हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रहे दलित बहुजनों ने. इनके सौजन्य से दोपहर होते-होते पूरा फेसबुक और ट्विटर नीला हो गया. लाखों तस्वीरों और विडियो से इंटरनेट भर गया. काबिले गौर है कि जंतर मंतर पर जब दलित आन्दोलन का एक नया अध्याय रचित हो रहा था, उसी समय चंद्रशेखर आजाद की भीम आर्मी से प्रेरित होकर बिहार की राजधानी पटना के आंबेडकर शोध संस्थान में एक और ‘आजाद’, अमर आजाद के नेतृत्व में ‘द ग्रेट भीम आर्मी’ का गठन हो रहा था, जो हुआ भी. गठन के बाद अमर आजाद ने घोषणा किया कि ‘नीला गमछा आर्मी की पहचान होगी तथा आंबेडकर, फुले और पेरियार के विचारों पर यह काम करेगी एवं दशरथ मांझी हमारे आदर्श होंगे. जल्द ही आर्मी के सदस्य दलित विधायक और मंत्रियों से मिलकर यह पूछेंगे कि आपने दलितों के लिए क्या किया?’. यूपी की भीम आर्मी से प्रेरित बिहार की भीम आर्मी का गठन संकेत करता है कि भविष्य में देश के विभिन्न अंचलों में ऐसी सेना का वजूद में आना लगभग तय है. बहरहाल मुख्यधारा की मीडिया में भीम आर्मी के इस ऐतिहासिक आयोजन पर भले ही विस्त्तार से जानने सुनने का मौका नहीं मिला, किन्तु सोशल मीडिया पर आई देश के चर्चित बहुजन एक्टिविस्टों और लेखकों की टिप्पणियां चौकाने वाली रहीं.

  पटना के मशहूर दलित चिन्तक और कई कर्मचारी संगठनों के पदाधिकारी हरिकेश्वर राम ने फेसबुक पर लिखा- ‘बिना विशेष तैयारी, बिना किसी राजनीतिक दल के समर्थन, बिना कोई साधन की व्यवस्था किये अम्बेडकरी साथियों की उपस्थिति इस बात का प्रमाण है कि अम्बेडकरवादी अब ब्राह्मणवादी और अधकचरा व्यवस्था को सहने को तैयार नहीं हैं’. न्यूज पोर्टल चला रहे पत्रकार शोबरन कबीर यादव ने लिखा, ’दलितों में निराशा है, लेकिन आशा की किरण भी है. हर रात के बाद सवेरा होता है और भीम आर्मी उसी रात का सबेरा नजर आती है’. डीयू में शिक्षकों के अधिकारों की  लड़ाई को नेतृत्व दे रहे प्रो. हंसराज सुमन ने लिखा- ‘भीम के सिपाही अब नहीं सहेंगे अत्याचार’. ‘आज दलित शक्ति का प्रदर्शन स्थल रहा जंतर मंतर. जय भीम से गूंजती रही दिल्ली. शीघ्र ही पूरा देश भी गूंजेगा’- ऐसा लिखा था नैक्डोर जैसे चर्चित सामाजिक संगठन  के राष्ट्रीय अध्यक्ष अशोक भारती ने. युवा ओबीसी पत्रकार प्रतीक राव की टिप्पणी थी- ‘यह यज्ञ हो रहा है, दलितों के दिलों से खौफ ख़त्म करने का यज्ञ. बहुजनों से यही अपील है कि इस यज्ञ में अपने समस्त दुःख-दर्द और बेबसी जाकर रख कर दें’.

   बहरहाल भीम आर्मी को आम से लेकर लेखक, एक्टिविस्ट जैसे खास दलित बहुजनों का जो व्यापक समर्थन मिला, यह बहुजन नेतृत्व की विफलता का प्रमाण है, इसका भी स्पष्ट संकेत सोशल मीडिया पर देखने को मिला. इस बात पर मोहर लगते हुए बिहार भीम आर्मी के अध्यक्ष अमर आजाद  ने लिखा –‘दलित आन्दोलन की स्थापित धाराओं कि विफलता है भीम आर्मी के उदय का कारण’. कुछ ऐसा ही लिखा था मशहूर पत्रकार अखिलेश अखिल ने. ’जंतर मंतर पर उमड़ी भीड़ बहुत कुछ कह जाती है. दलित राजनीति का यह उफान उन राजनीतिक दलों के लिए खतरे की  घंटी हो सकती है, जो अबतक दलित राजनीति के नाम पर कम्बल ओढ़कर घी पी रहे थे.’ इस बात को और स्पष्ट करते हुए ‘दलित कैसे बनें लखपति-करोडपति!’ सहित आधें दर्जन किताबों के लेखक बृजपाल भारती ने लिखा. ’पिछले चुनावों में आंबेडकरवादी पार्टियों की हार तथा नेताओं के विचलन ने दलित बहुजन समाज में काफी निराशा का माहौल था. 21 मई को जंतर मंतर पर भीम आर्मी के आह्वान पर दलित अत्याचारों के खिलाफ एकजुट हुए लगभग दो लाख युवा भीम सैनिकों ने उस निराशा को दूर कर दिया है. यह विरोध प्रदर्शन अत्याचारों के खिलाफ वर्तमान राजनीतिक सत्ताओं को चेतावनी है, जिसमें बेचारगी की सिस्कार के बजाय फुले, अम्बेडकर के विचारों की ताकत और लोकतान्त्रिक व्यवस्था में विश्वास से उपजी ताकत है. उपस्थित जनसमूह में 80 प्रतिशत युवाओं कि उपस्थिति से लगता है कि अम्बेडकरी आन्दोलन अब युवास्था में प्रवेश कर गया है.’

   निश्चय ही हाल के वर्षों में दलित नेतृत्व ने सिर्फ निराश और निराश किया है. हरियाणा के भगाणा से लेकर गुजरात के उना सहित देश के विभिन्न अंचलों में जो दलित उत्पीडन कि असंख्य घटनाएँ हुईं,उन पर दलित नेताओं की ख़ामोशी चौकाने वाली रही. ख़ामोशी सिर्फ दलित उत्पीडन की घटनाओं पर ही नहीं, भयावह आर्थिक विषमता की पुष्टि करती रिपोर्टों पर भी दिखी. यही नहीं निजीकरण, उदारीकरण, विनिवेशीकरण के जरिये शासक दलों द्वारा आरक्षण के खात्मे की जो साजिश हुई, उसकी काट के लिए दलित बुद्धिजीवियों ने सरकारी क्षेत्र की नौकरियों से आगे बढ़कर सप्लाई, डीलरशिप, ठेकों, पार्किंग, परिवहन, फिल्म-मीडिया इत्यादि समस्त क्षेत्रों में संख्यानुपात में भागीदारी का जो अभियान चलाया, उसकी पूरी तरह अनदेखी करते हुए दलित नेतृत्व सवर्णपरस्ती में मशगूल रहा. इन सब कारणों से स्थापित दलित नेतृत्व से दलितों का ऐसा मोहभंग हुआ कि 21 मई को युवा एक्टिविस्ट सोनू सिंह पासी को फेसबुक पर घोषणा करने में कोई झिझक नहीं हुई- ‘चंद्रशेखर आजाद रावण ने आज मायावती को ओवरटेक कर लिया है.‘

बहरहाल भीम आर्मी का उदय दलित आंदोलनों की कोई नयी परिघटना नहीं है. इस विषय में ‘दलित पैंथर आन्दोलन ‘पुस्तक के लेखक अजय कुमार की राय  काफी महत्वपूर्ण है. उन्होंने इस पुस्तक की प्रस्तावना में लिखा है- ‘भारतवर्ष में शताब्दियों से उच्च जातियां दलितों के मानवाधिकारों का हनन करती आई हैं, जिसके परिणामस्वरूप दलितों को अत्याचारों से प्रभावित होकर समय-समय पर आन्दोलन छेड़ने की आवश्यकता पड़ती रही है और सक्रिय दलित हमेशा बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर की विचारधारा से प्रेरित होकर उच्च-नीच का भेदभाव मिटाने एवं यथास्थिति को बदलने के लिए आन्दोलन करते रहे हैं. ऐसा ही एक आन्दोलन था ‘दलित पैंथर आन्दोलन’. इस आन्दोलन का क्रियाशील युग 1972-1979 तक था जिसमें  महाराष्ट्र के दलित युवाओं और सक्रिय साहित्यकारों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया एवं दलितों को डॉ. अम्बेडकर की ही भांति उनके अधिकारों के प्रति जागरूक किया एवं एक समतावादी समाज की स्थापना करने की भरसक कोशिश किया.’

जहां तक ‘भीम-सेना’ के नामकरण का सवाल है यह भी कोई नया नहीं है. पहली बार भीम सेना नामक संगठन 50 वर्ष पूर्व कर्णाटक में वजूद में आया, जिसके संस्थापक रहे श्याम सुन्दर. महाराष्ट्र में जन्मे श्याम सुन्दर यूं तो आंध्र प्रदेश के हैदराबाद में रहते थे, पर उनकी ज्यादातर सक्रियता कर्णाटक में रही. उसी श्याम सुन्दर ने बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर की 77 वीं वर्षगांठ पर 29 अप्रैल 1968 को कर्णाटक के गुलबर्गा शहर से ‘भीम सेना आन्दोलन’ की शुरुआत की. भीम सेना का आन्दोलन दक्षिण में प्रभावी हुआ ही, यह उत्तर भारत के यूपी, हरियाणा और पंजाब में भी फैला. बाद में जब 9 जुलाई, 1972 को ईंट का जवाब पत्थर से देने के लिए ‘दलित पैंथर’ नामक ऐतिहासिक संगठन वजूद में आया, उसने अमेरिका के ब्लैक पैंथर के साथ कर्णाटक की भीम सेना से भी प्रेरणा लिया. क्या लगभग पांच दशक बाद वजूद में आई ‘भीम आर्मी’ कर्णाटक भीम सेना की भांति अपनी छाप छोड़ेगी?

बहनजी, आपने यह भीम आर्मी के बारे में क्या कह दिया?

नई दिल्ली। बसपा प्रमुख मायावती ने भीम आर्मी के बारे में ऐसा स्टेटमेंट दिया है, जिस पर बड़ी बहस छिड़ सकती है. संभव है कि उनके बयान से बसपा के समर्थकों को भी धक्का लगे. आज 25 मई को जारी एक बयान में बसपा प्रमुख ने भीम आर्मी को आरएसएस और भाजपा से जुड़ा हुआ संगठन बता दिया है. अपने बयान में बसपा प्रमुख ने कहा है कि ‘भीम आर्मी वास्तव में बीजेपी के संरक्षण में पलने वाला संगठन है. बीजी इस संगठन का राजनीतिक इस्तेमाल कर रही है. इसलिए इसके नेताओं पर अब तक कोई कार्रवाई नहीं की गई है.’ हालांकि मायावती ने भीम आर्मी का आर.एस.एस या भाजपा से संपर्क होने का कोई सबूत नहीं दिया. बसपा प्रमुख के इस बयान के बाद देश भर से प्रतिक्रिया आनी शुरू हो गई है. तमाम लोगों मायावती के इस कदम और बयान से हैरान हैं. बसपा प्रमुख ने अपनी विज्ञप्ति में भीम आर्मी पर बाबासाहेब अम्बेडकर की जयंती के दौरान लोगों से चंदा वसूलने का आरोप लगाया है. जबकि भीम आर्मी ने संत रविदास औऱ बाबासाहेब की मूर्ति की स्थापना और इनकी मूर्ति के अनादर और दलित समाज के लोगों पर जुल्म के खिलाफ अपना प्रदर्शन किया था. बसपा के सहारनपुर यूनिट का संदर्भ लेते हुए मायावती ने कहा है कि सहारनपुर बसपा के लोगों का यह मानना है कि भीम आर्मी नाम का संगठन पूरे तौर पर बीजेपी का Product है और इसी संगठन के जरिए बीजेपी उत्तर प्रदेश में बसपा द्वारा सर्वसमाज में बनाए गए भाईचारे व सौहार्द को नफरत में बदलना चाहती है. हालांकि अपने तमाम आऱोपों के बारे में बहुजन समाज पार्टी या फिर उसकी मुखिया मायावती कोई प्रमाण नहीं दे पाई हैं.

भीम आर्मी के समर्थन में नीला हुआ जंतर-मंतर

सहारनपुर प्रकरण के विरोध के लिए सजा  जंतर मंतर देखने लायक था. ऊपर आसमान नीला था और धरती पर जंतर मंतर. जिधर देखो उधर ही नीला. हजारों की भीड़ और सबसे अहम बात उस भीड़ में 99 फीसदी युवा. सब के सब अम्बेडकरवादी. ‘जय भीम’ वाले. सहारनपुर के शब्बीरपुर गांव में ठाकुरों से लोहा लेने वाले भीम आर्मी के अध्यक्ष चंद्रशेखर रावण के समर्थन के लिए देश भर से युवाओं का जत्था जंतर मंतर पर पहुंचा था. बल्कि सच कहें तो असल में युवाओं की यह भीड़ सिर्फ चंद्रशखर रावण को समर्थन देने नहीं पहुंची थी, बल्कि युवाओं का यह जत्था उस युवक और उस संगठन के लिए सामने आया था जिसने ठाकुरों के अत्याचार के आगे झुकने की बजाय उनसे पंगा लिया और खुद को ‘ग्रेट चमार’ कह कर संबोधित किया. असल में आज का बहुजन युवा, खासकर दलित युवा राजनैतिक भागेदारी के लिए छटपटा रहा है. वह किसी ऐसे नेता को चाहता है जो उनके लिए लड़ने को खड़ा हो. जो दलित समाज का दुख समझे, दलितों पर होने वाले अत्याचार पर पलटवार करने की हिम्मत रखता हो और अपनी जाति पर शर्मिंदा होने की बजाय उस पर गर्व करे. सहारनपुर की घटना के बहाने युवाओं को चंद्रशेखर रावण में अपना हीरो दिखाई दिया है. अपने ऊपर गर्व करने और राजनैतिक भागेदारी की छटपटाहट ही थी कि बिना किसी राजनैतिक संगठन के बुलाए ही युवा आंदोलन के लिए तय वक्त से पहले ही जुटना शुरू हो गए थे. विभिन्न जगहों से आए युवाओं में समानता थी तो बस ‘जय भीम’ की. तमाम लोग एक-दूसरे को जानते नहीं थे. लेकिन दलित समाज के सम्मान की खातिर सब एकजुट होकर एक छतरी के नीचे खड़े थे. हो सकता है कि यह आंदोलन ज्यादा दिन न टिक सके और जंतर मंतर से लौटे युवा फिर से अपनी दुनिया में व्यस्त हो जाएं, लेकिन उन्होंने अपनी राजनैतिक भागेदारी की जरूरत को तो बता ही दिया है. इस आंदोलन से दलित राजनीति का दंभ भरने वाले नेताओं ने कितनी सीख ली ये तो वक्त बताएगा, लेकिन बहुजन युवाओं ने उनके लिए अपना संदेश दे दिया है. उन्होंने बता दिया है कि वो संगठित होना चाहते हैं, बाबासाहेब और मान्यवर कांशीराम के सपनों का भारत ही उनका भारत है और उन्हें बस एक मौका चाहिए.

मीडिया में सहारनपुर कहां है?

सहारनपुर से लौटे एक युवा रिपोर्टर ने यह कहकर मुझे चौंका दिया कि जिन दिनों वहां पुलिस मौजूदगी में सवर्ण-दबंगों का तांडव चल रहा था, दिल्ली स्थित ज्यादातर राष्ट्रीय न्यूज चैनलों और अखबारों के संवाददाता या अंशकालिक संवाददाता अपने कैमरे के साथ शब्बीरपुर और आसपास के इलाके में मौजूद थे, लेकिन ज्यादातर चैनलों और अखबारों में शब्बीरपुर की खबर नहीं दिखी. उन दिनों ज्यादातर चैनलों की खबरों में जस्टिन बीबर छाये हुए थे और लाखों रुपये खर्चकर उनके कार्यक्रम में मुंबई जाने वालों के इंटरव्यू दिखाये जा रहे थे. देश के कथित राष्ट्रीय मीडिया के मुख्यालयों से सहारनपुर की दूरी महज 180 किमी की है. पर मीडिया दिल्ली सरकार के हटाये गये एक बड़बोले मंत्री की बागी अदाओं पर फिदा था. तीन तलाक़ की उबाऊ बहसों से टीवी चैनल अटे पड़े थे. गोया कि भारतीय मुसलमान की सबसे बड़ी समस्या तीन तलाक़ ही हो, जबकि इस समुदाय में महज 0.56 फ़ीसद तलाक़ होते हैं. दूसरी तरफ, पश्चिम यूपी के शब्बीरपुर को जलाया जा रहा था. पुलिस की मौजूदगी में घर के घर उजाड़े गये. घरों में कुछ भी नहीं बचा. साइकिलें, चारपाइयां, कुछ छोटे-बड़े डब्बों में रखा राशन, कढ़ाई में बनी सब्जियां, अंबेडकर की किताबें और बच्चों के स्कूली बस्ते भी जलकर ख़ाक हो गए. महज बीस दिनों में तीसरी बार सहारनपुर का यह इलाक़ा सुलग रहा था. पर देश के बड़े न्यूज़ चैनलों और ज़्यादातर अख़बारों के लिये यह ख़बर नहीं थी. अगर कुछ खास चैनलों और न्यूज वेबसाइटों ने इसे न कवर किया होता तो देश को सहारनपुर की सच्चाई शायद ही पता चल पाती. ‘जंगलराज’ का कोरस ग़ायब यूपी या देश के कई प्रदेशों में ऐसी घटनाएं पहले से होती रही हैं और सिलसिला आज तक जारी है. पर हिंदी पट्टी के राज्यों में जब कभी किसी दलित या पिछड़े वर्ग के नेता की अगुवाई वाली सरकारें होती हैं, ऐसी घटनाओं के कवरेज में मीडिया, ख़ासकर न्यूज़ चैनल और हिन्दी अख़बार ‘बेहद सक्रिय’ दिखते रहे हैं-अच्छी तथ्यपरक रिपोर्टिंग मे नहीं, ‘जंगलराज’ का कोरस गाने में. हर किसी आपराधिक घटना, हादसे या उपद्रव को मीडिया का बड़ा हिस्सा उक्त सरकारों की नाकामी से उपजे ‘जंगलराज’ के रूप में पेश करता आ रहा है. पर्दे और पृष्ठों पर बार-बार उभरता रहा है-जंगलराज! लेकिन उत्तर प्रदेश में सरकार क्या बदली, मीडिया का वह ‘जंगलराज’ ग़ायब! योगी जी के ‘रामराज’ को भला ‘जंगलराज’ कहने का दुस्साहस कौन करे! सहारनपुर में सामुदायिक और सांप्रदायिक तनाव की घटनाएं पहले भी होती रही हैं. लेकिन इस बार एक फ़र्क़ नज़र आता है. ख़बर के बजाय तमाशे पर टिके रहने वाले न्यूज़ चैनलों की छोड़िये, पश्चिम उत्तर प्रदेश में सर्वाधिक प्रसारित हिन्दी अख़बारों ने भी इस पहलू को प्रमुखता से नहीं कवर किया. सांप्रदायिक-सामुदायिक तनाव की घटना की शुरुआत इस बार अंबेडकर जयंती के जुलूस से हुई. तब तक यूपी में भाजपा की अगुवाई वाली सरकार आ चुकी थी. भाजपा के स्थानीय सांसद, कई-कई विधायक और नेता इस जुलूस के साथ थे. जुलूस के ज़रिये दलित और अल्पसंख्यक समुदाय के बीच तनाव और टकराव पैदा करने की भरपूर कोशिश की गई. स्थानीय पुलिस अधिकारियों ने कड़ाई से निपटना चाहा तो उन्मादी भीड़ ने एसएसपी के बंगले पर हमला कर दिया. बाद में उक्त एसएसपी का तबादला कर दिया गया, मानो सारे घटनाक्रम के लिए वह अफ़सर ही दोषी रहा हो! भाजपा या राज्य सरकार ने स्थानीय सांसद, विधायक या नेताओं के ख़िलाफ़ कोई ठोस कार्रवाई नहीं की. आंबेडकर के नाम पर भाजपा-समर्थकों का यह जुलूस एक तीर से दो निशाने साधने की कोशिश कर रहा था. दलितों में यह भ्रम पैदा करने की कि सवर्ण वर्चस्व की ‘हिन्दुत्व-पार्टी’ अब दलितों के प्रिय नेता अंबेडकर को तवज्जो देने लगी है और दूसरा कि मुसलमान इस आयोजन में बाधा बन रहे हैं. देश के किसी कथित राष्ट्रीय या क्षेत्रीय टीवी चैनल ने उस वक्त इस पहलू पर अपने सांध्यकालीन सत्र में बहस नहीं कराई. तब सारे चैनलों पर ‘यूपी में योगी-योगी’ का जयगान चल रहा था. ऊपरी तौर पर हाल के उपद्रव या हिंसक हमले की जड़ में था-महाराणा प्रताप की शोभा यात्रा और उक्त जूलूस के दौरान तेज़ आवाज़ में ‘डीजे’ का बजना. बताया जाता है कि यह आयोजन बिल्कुल झारखंड में रामनवमी के जूलूसों की तरह था. गाजे-बाजे के साथ हथियारों से लैस उन्मादी युवाओं का सैलाब. इसमें एक ख़ास दबंग सवर्ण जाति के लोगों की संख्या ज़्यादा थी. गांव और आसपास के इलाक़े में खेती-बाड़ी और अन्य काम-धंधे पर इन जातियों का ही वर्चस्व है. दलितों के पास यहां खेती-बाड़ी की ज़मीन बहुत कम है. अनेक परिवार पशुपालक भी हैं. कुछ लोग छोटे-मोटे धंधे से जीवन-यापन करते हैं, जबकि कुछ नौकरियों में हैं. सामाजिक-राजनीतिक रूप से वे अपेक्षाकृत जागरूक और मुखर माने जाते हैं. ‘भीम सेना-भारत एकता मिशन’ इनका एक उभरता हुआ नया मंच है. चंद्रशेखर नामक एक युवा वकील इसके प्रमुख नेताओं में हैं. अलग-अलग नाम से इस तरह के संगठन देश के अन्य हिस्सों में भी बन रहे हैं. बसपा से निराश दलितों के बीच ये तेज़ी से लोकप्रिय भी हो रहे हैं. जयंतियों पर हथियारबंद जूलूस क्यों? सहारनपुर में हिंसा और उपद्रव के संदर्भ में सबसे पहला सवाल जो मीडिया को उठाना चाहिए था, वह ये कि 14 अप्रैल को यहां भाजपा नेताओं की अगुवाई में निकाले गए जुलूस के दौरान भारी हिंसा हुई थी और उन्मादी भीड़ ने कुछ लोगों के उकसावे पर जिले के एसएसपी के बंगले तक पर हमला किया, ऐसे में प्रशासन ने फिर किसी ऐसे जुलूस को निकलने ही क्यों दिया? बीते 5 मई को महाराणा प्रताप जयंती के नाम पर सवर्ण दबंगों को पारंपरिक हथियारों और आग्नेयास्त्रों के साथ जुलूस निकालने क्यों दिया गया? यह एक ऐसा सवाल है, जिसका सहारनपुर के जिला प्रशासन या समूची योगी सरकार के पास कोई भी तर्कसंगत जवाब नहीं. इन शोभा यात्राओं और जूलूसों पर प्रशासन की तरह मीडिया का बड़ा हिस्सा भी ख़ामोश रहता है, या तो वह इन्हें बढ़चढ़ कर कवर करता है या इन्हें सामान्य घटना के रूप में लेता है. समाज को बांटने और टकराव बढ़ाने वाले ऐसे जुलूसों को वह सिरे से ख़ारिज क्यों नहीं करता? अगर मीडिया ऐसा करता तो प्रशासन पर इसका भारी दबाव पड़ता और वह ऐसे जुलूसों को रोकने के लिए मजबूर हो जाता. मीडिया ऐसा करके निहित स्वार्थ से प्रेरित उन्मादी जुलूसों के ख़िलाफ़ पब्लिक ओपिनियन बना सकता था. पर देश के ज़्यादातर हिस्सों में सांप्रदायिक य़ा सामुदायिक तनाव पैदा करने वाले ऐसे जूलूस एक तरह का दैनन्दिन कर्मकांड बनते जा रहे हैं और मीडिया का बड़ा हिस्सा उनके शांतिपूर्ण समापन या रक्तरंजित होने का मानो इंतज़ार करता है! दूसरा अहम सवाल 5 मई के घटनाक्रम को लेकर उठना चाहिए था. जिस दिन शब्बीरपुर गांव में दलितों पर हमला हुआ, पूरे पांच घंटे हमला जारी रहा. घटनास्थल से लौटे पत्रकारों के मुताबिक उस वक्त पुलिस भारी मात्रा में वहां मौजूद थी. फिर उसने दबंग हमलावरों को रोका क्यों नहीं? क्या पुलिस-प्रशासन का उस दिन सवर्ण समुदाय के दबंग हमलावरों को समर्थन था? पुलिस ने बाद में दलितों की पंचायत रोकी. पर पांच घंटे का हमला क्यों नहीं रोका? मीडिया में यह सवाल कितनी शिद्दत से उठा? सहारनपुर के दलित वकील चंद्रशेखर सवाल उठाते हैः ’ख़ून तो सबका एक सा है फिर यह पूर्वाग्रह क्यों?’ समाज में जो पूर्वाग्रह हैं, उनकी अभिव्यक्ति सिर्फ़ शासन और सियासत तक सीमित नहीं है, वह मीडिया में भी है. अब कुछ चैनलों को चंद्रशेखर में दलित-आक्रोश के पीछे का चेहरा नज़र आ रहा है. पता नहीं, उसे नायक बनाना है या खलनायक? सहारनपुर में सांप्रदायिक और सामुदायिक तनाव व हिंसा को लेकर तीसरा सवाल है- इसके राजनीतिक संदर्भ का. क्या इस तरह की जातीय गोलबंदी के पीछे कुछ शक्तियों के कोई सियासी स्वार्थ भी हैं? कुछ माह बाद होने वाले स्थायी निकाय चुनावों से तो इनका कोई रिश्ता नहीं? दलितों और अल्पसंख्यकों के बीच एकता की संभावना से किसे परेशानी है? क्या कुछ लोगों को ऐसी एकता से किसी तरह का राजनीतिक भय है? क्या यह सब किसी योजना के तहत शुरू हुआ, जो बाद के दिनों में अनियंत्रित हो गया. और अब शांति की बात हो रही है! मीडिया के बड़े हिस्से ने सहारनपुर के संदर्भ में ऐसे सवालों को नहीं छुआ. – लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनका यह आलेख न्यूज वेबसाइट\””द वायर\”” से साभार प्रकाशित

सहारनपुर का सच (पार्ट-3) हमलावर अम्बेडकर मुर्दाबाद और योगी-मोदी जिन्दाबाद के नारे लगा रहे थे

सहारनपुर की हालिया घटना ने पीड़ित अग्नि भास्कर का भ्रम तोड़ दिया है. पहले उन्हें लगता था कि संविधान निर्माण करने और भारत के निर्माण में अपना महत्पूर्ण योगदान देने के कारण बाबासाहेब अम्बेडकर को हर वर्ग के लोग मानते होंगे. लेकिन बाबासाहेब के प्रति जातिवादी सवर्णों की नफरत देखकर भास्कर का भ्रम टूट गया है. भास्कर उस दिन को याद करते हुए कहते हैं कि हमलावर बाबा साहेब मुर्दाबाद और योगी-जोगी ज़िन्दाबाद के नारे लगा रहे थे. हमें गाली देते हुए उन्होंने बोला कि अम्बेडकर का नाम मत लेना तुम लोग और न मूर्ति लगाने के बारे में सोचना. अगर यहां रहना है तो योगी-मोदी बोलो. सहारनपुर में सवर्णों की यह मानसिकता भाजपा की सरकार बनने के बाद अचानक उभर कर आई है. जो लोग कल तक सपा के शासनकाल में गुंदागर्दी को लेकर उन्हें घेरते थे, वो आज खुद कठघरे में खड़े हैं. इस मामले के सामने आने के बाद हैरान करने वाली बात यह है कि जो भाजपा गुंडागर्दी और कानून व्यवस्था के नाम पर समाजवादी पार्टी को लगातार कठघरे में खड़ा करती थी, आज वही इस पूरे सच और पुलिसकर्मियों की भूमिका पर चुप्पी साधे हुए है.

सहारनपुर का सच (पार्ट-1) ‘वो मेरी छाती को काट देना चाहते थे, पुलिस उनके साथ थी’

सहारनपुर का शब्बीरपुर पांच मई से ही जातिवाद की आग में जल रहा है. आग थोड़ी ठंडी होने पर अब जातिवाद, घृणा और आतंक की कहानी सामने आने लगी है. इस हैवानियत के पीछे का सच चौंकाने वाला है. सबसे ज्यादा हैरान करने वाला सच तो पुलिस का है, जो यह बता रही है कि जाति का जहर इस समाज में किस कदर घुला हुआ है. तमाम पीड़ितों ने साफ कहा कि पुलिस उनके साथ थी. जिला अस्पताल में भर्ती तमाम लोगों से जन पक्षधरता के पैरोकार मीडियाकर्मी वाले मिलने पहुंच रहे हैं. तमाम मीडियाकर्मियों के वही सवाल हैं और पीड़ितों का जवाब भी सबको एक जैसा ही है. हां, कुछ लोगों की कहानी चौंकाने वाली है. रीना इसी में से एक है. रीना की आंखों से अभी तक दहशत गई नहीं है. रीना कहती हैं कि उन्होंने (ठाकुर) ने उन्हें चारो ओर से घेर लिया था. वो मेरी छाती को काट देना चाहते थे. उस पर तलवार मारना चाहते थे. मैंने किसी तरह हाथ पैर जोड़कर खुद को बचाया. उन्होंने मेरे शरीर के कई हिस्सों पर हमला किया. पुलिस उनके साथ थी.”