उजाला नहीं कर पाई सलमान खान की फिल्‍म ‘ट्यूबलाइट’

नई दिल्ली। आज सिनेमाघरों में सलमान खान की बहुप्रतीक्षित फिल्म ‘ट्यूबलाइट’ रिलीज हुई है. दो सुपरहिट फिल्‍में देने के बाद इस बार कबीर खान और सलमान खान की जोड़ी ने हॉलीवुड की फिल्म ‘ए लिटिल ब्वॉय’ से प्रेरित होकर इस फिल्म की कहानी पर्दे पर दर्शाने की कोशिश की है. इस फिल्म सलमान खान जिस अवतार में नजर आ रहे हैं उस अवतार में उन्हें पहले कभी नहीं देखा गया है. इस फिल्म में सलमान न तो अपनी शर्ट उतारने वाले हैं और न ही अपना मसल्स दिखाएंगे. लेकिन इस फिल्म में सलमान आपको बोर नहीं होने देंगे. कहानी में एक वक्त ऐसा आता है कि भरत की नौकरी आर्मी में लग जाती है और 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान उसे जाना पड़ता है और जिसके वापस आने की कोई उम्मीद नहीं होती. फिर यहां से शुरू होता है फिल्म का इमोशनल पल. इसके बाद लक्ष्मण पूरी तरीके से भावुक हो जाता है और उसकी बस यही एक कोशिश होती है कि किसी तरह वह अपने भाई को वापस ला सके. इस यकीन में लक्ष्मण का समय-समय पर साथ देते हैं बन्ने खान चाचा (ओम पुरी), जादूगर शाशा (शाहरुख खान) और शी लिंग (झू झू), लेकिन क्या लक्ष्मण का यकीन सही साबित होता है? लक्ष्मण अपने भाई भरत जंग के मैदान से वापस ला पाता है? अब इन सवालों का जवाब पाने के लिए आपको सिनेमाघरों में जाकर पूरी फिल्म देखनी पड़ेगी. कहानी में एक वक्त ऐसा आता है कि भरत की नौकरी आर्मी में लग जाती है और 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान उसे जाना पड़ता है और जिसके वापस आने की कोई उम्मीद नहीं होती. फिर यहां से शुरू होता है फिल्म का इमोशनल पल. इसके बाद लक्ष्मण पूरी तरीके से भावुक हो जाता है और उसकी बस यही एक कोशिश होती है कि किसी तरह वह अपने भाई को वापस ला सके. इस यकीन में लक्ष्मण का समय-समय पर साथ देते हैं बन्ने खान चाचा (ओम पुरी), जादूगर शाशा (शाहरुख खान) और शी लिंग (झू झू), लेकिन क्या लक्ष्मण का यकीन सही साबित होता है? लक्ष्मण अपने भाई भरत जंग के मैदान से वापस ला पाता है? अब इन सवालों का जवाब पाने के लिए आपको सिनेमाघरों में जाकर पूरी फिल्म देखनी पड़ेगी.

रामनाथ कोविंद के समर्थन में क्यों उतर रहे हैं नीतीश

 राष्ट्रपति पद  का चुनाव एकदम नजदीक है ऐसे में राजनीतिक पार्टियों की धड़कने तेजी से बढ़ती जा रही हैं. जब समस्त विपक्ष एक साझा उम्मीदवार उतारने की कोशिश में लगा था, उसी बीच बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने एनडीए उम्मीदवार रामनाथ कोविंद को समर्थन देकर सबको चौंका दिया. एनडीए से मुकाबला होने से पहले अब विपक्ष के खेमे में ही रार मच गई है. राजनीतिक गलियारों से लेकर आमजन के बीच इस सवाल का जवाब पाने को बेताबी है कि आखिर नीतीश ने क्यों एनडीए उम्मीदवार में समर्थन का फैसला किया है.

असल में बिहार में महादलित वोटबैंक बहुत बड़ा निर्णायक है. संयोग से रामनाथ कोविंद भी महादलित श्रेणी से ही आते हैं. बिहार में लालू प्रसाद यादव के यादव-मुस्लिम गठजोड़ पर नीतीश कुमार के भारी होने की वजह महादलित वोटबैंक का उनके साथ जाना ही रहा है. नीतीश के लिए महादलित वोटों का महत्व इसी से समझा जा सकता है कि उन्होंने 2014 में अपनी जगह जीतनराम मांझी को मुख्यमंत्री बनाने का दांव चला था. मांझी भी महादलित श्रेणी से ही आते हैं. बाद में जब मांझी की राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं हद पार करने लगीं तो नीतीश को उन्हें हटा कर खुद मुख्यमंत्री बनना पड़ा. मांझी ने इस फैसले को महादलितों का अपमान करार दिया था. 2015 के आम चुनाव में नीतीश कुमार महागठबंधन के जरिए दोबारा सत्ता में तो आ गए लेकिन वह बैसाखी के सहारे अपनी ताकत बनाए रखने के बजाय अकेले अपने दम पर मजबूत दिखना चाहते हैं. इसके लिए उन्हें महादलित वोट बैंक का साथ चाहिए ही चाहिए. नीतीश को इस बात की शंका थी कि अगर उन्होंने कोविंद का विरोध किया तो महादलितों से उनकी दूरी और बढ़ जाएगी. ऐसे में उन्होंने ‘महादलित’ कोविंद का साथ देने का एलान कर महादलितों के बीच अपनी साख बढ़ा ली है, जिसका फायदा उन्हें भविष्य में दिखेगा.

नीतीश कुमार की निगाहें आने वाले बिहार चुनाव पर हैं जिसमें वे पूर्ण बहुमत की सरकार चाहतें हैं जिसका बड़ा वोट बैंक दलितो के पास है.

गूगल अब नौकरी देने का काम भी करेगा.

दुनियाभर भर जानकारी सिर्फ एक क्लिक में आप तक पहुंचाने वाला गूगल सर्च इंजन अब आपको जॉब भी दिलाएगा.  गूगल जल्दी ही जॉब के लिए सर्च इंजन शुरू करने वाला है. अगर आप भी अच्छी नौकरी की तलाश कर रहे हैं तो अब गूगल आपके काम को और ज्यादा आसान करने जा रहा है. आपको बता दें कि गूगल ने हाल ही में अपने सालाना डेवलपर कॉन्फ्रेंस में इसकी घोषणा की थी. कंपनी का मानना है कि नए सर्च टूल से उन नौकरियों को ढूंढना आसान होगा, जिन्हें पहले ढूंढना मुश्किल होता था. इनमें रिटेल जॉब और सर्विस शामिल हैं. हालांकि, ये नया फीचर शुरुआत में अमेरिकी बाजार के लिए ही है जिसे बाद में दूसरे देशों के लिए भी लाया जाएगा.

गूगल ने अपने इस नए फीचर के लिए लिंक्डइन, मॉन्स्टर, ग्लासडोर, डायरेक्ट एंप्लॉयर, वेअप, कैरियर बिल्डर और फेसबुक जैसी जॉब लिस्टिंग साइट के साथ साझेदारी की है. इस सर्ज इंजन का पहला वर्जन रिलीज किया गया है. यह सर्च इंजन यूजर्स के इंटरेस्ट के आधार पर फिल्टर करके जॉब का रिजल्ट दिखाएगा

गूगल के इस कदम से संसार के करोड़ो लोगो को इसका फायदा मिलेगा.

 

NIA में निकली कई पदों पर ऑनलाइन भर्ती, करें आवेदन

अगर आप सरकारी नौकरी की इच्छा रखते हैं और किसी जांच विभाग में जाना चाहते हैं तो राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) में कई पदों पर भर्ती निकली है जिसके लिए नोटिफिकेशन भी जारी कर दिया गया है. कुल पदः 62 पदों का नामः इंस्पेक्टर, सब इंस्पेक्टर और असिस्टेंट सब इंस्पेक्टर योग्यताः देश के किसी भी मान्यता प्राप्त संस्थान से स्नातक की डिग्री होना अनिवार्य है. वेतनः 35000 रुपये प्रति माह ऐसे करें आवेदनः उम्‍मीदवार पहले ऑनलाइन अपना फार्म भरें और फिर जरूरी दस्तावेजों की फोटोकॉपी के साथ अपना आवेदन पत्र इस पते पर DIG (Adm), NIA HQ, 7th Floor, NDCC-II Building, Jai Singh Road, New Delhi–110001 भेज दें. अंतिम तारीखः 22 जून अधिक जानकारी के लिए एनआईए की ऑफिशियल वेबसाइट (nia.gov.in) पर क्लिक कर पढ़ें.

23 जून को जारी हुआ NEET का रिजल्ट

नई दिल्ली। सीबीएसई नीट 2017 का रिजल्ट  का इंतजार कर रहे स्टूडेंट्स का इंतजार अब खत्म हो गया है. केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड ने ऑफिशियल वेबसाइट पर रिजल्ट जारी कर दिया है. स्टूडेंट्स अपना रिजल्ट सीबीएसई की ऑफिशियल वेबसाइट cbseresults.nic.in और cbseneet.nic.in पर NEET 2017 Result पर चेक कर सकते हैं.

नेशनल एलिजिबिलिटी कम एंट्रेंस टेस्ट के नतीजों की घोषणा से 10.5 लाख से ज्यादा छात्रों ने राहत ली है. दो दिन पहले, भारत सरकार के आधिकारिक रिजल्ट पोर्टल ने जानकारी दी थी कि नीट रिजल्ट 22 जून को आएगा. हालांकि शाम होते ही इस नोटिफिकेशन को हटा लिया गया था.

गौरतलब है कि 12 जून को सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि नीट 2017 का रिजल्‍ट 26 जून तक जारी किया जाए. इसलिए सीबीएसई हर हालत में 26 जून तक रिजल्‍ट जारी कर देगा.

ऐसे चेक करें रिजल्ट – ऑफिशियल वेबसाइट cbseneet.nic.in पर जाएं. – NEET 2017 result and rank लिंक पर क्लिक करें. – एक नया पेज खुलेगा. अब यहां अपना रोल नंबर और अन्‍य डिटेल्स डालें. – रिजल्‍ट दिखने लगेगा. इसका प्रिंटआउट लेकर रख लें.

बता दें कि इस साल करीब 12 लाख छात्रों ने नीट की परीक्षा दी है. जिसमें से 10.5 लाख छात्रों ने हिंदी या अंग्रेजी में परीक्षा दी है जबकि शेष 1.25 लख छात्रों ने आठ अन्‍य भाषाओं का चुनाव किया था. इस साल नीट का एग्‍जाम 10 भाषाओं में आयोजित किया गया था. गौरतलब है कि नीट के माध्‍यम से ही एमबीबीएस और बीडीएस कोर्सों में एडमिशन दिया जाता है.

ऋषिकेश AIIMS में 1350 पदों पर बेहतर जॉब का मौका

उत्तराखंड के ऋषिकेश में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान ने प्रोफेसर, ट्यूटर / क्लीनिकल इंस्ट्रक्टर, नर्सिंग सुपरिन्टेन्डेन्ट एवं नर्स पदों पर भर्ती के लिए आवेदन मांगे है. इस भर्ती के लिए योग्य और इच्छुक अभ्यर्थी समय पर आवेदन कर सकते हैं.

इन पदों के लिए शैक्षिक योग्यता बी.एससी. (नर्सिंग) / एमबीबीएस डिग्री / पोस्ट ग्रेजुएट डिग्री / डिप्लोमा और इसके समकक्ष डिग्री होने पर भी मान्य हैं.

इसमें आवेदन करने के लिए अंतिम तिथि – 31-07-2017 है..

इस सरकारी जॉब के लिए, शॉर्टलिस्टिंग और इंटरव्यू में प्रदर्शन के आधार पर उमीदवार का चयन किया जाएगा.

अधिक जानकारी  के लिए लिंक पर जाएं

-http://www.aiimsrishikesh.edu.in/recruitments/faculty%20advt.%20%20for%20webiste.pdf

देश में दलितों की स्थिति में क्या कोई सुधार आया है

दलितों से छुआछूत का मामला हो या मंदिर में प्रवेश को लेकर टकराहट या उनसे व्यभिचार की घटनाएं- लगभग हर रोज देश के किसी न किसी कोने से देखने-सुनने को मिल जाती हैं। मंदिर में प्रवेश के मसले पर दलितों की हत्या तक कर दी जाती है। थोड़ी पुरानी बात है। उत्तर प्रदेश में समाजवादी सरकार के आने के बाद बरेली के पास ही एक गांव में मंदिर में दलितों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाया गया था। अखबार और टेलीविजन चैनलों ने इस घटना को छापा-दिखाया। पुजारी मंदिर में ताला लगाकर गांव छोड़कर भाग गया लेकिन पुलिस प्रशासन और सरकारी तंत्र में इसे लेकर कोई सुगबुगाहट नहीं दिखी। देश में इस तरह की घटनाओं पर नियंत्रण पाने के लिए बहुत सख्त कानून मौजूद हैं। ‘दलित एक्ट’ के तहत सजा के कठोर प्रावधान किए गए हैं। दलित उत्पीड़न के संदर्भ में उन्हें उचित ढंग से लागू किया जाए तो उसके भय से ही बहुत हद तक ऐसी घटनाओं पर नियंत्रण पाया जा सकेगा। दलित, सवर्णों के रास्ते से गुजर कर न जाएं इसलिए महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश में कई जगहों पर बहुत ऊंची-ऊंची दीवारें खड़ी कर दी गईं। अफ्रीका में ‘रंगभेद’ की बातें जब थीं तब वहां काले लोगों के लिए चलने के लिए सड़कों पर अलग लेन होती थीं। उनके लिए दुकानें अलग होती थीं। वे गोरों की दुकानों से अपनी जरूरत का समान नहीं खरीद सकते थे। वे रेलगाडि़यों के सामान्य डिब्बों में यात्रा नहीं कर सकते थे। उनके लिए ट्रेनों में अलग डिब्बे होते थे। पर भारत में यह सब तो आज भी घट रहा है। ‘रंगभेद’ व्यवस्था के खिलाफ पूरी दुनिया एक हो गई थी। भारत भी ‘रंगभेद’ के खिलाफ उठ खड़ा हुआ था। उस जमाने में अफ्रीका के लिए ‘वीजा’ नहीं मिलता था। मुझे याद है कि उन दिनों मुझे भारत सरकार ने 1980 के आसपास किसी साल में पासपोर्ट जारी किया तो उसपर साफ-साफ लिखा था कि आप दो देशों (अफ्रीका और इजरायल) की यात्रा नहीं कर सकते थे। लेकिन यह सोचकर भी शर्म आती है कि आज 21वीं सदी के भारत में भी ऐसी घटनाएं घट रही हैं! ‘रंगभेद’ के खिलाफ जो माहौल पूरी दुनिया में बना वैसा भारत में ‘जाति-व्यवस्था’ के खिलाफ कभी बन नहीं पाया। ‘रंगभेद’ की जो विशेषताएं थीं, वे सब इस जाति व्यवस्था में पाई जाती हैं। यहां जाति-व्यवस्था के बने रहने की मूल वजह ‘हिन्दू धर्म’ है। धार्मिक व्यवस्था में बदलाव लाए बगैर आप सिर्फ कानून के सहारे सामाजिक या धार्मिक स्तर पर दलित उत्पीड़न खत्म नहीं कर सकते। चाहे इस देश में लेनिन ही क्यों न पैदा हो लें। मतलब आप यह कहना चाह रहे हैं कि जाति-व्यवस्था या दलित उत्पीड़न को खत्म करने के प्रयास अपने देश में ईमानदारी से नहीं हुए? मैं आपको थोड़ा पीछे स्वतंत्रता संग्राम में ले जाना चाहूंगा। 1929-30 के आसपास गांधी जी की बाबा साहब अम्बेडकर की पहली मुलाकात हुई थी तब उन्होंने अम्बेडकर से कहा कि मैंने देश की आजादी का आंदोलन छेड़ रखा है। अम्बेडकर ने बहुत दिलचस्प जवाब दिया, ‘मैं सारे देश की आजादी की लड़ाई के साथ उन एक चौथाई जनता के लिए भी लड़ना चाहता हूं जिस पर कोई ध्यान नहीं दे रहा है। आजादी की लड़ाई में सारा देश एक है और मैं जो लड़ाई लड़ रहा हूं, वह सारे देश के खिलाफ है। मेरी लड़ाई बहुत कठिन है।’औपनिवेशिक सत्ता (अंग्रेजों) के खिलाफ तो सारा देश खड़ा था इसलिए उनका जाना तय था लेकिन देश के लोग अपने ही लोगों के साथ जो भेदभाव बरत रहे हैं तो मेरी लड़ाई तो उनसे भी है। दलितों, पिछड़ों को न तो जमीन रखने का अधिकार था, न ही उन्हें शिक्षा पाने का अधिकार था। वे सदियों से जमींदारों और सामंतों के खेतों और कारखानों में मजदूरी करते चले आ रहे थे। हिंदू धर्म, वर्ण व्यवस्था और जातिगत व्यवस्था की खुलकर वकालत करते हैं। डॉ अम्बेडकर ने सोचा कि यहां जातिगत व्यवस्था का मूल आधार धार्मिक व्यवस्था से ही लड़ना पड़ेगा। संकेत के तौर पर 1927 में डॉ। अम्बेडकर ने ‘मनुस्मृति’ को जलाया। यह यहां दोहराने की जरूरत नहीं है कि इस हिंदू धर्म-ग्रंथ में शूद्रों के बारे में क्या-क्या लिखा गया है। मनुस्मृति के जलाए जाने से हिंदू घबरा उठे।धार्मिक व्यवस्था में बदलाव लाए बगैर आप सिर्फ कानून के सहारे सामाजिक या धार्मिक स्तर पर दलित उत्पीड़न खत्म नहीं कर सकते। चाहे इस देश में लेनिन ही क्यों न पैदा हो लें। एक उदाहरण और देना चाहूंगा। अपने देश में दलितों को कुएं और तालाब से पानी नहीं लेने दिया जाता था। महाराष्ट्र में इस भेदभाव से लड़ने के लिए बाबा साहब ने ‘महाड़’ आंदोलन चलाया। जलगांव में एक तालाब के किनारे लाखों की संख्या में दलित जुटे और उन्होंने प्रकृति के पानी पर अपना हक जताया था। बाद में कोंकणी ब्राह्मणों ने उस तालाब के शुद्धिकरण के लिए मंत्रोच्चारण और पूजा-पाठ आयोजित करवाया। इसके विरोध में अम्बेडकर ने 12 दलितों का चयन किया और कहा कि तुम इस्लाम स्वीकार कर लो। देश में सनसनी फैल गई। तत्काल ब्राह्मणों ने दलितों के लिए गांव के दो कुएं पानी लेने के लिए खोल दिए। ब्राह्मणों ने इस दबाव में कुएं का पानी लेने की आजादी दलितों को दे दी क्योंकि उन्हें लगा कि उनका धर्म खतरे में पड़ जाएगा। अम्बेडकर ने पूना-पैक्ट के समय यह बयान दिया कि वे बौद्ध धर्म अपना लेंगे तो तुरंत पैक्ट पर समझौता हो गया। पूना पैक्ट की वजह से दलितों का बहुत लाभ हुआ। उनका सबलीकरण इस पैक्ट की वजह से ही संभव हो पाया। इसी पैक्ट की वजह से दलितों को आरक्षण आधा-अधूरा ही सही मिल पाया। इसी पैक्ट के नतीजे के चलते दलित समुदाय के लोग मंत्री, मुख्यमंत्री और राष्ट्रपति भी बन पाए। इसी पैक्ट की वजह से लाखों की संख्या में दलितों के लिए शिक्षा के दरवाजे खुले। इस बारे में प्रसिद्ध कहानीकार चंद्रधर शर्मा ‘गुलेरी’ का एक लेख है ‘कछुआ धर्म’वे पंडित थे। हर रोज पूजा-अर्चना करते थे। टीका लगाते थे। उन्होंने अपने लेख में  हिंदू धर्म की बहुत अच्छी व्याख्या की थी। उन्होंने लिखा है, ‘हिंदू धर्म को जब अपने ऊपर खतरा नजर आता है तब वह कछुए की तरह अपनी गर्दन और मुंह अंदर समेट कर मृत के समान निष्क्रिय होने का प्रदर्शन करता है। लेकिन जब कोई संकट नहीं दिखता है तब वह गर्दन उठाकर आक्रामक मुद्रा में ऐसे चलता है मानो पूरी दुनिया जीतने निकला हो।’प्राचीन काल से एक उदाहरण पेश करना चाहूंगा। गौतम बुद्ध ने अपनी शिक्षा और उपदेशों के बल पर जाति-व्यवस्था के खिलाफ मोर्चा लिया और धर्म-परिवर्तन किया। बड़ी संख्या में ब्राह्मण ही बौद्धभिक्षु बने। कई राजाओं ने भिक्षुओं के खिलाफ अभियान चलाया। पुष्यमित्र आदि राजाओं ने छोटे-मोटे अभियान चलाए। सबसे जोरदार अभियान बौद्ध-धर्म के खिलाफ नौ वीं शताब्दी में शंकराचार्य के समर्थकों ने चलाए, शंकराचार्य और उसके समर्थकों को हिंदू राजाओं का समर्थन था, उन्हें किसी का डर नहीं था तो वे बौद्ध मठों को तोड़ने और भिक्षुओं पर हमले करने लगे। दरअसल, बुद्ध वर्ण व्यवस्था पर चोट कर रहे थे। वे मानव-मानव के बीच वर्ण के आधार पर भेद करने की बात को झुठला रहे थे। वर्ण व्यवस्था की रक्षा और शंकराचार्य का समर्थन पाकर तीसरी सदी में व्यापक स्तर पर हिंदू धर्म-ग्रंथ रचे गए। उससे पूर्व सिर्फ वेदों की रचनाएं ही हुई थीं, जिनका जिक्र बौद्ध ग्रंथों में भी मिलता है। बौद्ध-ग्रंथों में रामायण और महाभारत की चर्चा नहीं मिलती है। बुद्ध के आसपास ही चार्वाक भी हुए जिन्होंने तीन वेद होने की ही बात की है। मतलब साफ है कि सिर्फ तीन वेद ही बुद्ध-चार्वाक के समय तक रचे गए थे। आप गौर करें तो पाएंगे, शंकराचार्य के बाद जिस भी धर्म ग्रंथ की रचना की गई, उनमें वर्ण व्यवस्था का समर्थन किया गया है। आप पूना पैक्ट के जरिए दलितों के जीवन में बदलाव आने की बात कर रहे हैं, लेकिन अक्सर यह सुनने को मिलता है किसी भी सरकार ने दलितों के लिए कुछ नहीं किया है। उत्तर प्रदेश के संदर्भ में आपका जबाव चाहूंगा? हां, सरकारों द्वारा दलितों के विकास के लिए उठाए गए कदम संतोषजनक नहीं कहे जा सकते हैं लेकिन यह कहना कि दलितों के लिए किसी भी सरकार ने कुछ नहीं किया है, एक उग्रवादी किस्म की सोच है। उत्तर प्रदेश हिंदुत्ववादियों का सबसे बड़ा केंद्र रहा है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि बहुत सारी धार्मिक नदियां उत्तर प्रदेश से होकर गुजरती हैं इसलिए इस प्रदेश का सबसे ज्यादा सांप्रदायीकरण हुआ है। गंगा का सबसे बड़ा हिस्सा उत्तर प्रदेश में है। कुंभ का आयोजन इलाहाबाद में होता है। ज्योतिर्लिंग बनारस में है। मेरे कहने का मतलब यह है कि उत्तर प्रदेश हिंदुत्व को उर्वर भूमि प्रदान करने का काम करती रही है। यह भी सच है कि उत्तर प्रदेश में कुछ भी घटित होता है तो उसका असर दूसरे राज्यों पर जरूर पड़ता है। इसलिए मेरा मानना है कि अगर उत्तर प्रदेश में जाति-व्यवस्था को कमजोर कर दिया जाए तो उसका असर पूरे देश पर पड़ेगा। मायावती या कोई दलित हजार बार भी मुख्यमंत्री बन जाए, उससे दलितों के जीवन में परिवर्तन नहीं आनेवाला। परिवर्तन सामाजिक आंदोलन के दबाव के फलस्वरूप ही आ पाएगा। कांशीराम -मायावती का आंदोलन और खासकर मायावती का उत्तर प्रदेश की सत्ता में आसीन होने का असर दलितों की जिंदगी बदलने में कितना हो पाया है? जाति-व्यवस्था के खिलाफ सामाजिक आंदोलन चलाए गए थे। वह बुद्ध, ज्योतिबा फुले से लेकर आंबेडकर तक चलता चला आ रहा है। आंबेडकर के बाद जो भी दलित आंदोलन हुए उसकी सबसे बड़ी कमजोरी यह रही कि सभी दलित नेतृत्व अपनी-अपनी अलग-अलग डफली पीटते चले गए। खुद आंबेडकर द्वारा खड़ी की गई रिपब्लिकन पार्टी भी बाद के दिनों में चार भागों में बंट गई। उसका एक भाग रामदास अठावले के नेतृत्व में पहले शिवसेना और बाद में भाजपा में शामिल हो चुका है। आंबेडकर के पोते प्रकाश अबेडकर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) में शामिल हो गए। एक भाग में योगेंद्र कबाड़े थे, वे अब भाजपा में हैं। रिपब्लिकन पार्टी के एक भाग के नेता आरएस गंवई थे जो कांग्रेस में शामिल हो गए। कुछ दिनों तक वे केरल के राज्यपाल भी रहे। आंबेडकर के बाद उनकी पार्टी विखंडित हुई और उसका अधिकांश हिस्सा दक्षिणपंथी पार्टियों में शामिल होता चला गया। निश्चित तौर पर इससे सामाजिक न्याय की लड़ाई कमजोर हुई। दलित राजनीति में निर्वात-सा बन गया। उसका फायदा निश्चित तौर पर कांशीराम को मिला। कांशीराम ने शुरू में यह तय किया कि दलितों को सबसे पहले सामाजिक तौर पर चेतना संपन्न किया जाए। 1960-80 तक उन्होंने चुनाव लड़ने की बात नहीं की थी। इस दलित राजनीति का मूलाधार बामसेफ पार्टी रही। कांशीराम ने सामाजिक जागृति के लिए बहुत मेहनत की। वे गली-गली साइकिल पर घूमते थे। उत्तर प्रदेश में इस आंदोलन का असर बहुत पड़ा। उन्होंने दलितों को अपने आंदोलन से बड़ी संख्या में जोड़ा। दलितों को संगठित करने के बाद उन्होंने राजनीति में उतरने की बात की जिसके चलते बामसेफ भी कई भागों में बंट गया। कांशीराम से अलग हुए दूसरे दल सामाजिक जागृति फलाने की बात पर जोर देने की बात कर रहे थे। आंबेडकर ने सामाजिक बदलाव कोई मंत्री पद पर रहते हुए नहीं किया था। सामाजिक आंदोलनों के जरिए जो परिवर्तन समाज में आता है, वह स्थायी भाववाला होता है। मतलब आप यह कह रहे हैं कि सामाजिक परिवर्तन की बात मायावती तक आते-आते पीछे छूट गई? सामाजिक परिवर्तन पीछे ही नहीं छूटा बल्कि उलटी दिशा में चल पड़ा। कांशीराम ने बहुजन समाज पार्टी की नींव रखी और राजनीति में पूरी तरह उतर गए। सामाजिक आंदोलन से जो दबाव समाज में बनता था, वह दबाव बनना खत्म हो गया और जिसके चलते दलित उत्पीड़न की घटनाओं में लगातार इजाफा हुआ, इसे साफ-साफ महसूस किया जा सकता है। गांधी और अम्बेडकर की जब बातचीत हो रही थी तब उन्होंने साफ-साफ कहा था कि सामाजिक आंदोलनों का राजनीतिक आंदोलनों पर वर्चस्व होना चाहिए। राजनीतिक आंदोलन के चलते सत्ता तो मिल जाएगी लेकिन समाज में बदलाव नहीं आ पाएगा इसलिए यदि समाज बदलना है तो सामाजिक आंदोलन बहुत जरूरी हैं। क्या आप यह कहना चाह रहे हैं कि कांशीराम और मायावती द्वारा सामाजिक आंदोलन को अचानक बंद करके राजनीति शुरू कर देने से समाज में बदलाव की दिशा में निर्वात की स्थिति बन गई? जी हां, बहुत बड़ा निर्वात बन गया और अगर ऐसा नहीं हुआ होता तो आज दलितों की स्थिति कई गुणा ज्यादा बेहतर होती। मैं यह कतई नहीं कह रहा हूं कि दलितों को राजनीति में नहीं आना चाहिए। मैं यह कहना चाह रहा हूं कि सामाजिक आंदोलन से मानस में बदलाव आता है और इसका असर दलित ही नहीं बल्कि गैर-दलितों पर भी देखा जा सकता है। कांशीराम के राजनीति में आने के फैसले से दलितों की सामाजिक स्थिति में जो सुधार दर्ज किया जा रहा था, वह उलटी दिशा में चल पड़ा। क्या इस परिस्थिति से जो सामाजिक दबाव बनने लगा था वह अब नहीं बन पा रहा है। क्या इसकी वजह से भी दलितों के उत्पीड़न के मामलों में बढ़ोतरी हो रही है? देखिए, कांशीराम-मायावती ने जब तक सामाजिक आंदोलन छेड़े रखा था तब तक हर राजनीतिक पार्टी इस दबाव में काम करती थी कि बिना दलित को साथ लिए चुनाव जीतना मुश्किल होगा। लेकिन मायावती के राजनीति में आते ही ब्राह्मण सत्ता के केंद्र में आ गए। ब्राह्मणों के बारे में यह गुणगान होने लगा कि वे हाशिये पर चले गए हैं। उनकी स्थिति खराब हो गई है। मैं यहां किसी खास व्यक्ति के बारे में बात नहीं कर रहा हूं। ब्राह्मण का मतलब व्यवस्था से मानता हूं। कांशीराम पहले ‘तिलक, तराजू और तलवार…’ का नारा लगाते थे लेकिन राजनीति में आते ही वे ‘हाथी नहीं गणेश हैं, ब्रह्मा, विष्णु, महेश है’ के नारे लगाने लगे। ब्रह्मा, विष्णु और महेश के खिलाफ अम्बेडकर पूरा जीवन लड़ते रहे। कांशीराम और मायावती ने इसे उलट दिया। कांशीराम ने बहुजन समाज पार्टी के निर्माण के बाद एक और खतरनाक कदम उठाया था। उन्होंने कहा कि अपनी-अपनी जातियों को मजबूत करो और इसी से कल्याण होगा। इसके बाद ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और दलितों की अलग-अलग जातियों के सम्मेलन होने लगे। लेकिन कांशीराम और मायावती भूल गए कि जातियों के मजबूत होने से जाति-व्यवस्था कैसे टूटेगी? इससे हरेक जाति का गौरव भड़क उठा और सामाजिक बदलाव और जाति-व्यवस्था के खिलाफ चल रहे आंदोलन को जोरदार झटका लगा। राजनीति में जातीय धुव्रीकरण बड़े पैमाने पर होने लगा। जातियों के नाम पर अलग-अलग जाति के गुंडें ध्रुवीकरण की वजह से जीतकर नगरपालिका से लेकर विधानसभा और संसद तक में पहुंचने लगे। आज राजनीति का चेहरा जातीय ध्रुवीकरण की वजह से ज्यादा विद्रूप हो गया है। इसकी वजह से देश में लोकतंत्र नहीं जातियां फल-फूल रही हैं। अब पार्टियां नहीं जातियां सत्ता में आने लगी हैं। कांशीराम-मायावती ने सभी जातियों के लोगों से मंत्री पद देने का वायदा किया। सत्ता में आने के बाद मायावती ने ऐसा किया भी लेकिन सभी सुख-सुविधा पाने के बाद भी उन जातियों के लोगों ने पांच साल के भीतर ही इन्हें लात मारकर किनारा कर लिया। मतलब यह है कि आप जाति-व्यवस्था खत्म करने की लड़ाई को मजबूत नहीं करेंगे और जातियों को मजबूत करने की बात करेंगे तो इससे दलित विरोधी शक्तियां ही मजबूत होंगी। बसपा के शासनकाल में तमाम जातियां दलित विरोधी शक्तियों के रूप में खड़ी हो गईं। कांशीराम पहले ‘तिलक, तराजू और तलवार’का नारा लगाते थे लेकिन राजनीति में आते ही वे ‘हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा, विष्णु और महेश है’के नारे लगाने लगे। यह अक्सर आरोप लगाया जाता है कि दलित चिंतक, दलित नेतृत्व ही दलित महिलाओं की उपेक्षा करते हैं। वे ही उन्हें आगे नहीं आने देना चाहते हैं। जी, आप बिल्कुल सही कह रहे हैं। बाबा साहेब ने अपने आंदोलन के जरिए यह कोशिश की थी कि दलित महिलाएं आगे आएं। वे दलित महिलाओं के साथ हिंदू महिलाओं को भी आगे लाने की बात कर रहे थे। इसलिए 1951 में वह हिंदू कोड बिल लेकर आए। हिंदू कोड बिल, सवर्ण महिलाओं को पिता की संपत्ति में अधिकार देने और दहेज प्रथा आदि जैसी कुरीतियों के खिलाफ लाया गया। लेकिन उस समय बनारस, इलाहाबाद और देश के दूसरे हिस्सों के साधू-संन्यासी गोलबंद होकर बिल के विरोध में उठ खड़े हो गए। बिल को स्वीकृति नहीं मिल पाई। दलित पुरुष नेता तो कई उभरे लेकिन महिला नेतृत्व नहीं उभर पाया। बाबा साहब की मृत्यु आजादी के चंद वर्षों बाद ही हो गई। उसके बाद जगजीवन राम आए तो उन्होंने भी दलित महिलाओं को नेतृत्व दिलाने के लिए कोई प्रयास नहीं किया। उनकी मृत्यु के बाद उनकी बेटी मीरा कुमार राजनीति में आईं जरूर लेकिन उन्हें यह विरासत में मिली। उन्हें राजनीति संघर्ष के रास्ते से नहीं मिली है। रिपब्लिकन पार्टी के चारों धड़े जिसका मैंने पहले जिक्र किया उसमें से कोई महिला नेतृत्व सामने नहीं आया। मायावती ने तो हद ही कर दी। उसके नेतृत्व में कोई दलित पुरुष तो छोडि़ए, कोई दलित महिला भी आगे नहीं आ पाई। दलित राजनीति में मायावती को छोड़कर कोई दूसरी महिला नजर नहीं आती हैं। मायावती खुद चार बार मुख्यमंत्री बन चुकी हैं लेकिन किसी दूसरी दलित महिला को उन्होंने आगे नहीं आने दिया। मायावती की सामंती सोच देखिए कि उन्होंने पांच-छह वर्ष पहले अपना उत्तराधिकारी घोषित करने की बात की थी। उन्होंने यह भी कहा था, ‘मैं अपने उत्तराधिकारी का नाम एक लिफाफे में बंद करके जाऊंगी। मेरे मरने के बाद लिफाफा खोला जाएगा।’ मैं इस बात का जिक्र सिर्फ इसलिए कर रहा हूं ताकि आनेवाली पीढ़ी दलित राजनीति में महिलाओं की स्थिति को समझ सके और उसे दुरुस्त करने की कवायद में लगे। दलित राजनीति में सफल पुरुष ने अपनी पत्नी को गृहणी बनाकर रखना पसंद किया। यह स्त्रीविरोधी मानसिकता है और यह भी उसी धर्म व्यवस्था की देन है। इसकी शिकार दूसरी पार्टियां भी रही हैं। महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देने का मामला दसियों साल से लटका पड़ा है। स्त्री विरोधी मानसिकता को मीडिया और सिनेमा भी बढ़ावा दे रहे हैं। पतियों की पूजा कीजिए और यह इच्छा कीजिए कि वह आपको बराबरी का दर्जा देगा, परस्पर विरोधी बातें हैं। कर्मकांडी व्यवस्था को खत्म किए बगैर स्त्रियों का कभी भी भला नहीं हो सकता है। लेखक के अपने विचार(साभार: तहलका हिंदी)

20 हजार करोड़ की लागत से होगा एजुकेशन सिस्टम में सुधार

नई दिल्ली। उत्तरी दिल्ली में एजुकेशन सिस्टम में सुधार के लिए नॉर्थ एमसीडी के एजुकेशन विभाग ने एक डिटेल प्लान तैयार किया है. प्लान के अनुसार एजुकेशन सिस्टम में सुधार पर करीब 20 हजार करोड़ रुपये से अधिक खर्च का एस्टिमेट तैयार किया गया है. इसमें से नॉर्थ एमसीडी के स्कूलों में पढ़ने वालों के बच्चों के एजुकेशन पर 23 प्रतिशत, ट्रांसपोर्टेशन पर 19 प्रतिशत, मेडिकल और पब्लिक हेल्थ पर 15 प्रतिशत और डिवेलपमेंट पर 12 प्रतिशत खर्च का प्लान बनाया है. स्कूलों में वॉटर सप्लाई और सैनिटेशन पर 10 प्रतिशत और सोशल सिक्युरिटी और वेलफेयर पर 12 प्रतिशत खर्च किया जाएगा.

नॉर्थ एमसीडी के एक सीनियर अफसर के अनुसार एमसीडी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के ड्रॉप आउट संख्या में तेजी से बढ़ोतरी हो रही थी. इसे देखते हुए एमसीडी ने एक प्राइवेट एजेंसी से कारणों को जानने के लिए सर्वे कराया था. एजेंसी ने ड्रॉप आउट के तीन कारण बताए, जिसमें एक तो फैमिली प्रॉब्लम, दूसरा स्कूल संबंधित प्रॉब्लम और तीसरा निजी कारणों से ड्रॉप आउट संख्या में बढ़ोतरी हो रही थी.

इस रिपोर्ट के आधार पर स्कूलों में एजुकेशन लेवल में सुधार के लिए लेआउट प्लान तैयार किया है, जिसका की-पॉइंट्स है एजुकेशन, ट्रांसपोर्टेशन, सोशल सिक्युरिटी और वेलफेयर, अर्बन डिवेलपमेंट, वॉटर सप्लाई, सैनिटेशन और मेडिकल फैसिलिटी. हर पॉइंट्स पर काम करने के लिए अलग-अलग रणनीति बनाई गई है और इस पर होने वाले खर्च का आंकलन भी किया गया है. अलग-अलग चरणों में इन पर काम किया जाएगा, जिस पर करीब 20 हजार करोड़ रुपये से अधिक का खर्च होगा.

किस काम पर, कितना खर्चः अफसरों के अनुसार एजुकेशन पर कुल राशि का 23 प्रतिशत, ट्रांसपोर्टेशन पर 19 प्रतिशत, मेडिकल और पब्लिक हेल्थ पर 15 प्रतिशत, अर्बन डिवेलपमेंट पर 12 प्रतिशत, सोशल सिक्युरिटी और वेलफेयर पर भी 12 प्रतिशत खर्च का आंकलन किया गया है. इसके अलावा स्कूलो में वॉटर सप्लाई और सैनिटेशन पर 10 प्रतिशत और अन्य कार्यों पर 7 प्रतिशत खर्च किया जाएगा.

7 वर्ष में जनसंख्या के मामले में चीन को पछाड़ देगा भारत

भारत देश आबादी के मामले में चीन को जल्दी ही पछाड़ देगा. आंकड़ो के अनुसार 7 साल में भारत चीन को पछाड़ देगा. भारत की आबादी आने वाले साल 2024 के आसपास 1.44 अरब को पार कर जाएगी. जिसके बाद भारत दुनिया की सबसे ज्यादा आबादी वाला देश बन जाएगा.

संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार भारत की संभावित वैश्विक आबादी का पुनरावलोकन 2017′ बुधवार को जारी किया गया. जिससे दो महत्वपूर्ण बातें सामने आई हैं कि पिछले 50 सालों में भारतीयों की प्रजनन दर आधी होकर 2.3 प्रतिशत हो गई है और पिछले 25 सालों में जीवन प्रत्याशा करीब एक दशक बढ़कर अब लगभग 69 साल हो गई है.

रिपोर्ट के मुताबिक, “करीब सात वर्षों में भारत की आबादी चीन से ज्यादा हो जाने की संभावना है. रिपोर्ट में कहा गया चीन की आबादी फिलहाल 1.41 अरब है और भारत की 1.34 अरब है. वहीं 2024 में दोनों देशों की आबादी करीब 1.44 अरब होने की उम्मीद है. रिपोर्ट के मुताबिक, इसके बाद भारत की आबादी कई दशकों तक बढ़ती रहेगी और 2030 में 1.5 अरब हो जाएगी और 2050 में 1.66 अरब हो जाएगी, जबकि चीन की आबादी 2030 तक स्थिर रहने की उम्मीद है और इसके बाद इसमें धीमी गिरावट आने की उम्मीद है.

गौरतलब है कि भारत में बच्चों को लेकर चीन की तरह कोई कानून नहीं है.

बॉलीवुड में 38 साल तक बने रहना आसान नहींः अनिल कपूर

मुंबई। अनिल कपूर को फिल्म इंडस्ट्री में काम करते हुए तीन दशक से भी ज्यादा का समय होने वाला है. जल्द ही इनकी कॉमेडी फिल्म ‘मुबारकां’ आने वाली है.

फिल्म के ट्रेलर लॉन्चिंग के मौके पर अनिल कहते हैं कि मैं इस इंडस्ट्री में पिछले 38 सालों से काम कर रहा हूं. इस दौरान मैंने कई तरह के रोल किए. यहां इतने लंबे समय तक काम करना आसान नहीं है. मेरे ख्याल से मैंने जरूर कुछ अच्छा ही किया होगा, तभी तो इतने समय तक यहां मेरी गौरवपूर्ण स्थिति बनी रही. अनिल फिलहाल अपनी अपकमिंग फिल्म ‘मुबारकां” के प्रमोशन में व्यस्त चल रहे हैं.

ये फिल्म अनीस बज्मी ने डायरेक्ट की है. अनिल और अनीस पांचवी बार एक साथ इस फिल्म में काम कर रहे हैं. बता दें कि 60 साल के अनिल ने बॉलीवुड में डेब्यू फिल्म ‘वो सात दिन’ में पद्मिनी कोल्हापुरे के साथ की.

दार्जिलिंग के हिंसक आंदोलन में 150 करोड़ का नुकसान

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पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग क्षेत्र में हिंसक आंदोलन के बाद हालात लगातार बिगडते जा रहे हैं. आठ दिन से गोरखा जनमुक्ति मोर्चा का विरोध जारी है. इसके चलते 150 करोड़ रुपए का वित्तीय और पर्यटन स्तर पर घाटा हो चुका है.दार्जिलिंग में जारी हिंसा का पर्यटन पर काफी बुरा असर पड़ा है. एक रेल अधिकारी के मुताबिक, यात्रियों और कर्मचारियों की सुरक्षा के मद्देनजर दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे की टॉय ट्रेन सेवा भी रोक दी गई है. गौरतलब है कि मार्च से लेकर जून तक गर्मी के दिनों को यहां टूरिज्म के हिसाब से सुनहरा समय माना जाता है और टूरिज्म यहां का सबसे बड़ा बिजनेस है.

राज्य सरकार के मुताबिक, ताजा तनाव के कारण पहाड़ को ये वित्तीय घाटा हुआ है. अंग्रेजी अखबार द टेलीग्राफ ने राज्य सरकार के एक अधिकारी के हवाले से लिखा- ‘हमने वित्तीय घाटे की रिपोर्ट तैयार की है. इस रिपोर्ट को कलकत्ता उच्च न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा. जो आंकड़ा निकाला गया है उसमें संपत्ति के नुकसान, सरकार और निजी दोनों और व्यापार नुकसान शामिल हैं.’

दार्जिलिंग और कालीम्पोंग में सरकारी अधिकारियों के फीडबैक के आधार पर यह रिपोर्ट बनाई गई है. इससे पहले 2013 में भी हिंसा हुई थी. उस दौरान भी बंद और हिंसक प्रदर्शन के कारण पहाड़ को 69 करोड़ रुपये नुकसान हुआ था. उस दौरान भी मामला कलकत्ता उच्च न्यायालय पहुंचा था. तब हाईकोर्ट ने आदेश दिया था कि इस नुकसान की वसुली गोरखा जनमुक्ति मोर्चा से की जाए.बुधवार को विमल गुरुंग की पार्टी ने दार्जिलिंग में पढ़ने वाले बाहर के छात्रों को पहाड़ छोड़कर जाने का आदेश दे दिया था. वहीं सुरक्षा बल स्थिति पर निगाह बनाए हुए ताकि हालात और न बिगड़ पायें.

पाकिस्तान की कठिन वीजा नीति से पाक-चीन संबंध में दरार

इस्लामाबाद। पाकिस्तान में व्यापार वीजा पर आए चीन के दो नागरिकों की हत्या के बाद पाक ने कहा है कि वह चीन के नागरिकों के लिए वर्तमान की उदार नीति में कमियों को दूर करने के लिए अपनी वीजा नीति की समीक्षा करेगा. गृह मंत्रालय ने कल एक बयान जारी करके बताया कि चीन के नागरिकों के लिए व्यापार और कार्य वीजा देने की स्थितियों और जरूरतों की समीक्षा की जाएगी. गृह मंत्री चौधरी निसार अली खान को बताया गया था कि जिन चीनी नागरिकों की हत्या की गई है वे पादरी थे और उस दल का हिस्सा थे जो व्यापार वीजा पर पाकिस्तान आए थे. इसके बाद यह निर्णय लिया गया है.

चीन के नागरिकों ली जिंग यांग 24 और मेंग ली सी 26 का बलूचिस्तान प्रांत के क्वेटा में 24 मई को अज्ञात बदमाशों ने अपहरण कर हत्या कर दी थी. आतंकवादी संगठन इस्लामिक स्टेट ने इन हत्याओं की जिम्मेदारी ली है. गृह मंत्रालय के बयान में कहा गया, ‘‘यह निर्णय वीजा प्रक्रिया में पारर्दिशता सुनिश्चित करने के साथ ही दोनों देशों के बीच जो वीजा अनुकूल माहौल है उसके दुरूपयोग को रोकने के लिए किया गया है.’’

अधिकारियों के अनुसार चीन के जिन नागरिकों की हत्या की गई है वे व्यापार वीजा का दुरूपयोग कर रहे थे. खान ने कहा कि चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारे से जुड़े कामगारों के बारे में सूचनाओं को साझा करने के साथ ही देश में आने वाले अन्य चीनी नागरिकों के बारे में जानकारी देने वाले एक व्यापक तंत्र लागू किया जाना चाहिए.

महाराष्ट्रः जमीन अधिग्रहण के खिलाफ किसानों ने शुरू किया आंदोलन

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मुंबई। मुंबई से तकरीबन 80 किलोमीटर दूर कल्याण-बदलापुर हाइवे पर किसानों ने सुबह से चक्का जाम किया हुआ है. कई गाड़ियों में तोड़फोड़ की और टायर जलाकर अपना विरोध जताया है. कई प्राइवेट गाड़ियों के साथ पुलिस की भी एक गाड़ी जलाई गई है. सैकड़ों की संख्या में लोग सड़क पर जमा हैं, जिनमें बड़े-बूढ़े और महिलाएं भी शामिल हैं.

पुलिस उन्हें हटाने की कोशिश में जुटी है, लेकिन किसानों की संख्या देखते हुए पुलिस कम पड़ रही है. मौके की नज़ाकत को देखते हुए अब आरसीपी और एसआरपी की अतिरिक्त टुकड़ियां भेजी गई हैं. जानकारी के मुताबिक- सरकार हवाई अड्डे के लिए जमीन अधिग्रहण करना चाहती है, जिसे लेकर किसान नाराज है. तकरीबन 17 गांव के किसानों को अपनी जमीन छीने जाने का डर है. आंदोलनकारियों ने पुलिस की गाड़ी भी जलाई. कुछ पुलिसवालों को चोट भी आई है.

उल्लेखनीय है कि प्रस्तावित हवाईअड्डा बनाने के लिए कुछ वर्ष पहले राज्य सरकार ने क्षेत्र में भूमि अधिग्रहण शुरू किया था, जिसका किसान विरोध कर रहे हैं, लेकिन गुरुवार को उनके प्रदर्शन ने हिंसक रूप ले लिया. झड़प में तीन पुलिस अधिकारी और एक कांस्टेबल घायल हो गए. भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पुलिसकर्मियों ने प्रदर्शनकारियों पर प्लास्टिक की गोलियां चलाई.

प्रदर्शनकारियों ने क्षेत्र में कल्याण हाजी मलंग मार्ग पर जलते टायर और लट्ठे फेंककर उसे बाधित कर दिया. उन्होंने पुलिस की एक वैन, तीन ट्रक, दो बाइक और एक टैम्पो में भी आग लगा दी. हालात को काबू में करने के लिए वरिष्ठ पुलिस अधिकारी और राजस्व अधिकारी घटनास्थल पर पहुंच गए. आंदोलनरत किसानों ने इस महीने की शुरुआत में हवाईअड्डे के लिए रक्षा मंत्रालय द्वारा करीब 1,600 एकड़ भूमि का अधिग्रहण किए जाने को चुनौती देते हुए बंबई उच्च न्यायालय में कई याचिकाएं दायर की थीं.

अफगानिस्तान के हेलमंड में कार बम धमाका, 24 की मौत

अफगानिस्तान के हेलमंड प्रांत के लश्करगाह में न्यू काबुल बैंक के नजदीक एक कार में बम धमाका हुआ. इस धमाके की वजह से 24 लोगों के मारे जाने की खबर है जबकि 50 लोग इस कार बम धमाके में घायल हुए हैं. ये बम धमाका भारतीय समय के मुताबिक दोपहर 12 बजे के करीब हुआ.

अफगानिस्तान गवर्नर के प्रवक्ता के मुताबिक इस ब्लास्ट की वजह से सेना और आम नागरिक दोनों घायल हुए हैं. हालांकि अभी मारे गए लोगों की संख्या के बारे में स्पष्ट जानकारी नहीं मिल सकी है.

घायलों को आपातकालीन स्थिति में नजदीकी अस्पताल ले जाया गया है. अभी तक किसी भी आतंकी समूह ने इस हमले की जिम्मेदारी नहीं ली है पर इस दुर्घटना में भारी जनहानि हुई है.

राजस्थान के स्वास्थ्य विभाग ने डॉक्टरों को जाति बताने का निर्देश दिया

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राजस्थान सरकार के स्वास्थ्य विभाग के अजीबोगरीब फैसले पर भारी विवाद खड़ा हो गया है. राज्य के स्वास्थ्य विभाग ने आदेश जारी कर डॉक्टरों की जाति बताने के लिए कहा है. यह आदेश जिले के स्वास्थ्य अधिकारियों को भेजा गया है. आदेश में सभी स्वास्थ्य अधिकारियों से ये बताने के लिए कहा गया है कि कौन सा डॉक्टर किस जाति का है. साथ ही डॉक्टरों की तैनाती कहां और कितने दिनों से है, ये भी पूछा जा रहा है. जिला स्वास्थ्य अधिकारियों से डॉक्टरों की जाति संबंधी स्वास्थ्य विभाग मुख्यालय भेजने का आदेश दिया गया है. राजस्थान स्वास्थ्य विभाग के निदेशक डॉ. वी.के. माथुर ने सर्कुलर जारी करने भी हैरान करने वाली वजह बताई. उन्होंने बताया कि स्वास्थ्य व्यवस्था बेहतर करने के लिए ऐसा किया गया है. उन्होने बताया कि जाति के आधार पर डॉक्टर की सूचना होने से बेहतर काम होगा और हमें काम में आसानी होगी.. विपक्षी दल कांग्रेस ने इस पूरे प्रकरण को बीजेपी की मानसिकता से जोड़कर बताया है. कांग्रेस का कहना है कि बीजेपी ने जो अपनी कार्यकारिणी घोषित की है, उसमें भी जाति का हवाला दिया है. कांग्रेस प्रवक्ता ने आरोप लगाया कि बीजेपी डॉक्टरों में भी समाज को बांटने का काम कर रही है. यह आदेश स्वास्थ्य विभाग से जनसंपर्क अधिकारी तक गया है. इसके बाद स्वास्थ्य विभाग के पोर्टल पर अपडेट हुआ है.