Indian Air Force में निकली वैकेंसी, एेसे करें एप्‍लाई

इंडियन एयर फोर्स ने नोटिफिकेशन जारी कर कई पदों के लिए आवेदन मांगा है. ये वैकेंसी अविवाहित पुरुषों के लिए है. जानें वैकेंसी से जुड़ी सारी डिटेल्‍स- पद का नाम : Airman Group X (Technical) Airman Group Y (Non-Technical) Trades पात्रता : Airman Group X: 12वीं या इससे समतुल्‍य एग्‍जाम पास किया हो. साथ में 50 प्रतिशत अंक हों. या सरकार द्वारा मान्‍यता प्राप्‍त पोलीटेक्टिन इंस्‍टीट्यूट से तीन साल का डिप्‍लोमा कोर्स किया हो. साथ में 50 फीसदी अंक हों. Airman Group Y: 12वीं या इससे समतुल्‍य एग्‍जाम पास किया हो. साथ में 50 प्रतिशत अंक हों. पे स्‍केल : Airman Group X: 33,100 रुपए प्रतिमाह सैलरी दी जाएगी. Airman Group Y: 26,900 रुपए प्रतिमाह की सैलरी दी जाएगी. सेलेक्‍शन प्रक्रिया : लिखित परीक्षा, एडेप्टिबिलिटी टेस्‍ट-1,2, फिजिकल टेस्‍ट और मेडिकल एग्‍जाम के आधार पर चयन किया जाएगा. कैसे एप्‍लाई करें : सभी डॉक्‍यूमेंट्स के साथ आवेदक 4 नवंबर को सुबह 10 बजे इस पते पर पहुंचे- Rajiv Gandhi Government Polytechnic, Itanagar, Arunachal Pradesh.

इज्जत बचाने उतरेगी ऑस्ट्रेलिया, देखिए टीम का ले-आउट

बेंगलुरु। वनडे क्रिकेट में नंबर एक बन चुकी टीम इंडिया गुरुवार को ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ बारिश की आशंका के बीच जब चौथे वनडे में उतरेगी, तो उसका लक्ष्य अपने वनडे इतिहास में परफेक्ट 10 का रिकॉर्ड बनाना होगा. भारतीय टीम ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ सीरीज में 3-0 की अपराजेय बढ़त बना कर सीरीज अपने नाम करने के साथ वनडे में नंबर-1 भी बन चुकी है. भारत ने इंदौर में पिछला मैच जीत कर वनडे क्रिकेट में अपने सबसे लंबे विजय क्रम की बराबरी कर ली थी. भारत की ये लगातार नौंवीं वनडे जीत थी. भारत ने इस साल जुलाई से सितंबर तक लगातार नौ वनडे मैच जीते हैं, जबकि इससे पहले उसने नवंबर 2008 से फरवरी 2009 तक लगातार नौ वनडे जीते थे. बेंगलुरु में भारत का ये 926वां वनडे मैच होगा. इसके अलावा अगर विराट की कप्तानी में भारत लगातार 10वां वनडे जीतता है, तो वो महेंद्र सिंह धौनी और राहुल द्रविड़ का रिकॉर्ड तोड़ देंगे. धौनी की कप्तानी में भारत लगातार नौ वनडे जीत चुका है. टीमें इस प्रकार हैं- भारत विराट कोहली (कप्तान), रोहित शर्मा, अजिंक्य रहाणे, मनीष पांडे, केदार जाधवन, महेंद्र सिंह धौनी, हार्दिक पंड्या, भुवनेश्वर कुमार, कुलदीप यादव, युजवेंद्र चहल, जसप्रीत बुमरा, उमेश यादव, मोहम्मद शमी, रवींद्र जडेजा और लोकेश राहुल. ऑस्ट्रेलिया स्टीवन स्मिथ (कप्तान), डेविड वार्नर, हिल्टन कार्टराइट, ट्रेविस हेड, ग्लेन मैक्सवेल, मार्कस स्टोइनिस, मैथ्यू वेड, एशटन एगर, केन रिचर्डसन, पैट कमिंस, नाथन कूल्टर नाइल, आरोन फिंच, पीटर हैंड्सकोंब, जेम्स फॉकनर और एडम जंपा.

अब पेट्रोल-डीजल भी मिलेंगे ऑनलाइन

नई दिल्ली। केंद्र सरकार की कोशिश है कि ग्राहक पेट्रोल और डीजल को ऑनलाइन ऑर्डर करे और उसे घर पर ही इसकी आपूर्ति हो सके. बुधवार को पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इंडिया मोबाइल कांग्रेस में इस बात की जानकारी दी.

प्रधान ने भरोसा जताया कि सूचना तकनीकी और संचार क्षेत्र मे जिस तरह की प्रगति हुई है, उसके आधार पर ग्राहकों को सीधे घर पर पेट्रोल और डीजल की आपूर्ति संभव हो सकेगी. बाद में उन्होंने ट्वीट करके भी इस जानकारी को साझा किया. होम डिलीवरी के लिए ई-कॉमर्स कंपनियों वाले फॉर्मेट का इस्तेमाल किया जा सकता है.

माना जा रहा है कि तेल कंपनियों ने पेट्रोल पंपों से पेट्रोल और डीजल को ग्राहकों के घर पर पहुंचाने के लिए एक फूल-प्रूफ ढांचा विकसित कर लिया है. पहले भी सरकारी पेट्रोलियम कंपनियों ने कहा था कि वे बेहद सुरक्षित टैंकर बनाकर उसका इस्तेमाल ग्राहकों के घर पर डिलीवरी के लिए कर सकती हैं. यह एक तरह का मोबाइल पेट्रोल टैंकर होगा.

अगर सरकार यह सेवा शुरू करती है तो इसका सबसे बड़ा फायदा ग्राहकों के साथ ही कंपनियों को भी होगा. साथ ही पेट्रोल पंपों पर भीड़ खत्म की जा सकेगी. लेकिन इसके लिए केंद्र सरकार को कुछ कानूनी संशोधन भी करने होंगे. इसकी वजह यह है कि मौजूदा कानून के मुताबिक घर पर पेट्रोल व डीजल जैसे ज्वलनशीन पदार्थों की आपूर्ति नहीं की जा सकती. इससे सार्वजनिक संपत्ति और जान को खतरा उत्पन्न हो सकता है.

तेल मंत्रालय के तहत ही काम करने वाले पेट्रोलियम एंड सेफ्टी ऑर्गेनाइजेशन (पीएसओ) ने इस प्रस्ताव का विरोध किया था. सूत्रों का कहना है कि देश की दिग्गज पेट्रोलियम मार्केटिंग कंपनी इंडियन ऑइल ने इस बारे में पीएसओ से बात की है. कंपनी ने सुरक्षा चिंताओं को काफी हद तक दूर कर लिया है. हो सकता है कि शुरुआत में सिर्फ डीजल की आपूर्ति की जाए, क्योंकि यह पेट्रोल के मुकाबले कम ज्वलनशील होता है.

बलात्कार के आरोप में एक और बाबा गिरफ्तार

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सियाराम बाबा

सीतापुर। बलात्कारी बाबा रामरहीम और फालाहारी बाबा के अब एक और बाबा पुलिस के शिकंजे में आया. यूपी के सीतापुर से पुलिस ने बाबा को गिरफ्तार किया है. बाबा पिछले 8 महीने से युवती को बंधक बनाकर बलात्कार कर रहा था.

बाबा का नाम सियारामदास है और वो उदासीन अखाड़े का महंत और इंटर कॉलेज का अध्यक्ष है. नौकरी दिलाने के बहाने एक युवती ने बाबा पर रेप का आरोप लगाया है. महंत ने न सिर्फ युवती का रेप किया बल्कि कॉलेज प्रबंधिका और दूसरे लोगों से भी उसका शारीरिक शोषण करवाया. लड़की ने बाबा पर कई महीनों तक बंधक बनाकर उसके साथ रेप करने आरोप लगाया है. उसी दौरान आरोपी ने पीड़िता की अश्लील वीडियो भी बनाई थी. फिलहाल पुलिस ने आरोपी के खिलाफ केस दर्ज कर उसे गिरफ्तार कर लिया है.

पीड़िता ने बताया उसे नौकरी की जरूरत थी. उसके दो परिचित नौकरी दिलाने के बहाने आरोपी बाबा की शिष्या मिंटू सिंह को 50 हजार रुपयों में बेच दिया. इसके बाद वह पीड़िता को अपने साथ सीतापुर आश्रम ले गई. वहां बाब सियाराम ने रात में पीड़िता के साथ रेप कर उसकी अश्लील वीडियो बनाई. अगली सुबह पीड़िता को आगरा के आश्रम में भेज दिया गया. वहां उसे 8 महीनों तक बंधक बनाकर उसके साथ रोज रेप किया जाता रहा. बीते दिन पीड़िता को वापस सीतापुर आश्रम लाया गया.

पुलिस के मुताबिक, पीड़िता के बयान के आधार पर आरोपी के खिलाफ रेप का केस दर्ज उसे गिरफ्तार कर लिया गया है. पुलिस आरोपी से पूछताछ कर मामले की जांच कर रही है. वहीं दूसरी तरफ, आरोपी बाबा सियाराम ने इन आरोपों को गलत बताया है. उसने कहा कि यह सब उसे फंसाने की साजिश है. वह तो पीड़िता को जानता भी नहीं है.

दिल्ली के 15,000 गेस्ट टीचर्स होंगे परमानेंट

मनीष सिसोदिया

नई दिल्ली। दिल्ली के सरकारी स्कूलों में पढ़ा रहे 15 हजार गेस्ट टीचर नियमित होंगे. इस बाबत दिल्ली कैबिनेट ने बिल तैयार किया है. अब इसे पास करने के लिए 4 अक्टूबर को विधानसभा का विशेष सत्र बुलाया है. शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया ने प्रेस वार्ता कर इस बात की जानकारी दी है.

दिल्ली के उप-मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने कहा कि सरकार जल्‍द ही दिल्‍ली के गेस्ट टीचर्स को परमानेंट करेगी. जल्‍द ही इस बिल को विधानसभा में पास कराया जाएगा. इसके लिए अगले सप्‍ताह 4 अक्टूबर को विशेष सत्र बुलाने की भी योजना है.

यहां पर याद दिला दें कि इससे पहले दिल्ली सरकार ने 17 हजार गेस्ट टीचरों का वेतन 90 फीसदी तक बढ़ाया था. इस फैसले का फायदा सेंट्रल टीचर एलिजिबिलिटी टेस्ट (सीटीईटी) पास करने वाले टीचरों को मिल रहा है. यहां पर बता दें कि दिल्ली के सरकारी स्कूलों में 17000 गेस्ट टीचर हैं, जिनमें से 2000 टीचर नॉन-सीटीईटी हैं.

दिल्ली में गेस्ट टीचर्स को रखने का सिलसिला 2009 मे उस वक्त शुरू हुआ जब कोर्ट ने राइट टू एजुकेशन लागू कर दिया और उसके बाद दिल्ली के सरकारी स्कूलों मे टीचर्स की भर्ती करना सरकार के लिए अनिवार्य हो गया. सरकार अगर परमानेंट टीचर रखती तो करीब एक टीचर को 35 से 40 हजार रूपए देने पड़ते. लेकिन 2009 में इन टीचर्स को 7 से 12 हजार रुपए देकर रख लिया गया. फिलहाल प्रतिदिन इन गेस्ट टीचर्स को करीब 700 से 900 रूपए दिए जाते है. लेकिन सिर्फ उतने दिन का, जितने दिन वो पढ़ाने आते हैं, हफ्ते की छुट्टी का भी कोई पैसा नहीं दिया जाता.

खबरों के मुताबिक, दिल्ली में करीब 15 हजार गेस्ट टीचर्स हैं. समय-समय पर ये लोग प्रदर्शन कर खुद को परमानेंट करने की मांग करते रहे हैं. इनका कहना है कि केजरीवाल सरकार ने चुनाव से पहले इनसे वादा किया था कि सभी गेस्ट टीचर्स को परमानेंट कर देंगे. गेस्ट टीचर्स की सैलरी भी बढ़ाएंगे. इस साल दिल्ली सरकार गेस्ट टीचर की सैलरी तो बढ़ा चुकी है पर परमानेंट करने का इंतजार है.

स्त्रियों को कब मिलेगा ‘ना’ कहने का हक?

women rights

हाल ही में उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में नौवीं में पढ़ने वाली एक छात्रा को एक मनचले लड़के ने सिर्फ इसलिए मार डाला क्योंकि उसने उसके प्रेम प्रस्ताव को ठुकरा दिया था. ये सिर्फ इस बात का संकेत है कि पुरुष अपने वर्चस्व पर आघात कैसे सह सकता है.

अगर हम अलग-अलग देशों में शीर्ष दस महिलाओं के लिए असुरक्षित देशों की बात करें तो उसमें नम्बर एक पर कोलम्बिया आएगा. यहां सबसे ज्यादा एसिड अटैक की घटनाए होती है. खास यह कि इनमें से ज्यादातर को न्याय नहीं मिल पाता. एक रिपोर्ट के मुताबिक 2015 में यहां लगभग 45,000 केस घरेलू हिंसा के दर्ज किए गए थे. दूसरे नंबर पर अफगानिस्तान का नाम आता है जहां लगभग 87 फीसदी लड़कियों की शादी 15 से 19 वर्ष के बीच कर दी जाती है. घरेलू हिंसा की दर यहां सबसे ज्यादा है. इसके साथ ही प्रसव के समय मृत्यु की दर प्रति एक लाख में 400 की है. तीसरे नंबर पर हमारा देश भारत आता है, जहां सामूहिक बलात्कार, घरेलू हिंसा, कन्या भ्रूण हत्या, मानव तस्करी की दर सबसे ज्यादा है.

आंकड़ों की बात करें तो बीते 30 साल में पचास मिलियन (5 करोड़) से ज्यादा महिलाओं के गर्भपात के केस सामने आए हैं. चौथे नंबर पर जिस देश का नाम है; वह है- द डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो. एक शोध के मुताबित कांगो में सबसे ज्यादा लिंग आधारित हिंसा होती है. लगभग 1.150 औरतें प्रतिदिन बलात्कार की शिकार होती हैं जो 4 लाख 20 हजार तक प्रतिवर्ष दर्ज की जाती है. औरतों के स्वास्थ्य की हालत सबसे ज्यादा खराब इसी देश में है. यहां की 51 प्रतिशत औरतें गर्भावस्था में रक्त-अल्पता (एनीमिया) से जूझती हैं. पांचवे नम्बर पर सोमालिया है; जहां कानून एवं व्यवस्था की भारी कमी है. वहां सेक्सुअल हरासमेंट को बहुत ही सामान्य तरीके से देखा जाता है. यहां प्रसव कालीन मौत की दर काफी ज्यादा है तथा बाल विवाह तथा औरतों के खतना जैसी बातें रोजमर्रा की है. छठे नम्बर पर पाकिस्तान है जहां औरतों को कम उम्र में जबरदस्ती की शादी, एसिड अटैक, पत्थर से मारने की सजा जैसी घटनाओं से आए दिन गुजरना पड़ता है.

वहां हर साल लगभग एक हजार लड़कियां ऑनर किलिंग की भेंट चढ़ जाती हैं. सातवें नम्बर पर केन्या आता है, जहां एड्स औरतों के लिए आम समस्या है. तथा उन्हें अपनी निजी जिंदगी में कोई भी फैसला लेने का अधिकार नहीं है. ब्राजील का नम्बर आठवां है. शोध के मुताबित हर पंद्रहवां सेकेंड यहां औरतों के साथ यौन उत्पीड़न होता है तथा प्रत्येक 2 घंटे में एक औरत का कत्ल हो जाता है. बच्चा जन्म देने या ना देने का फैसला लेने का अधिकार भी औरतों को नहीं है. अगर वो अपनी मर्जी से गर्भपात कराती हैं तो उन्हें 3 वर्ष की जेल होती है. 9वें नम्बर पर इजिप्ट आता है. यौन उत्पीड़न इस देश में इतना ज्यादा है कि यहां आए टूरिस्टों को भी इसका सामना करना पड़ता है. औरतों को शादी करने, बच्चे की कस्टडी, तलाक या कोई अन्य निर्णय लेने की आजादी नहीं है. दसवे नम्बर पर मैक्सिको आता है जहां 2011-12 में 4000 केस महिलाओं के लापता होने के दर्ज हुई हैं. ये तो बस चंद देशों में महिलाओं की स्थिति की झलकियां है. कमोबेश ज्यादातर देशों में यही स्थिति है. तमाम देशों में औरतों को उनका जायज हक नहीं मिलता. उनके साथ शारीरिक, मानसिक, कानूनी दुर्व्यवहार होते हैं. हम दिनों दिन तरक्की कर रहे हैं मगर औरतों की सुरक्षा पर अभी भी सवालिया निगाह है. शायद यही वजह है कि दिल्ली में लड़कियों ने रात को सड़क पर घूमकर ‘रात को सड़कों पर घूमने का हक’ मांगा और देश के बड़े शहरों में यह मुहिम बनती जा रही है.

– लेखिका शिक्षिका हैं. महिला मुद्दों पर लिखती हैं. उनसे संपर्क raipuja16@gmail.com पर किया जा सकता है.

जब बसपा के एक दिग्गज नेता पार्टी छोड़ गए तो कांशीराम जी ने कहा…

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Kanshiram

बहुजन समाज पार्टी के लिए पिछले कुछ साल ठीक नहीं रहे हैं. उसे पहले लोकसभा चुनाव में हार मिली, फिर उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में भी पार्टी जीत नहीं सकी. पार्टी से जुड़े कुछ पुराने नेता भी पार्टी छोड़ कर चले गए. उन्होंने बसपा पर तमाम आरोप भी लगाएं. पार्टी छोड़ कर गए नेता बसपा में रहने के दौरान अम्बेडकरवाद की कसमें खाते थे और खुद को मान्यवर कांशीराम का अनुयायी बताते थे.

लेकिन जब वो बहुजन समाज पार्टी को छोड़कर दूसरे दलों में चले गए तो उनका चोला ही बदल चुका है.

बात करते हैं बहुजन नायक मान्यवर कांशीराम से जुड़े एक और किस्से की. और आपको बताते हैं कि जब कांशीराम जी के समय में कोई नेता पार्टी छोड़ जाता था तो मान्यवर क्या कहते थे?

बात उन दिनों की है, जब मान्यवर कांशीराम बहुजन समाज पार्टी को देश भर में बढ़ाने में लगे हुए थे. उस दौरान एक बार एक बड़ा आदिवासी चेहरा अरविन्द नेताम पार्टी से अलग हो गए. नेताम बसपा छोड़कर कांग्रेस में चले गए. आमतौर पर किसी बड़े चेहरे के पार्टी से अलग हो जाने के बाद कुछ दिनों तक पार्टी में हलचल रहती है. लेकिन नेताम के कांग्रेस से अलग हो जाने के बावजूद भी कांशीराम जी को कोई फर्क नहीं पड़ा. पार्टी में भी सबकुछ सामान्य तौर पर चलता रहा. पत्रकार जो इसे मुद्दा बनाने में लगे थे, उन्हें बड़ी निराशा हुई. उन्हें चटपटी खबरें बनाने को नहीं मिल रही थी, क्योंकि कांशीराम जी उस नेता पर कोई भड़ास नहीं निकाल रहे थे.

पत्रकारों से नहीं रहा गया. कांशीराम जी से पत्रकारों ने पूछा- साहब आपकी पार्टी का दिग्गज नेता पार्टी छोड़कर चला गया, लेकिन आपको चिंता ही नहीं है. आप उसको मना क्यों नहीं लेते? साहब ने जवाब में कहा- भाई पहली बात तो वो माना हुआ होता तो पार्टी छोड़ता ही नहीं. दूसरी बात अब आप लोगों ने उसको दिग्गज़ बना दिया तो अब उसको मनाने की रेट भी दिग्गज़ हो गयी है जो कि मेरे पास है नहीं. इसीलिए मैं इसके जाने की विदाई पार्टी देता हूं ताकि किसी दूसरी पार्टी में रहकर मेरी सिखाई बातों पर थोड़ा बहुत तो अमल करेगा. वो भी मेरे मिशन का ही हिस्सा है.

कांशीराम जी ने कहा कि बसपा में किसी को लालची रस्सी से बांधकर नहीं रखा जाता और ना ही किसी नेता को नोट की कोर दिखाकर बुलाया जाता है. इसीलिए जिस किसी को बसपा समझ में आये वो यहां काम करे. यहां आने जाने वालों के लिए दरवाज़े हमेशा खुले रहते हैं.

असल में कांशीराम हमेशा इस बात पर जोर देते थे कि बहुजन समाज पार्टी एक मिशन है और मिशन में किसी को जबरदस्ती बांध कर नहीं रखा जा सकता. बहुजन समाज पार्टी के बनने से लेकर अब तक तमाम नेता पार्टी छोड़ कर गए तमाम नेताओं को निकाल दिया गया, लेकिन यह राजनैतिक आंदोलन आज भी चल रहा है. क्योंकि मान्यवर कांशीराम ने बहुजन समाज पार्टी को ऐसे तैयार किया था कि इसमें बहुजन समाज हमेशा सबसे ऊपर रहे.

शायद यही वजह है कि नेता बदलते रहते हैं और राजनैतिक दल चलता रहता है. मान्यवर कांशीराम यह भी कहा करते थे कि कोई किसी को नेता बना नहीं सकता, नेता खुद अपनी प्रतिभा से सामने आता है.

केरल के पहले दलित पुजारी को चाकू मारा

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बीजू नारायण

पलक्कड। देश के दक्षिण में दलितों और कट्टरवादी विचारधारा के विरोधियों पर हमले बढ़ते जा रहे हैं. दक्षिण भारत से ही धर्म और विचारधारा के नाम पर हिंसा का एक और मामला सामने आया है.

यहां आज केरल में एक दलित पुजारी बीजू नारायण को चाकू मार दिया गया. बीजू पर उनके घर के सामने चाकू से हमला किया गया, जिसमें वह बुरी तरह से घायल हो गए. बीजू की हालत फिलहाल स्थिर है, लेकिन इस घटना के बाद बीजू स्तब्ध हैं. धार्मिक कारणों से दलित समाज के किसी व्यक्ति पर हमला करने का इस साल का यह दूसरा मामला है.

पटेल लंबी के रहने वाले बीजू केरल के एक मंदिर के पुजारी थे. पुजारी बनने के लिए उन्होंने काफी मेहनत भी की थी. उन्होंने केरल के त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड से चारों वेदों का अध्ययन किया है. और ऐसा कर के पुजारी बनने वाले वो पहले दलित हैं. इसके बाद से ही वो कई रूढ़िवादी और हिंदुवादी संगठनों के निशाने पर थे.

मनुवादी विचारधारा को मानने वाले तमाम लोग इस बात से खफा थे कि एक दलित आखिर पुजारी कैसे बन गया. इसको लेकर एक खास वर्ग में काफी गुस्सा था. इस हमले से पहले बीजू को धमकियां भी मिल चुकी थी.

आंकड़ों की बात करें तो केरल में विचारधारा के चलते तेजी से हिंसा बढ़ी है. पिछले 17 सालों में वहां 172 से ज्यादा राजनीतिक कार्यकर्ताओं की हत्या हो चुकी है.

भारत की पहली अंतराष्ट्रीय फिल्म बनाएंगे विशाल भारद्वाज

फिल्मकार विशाल भारद्वाज ने मंगलवार को बताया कि वह अपनी आगामी फिल्म को लेकर उत्साहित होने के साथ-साथ घबराए हुए भी हैं. यह ‘जीरो डार्क थर्टी’ का प्रीक्वल है और अल कायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन पर लिखी पुस्तक ‘द एक्जाइल’ पर आधारित होगी. फिल्म का शीर्षक कथित तौर पर ‘ऐबटाबाद’ है और यह माना जाता है कि इसकी कहानी तोरा बोरा और एब्टाबाद में बिताए ओसामा के आखिरी दिनों पर आधारित होगी.

‘कमीने’ के निर्देशक ने ट्विटर पर कहा, “इस नए विषय पर काम को लेकर उत्साहित हूं लेकिन साथ ही घबराहट भी है और क्योंकि यह मेरे लिए पूरी तरह नई संस्कृतियों और भाषाओं की सबसे बड़ी चुनौती है.” भले ही ओसामा बिन लादेन प्राथमिक किरदारों में से एक होंगे, लेकिन इसकी कहानी इब्राहिम के परिप्रेक्ष्य से सुनाई जाएगी, जिसे कई वर्षो तक ओसामा की देखरेख और सुरक्षा के लिए रखा गया था.

 

विशाल भारद्वाज जंगली पिक्चर्स की सहभागिता में इसका सह-निर्माण और निर्देशन करेंगे. अगर फिल्म सफलतापूर्वक बनती है तो यह भारत की पहली अंतर्राष्ट्रीय फिल्म होगी. हालांकि, अभी टीम और कलाकारों का चयन नहीं किया गया है.

डाक विभाग ने निकाली 2,492 पदों की वैकेंसी, जल्‍द करें आवेदन

Chattisgarh Postal Circle में Gramin Dak Sevak के पदों के लिए नोटिफिकेशन जारी किया गया है. इस सरकारी नौकरी के लिए आवेदन करने से पहले रोजगार संबंधी सभी आवश्यक जानकारियां पढ़ लें, उसके बाद ही आवेदन करें. पद का नाम : Gramin Dak Sevak कुल पद की संख्या : 2492 योग्यता : इस भर्ती के लिए आवेदन करने वाले उम्मीदवार का 10वीं पास होना अनिवार्य है. उम्र : 18 से 40 साल के बीच होनी चाहिए. चुनाव प्रक्रिया : 10वीं कक्षा में प्राप्त अंकों के आधार पर चयन किया जाएगा. अंतिम तारीख : आवेदन करने की अंतिम तारीख 20 अक्टूबर 2017 है. कैसे करें आवेदन : आवेदन करने के लिए ऑफिशियल वेबसाइट indiapost.gov.in और appost.in/gdsonline पर जाएं.

दबंग दिल्ली vs पटना पाइरेट्स: पटना ने की 36-34 से जीत दर्ज

काफी प्रयास के बाद भी दंबग दिल्ली प्रो कबड्डी लीग (पीकेएल) के सीजन-5 में अपने घर में हार के सिलसिले को रोक न सकी। पटना पाइरेट्स ने मंगलवार को त्यागराज स्टेडियम में खेले गए मैच में दिल्ली को 36-34 से मात दी। पहले हाफ में पूरी तरह से पिछड़ने के बाद भी दिल्ली ने बेहतरीन वापसी की और पटना जैसी मजबूत टीम को परेशान कर दिया। एक समय स्कोर बराबरी पर था, लेकिन अंत के कुछ पलों में पटना के कप्तान प्रदीप नरवाल ने एक बार फिर बेहतरीन प्रदर्शन करते हुए दिल्ली को जीत से महरूम रखा। प्रदीप ने 14 अंक लिए।

पटना ने बेहतरीन शुरुआत की और चार मिनट के खेल में ही 11-0 की बढ़त ले ली। यहां से दिल्ली ने अपने आप को संभाला और अंक लेने शुरू किए। पहले हाफ के अंत तक दिल्ली 13-18 से पीछे थी।

दूसरे हाफ में मेजबान टीम ने बेहतरीन वापसी की 26वें मिनट में 24-23 से आगे निकल गई। हालांकि पटना ने फिर 27-24 से बढ़त ले ली थी। यहां से दोनों टीमों के बीच बेहतरीन मुकाबला देखा गया। 34वें मिनट में स्कोर 30-30 से बराबर था। अगले पल स्कोर 31-31 से बराबर हो गया। यहां से मैच कहीं भी जा सकता था, लेकिन प्रदीप ने अपनी टीम को हार का मुंह नहीं देखने दिया।

गुजरात में ये तीन युवा बिगाड़ सकते हैं भाजपा का सियासी गणित

Three young

अहमदाबाद। गुजरात विधानसभा चुनाव की सरगर्मियां तेज हो गई हैं. गुजरात की सत्ता पर दो दशक से काबिज बीजेपी के लिए इस बार राह आसान नहीं है. 23 सितंबर को संकल्प दिवस के सौ साल पूरा होने पर गुजरात के वडोदरा पहुंच कर मायावती ने जहां वहां के दलित समुदाय को उनके साथ होने का संकेत दे दिया है तो राहुल गांधी भी मोदी के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं.

लेकिन राजनैतिक दलों के अलावा तीन ऐसे युवा भी हैं जो मोदी और शाह की मुश्किल बढ़ा सकते हैं. इसमें पट्टीदार आंदोलन चलाने वाले हार्दिक पटेल हैं तो वहीं ऊना आंदोलन के बाद तेजी से चर्चा में आए जिग्नेश मेवाणी का नाम भी शामिल है. अल्पेश ठाकुर तीसरा ऐसा नाम है, जो भाजपा के वापस गुजरात की सत्ता में आने का रास्ता मुश्किल बना सकते हैं.

पटेल आरक्षण आंदोलन के जरिए हार्दिक पटेल को प्रदेश ही नहीं बल्कि देश में नई पहचान मिली. हार्दिक पटेल ने आंदोलन के जरिए गुजरात की तस्वीर को बदल कर रख दिया. गुजरात में पटेल समुदाय करीब 20 फीसदी हैं, जो सत्ता बनाने और बिगाड़ने की ताकत रखता है. सीटों की बात करें तो राज्य की 182 विधानसभा सीटों में से 70 सीटों पर पटेल समुदाय का प्रभाव है. पिछले दो दशक से राज्य का पटेल समुदाय बीजेपी का परम्परागत वोटर रहा है, जो फिलहाल नाराज माना जा रहा है.

इसी का नतीजा रहा कि 2015 में हुए जिला पंचायत चुनाव में सौराष्ट्र की 11 में से 8 पर कांग्रेस विजयी रही और बीजेपी को करारी हार का सामना करना पड़ा. विधानसभा चुनाव रहते बीजेपी पटेलों की नाराजगी को दूर नहीं किया तो जीत का सिलसिला जारी रखना आसान नहीं होगा. केशुभाई पटेल जैसे दिग्गज पटेल नेता भी पटेलों को भाजपा के खिलाफ करने में सहायक होंगे.

गुजरात में युवा दलित नेता के तौर पर जिग्नेश मेवाणी ने अपनी पहचान बनाई है. जिग्नेश पेशे से वकील और सामाजिक कार्यकर्ता हैं. मेवाणी ने ऊना में गोरक्षा के नाम पर दलितों की पिटाई के खिलाफ हुए आंदोलन का नेतृत्व किया था ‘आजादी कूच आंदोलन’ में जिग्नेश ने 20 हजार दलितों को एक साथ मरे जानवर न उठाने और मैला न ढोने की शपथ दिलाई थी. मेवाणी के उस आंदोलन से अब भी गुजरात के दलित जुड़े हुए हैं. इस आंदोलन को हर वर्ग का समर्थन मिला. ऊना आंदोलन में दलित मुस्लिम एकता का बेजोड़ नजारा देखा गया. सूबे में करीब 7 फीसदी दलित मतदाता हैं.

अल्पेश ने अन्य पिछड़ा वर्ग के 146 समुदायों को एकजुट करने का महत्वपूर्ण काम किया है. एक रैली के दौरान अल्पेश ने धमकी दी थी कि अगर पटेलों की मांगों के सामने बीजेपी शासित गुजरात सरकार ने घुटने टेके तो सरकार को उखाड़ फेंका जाएगा. अल्पेश लगातार बीजेपी को निशाने पर ले रहे हैं. अल्पेश ने गुजरात के करीब 80 देहात की विधानसभा सीटों पर बूथ स्तर पर प्रबंधन का काम किया है. माना जाता है कि उनके पास ओबीसी समाज का साथ है, जो कि गुजरात में 60 से ज्यादा सीटों पर अपना असर रखता है.

बिजली परियोजना के लिए तेलंगाना को मिलेंगे 4,009 करोड़ रुपये

सार्वजनिक क्षेत्र की पावर फाइनेंस कॉरपोरेशन (पीएफसी) ने तेलंगाना के नलगोंडा जिले में 4,000 मेगावाट क्षमता का बिजली संयंत्र स्थापित करने के लिए राज्य को 4,009 करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता देने की प्रतिबद्धता जताई है।

पीएफसी ने एक बयान में कहा कि उसने तेलंगाना पावर जेनरेशन कॉरपारेशन लि. (टीएसजीईएनसीओ) को 800-800 मेगावाट क्षमता की पांच इकाइयां लगाने के लिए 4009 करोड़ रुपये का मियादी कर्ज मंजूर किया है। कोयला आधारित याद्री तापीय बिजली संयंत्र तेलंगाना के नलगोंडा जिले में लगाया जाएगा। इसमें अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी यानी सुपर क्रिटिकल प्रौद्योगिकी का उपयोग होगा। याद्री तापीय बिजली संयंत्र 2978.4 करोड़ यूनिट बिजली पैदा करेगा और इससे भविष्य में तेलंगाना की बिजली जरूरतें पूरी होंगी।

परियोजना के लिए कर्ज को लेकर पीएफसी और टीएसजीईएनसीओ के अधिकारियों के बीच हाल ही में हैदराबाद में एक समझौता हुआ। इस मौके पर पीएफसी के चेयरमैन और प्रबंध निदेशक राजीव शर्मा, टीएसजीईएनसीओ के चेयरमैन और प्रबंध निदेशक डी प्रभाकर राव तथा अन्य अधिकारी मौजूद थे।

‘जातिवादी राम ने दलित ऋषि की हत्या की, गर्भवती पत्नी को जंगल भेजा’

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Shambuk yatra

बेंगलुरू। वारंगल में कांचा इलैया पर हमला होने के बाद, अब कन्नड़ के मशहूर लेखक हिंदूवादियों के निशाने पर है. कन्नड़ लेखक केएस भगवान ने कर्नाटक पुलिस से सुरक्षा की मांग की है.

दरअसल, केएस भगवान ने एक पब्लिक स्पीच में भगवान राम पर टिप्पणी की है. केएस भगवान ने कहा है राम कोई भगवान नहीं थे. वो सिर्फ एक इंसान थे जिनमें खूबियां थी. उन्होंने कहा कि राम ने सिर्फ 11 साल राज किया. जिसमें उन्होंने अपनी गर्भवती पत्नी को जंगल भेज दिया और दूसरा ब्राह्मण के कहने पर दलित शम्बुक की हत्या कर दी.

केएस भगवान ने राम को जातिवादी बताया. उन्होंने कहा कि राम ब्राह्मणों की पूजा करते थे. राम ने दलित की हत्या की थी. इसके बाद उन्होंने कहा कि गीता में जातिवाद की बात कही गई है. इसके बाद उन्होंने शंकराचार्य पर भी टिप्पणी की. इसके बाद उन्होंने राम मंदिर बनाए जाने की मांग पर सवाल खड़े करते हुए कहा कि ये लोगों को खुद सोचना चाहिए.

केएस भगवान ने कर्नाटक सरकार से सुरक्षा की मांग की है. के एस भगवान हिन्दू धर्म पर लिखते रहते हैं. वे अनुवादक और तर्कवादी माने जाते हैं. पुलिस उन पर पहले भी धार्मिक भावनाएं भड़काने का केस दर्ज कर चुकी है.

BHU आंदोलन का राजनीतिकरण छात्राओं के लिए अभिशाप

bhu protest

बीएचयू प्रकरण में न्‍यायिक जांच के आदेश से एक अध्‍याय समाप्‍त हो चुका है, कुछ बातें कही जानी चाहिए जो अब तक नहीं कही गई हैं. सबसे पहली बात उन लड़कियों के बारे में, जो वाकई अपनी सुरक्षा से खौफ़ज़दा थीं और धरने पर बिना किसी सियासी संगठन के उकसावे के बैठी थीं. अगर हम पूर्वांचल के समाज को थोड़ा भीतर तक समझते हों, तो हमें सबसे पहले इनकी चिंता होनी चाहिए. मुझे शक़ है कि छुट्टियों पर घर जाने के बाद ये अपनी पढ़ाई पहले की तरह जारी रख पाएंगी. अखबारों और चैनलों पर इनका चेहरा आने के बाद माता-पिता और परिवार का जो दबाव इन्‍हें झेलना होगा, उसकी कल्‍पना हम-आप सहज नहीं कर सकते. इस लिहाज से देखें तो एक शांतिपूर्ण धरने को अचानक इतनी हाइप मिलना और इसका राजनीतिकरण कई लड़कियों के लिए अभिशाप बनकर उभरेगा.

दूसरी बात, चूंकि विश्‍वविद्यालय में नियुक्तियों को लेकर बीते दो साल से ठाकुर बनाम ब्राह्मण की लड़ाई चल रही थी और इसे तानने का एक बहाना खोजा जा रहा था, सो जिन लोगों ने भी छात्रा सुरक्षा की घटना का इस्‍तेमाल अपने बिरादरी के हित में करने की कोशिश की है उन्‍होंने प्रकारांतर से परिसर का नुकसान किया है. इसमें उन छात्र-छात्राओं का भी पर्याप्‍त हाथ है जो लगातार सुरक्षा के नाम पर हुए धरने को अराजनीतिक बता रहे थे, लेकिन मूल में वे सब अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़े हुए थे. एबीवीपी की छात्रा की अगुवाई में शुरू किया धरना आखिर अराजनीतिक कैसे हो सकता है, यह बात भी सोची जानी चाहिए.

तीसरी बात उन संगठनों और लोगों की जो बीएचयू के मामले को बनारस से आगे ले गए हैं. इनमें ज्‍यादातर नागरिक समाज के संगठन, वामपंथी छात्र संगठन और दिल्‍ली के पेशेवर आंदोलनकारी लोग हैं. इन लोगों को किसी भी संघर्ष में हाथ डालने से पहले आंदोलनों की स्‍थानीय प्रकृति और अंतर्विरोधों को समझना चाहिए. किसी आंदोलन का व्‍यापक हो जाना अच्‍छी बात हो सकती है, लेकिन यह ध्‍यान रखा जाना चाहिए कि आंदोलनकारी ताकतें अनजाने में किसी दूसरे के पाले में न खेलने लग जाएं. मुझे लगता है कि दो दिन जबान बंद रखने के बाद अचानक चैनलों पर नमूदार हुए कुलपति ने एक झटके में आंदोलनकारी लोगों, संगठनों और मीडिया को अपने एजेंडे का हिस्‍सा बना लिया है. अगर कुलपति जाते भी हैं, तो यह आरएसएस के भीतर ठाकुर लॉबी की जीत होगी. ऐसे में वाम संगठनों की भूमिका बेगानी शादी में अब्‍दुल्‍ला दीवाने से ज्‍यादा की नहीं रह जाएगी.

बीएचयू एक विशाल ब्‍लैक होल है. यहां उठा आंदोलन उस ब्‍लैक होल से निकला था और एक झटके में उसी में समा गया. बीच के वक्‍फ़े में उसे हाइजैक करने की बहुत सारी कोशिशें हुई हैं. इससे किसी का वास्‍तव में भला नहीं हुआ है. हां, नुकसान बेशक होगा. उन्‍हीं लड़कियों का, जिन्‍होंने ईमानदारी से अपनी आवाज़ उठायी थी. दिल्‍लीवाले इस बात को कभी नहीं समझेंगे क्‍योंकि उन्‍हें हर नए नारे में सत्‍ता परिवर्तन का अक्‍स ही दिखता है. बनारस को अगर दिल्‍ली के आधुनिक मूल्‍य समझने की ज़रूरत है, तो दिल्‍ली के लोगों को भी बनारस के पारंपरिक समाज को समझना होगा. बनारस जैसा ठहरा हुआ समाज धीरे-धीरे बदलता है. इसे धीरे-धीरे अपनी गति से ही बदलने दें, तो बेहतर.

– यह लेख अभिषेक श्रीवास्तव ने लिखा है. लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.

मनमोहन सिंह ने खोला था विदेशी निवेश का रास्ता

Manmohan Singh

मेरे जवाब से बेहतर है मेरी खामोशी, न जाने कितने सवालों की आबरू रख ली। 27 अप्रैल, 2012 को संसद में उस वक्त के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने ये शेर पढ़ा था. उन दिनों यूपीए सरकार हर मोर्चे पर फेल हो रही थी. घोटाले पर घोटाले उजागर हो रहे थे, विपक्ष मनमोहन सिंह को बार-बार बोलने के लिए उकसा रहा था, उनकी चुप्पी पर सवाल उठ रहे थे, उन्हें ‘मौन’मोहन सिंह का खिताब दिया जा रहा था. फिर भी इस सरदार की चुप्पी नहीं टूटी. जब टूटी तो वही शेर पढ़ा, जो मैंने ऊपर लिखा है.

मनमोहन सिंह जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी के बाद देश में सबसे ज्यादा वक्त तक प्रधानमंत्री रहे. देश के सबसे ताकतवर पद पर रहे, लेकिन कमजोर प्रधानमंत्री के तौर पर सबसे ज्यादा बदनाम भी हुए. एक ऐसे प्रधानमंत्री, जिनकी खामोशी को विपक्ष ने चुनावों में मुद्दा तक बना लिया. पहली बार ऐसा हुआ कि प्रधानमंत्री कार्यालय को बाकायदा प्रेस कान्फ्रेंस करके बताना पड़ा कि प्रधानमंत्री रहते हुए मनमोहन सिंह ने कितनी बार चुप्पी तोड़ी है.

मनमोहन सिंह न तो कभी राजनीति में रहे और न ही राजनीति से उनका कोई खास लेना-देना रहा. हालात की मजबूरियों ने उन्हें प्रधानमंत्री पद तक पहुंचाया तो मजबूर और कमजोर प्रधानमंत्री का तमगा उनके नाम के आगे से बीजेपी ने कभी हटने नहीं दिया.

दस साल की सत्ता में मनमोहन सिंह ने बहुत कुछ देखा. देश को विकास की राह पर चलते देखा तो अपनी ही सरकार को भ्रष्टाचार की गर्त में जाते देखा. कॉमनवेल्थ गेम में करोड़ों का वारा न्यारा करने वाला कलमाड़ी देखा तो किसी राजा का अरबों का टूजी घोटाला देखा. ‘कोयले’ की कालिख ने तो मनमोहन सिंह का भी दामन मैला कर दिया.

तो क्या भारत के राजनीतिक इतिहास में मनमोहन सिंह को सबसे मजबूर और कमजोर प्रधानमंत्री के तौर पर आंका जाएगा? क्या सबसे भ्रष्टाचारी सरकार चलाने वाले प्रधानमंत्री के तौर पर याद किए जाएंगे? क्या रिमोट कंट्रोल से चलने प्रधानमंत्री के तौर पर इतिहास याद करेगा मनमोहन सिंह को? ये सवाल मनमोहन सिंह को भी भीतर से चाल रहे थे. तभी तो सत्ता के आखिरी दिनों में उन्होंने कहा था-मुझे उम्मीद है कि इतिहास उदारता के साथ मेरा मूल्यांकन करेगा.

मनमोहन में काबीलियत की कमी नहीं थी. उनकी ईमानदारी को लेकर कभी कोई सवाल नहीं उठा. उनके कमिटमेंट पर कोई सवाल नहीं उठा. मनमोहन सिंह, जो रिजर्व बैंक के गवर्नर रहे, चंद्रशेखर ने जिन्हें प्रधानमंत्री बनने के बाद अपना वित्तीय सलाहकार बनाया. राजीव गांधी ने जिन्हें प्लानिंग कमीशन का उपाध्यक्ष बनाया, नरसिंह राव ने जिन्हें बुलाकर देश का वित्तमंत्री बनाया था.

दरअसल नरसिंह राव कुशल कप्तान थे, मनमोहन सिंह उनकी टीम के ‘सचिन तेंदुलकर थे’. वो 1991 का साल था, जब मनमोहन सिंह देश के वित्त मंत्री बने थे. तब अर्थव्यवस्था गर्त में जा रही थी. देश का सोना गिरवी रखने की नौबत आ चुकी थी. महंगाई चरम सीमा पर थी. मनमोहन ने जब आर्थिक सुधारों की छड़ी घुमाई तो कायापलट होने लगा. विपक्ष मनमोहन पर सवालों की बारिश कर रहा था, लेकिन मनमोहन के सिर पर छतरी ताने नरसिंह राव खड़े थे. मनमोहन सिंह ने विदेशी निवेश का रास्ता खोल दिया था. जिस तरह से आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खोल रहे हैं. नतीजा ये हुआ कि आर्थिक सुधार रंग लाने लगे. देश का गिरवी रखा सोना भी वापस आया. अर्थव्यवस्था भी पटरी पर लौटी. 1991-92 में जो जीडीपी ग्रोथ सिर्फ 1.3 थी, वो 1992-93 में 5.1 और 1994-95 तक 7.3 हो गई. उदारीकरण के चलते इन्फार्मेशन टेक्लनोलॉजी और टेलिकॉम सेक्टर में क्रांति हुई और उन दिनों इस क्षेत्र में करीब 1 करोड़ लोगों को रोजगार मिला. ये मनमोहन सिंह की बतौर खिलाड़ी जीत थी तो उससे बड़ी जीत नरसिंह राव की कप्तानी की भी थी.

2004 में मनमोहन सिंह जब खुद कप्तान (प्रधानमंत्री) बने तो पहले पांच साल उनकी सरकार बड़े मजे में चली. कई मोर्चे फतेह किए, सड़कें बनीं, अर्थव्यवस्था को पंख लगे, जीडीपी ग्रोथ 8.1 तक पहुंची. मनमोहन सरकार ने सूचना का अधिकार देकर जनता के हाथों में एक बहुत बड़ी ताकत थमाई. लालकृष्ण आडवाणी शेरवानी पहने खड़े रह गए, 2009 में देश की जनता ने फिर मनमोहन को सत्ता के सिंहासन पर बिठा दिया. ये मनमोहन सिंह के काम का इनाम था. लेकिन दूसरी पारी में मनमोहन न खुद संभल पाए और न सरकार संभाल पाए. बस रिमोट कंट्रोल पीएम बनकर रह गए.

यूपीए-1 में मनमोहन सिंह ने जितना कमाया था, यूपीए-2 में सब गंवा दिया. घोटालों की झड़ी लग गई, महंगाई आसमान छूने लगी. पाकिस्तानी सैनिक हमारे सैनिकों के सिर तक काट ले गए. चीन भारत की सीमा में कई बार घुस आया. मनमोहन सिंह की कई बार कांग्रेस के भीतर भी बेइज्जती हुई, लेकिन उन्होंने इस्तीफा नहीं दिया, बाकायदा पद पर बने रहकर वफादारी की कीमत चुकाई. तमाम आरोपों का ठीकरा उनके सिर फोड़ा गया, वे खामोश रहे. ये मनमोहन सिंह की चुप्पी नहीं थी, वे चुपचाप सत्ता का ‘विष’ पी रहे थे. जुबान खोलते तो उनके ही आसपास के कई खद्दरधारी जेल में होते, चुप रहे, बहुतों की इज्जत बचा ली.

मनमोहन सिंह बद नहीं थे, लेकिन बदनाम ज्यादा हो गए. मनमोहन सिंह की जिंदगी नाकामियों और कामयाबियों की दास्तानों से भरी पड़ी है. इतिहास भी उन पर फैसला करने में हमेशा कश्मकश में रहेगा. उनकी आलोचना तो हो सकती है, लेकिन उन्हें नजरअंदाज करना उनके साथ बेईमानी होगी.

– यह लेख विकास मिश्रा ने लिखा है. लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े हैं.