यूपी निकाय चुनावः एक बूथ ऐसा भी जहां सिर्फ 6 लोगों ने डाला वोट

up बुलंदशहर। भारत में चुनाव को लोकतंत्र का महापर्व कहा जाता है लेकिन बुधवार को संपन्न तीसरे व अंतिम चरण के मतदान वाले दिन एक पोलिंग बूथ पर ऐसा नजारा देखने को मिला जैसे कि लोकतंत्र में वोट की चोट से नेता चुनने से लोगों का विश्वास ही उठ गया हो. खबरों के मुताबिक बुलंदशहर जनपद की नगर पालिका परिषद सिकन्द्राबाद के जैन इंटर कॉलेज को 55 नम्बर का बूथ बनाया गया था. इस बूथ पर 900 वोट थे, लेकिन सुबह 7:30 बजे से शाम 5 बजे तक मात्र 6 वोट ही पड़े. जिससे लोगों के लोकतंत्र व नेताओं से उठते विश्वास की पुष्टि होती है. वैसे अभी इतने अल्प मतदान के कारण का पता नहीं चल पाया है. हालांकि मामले के एसडीएम के संज्ञान में आने के बाद उन्होंने जांच का आश्वासन दिया है. वैसे तो नगर पालिका क्षेत्र में छिटपुट घटनाओं के बीच बुधवार को निकाय चुनाव शांतिपूर्वक संपन्न हो गया. हांलाकि, इस दौरान कई जगह फर्जी मतदान और भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पुलिस को हल्का बल का प्रयोग भी करना पड़ा. पुलिस ने ककोड़ नगर पंचायत के 3 प्रत्याशियों को शांति भंग की आशंका में थाने में बैठा लिया. जबकि सिकन्द्राबाद में निर्दलीय प्रत्याशी को नजरबंद कर दिया और सर्मथको पर लाठियां भांजी. कुछ जगह मतदाताओं की लाइन लंबी होने के कारण अव्यवस्था फैल गई हैं. अव्यवस्था देख बूथ अधिकारी पर भड़के प्रेक्षक मतदान के दौरान प्रेक्षक अनिल कुमार सागर जब शिकारपुर के डीएपी इंटर कॉलेज मतदान केंद्र पर पहुंचे तो एक कमरे में हो रही भीड़भाड़ एवं अव्यवस्था को देखकर भड़क गए. उन्होंने तैनात अधिकारी को फटकार लगाई और वोट डालने के लाईन से वोट डलवाने के निर्देश दिए. इस दौरान तहसीलदार शिकारपुर भी मौजूद रहे.

सजा के नाम पर उतरवाए 88 छात्राओं के कपड़े

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इटानगर। अरुणाचल प्रदेश में एक स्कूल के तीन टीचर्स पर गंभीर आरोप लगे हैं, शिकायत है कि उन्होंने स्कूल की 88 लड़कियों को सजा देने के लिए जबरन उनके कपड़े उतरवा दिए. दरअसल, इन छात्राओं ने कथित तौर पर प्रधानाध्यापक के खिलाफ अश्लील शब्द लिखे थे.

पुलिस ने बताया कि पापुम पारे जिला में तनी हप्पा स्थित कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय की छठी और सातवीं कक्षा की 88 छात्राओं को 23 नवंबर को इस सजा का सामना करना पड़ा. हालांकि, यह मामला 27 नवंबर को सामने आया, जब पीड़िताओं ने ऑल सागली स्टूडेंट्स यूनियन (एएसएसयू) से इस पूरी घटना का जिक्र किया. जिसके बाद यूनियन ने स्थानीय पुलिस थाने में प्राथमिकी दर्ज कराई.

शिकायत के मुताबिक दो सहायक शिक्षकों और एक जूनियर शिक्षक ने 88 छात्राओं को अन्य छात्राओं के सामने अपने कपड़े उतारने के लिए मजबूर किया. दरअसल, इन छात्राओं के पास से कागज मिला था जिस पर प्रधानाध्यापक और एक छात्रा के खिलाफ अश्लील शब्द लिखे थे. जिले के पुलिस अधीक्षक तुम्मे अमो ने छात्र संगठन  द्वारा प्राथमिकी दर्ज कराए जाने की आज पुष्टि की.

उन्होंने बताया कि यह मामला महिला पुलिस थाने को सौंप दिया गया है. महिला थाने की प्रभारी ने बताया कि पीड़िताओं और उनके माता पिता के साथ-साथ शिक्षकों से पूछताछ की जाएगी. अरूणाचल प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने इस घटना की निंदा की और कहा कि शिक्षकों की ऐसी जघन्य हरकत छात्राओं को प्रभावित कर सकते हैं. इसने एक बयान में कहा कि किसी बच्चे की गरिमा से छेड़छाड़ करना कानून और संविधान के खिलाफ है.

क्या भाजपा ने गुजरात में हार मान ली है

दिल्ली में भाजपा के अशोका रोड स्थित केंद्रीय पार्टी मुख्यालय सुना सा पड़ा है. ज्यादातर नेता गायब हैं. पूछने पर पता चलता है कि सब गुजरात गए हैं. यानि प्रधानमंत्री मोदी से लेकर पार्टी अध्यक्ष अमित शाह तक सब गुजरात में हैं. अमित शाह इन दिनों भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष की बजाय गुजरात प्रदेश के अध्यक्ष जैसा बर्ताव कर रहे हैं. कुल मिलाकर जो लोग पार्टी दफ्तर में मौजूद हैं, उनसे बात करने पर साफ पता चल जाता है कि शायद भारतीय जनता पार्टी ने गुजरात में हार मान ली है. उनकी हताशा साफ तौर पर दिख रही है. भाजपा को कवर करने वाले पत्रकारों से बात करिए. कोई भी इस बात को लेकर आश्वस्त नहीं है कि भाजपा गुजरात का चुनाव जीत सकती है, बल्कि सब यह मान कर चल रहे हैं कि भाजपा गुजरात में पक्का हार रही है. गुजरात के लोगों से भी बात करने पर यह साफ हो जा रहा है कि गुजरात के दलित और पाटीदार भाजपा को वोट देने के मूड में नहीं है. जी हां, भाजपा द्वारा तमाम पाटीदारों को टिकट दिए जाने के बावजूद पाटीदार समाज भाजपा को वोट नहीं देने जा रहा है. दलितों को उना में गौरक्षकों द्वारा डंडे से की गई पिटाई का दर्द शरीर से होकर उनके दिल में जा बसा है. रही सही कसर जीएसटी ने निकाल दी है. आप गुजरात में मोदी जी का चुनाव प्रचार देखिए. वो क्या-क्या बोल रहे हैं अगर आप इस पर ध्यान देंगे तो उनकी हताशा साफ दिख जाएगी. कल तक ‘हर-हर मोदी घर-घर मोदी’ का नारा लगाने वालों के सर से मोदी का भूत उतर चुका है. गुजरात चुनाव बहुत कुछ कहने जा रहा है, इंतजार करिए.

हम लोगों पीटते हैं, पिटते नहींः राज ठाकरे

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मुंबई। मुंबई के एलफिस्टन रोड स्टेशन हादसे के बाद से ही महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) ने स्टेशन पर सामान बेचने वाले हॉकर्स के साथ मारपीट कर रही है. कई बार हॉकर्स के साथ एमएनएस कार्यकर्ताओं की झड़प हो चुकी है.

बीते रविवार को विख्रोली में हॉकर्स को हटाने का काम कर रहे मनसे कार्यकर्ताओं की ही पिटाई हो गई. इस घटना के बाद से ही मनसे प्रमुख राज ठाकरे गुस्से में है. उन्होंने सोमवार को शिवाजी पार्क रेसीडेंस स्थित कृष्णा कुंज में बैठक आयोजित कर कार्यकर्ताओं को फटकार लगाई.

पार्टी प्रमुख ठाकरे ने अपने जोनल ऑफिस के कार्यकर्ताओं को धमकी देते हुए कहा कि, “अगर आप मनसे के नेता हैं तो आपके साथ ऐसा नहीं होना चाहिए. अगर आप ऐसे ही बार-बार पिटेंगे तो अपने पद से हाथ धोना पड़ेगा. उन्होंने आगे कहा कि पार्टी कार्यकर्ता ऐसा होना चाहिए जो दूसरों को पीटते हैं ना कि खुद पिटते हैं.”

मनसे प्रमुख ने चेतावनी देकर कहा कि “अगली बार जब आप एंटी-हॉकर अभियान पर जाते हैं तो पूरी तैयारी के साथ जाएं. विख्रोली की घटना दोबारा नहीं होनी चाहिए. जब हम खुद की सुरक्षा नहीं कर सकते हैं तो दूसरों को कैसे रख सकते हैं.”

गौरतलब है कि रविवार की रात विख्रोली में मनसे कार्यकर्ताओं ने हॉकरों को उनके स्टॉल्स पर मराठी में साइन बोर्ड और होर्डिंग लगाने की बात की थी. जिसके बाद मामला उग्र होने पर मनसे कार्यकर्ताओं की पिटाई हो गई.इस घटना में चार मनसे कार्यकर्ता और दो कांग्रेस कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया.

कुमार विश्वास ने ढका केजरीवाल का चेहरा

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नई दिल्ली। कुमार विश्वास का एक बेहद दिलचस्प पोस्टर सामने आया है जो आम आदमी पार्टी में विवाद की नई वजह बन सकता है. इस पोस्टर में अरविंद केजरीवाल के चेहरे को पीछे छुपाते हुए कुमार विश्वास सामने खड़े नजर आ रहे हैं. हालांकि खुद कुमार ने इसी 26 नवंबर को रामलीला मैदान के मंच से चेहरों की राजनीति करने पर सवाल खड़े किए थे.

रामलीला मैदान में भी दिया था ‘बगावती बयान’ रविवार 3 दिसंबर को कुमार विश्वास दिल्ली के पार्टी दफ्तर में कार्यकर्ताओं के साथ बैठक करने जा रहे हैं लेकिन इसके लिए जो पोस्टर सोशल मीडिया पर शेयर किया जा रहा है उससे पार्टी का अंदरूनी विवाद बढ़ सकता है. यह पोस्टर तब सामने आया है जब पार्टी के 5 साल पूरे होने पर रामलीला मैदान से कुमार ने तंज कसते हुए कहा था कि कार्यकर्ताओं की आवाज को पार्टी में नही सुना जा रहा है इसलिए उनसे संवाद जरूरी है.

शुरू हो चुका है ‘ट्विटर-वॉर’ यह पोस्टर आम आदमी पार्टी के राजस्थान ट्विटर हैंडल के अलावा खुद कुमार विश्वास ने भी री-ट्वीट किया है. इस पोस्टर के सोशल मीडिया में आने के बाद केजरीवाल और कुमार विश्वास के समर्थक आपस मे भिड़ते नजर भी आ रहे हैं. दो गुटों के बीच तंज कसे जा रहे हैं और जमकर बहसबाजी भी हो रही है.

एक मंच पर थे केजरी-कुमार, फिर भी नहीं हुई बा रामलीला मैदान में स्थापना दिवस के आयोजन पर मंच पर अरविंद केजरीवाल और कुमार विश्वास साथ-साथ बैठे रहे लेकिन दोनों के बीच बातचीत ना के बराबर थी. दिलचस्प बात यह भी रही कि इसी मंच पर कुमार के खिलाफ बयान देने के बाद सस्पेंड होकर भी पार्टी में वापसी करने वाले अमानतुल्लाह खान भी मौजूद नजर आए.

‘ट्वीट’ भी निशानेदार इसी बीच कुमार विश्वास ने अपने ट्विटर हैंडल पर एक ऐसी बात लिखी है जो दोनों आप नेताओं में लंबे समय से चल रहे ‘शीत-युद्ध’ की ओर इशारा करता है. कुमार विश्वास ने लिखा है, “जो लोग फोटोशॉप्ड एलबम के चकाचौंध में जो लोग अपने पहचान-पत्रों में लगे पुराने पासपोर्ट साइज फोटो को भूल जाते हैं, उनकी शिनाख्त तक खत्म हो जाती है.” साफ जाहिर है कि यह ट्वीट किस पर निशाना साध रहा है क्योंकि मीडिया की चकाचौंध में इन दिनों कौन है वह जगजाहिर है.

आज तक से साभार

लालू ने नीतीश को बताया जनादेश का हत्यारा

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पटना। राष्ट्रीय जनता दल (राजद) अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के ‘ट्वीट वार’ पर पलटवार किया और कहा कि बिहार में इकलौता ऐसा मुख्यमंत्री है जिसपर जघन्य हत्या का संगीन आरोप है. यादव ने आज अपने एक के बाद एक ट्वीट में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का नाम लिये बिना उनपर जमकर निशाना साधते हुए लिखा, बिहार में देश का इकलौता ऐसा स्वघोषित देशभक्त मुख्यमंत्री है जिसपर जघन्य हत्या का आरोप है. क्या देश के किसी और मुख्यमंत्री पर निर्मम हत्या का मामला दर्ज है और इसे छुपाने का साहस है.

लालू यादव यहीं नहीं रुके और अपने दूसरे ट्वीट के जरिए तीखा प्रहार करते हुए कहा, क्या आप ‘पेट के दांत’ ठीक करने वाले किसी डेंटिस्ट को जानते है. बिहार में जनादेश का एक हत्यारा है जिसके पेट में दांत है. उसने सभी नेताओं और पार्टियों को ही नहीं बल्कि करोड़ों गरीबों को भी अपने विषदंत से काटा है.

राजद सुप्रीमो ने सवालिया लहजे में कहा कि देश के किस देशभक्त मुख्यमंत्री पर जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के एक होनहार शोधार्थी की थीसिस चोरी करने पर दिल्ली उच्च न्यायालय ने 20 हजार रुपए का जुर्माना लगाया था. बच्चों की थीसिस चुराने वाले थीसिस चोर अपने आप को देशभक्त कहते हैं. उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि बिहार के ‘थीसिस चोर’ देशभक्त मुख्यमंत्री बताएं कि उन्होंने 20 हजार रुपए का जुर्माना चेक में दिया, आरटीजीएस किया या नकद में अदा किया.

इससे पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने आज सुबह ट्वीट करते हुए लिखा, जान की चिंता, माल-मॉल की चिंता, क्या सबसे बड़ी देशभक्ति है. हालांकि अपने ट्वीट में मुख्यमंत्री ने किसी का नाम तो नहीं लिया लेकिन उनका ट्वीट राष्ट्रीय जनता दल (राजद) अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव और पूर्व उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव को जवाब के रूप में देखा जा रहा है. वहीं, मंगलवार को भी मुख्यमंत्री ने राष्ट्रीय जनता दल(राजद) सुप्रीमों, जनता दल यूनाइटेड (जदयू) के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव और पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी की सुरक्षा में कटौती करने के केंद्र के फैसले को लेकर जारी बयानबाजी के बीच सोशल मीडिया के जरिए विरोध पर तंज किया था.

बहुजन आरक्षण की वकालत नहीं करती मीडिया

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आरक्षण एक संवैधानिक व्यवस्था है, जो देश और समाज में हाशिये पर सदियों से रहे अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़ी जाति यानी बहुजन को मुख्यधारा में लाने की पहल है. इस पहल को दिव्ज समाज ने आज तक स्वीकार नहीं किया है. वह इसे समाज में खटास उत्पन्न का दोषी मानता है और आरक्षण के लिए जातिगत आधार को खरिज कर, आर्थिक आधार को लागू करने की वकालत करता रहता है. आरक्षण से दलितों की दूसरी पीढ़ी उच्च संस्थानों में आने लगी है, तो कुतर्क किया जा रहा है कि ये गरीब दलितों का आरक्षण हड़प रहे हैं. बात यहीं खत्म नहीं होती बल्कि योग्यता और अयोग्ता का सवाल भी खड़ा कर आरक्षण व्यवस्था को सवालों के घेरे में लेने की साजिश रची जा रही है. ऐसे में आरक्षण के सवाल पर भारतीय मीडिया बहुजन के साथ खड़ा नहीं दिखता है. देखा जाये तो यह आरक्षण के समर्थन में कम बल्कि विरोध में ज्यादा खड़ा रहता है. मंडल कमीशन के लागू होने के दौरान इसका चरित्र सब के सामने उजागर हो चुका है.

भारतीय प्रारूप संविधान कि धारा 10 में अनुसूचित जाति, जनजाति को नौकरियों में आरक्षण का प्रावधान है. तो वहीं, धारा 10संशोधन में पिछडों को शामिल किया गया है. बहुजन के लिए आरक्षण एक संवैधानिक व्यवस्था है ताकि समाज में जो गैरबराबरी है उसे पाटा जा सके. लेकिन, आरक्षण के विरोधी इसे स्वीकार नहीं करते हैं और समय समय पर आरक्षण के खिलाफ आंदोलन करते रहते हैं. इसमें मीडिया की भूमिका चाहे वह प्रिंट हो या इलेक्ट्रोनिक उनके साथ खड़ा रहता है. आरक्षण का विरोध करने वाले के साथ मीडिया का खड़ा होना उसके चरित्र को उजागर करता दिखता है. वहीं आरक्षण के समर्थन में खड़े रहने वाले के पक्ष में मीडिया तब तक खड़ा नहीं होता जब तक कोई बड़ी घटना न हो जाये. यह भारतीय मीडिया का दिव्ज प्रेम साबित करता है. भारतीय संविधान ने आरक्षण को लेकर जो हक बहुजन को दिया है उसे नकारा नहीं जा सकता है.

देखा जाये तो शुरू से ही मीडिया का साथबहुजन को नहीं मिला है. तमाम व्यवस्था के बीच अभी भी सरकारी सेवा में बहुजन, दिव्जों की तुलना में आधे भी नहीं है. खासकर शीर्ष पद पर तो बराबरी बिलकुल नहीं है. जब-जब आरक्षण का सवाल सामने आता है. आर्थिक आरक्षण का हवाला दिया जाने लगता है. संगठन, इस दिशा में सक्रिय हो जाते है. वहीं, कुछ दिव्ज जातियां अपने को आरक्षण पाने के लिए बहुजन में शामिल करने को लेकर गाहे-बगाहे आंदोलन कर दबाव की राजनीति करती हैं. प्रिंट औरइलैक्ट्रोनिक मीडिया उनका साथ भी देती है, उनके आंदोलन एवं मांग की खबरों सेमीडिया पट जाती है. इसकी वजह साफ है. प्रिंट और इलैक्ट्रोनिक मीडिया पर दिव्जों का काबिज होना. 2006 में भारतीय मीडिया के राष्ट्रीय सर्वे में साफ हो चुका है कि मीडिया के र्शीष पदों पर दिव्जों का कब्जा है. बहुजन की भागीदारी मीडिया में नहीं के बराबर है. जो भी है वे शीर्ष पद यानी फैसले लेने वाले पद पर नहीं है. ऐसे में तस्वीर साफ है कि प्रिंट और इलैक्ट्रोनिक मीडिया पर काबिज दिव्ज आपकी बातों की वकालत क्यों करें? वकालत वह अपनी कौम की करती है. अगर जगह दी भी तो अंदर के पेज में ऐसी जगह लगा देंगे कि ढूंढते रह जायेंगे. यहीं हाल इलैक्ट्रोनिक मीडिया का है. प्राइम टाइम में नहीं दिखाकर ऑड टाइम में दिखा देंगे.

देखा जाये तो पूरे मसले को प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया चीजों को भ्रम की स्थिति में पहुंचाने की पुरजोर कोशिश करती है. आरक्षण के विरोध में पहलुओं को खोजकर उस पर गल थोथरी करती है और अंत में आर्थिक पक्ष को रख बहस को संवेदनशील बनाते हुए जहर उगलने लगती है. जबकि, आरक्षण के संवैधानिक पक्ष पर चुप्पी साध लेती है. बराबरी एवं गैर बराबरी तथा सदियों से हाशिये पर रहे बहुजनों की स्थिति उन्हें नहीं दिखती है. इस बात पर बात नहीं होती कि आरक्षण का प्रावधान आर्थिक लाभ पहुंचाना नहीं है बल्कि मसला बराबरी में लाते हुए मुख्यधारा से जोड़ना है. आरक्षण का विरोध करने के पीछे मीडिया का चेहरा साफ है. आरक्षण की जरूरतों पर बात नहीं होती है. बल्कि मिल रहे आरक्षण पर सवाल खड़े किये जाते हैं कि अगर कोई बहुजन संपन्न है तो उसे इसका लाभ न दिया जाये. ऊपर से राजनीति का भी सहारा उसे मिल जाता है. आरक्षण की वकालत नहीं करने वाले प्रिंट और इलैक्ट्रोनिक मीडिया को उस समय बल मिल जाता है, जब कोई बहुजन नेता किसी समारोह में आर्थिक आरक्षण के प्रावधानों का समर्थन कर देता है. यहां नाम देने की जरूरत नहीं कई बहुजन नेताओं का बयान या संबोधन प्रिंट और इलैक्ट्रोनिक मीडिया पर आ चुका है. मीडिया ने उसे हाथों-हाथ लेते हुए स्थापित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. ऐसी खबरों को लीड बनाया जाता है. वहीं, आरक्षण की वकालत में लीड क्या, खबर न्यूज रूम तक जा ही नहीं पाती है.

बहुजनों को आरक्षण क्यों के, प्रावधानों में सकारात्मक प़क्ष की जगह नकारात्मक पहलू देखने को मिलता है. इन सबके पीछे मीडिया का बहुजन के खिलाफ बने मांइडसेट है. तभी तो सूचना के अधिकार से बहुजन आरक्षण के खुलासे ये मुंह छुपातें हैं. आंकड़े बताते हैं कि अभी बहुजन बहुत पीछे हैं. आरटीआई से चैंकाने वाली जानकारी मिली है. केन्द्रीय मंत्रालयों में अवर सचिव से लेकर सचिव स्तर तक सिर्फ 5.40 फीसदी पिछड़ा और 8.63 फीसदी अनुसूचित जाति वर्ग के लोग ही पहुंच पाए हैं. जबकि सामान्य वर्ग से करीब 82 फीसदी लोग कार्यरत हैं.

आरटीआईकार्यकर्ता महेन्द्र प्रताप सिंह ने कार्मिक एवंप्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) में सामान्य, पिछड़ा, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग के ग्रुप ‘ए’ अधिकारियों की संख्या की जानकारी मांगी थी. सितंबर 2016 में डीओपीटी ने केन्द्रीय मंत्रालय के अवर सचिव, उप निदेशक, निदेशक, संयुक्तसचिव, अतिरिक्त सचिव और सचिव या इसके समकक्ष पदों की सूची आरटीआई के जवाब में दी.

आरटीआई दस्तावेजों के मुताबिक ओबीसी वर्ग का एक भी अधिकारी केन्द्रीय मंत्रालयों के सबसे बड़े पद सचिव व अतिरिक्त सचिव नहीं है. जबकि सचिव पद पर सामान्य वर्ग के 110 और एससी वर्ग के सिर्फ दो अधिकारी ही कार्यरत हैं. वहीं अतिरिक्त सचिव पद पर 106 अधिकारी सामान्य, पांच-पांच अधिकारी एससी और एसटी वर्ग के अधिकारी हैं. उधर, अवरसचिव स्तर के पदों पर 184 अधिकारीसामान्य वर्ग, सिर्फ अधिकारी ओबीसी वर्ग, 22 अधिकारी एससी वर्ग और 19अधिकारी एसटी वर्ग के अधिकारी कार्यरत हैं. (संदर्भ-http://hindi.siasat.com/news/rtiRTI से ख़ुलासा, सिर्फ 13 फीसदी दलित-पिछड़े केन्द्रीय मंत्रालयों में उच्च पदों पर January 22, 2017 Election 2017, India, Uttar Pradesh) .

आरक्षण के सच को मुख्य मीडिया सामने नहीं लाती है. जो भी सच है वह सोशल या वेब मीडिया पर देखा जा सकता है. सूचना के अधिकार से आरक्षण की जो तस्वीर सामने आई है, वह एक आइना है. आरक्षण का विरोध करने वालों को दिखता है लेकिन वे देखना नहीं चाहते. जब सवाल उठने लगते हैं तो विरोध शुरू हो जाता है. आर्थिक आधार सहित कई तरह के आरोप-प्रत्यारोप मीडिया के माध्यम से आने लगते हैं ऊपर से राजनीतिक हवा भी साथ दे जाती है. देखा जाये तो मीडिया गैरबराबरी के फासले को मिटाने के लिए कोई पहल करती नहीं दिखाती है. जिस तरह से अमेरिकन मीडिया में अश्वेतों को प्रवेश देने के लिए विशेष अभियान चलाया गया और आज वहां की तस्वीर बदल चुकी है. लेकिन भारत में यह पहल क्यों नहीं दिखती? जरूरत है एक बड़े बदलाव की जो समाज को बराबर करें.

(संजय कुमार, मो-9934293148, लेखक वरिष्ठ पत्रकार है सामाजिक मुद्दों पर लिखते हैं.)

उना कांड का दर्द नहीं भूले हैं दलित

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नई दिल्ली। 11 जुलाई 2016 को गुजरात के उना में कथित गौरक्षकों द्वारा दलितों पर किए गए हमले का प्रकरण विधानसभा चुनाव से पहले एक बार फिर जीवित हो उठा है. इस मामले को लेकर आंदोलन करने वाले दलित नेता जिग्नेश मेवाणी ने निर्दलीय चुनाव लड़ने का फैसला करके इस कांड को फिर से जनता के जेहन में ताजा कर दिया है. वैसे उना के लोग आज भी उस घटना को भूले नहीं हैं.

उना कांड के बाद चर्चा में आए दलित विचार मंच के जिग्नेश मेवाणी को उना के ये दलित अपना हीरो मान रहे हैं. पूरे गुजरात में दलित समुदाय का वोटिंग प्रतिशत महज सात फीसदी है जो राष्ट्रीय औसत से करीब आधी है. देश भर में दलितों का वोटिंग प्रतिशत 16 फीसदी है. मेवाणी को कांग्रेस और आप ने समर्थन दकर ऐलान कर ही दिया है.

नहीं मिला है अब तक न्याय वसराम सरवैया कहते हैं कि हमें अब तक न्याय नहीं मिला. इनकी नाराजगी उन राजनेताओं से भी है जो घटना के बाद इनके यहां आए. इनके दुख-दर्द को बांटने का भरोसा भी दिया लेकिन अब तक कुछ नहीं हुआ. वसराम सरवैया का कहना है ‘उस घटना के बाद हमारे घर राहुल गांधी भी आए, दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल भी आए और जब विपक्ष की तरफ से दबाव बढ़ा तो तत्कालीन मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल भी आईं. वसराम की शिकायत है कि आनंदीबेन ने उस वक्त जमीन और रोजगार के साधन मुहैया करने का वादा किया था. अब तो एक साल से भी ज्यादा हो गए उन्हें कुछ नहीं मिला.

क्या हुआ था उस दिन उना के मोटा समढियाला गांव के वसराम सरवैया के लिए 11 जुलाई 2016 की सुबह जिंदगी की सबसे काली सुबह साबित हुई. दलित वसराम के पास सुबह सात बजे ही बगल के गांव से फोन आया कि उनकी गाय को शेर ने मार दिया है. पुश्तैनी काम करने वाले वसराम सरवैया अपने तीन भाइयों के साथ उस जगह पहुंच गए और फिर मरी हुई गाय का चमड़ा निकालने का काम करने लगे. तभी 40 से 50 की तादाद में गौरक्षकों की एक टोली पहुंची और इन सबकी पिटाई शुरू कर दी. हालत इतनी खराब थी कि इन्हें उना सिविल अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा और फिर राजकोट ले जाया गया.

जिग्नेश मेवाणी के खिलाफ जारी हुआ गैर जमानती वारंट

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अहमदाबाद। गुजरात विधानसभा चुनाव को लेकर जारी सियासी घमासान के बीच अहमदाबाद की एक अदालत ने दलित नेता जिग्नेश मेवाणी के खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी किया है. जनवरी में एक विरोध प्रदर्शन के दौरान दिल्ली जा रही राजधानी एक्सप्रेस को रोकने को लेकर उनके खिलाफ दर्ज एक मामले की सुनवाई के लिए पेश नहीं होने को लेकर अदालत ने यह वारंट जारी किया.

समाचार एजेंसी भाषा के मुताबिक सोमवार को अतिरिक्त मुख्य मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट आरएस लंगा ने अदालत के समक्ष पेश नहीं होने को लेकर मेवाणी और 12 अन्य लोगों के खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी किया.

11 जनवरी को वाइब्रेंट गुजरात शिखर सम्मेलन के खिलाफ एक ‘रेल रोको’ विरोध प्रदर्शन के दौरान अहमदाबाद रेलवे स्टेशन पर राजधानी एक्सप्रेस को काफी देर तक रोकने के आरोप में मेवाणी और उनके समर्थकों को गिरफ्तार किया गया था. उनके खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 143 (गैर-कानूनी सभा करने), 147 (दंगा) और भारतीय रेल अधिनियम की संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया था.

इस मामले में एक आरोप पत्र भी दायर किया गया था. मेवाणी के वकील शमशाद पठान ने अपने मुवक्किल को पेशी से छूट दिए जाने की मांग को लेकर अदालत में आवेदन दिया था, जिस पर सोमवार को मजिस्ट्रेट ने विचार करने से मना कर दिया. पठान ने इस आधार पर छूट की मांग की थी कि उनका मुवक्किल वडगाम विधानसभा सीट से निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर नामांकन पत्र भरने में व्यस्त था.

जिग्नेश मेवाणी लगातार दूसरी बार अदालत के समक्ष पेश नहीं हो पाए. सोमवार को उन्होंने गुजरात विधानसभा चुनाव में बनासकांठा के वडगाम से निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर उतरने की घोषणा की थी. वहीं, मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने परोक्ष रूप से उनका समर्थन करते हुए वहां से अपना उम्मीदवार नहीं उतारने का फैसला किया है.

UP निकाय चुनाव: बाराबंकी में पुलिस ने पोलिंग एजेंटों पर चलाई लाठियां

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लखनऊ। उत्तर प्रदेश निकाय चुनाव में बुधवार को आखिरी चरण के 26 जिलों में वोटिंग शुरू हो गई है. तीसरे चरण के इस मतदान में राज्य की 5 नगर निगम सीटों पर भी वोट डाले जा रहे हैं. इस बीच बाराबंकी में पुलिस ने पोलिंग एजेंटों पर लाठियां भांजी हैं.

यूपी के बाराबंकी में आज पुलिस का रोद्र रूप देखने को मिला. यहां पीर बतावान वार्ड नंबर 26 में पुलिस ने मतदाताओं पर लाठियां भांजी और कई कुर्सियों को तोड़ दिया. दरअसल, सुबह पोलिंग एजेंट अपनी कुर्सियां लगाए बैठे थे तभी पुलिस बल ने उनको बिना चेतावनी दिए दौड़ा-दौड़ा कर पीट दिया. जिससे मतदाताओं में आक्रोश व्याप्त है. बाराबंकी के टिकैतनगर नगर पंचायत में एसडीएम ने दो पोलिंग एजेंट को प्रचार सामग्री के साथ पकड़ा है, उन्हें थाना भेज दिया गया है. इसके अलावा 5 लोगों को गिरफ्तार किया गया है.

जनता ने पुलिस और प्रशासन के खिलाफ जमकर नारेबाजी की. वहीं आक्रोशित मतदाताओं का कहना है हम लोग बूथ से 200 मीटर दूर बैठे थे तभी पुलिस ने हम लोगों के ऊपर लाठियां चला कर कुर्सियां तोड़ डालीं. अब मतदाता घर से नहीं निकल रहे हैं.

इनमें सहारनपुर, बरेली, झांसी, मुरादाबाद और फिरोजाबाद शामिल हैं. आज होने वाले मतदान में कुल 233 नगर निकायों और 4299 वार्डों में 3599 पोलिंग सेंटर और 10817 पोलिंग बूथों पर 90 हजार से ज्यादा मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे.

राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरनाक है ये 42 मोबाइल एप्स

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नई दिल्ली। खुफिया एजेंसियों की एलर्ट के बाद गृह मंत्रालय ने भारत-चीन सीमा पर तैनात जवानों को अपने मोबाइल से एप्लीकेशन डिलीट करने के लिए कहा है. जानकारी के मुताबिक ऐसे 42 मोबाइल एप की एक लिस्ट जारी की गई है जो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा हो सकता है. इन एप्स को इस्तेमाल न करने के लिए एक एडवाइजरी भी जारी की गई है.

इन मोबाइल एप में वेब चैट, ट्रूकॉलर, यूसी ब्राउजर, यूसी न्यूज जैसे एप शामिल हैं, आशंका जताई जा रही है कि जवानों के मोबाइल में यह एप होने से खुफिया जानकारी लीक हो सकती है और जासूसी के लिए इनका इस्तेमाल किया जा सकता है. जानकारी के मुताबिक यह एप चीनी डेवलपर्स ने तैयार किए हैं.

एडवाइजरी के मुताबिक मोबाइल में पहले से ही डाउनलोड एप्लीकेशन का प्रयोग न करने और ऐसे एप को तुरंत अनइंस्टॉल कर मोबाइल से फॉर्मेट करने के लिए कहा गया है. सेना के अलावा लद्दाख से अरुणाचल तक फैली 4 हजार किमी की सीमा पर ITBP जैसे केंद्रीय पुलिस बल के जवान भी तैनात हैं. इन जवनों को पहले में साइबर सुरक्षा से जुड़े निर्दश दिए जाते रहे हैं.

ये हैं वो खतरनाक ऐप्स

40 एप्स की जो सूची जारी की है, उनमें वीबो, वीचैट, शेयरइट, ट्रूकालर, यूसी न्यूज, यूसी ब्राउसर, ब्यूटी प्लस, न्यूजडोग, वीवा वीडियो-क्यू वीडियो, आईएनसी, पैरालल स्पेश, अपुस ब्राउसर, परफेक्ट कार्प, वायरस क्लीनर-हाई सिक्योरिटी लैब, सीएम ब्राउसर, एमआई कम्युनिटी, डयू रिकॉर्डर, वाल्ट हाइड, यूकैम मेकअप, एमआई स्टोर, कैचक्लीनर डयू एप्स, डयू बैटरी सेवर, डयू क्लीनर, डयू प्राइवेसी, 360 सिक्योरिटी, डयू ब्राउसर, क्लीन मास्टर-चीता मोबाइल, बैडू ट्रांसलेट, बैडू एप, वंडर कैमरा, ईएस फाइल एक्सप्लोरर, फोटो वंडर, क्यूक्यू इंटरनेशनल, क्यूक्यू म्यूजिक, क्यूक्यू मेल, क्यूक्यू प्लेयर, क्यूक्यू न्यूजफीड, क्यूक्यू सिक्योरिटी, सेल्फी सिटी, मेल मास्टर, एमआई वीडियो कॉल और क्यूक्यू लांचर शामिल हैं।

राजस्थान के हॉस्टलों में अनिवार्य हुआ राष्ट्रगान

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जयपुर। राजस्थान के समाज कल्याण विभाग ने सभी राज्य के छात्रावासों में सुबह राष्ट्रगान को अनिवार्य कर दिया है. राज्य के समाज कल्याण विभाग की ओर से जारी आदेश में लिखा है कि विभाग के सभी 789 छात्रावासों में सुबह सात बजे राष्ट्रगान गाया जाएगा. समाज कल्याण विभाग राज्य में ओबीसी, एससी और एसटी का छात्रावास संचालित करता है.

विभाग के प्रधान सचिव समित शर्मा का कहना है कि ये पहले से होता रहा है लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इसमें सिथिलता आ गई थी जिसकी वजह से दोबारा आदेश निकालना पड़ा है. इसे रोजाना गाने के लिए ही आदेश निकाला गया है. गौरतलब है कि पिछली वसुंधरा सरकार के दौरान समाज कल्याण विभाग के सभी दफ्तरों में खाने से पहले भोजन मंत्र पढ़ना जरूरी किया गया था.

आदेश के मुताबिक बच्चों में राष्ट्र के प्रति देशभक्ति का जज़्बा जगाने के लिए यह कदम उठाया गया है. विभाग के निदेशक समित शर्मा ने बताया कि आवासीय विद्यालयों में राष्ट्रगान गाया जाता है, अब इस परम्परा को छात्रावासों में भी शुरू किया गया है. पिछले दिनों कई राज्यों में राष्ट्रगान को लेकर बहस हो चुकी है.

जयपुर के मेयर अशोक लाहोटी ने भी नगर निगम के दफ्तर में सुबह राष्ट्रगान और शाम को वंदेमातरम गाना अनिवार्य कर दिया था. इसके बाद राजस्थान यूथ बोर्ड ने सवाई मान सिंह स्टेडियम में राष्ट्रगीत कार्यक्रम का आयोजन किया था, इस कार्यक्रम में मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे भी शामिल हुईं थीं.