बहुजन आरक्षण की वकालत नहीं करती मीडिया

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आरक्षण एक संवैधानिक व्यवस्था है, जो देश और समाज में हाशिये पर सदियों से रहे अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़ी जाति यानी बहुजन को मुख्यधारा में लाने की पहल है. इस पहल को दिव्ज समाज ने आज तक स्वीकार नहीं किया है. वह इसे समाज में खटास उत्पन्न का दोषी मानता है और आरक्षण के लिए जातिगत आधार को खरिज कर, आर्थिक आधार को लागू करने की वकालत करता रहता है. आरक्षण से दलितों की दूसरी पीढ़ी उच्च संस्थानों में आने लगी है, तो कुतर्क किया जा रहा है कि ये गरीब दलितों का आरक्षण हड़प रहे हैं. बात यहीं खत्म नहीं होती बल्कि योग्यता और अयोग्ता का सवाल भी खड़ा कर आरक्षण व्यवस्था को सवालों के घेरे में लेने की साजिश रची जा रही है. ऐसे में आरक्षण के सवाल पर भारतीय मीडिया बहुजन के साथ खड़ा नहीं दिखता है. देखा जाये तो यह आरक्षण के समर्थन में कम बल्कि विरोध में ज्यादा खड़ा रहता है. मंडल कमीशन के लागू होने के दौरान इसका चरित्र सब के सामने उजागर हो चुका है.

भारतीय प्रारूप संविधान कि धारा 10 में अनुसूचित जाति, जनजाति को नौकरियों में आरक्षण का प्रावधान है. तो वहीं, धारा 10संशोधन में पिछडों को शामिल किया गया है. बहुजन के लिए आरक्षण एक संवैधानिक व्यवस्था है ताकि समाज में जो गैरबराबरी है उसे पाटा जा सके. लेकिन, आरक्षण के विरोधी इसे स्वीकार नहीं करते हैं और समय समय पर आरक्षण के खिलाफ आंदोलन करते रहते हैं. इसमें मीडिया की भूमिका चाहे वह प्रिंट हो या इलेक्ट्रोनिक उनके साथ खड़ा रहता है. आरक्षण का विरोध करने वाले के साथ मीडिया का खड़ा होना उसके चरित्र को उजागर करता दिखता है. वहीं आरक्षण के समर्थन में खड़े रहने वाले के पक्ष में मीडिया तब तक खड़ा नहीं होता जब तक कोई बड़ी घटना न हो जाये. यह भारतीय मीडिया का दिव्ज प्रेम साबित करता है. भारतीय संविधान ने आरक्षण को लेकर जो हक बहुजन को दिया है उसे नकारा नहीं जा सकता है.

देखा जाये तो शुरू से ही मीडिया का साथबहुजन को नहीं मिला है. तमाम व्यवस्था के बीच अभी भी सरकारी सेवा में बहुजन, दिव्जों की तुलना में आधे भी नहीं है. खासकर शीर्ष पद पर तो बराबरी बिलकुल नहीं है. जब-जब आरक्षण का सवाल सामने आता है. आर्थिक आरक्षण का हवाला दिया जाने लगता है. संगठन, इस दिशा में सक्रिय हो जाते है. वहीं, कुछ दिव्ज जातियां अपने को आरक्षण पाने के लिए बहुजन में शामिल करने को लेकर गाहे-बगाहे आंदोलन कर दबाव की राजनीति करती हैं. प्रिंट औरइलैक्ट्रोनिक मीडिया उनका साथ भी देती है, उनके आंदोलन एवं मांग की खबरों सेमीडिया पट जाती है. इसकी वजह साफ है. प्रिंट और इलैक्ट्रोनिक मीडिया पर दिव्जों का काबिज होना. 2006 में भारतीय मीडिया के राष्ट्रीय सर्वे में साफ हो चुका है कि मीडिया के र्शीष पदों पर दिव्जों का कब्जा है. बहुजन की भागीदारी मीडिया में नहीं के बराबर है. जो भी है वे शीर्ष पद यानी फैसले लेने वाले पद पर नहीं है. ऐसे में तस्वीर साफ है कि प्रिंट और इलैक्ट्रोनिक मीडिया पर काबिज दिव्ज आपकी बातों की वकालत क्यों करें? वकालत वह अपनी कौम की करती है. अगर जगह दी भी तो अंदर के पेज में ऐसी जगह लगा देंगे कि ढूंढते रह जायेंगे. यहीं हाल इलैक्ट्रोनिक मीडिया का है. प्राइम टाइम में नहीं दिखाकर ऑड टाइम में दिखा देंगे.

देखा जाये तो पूरे मसले को प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया चीजों को भ्रम की स्थिति में पहुंचाने की पुरजोर कोशिश करती है. आरक्षण के विरोध में पहलुओं को खोजकर उस पर गल थोथरी करती है और अंत में आर्थिक पक्ष को रख बहस को संवेदनशील बनाते हुए जहर उगलने लगती है. जबकि, आरक्षण के संवैधानिक पक्ष पर चुप्पी साध लेती है. बराबरी एवं गैर बराबरी तथा सदियों से हाशिये पर रहे बहुजनों की स्थिति उन्हें नहीं दिखती है. इस बात पर बात नहीं होती कि आरक्षण का प्रावधान आर्थिक लाभ पहुंचाना नहीं है बल्कि मसला बराबरी में लाते हुए मुख्यधारा से जोड़ना है. आरक्षण का विरोध करने के पीछे मीडिया का चेहरा साफ है. आरक्षण की जरूरतों पर बात नहीं होती है. बल्कि मिल रहे आरक्षण पर सवाल खड़े किये जाते हैं कि अगर कोई बहुजन संपन्न है तो उसे इसका लाभ न दिया जाये. ऊपर से राजनीति का भी सहारा उसे मिल जाता है. आरक्षण की वकालत नहीं करने वाले प्रिंट और इलैक्ट्रोनिक मीडिया को उस समय बल मिल जाता है, जब कोई बहुजन नेता किसी समारोह में आर्थिक आरक्षण के प्रावधानों का समर्थन कर देता है. यहां नाम देने की जरूरत नहीं कई बहुजन नेताओं का बयान या संबोधन प्रिंट और इलैक्ट्रोनिक मीडिया पर आ चुका है. मीडिया ने उसे हाथों-हाथ लेते हुए स्थापित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. ऐसी खबरों को लीड बनाया जाता है. वहीं, आरक्षण की वकालत में लीड क्या, खबर न्यूज रूम तक जा ही नहीं पाती है.

बहुजनों को आरक्षण क्यों के, प्रावधानों में सकारात्मक प़क्ष की जगह नकारात्मक पहलू देखने को मिलता है. इन सबके पीछे मीडिया का बहुजन के खिलाफ बने मांइडसेट है. तभी तो सूचना के अधिकार से बहुजन आरक्षण के खुलासे ये मुंह छुपातें हैं. आंकड़े बताते हैं कि अभी बहुजन बहुत पीछे हैं. आरटीआई से चैंकाने वाली जानकारी मिली है. केन्द्रीय मंत्रालयों में अवर सचिव से लेकर सचिव स्तर तक सिर्फ 5.40 फीसदी पिछड़ा और 8.63 फीसदी अनुसूचित जाति वर्ग के लोग ही पहुंच पाए हैं. जबकि सामान्य वर्ग से करीब 82 फीसदी लोग कार्यरत हैं.

आरटीआईकार्यकर्ता महेन्द्र प्रताप सिंह ने कार्मिक एवंप्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) में सामान्य, पिछड़ा, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग के ग्रुप ‘ए’ अधिकारियों की संख्या की जानकारी मांगी थी. सितंबर 2016 में डीओपीटी ने केन्द्रीय मंत्रालय के अवर सचिव, उप निदेशक, निदेशक, संयुक्तसचिव, अतिरिक्त सचिव और सचिव या इसके समकक्ष पदों की सूची आरटीआई के जवाब में दी.

आरटीआई दस्तावेजों के मुताबिक ओबीसी वर्ग का एक भी अधिकारी केन्द्रीय मंत्रालयों के सबसे बड़े पद सचिव व अतिरिक्त सचिव नहीं है. जबकि सचिव पद पर सामान्य वर्ग के 110 और एससी वर्ग के सिर्फ दो अधिकारी ही कार्यरत हैं. वहीं अतिरिक्त सचिव पद पर 106 अधिकारी सामान्य, पांच-पांच अधिकारी एससी और एसटी वर्ग के अधिकारी हैं. उधर, अवरसचिव स्तर के पदों पर 184 अधिकारीसामान्य वर्ग, सिर्फ अधिकारी ओबीसी वर्ग, 22 अधिकारी एससी वर्ग और 19अधिकारी एसटी वर्ग के अधिकारी कार्यरत हैं. (संदर्भ-http://hindi.siasat.com/news/rtiRTI से ख़ुलासा, सिर्फ 13 फीसदी दलित-पिछड़े केन्द्रीय मंत्रालयों में उच्च पदों पर January 22, 2017 Election 2017, India, Uttar Pradesh) .

आरक्षण के सच को मुख्य मीडिया सामने नहीं लाती है. जो भी सच है वह सोशल या वेब मीडिया पर देखा जा सकता है. सूचना के अधिकार से आरक्षण की जो तस्वीर सामने आई है, वह एक आइना है. आरक्षण का विरोध करने वालों को दिखता है लेकिन वे देखना नहीं चाहते. जब सवाल उठने लगते हैं तो विरोध शुरू हो जाता है. आर्थिक आधार सहित कई तरह के आरोप-प्रत्यारोप मीडिया के माध्यम से आने लगते हैं ऊपर से राजनीतिक हवा भी साथ दे जाती है. देखा जाये तो मीडिया गैरबराबरी के फासले को मिटाने के लिए कोई पहल करती नहीं दिखाती है. जिस तरह से अमेरिकन मीडिया में अश्वेतों को प्रवेश देने के लिए विशेष अभियान चलाया गया और आज वहां की तस्वीर बदल चुकी है. लेकिन भारत में यह पहल क्यों नहीं दिखती? जरूरत है एक बड़े बदलाव की जो समाज को बराबर करें.

(संजय कुमार, मो-9934293148, लेखक वरिष्ठ पत्रकार है सामाजिक मुद्दों पर लिखते हैं.)

उना कांड का दर्द नहीं भूले हैं दलित

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नई दिल्ली। 11 जुलाई 2016 को गुजरात के उना में कथित गौरक्षकों द्वारा दलितों पर किए गए हमले का प्रकरण विधानसभा चुनाव से पहले एक बार फिर जीवित हो उठा है. इस मामले को लेकर आंदोलन करने वाले दलित नेता जिग्नेश मेवाणी ने निर्दलीय चुनाव लड़ने का फैसला करके इस कांड को फिर से जनता के जेहन में ताजा कर दिया है. वैसे उना के लोग आज भी उस घटना को भूले नहीं हैं.

उना कांड के बाद चर्चा में आए दलित विचार मंच के जिग्नेश मेवाणी को उना के ये दलित अपना हीरो मान रहे हैं. पूरे गुजरात में दलित समुदाय का वोटिंग प्रतिशत महज सात फीसदी है जो राष्ट्रीय औसत से करीब आधी है. देश भर में दलितों का वोटिंग प्रतिशत 16 फीसदी है. मेवाणी को कांग्रेस और आप ने समर्थन दकर ऐलान कर ही दिया है.

नहीं मिला है अब तक न्याय वसराम सरवैया कहते हैं कि हमें अब तक न्याय नहीं मिला. इनकी नाराजगी उन राजनेताओं से भी है जो घटना के बाद इनके यहां आए. इनके दुख-दर्द को बांटने का भरोसा भी दिया लेकिन अब तक कुछ नहीं हुआ. वसराम सरवैया का कहना है ‘उस घटना के बाद हमारे घर राहुल गांधी भी आए, दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल भी आए और जब विपक्ष की तरफ से दबाव बढ़ा तो तत्कालीन मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल भी आईं. वसराम की शिकायत है कि आनंदीबेन ने उस वक्त जमीन और रोजगार के साधन मुहैया करने का वादा किया था. अब तो एक साल से भी ज्यादा हो गए उन्हें कुछ नहीं मिला.

क्या हुआ था उस दिन उना के मोटा समढियाला गांव के वसराम सरवैया के लिए 11 जुलाई 2016 की सुबह जिंदगी की सबसे काली सुबह साबित हुई. दलित वसराम के पास सुबह सात बजे ही बगल के गांव से फोन आया कि उनकी गाय को शेर ने मार दिया है. पुश्तैनी काम करने वाले वसराम सरवैया अपने तीन भाइयों के साथ उस जगह पहुंच गए और फिर मरी हुई गाय का चमड़ा निकालने का काम करने लगे. तभी 40 से 50 की तादाद में गौरक्षकों की एक टोली पहुंची और इन सबकी पिटाई शुरू कर दी. हालत इतनी खराब थी कि इन्हें उना सिविल अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा और फिर राजकोट ले जाया गया.

जिग्नेश मेवाणी के खिलाफ जारी हुआ गैर जमानती वारंट

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अहमदाबाद। गुजरात विधानसभा चुनाव को लेकर जारी सियासी घमासान के बीच अहमदाबाद की एक अदालत ने दलित नेता जिग्नेश मेवाणी के खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी किया है. जनवरी में एक विरोध प्रदर्शन के दौरान दिल्ली जा रही राजधानी एक्सप्रेस को रोकने को लेकर उनके खिलाफ दर्ज एक मामले की सुनवाई के लिए पेश नहीं होने को लेकर अदालत ने यह वारंट जारी किया.

समाचार एजेंसी भाषा के मुताबिक सोमवार को अतिरिक्त मुख्य मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट आरएस लंगा ने अदालत के समक्ष पेश नहीं होने को लेकर मेवाणी और 12 अन्य लोगों के खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी किया.

11 जनवरी को वाइब्रेंट गुजरात शिखर सम्मेलन के खिलाफ एक ‘रेल रोको’ विरोध प्रदर्शन के दौरान अहमदाबाद रेलवे स्टेशन पर राजधानी एक्सप्रेस को काफी देर तक रोकने के आरोप में मेवाणी और उनके समर्थकों को गिरफ्तार किया गया था. उनके खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 143 (गैर-कानूनी सभा करने), 147 (दंगा) और भारतीय रेल अधिनियम की संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया था.

इस मामले में एक आरोप पत्र भी दायर किया गया था. मेवाणी के वकील शमशाद पठान ने अपने मुवक्किल को पेशी से छूट दिए जाने की मांग को लेकर अदालत में आवेदन दिया था, जिस पर सोमवार को मजिस्ट्रेट ने विचार करने से मना कर दिया. पठान ने इस आधार पर छूट की मांग की थी कि उनका मुवक्किल वडगाम विधानसभा सीट से निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर नामांकन पत्र भरने में व्यस्त था.

जिग्नेश मेवाणी लगातार दूसरी बार अदालत के समक्ष पेश नहीं हो पाए. सोमवार को उन्होंने गुजरात विधानसभा चुनाव में बनासकांठा के वडगाम से निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर उतरने की घोषणा की थी. वहीं, मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने परोक्ष रूप से उनका समर्थन करते हुए वहां से अपना उम्मीदवार नहीं उतारने का फैसला किया है.

UP निकाय चुनाव: बाराबंकी में पुलिस ने पोलिंग एजेंटों पर चलाई लाठियां

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लखनऊ। उत्तर प्रदेश निकाय चुनाव में बुधवार को आखिरी चरण के 26 जिलों में वोटिंग शुरू हो गई है. तीसरे चरण के इस मतदान में राज्य की 5 नगर निगम सीटों पर भी वोट डाले जा रहे हैं. इस बीच बाराबंकी में पुलिस ने पोलिंग एजेंटों पर लाठियां भांजी हैं.

यूपी के बाराबंकी में आज पुलिस का रोद्र रूप देखने को मिला. यहां पीर बतावान वार्ड नंबर 26 में पुलिस ने मतदाताओं पर लाठियां भांजी और कई कुर्सियों को तोड़ दिया. दरअसल, सुबह पोलिंग एजेंट अपनी कुर्सियां लगाए बैठे थे तभी पुलिस बल ने उनको बिना चेतावनी दिए दौड़ा-दौड़ा कर पीट दिया. जिससे मतदाताओं में आक्रोश व्याप्त है. बाराबंकी के टिकैतनगर नगर पंचायत में एसडीएम ने दो पोलिंग एजेंट को प्रचार सामग्री के साथ पकड़ा है, उन्हें थाना भेज दिया गया है. इसके अलावा 5 लोगों को गिरफ्तार किया गया है.

जनता ने पुलिस और प्रशासन के खिलाफ जमकर नारेबाजी की. वहीं आक्रोशित मतदाताओं का कहना है हम लोग बूथ से 200 मीटर दूर बैठे थे तभी पुलिस ने हम लोगों के ऊपर लाठियां चला कर कुर्सियां तोड़ डालीं. अब मतदाता घर से नहीं निकल रहे हैं.

इनमें सहारनपुर, बरेली, झांसी, मुरादाबाद और फिरोजाबाद शामिल हैं. आज होने वाले मतदान में कुल 233 नगर निकायों और 4299 वार्डों में 3599 पोलिंग सेंटर और 10817 पोलिंग बूथों पर 90 हजार से ज्यादा मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे.

राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरनाक है ये 42 मोबाइल एप्स

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नई दिल्ली। खुफिया एजेंसियों की एलर्ट के बाद गृह मंत्रालय ने भारत-चीन सीमा पर तैनात जवानों को अपने मोबाइल से एप्लीकेशन डिलीट करने के लिए कहा है. जानकारी के मुताबिक ऐसे 42 मोबाइल एप की एक लिस्ट जारी की गई है जो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा हो सकता है. इन एप्स को इस्तेमाल न करने के लिए एक एडवाइजरी भी जारी की गई है.

इन मोबाइल एप में वेब चैट, ट्रूकॉलर, यूसी ब्राउजर, यूसी न्यूज जैसे एप शामिल हैं, आशंका जताई जा रही है कि जवानों के मोबाइल में यह एप होने से खुफिया जानकारी लीक हो सकती है और जासूसी के लिए इनका इस्तेमाल किया जा सकता है. जानकारी के मुताबिक यह एप चीनी डेवलपर्स ने तैयार किए हैं.

एडवाइजरी के मुताबिक मोबाइल में पहले से ही डाउनलोड एप्लीकेशन का प्रयोग न करने और ऐसे एप को तुरंत अनइंस्टॉल कर मोबाइल से फॉर्मेट करने के लिए कहा गया है. सेना के अलावा लद्दाख से अरुणाचल तक फैली 4 हजार किमी की सीमा पर ITBP जैसे केंद्रीय पुलिस बल के जवान भी तैनात हैं. इन जवनों को पहले में साइबर सुरक्षा से जुड़े निर्दश दिए जाते रहे हैं.

ये हैं वो खतरनाक ऐप्स

40 एप्स की जो सूची जारी की है, उनमें वीबो, वीचैट, शेयरइट, ट्रूकालर, यूसी न्यूज, यूसी ब्राउसर, ब्यूटी प्लस, न्यूजडोग, वीवा वीडियो-क्यू वीडियो, आईएनसी, पैरालल स्पेश, अपुस ब्राउसर, परफेक्ट कार्प, वायरस क्लीनर-हाई सिक्योरिटी लैब, सीएम ब्राउसर, एमआई कम्युनिटी, डयू रिकॉर्डर, वाल्ट हाइड, यूकैम मेकअप, एमआई स्टोर, कैचक्लीनर डयू एप्स, डयू बैटरी सेवर, डयू क्लीनर, डयू प्राइवेसी, 360 सिक्योरिटी, डयू ब्राउसर, क्लीन मास्टर-चीता मोबाइल, बैडू ट्रांसलेट, बैडू एप, वंडर कैमरा, ईएस फाइल एक्सप्लोरर, फोटो वंडर, क्यूक्यू इंटरनेशनल, क्यूक्यू म्यूजिक, क्यूक्यू मेल, क्यूक्यू प्लेयर, क्यूक्यू न्यूजफीड, क्यूक्यू सिक्योरिटी, सेल्फी सिटी, मेल मास्टर, एमआई वीडियो कॉल और क्यूक्यू लांचर शामिल हैं।

राजस्थान के हॉस्टलों में अनिवार्य हुआ राष्ट्रगान

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जयपुर। राजस्थान के समाज कल्याण विभाग ने सभी राज्य के छात्रावासों में सुबह राष्ट्रगान को अनिवार्य कर दिया है. राज्य के समाज कल्याण विभाग की ओर से जारी आदेश में लिखा है कि विभाग के सभी 789 छात्रावासों में सुबह सात बजे राष्ट्रगान गाया जाएगा. समाज कल्याण विभाग राज्य में ओबीसी, एससी और एसटी का छात्रावास संचालित करता है.

विभाग के प्रधान सचिव समित शर्मा का कहना है कि ये पहले से होता रहा है लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इसमें सिथिलता आ गई थी जिसकी वजह से दोबारा आदेश निकालना पड़ा है. इसे रोजाना गाने के लिए ही आदेश निकाला गया है. गौरतलब है कि पिछली वसुंधरा सरकार के दौरान समाज कल्याण विभाग के सभी दफ्तरों में खाने से पहले भोजन मंत्र पढ़ना जरूरी किया गया था.

आदेश के मुताबिक बच्चों में राष्ट्र के प्रति देशभक्ति का जज़्बा जगाने के लिए यह कदम उठाया गया है. विभाग के निदेशक समित शर्मा ने बताया कि आवासीय विद्यालयों में राष्ट्रगान गाया जाता है, अब इस परम्परा को छात्रावासों में भी शुरू किया गया है. पिछले दिनों कई राज्यों में राष्ट्रगान को लेकर बहस हो चुकी है.

जयपुर के मेयर अशोक लाहोटी ने भी नगर निगम के दफ्तर में सुबह राष्ट्रगान और शाम को वंदेमातरम गाना अनिवार्य कर दिया था. इसके बाद राजस्थान यूथ बोर्ड ने सवाई मान सिंह स्टेडियम में राष्ट्रगीत कार्यक्रम का आयोजन किया था, इस कार्यक्रम में मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे भी शामिल हुईं थीं.

दरिंदगी की सारी हद पार, 12 साल की दलित बच्ची का किया बलात्कार

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झालावाड़। भारत में दलित चेतना के नवउभार के बीच दलितों पर अत्याचार के आंकड़े भी भयावह तेजी से बढ़े हैं. बात सिर्फ प्रगति और जागरूकता की होती तो दलितों के खिलाफ हिंसा का ग्राफ कम होना चाहिए था, लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है.

राजस्थान के झालावाड़ जिले में 12 वर्षीय एक दलित बच्ची का उसके पड़ोसी द्वारा कथित रूप  से अपहरण और बलात्कार किए जाने का मामला सामने आया है. खानपुर पुलिस थाने में उपनिरीक्षक सुरेंद्र सिंह ने सोमवार को बताया कि छठी कक्षा की छात्रा खानपुर कस्बे के तैलियो का मोहल्ला की निवासी है. बच्ची जब रविवार को अपने घर के बाहर खेल रही थी, तभी विजय सिंह (22) ने उसका कथित अपहरण कर लिया. उन्होंने बताया कि आरोपी अपराध करने के बाद कस्बे से फरार हो गया.

अधिकारी ने बताया कि बच्ची के माता-पिता दिहाड़ी पर काम करने वाले श्रमिक हैं. वे काम पर गए थे इसलिए बच्ची उस समय अकेली थी. आरोपी जन्मदिन की एक पार्टी में ले जाने का बहाना बनाकर उसे अपनी मोटरसाइकिल पर बैठाकर ले गया. उन्होंने बताया कि पीड़िता ने अपने माता-पिता को आप बीती सुनाई जिसके बाद आरोपी के खिलाफ मामला दर्ज किया गया. अधिकारी ने बताया कि इस बीच पीड़िता और उसके माता पिता को सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) ले जा रही खानपुर पुलिस थाने की पुलिस वैन सोमवार को पलट गई.

पुलिस अधीक्षक झालावाड़ आनंद शर्मा का कहना है कि पीडि़ता के थाने पहुंचते ही हैड कांस्टेबल ने रिपोर्ट लिखाने को कहा. लड़का पुलिस में कार्यरत लांगरी का पुत्र है. उसे गिरफ्तार कर लिया गया. वाहन चालक के शराब सेवन की बात सामने आई है. उसे लाइन हाजिर कर पुलिस उपअधीक्षक को जांच के आदेश दे दिए हैं. डयूटी अफसर पर भी कार्रवाई की जाएगी.

जिग्नेश मेवाणी ने भरा पर्चा, लड़ेंगे निर्दलीय चुनाव

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अहमदाबाद। दलित नेता और सामाजिक कार्याकर्ता जिग्नेश मेवाणी ने बनासकांठा जिले की वडगांव-11 सीट गुजरात विधानसभा का चुनाव लड़ेंगे. उन्होंने इस सीट से अपना चुनावी पर्चा भी भर दिया है. वह बतौर निर्दलीय प्रत्याशी विधानसभा चुनाव लड़ेंगे. जिनेश ने ट्वीट कर कहा कि वह निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में गुजरात के बनासकांठा जिले की वडगांव-11 सीट से गुजरात विधानसभा का चुनाव लड़ेंगे. इससे पहले ऐसी अटकलें थीं कि वह अल्पेश ठाकोर की तरह ही कांग्रेस में शामिल हो सकते हैं जिसे उन्होंने खारिज कर दिया था.

जिग्नेश ने अपने फेसबुक वॉल पर लिखा, ‘निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में मैं वड़गांव 11 चुनावक्षेत्र से गुजरात विधानसभा का चुनाव लड़ूंगा. पिछले कुछ महीनों से, खास तौर पर चुनाव की घोषणा होने के बाद अनगिनत आंदोलनकारी साथियों का और युवा वर्ग का न केवल यह अनुरोध था बल्कि यह ख्वाहिश थी कि हम इस बार जमकर चुनाव लड़ें और भाजपा के सामने सड़कों के साथ-साथ चुनाव में भी मुकाबला करें.’

उन्होंने लिखा, ‘भाजपा हमारी परम शत्रु है, इसलिए भाजपा को छोड़कर कोई भी राजनीतिक दल (या निर्दलीय प्रत्याशी) हमारे सामने अपना उम्मीदवार खड़ा ना करे. यह हमारा अनुरोध है. लड़ाई सीधी हमारे और भाजपा के बीच में होने दें. पिछले 22 साल से गुजरात में जो तानाशाही चल रही है, उसके सामने ऊना से लेकर अब तक हमने जो संघर्ष किया है , जो माहौल बनाया है, उससे न केवल गुजरात लेकिन पूरे देश की जनता वाकिफ है.’

जिग्नेश ने कहा, ‘हम जिन मुद्दों को लेकर संघर्ष करते आए हैं और जिस ऊर्जा, प्रतिबद्धता और जोश के साथ अब तक सड़कों पर दलित-शोषित तबकों की आवाज़ बने हैं, उन्हीं मुद्दों की बात करने के लिए और इसी आवाज़ को बुलंद करते हुए गुजरात विधानसभा में भी जाएंगे. चुनाव जीतने के बाद जनता की लड़ाई को और भी तेज करेंगे. यह हमारा वादा है.’

1207 शिक्षा मित्रों को स्थाई नियुक्ति, बनेंगे सहायक अध्यापक

उत्तराखंड की त्रिवेंद्र सरकार ने डीएलएड टीईटी पास 1207 समायोजित शिक्षा मित्रों को स्थाई नियुक्ति का तोहफा दिया है. कोर्ट ने शिक्षक बनने की योग्यता हासिल कर चुके शिक्षा मित्रों को स्थाई नियुक्ति दिए जाने का फैसला राज्य सरकार पर छोड़ा था. टीईटी उत्तीर्ण करने वालों के साथ ही बीटीसी और डीएलएड उत्तीर्ण कर चुके शिक्षा मित्र भी प्राइमरी स्कूलों में सहायक अध्यापक बनेंगे. उत्तराखंड बनने के बाद पहली बार सरकार ने शिक्षा मित्रों को पक्का किया है, जिससे स्थाई किए गए शिक्षा मित्रों में खुशी की लहर है.

31 मार्च 2015 से पहले नियुक्ति पाने वाले शिक्षा मित्र, जिन्होंने टीईटी नहीं किया है, उनके पास 31 मार्च 2019 तक निर्धारित योग्यता हासिल करने का मौका है. सचिव, विद्यालयी शिक्षा डॉक्टर भूपिंदर कौर औलख ने सोमवार को यह शासनादेश जारी किया. उन्होंने निदेशक प्रारंभिक शिक्षा को औपबंधिक रूप से सहायक अध्यापक (प्राथमिक) के पद पर कार्यरत पात्र शिक्षकों को सहायक अध्यापक (प्राथमिक) के पद पर नियुक्ति के लिए अग्रेत्तर कार्रवाई करने के निर्देश दिए.

आदेश के अनुसार सचिव के अनुसार सहायक अध्यापक पद पर नियुक्ति पाने के वही शिक्षा मित्र पात्र होंगे, जिन्होंने उत्तराखंड प्रारंभिक शिक्षा (अध्यापक) सेवा नियमावली-2012 के प्रावधानों के अनुसार द्विवार्षिक बीटीसी अथवा डीएलएड योग्यता हासिल कर ली हो. साथ ही वे टीईटी प्रथम वर्ष उत्तीर्ण भी कर चुके हों. शिक्षकों को नियुक्ति देने के लिए राजकीय प्रारंभिक शिक्षा (अध्यापक) सेवा नियमावली-2012 में संशोधन किया जाएगा. शिक्षा निदेशक को इसका प्रस्ताव तैयार कर शासन को भेजने के निर्देश दिए गए हैं. सरकार के इस नए आदेश से हजारों कार्यरत शिक्षा मित्रों को लाभ मिलेगा. प्रदेश में कुल 3652 शिक्षा मित्र कार्यरत हैं, जिनमें से 1207 टीईटी और सीटीईटी पास कर चुके हैं. वहीं, 2445 शिक्षा मित्र अभी स्थायी नियुक्ति के लिए अर्ह नहीं हैं. उत्तराखंड टीईटी उत्तीर्ण प्राथमिक शिक्षक संगठन के अध्यक्ष सूर्य सिंह पंवार ने शासनादेश जारी होने पर सीएम त्रिवेंद्र रावत, शिक्षा मंत्री अरविंद पांडेय, सचिव डॉ. भूपिंदर कौर औलख और प्रांरभिक शिक्षा निदेशक राकेश कुंवर का आभार जताया है. उन्होंने कहा कि 17 वर्षों के लंबे संघर्ष के बाद उन्हें सफलता मिली है. वर्षों से दुर्गम में सेवा दे रहे शिक्षकों में इससे नई ऊर्जा का संचार होगा.

कश्मीर में महेंद्र सिंह धोनी के सामने लगे अफरीदी के नारे

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श्रीनगर। भारतीय टीम के दिग्गज खिलाड़ी महेंद्र सिंह धोनी रविवार को जम्मू-कश्मीर के बारामूला स्थित कुंजर में चिनार क्रिकेट प्रीमियर लीग के चीफ गेस्ट बनकर पहुंचे. यह कार्यक्रम भारतीय सेना की तरफ से आयोजित कराया गया था. टीम इंडिया के पूर्व कप्तान को देखने के लिए काफी लोग जुटे थे, लेकिन तभी वहां शाहिद अफरीदी के नारे लगने लगे.

धोनी सेना में आनरेरी लेफ्टिनेंट कर्नल के पद पर हैं. इस दौरान उन्हें एक अजीब स्थिति से गुजरना पड़ा जब उनको देखने उमड़ी ने अफरीदी -अफरीदी के नारे लगाए. शाहिद अफरीदी पाकिस्तान के पूर्व क्रिकेटर और कप्तान हैं और वह भारत में भी काफी लोकप्रिय हैं. कश्मीर के स्थानीय मीडिया में इस खबर को जोर-शोर से उठाया गया और घटना का विडियो वायरल हो गया है.

स्थानीय मीडिया में रिपोर्ट्स आने के बाद इसका वीडियो भी वायरल हो रहा है. इसी कार्यक्रम में धोनी ने भारत-पाकिस्तान क्रिकेट पर अपनी राय रखी थी. भारत-पाक सीरीज पर धोनी ने कहा, ‘भारत-पाकिस्तान सीरीज महज खेल नहीं है. यह इससे कहीं अधिक है. भारत सरकार को फैसला करना चाहिए कि दोनों देशों के बीच क्रिकेट खेला जाए या नहीं क्योंकि इस मुद्दे पर भारत सरकार सही निर्णय करेगी.’

धोनी एक हफ्ते से कश्मीर में हैं. इस दौरान 22 नवंबर को वह श्रीनगर के एक स्कूल पहुंचे और बच्चों के साथ वक्त बिताया था. इसके बाद उन्होंने उत्तर कश्मीर के बारामूला जिले के उभरते क्रिकेटरों से मुलाकात कर उन्हें फिटनेस पर ध्यान देने की सलाह दी थी. इस टूर के दौरान धोनी ने कश्मीर की सुंदर नजारों की भी तारीफ की थी.

ज्योतिबा फुलेः वंचितों को शिक्षा का रास्ता दिखाने वाले महानायक

jyotiba phule

डॉ. अम्बेडकर ने बुद्ध तथा कबीर के बाद महामना फुले को अपना तीसरा गुरू माना है. महामना ज्योतिबा फुले ऐसे महान विचारक, समाज सेवी तथा क्रांतिकारी कार्यकर्ता थे जिन्होंने भारतीय सामाजिक संरचना की जड़ता को ध्वस्त करने का काम किया. महिलाओं, दलितों एवं शूद्रों की अपमानजनक जीवन स्थिति में परिवर्तन लाने के लिए वे आजीवन संघर्षरत रहे. ज्योतिबा फुले का पूरा नाम जोतिराव गोविंदराव फुले था. उनका जन्‍म 11 अप्रैल 1827 को पुणे में महाराष्‍ट्र के एक माली परिवार में हुआ. ज्योतिबा को पढ़ने की ललक थी सो पिता ने उन्हें पाठशाला में भेजा था मगर सवर्णों के विरोध ने उन्‍हें स्‍कूल से वापिस बुलाने पर मजबूर कर दिया. शायद यही कसक रही कि उन्होंने वंचित वर्ग की भलाई के लिए शिक्षा के क्षेत्र में काम करने का फैसला किया.

1 जनवरी, 1848 को उन्होंने पुणे में एक बालिका विद्यालय की स्थापना कर दी. 15 मई, 1848 को पुणे की अछूत बस्ती में अस्पृश्य लड़के-लड़कियों के लिए भारत के इतिहास में पहली बार विद्यालय की स्थापना की. थोड़े ही अन्तराल में उन्होंने पुणे और उसके पार्श्ववर्ती इलाकों में 18 स्कूल स्थापित कर डाले. चूंकि हिन्दू धर्मशास्त्रों में शुद्रातिशुद्रों और नारियों का शिक्षा-ग्रहण व शिक्षा-दान धर्मविरोधी आचरण के रूप में चिन्हित रहा है इसलिए फुले दंपति को शैक्षणिक गतिविधियों से दूर करने के लिए धर्म के ठेकेदारों ने जोरदार अभियान चलाया. उस स्कूल में पढ़ाने के लिए कोई शिक्षक न मिलने पर ज्योतिबा फुले की पत्नी सावित्रीबाई फुले आगे आईं. इस दौरान उन्हें तमाम अन्य मुश्किलों का भी सामना करना पड़ा लेकिन फुले दंपत्ति ने हार नहीं मानी. एक वक्त ऐसा भी आया जब फुले दंपत्ति ने 1849 में घर छोड़ देने का फैसला किया. निराश्रित फुले दंपति को पनाह दिया उस्मान शेख ने. फुले ने अपने कारवां में शेख साहब की बीवी फातिमा को भी शामिल कर अध्यापन का प्रशिक्षण दिलाया. फिर अस्पृश्यों के एक स्कूल में अध्यापन का दायित्व सौंपकर फातिमा शेख को उन्नीसवीं सदी की पहली मुस्लिम शिक्षिका बनने का अवसर मुहैया कराया. सामाजिक बहिष्‍कार का जवाब महात्‍मा फुले ने 1851 में दो और स्‍कूल खोलकर दिया. सन् 1855 में उन्होंने पुणे में भारत की प्रथम रात्रि प्रौढ़शाला और 1852 में मराठी पुस्तकों के प्रथम पुस्तकालय की स्थापना की. यही वजह है कि बहुजन समाज 5 सितंबर को शिक्षक दिवस का विरोध करता रहा है और रुढ़िवादियों को चुनौती देकर वंचित तबके के लिए पहला स्कूल खोलने वाले ज्योतिबा फुले और प्रथम महिला शिक्षिका सावित्रीबाई फुले के सम्मान में ‘शिक्षक दिवस’ की मांग करता रहा है.

नारी–शिक्षा, अतिशूद्रों की शिक्षा के अतिरिक्त समाज में और कई वीभत्स समस्याएं थीं जिनके खिलाफ पुणे के हिन्दू कट्टरपंथियों के डर से किसी ने अभियान चलाने की पहलकदमी नहीं की थी. लेकिन फुले थे सिंह पुरुष और उनका संकल्प था समाज को कुसंस्कार व शोषणमुक्त करना. लिहाजा ब्राह्मण विधवाओं के मुंडन को रोकने के लिए नाइयों को संगठित करना, विश्वासघात की शिकार विधवाओं की गुप्त व सुरक्षित प्रसूति, उनके अवैध माने जानेवाले बच्चों के लालन–पालन की व्यवस्था, विधवाओं के पुनर्विवाह की वकालत, सती तथा देवदासी-प्रथा का विरोध भी फुले दंपति ने बढ़-चढ़कर किया.

फुले ने अपनी गतिविधियों को यहीं तक सीमित न कर किसानों, मिल-मजदूरों, कृषि-मजदूरों के कल्याण तक भी प्रसारित किया. इन कार्यों के मध्य उन्होंने अस्पृश्यों की शिक्षा के प्रति उदासीनता बरतने पर 19 अक्तूबर, 1882 को हंटर आयोग के समक्ष जो प्रतिवेदन रखा, उसे भी नहीं भुलाया जा सकता. अपने उद्देश्य को संस्थागत रूप देने के लिए ज्योतिबा फुले ने सन 1873 में महाराष्ट्र में सत्य शोधक समाज नामक संस्था का गठन किया. उनकी छोटी-बड़ी कई रचनाओं के मध्य जो सर्वाधिक चर्चित हुईं वे थीं- ब्राह्मणों की चालाकी, किसान का कोड़ा और ‘गुलामगिरी’. इनमें 1 जून, 1873 को प्रकाशित गुलामगिरी का प्रभाव तो युगांतरकारी रहा.

मुम्‍बई सरकार के अभिलेखों में भी ज्योतिबा फुले द्वारा पुणे एवं उसके आस-पास के क्षेत्रों में शुद्र बालक-बालिकाओं के लिए कुल 18 स्‍कूल खोले जाने का उल्‍लेख मिलता है. समाज सुधारों के लिए पुणे महाविद्यालय के प्राचार्य ने अंग्रेज सरकार के निर्देश पर उन्‍हें पुरस्‍कृत किया और वे चर्चा में आए. 28 नवम्बर 1890 को उनका महापरिनिर्वाण हो गया. बहुजन समाज महात्मा ज्योतिबा फुले को ‘राष्ट्रपिता’ का दर्जा देता है. – राजकुमार

AIIMS ने निकाली कई पदों पर वैकेंसी, जल्द करें अप्लाई

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) ने ‘Junior Residents (Non-Academic)’ पदों पर भर्ती निकाली है. इन पदों के लिए इच्छुक और योग्य उम्मीदवार 9 दिसंबर, 2017 तक आवेदन कर सकते हैं. आवेदन से जुड़ी जानकारी नीचे दी गई हैं.

संस्थान का नाम अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS)

पद का नाम Junior Residents (non Academic)

पद की संख्या नोटिफिकेशन के अनुसार डिप्टी मैनेजर के 194 पदों पर भर्तियां होनी है.

योग्यता इन पदों पर आवेदन करने के लिए उम्मीदवार को किसी भी मान्यता प्राप्त संस्थान से MBBS/BDS की डिग्री ली होनी आवश्यक है.

सैलरी 15,600 से 56,100 रुपये.

अंतिम तिथि 09 दिसंबर 2017

कैसे करें आवेदन आवेदन करने के इच्छुक उम्मीदवार All India Institute of Medical Sciences (AIIMS) की आधिकारिक वेबसाइट aiims.ac.in पर जाकर आवेदन कर सकते हैं.

यूपी पुलिस ने 8 गधों को 4 दिन बाद किया जेल से रिहा

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जालौन। आपने इंसानों को जेल से छूटकर निकलते हुए जरूर देखा या सुना होगा. लेकिन आपने गधों को जेल से छूटते हुए नहीं देखा होगा. ऐसी ही एक घटना उत्तर प्रदेश के जालौन में घटी है. गधों का आरोप बस इतना था कि गधों ने जेल के बाहर लगे पेड़ पौधों और जेल स्टाफ की कॉलोनी के बाग को चर लिया था. बाग में चरना आठ गधों को महंगा पड़ गया. जेल स्टाफ ने गधों को कैद कर बच्चा जेल में बंद कर दिया. पुलिस ने इन गधों को 4 दिन बाद रिहा किया.

जानकारी के मुताबिक जेल अधिकारियों ने गधे के मालिक को कई बार मना किया था वो अपने गधे इदर ना छोड़े. जेल पुलिस ने सबक सिखाने के लिए चार दिन के लिए गधों को जेल में बंद कर दिया. गधों की रिहाई भी इतनी आसानी से नहीं हुई, गधे के मालिक ने पहले तो जेलर से गुहार लगाई. इसके बाद स्थानीय बीजेपी नेता शक्ति गहोई से कहलवाने के बाद ही गधों को आजादी मिली.

इस पूरे मामले पर जेलर का कहना है कि पचास-साठ हजार रुपये खर्च करके पौधे लगवाए गए हैं, गधों को ना तो अरेस्ट किया जा सकता है और ना ही एडजस्ट किया जा सकता है. गधों के मालिकों को बुलाकर चेतावनी देकर छोड़ दिया गया.