यूपी में दलित छात्रा की ईंट से मार-मार कर हत्या

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बांदा। यूपी में दलितों पर अत्याचार रूकने का नाम नहीं ले रहा है. हाल ही में राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट में भी यूपी में दलितों पर अत्याचार बढ़ने के आकड़ों की भी पुष्टि की है. आंकड़े जारी होने के बाद भी यूपी सरकार और पुलिस दलितों की सुरक्षा करने में नाकामयाब साबित हो रही है.

इसी क्रम में यूपी के बांदा में एक दिल दहलाने वाली दुर्घटना हुई है. बांदा के बिसंड़ा थाना क्षेत्र के अलिहा गांव में दसवीं कक्षा की दलित छात्रा की कुछ लोगों ने ईंट से मार-मार कर हत्या कर दी. मृतक छात्रा के पिता ने बताया कि पड़ोसी युवक कुछ लोगों के साथ घर में घुसकर उनकी छोटी बेटी के अपहरण की कोशिश कर रहे थे. उन्होंने आगे बताया कि हमने उसका विरोध किया तो उन लोगों ने मुझे और मेरे बेटे को ईंट और लात-घूसों से मारा. इसी बीच लड़की ने इसका विरोध किया, तो ईंट से पीट-पीट कर उसकी हत्या कर दी.

गरीबदास रैदास की 16 वर्षीय बेटी दसवीं कक्षा में पढ़ती थी. बुधवार सुबह चार बजे घर में जब सब सो रहे थे तो पड़ोसी युवक अपने एक साथी के साथ दीवार फांदकर उनके घर के अंदर घुस गया. पिता के नजदीक चारपाई में सो रही छात्रा का पड़ोसी व उसके साथी ने अपहरण करने का प्रयास किया. छात्रा के शोर मचाने पर नजदीक चारपाई में सो रहे पिता व भाई नीरज की नींद खुल गई. तीनो ने मिलकर उनका विरोध करना शुरू किया तो उन्होंने दीवार की जमीन में पड़ी ईंट से छात्रा के सिर व चेहरे पर ताबड़-तोड़ वार कर हत्या कर दी. हत्यारोपियों ने पिता को पीटकर उनके दांत तोड़ दिए. भाई की भी लात-घूंसों से पिटाई कर दी. घटना को अंजाम देने के बाद भाग रहे पड़ोसी को घायल हो चुके पिता ने पकड़ने का प्रयास किया तो जैकेट उसके हाथ लगी. दोनो हत्या के आरोपी भागने में सफल रहे.

बड़ी बेटी का भी हुआ अपहरण…

रैदास ने मामले की सूचना पुलिस को दी. इससे पुलिस परिजनों के साथ छात्रा को जिला अस्पताल ले गई. वहां चिकित्सकों ने उसे देखकर मृत घोषित कर दिया. घटना के बारे में मृतका के पिता ने पुलिस को बताया कि 12 अक्टूबर की शाम उसकी दिव्यांग बड़ी बेटी सुमन घर से शौच के लिए खेतों की ओर गई थी. फतेहपुर जनपद के जजरहा ललौली गांव के तांत्रिक गफार और उसके साथी विजय ने उसको बहला-फुसला कर अपहरण कर लिया था. आरोपी दिव्यांग बेटी के साथ दो लैपटाप, नकदी व सोने-चांदी के जेवर भी ले गए थे. घटना की उसने थाने में शिकायत दर्ज कराई थी. इसमें पुलिस ने गांव के कई लोगों से भी जाकर पूछताछ किया था. हत्यारोपी पड़ोसी के भाई व अन्य परिजनों ने पुलिस के पूछताछ करने को लेकर उसे देख लेने की धमकी दी थी. उसी रंजिश के चलते पड़ोसी युवक समेत आधा दर्जन लोग सुबह उसके घर पहुंचे थे. पड़ोसी के साथ घर के अंदर कूदकर आया उसका साथी घटना के समय मुंह कपड़े से ढके था. उनके तीन-चार अन्य साथी घटना के समय घर के बाहर खड़े थे.

सूचना मिलने पर अपर पुलिस अधीक्षक, बबेरू के सीओ और बिसंडा के थानाध्यक्ष ने घटनास्थल का मुआयना कर आला कत्ल ईंट व जैकेट को अपने कब्जे में लिया. सीओ का कहना है कि शीघ्र हत्या के आरोपियों को जल्द से जल्द पकड़ा जाएगा.

अरूंधति रॉय ने जिग्नेश मेवाणी को चुनाव लड़ने के लिए दिया 3 लाख का चंदा

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अहमदाबाद। गुजरात में दलित आंदोलन के चेहरे जिग्नेश मेवाणी के आंदोलन को बुकर प्राइज विजेता लेखिका अरुंधति रॉय ने तीन लाख रुपए दिए हैं ताकि वह चुनाव प्रचार में स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में प्रचार कर सकें.

अरुंधति रॉय ने एक मैगजीन को बताया “मैं उनके कई समर्थकों में से एक हूं. मैंने उनके अभियान में योगदान दिया क्योंकि मेरा मानना है कि जिग्नेश मेवाणी मुख्यधारा की भारतीय राजनीति में एक तरह की सफलता का प्रतिनिधित्व करते हैं. उनके पास एक विजन और विश्वास है और हमें जिस दिशा में आगे बढ़ने की जरूरत है, उसके बारे में उनके पास एक वास्तविक, बहुआयामी समझ है.” हाल ही में अरुंधति रॉय का नया उपन्यास ‘मिनिस्ट्री ऑफ अटमोस्ट हैप्पीनेस’ चर्चा में रहा था.

दलित नेता मेवाणी ने अरुंधति रॉय को आंदोलन में योगदान देने के लिए धन्यवाद किया. मेवाणी कांग्रेस के बाहरी समर्थन के साथ एक स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में बनासकांठा जिले की वडगाम (एससी) सीट से चुनाव लड़ेंगे. इसके लिए वह क्राउडफंडिंग कर रहे हैं. अपनी अपील में वे कहते हैं कि उनका आंदोलन गुजरात के दलितों को भीड़-शासन के विरुद्ध प्रेरित करने के लिए है.

उनकी इस फंड इकट्ठा करने की मुहिम का नाम ‘जनता की लड़ाई, जनता के पैसे से’ है. मेवाणी का कहना है कि वह ‘स्वायत्तता और आंदोलन की पूरी आजादी’ बनाए रखने के लिए राजनीतिक और कॉर्पोरेट फंडिंग से दूर रहेंगे.

फंड रेजिंग वेबसाइट के मुताबिक, मेवाणी ने पहले ही एक हफ्ते में 5,50,000 रुपए जुटाए हैं, जिनमें से 3,00,000 रुपयों का योगदान अरुंधति रॉय द्वारा किया गया है.

दलित अधिकारों की मजबूती से वकालत करने वाली रॉय भाजपा की आलोचक हैं. भाजपा ने उन पर ‘राष्ट्र विरोधी’ होने का आरोप लगाया था. रॉय ने आरोप लगाया था कि भाजपा हिंदू राष्ट्रवाद के नाम पर ब्राह्मणवाद को बढ़ावा दे रही है और उन्होंने कहा था कि इस समय अल्पसंख्यक डर में जी रहे हैं.

संजय लीला भंसाली और प्रसून जोशी संसदीय समिति के सामने हुए पेश

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नई दिल्ली। संसदीय कमेटी के सामने पेशी के बाद पद्मावती के निर्देशक संजय लीला भंसाली ने सफाई दी है. भंसाली ने कहा, ‘मेरी फिल्म पद्मावती की कहानी इतिहास पर आधारित नहीं है. यह मलिक मोहम्मद जायसी की कविता पर आधारित है.’ मीटिंग दो घंटे से ज्यादा देर तक चली. भंसाली का यह बयान नए विवाद को जन्म दे सकता है.

संजय लीला भंसाली और सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष प्रसून जोशी संसद की इन्फॉर्मेशन और टेक्नॉलजी कमेटी के सामने पेश हुए. 14 सदस्यीय इस कमेटी के 8 सदस्यों के सामने प्रसून जोशी पेश हुए. बीजेपी से दो सदस्यों ने फिल्म पर बैन की मांग की तो शिवसेना के सदस्य ने इसका समर्थन किया. बाकी के सदस्यों ने कहा कि जब सेंसर बोर्ड ने फिल्म को मंजूरी ही नहीं दी है तो बैन का सवाल कहां से उठता है.

संसदीय कमेटी के सामने प्रसून जोशी ने कहा कि उन्होंने अभी तक फिल्म नहीं देखी है. फिल्म को पहले रीजनल कमेटी देखेगी और फिर सेंट्रल कमेटी. सेंसर बोर्ड पहले एक्सपर्ट्स की राय लेगा फिर किसी नतीजे पर पहुंचेगा. मीटिंग में सेंसर बोर्ड चीफ से पूछा गया कि क्या फिल्म के प्रोमो को अप्रूव कराया गया था. जिस पर उन्होंने कहा, हां प्रोमो अप्रूव थे. कुछ मेंबर्स ने यह भी कहा कि कमर्शियल फायदे के लिए विवादों को तूल दिया जा रहा है.

निर्देशक भंसाली की तरफ से लिखित में कमिटी को बताया गया कि फिल्म इतिहास के तथ्यों पर आधारित है। लेकिन जायस की पद्मावत तो घटना के कई सौ साल बाद लिखा गया, वो सत्य कैसे हो सकता है? इस सवाल के जवाब में उन्‍होंने कहा, क्या पद्मावती, राजा रत्नसेन और पद्मावती का महल आज भी है वो काल्पनिक है?

कोटा से भाजपा सांसद ओम बिड़ला ने कहा, हमने पीटिशन कमिटी के सामने अपनी बात रख दी है. निर्देशक ने लिखित में कमिटी को बताया था कि इतिहास के तथ्यों के आधार पर फिल्म बनाई गई है. सेंसरबोर्ड इतिहास के साथ छेड़छाड़ को देखे. प्रोमों को सर्टिफिकेट दिया या नहीं? ये सेंसर बोर्ड बताएगा लेकिन जो प्रोमों और ट्रेलर दिखाए जा रहे हैं, जब वहीं आपत्तिजनक है तो फिल्म में कितना आपत्तिजनक होगा.

युवराज सिंह को मिली डॉक्टरेट की मानद उपाधि

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भोपाल। भारतीय क्रिकेट टीम के स्टार क्रिकेटर और हरफनमौला ऑलराउंडर युवराज सिंह को खेल में दिये योगदान के लिये ग्वालियर के आईएमटी विश्वविद्यालय ने गुरुवार को दर्शनशास्त्र में डॉक्टरेट की मानद उपाधि से सम्मानित किया.

क्रिकेटर युवराज को यह सम्मान मैदान में असाधारण खेल कौशल दिखाने के अलावा कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से निजात पाने के बाद दूसरों को हौसला देने के लिये दिया गया. बता दें कि युवराज सिंह ने कैंसर से उबरकर भी बेहतरीन खेल का प्रदर्शन किया था.

यहां जारी एक विज्ञप्ति के मुताबिक, युवराज के अलावा यह सम्मान डा. ए.एस किरण कुमार (अंतरिक्ष विज्ञान), गोविंद निहलानी (फिल्म), डा. अशोक वाजपेयी (कवि), रजत शर्मा ( मीडिया), डा. आर.ए माशेलकर (विज्ञान एवं तकनीक) और अरुणा राय (सामाजिक कार्य) को भी दिया गया.

युवराज सिंह ने कहा कि ‘डाक्टरेट की उपाधि पाकर मैं सम्मानित महसूस कर रहा हूं. इससे मुझे अतिरिक्त जिम्मेदारी का अहसास होता है और मैं अपने कार्यों से दूसरों के लिये उदाहरण बनना चाहता हूं.’ युवराज ने देश के लिये 400 से ज्यादा अंतरराष्ट्रीय मैचों में 10,000 से ज्यादा रन बनाये हैं. उन्होंने भारत के टी20 विश्व कप 2007 और एकदिवसीय क्रिकेट विश्व कप 2011 जीतने में अहम भूमिका निभाई थी.

भाजपा शासित राज्य में दलितों पर अत्याचार बढ़ेंः रिपोर्ट

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नई दिल्ली। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) ने देश में अपराध को लेकर आंकड़े जारी किए हैं. एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक हत्या और महिलाओं के खिलाफ अपराध जैसे सर्वाधिक मामले 2016 में उत्तर प्रदेश में दर्ज हुए हैं. वहीं दलितों के खिलाफ अपराध के मामले उन राज्यों में ज्यादा दर्ज किए गए हैं, जहां भारतीय जनता पार्टी की सरकारें हैं.

एनसीआरबी के आंकड़ों में बताया गया है कि देश में महिलाओं के साथ बलात्कार के मामले 12.4 फीसदी बढ़े हैं. 2015 में बलात्कार के 34,651 मामले दर्ज हुए थे, जिसकी तुलना में 2016 में 38,947 मामले दर्ज हुए. इनमें मध्य प्रदेश में बलात्कार के सबसे ज्यादा 4,882 मामले सामने आए, वहीं उत्तर प्रदेश में बलात्कार के मामलों की संख्या 4,816 रही.

आंकड़ों के मुताबिक हत्या और महिलाओं के खिलाफ अपराध जैसे सर्वाधिक मामले वर्ष 2016 में उत्तर प्रदेश में दर्ज किए गए. देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में हत्या की घटनाएं सबसे ज्यादा हुईं. यहां हत्या की 4,889 घटनाएं हुईं, जो ऐसे कुल मामलों का 16.1 फीसदी है. वहीं मेट्रो शहरों में दिल्ली के हालात सबसे खराब हैं. दिल्ली 38.8 फीसदी क्राइम रेट के साथ पहले नंबर पर, दूसरे पर 8.9 फीसदी के साथ दूसरे और 7.7 फीसदी के साथ मुंबई तीसरे नंबर पर है.

बाबासाहेब को धम्म दीक्षा देने वाले भदंत प्रज्ञानंद महास्थवीर का हुआ परिनिर्वाण

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नई दिल्ली। बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर को धम्म दीक्षा दिलाने वाले दीक्षा गुरू भदंत प्रज्ञानंद महास्थवीर का परिनिर्वाण हो गया. उनका परिनिर्वाण आज सुबह 11 बजे हुआ. उनका पार्थिव  शरीर आज लखनऊ के रिसालदार बुद्धविहार में दर्शनार्थ रखा गया.

प्रज्ञानंद महास्थवीर पिछले कई दिनों से अस्वस्थ चल रहे थे. रविवार को उनकी तबीयत ज्यादा बिगड़ गई. जिसके बाद उन्हें किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय के ट्रॉमा सेंटर में भर्ती कराया गया. सांस लेने में तकलीफ होने पर सोमवार को उन्हें गांधी वार्ड के आइसीयू में शिफ्ट किया गया. अंततः आज सुबह (30 नवंबर) 11 बजे उनका परिनिर्वाण हो गया.

प्रज्ञानंद का जन्म 18 दिसंबर, 1927 को श्रीलंका के गलगेदर गांव में हुआ था. वर्ष 1941 में लखनऊ के बुद्ध विहार रिसालदार पार्क लालकुआं के संस्थापक बोधानंद के बुलावे पर वह भारत आए. वर्ष 1942 में बौद्ध भिक्षु बने. इस दौरान 1948 व 1951 में दो बार डॉ. भीमराव अंबेडकर लखनऊ आए और उनसे मुलाकात की. वर्ष 1952 में बोधानंद का स्वर्गवास हो गया. इसके बाद बौद्ध विहार की कमान प्रज्ञानंद को सौंपी गई. 14 अक्टूबर, 1956 को सात भंतों की मौजूदगी में बाबासाहेब ने लाखों समर्थकों के साथ बौद्ध धम्म की दीक्षा ग्रहण ही. उन सात भंतों में सिर्फ प्रज्ञानंद ही अब तक जीवित रहे.

ग्राउंड रिपोर्ट: गुजरात के दलितों पर मोदी, राहुल का असर क्यों नहीं?

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स्टेट हाइवे 55 के दोनों किनारों पर कंटीली झाड़ियों की क़तारों के पीछे से कपास और गेहूं के खेत झांक रहे हैं. खेतों का यह विस्तार पार करते हुए हम पाटन की हरजी तालुका में बसे बोरतवाड़ा गांव पहुचंते हैं. बोरतवाड़ा के दलित बहुल इलाक़े में बसे रोहितवास मोहल्ले में रहने वाले गांव के सरपंच महेश भाई मकवाना के लिए यह एक व्यस्त सुबह है.

गांव के पहले दलित सरपंच हम उनके पक्के मकान के सामने बंधी भैसों और साथ ही खड़े ट्रैक्टर के बगल से गुज़रकर उन तक पहुँचते हैं. यहां कागज़ों और मोबाइल फ़ोन के बीच उलझे 41 वर्षीय महेश लगातार पंचायत के रोज़मर्रा के काम निपटा रहे हैं. बोरतवाड़ा के इतिहास में महेश इस गांव के पहले दलित सरपंच हैं. सन 1961 में गुजरात पंचायत एक्ट के बनने के बाद 2016 में पहली बार बोरतवाड़ा को अनुसूचित जाति/जनजाति के तहत आरक्षित सीट घोषित किया गया. गांव में आरक्षित सीट पर हुए इस पहले पंचायत चुनाव को 12 वोटों से जीत कर महेश ने अप्रैल 2017 में सरपंच का कार्यभार संभाला. पर दो महीने के भीतर ही गांव की पंचायत कमेटी उनके ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव ले आई.

महेश का आरोप है कि एक दलित होने के कारण पंचायत कमेटी के सदस्य उन्हें पसंद नहीं करते. वे कहते हैं, “मुझे गांव के 3200 आम लोगों ने वोट देकर सरपंच चुना लेकिन पंचायत कमेटी के पांच ठाकुर पंचायत को अपनी मुट्ठी में रखना चाहते हैं. वो मुझे और पंचायत को काम नहीं करने देते. गांव के विकास कार्यों के लिए जारी बज़ट को अटकाने से लेकर अविश्वास प्रस्ताव लाकर पंचायत भंग करने तक मुझे रोकने और परेशान करने लिए हर संभव प्रयास किया जाता है”.

‘जिग्नेश मेवानी हमारा नेता हैं’ बोरतवाड़ा पंचायत कमेटी में महेश के अलावा 11 और सदस्य हैं जिनमें पांच ठाकुर और तीन चौधरी सदस्य शामिल हैं. अविश्वास प्रस्ताव तो पारित नहीं हुआ पर महेश के ज़ेहन में अविश्वास की एक गहरी लकीर खिंच चुकी है. गुजरात चुनाव में अपने गांव के दलितों के बारे करते हुए वे कहते हैं, “जिग्नेश मेवानी हमारा नेता हैं. भाजपा हो या कांग्रेस, हम उसी को वोट देंगे जो गुजरात के दलितों के लिए जिग्नेश की 12 मांगों को मानेगा. अगर मांगें नहीं मानी गईं तो नोटा दबा देंगे. मेरा तो जिग्नेश से कहना है कि वे दलितों के लिए अलग राज्य की मांग करें.” अलग राज्य का ख़्याल दिल में आने की वजह पूछने पर महेश खामोश हो जाते हैं. फिर आंखों में आए आंसू और चेहरे पर मुस्कान लिए वह कहते हैं, “सिर्फ़ 70 दलित घरों वाले इस गांव के 3200 लोगों ने मुझे अपना सरपंच चुना. पर सिर्फ़ पांच ठाकुर मुझे काम नहीं करने दे रहे. मुझ पर सबके सामने अपमानजनक जातिगत टिप्पणियां की जाती हैं. इससे बड़ा दुख और क्या हो सकता है?”

क्या कहते हैं ठाकुर? हम रोहितवास मोहल्ले से निलककर हरजी तालुका केंद्र पहुंचते हैं, जहां हमारी मुलाक़ात बोरतवाड़ा पंचायत कमेटी के सदस्य भरत और दिलीप ठाकुर से होती है. एक ही परिवार से आने वाले इन दोनों भाइयों के पिता मांगाजी ठाकुर बोरतवाड़ा के उपसरपंच हैं. महेश के आरोपों को ख़ारिज करते हुए भरत कहते हैं कि महेश अपनी मनमानी चलाते हैं. वे कहते हैं, “जब गांव की सीट रिज़र्व घोषित हुई तब हमने सारे दलित समाज को गांव के शंकर मंदिर पर बुलाया और कहा कि आपस में सहमति करके किसी एक को चुन लें, चुनाव की क्या ज़रूरत है? पर नहीं, इन सबको तो फॉर्म भरना था.” ”फिर चुनाव के बाद महेश मकवाना सरपंच तो बन गया पर वह हम सबकी सहमति के ख़िलाफ़ अकेले सब तय करना चाहता है इसलिए हम उसके ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव लाए. हमारे घर के लोग सालों से पंचायत में हैं पर ऐसा कभी नहीं हुआ. हम तालुका विकास अधिकारी से भी महेश की शिकायत करेंगे”. गांव के चुनावी रुझान के बारे में बात करते हुए पंचायत समिति के सदस्य भरत कहते हैं, “हमारे गांव में किसी जिग्नेश का कोई प्रभाव नहीं है. यहां के सारे दलित उसी को वोट देंगे जिसे वोट देने के लिए हम कहेंगे. और हम चुनाव में अपना वोट कांग्रेस या भाजपा को देखकर नहीं, स्थानीय उम्मीदवार को देखकर तय करते हैं.”

‘उन्हें दलित सरपंच पसंद नहीं था’ अहमदाबाद की तरफ़ लौटते हुए मेहसाणा जिले की हेडवा हनुमंत ग्राम पंचायत में हमारी मुलाक़ात सरपंच संजय परमार के परिवार से होती है. मेहसाणा शहर के मुहाने पर बसी इस ग्राम पंचयात का भौगोलिक फैलाव ग्रामीण और कस्बाई क्षेत्रों के बीच बंटा हुआ है. शहरी पृष्ठभूमि से आने वाले 39 वर्षीय संजय, व्यवसायी होने के साथ-साथ हेडवा के पहले दलित सरपंच भी हैं. 2015 में पहली बार आरक्षित सीट पर चुनाव जीतने के बाद वो सिर्फ़ पंद्रह महीने तक ही अपना कार्यकाल संभाल सके. एक आवासीय परिसर में बने उनके घर पहुंचने पर पता चलता है कि संजय लंबे बुखार की वजह से अस्पताल में भर्ती हैं. पर एक दलित सरपंच के तौर पर अपना अनुभव बताने के लिए वह अस्पताल में ही हमसे बात करने को तैयार हो जाते हैं. ग्लूकोज़ ड्रिप एक हाथ में लगाकर लेटे हुए वे कहते हैं, “63 साल से हेडुआ में पंचायत चल रही है पर कभी किसी सरपंच का कार्यकाल बाधित नहीं हुआ. पर सिर्फ़ एक दलित सरपंच के साथ ही ऐसा क्यों?” ”मुझे बज़ट पास नहीं करने दिया गया, कोई विकास कार्य नहीं करने दिया गया और बहुमत से पंचायत को भंग कर दिया गया. सिर्फ़ इसलिए कि पिछले बीस साल से उच्च जाति के जिस दरबार परिवार का पंचायत पर क़ब्ज़ा था, उन्हें मेरे जैसा दलित सरपंच पसंद नहीं था.”

न्याय की लंबी लड़ाई संजय ने सरपंच के तौर पर अपने साथ हुए पक्षपातपूर्ण हमलों के ख़िलाफ़ ‘अनुसूचित जाति और जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम’ के तहत तीन शिकायतें दर्ज करवाईं और आज भी न्याय के लिए वे लंबी अदालती लड़ाई लड़ रहे हैं. अप्रैल 2017 में सामान्य सीट पर चुनाव जीतकर संजय दोबारा सरपंच बने. अपनी इस जीत के बारे में वे कहते हैं, “मुझे हेडवा के शहरी इलाक़ों में रहने वाले पढ़े लिखे लोगों ने वोट देकर जिताया है, सिर्फ ग्रामीण जनता के भरोसे तो मैं कभी नहीं जीत पाता.” ”मेरे पिता इनकम टैक्स कमिश्नर रहे हैं. मैंने सारी ज़िंदगी शहर में गुज़ारी. यहीं मेहसाणा में पला-बढ़ा. शहर में कभी किसी ने अहसास नहीं दिलाया कि मैं दलित हूँ मगर पंचायत में आने के बाद पहली बार मुझे मेरी दलित पहचान का अहसास हुआ. पंचायत कमेटी में काम करते हुए बार-बार मुझे अपनी जाति का अहसास होता.” ‘जिग्नेश दलितों की अलग पार्टी बनाएँ’ इस गुजरात चुनाव में जिग्नेश मेवानी के नेतृत्व में उभरे दलित प्रभाव को लेकर संजय ज़्यादा आशान्वित नहीं हैं. वे कहते हैं, “जिग्नेश के आंदोलन से मेरे जैसे लोगों को बहुत साहस तो मिला है पर यह आंदोलन इस चुनाव में कितनी बड़ी राजनीतिक सफ़लता में परिवर्तित होगा, इसके बारे में मैं कुछ नहीं कह सकता.” ”पर मैं जिग्नेश से यही कहना चाहता हूं कि वह कांग्रेस और भाजपा में से किसी पार्टी का साथ न दें और गुजरात के दलितों की अलग राजनीतिक पहचान बनाएं”.

भाजपा की ओर भी रुझान मेहसाणा जिले के ही अकाबा गाँव के दलित सरपंच मनु भाई परमार लंबे समय से क्षेत्र में भाजपा कार्यकर्ता के तौर पर सक्रिय रहे हैं. गुजरात चुनाव को लेकर उनकी राय महेश और संजय से उलट है. उन्होंने राज्य चुनाव में भी भाजपा की जीत का दावा करते हुए कहा कि प्रदेश की भाजपा सरकार ने दलितों के उत्थान के लिए लगातार विकास कार्य किए हैं. वो कहते हैं, “गुजरात में दलितों की स्थिति ख़राब है, इस तथ्य से पूरी तरह इनकार नहीं किया जा सकता. पर दलितों की इस स्थिति के लिए भाजपा सरकार ज़िम्मेदार नहीं है. यह समस्या प्रशासनिक कम है और सामाजिक रूढ़ियों से ज़्यादा जुड़ी हुई है. गुजरात की भाजपा सरकार ने दलितों के लिए बहुत काम किया है. रमनलाल वोराह और आत्माराम परमार जैसे नेताओं ने हमारे समाज के लिए बहुत काम किया है इसलिए हम इस बार भी भाजपा को ही वोट देंगे.”

प्रियंका दुबे की रिपोर्ट बीबीसी से साभार

सामाजिक क्रान्ति का दस्तावेज है भारतीय संविधान

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हम सब के लिए अत्यंत हर्ष एवं गौरव की बात है कि 26 नवम्बर को पिछले दो वर्षो से संविधान दिवस के रूप में मनाने की परंपरा की शुरूआत केन्द्र एवं राज्य सरकारों द्वारा की गयी है. 26 नवम्बर 1949 को संविधान निर्माता समिति द्वारा भारतीय संविधान का प्रलेख भारतीय गणतंत्र (जन-गण-मन) को समर्पित किया गया था. आम जनमानस की गतिशील चेतना के फलस्वरूप भारतीय संविधान की प्रस्तावना में पंथ-निरपेक्ष, समाजवादी तथा राष्ट्र की अखण्डता जैसे नए-नए शब्दों को अंगीकृत किया गया है.

भारतीय संविधान एक स्थूल प्रलेख नहीं है, बल्कि जनमानस की चेतना के अनुरूप गत्यात्मक प्रलेख है, जिसे सामाजिक क्रान्ति के दस्तावेज के रूप में भी परिभाषित किया गया है (जी0 ऑस्टिन). संविधान के संरक्षक यानि उच्चतम न्यायालय को नागरिकों और अल्पसंख्यकों के संरक्षण का दायित्व सौंपा गया है.

भारतीय संसदीय व्यवस्था में प्रतिपक्ष का होना अपरिहार्य माना गया है. सशक्त एवं जागरूक प्रतिपक्ष के अभाव में संसदीय व्यवस्था स्वयमेव सर्वसत्तावादी व्यवस्था यानि अधिनायकवाद के स्वरूप में परिवर्तित मानी जायेगी. संसदीय लोकतांत्रिक व्यवस्था को पुर्नजीवित करने के लिए संवाद, संहिष्णुता, प्रतिपक्ष के रचनात्मक सुझावों को स्वीकार करने की परंपरा को बल प्रदान किया जाना चाहिए. जनवादी सोच से प्रेरित संगठनों/व्यक्तियों को सत्तारूढ़ दल के विचारधाराओं के प्रति संयमित तरीके से असहमति दर्ज करने की स्वतंत्रता प्रदत्त होनी चाहिए, अन्यथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के स्वर स्वतः दफन हो जायेंगे.

संविधान में प्रत्येक व्यक्ति के लिए सरकारी स्वास्थ्य केन्द्रों के माध्यम से स्वास्थ्य सेवाओं की सुलभता नागरिको के प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण (अनुच्छेद 21) की श्रेणी में रखा गया (Paschim Banga Kheta Mazdoor Samiti Vs. State of West Bengal, Pt. Parmananda Katara Vs. Union of India). संविधान के अनुच्छेद 41, 42,47 में राज्य के नीति निदेशक सिद्धांतों के माध्यम से लोक-स्वास्थ्य, पोषण स्तर, काम की न्याय संगत और मानोचित दशाओं के सुधार हेतु उपबंध किये गये हैं.

पंथ-निरपेक्षता को संविधान का आधारभूत ढांचे के रूप में स्वीकार किया गया है. पंथ-निरपेक्ष शब्दावली का तात्पर्य ऐसे राष्ट्र से है जो किसी विशेष धर्म को राजधर्म के रूप में मान्यता नहीं प्रदान करता वरन सभी धर्मों के साथ समान व्यवहार करता है. पंथ-निरपेक्षता की अवधारणा संविधान की ‘‘विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता‘‘ की शब्दावली में विवक्षित है. विगत कुछ वर्षो से जाति विशेष द्वारा राजकीय/संवैधानिक प्रमुखों को राजकीय समारोह के माध्यम तलवार, गदा व फरसा जैसे हथियार उपहार स्वरूप भेंट किये जा रहें है, जो एक तरफ जाति विशेष के शौर्य व पराक्रम का प्रतीक है, तो दूसरी तरफ जाति विशेष द्वारा अस्त्र-शस्त्र का खुले आम प्रदर्शन तथा संग्रह करने की मनोवृति की राजकीय स्वीकृति है. उक्त आचरण से जाति विशेष द्वारा हिंसा व उदण्ड प्रवृति के प्रचार-प्रसार के स्वीकार्यता को बल मिलता है जबकि घातक हथियारों का सार्वजनिक प्रदर्शन, संग्रह पर कानूनी प्रतिबन्ध है. उक्त प्रकार के कार्यक्रमों, आयोजनों को शासन द्वारा प्रतिबंधित किया जाना चाहिए.

रोविन्द्रा संजीवईया प्रवक्ता-हिन्दी इन्द्रसना इन्टर कॉलेज बालापार-गोरखपुर (उत्तर प्रदेश)

निकाय चुनाव खत्म होते ही यूपी में बढ़े बिजली के दाम

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लखनऊ। उत्तर प्रदेश में सत्ता में आते ही जनता को 24 घंटे बिजली देने का वादा करने वाली योगी सरकारने बड़ा झटका दिया है. निकाय चुनाव खत्म होते ही राज्य विद्युत नियामक आयोग ने बिजली की दरों में बढ़ोत्तरी का ऐलान किया है.

नई कीमतों के मुताबिक पहली 100 यूनिटों के लिए 3 रुपये और इसके बाद 4.50 रुपये प्रति यूनिट के हिसाब से बिल आएगा. उत्तर प्रदेश विद्युत नियामक आयोग ने वर्ष 2017-18 के लिए ग्रामीण अनमीटर्ड कनेक्शन का मासिक बिल 180 से बढ़ाकर 31 मार्च 2018 तक 300 रुपये और उसके बाद 400 रुपये किया गया है. आयोग ने ग्रामीण घरेलू बिजली दरों में 63 फीसद, शहरी घरेलू में 8.49 फीसद, कॉमर्शियल में 9.89 और ऑफिसेस की बिजली दरों में 13.46 फीसद की वृद्धि की है.

पहले से ही महंगाई की मार झेल रही यूपी की जनता के लिए बिजली का यह ‘करंट’ काफी सताने वाला साबित हो सकता है क्योंकि इससे कई चीजों के दाम भी ऊपर जा सकते हैं. वहीं राज्य सरकार के ऐलान के बाद भी कई जिलों में बिजली की हालत जस की तस बनी हुई है.

अगले सप्ताह से बिजली महंगी हो जाएगी. उद्योगों को छोड़ गांव से लेकर शहरवासियों को महंगी बिजली का तगड़ा झटका लग गया. गुरुवार को उत्तर प्रदेश विद्युत नियामक आयोग टैरिफ आर्डर जारी कर दिया. नगरीय निकाय चुनाव में जनता की नाराजगी से बचने के लिए राज्य सरकार के इशारे पर अब तक टैरिफ आर्डर न जारी करने वाले नियामक आयोग ने गुरुवार को चालू वित्तीय वर्ष के लिए बिजली की दरें घोषित कर दी.

अध्यक्ष पद के लिए इलेक्शन नहीं सिलेक्शन कर रही है कांग्रेसः पूनावाला

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  rahul gandhi

नई दिल्ली। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी जहां एक तरफ गुजरात चुनाव में बीजेपी के खिलाफ मोर्चा खोले बैठे हैं…तो दूसरी तरफ उनके ही पार्टी नेता शहजाद पूनावाला ने राहुल की मुश्किलें बढ़ा दी है…शहजाद पूनावाला का मानना है कि कांग्रेस में अध्यक्ष पद के लिए हो रहे चुनाव महज दिखावा है और सिर्फ राहुल को जीताने के लिए ये चुनाव हो रहा है…यानि उनका ये मानना है कि पार्टी इलेक्शन नहीं बल्कि राहुल का सेलेक्शन कर रही है…

शहजाद का ये भी कहना है कि अगर पार्टी में निष्पक्ष रुप से चुनाव होता है तो वो अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ने के लिए तैयार हैं…उन्होंने राहुल पर निशाना साधते हुए कहा कि वे पिछले 6 साल से राहुल से मिलने के लिए समय मांग रहे हैं…ताकि उन्हें पार्टी के अंदर की खामियों के बारे में बता सके…लेकिन अभी तक वो अपने मकसद में कामयाब नहीं हो पाए हैं… वैसे उन्होंने ये भी इच्छा जाहिर की है कि राहुल गांधी टीवी पर डिबेट के लिए आएं और ये बताएं कि पार्टी के लिए उनका क्या विजन है.

इधर कांग्रेस ने पूनावाला के इस बयान को गंभीरता से नहीं लेने की बात कही है…पार्टी के नेताओं का मानना है… कि शहजाद ने अभी तक पार्टी सदस्यता का नवीकरण नहीं कराया है…इसलिए इनकी बातों को गंभीरता से नहीं लिया जाना चाहिए… महाराष्ट्र कांग्रेस सचिव के रुप में अक्सर टीवी पर होने वाले डिबेट में शहजाद पूनावाला पार्टी का बचाव करते हुए दिख जाते हैं…और अब देखना है कि राहुल की ताजपोशी पर नजरें गड़ाए..पूनावाला कांग्रेस के लिए और क्या क्या मुश्किलें खड़ी करते हैं.

दलित की बारात रोक की मारपीट, दूल्हा बारात लेकर पहुंचा थाने

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gurdaspur

गुरदासपुर। पंजाब के गुरदासपुर में एक दलित की बारात को रोकने और बारातियों के साथ मारपीट करने का मामला सामने आया है. इसकी शिकायत जब पुलिस ने लिखने से मना कर दिया तो दूल्हा बारात लेकर थाने पहुंच गया. इसके बाद पुलिस ने शिकायत दर्ज कर कार्रवाई का आश्वासन दिया तब जाकर बारात रवाना हुई.

दरअसल, गुरदासपुर के थाना दोरांगला के गांव गुत्थी में एक उच्च जाति परिवार के लोगों ने दलित परिवार की निकल रही बारात के दौरान दूल्हे सहित बारातियों से मारपीट कर उनकी बारात रोकने की कोशिश की. इतना ही नहीं जातिवादी गुंडों ने दलितों को जाति सूचक गालियां तथा बारात न ले जाने की धमकियां दीं. पीडि़त लोग अपनी शिकायत लेकर थाना दोरांगला पहुंचे, लेकिन वहां पर उनकी कोई सुनवाई नहीं हुई. जिसके बाद दूल्हा अपनी बारात सहित एसएसपी कार्यालय में पहुंचा, लेकिन वहां पर भी तसल्ली बख्श जवाब न मिलने के चलते सभी बाराती थाने में ही रहे. इसके बाद पुलिस ने माहौल बिगड़ता देख आरोपियों पर कार्रवाई का आश्वासन दिया, जिसके बाद बारात शादी के लिए रवाना हुई.

गुत्थी गांव के पीड़ित दूल्हे बलजिन्दर ने बताया कि वह बीएसएफ में है और इस समय छत्तीसगढ़ में तैनात है. 29 नवंबर को उसकी शादी थी तथा उसे बारात लेकर जालंधर जाना था. सुबह करीब 9 बजे, जब वह घोड़ी पर बैठा था और उसकी भाभियां उसे सुरमा लगाने की रस्म निभा रही थीं तो इसी दौरान गांव का ही पृतपाल सिंह जिनके घर भी शादी होने वाली है ट्राली में कुर्सियां लेकर आ रहा था. उसने हमसे रास्ता मांगा जिस पर हमारे रिश्तेदारों ने कहा कि रस्म हो रही है थोड़ा इंतजार कर लो. इसके बाद उसने फोन करके अपने घर से अपने भाइयों अमनदीप व अमृतपाल के अलावा कुछ और नौजवानों को बुला लिया, जिन्होंने मुझे घोड़ी से नीचे उतारने की कोशिश की तथा बीच-बचाव के लिए आए परिवार व अन्य रिश्तेदारों से मारपीट की. मारपीट के दौरान उन्होंने हमें जातिसूचक गालियां भी दी तथा धमकियां देने लगे कि यह बारात कहीं नहीं जाएगी.

बलजिन्दर के पिता हरभजन और माता तनिन्दर कौर ने आरोप लगाया कि पृतपाल उच्च जाति से संबंधित हैं तथा उनके घर से कोई भी लड़का कोई काम नहीं करता. मेरे दो बेटे हैं, जिनमें से बड़ा विदेश में है तथा छोटा बीएसएफ में है. मनुवादियों ने इसी बात के कारण हमसे रंजिश रखते हैं. मनुवादियों ने स्थानीय नेताओं की शह पर हमारा घर भी तुड़वा दिया था. लेकिन आज जो उन्होंने कहा कि उससे हमें बेहद शर्मिंदा होना पड़ा है.

शहर के डीएसपी एडी सिंह ने बताया कि शिकायत मिलने के बाद संबंधित थाना प्रभारी को कार्रवाई के आदेश जारी कर दिए गए हैं. जातिसूचक गालियां व धमकियां देने संबंधी जांच करने के बाद ही कार्रवाई की जाएगी. दोरांगला थाना के प्रभारी कुलविन्दर सिंह ने कहा कि उक्त मामले में कुछ लोगों को पकड़ा गया है. पीडि़त परिवार ने अभी तक कोई बयान नहीं दिया. उनके बयान लेने के बाद ही कार्रवाई की जाएगी.

इनपुट दैनिक भास्कर से

यूपी निकाय चुनावः एक बूथ ऐसा भी जहां सिर्फ 6 लोगों ने डाला वोट

up बुलंदशहर। भारत में चुनाव को लोकतंत्र का महापर्व कहा जाता है लेकिन बुधवार को संपन्न तीसरे व अंतिम चरण के मतदान वाले दिन एक पोलिंग बूथ पर ऐसा नजारा देखने को मिला जैसे कि लोकतंत्र में वोट की चोट से नेता चुनने से लोगों का विश्वास ही उठ गया हो. खबरों के मुताबिक बुलंदशहर जनपद की नगर पालिका परिषद सिकन्द्राबाद के जैन इंटर कॉलेज को 55 नम्बर का बूथ बनाया गया था. इस बूथ पर 900 वोट थे, लेकिन सुबह 7:30 बजे से शाम 5 बजे तक मात्र 6 वोट ही पड़े. जिससे लोगों के लोकतंत्र व नेताओं से उठते विश्वास की पुष्टि होती है. वैसे अभी इतने अल्प मतदान के कारण का पता नहीं चल पाया है. हालांकि मामले के एसडीएम के संज्ञान में आने के बाद उन्होंने जांच का आश्वासन दिया है. वैसे तो नगर पालिका क्षेत्र में छिटपुट घटनाओं के बीच बुधवार को निकाय चुनाव शांतिपूर्वक संपन्न हो गया. हांलाकि, इस दौरान कई जगह फर्जी मतदान और भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पुलिस को हल्का बल का प्रयोग भी करना पड़ा. पुलिस ने ककोड़ नगर पंचायत के 3 प्रत्याशियों को शांति भंग की आशंका में थाने में बैठा लिया. जबकि सिकन्द्राबाद में निर्दलीय प्रत्याशी को नजरबंद कर दिया और सर्मथको पर लाठियां भांजी. कुछ जगह मतदाताओं की लाइन लंबी होने के कारण अव्यवस्था फैल गई हैं. अव्यवस्था देख बूथ अधिकारी पर भड़के प्रेक्षक मतदान के दौरान प्रेक्षक अनिल कुमार सागर जब शिकारपुर के डीएपी इंटर कॉलेज मतदान केंद्र पर पहुंचे तो एक कमरे में हो रही भीड़भाड़ एवं अव्यवस्था को देखकर भड़क गए. उन्होंने तैनात अधिकारी को फटकार लगाई और वोट डालने के लाईन से वोट डलवाने के निर्देश दिए. इस दौरान तहसीलदार शिकारपुर भी मौजूद रहे.

सजा के नाम पर उतरवाए 88 छात्राओं के कपड़े

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इटानगर। अरुणाचल प्रदेश में एक स्कूल के तीन टीचर्स पर गंभीर आरोप लगे हैं, शिकायत है कि उन्होंने स्कूल की 88 लड़कियों को सजा देने के लिए जबरन उनके कपड़े उतरवा दिए. दरअसल, इन छात्राओं ने कथित तौर पर प्रधानाध्यापक के खिलाफ अश्लील शब्द लिखे थे.

पुलिस ने बताया कि पापुम पारे जिला में तनी हप्पा स्थित कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय की छठी और सातवीं कक्षा की 88 छात्राओं को 23 नवंबर को इस सजा का सामना करना पड़ा. हालांकि, यह मामला 27 नवंबर को सामने आया, जब पीड़िताओं ने ऑल सागली स्टूडेंट्स यूनियन (एएसएसयू) से इस पूरी घटना का जिक्र किया. जिसके बाद यूनियन ने स्थानीय पुलिस थाने में प्राथमिकी दर्ज कराई.

शिकायत के मुताबिक दो सहायक शिक्षकों और एक जूनियर शिक्षक ने 88 छात्राओं को अन्य छात्राओं के सामने अपने कपड़े उतारने के लिए मजबूर किया. दरअसल, इन छात्राओं के पास से कागज मिला था जिस पर प्रधानाध्यापक और एक छात्रा के खिलाफ अश्लील शब्द लिखे थे. जिले के पुलिस अधीक्षक तुम्मे अमो ने छात्र संगठन  द्वारा प्राथमिकी दर्ज कराए जाने की आज पुष्टि की.

उन्होंने बताया कि यह मामला महिला पुलिस थाने को सौंप दिया गया है. महिला थाने की प्रभारी ने बताया कि पीड़िताओं और उनके माता पिता के साथ-साथ शिक्षकों से पूछताछ की जाएगी. अरूणाचल प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने इस घटना की निंदा की और कहा कि शिक्षकों की ऐसी जघन्य हरकत छात्राओं को प्रभावित कर सकते हैं. इसने एक बयान में कहा कि किसी बच्चे की गरिमा से छेड़छाड़ करना कानून और संविधान के खिलाफ है.

क्या भाजपा ने गुजरात में हार मान ली है

दिल्ली में भाजपा के अशोका रोड स्थित केंद्रीय पार्टी मुख्यालय सुना सा पड़ा है. ज्यादातर नेता गायब हैं. पूछने पर पता चलता है कि सब गुजरात गए हैं. यानि प्रधानमंत्री मोदी से लेकर पार्टी अध्यक्ष अमित शाह तक सब गुजरात में हैं. अमित शाह इन दिनों भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष की बजाय गुजरात प्रदेश के अध्यक्ष जैसा बर्ताव कर रहे हैं. कुल मिलाकर जो लोग पार्टी दफ्तर में मौजूद हैं, उनसे बात करने पर साफ पता चल जाता है कि शायद भारतीय जनता पार्टी ने गुजरात में हार मान ली है. उनकी हताशा साफ तौर पर दिख रही है. भाजपा को कवर करने वाले पत्रकारों से बात करिए. कोई भी इस बात को लेकर आश्वस्त नहीं है कि भाजपा गुजरात का चुनाव जीत सकती है, बल्कि सब यह मान कर चल रहे हैं कि भाजपा गुजरात में पक्का हार रही है. गुजरात के लोगों से भी बात करने पर यह साफ हो जा रहा है कि गुजरात के दलित और पाटीदार भाजपा को वोट देने के मूड में नहीं है. जी हां, भाजपा द्वारा तमाम पाटीदारों को टिकट दिए जाने के बावजूद पाटीदार समाज भाजपा को वोट नहीं देने जा रहा है. दलितों को उना में गौरक्षकों द्वारा डंडे से की गई पिटाई का दर्द शरीर से होकर उनके दिल में जा बसा है. रही सही कसर जीएसटी ने निकाल दी है. आप गुजरात में मोदी जी का चुनाव प्रचार देखिए. वो क्या-क्या बोल रहे हैं अगर आप इस पर ध्यान देंगे तो उनकी हताशा साफ दिख जाएगी. कल तक ‘हर-हर मोदी घर-घर मोदी’ का नारा लगाने वालों के सर से मोदी का भूत उतर चुका है. गुजरात चुनाव बहुत कुछ कहने जा रहा है, इंतजार करिए.

हम लोगों पीटते हैं, पिटते नहींः राज ठाकरे

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मुंबई। मुंबई के एलफिस्टन रोड स्टेशन हादसे के बाद से ही महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) ने स्टेशन पर सामान बेचने वाले हॉकर्स के साथ मारपीट कर रही है. कई बार हॉकर्स के साथ एमएनएस कार्यकर्ताओं की झड़प हो चुकी है.

बीते रविवार को विख्रोली में हॉकर्स को हटाने का काम कर रहे मनसे कार्यकर्ताओं की ही पिटाई हो गई. इस घटना के बाद से ही मनसे प्रमुख राज ठाकरे गुस्से में है. उन्होंने सोमवार को शिवाजी पार्क रेसीडेंस स्थित कृष्णा कुंज में बैठक आयोजित कर कार्यकर्ताओं को फटकार लगाई.

पार्टी प्रमुख ठाकरे ने अपने जोनल ऑफिस के कार्यकर्ताओं को धमकी देते हुए कहा कि, “अगर आप मनसे के नेता हैं तो आपके साथ ऐसा नहीं होना चाहिए. अगर आप ऐसे ही बार-बार पिटेंगे तो अपने पद से हाथ धोना पड़ेगा. उन्होंने आगे कहा कि पार्टी कार्यकर्ता ऐसा होना चाहिए जो दूसरों को पीटते हैं ना कि खुद पिटते हैं.”

मनसे प्रमुख ने चेतावनी देकर कहा कि “अगली बार जब आप एंटी-हॉकर अभियान पर जाते हैं तो पूरी तैयारी के साथ जाएं. विख्रोली की घटना दोबारा नहीं होनी चाहिए. जब हम खुद की सुरक्षा नहीं कर सकते हैं तो दूसरों को कैसे रख सकते हैं.”

गौरतलब है कि रविवार की रात विख्रोली में मनसे कार्यकर्ताओं ने हॉकरों को उनके स्टॉल्स पर मराठी में साइन बोर्ड और होर्डिंग लगाने की बात की थी. जिसके बाद मामला उग्र होने पर मनसे कार्यकर्ताओं की पिटाई हो गई.इस घटना में चार मनसे कार्यकर्ता और दो कांग्रेस कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया.

कुमार विश्वास ने ढका केजरीवाल का चेहरा

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नई दिल्ली। कुमार विश्वास का एक बेहद दिलचस्प पोस्टर सामने आया है जो आम आदमी पार्टी में विवाद की नई वजह बन सकता है. इस पोस्टर में अरविंद केजरीवाल के चेहरे को पीछे छुपाते हुए कुमार विश्वास सामने खड़े नजर आ रहे हैं. हालांकि खुद कुमार ने इसी 26 नवंबर को रामलीला मैदान के मंच से चेहरों की राजनीति करने पर सवाल खड़े किए थे.

रामलीला मैदान में भी दिया था ‘बगावती बयान’ रविवार 3 दिसंबर को कुमार विश्वास दिल्ली के पार्टी दफ्तर में कार्यकर्ताओं के साथ बैठक करने जा रहे हैं लेकिन इसके लिए जो पोस्टर सोशल मीडिया पर शेयर किया जा रहा है उससे पार्टी का अंदरूनी विवाद बढ़ सकता है. यह पोस्टर तब सामने आया है जब पार्टी के 5 साल पूरे होने पर रामलीला मैदान से कुमार ने तंज कसते हुए कहा था कि कार्यकर्ताओं की आवाज को पार्टी में नही सुना जा रहा है इसलिए उनसे संवाद जरूरी है.

शुरू हो चुका है ‘ट्विटर-वॉर’ यह पोस्टर आम आदमी पार्टी के राजस्थान ट्विटर हैंडल के अलावा खुद कुमार विश्वास ने भी री-ट्वीट किया है. इस पोस्टर के सोशल मीडिया में आने के बाद केजरीवाल और कुमार विश्वास के समर्थक आपस मे भिड़ते नजर भी आ रहे हैं. दो गुटों के बीच तंज कसे जा रहे हैं और जमकर बहसबाजी भी हो रही है.

एक मंच पर थे केजरी-कुमार, फिर भी नहीं हुई बा रामलीला मैदान में स्थापना दिवस के आयोजन पर मंच पर अरविंद केजरीवाल और कुमार विश्वास साथ-साथ बैठे रहे लेकिन दोनों के बीच बातचीत ना के बराबर थी. दिलचस्प बात यह भी रही कि इसी मंच पर कुमार के खिलाफ बयान देने के बाद सस्पेंड होकर भी पार्टी में वापसी करने वाले अमानतुल्लाह खान भी मौजूद नजर आए.

‘ट्वीट’ भी निशानेदार इसी बीच कुमार विश्वास ने अपने ट्विटर हैंडल पर एक ऐसी बात लिखी है जो दोनों आप नेताओं में लंबे समय से चल रहे ‘शीत-युद्ध’ की ओर इशारा करता है. कुमार विश्वास ने लिखा है, “जो लोग फोटोशॉप्ड एलबम के चकाचौंध में जो लोग अपने पहचान-पत्रों में लगे पुराने पासपोर्ट साइज फोटो को भूल जाते हैं, उनकी शिनाख्त तक खत्म हो जाती है.” साफ जाहिर है कि यह ट्वीट किस पर निशाना साध रहा है क्योंकि मीडिया की चकाचौंध में इन दिनों कौन है वह जगजाहिर है.

आज तक से साभार

लालू ने नीतीश को बताया जनादेश का हत्यारा

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पटना। राष्ट्रीय जनता दल (राजद) अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के ‘ट्वीट वार’ पर पलटवार किया और कहा कि बिहार में इकलौता ऐसा मुख्यमंत्री है जिसपर जघन्य हत्या का संगीन आरोप है. यादव ने आज अपने एक के बाद एक ट्वीट में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का नाम लिये बिना उनपर जमकर निशाना साधते हुए लिखा, बिहार में देश का इकलौता ऐसा स्वघोषित देशभक्त मुख्यमंत्री है जिसपर जघन्य हत्या का आरोप है. क्या देश के किसी और मुख्यमंत्री पर निर्मम हत्या का मामला दर्ज है और इसे छुपाने का साहस है.

लालू यादव यहीं नहीं रुके और अपने दूसरे ट्वीट के जरिए तीखा प्रहार करते हुए कहा, क्या आप ‘पेट के दांत’ ठीक करने वाले किसी डेंटिस्ट को जानते है. बिहार में जनादेश का एक हत्यारा है जिसके पेट में दांत है. उसने सभी नेताओं और पार्टियों को ही नहीं बल्कि करोड़ों गरीबों को भी अपने विषदंत से काटा है.

राजद सुप्रीमो ने सवालिया लहजे में कहा कि देश के किस देशभक्त मुख्यमंत्री पर जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के एक होनहार शोधार्थी की थीसिस चोरी करने पर दिल्ली उच्च न्यायालय ने 20 हजार रुपए का जुर्माना लगाया था. बच्चों की थीसिस चुराने वाले थीसिस चोर अपने आप को देशभक्त कहते हैं. उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि बिहार के ‘थीसिस चोर’ देशभक्त मुख्यमंत्री बताएं कि उन्होंने 20 हजार रुपए का जुर्माना चेक में दिया, आरटीजीएस किया या नकद में अदा किया.

इससे पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने आज सुबह ट्वीट करते हुए लिखा, जान की चिंता, माल-मॉल की चिंता, क्या सबसे बड़ी देशभक्ति है. हालांकि अपने ट्वीट में मुख्यमंत्री ने किसी का नाम तो नहीं लिया लेकिन उनका ट्वीट राष्ट्रीय जनता दल (राजद) अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव और पूर्व उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव को जवाब के रूप में देखा जा रहा है. वहीं, मंगलवार को भी मुख्यमंत्री ने राष्ट्रीय जनता दल(राजद) सुप्रीमों, जनता दल यूनाइटेड (जदयू) के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव और पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी की सुरक्षा में कटौती करने के केंद्र के फैसले को लेकर जारी बयानबाजी के बीच सोशल मीडिया के जरिए विरोध पर तंज किया था.