फिर से साइबर हमले की चपेट में दुनिया

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कुछ दिन पहले ही रैनसमवेयर वायरस ने दुनिया भर की बैकों, कपंनियो को अपनी चपेट में लिया था. अब दुनिया फिर से एक साइबर हमले की चपेट में आ चुकी है. इस हमले से ब्रिटिश विज्ञापन एजेंसियों  समेत कई कंपनियां प्रभावित हुई हैं. इसका सबसे अधिक असर यूक्रेन में दिख रहा है जहां बैंक, बिजली कंपनियां और सरकारी मंत्रालयों तक के कंप्यूटर में गड़बड़ी देखने को मिल रही है.

जानकारी के अनुसार यह साइबर हमला अमेरिका तक भी पहुंच गया है. रूस की रॉसनेफ्ट ऊर्जा कंपनी भी हैक कर ली गई है. यूक्रेन का सेंट्रल बैंक, सरकारी बिजली वितरक कंपनी यूक्रेनेर्गो, विमान निर्माता कंपनी एंतोनोव और दो डाक सेवाएं इससे काफी प्रभावित हैं. राजधानी किएव की मेट्रो में पेमेंट कार्ड काम नहीं कर रहे हैं. कई पेट्रोल स्टेशनों को अपना काम-काज रोकना पड़ा है.

यूक्रेन के प्रधानमंत्री ने इस हमले को अप्रत्याशित करार दिया है. यूक्रेन के उप-प्रधानमंत्री ने एक तस्वीर ट्विटर पर डाली है, जिसमें स्क्रीन पर सिस्टम में ख़राबी की सूचना दिख रही है. उन्होंने कैप्शन में लिखा है, ”टा-डा! कैबिनेट मंत्री के सचिवालय में नेटवर्क डाउन है.’

पिछले महीने रैनसमवेयर वायरस के हमले ने दुनिया भर के 100 से अधिक देशों में हड़कंप मचा दिया था. भारत भी इस हमले की चपेट में आ गया था और अब एक बार से खतरनाक वायरस ने दस्तक दे दी है जिसका रूख लगातार बड़े देशो की तरफ दिख रहा है.

 

गैंगरेप और मारपीट के आरोप में हिंदू युवा वाहिनी के तीन कार्यकर्ता गिरफ्तार

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बरेली। उत्तर प्रदेश में योगीराज आने के बाद से हिंदू युवा वाहिनी और इससे जुड़े संगठन के कार्यकर्ता बेलगाम हो गए है. प्रतिदिन कोई न कोई गंभीर मामला सामने आता है. कार्यकर्ता गले में गमछा पहनकर जिसको मन किया उसको पीटा, जिसको मन किया उसके साथ छेड़छाड़ कर दी.

ऐसा ही एक मामला उत्तर प्रदेश के बरेली जिले में सामने आया है.घटना सोमवार रात की है, गणेश नगर इलाके में दीपक और अविनाश के बीच तेज आवाज में गाना बजाने को लेकर विवाद शुरू हुआ था. जो बाद में बढ़ता गया. झगड़े को लेकर पैरवी करने पहुंचे भाजपा और हिंदु युवा वाहिनी के नेताओं के बीच थाने में ही मारपीट हुई और एक दारोगा की कथित रूप से वर्दी फाड़ दी गयी. महिलाओं के साथ बदसलूकी की गई.

पुलिस उपाधीक्षक रोहित सिंह सजवाण ने बताया कि गणेशनगर निवासी दीपक नामक युवक सोमवार को अपने घर में तेज आवाज में गाना बजा रहा था. दूसरे पक्ष के अविनाश ने अपनी मां के बीमार होने का हवाला देते दीपक से आपत्ति दर्ज करायी. इसे लेकर दोनों के बीच कहासुनी हुई. उन्होंने बताया कि झगड़े के बाद दीपक ने गाना बंद कर दिया. आरोप है कि देर शाम अविनाश हिन्दू युवा वाहिनी के अपने दो साथियों के साथ दीपक के घर में घुसा और उसकी गैर मौजूदगी में महिलाओं से बदसलूकी की. महिलाओं ने दीपक को सूचना दी तो वह भाई गौरव के साथ घर पहुंचा मगर तब तक आरोपी जा चुके थे.

सजवाण ने बताया कि दीपक और गौरव ने बाद में अविनाश को पकड़ लिया और पिटाई करने के बाद पुलिस को सौंप दिया. इंस्पेक्टर मुकेश कुमार जब अविनाश को लेकर थाने पहुंचे तभी हिन्दू युवा वाहिनी के मण्डल अध्यक्ष जितेन्द्र शर्मा और महानगर अध्यक्ष पंकज पाठक समेत बड़ी संख्या में कार्यकर्ता थाने पहुंच गए. उन्होंने बताया कि वाहिनी कार्यकर्ताओं ने अविनाश की गिरफ्तारी पर हंगामा किया. इस मामले में पुलिस ने अविनाश , जितेंद्र और पंकज को गिरफ्तार किया है और जांच जारी है. इस मामले में हिन्दू युवा वाहिनी के चार कार्यकर्ताओं के खिलाफ सामूहिक दुष्कर्म का मामला दर्ज किया गया है.

दिल्ली मेट्रो में नौकरी चाहिए तो इसे पढ़िए

नई दिल्ली। दिल्ली मेट्रो में जॉब करना चाहते हैं तो आपके लिए सुनहरा ऑफर है. बता दें कि दिल्ली मेट्रो ने ग्रेजुएशन लेवल पर वैकेंसी निकाली गयीं है. दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन ने ग्रेजुएट्स के लिए कई पदों पर आवेदन मांगे हैं.

इच्छुक उम्मीदवार DMRC की वेबसाइट पर क्लिक करके पूरी जानकारी प्राप्त कर सकते हैं जानकारी के लिए निचे दिए गए विवरण अनुसार उम्मीदवार आवेदन कर सकते है.

कुल पदों की संख्या – 15

पदों का विवरण- कंसलटेंट पीए

योग्यता- योग्य उम्मीदवार मान्यता प्राप्त संस्थान से ग्रेजुएशन की डिग्री किया हुआ हो.

आयु- न्यूनतम आयु 21 साल

वेतन- 50,000 रुपये प्रति माह

चयन प्रक्रिया-

सभी उम्मीदवारों का चयन इंटरव्यू के आधार पर किया जाएगा.

ऐसे करें आवेदन-

इच्छुक उम्मीदवार संबंधित वेबसाइट पर क्लिक करके सावधानीपूर्वक ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया पूरी करें. अधिक जानकारी के लिए डीएमआरसी की ऑफिशियल वेबसाइट पर भी देख सकते हैं (DMRC)

इस जॉब के लिए 13 जुलाई 2017 तक आवेदन किये जा सकते हैं.

 

सीबीएसई ने NEET में सवर्णों को दिया 50.5 प्रतिशत आरक्षण

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ना। मेडिकल प्रवेश परीक्षा नीट के आरक्षण नियमों में इस साल से बड़ा बदलाव किया गया है. सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद बने नये नियम के अनुसार ऑल इंडिया कोटे में सामान्य वर्ग के लिए नई अनारक्षित वर्ग बनायी गई है. इस श्रेणी में सामान्य वर्ग के साथ ओबीसी, क्रीमीलेयर वाले अभ्यार्थी शामिल नहीं होंगे.

केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) नीट इंफॉर्मेशन बुलेटिन में काउंसेलिंग के दौरान ऐसे अभ्यार्थियों को अपनी श्रेणी यूआर दर्शाने के निर्देश दिये हैं. इसके अनुसार अच्छे अंक पाने वाले आरक्षित वर्ग के अभ्यार्थी सामान्य मेरिट में जगह नहीं बना पायेंगे. इससे कम अंक वाले सामान्य वर्ग के अभ्यर्थियों को अप्रत्यक्ष रूप से लाभ मिलेगा. इस बार इसी आधार पर आरक्षित वर्ग व अनारक्षित वर्ग की अलग-अलग काउंसलिंग होगी.

सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के बाद सीबीएसई ने देशभर में इसे लागू कर दिया है. इसके बाद से एक व्यापक बहस शुरू हो चुकी है. इसके अनुसार आरक्षित वर्ग का उम्मीदवार चाहे सबसे ज्यादा नंबर ले आए लेकिन वह सिर्फ आरक्षित वर्ग ही नौकरी पाएगा. यानि अनारक्षित वर्ग के लिए 50.5 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था कर दी गई है.

सुप्रीम कोर्ट ने अलग करने का दिया था निर्देश सुप्रीम कोर्ट ने अप्रैल 2017 में एक अहम फैसले में कहा था कि आरक्षित वर्ग के उम्मीदवार को आरक्षित वर्ग में ही नौकरी मिलेगी. चाहे उसने सामान्य वर्ग के उम्मीदवारों से ज्यादा अंक क्यों न हासिल किये हों. नई व्यवस्था के तहत आरक्षित श्रेणी को अलग रखा गया है. अगर अभ्यार्थी को मेरिट सूची में ज्यादा अंक आते भी हैं तो उन्हें अपने श्रेणी में ही उसका फायदा होगा. 2016 तक ओबीसी उम्मीदवार का अंक सामान्य वाले के बराबर होने पर उसे ओबीसी कोटे की जगह सामान्य केटेगरी में दाखिला ले लेता था, लेकिन अब ऐसा नहीं होगा.

बेहतर रैंक लाने वाले आरक्षित वर्ग के अभ्यार्थी सामान्य मेरिट में जगह नहीं बना पाएंगे. उन्हें उनकी कैटेगरी के अनुसार तैयार अलग मेरिट में ही जगह मिलेगी. इससे सामान्य जाति के ऐसे अभ्यर्थी जो अच्छा प्रदर्शन न करने के कारण कुल मेरिट में काफी पीछे हो जाते हैं, उन्हें नई अनारक्षित वर्ग में ही जगह मिलने के कारण ठीक वैसा ही लाभ मिलेगा, जैसा पहले आरक्षित श्रेणियों को मिलता था.

2016 तक सामान्य या ओबीसी उम्मीदवारों के स्कोर कार्ड पर सिर्फ ऑल इंडिया रैंक के बारे में जानकारी होती थी, लेकिन इस साल से ओबीसी उम्मीदवारों के स्कोर कार्ड पर भी रैंक के साथ उनके अनारक्षित या आरक्षित कोटे की भी जानकारी होगी. इस नियम के लागू होने के बाद नीट के ओएसडी ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद इसे लागू किया गया है. इस बार मेरिट लिस्ट से आरक्षित और अनारक्षित केटेगरी को अलग-अलग रखा जायेगा. इससे सीटें खाली नहीं रहेगी.

इस खबर का संपादन नागमणि कुमार शर्मा ने किया है.

ड्वेन ब्रावो के घर पर इंडिया टीम का जश्न

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वेस्टइंडीज। भारत और वेस्टइंडीज के बीच सीरीज चल रही है. जहां एक तरफ भारत ने वेस्टइंडीज से दूसरा वनडे जीता तो वहीं दूसरी तरफ कैरेबियाई क्रिकेटर ड्वेन ब्रावो ने सभी भारतीय क्रिकेटरों को घर आने का निमंत्रण दिया. ब्रावो के घर भारतीय टीम ने जमकर मस्ती की.

रविवार को वेस्टइंडीज के खिलाड़ी ब्रावो ने टीम इंडिया को अपने घर पर डिनर के लिए बुलाया. बता दें कि इस डिनर पार्टी में टीम इंडिया के कप्तान विराट कोहली और पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धोनी समेत कई क्रिकेटर पहुंचे थे.

ड्वेन ब्रावो ने इंस्ट्राग्राम पर दो फोटो शेयर की हैं. एक तस्वीर में ब्रावो अपनी मां के साथ हैं और उनके बगल में धोनी अपनी बेटी के साथ नजर आ रहे हैं. कैप्शन में ब्रावो ने धोनी को दूसरी मां का बेटा लेकिन अपना भाई बताया.

टीम इंडिया ने क्वींस पार्क ओवल में दूसरे वन-डे में वेस्टइंडीज को 105 रनों से हराया था, इसके चलते उनकी खुशी दोगुनी हो गई थी. ब्रावो ने टीम इंडिया के अपने घर डिनर की कई फोटोज इंस्टाग्राम पर शेयर की.

वेस्टइंडीज दौरे पर धोनी और धवन की बच्चों संग मस्ती

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वेस्टइंडीज। इन दिनों भारतीय क्रिकेट टीम वेस्टइंडीज के दौरे पर है दोनो देशों के बीच एकदिवसीय मैच हो रहे हैं. पहला मैच बारिश के कारण रद्द हो चुका है लेकिन  टूर्नामेंट के दूसरे वनडे में जीत दर्ज करने बाद टीम इंडिया सीरिज में बढ़त ले चुकी है.तीसरा मैच 30 जून को एंटीगुआ में शाम 7 बजे होगा.

लेकिन इन सबके बीच भारतीय खिलाड़ी अपने वेस्टइंडीज दौरे पर जमकर मस्ती कर रहे हैं. कई खिलाड़ी ऐसे भी हैं जो अपनी-अपनी पत्नियों के साथ इस टूर पर आए हैं. यहां पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धोनी और सलामी बल्लेबाज शिखर धवन ने जमकर मस्ती की है. कैरेबियाई टूर के दौरान शिखर धवन ने सोशल मीडिया पर मस्तीभरे पलों की एक फोटो पोस्ट की है.

इस फोटो में धवन अपने बेटे जोरावर और पत्नी आयशा के साथ दिख रहे हैं. इस फोटो में पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धोनी, उनकी बेटी जीवा और पत्नी साक्षी भी नजर आ रहे हैं.

इस फोटो को इंस्टाग्राम पर पोस्ट करते हुए धवन ने लिखा है- हम एंटीगुआ जा रहे हैं. देखकर खुशी हुई कि बच्चे खुश हैं और सुबह खेल रहे हैं. इससे हम सबके चेहरे पर मुस्कान आ जाती है.

 

विधानसभा चुनाव से पहले आरएसएस निकालेगा दलित रथयात्रा :गुजरात

गुजरात में विधानसभा चुनावों से ठीक पहले आरएसएस दलित कार्ड खेलने में जुट गया है. वहां के दलित संगठन ने गुजरात विधानसभा चुनाव के मद्देनजर राज्य में चार महीने के एक कार्यक्रम की शुरुआत कर रखी है. भारतीय बौद्ध संघ के अध्यक्ष भांते संघप्रिय राहुल ने कहा कि वो चाहते हैं कि समुदायों के बीच की दूरियां खत्म हों और यह सोच खत्म हो जाए कि आरएसएस और बीजेपी दलितों के खिलाफ हैं. उन्होंने आगे कहा कि गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रुपाणी 30 जून को दलित रथ यात्रा का आयोजन करेंगे जो सभी दलित जातियों को साथ लेकर चलेगें.

उत्तर प्रदेश चुनाव से पहले भी इसी तरह का अभियान चलाने वाले राहुल ने कहा, “कई ऐसे लोग हैं जो भारतीय जनता पार्टी की नीतियों को पसंद नहीं करते और लोगों के बीच आरएसएस व बीजेपी की छवि खराब करने के लिए दलित-विरोधी होने का आरोप लगाते हैं। ऊना जैसी घटनाओं से भी काफी नुकसान पहुंचा है। आरएसएस और बीजेपी से बड़ा दलितों का समर्थक और कोई नहीं है।” राहुल ने बताया कि यह रथ यात्रा अक्टूबर माह में सोमनाथ में समाप्त होगी। इसके समापन पर पीएम नरेंद्र मोदी और जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे भी मौजूद होंगे. गौरतलब है की बीजेपी चुनावों से ठीक पहले इस तरह के हथकंडे आजमाती रही है जिसका मुख्य लक्ष्य चुनावों में विजय पाना होता है.

 

सफाईकर्मी बना टीसी

Raju prasad

डबरा मेहनत और हिम्मत का जज्बा साथ हो तो सफलता मिल ही जाती है. डबरा स्टेशन पर स्वीपर के तौर पर कार्यरत राजू प्रसाद गौड़ ने यह साबित कर दिखाया. स्टेशन की साफ-सफाई करते हुए मेहनत से पढ़ाई की. परिणाम टीसी की विभागीय परीक्षा में उन्होंने 270 अभ्यर्थियों में से झांसी मंडल में टॉप किया. अब स्टेशन पर सफाई करने वाला राजू, कोट पहनकर टिकट चैक करेगा.

राजू प्रसाद गौड़ उत्तरप्रदेश के बलिया शहर के रहने वाले हैं. 2013 में रेलवे में स्वीपर के पद पर पदस्थ हुए. डबरा से पहले वह मुरैना रेलवे स्टेशन पर सफाई कर्मचारी के रूप में काम करते रहे. लेकिन कुछ महीने पहले डबरा में ट्रांसफर हो गया. डबरा में सफाई के साथ-साथ उन्होंने नियमित तैयारी की. समय-समय पर विभागीय परीक्षाएं दी, बुकिंग कलर्क की परीक्षा में भी पास हो गए थे. लेकिन उनका लक्ष्य टीसी बनने का था, उन्होंने कभी हिम्मत नहीं हारी. जनवरी माह में टीसी की विभागीय परीक्षा दी, जिसका 21 जून को रिजल्ट घोषित हुआ. इसमें उन्होंने झांसी मंडल में टॉप किया है. राजू की सफलता पर स्टेशन मास्टर केएस मीना सहित अन्य कर्मचारियों ने बधाई देते हुए उनके उज्जवल भविष्य की कामना की है. राजू का कहना है कि ‘मैंने अपने काम को कभी छोटा नहीं समझा बल्कि उसे कैसे अच्छा करूं यही सोचा.’

बुकिंग क्लर्क की परीक्षा में झांसी में तीसरा स्थान था टीसी के पहले राजू प्रसाद ने बुकिंग कलर्क की विभागीय परीक्षा दी थी. परीक्षा नवंबर 2016 में आयोजित हुई थी. इसका रिजल्ट जनवरी 17 में आया. इसमें राजू ने झांसी मंडल में तीसरा स्थान प्राप्त किया था. लेकिन राजू का उद्देश्य टीसी बनने का था, इसलिए उन्होंने बुकिंग कलर्क की ज्वाइनिंग नहीं की, और कड़ी मेहनत से तैयारी में जुटे रहे, जिससे उन्हें सफलता मिली. इस संबंध में पीआरओ मनोज कुमार का कहना है कि विभागीय टीसी की परीक्षा का रिजल्ट 21 जून को घोषित किया है. जानकारी में पता चला कि जिस अभ्यर्थी ने मंडल में टॉप किया है वह डबरा स्टेशन पर स्वीपर के पद पदस्थ था. राजू का कहना है कि भविष्य में भी वह आगे उच्च पदों पर भर्ती की तैयारी करता रहेगा.

भाई-बहन को आगे पढ़ाने की नौकरी राजू प्रसाद ने बताया कि उन्होंने आर्ट से ग्रेजुऐशन किया है. ग्रेजुऐशन के बाद नौकरी की तैयारी की, इस बीच 2013 में उनका चयन रेलवे में सफाई कर्मचारी के रूप में हो गया. परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी. माता-पिता के अलावा परिवार में तीन भाई एक बहन है, सभी पढ़ाई कर रहे हैं. उन्हें आगे बेहतर पढ़ाने के लिए ही उन्होंने रेलवे में यह सर्विस ज्वाइन कर ली. पिछले चार सालों से सफाई कर्मचारी के रूप में रेलवे में अपनी सेवाएं दे रहे हैं.

 

राष्‍ट्रपति चुनाव: साबरमती से प्रचार अभियान शुरू करेंगी मीरा कुमार

नयी दिल्ली: विपक्ष की राष्ट्रपति उम्मीदवार मीरा कुमार ने दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेन्स आयोजित करके कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी समेत अन्य समर्थक पार्टियों को शुक्रिया अदा करते हुए घोषणा की कि वह गुजरात के साबरमती से राष्ट्रपति चुनाव के लिए प्रचार शुरू करेगीं. साथ ही सभी दलों समेत बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को भी पत्र लिख कर समर्थन देने का आग्रह किया है.

मीरा कुमार ने कहा कि वह राष्ट्रपति पद के साथ-साथ विचारधारा की लड़ाई भी लड़ रहीं हैं. बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का एनडीए उम्मीदवार रामनाथ कोविंद को समर्थन देने पर कहा कि मैंने नीतीश कुमार को भी खत लिखा है. मेरा समर्थन करना या नहीं करना पूरी तरह नीतीश कुमार और उनकी पार्टी पर निर्भर है. मीरा कुमार ने राष्ट्रपति चुनाव को विचारधारा की लड़ाई से जोड़ते हुए कहा कि मैं प्रेस की आजादी, गरीबी उन्मुक्तता, लोकतांत्रिक समाजिक न्याय में आस्था रखती हूं. जातिगत राजनीति पर हमला बोलते हुए मीरा कुमार ने कहा कि देश में इससे पहले भी तथाकथित उच्च जाति के राष्ट्रपति बने, पर कभी किसी ने उनकी जाति को मुद्दा नहीं बनाया. सबने उनके गुणों और काबिलियत को देखा. लेकिन, मैं देख रही हूं कि इस बार के राष्ट्रपति चुनाव में जातिगत मुद्दों को उठाया जा रहा है. उन्होंने कहा कि मेरे विचार से इस जाति को ही एक गठरी में बांध कर जमीन के बहुत भीतर गाड़ देना चाहिए. देश में जातिगत राजनीति नहीं होनी चाहिए.

विपक्ष की राष्ट्रपति उम्मीदवार ने सुषमा स्वराज द्वारा लगाये गये आरोप पर कहा कि मेरे लोकसभा अध्यक्ष काल के समापन के दिन सभी दलों ने स्पीच दिया. वह रिकॉर्ड पर है. कोई भी कभी भी इसकी समीक्षा कर सकता है. मैंने हमेशा अपना कार्य निष्पक्ष रूप से किया है और आगे भी करती रहुंगी

 

भारतीय मीडिया में दलित पत्रकार क्यों नहीं हैं?

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पिछली गर्मियों में एशियन कॉलेज ऑफ जर्नलिज्म (एसीजे) में डायवर्सिटी प्रोजेक्ट (विविधता परियोजना) को गोपनीय रखने की सारी कोशिशें की गईं. लेकिन कक्षाएं शुरू होने के कुछ दिनों के बाद ही यह बात किसी तरह से सार्वजनिक हो गई कि चेन्नई के इस प्रतिष्ठित पत्रकारिता संस्थान में, जहां पढ़ना और रहना ठीक-ठाक खर्चीला है, कुछ विद्यार्थियों को पढ़ाई करने के लिए जाति आधारित स्कॉलरशिप दी गई है.

2016-17 बैच के मध्यवर्गीय पृष्ठभूमि से वास्ता रखने वाले ऊंची जातियों के कई छात्र इससे नाराज हो गए. उन्होंने इसे ‘उलटा जातिवाद’ करार देते हुए इसके खिलाफ कानाफूसी अभियान शुरू कर दिया. ये बात जैसे-जैसे कैंपस के बाहर तक फैली, ऊंची जातियों के मध्यवर्गीय एल्युमनाई (पूर्व छात्र) भी इस सामूहिक कानाफूसी में शरीक हो गए. उन्होंने संस्थान के संस्थापकों पर ‘नकली कम्युनिस्ट’ होने, ‘संस्थान पर मार्क्सवाद थोपने के अभियान में शामिल होने, जातिवादी व्यवहार करने और विद्यार्थियों की जेब काटने’ का आरोप लगाया.

इनमें से जो थोड़े प्रगतिशील किस्म के थे, उनका यह कहना था कि जाति आधारित स्कॉलरशिप से उन्हें कोई दिक्कत नहीं है लेकिन उनकी इच्छा है कि संस्थान को आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों, दूसरे शब्दों में ऊंची जातियों के गरीब विद्यार्थियों की भी मदद करनी चाहिए.

बात चाहे एसीजे की हो या अंग्रेजी माध्यम के अन्य प्रतिष्ठित निजी पत्रकारिता संस्थानों की, तथ्य यह है कि इनकी कक्षाओं में तथाकथित ऊंची जाति के छात्रों का भारी बहुमत होता है, जिसका परिणाम यह होता है कि पूर्व छात्रों के प्रभावशाली नेटवर्क में भी इन्हीं जातियों का दबदबा होता है.

गरीब/अमीर, ग्रामीण/शहरी, भाषाई रूप से अलग-अलग, हिंदू, मुस्ल्मि, ईसाई और गेहुएं रंग का हर व्यक्ति; उपमहाद्वीप के वैसे तमाम लोग, जो यहां आम तौर पर पाई जाने वाली एक किस्म की दृष्टिहीनता के शिकार हैं, उन्हें यह विविधता आश्चर्यजनक लगती है. लेकिन, आंखें, खोल कर देखें तो ये सब दुखद रूप से एक ही हैं.

भारत के किसी भी दूसरे प्रतिष्ठित संस्थान की ही तरह, फिर चाहे वह अकादमिक हो, विधायी हो, न्यायिक हो या नौकरशाही से संबंधित हो या पत्रकारिता से जुड़ा हो, एसीजे ‘अन्य’ सामाजिक समूहों से आने वाले तमाम लोगों के लिए एक पराई जगह साबित हो सकता है.

पिछले साल जून महीने में दाखिला लेने वाले 190 छात्रों में वहां का मैनेजमेंट सिर्फ 6 दलितों और एक आदिवासी की पहचान कर सका. बाकी सारे सवर्ण यानी तथाकथित ‘छूई जा सकने वाली’ जातियों से ताल्लुक रखते थे, चाहे उनका धर्म, भाषा, खानपान (चाहे वे बीफ खाने वाले हों या न हों) कुछ भी क्यों न हों. हर साल की तरह इनमें सबसे बड़ा समूह बंगाली सवर्णों का था, उसके बाद हिन्दीभाषी सवर्ण थे, उसके बाद मलयाली सवर्णों का नंबर था. और हर साल की तरह इन छूए जा सकने वालों में ब्राह्मणों का बहुमत था.

इस पेशे में ब्राह्मणों के वर्चस्व का इतिहास देश में अंग्रेजी पत्रकारिता के इतिहास जितना ही पुराना है. लेकिन, जो चीज वास्तव में परेशान करने वाली है; वह यह कि 200 सालों के बाद भी पत्रकारिता की आधुनिक कक्षा भारत के एक आम अंग्रेजी न्यूजरूम की हूबहू मूरत नजर आती हैं.

ऐसी जगहों पर दलितों और आदिवासियों को लेकर आना खतरनाक है, जहां वे संख्या में बेहद कम हैं, जहां उन्हें मु्फ्तखोर करार देकर उनके साथ कटु व्यवहार होता है, और जहां वे अपनी असली पहचान को छिपा कर ही सिर ऊंचा करके चल सकते हैं. दलित और आदिवासी एक्टिविस्टों और छात्र नेताओं ने छात्रों को एसीजे की स्कॉलरशिप के लिए आवेदन करने से हतोत्साहित किया है और उन्हें अकादमिक जगत या सिविल सेवा में कॅरियर बनाने की ओर मोड़ने की कोशिश की है. हालांकि, ये क्षेत्र भी जातिवाद से मुक्त नहीं हैं, लेकिन कम से कम वहां इस बात का भरोसा तो है कि किसी को बस इस कारण निकाल बाहर नहीं किया जाएगा, क्योंकि किसी को उनकी नस्ल पसंद नहीं है.

Reuters

पिछले दस वर्षों से एसीजे अनुसूचित जातियों और जनजातियों (एससी/एसटी) के लिए 4 पूरी तरह से वित्त पोषित सीटों की व्यवस्था कर रहा है. लेकिन, इन सीटों पर विरले ही किसी ने कभी दावेदारी की है. या तो पर्याप्त संख्या में आवेदन नहीं आए या इससे भी दुखद यह है कि जिन्होंने आवेदन किया, वे भी विशेषाधिकार हासिल वर्गों के उम्मीदवारों से पिछड़ गए.

फिर एक दिन छह दलितों और एक आदिवासी विद्यार्थी ने संस्थान के दरवाजे पर दस्तक दी. ये पिछली गर्मियों की बात है. इनमें से तीन लड़कियां और दो लड़के अति वंचित माडिगा जाति से ताल्लुक रखते थे. उनमें से सिर्फ एक संपन्न परिवार से था और संस्थान की फीस चुकाने में समर्थ था. बाकी में से तीन दिहाड़ी मजदूरों के बच्चे थे. एक लड़की के पिता किसान थे और मां स्कूल की टीचर थीं. दो इकलौती कमाई वाले परिवारों से थीं, जिनके पिता कम आय वाली नौकरियों में थे.

इनमें से सभी ने न सिर्फ उन प्रतियोगियों से मुकाबला किया, जिनके पीछे पीढ़ियों से विशेषाधिकार का बल था, बल्कि उन्हें पछाड़ा भी.

एसीजे और साउथ एशियन फाउंडेशन (एसएएफ) ने इन छह छात्रों की ट्यूशन फीस और आवास के लिए करीब 2,000,000 रुपए (30,800 अमेरिकी डॉलर) की मदद की. जब यह रकम कम पड़ गई, तो अंग्रेजी मीडिया में काम कर रहे वरिष्ठ पत्रकारों के एक चुने हुए समूह से, जिन पर सकारात्मक कार्रवाई का समर्थन करने के मामले में विश्वास किया जा सकता था, आर्थिक मदद की गुहार लगाई गई. इन लोगों ने मिलकर कम पड़ रही रकम के संकट को हफ्ते भर में खत्म कर दिया. बल्कि उनकी मदद के बाद इतना पैसा और बच गया कि विद्यार्थियों को चेन्नई की ब्रिटिश काउंसिल में अंग्रेजी की अतिरिक्त कोचिंग के लिए भी स्पांसर किया जा सकता था.

लेकिन डोनेशन के आने का सिलसिला थमा नहीं और अंत में इतना पैसा जमा हो गया कि कोर्स के अंत में सभी छह छात्रों के पास एक लैपटॉप, कैमरा और वॉयस रिकॉर्डर भी था.

वरिष्ठ पत्रकारों का समूह अब इसे एक वार्षिक कार्यक्रम का रूप देने और इसके भीतर पत्रकारिता के दूसरे संस्थानों को भी शामिल करने की योजना बना रहा है. उनकी योजना भारतीय संपादकों से विविधता के पक्ष में प्रतिज्ञा कराने के लिए एक राउंड टेबल मीटिंग का आयोजन करने की भी है.

लेकिन इस कहानी के भीतर कहानी यह है कि जब ये छह छात्र संस्थान से पढ़ाई पूरी कर रहे थे, तब अनुसूचित जाति/जनजाति के छात्रों में से सभी ने मुझसे यह बात कही कि कोई इनके पास यह दरयाफ्त करने आया था कि क्या उन्हें ‘उन’ छात्रों के बारे में कुछ पता है? उनमें से एक दलित छात्र ने कहा, ‘मेरे अपने रूममेट्स ने मुझसे यह कहना शुरू किया कि वे इस बात का पता लगाना चाहते हैं कि आखिर स्कॉलरशिप किन्हें मिली है? वे यह पता करना चाहते थे कि क्या जिन्हें स्कॉलरशिप मिली हैं, वे वास्तव में इसके योग्य थे.’ वह यह कहते हुए मुस्करा उठा, ‘उसकी परेशानी बस ये थी कि वह विद्यार्थियों के चेहरों को देख कर दलित और आदिवासी नहीं छांट पा रहा था.’

यह वास्तव में ईश्वर की बड़ी रहमदिली है कि कुछ ब्राह्मण आबनूस की तरह (काले) रंग के होते हैं और कुछ दलित आड़ू की तरह (लाल) होते हैं. पिछले दस सालों में जिसे भी यह स्कॉलरशिप मिली उसे योग्य होने के बावजूद लुका-छिपी का यह दुखद खेल खेलने पर मजबूर होना पड़ा. हर साल की तरह इस साल भी मैनेजमेंट को हस्तक्षेप करना बड़ा और इससे पहले कि वे छह छात्रों की पहचान कर पाते, जाति पहरेदारों को अनुशासित करना पड़ा.

अंग्रेजी पत्रकारिता में आपको खुलेआम खुद को होमोसेक्सुल कबूल करने वाले लोग ज्यादा मिल जाएंगे, बनिस्बत ऐसे लोगों के जो खुल कर अपना दलित होना कुबूल करते हों. भारतीय पत्रकारिता इस कदर दिमाग को चकरा देने वाले स्तर तक उच्च जातीय है कि पत्रकार याशिका दत्त द्वारा बस अपने दलित होने की स्वीकृति को जाति-विविधता हासिल करने की दिशा में एक मील के पत्थर के तौर पर देखा गया.

ऐसा नहीं है कि एक न्यूजरूम किसी गांव की तरह है, जहां हर कोई यह जानता है कि कौन किसका बेटा या बेटी है, कौन कहां रहता है. दलितों के लिए न्यूजरूम के रॉक स्टारों के घमंडीपने को नजरंदाज करना और न्यूज रूम की भीड़ में घुल-मिल जाना काफी आसान है, जहां हर कोई यह कह देने पर कि आप बंगाल से हैं, यह मान लेता है कि आप बंगाली भद्र लोक तबके से ही होंगे.

देश में दस सालों तक खोजने के बाद मैं अंग्रेजी मीडिया में बस आठ दलितों की खोज कर पाया हूं. इनमें से सिर्फ दो अपनी दलित पहचान उजागर करने की हिम्मत जुटा पाए हैं.

करीब छह साल पहले जब इनमें से एक ने काफी झिझक के बाद वाम झुकाव रखने वाले अपने करीबी ब्राह्मण सहकर्मियों के सामने अपनी जाति को उजागर किया, तो उनमें से एक ने कहा, ‘तुम में दलित जैसा क्या है? तुम्हें इस पहचान का दावा करने की क्या जरूरत है?’

वह इतना स्तब्ध रह गया कि उस दिन वह कोई जवाब नहीं दे पाया, लेकिन वह आज भी ऐसे किसी मौके का इंतजार कर रहा है, जिस दिन वह अपनी सहकर्मी से कहेगा, ‘‘मैं तुम्हारे लिए पूरी तरह से दलित नहीं हूं, क्योंकि मैं अच्छी अंग्रेजी बोलता हूं, फैशनेबल कपड़े पहनता हूं, शहर के सबसे आधुनिक किस्म के लोगों के साथ समय बिताता हूं. क्या मैं तुम्हारी नजरों में तब दलित होता, जब मैं तुम्हारे घर के बाहर कचरा बीन रहा होता, तुम्हारी मरी हुई गाय की खाल उतार रहा होता या मेरे परिवार की औरतें देवदासियां होतीं या दुष्कर्म की शिकार होतीं?’

जिन आठ लोगों की मैंने तलाश की, उनमें से सिर्फ चार ही अब भी पत्रकारिता के पेशे में हैं.

न्यूजरूम का ब्राह्मण चेहरा

दस साल पहले तक अंग्रेजी अखबारों के संपादक अपने रिपोर्टरों से यह कहते थे कि दलितों, आदिवासियों और मुसलमानों पर अत्याचारों की कहानी को कोई नहीं पढ़ता है. आज वे उन रिपोर्टरों के लिए हवाई जहाज के टिकट कटा रहे हैं और टैक्सियां बुक करा रहे हैं, जो सुदूर गांवों में जाकर ताजातरीन अत्याचारों की रिपोर्टिंग पूरे भावनात्मक ब्यौरों के साथ करने के लिए लालायित हैं.

हाशिए के बहिष्कृत लोगों में इस नई पनपी दिलचस्पी की एक वजह ये है कि पिछले एक दशक में दलित, बहुजन, आदिवासी, मुस्लिम, कश्मीरी और उत्तर-पूर्वी समुदायों के संपादकों द्वारा चलाए जा रहे वैकल्पिक मीडिया ने काफी बड़ी संख्या में ऑननलाइन पाठकों को अपनी ओर आकर्षित किया है. इसने ही तथाकथित मुख्यधारा के मीडिया को अपना रास्ता बदलने पर मजबूर किया है.

फेसबुक, ट्विटर की बदौलत ऐसी वेबसाइटें, जिन्हें पहले हाशिए का मामूली खिलाड़ी कह कर खारिज कर दिया जाता था, अब समाचार के शिकारियों की दुनिया के केंद्र में हैं और ब्रेकिंग न्यूज का पीछा कर रही हैं. दलित कैमरा, राउंड टेबल इंडिया, वेलिवाडा, आदिवासी रिसर्जेंस, साहिल ऑनलाइन, मिलि गैजेट, कश्मीर रीडर, रैयत और थम्ब प्रिंट इनमें से बस कुछ उदाहरण हैं.

पिछले साल मई में हुए दीक्षांत समारोह से पहले ही एसीजे के 90 फीसदी छात्र विभिन्न न्यूजरूमों में प्लेसमेंट पा चुके थे. इनमें वे भी थे, जिन्हें एससी/एसटी स्कॉलरशिप से दिक्कत थी. आने वाले समय में वे अपने नए संपादकों को शीशे में उतारने की तमाम कोशिशें करेंगे और मुमकिन है उनमें से कुछ ताजातरीन दलित अत्याचार की दिल को छूने वाली स्टोरी भी लिखें.

जहां तक सात, एससी/एसटी विद्यार्थियों का सवाल है, उनमें से एक कोर्स के अंत में पत्रकारिता से आकर्षित नहीं था और उसने प्लेसमेंट न लेकर सिविल सर्विसेज की तैयारी करने का मन बनाया है. चार को देश के शीर्ष न्यूज कॉरपोरेशनों से नौकरी का प्रस्ताव मिला है. बाकी दो ने अभी तक मिले प्रस्तावों को स्वीकार नहीं किया है और वे बेहतर प्रस्ताव का इंतजार कर रहे हैं. इन लोगों ने एक करार किया है कि जब वे पत्रकारिता के पेशे में अपने लिए नाम कमा लेंगे, तब वे अपनी जाति की पहचान को उजागर करेंगे.

यह दुखद है कि ये छह दलित विद्यार्थी एक ऐसे पेशे में वीरता दिखाना चाह रहे हैं, जिसमें आज भी ज्यादातर नौकरियां कनेक्शन वालों को मिलती है.

गरीब ब्राह्मण परिवारों से पत्रकारिता के क्षेत्र में नाम कमाने वालों की कोई कमी नहीं है. ऐसे अनगिनत मौके हैं जब एक सफल ब्राह्मण पत्रकार ने मेरे सामने यह शिकायत की कि अगर एससी/एसटी आरक्षण नहीं होता, तो वे या तो वैज्ञानिक बने होते या भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) में शान से अधिकारी की नौकरी बजा रहे होते.

आज भी ब्राह्मण आईएएस के बच्चों को इंटरव्यू में यह कहने पर भी न्यूजरूम की नौकरी मिल जा रही है कि वे एटिडिंग डेस्क पर सिर्फ अपने जनरल नॉलेज को सुधारने के लिए काम करना चाहते/चाहती हैं, क्योंकि वे भी अपने अभिभावकों की तरह नौकरशाह बनना चाहते/चाहती हैं.

दक्षिण के एक खानदानी न्यूज पेपर ने एक ब्राह्मण रिपोर्टर के प्रोबेशन को चार बार आगे बढ़ाया, जबकि आमतौर पर ज्यादातर रिपोर्टरों को दूसरी बार में ही बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है. क्या इस बात का कोई लेना-देना इस तथ्य से है कि उसके पिता और दादा भी उसी अखबार में रिपोर्टर थे?

यह कोई इकलौता न्यूज पेपर नहीं है जिसने ब्राह्मण परिवारों की कई पीढ़ियों को, उनमें से भी ज्यादातर पुरुषों को नौकरी दी है. ऐसे कई उदाहरण मिलते हैं, जहां, किसी ब्राह्मण रिपोर्टर को उसी जिले या शहर में पोस्टिंग दी गई जहां उसके परिवार की पहले की पीढ़ी वाले उसी प्रकाशन के लिए रिपोर्टर हुआ करते थे.

उदाहरण के लिए एक मंदिर नगर में तीसरी पीढ़ी के रिपोर्टर की कहानी मुझे खुद उस रिपोर्टर से ही पता चली. उसे अपने पुरखों की परंपरा का निर्वाह करने का गर्व था. उसने काफी शेखी बघारते हुए कहा कि उसके परिवार की पहुंच दिल्ली तक है. उसने मुझसे कहा, ‘अगर आप स्पेशल दर्शन या पूजा कराना चाहते हैं, तो बस मुझे कॉल कीजिएगा. उसने अखबार के मालिक के बारे में बेहद चैंकाने वाली बात बताई, ‘वे जब भी यहां तीर्थ के लिए आते हैं, तो मेरे घर पर ही ठहरते हैं. वे काफी शुद्ध लोग हैं और बाहर खाना पसंद नहीं करते हैं (क्योंकि आपको नहीं पता बाहर किसके हाथ का छुआ खाना खाना पडे).’

कोई ये बात पक्के तौर पर नहीं कह सकता है कि आखिर रिपोर्टरों के तौर पर इतने ब्राह्मणों की बहाली कैसे होती है?

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ऐसा नहीं है कि दलित या आदिवासी अंग्रेजी पत्रकारिता के किले को तोड़ने में इस कारण अक्षम हैं क्योंकि वे अंग्रेजी नहीं बोल सकते, या फिर वे खराब पत्रकार हैं. भारत में मुख्यधारा का कोई भी समाचार संस्थान आसानी से इस बात की गवाही दे सकता है कि भारत में खराब पत्रकारों की कोई कमी नहीं है. अंग्रेजी अखबारों में रिपोर्टरों द्वारा फाइल की गई कच्ची कॉपियों की अगर जांच की जाए, तो यह तथ्य सामने आएगा कि ज्यादातर रिपोर्टर अंग्रेजी का एक अच्छा सही वाक्य तक नहीं लिख सकते हैं.

अगर आपको यह बात बढा-चढ़ाकर पेश की गई लग रही है, तो उन्हें टीवी न्यूज पर लाइव देखिए या उन्हें सोशल मीडिया पर फॉलो कीजिए, जहां कोई सब-एडिटर उनके लिखे को संपादित और दुरुस्त नहीं करता है.

पहली नजर में यह जानकर झटका लग सकता है कि भारतीय न्यूजरूमों में जहां स्पष्ट आरक्षण विरोधी माहौल पाया जाता है, मेरिट/योग्यता को इस कदर नजरंदाज किया जाता है. लेकिन यह उस आर्थिक व्यवस्था के बिल्कुल अनुरूप है, जिसमें आज भी पूंजी आमतौर पर विरासत में मिलती है और हितों का टकराव एक सामाजिक-आर्थिक मौका है, जिसमें क्लाइंट परिवार बन जाता है और परिवार क्लाइंट बन जाता है.

हम एक ऐसे देश में रहते हैं, जिसमें जब एक रेड्डी जज, खुलेआम दलितों का कल्तेआम करने वाले रेड्डी लोगों को बरी कर देता है, तो हमें कोई समस्या नहीं होती, लेकिन जब एक दलित जज यह शिकायत करता है कि ऊंची जाति के जज उसके साथ भेदभाव कर रहे हैं, तो यह हंगामाखेज और न्यायालय की अवमानना बन जाता है.

इस देश में आज भी एक मुस्लिम रिपोर्टर को राष्ट्रीय सुरक्षा की बीट की जिम्मेदारी देना असहज करने वाली स्थिति है, लेकिन जब एक ब्राह्मण रिपोर्टर एक मरनासन्न ब्राह्मण कला रूप को प्रोमोट करता है और इसे बचाने में लगे ब्राह्मण कलाकार को ‘अगुआ’ और ‘उस्ताद’ कह कर पुकारता है, तब यह अवार्ड जीतने लायक पत्रकारिता बन जाती है.

श्वेत पुरुष अमेरिकी पत्रकारिता

जून, 2011 में जब मैं बोस्टन (अमेरिका) में एक थिंक टैंक द्वारा आयोजित ‘न्यूजरूम में विविधता’ विषय पर पैनल डिस्कशन में भाग ले रहा था, तब श्रोताओं में से एक श्वेत व्यक्ति ने मुझ पर चिल्लाते हुए कहा, ‘श्वेत, पुरुष अमेरिकी पत्रकारों के कारण ही दुनिया मैल्कम एक्स और रोज़ा पार्क्स के बारे में जानती है. वह श्वेत मुझपर इसलिए गुस्सा था क्योंकि मैंने उस साल, ठीक पिछले हफ्ते हुए रिपोर्टरों और संपादकों के एक सम्मेलन को, जिसमें 1,000 अमेरिकी खोजी पत्रकार जमा हुए थे, श्वेत पुरुषों की कभी न खत्म होने वाली परेड करार दिया था.

उस क्रोधित श्वेत पुरुष को देखकर जिसने बाद में अपना परिचय एक पत्रकार के तौर पर कराया, यह सोचने पर विवश हो जाना पड़ा कि अमेरिकी न्यूजरूमों में किसी अफ्रीकी अमेरिकी पत्रकार का बिना लोगों की नजरों में गड़े दाखिल हो जाना कितना मुश्किल होता होगा.

लेकिन यह अमेरीकियों की बात है, जो न सिर्फ ज्यादा संपन्न हैं बल्कि किसी औसत भारतीय की तुलना में सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से आगे हैं.

यह किसी भी तरह से इसलिए नहीं है कि उन्होंने हमारे यहां अस्पृश्यता समाप्त किए जाने से पहले अपने यहां दासप्रथा समाप्त कर दी या इसलिए कि उन्होंने हमारे यहां किसी दलित या आदिवासी या मुस्लिम के प्रधानमंत्री बनने से पहले एक अश्वेत को अपना राष्ट्रपति चुना. नस्लीय अल्पसंख्यकों पर खासकर अश्वेतों पर हमला आज भी वहां के जीवन की एक डरावनी मगर अक्सर घटित होने वाली सच्चाई है. और हां, अब डोनल्ड ट्रंप राष्ट्रपति हैं.

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लेकिन यह नहीं सोचा जा सकता कि किसी अश्वेत को अमेरिका में सार्वजनिक स्थलों पर प्रवेश करने से रोका जाएगा और वहां के अखबार इस पर चुप्पी साध लेंगे. भारत में तो आज भी चुने हुए प्रतिनिधि और सेलेब्रिटीज तक, अगर वे ऊंची जातियों के नहीं हैं, कुछ खास मंदिरों में दाखिल नहीं हो सकते. अगर आप दलित हैं, तो बेंगलुरू के आसपास के ज्यादातर गांवों में आप न बाल कटवा सकते हैं, न चाय खरीद सकते हैं. लेकिन आप यह सच्चाई नहीं जान पाएंगे, क्योंकि अंग्रेजी अखबारों को लगता है कि यह सब जानने में आपकी कोई दिलचस्पी नहीं है. भारतीय मीडिया की जाति के सामाजिक बहिष्कार या अलगाव के से जुड़े रोज के और बोरियत से भरे किस्सों में कोई दिलचस्पी नहीं है.

कई अन्य चीजों की तरह अमेरिकी पत्रकारिता भी हमारी पत्रकारिता की तुलना में ज्यादा विकसित है. काफी पहले 1978 में, अमेरिकन सोसाइटी ऑफ न्यूजपेपर एडिटर्स (एएसएनई) ने एक ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित करते हुए अमेरिकी न्यूजरूमों में अल्पसंख्यकों की ज्यादा भागीदारी की मांग की थी. तब से लेकर अब तक एएसएनई, विविधता अनुपात पर सख्त निगरानी रखता है और शोषित तबकों के इच्छुक पत्रकारों को सहायता और ट्रेनिंग असिस्टेंस मुहैया कराता है.

उनके 2016 के एक सर्वेक्षण ने यह उजागर किया कि सर्वे किए गए 737 संस्थानों में न्यूजरूम संपादकों का 13 फीसदी और कुल संपादकीय टीम का 17 फीसदी हिस्सा अल्पसंख्यकों का था. तीन दशक से भी पहले जब उन्होंने शुरुआत की थी, तब 4 फीसदी से भी कम अमेरिकी पत्रकार अल्पसंख्यक समुदायों से थे.

भारत में जहां ज्यादातर संपादक यह तक मानने को तैयार नहीं होते कि न्यूजरूम की बनावट में समस्या है, वहां अगर आप न्यूजरूम की विविधता को लेकर किसी सर्वे का हवाला दें, तो वे उखड़ जाते हैं और उलटे जातिवाद का आरोप मढ़ देते हैं या मेरिट के विनाश पर उच्च-जातीय भाषण पिला देते हैं.

अमरिकी पत्रकारिता एक और शानदार परंपरा पर नाज कर सकती है, और वह है ब्लैक प्रेस. यानी अफ्रीकी अमेरीकियों का, उनके द्वारा और उनके लिए समाचार के संस्थान. ‘ब्लैक लाइव्स मैटर’ (अश्वेतों के जीवन का भी महत्व है) आंदोलन के दौरान उनकी ताकत देखने लायक थी.

अश्वेत स्वामित्व और अश्वेत द्वारा प्रकाशित पहले अखबार ‘फ्रीडम्स जर्नल’ का पहला अंक वाशिंगटन डीसी के म्यूजियम की एक प्रमुख दीवार की शोभा बढ़ा रहा है. इसके संपादक, सैम्युएल कॉर्निश और जॉन रस्सवर्म ने 16 मार्च, 1827 को छपे इसके पहले अंक में एक यादगार घोषणा की थी:

‘बहुत हुआ जब दूसरे हमारी तरफ से बोलते रहे हैं. बहुत हुआ जब हमारे अस्तित्व से बेहद नजदीक से जुड़ी चीजों की गलत प्रस्तुति से लोगों को ठगा जाता रहा है…अब हम अपनी लड़ाई खुद लड़ना चाहते हैं.’

काश, मेरे पास ये लाइनें 2011 में होती, तो मैं बोस्टन के उस श्वेत व्यक्ति पर इसे दे मारता, जिसे इस बात में कुछ भी गलत नजर नहीं आया कि दुनिया ने मैल्कम एक्स और रोज़ा पार्क्स को श्वेत पुरुष पत्रकारों की निगाहों से जाना.

एक अछूत की निगाहों से

कोई यह आरोप नहीं लगा रहा है कि सारे श्वेत पत्रकार नस्लवादी होते हैं या सारे ब्राह्मण पत्रकार जातिवादी होते हैं. इस बात में कोई शक नहीं कि भारतीय जाति व्यवस्था के बारे में कुछ सबसे बेहतरीन कमेंटरी, रिपोर्ताज और अकादमिक कार्य ब्राह्मण पत्रकारों और बुद्धिजीवियों द्वारा किए गए हैं. लेकिन वैसे तमाम लोगों के लिए जो भारतीय न्यूजरूमों में प्रणालीबद्ध सामाजिक बहिष्कार का बचाव उन ऊंची जातियों के पत्रकारों को सामने रखकर करते हैं, जिन्होंने जाति पर महत्वपूर्ण काम किया है, मेरे मन में स्वाभाविक रूप से आया एक जवाब है, ‘दुनिया यह जानना चाहती है कि यह दुनिया एक अछूत की निगाह से कैसी दिखाई देती है.’

यह सवाल दलित कैमरा के संस्थापकों के सूत्रवाक्य या पंचलाइन, ‘दलित कैमरा: थ्रू अनटचेबल्स आईज.’ (दलित कैमरा: अछूतों की निगाह से) से प्रभावित है.

एसीजे की विविधता परियोजना को समर्थन देने वालों ने यह उम्मीद नहीं की है कि इससे लाभान्वित होने वाले सभी दलित और आदिवासी जाति, सांप्रदायिकता और गरीबी पर रिपोर्टिंग को अपना कॅरियर बनाएंगे.

उम्मीद बस ये है कि वे सब भी उस सत्ता, प्रतिष्ठा और अंतरराष्ट्रीय पहुंच में हिस्सेदारी करेंगे, जो भारत में अंग्रेजी पत्रकार होने के नाते मिलती है.

उनके पीछे ऐसे परिवार और पूरे समुदाय हैं, जिन्हें यह उम्मीद है कि एक दिन ऐसा भी आएगा जब उनका कोई बच्चा प्रधानमंत्री के प्रेस कांफ्रेंस को कवर करेगा, भारतीय क्रिकेट टीम के साथ हवाई यात्रा करेंगे, शाहरुख खान से उनके घर में इंटरव्यू करेंगे, बिल्कुल नई आई मर्सिडीज की टेस्ट ड्राइव करेंगे, विदेशों में सैर करने जाएंगे, घर महंगे उपहार लेकर आएंगे या अपनी जान-पहचान के बल पर पुरस्कार पाएंगे या मोटी स्कॉलरशिप झटकेंगे.

वे सात, जिनका नाम नहीं लिया जाएगा, उन्हें अच्छाई या भक्ति के बोझ के तले दबे बिना, वहां सिर्फ अपनी उपस्थिति दर्ज करानी है. सारे खराब अंग्रेजी रिपोर्टर ब्राह्मण या सवर्ण ही हों, यह कतई अच्छी बात नहीं है.

साभारः द वायर हिंदी से, खबर में कोई बदलाव नहीं किया गया है.

(सुदीप्तो मंडल एक खोजी पत्रकार हैं, जो मुख्यतौर पर दक्षिण भारत से जाति, सांप्रदायिकता और भ्रष्टाचार पर रिपोर्टिंग करते हैं. वे दलित रिसर्च स्कॉलर रोहित वेमुला की मौत और आंबेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन, जिससे वेमुला जुड़े थे, के 25 वर्षों के इतिहास पर एक किताब लिख रहे हैं. यह लेख मूल रूप से अलजज़ीरा में अंग्रेजी में छपा था.)

खुद घुसपैठ कर चीन ने भारतीय सेना पर लगाया आरोप

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नई दिल्ली। पहले तो चीनी सैनिक सिक्कीम में जबरन भारतीय सीमा में घुस आए और दो बंकर नष्ट करने के अलावा भारतीय सैनिकों से झड़प भी की. इसके बाद अब चीन ने भारत पर ही घुसपैठ का आरोप लगा दिया है. चीन ने यह भी मांग की है कि भारतीय सैनिकों को सिक्कीम में तुरंत पीछे बुलाया जाए. चीन ने कहा है कि उसने नाथुला दर्रे से कैलास मानसरोवर यात्रियों का आवागमन रोकने के पीछे सीमा गतिरोध को कारण के रूप में पेश किया है.

चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता गेंग शुआंग ने एक बयान में कहा है कि चीन अपील करता है कि भारत सीमा पार करके आए अपने सैनिकों को तुरंत वापस बुलाए और पूरे मामले में जांच के आदेश दे. उन्होंने अपने बयान में आरोप लगाया कि भारतीय सीमा रक्षक सिक्कीम में भारत-चीन सीमा पार कर उसके क्षैत्र में चले गए और चीनी फ्रंटियर फोर्सेज की देवलांग में आम गतिविधियों को प्रभावित किया. इसके बाद चीन ने उसके जवाब में कदम उठाए.

चीनी प्रवक्ता का यह बयान उसके रक्षा मंत्री के उस बयान के बाद आया है जिसमें उन्होंने दावा किया था कि उसकी जमीन पर सड़क और इमारत निर्माण का भारतीय सेना विरोध कर रही है. माना जा रहा है कि सड़क निर्माण का विरोध करना ही चीन को नागवार गुजरा और उसने कैलास मानसरोवर यात्रा के लिए नाथुला दर्रे को बंद कर दिया.

मोदी और ट्रंप ने IS सहित विदेश नीति पर की चर्चा

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वाशिंगटन। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तीन देशों के दौरो पर अमेरिकी दौरे में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से सोमवार को वॉशिंगटन में मिले. इस दौरान पीएम मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप ने साझा बयान दिया और एक सुर में आतंकवाद को साझा प्रयास से खत्म करने की बात कही. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप को परिवार समेत भारत आने का न्योता दिया है. मोदी-ट्रंप ने साझा बयान में कट्टर इस्लामिक आतंकवाद को लोकतंत्र के लिए खतरा बताते हुए इससे मिलकर निपटने की रणनीति बनाने की बात कही. अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने आतंकवाद पर हमला बोलते हुए कहा कि अमेरिका और भारत मिलकर इस्लामिक आतंकवाद का खात्मा करेंगे. उन्होंने कहा कि दोनों देश आतंकवाद से प्रभावित रहे हैं और हम कट्टर इस्लामिक आतंकवाद को खत्म करेंगे. वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि आतंकवाद जैसी वैश्विक चुनौतियों से अपने समाजों की सुरक्षा अमेरिका और भारत की सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में से एक है. क्योंकि विश्व के दो विशाल लोकतंत्रों का साझा सशक्तिकरण हमारा साझा उद्देश्य है. पीएम मोदी ने कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप और मेरे बीच बातचीत अत्यंत महत्वपूर्ण रही. क्योंकि यह बातचीत परस्पर विश्वास पर आधारित थी. बातचीत के केंद्र में हमारे मूल्य, प्राथमिकताएं और चिंतन शामिल थे. इस दौरान ट्रंप ने मोदी को सच्चा दोस्त बताया और जल्द ही भारत दौरे की बात कही.

नवबंर में पेश हो सकता है आम बजटः नीति आयोग

नई दिल्ली। आने वाले वर्ष 2018 से वित्तीय वर्ष अप्रैल की बजाय जनवरी से लागू किया जा सकता है. इसके साथ ही देश में 150 साल से चली आ रही अप्रैल-मार्च की वित्त वर्ष की परंपरा में बदलाव हो सकता है. इस साल का आम बजट नवंबर में पेश किये जाने की संभावनाऐं हैं. सूत्रों के मुताबिक,  नरेंद्र मोदी ने वित्तीय वर्ष में बदलाव की बात कही थी, जिसके बाद सरकार इसको अमल में लाने में जुट गई है.

वर्तमान सरकार ने 2017-18 का बजट फरवरी के अंतिम हफ्ते की बजाय 1 फरवरी को पेश किया था. कई दशकों से भारत में फरवरी के अंतिम हफ्ते में बजट पेश करने की परंपरा थी. ऐसे में अगर फाइनेंशियल ईयर जनवरी से शुरू होता है तो यह दूसरा बड़ा बदलाव कहलाएगा.

सरकार के जिस प्रस्ताव पर चर्चा चल रही है,  उसके मुताबिक संसद का बजट सत्र दिसंबर से पहले शुरू होगा, ताकि बजट की प्रक्रिया को साल खत्म होने तक पूरा किया जा सके.बजट की प्रक्रिया को पूरा करने में तकरीबन दो महीने का वक्त लगता है, ऐसे में इस बात की संभावना जताई जा रही है कि सरकार नवंबर के पहले हफ्ते में आम बजट पेश कर सकती है.

उससे पहले तक भारत में वित्त वर्ष की शुरूआत एक मई को शुरू होकर 30 अप्रैल तक होती थी. प्रधानमंत्री मोदी के वित्त वर्ष का कैलेंडर वर्ष से मेल करने की इच्छा जताने के बाद सरकार ने पिछले साल एक उच्चस्तरीय समिति का गठन किया. जिसमें इस बड़े बदलाव को जामा पहनाया गया.

अमेरिका दौरे के बाद नीदरलैंड के लिए रवाना हुए मोदी

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नीदरलैंड। आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तीन देशों की यात्रा खत्म होने जा रही है. अपने तीन देशों के विदेश दौरे अब अंतिम दौर में हैं. दो दिन के यूएस विजिट के बाद मोदी मंगलवार को आखिरी पड़ाव नीदरलैंड के लिए रवाना हो गए हैं. इसके बाद वे आज शाम ही स्वदेश के लिए रवाना हो जाएंगे.

मोदी नीदरलैंड के प्रधानमंत्री मार्क रूट से आधिकारिक मुलाकात करके  उनसे आतंकवाद और जलवायु परिवर्तन सहित कई वैश्विक मुद्दों पर चर्चा कर सकते हैं. वह नीदरलैंड में कंपनियों के सीईओ से मुलाकात करेंगे और उन्हें भारत के विकास के सफर में साझेदार बनने को प्रेरित करेंगे. प्रधानमंत्री मोदी वहां भारतीय प्रवासियों को भी संबोधित करेंगे. बता दें कि रूट और मोदी की मुलाकात 2015 में हो चुकी है, जब रूट दो दिन के दौरे पर दिल्ली आए थे.

नीदरलैंड दौरे पर निकलने से पहले मोदी ने ट्वीट किया – “मैं 27 जून को नीदरलैंड के दौरे पर रहूंगा. दोनों देशों के बीच डिप्लोमैटिक रिलेशन की इस साल 70वीं सालगिरह है. इस दौरान में मार्क रूट से मुलाकात करूंगा. वहीं, किंग विलियम-अलेक्जेंडर और क्वीन मैक्सिमा से भी मिलूंगा.

मोदी ने आगे कहा कि मैं पीएम रूट के साथ मुलाकात को लेकर काफी उत्साहित हूं. इस दौरान दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय संबंध को और मजबूत किया जाएगा. हमारे बीच जलवायु परिवर्तन और काउंटर- टेरिज्म जैसे मुद्दों पर चर्चा हो सकती है. जिससे भविष्य के लिए अपार संभावनाऐं एकत्रित होगीं.

INDvsWI:  चैंपियंस ट्रॉफी की टी-शर्ट पहन के बैटिंग करने उतरे युवराज, सोशल मीडिया पर उड़ी खिल्लियां

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नई दिल्ली। इंडिया के स्टार क्रिकेटर युवराज सिंह जब मैदान पर उतरते हैं तो सामने वाले गेंदबाज की हालत हो जाती है. क्योंकि युवराज अगर फॉर्म में हों तो बॉल मैदान के बाहर ही दिखता है. लेकिन रविवार को वेस्ट इंडीज के खिलाफ दूसरे वनडे मैच में युवराज की एक गलती के कारण उनका सोशल मीडिया पर अच्छा खासा मजाक बन गया.

मामला ये हुआ कि युवराज जब वेस्टइंडीज के खिलाफ बैटिंग करने उतरे तो उन्होंने चैंपियंस ट्रॉफी वाली टी-शर्ट पहन रखी थी, जो की पिछले टूर्नामेंट चैपियंस ट्रॉफी में भी उन्होंने पहनी थी. चूकिं टीम मैनेजमेंट लगभग हर टूर्नामेंट के लिए नई टीशर्ट प्रोवाइड करती है. लेकिन युवराज ने ऐसा क्यों किया था ये किसी को पता नहीं चला. हालांकि बाद में युवराज जब फिल्डिंग के लिए लौटे तब वो नई टी-शर्ट पहन कर आए. लेकिन जब तक सोशल मीडिया की नजर उनके टी-शर्ट पर पड़ गई और इसके बाद लोगों ने इनका खूब मजाक उड़ाई.

गौरतलब है कि वेस्ट इंडीज के खिलाफ दूसरे वन डे मैच में इंडियन टीम की शानदार जीत के साथ-साथ टीम ने एक बड़ा रिकॉर्ड भी अपने नाम किया. पहले बल्लेबाजी करते हुए टीम इंडिया ने विंडीज टीम के लिए 310 का बड़ा स्कोर रखा, जिसके बाद बैटिंग करने उतरी वेस्ट इंडीज की टीम ने 205 रनों पर ही घुटने टेक दिए. इस मैच में भारत की शानदार जीत हुई.

जानें कितनी सैलरी लेती हैं SBI की चेयरमैन अरुंधती भट्टाचार्य

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नई दिल्ली। दुनिया के 50 सबसे बड़े बैंकों में शामिल और देश का सबसे बड़ा बैंक भारतीय स्टेट बैंक अपने प्रमुख को जो सैलरी देता है वो जानकर आप निश्चित रूप से चौंक जाएंगे. नंबर 1 सरकारी बैंक एसबीआई चीफ को मिलने वाली सैलरी, नंबर एक प्राइवेट बैंक आईसीआईसीआई बैंक की चीफ को मिलने वाली सैलरी के सामने कुछ भी नहीं है. ये चौंकाने वाली बात आज सामने आई है.

विभिन्न बैंकों की सालाना रिपोर्ट के मुताबिक स्टेट बैंक की प्रमुख अरूंधति भट्टाचार्य को वित्त वर्ष 2016-17 में 28.96 लाख रुपये का सालाना वेतन पैकेज मिला. इसी दौरान आईसीआईसीआई बैंक की मैनेजिंग डायरेक्टर और सीईओ चंदा कोचर को 2.66 करोड़ रुपये का मूल वेतन मिला. इतना ही नहीं अगले कुछ महीनों में उन्हें उनके प्रदर्शन का 2.2 करोड़ रुपये बोनस (परफॉर्मेंस बोनस) भी दिया जाएगा. निजी बैंक के टॉप अधिकारी के फायदों का सिलसिला यहीं तक नहीं है. इन सब के अलावा चंदा कोचर को भत्तों के तौर पर 2.43 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया और इस तरह उनका कुल वेतन 6.09 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है.

इस उदाहरण से आप साफ समझ सकते हैं कि जहां देश के नंबर एक सरकारी बैंक एसबीआई की चीफ को सालाना सैलरी 30 लाख रुपये से भी कम है वहीं देश के नंबर एक प्राइवेट बैंक के चीफ की सैलरी 6 करोड़ रुपये से ज्यादा है. अगर दूसरे लिहाज से देखें तो दोनों की सैलरी में 19 गुना का अंतर है. ये भारी अंतर बेहद चौंकाने वाला है.

एक और प्राइवेट बैंक एक्सिस बैंक की प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी शिखा शर्मा को वित्त वर्ष 2016-17 में 2.7 करोड़ रुपये का मूल वेतन मिला. इसके साथ उन्हें 1.35 करोड़ रुपये का वेरिएबल पे और 90 लाख रुपये के दूसरे भत्तों का पेमेंट किया गया. एचडीएफसी बैंक के एमडी आदित्य पुरी को 10 करोड़ का वेतन इस दौरान मिला है. यही नहीं उनके पास 57 करोड़ रुपये से ज्यादा कीमत का स्टॉक ऑप्शन भी है.

भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने पिछले साल अगस्त में कम वेतन के मुद्दे को उठाया था. यह सरकारी बैंकों के टॉप ऑफिशियल को आर्कषित करने के हिसाब से बेहद कम है. सरकारी बैंक अपने निचले पद के अधिकारियों को ज्यादा और टॉप अधिकारियों को कम वेतन देते हैं. उन्होंने कहा था कि इस वजह से सरकारी बैंक उच्च योग्यता रखने वाले लोगों को नौकरी नहीं दे पाते और उनमें टॉप लेवल पर सीधे नौकरी पाना भी मुश्किल होता है.

दार्जिलिंग में ईद पर बेमियादी बंद के बीच 12 घंटे की राहत

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पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग क्षेत्र में अलग गोरखालैंड की मांग को लेकर गोरखा जनमुक्ति मोर्चा समर्थकों की ओर से रैली और प्रदर्शन का सिलसिला रविवार को भी जारी रहा पर इसी बीच जनमुक्ति मोर्चा ने सोमवार को ईद के मौके पर सुबह 6:00 बजे से शाम 6:00 बजे तक 12 घंटे की आंशिक ढील देने का एलान किया है. हालांकि मोर्चा ने साफ किया है कि इलाके में वाहनों की आवाजाही में छूट सिर्फ मुस्लिम तबके के लिए है अन्य किसी भी तबके लिए नहीं है.

मोर्चा प्रमुख विमल गुरुंग ने शनिवार रात को जारी एक वीडियो संदेश में पार्टी के तमाम नेताओं व कार्यकर्ताओं से अलग राज्य की मांग में सड़कों पर उतरने की अपील की है. उन्होंने कहा कि मोर्चा बातचीत के लिए तैयार है, लेकिन यह बातचीत सिर्फ अलग गोरखालैंड के मुद्दे पर ही होगी.

उन्होंने कहा है कि बातचीत किसी वैकल्पिक फार्मूले पर नहीं होगी. गुरुंग ने भाजपा का नाम लिए बिना चेताया है कि दूसरे दलों के कुछ नेता गोरखालैंड आंदोलन के साथ विश्वासघात करने का प्रयास कर सकते हैं. मोर्चा प्रमुख ने कहा है कि या तो उनका शव घर जाएगा या फिर वे गोरखालैंड के साथ लौटेंगे पर इस आंदोलन को बीच में नहीं छोडेगें वरना गौरखालैंड़ का सपना हमेशा की तरह अधूरा रह जायेगा. इस बार के आंदोलन की गूंज पूरे भारत मे है जिसे रूकने न दिया जायेगा कल से बंद पहले की तरह शृरु हो जायेगा.

 

शौचालय बनाने जा रहे दलितों को जातिवादी गुंडों ने पीटा

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गोंडा। एक तरफ मोदी सरकार स्वच्छ भारत और निर्मल भारत अभियान चला रहे हैं, वहीं दूसरी उच्च जाति के लोग दलित परिवार को शौचालय बनाने के लिए पीटते हैं. घटना है यूपी के गोंडा की. जहां योगी आदित्यनाथ की नेतृत्व में भाजपा की सरकार है. गोंडा के तेंदुवा कला कोतवाली क्षेत्र के दतौली गांव में शनिवार (24 जून 2017) को शौचालय का गड्ढा खोदने से नाराज जातिवादी गुंडों ने एक दलित बाप बेटे को पीटकर मरणासन्न कर दिया. दोनों को गंभीर हालत में इलाज के लिए सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में भर्ती कराया गया है. इस मामले में पीड़ित ने तीन लोगों के खिलाफ मारपीट व दलित उत्पीड़न की रिपोर्ट दर्ज कराई है.

दतौली गांव के रहने वाले दलित नन्हें के मुताबिक शौचालय निर्माण के लिए वह शनिवार को अपने घर के पास पड़ी जमीन पर गड्ढा खोद रहा था. इसी बीच गांव के ही रहने वाले लाल सिंह, फुलरु सिंह व बहादुर सिंह लाठी डंडा लेकर आ धमके और उसे गड्ढा खोदने से मना करने लगे. जब उसने इसका विरोध किया तो तीनों ने उस पर हमला कर दिया और लाठी डंडों से उसे जमकर पीटा. नन्हें की चीख सुनकर उसके पिता बुधई मौके पर पहुंच गए. नाराज जातिवादियों ने बुजुर्ग बधई को भी नही बक्शा और उसे भी पीटना शुरू कर दिया. हमलावर दोनों को मरणासन्न होने तक पीटते रहे.

जातिवादियों के तेवर देखकर गांव का कोई भी बाप-बेटों को बचाने की हिम्मत नहीं जुटा सका. पिटाई के बाद जातिवादी गुंडें आराम से अपने घर चले गए. उनके जाने के बाद लोगों ने पुलिस को सूचना दी. मौके पर पहुंची पुलिस ने गंभीर रुप से घायल बुधई व नन्हे को मनकापुर के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में भर्ती कराया जहां उनका इलाज किया जा रहा है.

इस मामले में नन्हे लाल सिंह, फुलरु सिंह व बहादुर सिंह के खिलाफ मारपीट, धमकी व दलित उत्पीड़न की रिपोर्ट दर्ज कराई गई. कोतवाल दद्दन सिंह ने बताया कि तीनों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर ली गई है.

 नागमणि कुमार शर्मा की रिपोर्ट

नीतीश कुमार का नहीं है कोई सिद्धांत: कांग्रेस 

नई दिल्ली। राष्ट्रपति चुनाव में भाजपा के उम्मीदवार रामनाथ कोविंद के समर्थन के लिए बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार खुलकर सामने आये हैं. कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद ने कहा कि नीतीश कुमार ने मीरा कुमार जो की बिहार राज्य की बेटी हैं, उनके लिए हारने की बात पहले की है तो ये बिहार के लोगों का भला किस तरह से सोचते हैं.

आजाद ने कहा कि जिन लोगों का सिद्धांत एक होता है उनका फैसला बदलता नहीं है. उन्होंने आगे कहा कि जिनका यकीन कई सिद्धांतों पर होता है उनके फैसले बदलते रहते हैं. नीतीश के कोविंद को समर्थन देने पर महागठबंधन की आशा लगाई हुए सभी विपक्षी पार्टियां नाराज हैं.

राजद के मुखिया लालू प्रसाद यादव का कहना है कि नीतीश के इस फैसले से गलत संदेश जाएगा. लालू ने कहा कि खुद नीतीश कुमार संघ मुक्त भारत की बात किया करते थे लेकिन अब वो एनडीए का साथ देते हुए नजर आ रहे हैं, यह मेरी समझ से परे है. लालू ने कहा कि वो नीतीश से बात करेंगे की इस मामले में फिर से विचार किया जायेगा.

 गौरतलब है कि सुषमा स्वराज के ट्विटर हैंडिल पर रविवार को उन्होंने ट्वीट शेयर किया था जिसमें उन्होंने दिखाया था कि मीरा कुमार संसद में किसी को बोलने का मौका नहीं देती थीं. इस पर कांग्रेस के नेता टॉम वडक्कन का कहना है कि संसद में सुनियोजित समय के भीतर बोलने को कहा था जो कि स्पीकर की ड्यूटी होती है. मुझे नहीं लगता कि यह कोई बड़ा मुद्दा है.

कांग्रेस नेता एन ए हैरिस का कहना है कि ऐसे लोगों के विरुद्ध नहीं बोलना चाहिए जो सम्मानित हैं. हर कोई मीरा कुमार के पारिवारिक बैकग्राउंड व उनकी शख्सियत के बारे में जानता है. वे अच्छी शख्सियत के साथ-साथ भारतीय राजनीति की काफी सक्रिय नेता भी हैं पर इससे इतर नीतीश कुमार भाजपा के पाले में गेंद डालने की तैयारी कर चुके हैं.

क्रिकेट विश्वकप: भारत और पाकिस्तान की महिला टीमें होगीं आमने-सामने

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नई दिल्ली। आईसीसी महिला विश्व कप का आगाज 24 जून को शुरू हो चुका है. 2 जुलाई को डर्बी के काउंटी ग्राउंड पर भारत-पाकिस्तान मुकाबला खेला जायेगा. गौरतलब है की चैंम्पियन ट्राफी के फाइनल में पुरुष टीम को हार मिली थी जिसका बदला महिला टीम ले सकती है. अब भारत के पास एक और सुनहरा मौका दो जुलाई को है इस बार बारी भारतीय महिला क्रिकेट टीम की होगी.

ये मुकाबला भारतीय समय के मुताबिक दोपहर 3 बजे से शुरू होगा. इस मुकाबले को लेकर धीरे-धीरे माहौल गर्म होगा और उम्मीद है कि भारतीय महिला क्रिकेट टीम वो कसर पूरी कर देगी जो पुरुष टीम 18 जून के फाइनल में नहीं कर सकी.

भारत और पाकिस्तान महिला क्रिकेट टीमों के बीच अब तक हुए वनडे मैचों के आंकड़े पूरी तरह से एकतरफा रहे हैं.  भारतीय महिला टीम और पाकिस्तान महिला टीम के बीच 2005 से 2017 के दौरान कुल 9 वनडे मैच खेले गए हैं और इन सभी मुकाबलों में भारत ही जीता है.

एक और दिलचस्प पहलु महिला क्रिकेट टीम से जुड़ा है. भारतीय महिला क्रिकेट टीम बेशक अब तक एक बार भी विश्व कप जीतने में सफल नहीं रही है लेकिन पाकिस्तान को उसने हर बार हराया है. इस बार भी मुकाबला एकतरफा रहने के चांस हैं.