आरक्षण के जनक:राजर्षि शाहूजी महाराज

भारतवर्ष आरक्षण का देश है.कारण,धर्माधारित जिस वर्ण-व्यवस्था के द्वारा यह देश सदियों से परिचालित होता रहा है,वह वर्ण-व्यवस्था मुख्यतः शक्ति के स्रोतों-आर्थिक ,राजनीतिक और धार्मिक- के बंटवारे की व्यवस्था रही है.चूंकि वर्ण-व्यवस्था के प्रवर्तक विदेशागत आर्य थे इसलिए उन्होंने इसमें ऐसा प्रावधान रचा कि शक्ति के स्रोतों में मूलनिवासी समाज (शुद्रतिशूद्रों) को रत्ती भर भी हिस्सेदारी नहीं मिली और यह समाज चिरकाल के लिए पूर्णरूपेण शक्तिहीन होने को अभिशप्त हुआ.ऐसे शक्तिहीन समाज को सदियों बाद किसी व्यक्ति ने पहली बार शक्ति के स्रोतों में हिस्सेदारी दिलाने का सफल दृष्टान्त कायम किया तो वह थे कोल्हापुर नरेश छत्रपति शाहू जी महाराज.

26 जून 1874 को कोल्हापुर राजमहल में जन्मे शाहू जी छत्रपति शिवाजी के पौत्र तथा आपासाहब घाटगे कागलकर के पुत्र थे.उनके बचपन का नाम यशवंत राव था.तीन वर्ष की उम्र में अपनी माता को खोने वाले यशवंत राव को 17 मार्च 1884 को कोल्हापुर की रानी आनंदी बाई ने गोंद लिया तथा उन्हें छत्रपति की उपाधि से विभूषित किया गया.बाद में 2 जुलाई 1894 को उन्होंने कोल्हापुर का शासन सूत्र अपने हाथों में लिया और 28 साल तक वहां का शासन किये.19-21 अप्रैल 1919 को कानपुर में आयोजित अखिल भारतीय कुर्मी महासभा के 13 वें राष्ट्रीय सम्मलेन में उन्हें राजर्षि के ख़िताब से नवाजा गया.

शाहू जी की शिक्षा विदेश में हुई तथा जून 1902 में उन्हें कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से एल.एल.डी. की मानद उपाधि प्राप्त हुई जिसे पानेवाले वे पहले भारतीय थे.इसके अतिरिक्त उन्हें जी.सी.एस.आई.,जी.सी.वी.ओ.,एम्.आर.इ.एस. की उपाधियाँ भी मिलीं.एक तेंदुए को पलभर में ही खाली हाथ मार गिराने वाले शाहू जी असाधारण रूप से मजबूत थे.उन्हें रोजाना दो पहलवानों से लड़े बिना चैन नहीं आता था.

शाहू जी ने जब कोल्हापुर रियासत की बागडोर अपने हाथों में ली उस समय एक तरफ ब्रिटिश साम्राज्यवाद तो दूसरी तरफ ब्राह्मणशाही जोर शोर से क्रियाशील थी .उस समय भारतीय नवजागरण के नायकों के समाज सुधार कार्य तथा अंग्रेजी कानूनों के बावजूद बहुजन समाज वर्ण-व्यवस्था सृष्ट विषमता की चक्की में पीस रहा था.इनमें दलितों की स्थिति जानवरों से भी बदतर थी.शाहू जी ने उनकी दशा में बदलाव लाने के लिए चार स्तरों पर काम करने का मन बनाया .पहला,उनकी शिक्षा की व्यवस्था तथा दूसरा, उनसे सीधा संपर्क करना.तीसरा ,प्रशासनिक पदों पर उन्हें नियुक्त करना एवं चौथा उनके हित में कानून बनाकर उनकी हिफाजत करना.अछूतों की शिक्षा के लिए एक और जहाँ उन्होंने ढेरों पाठशालाएं खुलवायीं, वहीँ दूसरी ओर अपने प्रचार माध्यमों द्वारा घर-घर जाकर उनको शिक्षा का महत्व समझाया.उन्होंने उनमें शिक्षा के प्रति लगाव पैदा करने के लिए एक ओर जहाँ उनकी फीस माफ़ कर दी, वहीँ दूसरी ओर स्कालरशिप देने की व्यवस्था कराया.उन्होंने राज्यादेश से अस्पृश्यों को सार्वजनिक स्थलों पर आने-जाने की छूट दी तथा इसका विरोध करने वालों को अपराधी घोषित कर डाला.

दलितों की दशा में बदलाव लाने के लिए उन्होंने दो ऐसी विशेष प्रथाओं का अंत किया जो युगांतरकारी साबित हुईं.पहला,1917 में उन्होंने उस ‘बलूतदारी-प्रथा’ का अंत किया,जिसके तहत एक अछूत को थोड़ी सी जमीन देकर बदले में उससे और उसके परिवार वालों से पूरे गाँव के लिए मुफ्त सेवाएं ली जाती थीं.इसी तरह 1918 में उन्होंने कानून बनाकर राज्य की एक और पुरानी प्रथा ‘वतनदारी’ का अंत किया तथा भूमि सुधार लागू कर महारों को भू-स्वामी बनने का हक़ दिलाया.इस आदेश से महारों की आर्थिक गुलामी काफी हद तक दूर हो गई.दलित हितैषी उसी कोल्हापुर नरेश ने 1920 में मनमाड में दलितों की विशाल सभा में सगर्व घोषणा करते हुए कहा था-‘मुझे लगता है आंबेडकर के रूप में तुम्हे तुम्हारा मुक्तिदाता मिल गया है .मुझे उम्मीद है वो तुम्हारी गुलामी की बेड़ियाँ काट डालेंगे.’उन्होंने दलितों के मुक्तिदाता की महज जुबानी प्रशंसा नहीं की बल्कि उनकी अधूरी पड़ी विदेशी शिक्षा पूरी करने तथा दलित-मुक्ति के लिए राजनीति को हथियार बनाने में सर्वाधिक महत्वपूर्ण योगदान किया.किन्तु वर्ण-व्यवस्था में शक्ति के स्रोतों से बहिष्कृत तबकों के हित में किये गए ढेरों कार्यों के बावजूद इतिहास में उन्हें जिस बात के लिए खास तौर से याद किया जाता है,वह है उनके द्वारा किया गया आरक्षण का प्रावधान.

हम जानते हैं भारत सिर्फ आरक्षण का ही देश नहीं है,बल्कि दुनिया के अन्य देशों के विपरीत यहाँ के वर्ग संघर्ष का इतिहास भी आरक्षण पर केन्द्रित रहा है.खास तौर से दलित –पिछड़ों को मिलनेवाले आरक्षण पर देश में कैसे गृह-युद्ध की स्थिति पैदा हो जाती है,यह हमने मंडल के दिनों में देखा .तब मंडल रिपोर्ट के खिलाफ देश के शक्तिसंपन्न तबके के युवाओं ने जहां खुद को आत्म-दाह और राष्ट्र की संपदा-दाह में झोंक दिया,वहीँ सवर्णवादी संघ परिवार ने राम जन्मभूमि –मुक्ति आन्दोलन के नाम पर स्वाधीन भारत का सबसे बड़ा आन्दोलन खड़ा कर दिया,जिसके फलस्वरूप राष्ट्र की बेशुमार संपदा तथा असंख्य लोगों की प्राण हानि हुई.बाद में मंडल-2 के दिनों (2006 में जब पिछड़ों के लिए उच्च शिक्षण संस्थाओं के प्रवेश में आरक्षण लागू हुआ) में पुनः गृह-युद्ध की स्थिति पैदा कर दी गई. 21वीं सदी में जहाँ सारी दुनिया जिओ और जीने दो की राह पर चल रही है,वहीँ भारत के परम्परागत सुविधासंपन्न लोग आरक्षण के नाम पर बार-बार गृह –युद्ध की स्थिति पैदा किये जा रहे हैं.ऐसे हालात में 1902 के उस हालात की सहज कल्पना की जा सकती जब शाहू जी महाराज ने चित्तपावन ब्राह्मणों के प्रबल विरोध के मध्य 26 जुलाई को अपने राज्य कोल्हापुर की शिक्षा तथा सरकारी नौकरियों में दलित-पिछड़ों के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण लागू किया.यह आधुनिक भारत में जाति के आधार मिला पहला आरक्षण था.इस कारण शाहू जी आधुनिक आरक्षण के जनक कहलाये.ढेरों लोग मानते हैं कि परवर्तीकाल में बाबासाहेब डॉ.आंबेडकर ने शाहू जी द्वारा लागू किये गए आरक्षण का ही विस्तार भारतीय संविधान में किया.

लेकिन भारी अफ़सोस की बात है कि जिस आरक्षण की शुरुआत शाहूजी जी ने किया एवं जिसे बाबा साहब में विस्तार दिया , वह आरक्षण आज लगभग पूरी तरह कागजों की शोभा बन चुका है. यदि आरक्षण पूरी तरह कागजों की शोभा बनकर अपनी उपयोगिता खो देता है तब फिर लोग शाहूजी या बाबा साहेब ही नहीं, इस दिशा में योगदान करने वाले दूसरे महापुरुषों को भी भूल जायेंगे. ऐसे में यदि आप शाहूजी जैसे अपने महापुरुषों को याद रखना चाहते हैं तो आपको सिर्फ आरक्षण बचाने का नहीं बल्कि बढ़ाने की सफल लड़ाई लड़नी होगी. और आज की तारीख में वह लड़ाई अमेरिका और दक्षिण अफ्रीका से प्रेरणा लेते हुए सर्वव्यापी आरक्षण अर्थात डाइवर्सिटी लागू करवाने के लिए लड़नी होगी. इससे बेहतर विकल्प और कोई नहीं है.

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महाराष्ट्र में क्यों नाराज़ हैं मराठा?

महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण आंदोलन फिर से आग पकड़ने लगा है. आशंका है कि सरकार ने जल्द कदम नहीं उठाए तो हालात और बिगड़ सकते हैं. राज्य में अगले साल चुनाव होने हैं, ऐसे में सरकार की मुश्किल ये है कि वह सरकारी नौकरियों और कॉलेजों में मराठों को 16 फीसदी आरक्षण दिए जाने की मांग को सीधे-सीधे नहीं मान सकती.

इस पहले राज्य की पिछली कांग्रेस सरकार ने मराठों को आरक्षण से जुड़ा बिल विधानसभा में पास कर दिया था, लेकिन कोर्ट ने इस पर रोक लगा दी, कोर्ट ने पिछडा वर्ग आयोग से मराठा समाज की आर्थिक-सामाजिक स्थिति पर रिपोर्ट मांगी है, जिसके बाद ही मराठा आरक्षण पर कोई फैसला संभव है.

देवेंद्र फडणवीस सरकार की मुश्किल ये भी है कि सुप्रीम कोर्ट की तरफ से निर्धारित पचास फीसदी की सीमारेखा के पार जाकर राज्य में मराठों को आरक्षण देना संभव नहीं और अगर सरकार ने ओबीसी के लिए तय 27 फीसदी कोटे में ही मराठों को शामिल करती हैं, तो राज्य में एक अलग ओबीसी आंदोलन शुरू हो जाएगा. ओबीसी और दलित दोनों ही वर्ग आरक्षण में किसी तरह के बदलाव के खिलाफ है.

ऐसे में सरकार मराठा समाज को मनाने के लिए उनके एजुकेशन फीस आधी करने, एजुकेशन लोन पर ब्याज दरें आधी करने और हॉस्टल सुविधाएं बढ़ाने का आश्वासन दे रहे हैं. हालांकि मराठा समाज अगले साल होने वाले चुनाव को देखते हुए सरकार को झुकाने में की कोशिश में है.

दरअसल राज्य में मराठों की आबादी 28 से 33 फीसदी तक मानी जाती है. मराठा समाज परंपरागत रूप से खेतिहर रहा है और उनका कहना है कि पिछले कई सालों से लगातार पड़ रहे सूखे और खेती में नुकसान के कारण वे बरबादी की कगार पर पहुंच गए हैं. उनका दावा है कि आत्महत्या करने वाले किसानों में सबसे ज्यादा संख्या मराठों की है, इसलिए उन्हें भी आरक्षण का लाभ दिया जाना चाहिए. राज्य सरकार ने हाल ही में 72 हजार पदों पर बहाली का विज्ञापन निकाला है और मराठा इसमें आरक्षण की मांग कर रहे हैं.

मराठा समाज की दूसरी सबसे बड़ी मांग शिक्षा में आरक्षण की है. दरअसल महाराष्ट्र में जिला स्तर पर ही इंजीनियरिंग और मेडिकल के कई कॉलेज खुल गए हैं और मराठा समाज में इनमें दाखिले के लिए आरक्षण और फीस माफी चाहते हैं. इन इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेजों में पढ़ने की फीस अभी काफी ज्यादा है. आंदोलन कर रहे मराठों का कहना है कि उन्हें बच्चों की पढ़ाई के लिए खेत गिरवी रखकर लोन लेना पड़ता है. इसके अलावा डोनेशन के लिए साहूकारों से कर्ज लेना पड़ जाता है. खेती में नुकसान, फसलों के दाम में कमी और ब्याज के बढ़ते बढ़ते फंदे के कारण कई किसान आत्महत्या के लिए मजबूर हो जाते हैं.

इस मराठा आरक्षण आंदोलन के पीछे राजनीतिक कारणों को भी खारिज नहीं किया जा सकता है. लंबे समय बाद राज्य में पिछले चार साल से देवेंद्र फडणवीस मुख्यमंत्री पद पर विराजमान हैं. मनोहर जोशी के बाद सीएम पद संभालने वाले फडणवीस राज्य के दूसरे ब्राह्मण नेता हैं. ऐसे में शरद पवार, अशोक चव्हाण, नारायण राणे और पृथ्वीराज चव्हान जैसे नेताओं वाले मराठा समाज को सीएम पोस्ट से ये दूरी अखरती भी है.

राज्य की सियासत में मराठों में बड़ी ताकत के रूप देखा जाता है. यहां विधानसभा की कुल 288 सीटों में से 80 पर मराठा वोट ही निर्णायक माना जाता है. हालांकि बीजेपी को भी पता है कि ज्यादातर मराठा उसे वोट नहीं देते. वे या तो एनसीपी, कांग्रेस के साथ हैं या फिर शिवेसना के साथ. ऐसे में बीजेपी आरक्षण जैसे सवाल पर उनकी सारी बातें मानकर ओबीसी और दलित को नाराज़ करने की मूड में नहीं. राज्य की आबादी में ओबीसी 52% हिस्से का दावा करता है, तो वहीं दलित खुद को 7 से 12 प्रतिशत तक बताते हैं. जाहिर है राजनीतिक तौर पर मराठों के साथ पूरी तरह खड़ा होना बीजेपी को अपने लिए मुफीद नहीं दिखता.

हालांकि महाराष्ट्र में आरक्षण और खासतौर से शिक्षा में आरक्षण का मुद्दा बड़ा पेचीदा है. यहां करीब 75 फीसदी सीटें अलग-अलग आरक्षण के नाम पर राज्य के मूल निवासी बच्चों के लिए रिजर्व होती हैं. इनमें मूल एससी/एसटी और ओबीसी भी शामिल होते है. इसके अलावा ज्यादातर निजी संस्थाओं में 15 फीसदी सीट मैनेजमेंट और एनआरआई कोटे की होती है. जाहिर है इनसे अलग किसी और वर्ग को आरक्षण दे पाना राज्य सरकार के लिए काफी मुश्किल लगता है. इसके लिए पहले से ही आरक्षण कोटे में ही मराठों को एडजस्ट करना होगा, जिस पर फिर नया राजनीतिक बवाल होगा.

संदीप सोनवलकर Read it also-शर्मनाक: बर्तन धो रहा है करगिल का यह हीरो दलित-बहुजन मीडिया को मजबूत करने के लिए और हमें आर्थिक सहयोग करने के लिये दिए गए लिंक पर क्लिक करेंhttps://yt.orcsnet.com/#dalit-dast

शर्मनाक: बर्तन धो रहा है करगिल का यह हीरो

नई दिल्ली। जूस की दुकान पर बर्तन धो रहे इन शख्स को जानते हैं आप? यह करगिल वॉर के वीर योद्धा सतवीर सिंह हैं। इन्हें इस हाल पर सरकारी सिस्टम ने लाकर बैठा दिया है। कल देशभर में 19वां करगिल विजय दिवस मनाया जाएगा लेकिन देश की राजधानी दिल्ली में ही एक योद्धा जूस की दुकान खोलकर खुद ही झूठे बर्तन धो रहे हैं।

लांस नायक सतवीर सिंह दिल्ली के ही मुखमेलपुर गांव में रहते हैं। करगिल युद्ध के दिल्ली से इकलौते जाबांज हैं। 19 साल बीत गए, पैर में आज भी पाकिस्तान की एक गोली फंसी हुई है, जिसकी वजह से चल फिर नहीं सकते। बैसाखी ही एक सहारा है। यह योद्धा करगिल की लड़ाई जीते, मगर हक के लिए सिस्टम से लड़ते हुए हार गए।

सतवीर बताते हैं, ‘वह 13 जून 1999 की सुबह थी। करगिल की तोलोलिंग पहाड़ी पर थे। तभी घात लगाए पाकिस्तानी सैनिकों की टुकड़ी से आमना-सामना हो गया। 15 मीटर की दूरी पर थे पाकिस्तानी सैनिक।’ 9 सैनिकों की टुकड़ी की अगुवाई सतवीर ही कर रहे थे। सतवीर ने हैंड ग्रेनेड फेंका। बर्फ में 6 सेकंड बाद ग्रेनेड फट गया। जैसे ही फटा पाकिस्तान के 7 सैनिक मारे गए। उन्होंने बताया, ‘हमें कवरिंग फायर मिल रहा था लेकिन 7 जवान हमारे भी शहीद हुए थे। उसी दरम्यान कई गोलियां लगीं। उनमें एक, पैर की एड़ी में आज भी फंसी हुई है। 17 घंटे वहीं पहाड़ी पर घायल पड़े रहे। सारा खून बह चुका था। 3 बार हेलीकॉप्टर भी हमें लेने आया। लेकिन पाक सैनिकों की फायरिंग की वजह से नहीं उतर पाया। हमारे सैनिक ही हमें ले गए। एयरबस से श्रीनगर लाए। 9 दिन बाद वहां रहने के बाद दिल्ली शिफ्ट कर दिया।’

अभी भी बैसाखी के सहारे चलते हैं सतवीर

सरकारी आंकड़ों में करीब 527 देश के जवान शहीद हुए और करीब 1,300 से ज्यादा योद्धा घायल हुए थे। भारत की विजय के साथ 26 जुलाई को यह युद्ध समाप्त हुआ। करगिल के उन घायल योद्धाओं में लांस नायक सतवीर सिंह का भी नाम था। उस युद्ध में शहीद हुए अफसरों, सैनिकों की विधवाओं, घायल हुए अफसरों और सैनिकों के लिए तत्कालीन सरकार में पेट्रोल पंप और खेती की जमीन मुहैया करवाने की घोषणा की थी। लांस नायक सतबीर सिंह के पैर में 2 गोलियां लगी थीं। एक तो पांव से लगकर एड़ी से निकल गई और दूसरी पैर में ही फंसी रह गई। वह गोली आज भी उनके पैर में फांसी हुई है।

इस वीर जवान ने बताया, ‘एक साल से ज्यादा मेरा इलाज दिल्ली सेना के बेस हॉस्पिटल में चला। मुझे भी औरों की तरह पेट्रोल पंप आवंटित होने की प्रक्रिया पूरी हो चुकी थी, लेकिन दुर्भाग्यवश पेट्रोल पंप नहीं मिल सका। इसके बाद जीवनयापन करने के लिए मुझे करीब 5 बीघा जमीन दी गई। मैंने उस पर फलों का एक बाग भी लगाया। वह जमीन का टुकड़ा भी करीब 3 साल तक मेरे पास रहा, लेकिन बाद में मुझसे छीन लिया। 2 बेटे हैं जिनकी पढ़ाई भी पैसों के अभाव में छूट गई। पेंशन और इस जूस की दुकान से घर का खर्च मुश्किल से चलता है।’

वह कहते हैं, ’13 साल 11 महीने नौकरी की। मेडिकल ग्राउंड पर अनफिट करार दिया। दिल्ली का अकेला सिपाही था। सर्विस सेवा स्पेशल मेडल मिला। सरकार ने जमीन व उस पर पेट्रोल पंप देने का वादा किया। उसी दरम्यान एक बड़ी पार्टी के नेता की तरफ से संपर्क किया गया। ऑफर दिया कि पेट्रोल पंप उनके नाम कर दूं। मैंने इनकार किया तो सब कुछ छीन लिया गया। 19 साल से फाइलें पीएम, राष्ट्रपति, मंत्रालयों में घूम रही हैं। आज तक कोई नहीं मिला। कोई मदद नहीं मिली। सम्मान नहीं मिला। डिफेंस ने सम्मान बरकार रखा।’

सभार-नवभारत टाइम्स Read it also-संसद सत्र कल से, चार साल में मोदी सरकार के 40 बिल अटके दलित-बहुजन मीडिया को मजबूत करने के लिए और हमें आर्थिक सहयोग करने के लिये दिए गए लिंक पर क्लिक करेंhttps://yt.orcsnet.com/#dalit-dast

तो क्या मायावती के लिए पद छोड़ने को तैयार हैं राहुल गांधी

भारतीय जनता पार्टी भले ही इस पर चुटकी ले रही है कि पीएम प्रत्याशी बनने की घोषणा के अगले ही दिन कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने अपना हाथ खींच लिया है, लेकिन असल में ऐसा कर राहुल गांधी ने एक दूरदर्शी नेता का काम किया है. दरअसल कांग्रेस पार्टी ने अध्यक्ष राहुल गांधी को अगले लोकसभा चुनाव के लिए प्रधानमंत्री पद का दावेदार बनाने का फैसला किया. पार्टी ने यह भी कहा कि वह विपक्षी पार्टियों के बीच पीएम उम्मीदवार को लेकर आम सहमति बनाने की कोशिश करेगी. लेकिन वहीं मंगलवार 24 जुलाई को खुद राहुल गांधी ने संकेत दिए कि अगले लोकसभा चुनावों के बाद केंद्र में भाजपा और आरएसएस की सरकार बनने से रोकने के लिए कांग्रेस हर मुमकिन और जरूरी कदम उठाएगी.

हालांकि राहुल गांधी ने पीएम बनने की संभावना से इंकार नहीं किया और अगर कांग्रेस पार्टी मजबूत बनकर उभरती है तो जाहिर है कि प्रधानमंत्री पद पर सबसे बड़ा दावा राहुल गांधी का ही होगा. लेकिन राहुल गांधी ने यह भी साफ किया कि जरूरत पड़ने पर कांग्रेस किसी भी ऐसी सरकार को समर्थन देगी जो भाजपा और आरएसएस की सरकार या उसके द्वारा समर्थित किसी सरकार को बनने से रोक सके. राहुल गांधी का यह फैसला एक सोचा समझा फैसला है, जिसके अपने राजनीतिक मायने हैं.

हाल ही में दिल्ली में सौ से ज्यादा महिला पत्रकारों के साथ एक अनौपचारिक मुलाकात में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने किसी महिला को पीएम के रूप में स्वीकार करने की संभावना पर हामी भरी. राहुल ने कहा कि भाजपा-आरएसएस की सरकार या उसके द्वारा समर्थित किसी भी सरकार को बनने से रोकने के लिए वह हर मुमकिन कदम उठाएंगे और जो भी जरूरी होगा वह करेंगे. ऐसे में

अभी कोई यह दावे से नहीं कह सकता कि 2019 चुनाव के बाद क्या स्थिति बनेगी. कांग्रेस और राहुल गांधी का एकमात्र लक्ष्य भाजपा को रोकना है. कई और विपक्षी दल भी यह दावा करते हैं. ऐसे में कांग्रेस पार्टी हर संभावना पर सोच रही है. चुनाव बाद जो स्थिति बनेगी उसमें कौन कहां खड़ा होगा, अभी से इसका कयास लगाना संभव नहीं है. लेकिन कांग्रेस से इतर जो सबसे बड़ा नाम सामने आ रहा है वह बसपा प्रमुख मायावती और तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी का नाम है. हालांकि बंगाल से होने के कारण ममता बनर्जी का दावा कमजोर हो सकता है. और अन्य सहयोगी दलों की मदद से मायावती का दावा मजबूत हो सकता है. वर्तमान हालात में मायावती के साथ देवेगौड़ा की जेडीएस, अभय चौटाला की इंडियन नेशनल लोकदल और सपा के अखिलेश यादव खड़े हैं. एक दलित और महिला के तथ्य को साथ देखा जाए तो बसपा प्रमुख मायावती को इसका फायदा मिल सकता है.

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सवर्णों की मार से दलित बच्चों का स्कूल जाना हुआ बंद

2016 में उत्तराखण्ड के बागेश्वर जनपद में एक दलित युवक को इसलिए मार दिया गया था कि उसने सवर्ण टीचर का आटा छू दिया था. आज फिर दो वर्ष बाद बागेश्वर जनपद में ही जातिवाद का क्रूर चेहरा देखने को मिला है. सवर्ण समाज के जातिवादियों द्वारा दलित समुदाय के छात्राओं के साथ छेड़खानी और अभद्रता की गयी जिसका विरोध दलित वर्ग के छात्रों ने किया तो सवर्णों ने उनकी बुरी तरह पिटाई कर दी.

घटना बागेश्वर जिले के राजकीय इंटर कालेज तिलसारी में पढ़ रहे अनुसूचित जाति बाहुल्य गांव उड़खली के बच्चों के साथ घटित हुई है. जातिवादियों की पिटाई से पांच से अधिक छात्र घायल हुए हैं. छात्रों में दहशत और भय बना हुआ है तथा जान का खतरा बना है जिस कारण उपरोक्त विद्यालय में 40 से उपर अध्ययनरत छात्रों ने स्कूल जाना बंद कर दिया है. हैरानी की बात है कि पटवारी ने 24 घंटे बीतने के बाद भी खबर लिखे जाने तक एफआइआर दर्ज नहीं की थी. पीड़ित पक्ष के अभिभावकों ने आन्दोलन की चेतावदी दी है. ऐसी घटनाएं लगातार देश में बढ़ती जा रही हैं न सड़क पर दलित सुरक्षित हैं न ही स्कूलों में. लगता है देश को डिजिटल नहीं दलित इंडिया में तब्दील कर दमन की नीति हो रही है. क्या न्यू इंडिया की शुरुआत मॉब लिचिंग से हो रही है जिसमें दलितों को, अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया जा रहा है. स्कूल में ही जब बालिकाएं सुरक्षित नहीं तो बेटी बचाओ – बेटी पढ़ाओ का नारा मात्र दिखावा और चुनावी जुमला ही बन कर रह गया है.

आई0 पी0 ह्यूमन

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हर महीन लाखों कमाने का ऑफर लेकर बाजार में आया अमूल

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नई दिल्ली। अमूल लोगों के बीच में एक शानदार ऑफर लेकर आया है. अपने ऑफर में अमूल लोगों को लाखों कमाने का भरोसा दे रहा है. अमूल का कहना है कि कंपनी के साथ जुड़कर लोग 5 से 10 लाख रुपये महीना कमा सकते हैं. दरअसल अमूल अपनी फ्रेंचाइजी ला रहा है.

अमूल के मुताबिक फ्रेंचाइजी के लिए आपको रॉयलिटी और मुनाफा शेयर का भुगतान नहीं करना पड़ेगा. फ्रेंचाइजी 2 लाख रुपये से भी शुरू की जा सकेगी. इसके लिए एक अच्छी सी लोकेशन पर पहले से बनाई हुई दुकान या जगह की जरूरत पड़ेगी. यह किराए की भी हो सकती है. डेढ़ से 6 लाख रुपये की लागत वाले फॉर्मेट की दुकान के सारे खर्च फ्रेंचाइजी खुद उठाएगी.

फ्रेंचाइजी की तरफ से उठाए जाने वाले खर्चों में दुकान का इंटीरियर, उपकरण आदि शामिल होंगे. अमूल के थोक विक्रेता फ्रेंचाइजी तक सामान पहुंचाएंगे और फ्रेंचाइजी उसे फुटकर में बेचकर बड़ा मुनाफा कमाएगी. फुटकर मुनाफा प्रोडक्ट्स के हिसाब से अलग-अलग भी हो सकता है. अमूल के मुताबिक ब्रिकी की मात्रा पर अतिरिक्त पूंजी की जरूरत निर्भर करेगी. लोकेशन के हिसाब से अलग-अलग जगह पर अनुमानित मासिक बिक्री के टर्नओवर में अंतर हो सकता है. गौरतलब है कि अमूल कई प्रकार की फ्रेंचाइजी ऑफर करता है जैसे अमूल आउटलेट, अमूल रेलवे पार्लर या अमूल किओस्क, इसके लिए 2 लाख रुपये का निवेश करना पड़ेगा. इसके अलावा 25 हजार रुपये की ब्रांड सिक्योरिटी लगेगी, जो नॉन रिफंडेबल होगी. एक लाख रुपये दुकाने को दोबारा तैयार करने पर खर्च किए जाएंगे और 75 हजार रुपये जरूरी उपकरणों पर खर्च होंगे. दूसरे प्रकार की फ्रेंचाइजी अमूल आइसक्रीम स्कूपिंग पार्लर है. इसके लिए 5 लाख रुपये के निवेश की आवश्यकता होगी. इसमें 50 हजार रुपये की ब्रांड सिक्यॉरिटी, 4 लाख रुपये रिनोवेशन और डेढ़ लाख रुपये उपकरणों के लिए निवेश करने होंगे.

 साभारः अमर उजाला

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पाकिस्तान में आम चुनाव, 272 सीटों पर 100 दल मैदान में

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नई दिल्ली। भारत के पड़ोसी देश पाकिस्तान में आज आम चुनाव हो रहा है. इसके लिए सुबह 8 बजे से ही वोटिंग शुरू है, जो शाम 6 बजे तक चलेगी. आम चुनाव में सीधा मुकाबला नवाज शरीफ और इमरान खान की पार्टी के बीच माना जा रहा है. चुनाव में 272 सीटों के लिए तकरीबन 100 राजनीतिक दल मैदान में हैं.

चुनाव के ठीक पहले पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ द्वारा आत्मसमर्पण करने और उसके बाद जेल जाने से यह चुनाव काफी रोचक हो गया है. चुनाव के नतीजे शरीफ की रिहाई का फैसला करेंगे. इस बीच पाकिस्तान से आ रही खबरों के मुताबिक इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए इंसाफ और नवाज शरीफ की पार्टी पीएमएल (एन) के कार्यकर्ताओं के बीच झड़प हुई है. दोनों पार्टी के कार्यकर्ता पंजाब के राजनपुर में भिड़े गए.

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इंकम टैक्स रिर्टन भरने के लिए सिर्फ 6 दिन बचे, फाइन से बचने के लिए जल्दी करें

नई दिल्ली। इंकम टैक्स रिटर्न यानि सलाना कमाई का लेखा जोखा. टैक्स का रिटर्न भरने की आखिरी तारीख 31 जुलाई है. इसलिए अगर आप इसके दायरे में आते हैं तो अगले 6 दिनों के भीतर अपना आईटीआर फाइल कर लेना चाहिए. अगर आपने इसमें चूक की तो आप पर एक हजार रुपये से दस हजा रुपये तक का फाइन लग सकता है. आप अपना आईटीआर ऑनलाइन और ऑफलाइन, दोनों तरीकों से भर सकते हैं.

अगर आप वेतनभोगी हैं, तो आपको आईटीआर 1 फॉर्म अथवा सहज भरना होगा. इसमें आप अपनी सैलरी डिटेल फॉर्म 16 की मदद से आसानी से भर सकते हैं. आपको ज्यादातर डिटेल इसमें मिल जाती हैं. आप अपनी सैलरी स्लिप की मदद भी ले सकते हैं.

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गठबंधन पर मायावती की कांग्रेस को दो टूक

नई दिल्ली। तीन राज्यों के महत्वपूर्ण चुनावों में बसपा और कांग्रेस के बीच गठबंधन होगा या नहीं, यह ऐसा सवाल बन गया है, जिसका जवाब किसी को नहीं मिल रहा है. पिछले हफ्तों की बात करें तो मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस औऱ बसपा के गठबंधन से जुड़ी कई खबरें और कई तरह के बयान सामने आ चुके हैं. लेकिन गठबंधन को लेकर सच्चाई क्या है, यह बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष सुश्री मायावती ने खुद बताया है.

गठबंधन को लेकर आज अपने दो टूक बयान में बसपा प्रमुख ने साफ-साफ कहा है कि-

बी.एस.पी. किसी भी पार्टी के साथ गठबंधन करके चुनाव तभी लड़ेगी, जब हमारी पार्टी को सम्मानजनक सीटें मिलेंगी. जहाँ तक कांग्रेस के कुछ नेता जो मीडिया में बी.एस.पी. के साथ मध्यप्रदेश, राजस्थान व छत्तीसगढ़ विधानसभा के चुनावों के सम्बन्ध में गठबन्धन को लेकर आए दिन अपनी क़िस्म-क़िस्म की प्रतिक्रियाएं दे रहें हैं, उनको हमारी पार्टी का यह स्पष्ट कहना है कि बी.एस.पी. इन प्रदेशों में भी कांग्रेस के साथ तभी गठबंधन करके चुनाव लड़ेगी, जब हमारी पार्टी को यहाँ गठबन्धन में सम्मानजनक सीटें मिलेंगी.

अपने बयान में बसपा प्रमुख ने यह भी कहा है कि इन तीनों ही प्रदेशों में हमारी पार्टी सभी सीटों पर पूरी मजबूती के साथ अकेले अपने बलबूते पर ही चुनाव लड़ने की तैयारी में पूरे जी-जान से लगी हुई है. अब देखना है कि बसपा की इस सीधी बात पर कांग्रेस का क्या जवाब आता है.

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मॉब लिंचिंग पर बसपा प्रमुख मायावती का बड़ा बयान

फाइल फोटो

नई दिल्ली। मॉब लिंचिंग की आए दिन हो रही घटनाओं पर बसपा प्रमुख मायावती ने केंद्र की भाजपा सरकार पर निशाना साधा है. मायावती ने इस मुद्दे को गंभीरता से उठाते हुए संसद के इसी सत्र में इसके खिलाफ कानून बनाने की मांग की है. पार्टी की ओर से जारी अपने बयान में बसपा प्रमुख ने कहा है कि हिंसक भीड़ द्वारा निर्दोषों की हत्या की खुली छूट दे दी गई है, जिससे देश का लोकतंत्र अब भीड़तंत्र में बदल गया है. अपने बयान में यूपी की पूर्व मुख्यमंत्री ने देश भर में दलितों, पिछड़ों और आदिवासी समाज के लोगों पर बढ़ते अत्याचार का भी मुद्दा उठाया.

बसपा प्रमुख ने गोरक्षा के नाम पर राजस्थान के अलवर में हुई मॉब लिंचिंग की घटना की निंदा की है. उन्होंने इस मामले में केंद्र और राजस्थान की सरकार से कड़ी कार्रवई करने की मांग की. इस तरह की घटनाओं पर भाजपा नेताओं के विवादित बयान और ऐसे मामले में ज्यादातर भाजपा के घोषित कार्यकर्ताओं के शामिल होने पर भी बसपा प्रमुख ने भाजपा को कठघरे में खड़ा किया. मॉब लिंचिंग की घटनाओं पर भाजपा नेताओं की चुप्पी पर सवाल उठाते हुए बसपा प्रमुख ने कहा कि इसका साफ मतलब है कि ऐसी घटनाओं को भाजपा नेताओं का समर्थन है.

बसपा प्रमुख ने कहा कि “देश की आमजनता को इस बारे में सोचना होगा कि वे ऐसी संकीर्ण व ग़लत सोच के आधार पर काम करने वाली सरकार को क्यों चुने जिसमें किसी का भी जान-माल, मज़हब और साथ ही देशहित कुछ भी क़तई सुरक्षित नहीं है. इस मामले में उन्होंने बी.एस.पी. के संस्थापक मान्यवर कांशीराम की उस बात को भी याद किया कि वर्तमान हालातों में अपने देश में ‘मज़बूत’ नहीं बल्कि ‘मजबूर’सरकार की ज़रूरत है. ताकि उस पर जनहित और देशहित में लगातार काम करते रहने के लिए तलवार लटकी रहे और वह निरंकुश व तानाशाही का व्यवहार नहीं कर सके जैसा कि ख़ासकर आजकल बीजेपी के वर्तमान शासनकाल में देखने को मिल रहा है.”

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तेजिंदर गगन का जाना

वरिष्ठ पत्रकार  प्रभाकर चौबे के दिवंगत होने की खबर का अभी एक पखवाड़ा भी नहीं हुआ था की खबर आई, तेजिंदर गगन नहीं रहे. मुझे याद है तेजिंदर गगन से मेरी पहली मुलाकात एक कार्यक्रम में हुई थी. वह एक राज्य संसाधन केंद्र के द्वारा आयोजित कार्यक्रम था. जिसमें वह बतौर साथी वक्ता पहुंचे थे. वहां एक महिला वक्ता ने अपने वक्तव्य के दौरान महिलाओं को दोयम दर्जे में रखे जाने की वकालत कर रही थी और सारे श्रोतागण स्तब्ध होकर सुन रहे थे. वह महिला किसी कॉलेज में प्रोफेसर थी मुझे उनका नाम अभी याद नहीं आ रहा है.

लेकिन जैसे ही तेजिंदर गगन के अपने वक्तव्य देने की बारी आई तो उन्होंने अपने वक्तव्य के प्रारंभ में ही कहा कि मेरी 62 साल की आयु में पहली बार किसी महिला को इस तरह के वक्तव्य देते हुए देखा है. यह एक दुर्भाग्य है की आज भी सार्वजनिक तौर पर ऐसी बातें कही जा रही है. वह भी एक महिला के द्वारा. उन्होंने बड़ी विनम्रता से अपनी बात को रखा. मैं उनकी इस बात से बहुत प्रभावित हुआ इस प्रकार उनसे मेरा मिलने जुलने का सिलसिला प्रारंभ हो गया.

प्रसंगवश बताना जरूरी है कि वे दूरदर्शन के निदेशक पद से सेवानिवृत्त हुए थे. तेजिंदरजी ने देशबंधु से अपने करियर की शुरुआत की थी. बाद में वे बैंक पदस्‍थ रहे और फिर आकाशवाणी और दूरदर्शन में लंबे समय तक कार्यरत रहे. इस दौरान उन्होंने रायपुर, अंबिकापुर, संबलपुर, नागपुर, देहरादून, चैन्नई व अहमदाबाद केंद्रों में अपनी सेवाएं दीं. उनके उपन्यास काला पादरी, डायरी सागा सागा, सीढ़ियों पर चीता इत्यादि बहुचर्चित हुए.

सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने अनटोल्ड नाम की एक अंग्रेजी पत्रिका प्रकाशित कर रहे थे. जो वेबसाइट में भी उपलब्ध है. वे इस पत्रिका में वंचित समुदाय के दुख दर्द को पर्याप्त स्थान देते थे. वह रायपुर में तमाम साहित्यिक कार्यक्रमों में सक्रिय थे और लगभग हर कार्यक्रम में दिखाई पड़ते थे. उनकी बेहद सरल ढंग से अपनी बात रखने की शैली ने पाठकों और दर्शकों को प्रभावित कर रखा था. वे बहुत बड़ी बड़ी बातों को भी बहुत ही सहजता से बोलते थे.

हाल ही में उन्हें हिंदी साहित्य सम्मेलन छत्तीसगढ़ की ओर से सप्तपर्णी सम्मान से नवाजा गया था इसी सम्मान की श्रृंखला में इन पंक्तियों के लेखक को पुनर्नवा पुरस्कार से नवाजा गया. मुझे बेहद गर्व था कि उनके साथ मुझे भी सम्मानित किया गया. क्योंकि वह एक सुप्रसिध्‍द उपन्यासकार थे .

उन्हें उनके उपन्यास काला पादरी के लिए बेहद प्रसिद्धि मिली. काला पादरी समकालीन हिन्दी साहित्य उपन्यास जगत में अपने आप में विलक्षण है. ‘‘काला पादरी’’ हिन्दी उपन्यास परम्परा से हटकर समाज की कुव्यवस्था पर तीखा प्रहार व कुरूपता का चेहरा उजागर करने वाला बेजोड़ दस्तावेज है. ‘‘कालापादरी’’ में जेम्स खाका की अंतर्मन की संवेदनाओं को उपन्यासकार ने पूरी दक्षता से उभारा है. अंततः उपन्यास की तार्किक परिणिती जेम्स खाका के उस निर्णय में होती है जो उसे धर्म की चाकरी से मुक्त करता है और वह चर्च की संडे की प्रार्थना मे शामिल होने के बजाए अपनी महिला मित्र सोंजेलिन मिंज के साथ बाजार जाने का निर्णय लेता है. ‘‘कालापादरी’’ की अंर्तवस्तु वर्तमान समय की अत्यंत संवेदनशील अंर्तवस्तु है इसमें व्यक्ति और समाज के भौतिक जीवन की संवेदनात्मक व मानवीय पहलू का सजग चित्रण है. निः संदेह कालापादरी के माध्यम से तेजिंदर ने उपन्यास जगत को गौरवन्वित किया है.

 वह कविताएं निबंध भी लिखा करते थे उनकी रचनाओं में सामाजिक कुरीतियों पर चोट तथा प्रगतिशीलता की झलक मिलती थी. फिलहाल वे संस्मरण लिख रहे थे और मुझे बताया था कि कुछ संस्मरण वे प्रकाशन के लिए भी भेज रहे हैं. इसे किताब के रूप में प्रकाशित करने की योजना भी है. गौरतलब है कि मासिक पत्रिका हंस में भी उनके संस्‍मरण प्रकाशित हुये है.

वे अक्‍सर कहा करते थी की उन्‍हे वामपंथ एवं अंबेडकरवाद की समझ उनके नागपुर पदस्‍थापना के दौरान हुई. वे चीजों को बहुत ही गहराई से देखते थे. अपने किसी भी वकतव्‍य में इस बात का बखूबी ख्‍याल रखते की किसी को बुरा न लगे. इसलिए वे विनम्रता से अपनी बात रखते थे. मेरी उनके साथ पत्रिका अनटोल्‍ड के प्रकाशन के संबंध में कई बार सम्‍पर्क हुआ लेकिन कई कारणों से पत्रिका का सतत प्रकाशन नही हो पाया. उनका जाना साहित्‍य के लिए अपूर्णीय क्षति जिसकी भरपाई लगभग नामुमकिन है.

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अठावले का मोदी चालीसा

20 जुलाई को जब लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव आया था और राहुल गांधी का पीएम मोदी को झप्पी देना खबरों की सुर्खियां थी, एक नेता ने सदन में सबका खूब मनोजरंजन किया. वो नेता आरपीआई के रामदास अठावले थे. अठावले सदन में मोदी चालीसा पढ़ रहे हैं, और सदन में बैठे बाकी लोग कैसे हंस रहे हैं. दरअसल ये लोग अठावले की चालीसा पर नहीं बल्कि उन्हीं पर हंस रहे हैं.

रामदास अठावले का ताल्लुक महाराष्ट्र से है. एक वक्त में वो दलित पैंथर से जुड़े रहे, फिर अपनी पार्टी बनाई. वह महाराष्ट्र विधानसभा के सदस्य भी रहे हैं और महाराष्ट्र सरकार में मंत्री भी. अठावले लोकसभा के सांसद भी रहे हैं. अठावले की खासियत यह है कि वह सत्ता और सदन में बने रहने के लिए छटपटाते रहते हैं. अपनी इस चाहत को किसी भी शर्त पर पूरा करने को अमादा अठावले इसके लिए कभी कांग्रेस के पाले में जाते हैं तो कभी शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस के.

2009 में हुए लोकसभा चुनाव में अठावले लोकसभा में नहीं पहुंच सके. इस बीच उनके लिए सत्ता से दूर रहना मुश्किल हो गया, सो उन्होंने राज्यसभा जाने का तरीका ढूंढ़ निकाला. 2014 के लोकसभा चुनाव में महाराष्ट्र में दलित वोटों को अपने पाले लाने के लिए भाजपा को एक दलित चेहरे की जरूरत थी. भाजपा के पास प्रदेश में कोई बड़ा दलित चेहरा नहीं था. फिर क्या था, अठावले की लॉटरी लग गई.

भाजपा ने उन्हें राज्यसभा में भेज दिया. भाजपा और मोदी जी की कृपा से अठावले राज्यसभा के सांसद और केंद्र सरकार में राज्यमंत्री हैं. इस दौरान उनका एकमात्र काम हर बात पर बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष सुश्री मायावती पर सवाल उठाना भर है. जाहिर है उन्हें यही काम सौंपा गया होगा. जाहिर है वो पीएम मोदी का चालीसा गाएंगे ही.

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झारखंडः गैंग रेप का मास्टरमाइंड और पत्थलगाड़ी नेता अरेस्ट

रांची। खूंटी जिले के अड़की स्थित कोचांग गांव में नुक्कड़ नाटक करने गई पांच युवतियों के साथ गैंग रेप का मास्टमाइंड व पत्थगड़ी समर्थक नेता जान तोनास तिडू और बलराम समद को पुलिस ने अरेस्ट कर लिया है. पुलिस ने जोनास तिडू को जमशेदपुर के हाता चौक बस स्टैड से पकड़ा है. वहीं बलराम समद को खूंटी जिले के जीवनटोला से अरेस्ट किया गया है. आईजी नवीन कुमार ने बताया कि खूंटी गैंग रेप की घटना के बाद एसआईटी का गठन किया गया था. एसआईटी लगातार छापेमारी कर रही थी. पुलिस के दबाव के बाद दोनों महाराष्ट्र भागने का प्रयास कर रहे थे. दोनों किसी वाहन से चक्रधरपुर रेलवे स्टेशन पहुंचने की योजना में थे. इस बात की सूचना मिलने के बाद जमशेदपुर के सीनियर एसपी अनूप बिरथरे, खूंटी एसपी अश्विनी कुमार सिन्हा सहित कई अधिकारियों के नेतृत्व में अलग-अलग टीम का गठन किया गया. टीम ने दोनों को पकड़ लिया. आईजी ने बताया, पूछताछ में जानास तिडू और बलराम समद ने स्वीकार किया है कि वे संविधान की गलत व्याख्या कर खूंटी जिले के कई गांवों में आम जनता को बहला -फुसला कर पत्थलगड़ी कराते थे. पीएलएफआई के एरिया कमांडर रहे बाजी समद उर्फ टकला, जुनास मुंडू और अन्य को उकसा कर कोचांग में नुक्कड़ नाटक करने पहुंची युवतियों के साथ गैग रेप कराया. गैंग रेप के पुलिस अब तक सात आरोपियों को अरेस्ट कर चुकी है. गौरतलब है कि खूंटी जिले के अड़की के कोचांग में नुक्कड़ नाटक करने गयी मंडली की पांच युवतियों के साथ 19 जून को गैंग रेप किया गया था. पुलिस की जांच में यह बात सामने आई थी कि जान जोनास तिडू ने ही पीएलएफआई के बाजी समद को उकसा कर गैंगरेप की घटना को अंजाम दिया था.

  • रिपोर्ट- रणजीत कुमार, रांची

जानिए, बसपा की महाबैठक में किसको मिला कौन सा पद

नई दिल्ली। बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में कई अहम फैसले लिए गए. शनिवार 21 जुलाई को हुई पार्टी की बैठक शाम 7 बजे शुरू हुई जो रात तकरीबन 10.30 तक चली. इस दौरान लिए गए अहम फैसले में जयप्रकाश सिंह को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है. इसके अलावे दिल्ली और राजस्थान में भी बदलाव किया गया है. बैठक में बड़ा फैसला लेते हुए बसपा प्रमुख मायावती ने रामजी गौतम को पार्टी का नया राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया है. रामजी गौतम उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी के रहने वाले हैं.

दिल्ली के प्रभारी धर्मवीर अशोक को यहां से हटा दिया गया है, जबकि जेएनयू के प्रो. विवेक कुमार को पार्टी में को-आर्डिनेटर बना दिया गया है. इसके अलावे बसपा के नेशनल को-आर्डिनेटर एड. वीर सिंह को भी उनके पद से हटा दिया गया है. उन्हें राष्ट्रीय महासचिव के पद से भी हटा दिया गया है. धर्मवीर अशोक को जयप्रकाश सिंह के कारण बतौर सजा पद ले लिया गया है. क्योंकि धर्मवीर अशोक ने जयप्रकाश सिंह को पार्टी में आगे बढ़ाया था, जबकि एड. वीर सिंह तमाम कार्यक्रमों में जयप्रकाश सिंह के साथ मौजूद रहने के बावजूद उनके आचरण के बारे में पार्टी अध्यक्ष को नहीं बताया था.

राजस्थान में दो नए प्रभारी बनाए गए हैं. ये दोनों मुनकाद अली और सुरेश आर्य हैं. ये दोनों प्रदेश में धर्मवीर अशोक के साथ मिलकर काम करेंगे.

बसपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में अहम फैसला

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नई दिल्ली। बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक 21 जुलाई को दिल्ली स्थित केंद्रीय कार्यालय पर हुई. इस दौरान देश भर से तकरीबन 300 कार्यकर्ता दिल्ली पहुंचे. इस दौरान बसपा की राष्ट्रीय अध्यक्ष सुश्री मायावती की ओर से विज्ञप्ति जारी किया गया. बैठक की महत्वपूर्ण बात यह रही कि राहुल गांधी पर टिप्पणी को लेकर पद से हटाए गए जयप्रकाश सिंह को पार्टी से निकाल दिया गया. तो कार्यकर्ताओं को और भी कई निर्देश दिए गए. हम यहां पार्टी की ओर से जारी विज्ञप्ति को दे रहे हैं.

बसपा अम्बेडकरवादी विचारधारा वाली सर्वसमाज की पार्टी बी.एस.पी. की राष्ट्रीय अध्यक्ष, उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री व पूर्व सांसद सुश्री मायावती जी ने पार्टी की अखिल भारतीय बैठक को आज यहाँ सम्बोधित करते हुये कहा कि बी.एस.पी. अम्बेडकरवादी विचारधारा वाली सर्वसमाज की पार्टी है तथा उन्हीं के आदर्शों व मूल्यों के बल पर आगे बढ़ते हुये भारत की राजनीति में ख़ास व महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त करने एवं उत्तर प्रदेश में चार बार सरकार बनाने में सफल हुई है तथा इसमें (बी.एस.पी.) परिवारवाद, जातिवाद व साम्प्रदायिकता के साथ-साथ व्यक्तिगत स्वार्थ, व्यक्तिगत लांछन, छींटाकशी व विद्वेष आदि का कोई स्थान नहीं है. पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने ऐसी अनुशासनहीनता को ना तो पहले कभी बर्दाश्त किया है और ना ही आगे कभी इसे सहन किया जायेगा और इसी क्रम में पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष व नेशनल कोर्डिनेटर श्री जयप्रकाश सिंह को उनके सभी पार्टी पदों से हटा दिया गया है और अब आज पार्टी से भी निकाल दिया गया है, क्योंकि उन्होंने प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी को व्यक्तिगत तौर पर आक्षेप करते हुये उन्हें ’’गब्बर सिंह’’ कहा था तथा कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री राहुल गाँधी के बारे में भी काफी व्यक्तिगत आक्षेप व अनर्गल बयानबाज़ी की थी.

भाजपा को सत्ता से हटा कर दम लेंगे ख़ासकर ऐसे मामलों में बी.एस.पी. को सत्ताधारी बीजेपी पार्टी कतई नहीं बनने देना है जो कि सत्ता की लालच व अहंकार में आकर मर्यादाओं की हर सीमा को लांघने में लगी हुई है तथा उनके नेताओं को इसकी कोई परवाह भी नहीं जगती है. उत्तर प्रदेश में लोकसभा व विधानसभा के चुनाव के दौरान् तो खासकर बी.एस.पी. के लोगों को खून के घूंट पी कर रहना पड़ा था फिर भी पार्टी ने अपना संयम बनाये रखने का पूरा-पूरा प्रयास किया था. देश जानता है कि जातिवादी तत्वों ने बाबा साहेब डा. भीमराव अम्बेडकर के साथ भी ऐसा ही बर्ताव हमेशा किया था परन्तु वे कभी भी अपने लक्ष्य को प्राप्त करने से विचलित नहीं हुये.

बसपा का लक्ष्य सामाजिक परिवर्तन और आर्थिक मुक्ति सुश्री मायावती जी ने अपने सम्बोधन में बी.एस.पी. ’’सामाजिक परिवर्तन व आर्थिक मुक्ति’के महान लक्ष्य को लेकर चलने वाली एक अनुशासन-प्रिय पार्टी है और इसीलिए पार्टी के विरोधी भी बी.एस.पी. व उसके नेतृत्व के बारे में कुछ भी बोलने के पहले कई बार सोचते हैं और अगर कोई नेता अपनी सीमा लांघता है, तो वह जनता की नजर में अपनी इज़्ज़त ख़ुद गवाँता है. आज भी हर स्तर पर ख़ासकर बीजेपी के नेताओं द्वारा बार-बार बी.एस.पी. को उत्तेजित करने का प्रयास किया जाता है लेकिन हमारी पार्टी ने पूरा संयम बरता और बिना विचलित हुये आगे अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते रहने का प्रयास किया है.

वैसे भी यह सर्वविदित है कि बी.एस.पी. की नीति व सिद्धान्त अमूल्य संविधान, कानून व मानवीयता पर आधारित है और इसलिये इसका संकल्प ’’सर्वजन हिताय व सर्वजन सुखाय’में निहित है जो बाबा साहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर की संवैधानिक सोच पर पूर्णतः आधारित है. इस संकल्प को प्राप्त करने के क्रम में बाबा साहेब डा. अम्बेडकर की तरह ही बी.एस.पी. ने भी कई बार अनेकों प्रकार के धोखे खाये हैं फिर भी अपनी नीतियों व सिद्धान्तों के लिये अनेकों प्रकार की कुर्बानियाँ देने से पीछे नहीं हटी है और इस क्रम में बी.एस.पी. मूवमेन्ट ने कभी भी किसी के ख़िलाफ व्यक्तिगत लांछन व विद्वेष से अपने आपको दूर रखने का प्रयास किया है हालाँकि समय-समय पर पार्टी को जैसे को तैसा मुँहतोड़ राजनीतिक जवाब भी देना पड़ा है परन्तु वह भी मर्यादा में रहते हुये.

इसके साथ ही आज के दूषित राजनीति वातावरण में जहाँ ख़ासकर सत्ताधारी बीजेपी व उसका शीर्ष नेतृत्व भी राजनीतिक द्वेष व लांछन वाली राजनीतिक बयानबाज़ी के निचले स्तर पर नज़र आता है, तो ऐसे ख़राब माहौल में भी बी.एस.पी. के शीर्ष नेतृत्व की तरह पार्टी के सभी छोटे-बड़े पदाधिकारियों व कार्यकर्ताओं को अपना संयम व धैर्य कभी नहीं खोना है तथा पूरी शालीनता के साथ व्यवहार करते हुये पार्टी अनुशासन से अपने आपको बांधे रखना है. पार्टी की प्रतिष्ठा व सफलता की यह कुंजी है. हमें सेना की तरह अनुशासन से बंधे रहना है, जो कि बी.एस.पी. की असली पहचान भी है.

बसपा कैडर आधारित पार्टी उन्होंने कहा कि बी.एस.पी. एक कैडर-आधारित पार्टी है और कैडर जनसभाओं की तरह खुले में नहीं बल्कि बन्द जगह पर आयोजित की जाती है क्योंकि कैडर में पार्टी की नीतियों व सिद्धान्तों को सामने रखकर विचारों के बल पर सर्वसमाज को जोड़ने का काम किया जाता है. वैसे भी बी.एस.पी. देश के ग़रीबों, मज़दूरों, दलितों, पिछड़ों, धार्मिक अल्पसंख्यकों व अन्य शोषितों-पीड़ितों के हितों के लिये संघर्ष करने वाली पार्टी है तथा पार्टी के कार्यक्रमों के आयोजनों पर बड़े-बड़े पूँजीपतियों व धन्नासेठों की पार्टी बीजेपी आदि की तरह पानी की तरह धन खर्च नहीं कर सकती है. बीजेपी की अपनी करनी के कारण भी इसकी केन्द्र व राज्य सरकारों की लोकप्रियता तेजी से गिर रही है परन्तु रूपया के मूल्य का तेजी से नीचे गिरते रहना देश के लिये अति-चिन्ता की बात.

भाजपा बसपा से परेशान है सुश्री मायावती जी ने कहा कि जनता की नजर में बीजेपी जनहित, जनकल्याण व देशहित आदि के विरूद्ध एक जनविरोधी निरंकुश पार्टी व सरकार बनकर उभरी है. इसलिये उसको सत्ता से यथासंभव दूर रखना अब ज़रूरी हो गया है और जिसके लिये ही विभिन्न राज्यों में विभिन्न पार्टियों से चुनावी गठबंधन या समझौता करने की नीति पर अमल किया जा रहा है. कर्नाटक में इसके अच्छे परिणाम निकले हैं तथा हरियाणा में भी बी.एस.पी.-इण्डियन नेशनल लोकदल गठबंधन तेजी से अपनी राजनीतिक पैठ बना रहा है, जिससे बीजेपी काफी ज़्यादा परेशान है.

भाजपा विरोधी रणनीति बनाएगी बसपा आने वाले विधानसभा व लोकसभा आमचुनावों के बारे में बी.एस.पी. को अपनी कारगर बीजेपी सरकार-विरोधी रणनीति बनानी है जिसके सम्बन्ध में पार्टी का शीर्ष नेतृत्व बी.एस.पी. मूवमेन्ट के भविष्य के साथ-साथ देश के व्यापक राजनीतिक, सामाजिक व आर्थिक भविष्य को ध्यान में रखकर फैसले करेगा और जब मामला परिपक्व होगा तो उसकी सार्वजनिक घोषणा अवश्य ही की जायेगी.

गठबंधन और नीतियों पर बात न करें पदाधिकारी इस सम्बंध में किसी भी स्तर के पदाधिकारियों व कार्यकर्ताओं को किसी भी प्रकार की टिप्पणी पार्टी हित के विरूद्ध व अनुशासनहीनता मानी जायेगी, जो पार्टी कभी भी गवारा नहीं करेगी अर्थात चुनावी गठबंधन या समझौता के सम्बंध में सर्वाधिकार पार्टी हाईकमान के पास सुरक्षित है, जिसका सम्मान आवश्यक है.

गोपालदास नीरज, जिनकी कविता में शराब से ज़्यादा नशा था

”इस द्वार क्यों न जाऊं, उस द्वार क्यों न जाऊं घर पा गया तुम्हारा मैं घर बदल-बदल के हर घाट जल पिया है, गागर बदल बदल के” तब फ्लाईओवरों की दिल्ली अपनी प्रक्रिया में थी. साल 2008 था शायद, जब राजधानी के व्यस्त ट्रैफिक में फंसी एक कार में प्रभाष जोशी ने अपना पसंदीदा पद्य मुझसे साझा किया था. नीरज किसे प्रिय नहीं रहे होंगे, लेकिन इसके बाद मेरी पसंद पर जैसे एक मुहर लग गई. अपने हीरो पत्रकार को जो कवि पसंद है, वही अपन को पसंद है. खटैक.

गोपालदास नीरज से मुलाक़ातें मैं उंगलियों पर गिन सकता हूं. पर हर बार उन्हीं की भाषा में कहूं तो मिलकर यही लगा कि कितनी अतृप्ति है. बाद के दिनों में पत्रकारों से बात करने का कोई मोह उन्हें नहीं रह गया था. फालतू सवालों पर झिड़क भी देते थे. लेकिन कोई दिलचस्प श्रोता मिल जाए जो जीवन दर्शन पर कोई अनूठी बात कह दे तो उससे देर तक बात कर लेते थे. एक बार जब साथी पत्रकार उनसे जीवन के संघर्षों और फिल्मी अनुभवों पर बात कर रहे थे तो मैंने हाइकू के बारे में पूछा. हाइकू बड़ी मुश्किल विधा थी, पर ज़िद्दी नीरज उसमें भी हाथ आज़मा रहे थे. मेरा सवाल शायद उन्हें ठीक लगा. फिर सवालों को निपटाना बंद करके जवाब देने लगे. मैंने उनसे पूछा कि नए लिखने वालों में कौन पसंद है तो बोले- ज़्यादा सुन नहीं पाता पर गुलज़ार अच्छा लिख रहे हैं. बाद में गुलज़ार ने भी हाइकू लिखे. जो लोग नीरज के ज़िक्र के साथ शराब का क़िस्सा छेड़ते हैं वो भी जानते हैं कि नीरज की कविता में शराब से ज्यादा नशा था जो उतरने का नाम नहीं लेता.

मेरी भाषा प्रेम की भाषा है’

मंचों पर अपने आख़िरी दिन उनकी मरज़ी के रहे. मन नहीं होता था तो हज़ारों की भीड़ में भी संचालक को कहकर शुरू में ही कविता पढ़कर होटल चले जाते थे. मन होता था तो चंडीगढ़ के एक गेस्ट हाउस में डेढ़ सौ लोगों के लिए भी डेढ़ घंटा पढ़ जाते थे. कृष्ण, ओशो रजनीश और जीवन-मृत्यु- इन विषयों पर बहुत रुचि से बात करते थे. कहते थे कि ओशो रजनीश देहांत से पहले अपना चोगा और कलम उनके लिए छोड़ गए थे.कुछ क्षेत्रीय असर भी था कि क्यों साहब उनका तकियाक़लाम हो गया था. कहते थे, “मेरी भाषा प्रेम की भाषा है. गुस्से में कभी अपना चेहरा देखना और जब प्रेम करते हों, तब देखना. क्यों साहब.”

सभी गुनगुनाने लगे, नीरज के गीत

नीरज ने साहित्य के भी स्थापित प्रतिमानों को अपने तरीक़े से तोड़ा. 1958 में लखनऊ रेडियो से पहली बार उन्होंने ‘कारवां गुज़र गया’ पढ़ी थी. उन्होंने मुझे बतलाया था कि मुंबई वालों ने वही गीत सुनकर उन्हें बुला लिया कि ये हिंदी का कौन आदमी है जो कारवां जैसे शब्द लिख रहा है. इस गीत को भी देखिए. न मात्रा, न तुकांत- ये कोई गीत ठहरा बल- ऐ भाई ज़रा देखकर चलो आगे ही नहीं पीछे भी दाएं ही नहीं बाएं भी ऊपर ही नहीं नीचे भी तू जहां आया है वो तेरा घर नहीं, गांव नहीं, गली नहीं, कूचा नहीं, रास्ता नहीं, बस्ती नहीं, दुनिया है और प्यारे दुनिया ये सर्कस है पर उस आदमी ने गीत बना दिया और सब गाने लगे. आध्यात्मिक आदमी थे पर धर्म की सामूहिकता में यक़ीन नहीं रखते थे. अब तो मज़हब भी कोई ऐसा चलाया जाए जिसमें इंसान को इंसान बनाया जाए उन्हें श्रृंगार का कवि कहलाना पसंद नहीं था. एक काव्य पाठ में उन्होंने कहा, “अध्यात्म का मुझ पर बड़ा असर रहा. लेकिन लोगों ने मुझे श्रृंगार का कवि घोषित कर दिया. आज जी भर के देख लो चांद को क्या पता कल रात आए न आए “तो यहां चांद का मतलब चांद और रात का मतलब रात थोड़े ही है. यह फिलॉस्फी है जीवन की. श्रृंगार नहीं है.” इसी काव्यपाठ में उन्होंने कहा था, “मेरा धर्म में विश्वास नहीं है, धार्मिकता में है. ईश्वर के नाम पर चार हज़ार धर्म बने. इन धर्मों ने क्या किया, ख़ून बहाया. हिंदुस्तान ने कहा, पहला अवतार- मत्स्यावतार. अवतार नहीं था वह, धरती पर जीवन का अवतरण था. फिर कृष्ण आया साहब. जीवन को उत्सव बना दिया उस आदमी ने.

नीरज का काव्यपाठ

शुरुआती दिनों में हिंदी गीतों में मेरी जो रुचि बनी, उसकी नब्बे फीसदी ज़िम्मेदारी नीरज की ही थी. पांच फीसदी संतोषानंद और शेष पांच में शेष गीतकार. आगे उन्हीं का एक काव्य पाठ, ज्यों का त्यों – इस आस में कि इटावा या अलीगढ़ में अब भी चमकीली आंखों वाला एक बूढ़ा किसी चारपाई पर लेटा होगा और इसी तरह पद्य और गद्य पढ़ रहा होगा- मृत्यु क्या चीज है, घबड़ाते सूरज से प्राण धरा से पाया है शरीर ऋण लिया वायु से है, हमने इन सांसों का सागर ने दान दिया आंसू का प्रवाह जो जिसका है उसको उसका धन लौटाकर मृत्यु के बहाने हम ऋण यही चुकाते हैं काल नहीं है बीतता. बीत रहे हम लोग, क्यों साहब. इसलिए लिखता हूं, अब के सावन में शरारत मेरे साथ हुई मेरा घर छोड़ के सारे शहर में बरसात हुई जिंदगी भर औरों से हुई गुफ़्तगू मगर आज तक हमारी हमसे न मुलाक़ात हुई कबीर क्या कहता है, घूंघट के पट खोल. इसी को मैं कहता हूं, आवरण उतार तब दिखेगी ज्योति. मेरे लिखे में कहीं गीता है, कहीं उपनिषद. मेरे नसीब में ऐसा भी वक़्त आना था जो गिरने वाला था, वो घर मुझे बनाना था भाषा आपके दरवाज़े आए भावों का स्वागत करने का जरिया है. गीत क्या चीज है, भाषा, भाव और वातावरण का मिश्रण. ब्रज वाले मेरे पास आए तो मैंने लिखा माखन चोरी कर तूने कम तो कर दिया बोझ ग्वालन का युद्ध की बात आए तो भाषा बदल जाती है मैं सोच रहा हूं अगर तीसरा युद्ध छिड़ा तो नई सुबह की नई फसल का क्या होगा अभी अलग-अलग जगह के चार दोस्त कवियों की एक साथ एक कार एक्सीडेंट में मृत्यु हो गई. ऐसा क्यों है, कि कोई कहीं पैदा होता है और कहीं मर जाता है जहां मरण जिसका लिखा वो …… (दो शब्द स्पष्ट नहीं हो पाए) मृत्यु नहीं जाए कहीं, व्यक्ति वहां खुद आए मित्रों हर पल को जियो अंतिम ही पल मान अंतिम पल है कौन साल कौन सका है जान तन से भारी सांस है, इसे समझ लो ख़ूब मुर्दा जल में तैरता जिंदा जाता डूब और इसीलिए मैंने लिखा कि जिंदगी मैंने गुजारी नहीं सभी की तरह हर एक पल को जिया पूरी सदी की तरह तुम मुझे सुनोगे पर समझ न पाओगे मेरी आवाज है कान्हा की बंसरी की तरह कविता अलंकारों का ही खेल है. क्यों साहब. अगर थामता न पथ में उंगली इस बीमार उमर की हर पीड़ा वैश्या बन जाती, हर आंसू आवारा होता और इसी भौरे की गलती क्षमा न यदि ममता कर देती ईश्वर तक अपराधी होता, पूरा खेल दुबारा होता एकाध गीत और सुना देता हूं. क्या बज गया. थक गया. छिप-छिप अश्रु बहाने वालों, मोती व्यर्थ लुटाने वालों कुछ सपनों के मर जाने से, जीवन नहीं मरा करता है खोता कुछ भी नहीं यहां पर केवल जिल्द बदलती पोथी जैसे रात उतार चांदनी पहने सुबह धूप की धोती वस्त्र बदलकर आने वालों! चाल बदलकर जाने वालों! चंद खिलौनों के खोने से बचपन नहीं मरा करता है. अब न गांधी रहे न, विनोबा रहे. कहां गए वे लोग. हम साहब गरीब थे पर बेईमान नहीं थे. आप लोग चिट्ठी में नीचे लिखते हैं न ‘आपका’. वो झूठ है. जानता हूं मैं कि मेरी सांस तक मेरी नहीं है. यकीन मानिए मैंने शब्द की रोटी खाई है जिंदगी भर. इसलिए मैं ‘आपका’ नहीं ‘सप्रेम’ लिखता हूं. लेकिन अंग्रेजी में ‘योर्स सिंसियरली’ लिखना पड़ता है. कितना बड़ा झूठ है साहब. हम तो मस्त फकीर, हमारा नहीं ठिकाना रे जैसा अपना आना रे, वैसा अपना जाना रे औरों का धन सोना-चांदी, अपना धन तो प्यार रहा दिल से दिल का जो होता है, वो अपना व्यापार रहा और आख़िर में- इतने बदनाम हुए हम तो इस जमाने में तुमको लग जाएंगी सदियां हमें भुलाने में.

सभार बीबीसी Read it also-गैर दलित आलोचकों का असली चेहरा
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राहुल ने ली पीएम मोदी की झप्पी, सरकार पर जमकर बरसें

नई दिल्ली। लोकसभा में उस समय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सकपका गए जब राहुल गांधी ने उन्हें झप्पी ले ली. अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा के बाद कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अचानक पीएम मोदी के पास पहुंच गए और उन्हें गले लगा लिया. इस दौरान एक बार मोदी को कुछ समझ में नहीं आया लेकिन जब मोदी संभले तो उन्होंने राहुल गांधी से हाथ मिलाया. इससे पहले राहुल गांधी ने तमाम बातों को लेकर पीएम मोदी पर जमकर निशाना साधा.

उन्होंने 15 लाख रुपये, युवाओं को रोजगार से लेकर राफेल सौदे को लेकर सरकार पर तमाम सवाल उठाएं. तो वहीं अमित शाह की संपत्ति बढ़ने पर पीएम मोदी की चुप्पी पर भी उन्हें घेरा. कांग्रेस अध्यक्ष ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की असफलताओं को गिनाते हुए कहा की ये सरकार झूठ बोल रही है. रोजगार के मुद्दे पर सवाल उठाते हुए राहुल गांधी ने कहा, “मोदी जी जहां भी जाते हैं रोज़गार की बात करते हैं. कभी कहते हैं पकौड़े बनाओ कभी कहते हैं दुकान खोलो. रोज़गार कौन लायेगा? हिन्दुस्तान के युवाओं ने प्रधानमंत्री जी पर भरोसा किया था. अपने भाषण में प्रधानमंत्री जी ने कहा था हर साल 2 करोड़ युवाओं को रोज़गार दूंगा.”

अमित शाह के बेटे की संपत्ति के आश्चर्यजनक ढंग से कई गुणा बढ़ने पर राहुल ने मोदी पर तंज कसते हुए कहा, ”प्रधानमंत्री जी ने कहा था मैं देश का चौकीदार हूं, देश की चौकीदारी करुंगा. लेकिन वो चौकीदार नहीं भागीदार है. जब प्रधानमंत्री के मित्र के पुत्र 16000 गुना अपनी आमदनी बढ़ाते हैं तो प्रधानमंत्री के मुंह से एक शब्द नहीं निकलता” इस दौरान राहुल गांधी ने किसानों का भी मुद्दा उठाया.

राफेल सौदे पर सरकार को घेरते हुए राहुल गांधी ने कहा कि फ्रांस के राष्ट्रपति ने मुझे बताया कि दोनों देशों के बीच राफेल को लेकर कोई सीक्रेट डील नहीं है. राफेल डील को लेकर रक्षा मंत्री ने देश से झूठ बोला. राफेल हवाई जहाज का दाम 520 करोड़ रुपये प्रति हवाई जहाज था. प्रधानमंत्री जी फ्रांस गए, जादू से यह दाम 1600 करोड़ रुपये प्रति हवाई जहाज हो गया.

अपने भाषण के दौरान राहुल गांधी के निशाने पर लगातार पीएम मोदी रहे. राहुल गांधी ने कई बार मोदी पर सीधा हमला बोला. पीएम को घेरते हुए राहुल गांधी ने कहा कि ”पूरे देश ने अभी देखा है कि मैंने प्रधानमंत्री के बारे में साफ-साफ बोला है और प्रधानमंत्री मुझसे नज़र नहीं मिला रहे हैं. ये सच्चाई है; ‘चौकीदार नहीं, भागीदार है’ देश को ये बात समझ में आ गयी है.”

एचएएल का मुद्दा उठाते हुए राहुल गांधी ने कहा कि प्रधानमंत्री को इस बात का जवाब देना चाहिए कि एचएएल से ये सौदा क्यों छीना गया और ऐसी कंपनी को क्यों दिया गया जिस पर 35 हजार करोड़ रुपये का कर्ज़ है और उसने जीवन में कभी हवाई जहाज नहीं बनाया. किसानों के मुद्दे पर राहुल गांधी ने कहा कि किसान कहता है प्रधानमंत्री जी आपने हिंदुस्तान के सबसे अमीर लोगों का ढाई लाख करोड़ का कर्जा माफ किया हमारा भी थोड़ा कर्ज माफ कीजिए. लेकिन वित्त मंत्री कहते हैं नहीं किसानों का कर्जा माफ नहीं होगा.

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हिन्दुवादियों का सवाल, अयोध्या क्यों नहीं जाते नरेन्द्र मोदी

पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का मगहर दौरा काफी चर्चा में रहा. मगहर वह स्थान है, जहां संत कबीर ने अपने शरीर का त्याग किया था. प्रधानमंत्री का 2014 लोकसभा चुनाव से पहले बनारस जाने और वहां से चुनाव लड़ने और फिर 2019 चुनाव के पहले मगहर जाना उनकी राजनीति का एक हिस्सा है. लेकिन इस बीच एक सवाल अयोध्या को लेकर उठने लगा है. अयोध्या के लोग और हिन्दुत्व के समर्थक यह सवाल उठाने लगे हैं कि आखिर बनारस और मगहर तक चले जाने वाले प्रधानमंत्री मोदी अयोध्या क्यों नहीं आते?

यह सवाल जायज भी है, क्योंकि मोदी जी बनारस से लेकर मगहर तक चले गए. अब तक की अपनी चार सालों की सरकार में दुनिया भर में घूम-घूम कर मंदिर, मस्जिद और मज़ार पर जा रहे हैं लेकिन अयोध्या से उनकी बेरुखी रामभक्तों के समझ से परे है.

दरअसल, अयोध्या और भारतीय जनता पार्टी का राजनीतिक संबंध भावनात्मक रूप से जुड़ा हुआ है. उत्तर प्रदेश ही नहीं बल्कि देश भर में भारतीय जनता पार्टी को राजनीतिक पहचान दिलाने में अयोध्या और राम मंदिर की कितनी भूमिका का सच किसी से छिपा नहीं है. 1991 में जब कल्याण सिंह के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की पहली बार सरकार बनी थी तो पूरा मंत्रिमंडल शपथ लेने के बाद अयोध्या में रामलला के दर्शन के लिए पहुंच गया था. लेकिन दूसरी ओर प्रधानमंत्री मोदी बहुमत से केंद्र के साथ-साथ कई राज्यों में सरकार बनाने और केंद्र में चार साल पूरा कर लेने के बावजूद अयोध्या से दूरी बनाए हुए हैं.

राम भक्तों का दर्द तब और बढ़ जाता है जब प्रधानमंत्री अयोध्या के ठीक बगल में फैजाबाद तक पहुंच गए लेकिन 10 किलोमीटर दूर अयोध्या जाने से परहेज किया. इस बीच एक और वाकया हुआ, जब प्रधानमंत्री अयोध्या आ सकते थे, लेकिन उन्होंने अयोध्या से किनारा कर लिया. असल में जब अयोध्या से जनकपुर तक के लिए बस सेवा की शुरुआत होनी थी तो इसे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को हरी झंडी दिखाना था. तब रामभक्तों और हिन्दुत्व समर्थकों को पूरी उम्मीद थी कि प्रधानमंत्री का वनवास पूरा होगा और वो अयोध्या आएंगे, लेकिन तब भी मोदी अयोध्या नहीं आए बल्कि नेपाल चले गए. सवाल है कि आख़िर मोदी हरी झंडी तो अयोध्या से भी दिखा सकते थे.

प्रधानमंत्री के मगहर दौरे ने एक और सवाल खड़ा कर दिया है. कबीर घोर ईश्वर विरोधी थे. धर्म और उससे जुड़े कर्मकांडों के कबीर इतने विरोधी थे कि उन्होंने मोक्ष की धरती कहे जाने वाले वाराणसी को अंतिम वक्त में त्याग कर मगहर की उस धरती को चुना, जिसके बारे में कहा जाता था कि वहां मरने वाला इंसान अगले जन्म में जानवर पैदा होता है. तो वहीं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की छवि हिन्दुत्व और ईश्वर समर्थक की है. ऐसे में विपरीत विचारधारा वाले और राम को नकारने वाले संत के मजार पर जाने की बात मोदी समर्थकों को हजम नहीं हो रही है.

बीबीसी में इसी मुद्दे पर प्रकाशित एक लेख में वरिष्ठ पत्रकार योगेश मिश्र का कहना है कि प्रधानमंत्री मोदी 2019 के चुनाव के पहले अयोध्या जरूर जाएंगे. संभावना जताई जा रही है कि अयोध्या मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला भी हाई कोर्ट की तर्ज पर हो सकता है, जिसमें हाई कोर्ट दो तिहाई जमीन हिन्दू पक्ष को सौंप चुका है. अगर ऐसा होता है तो मोदी एक विजेता के तौर पर अयोध्या आ सकते हैं. अगर ऐसा होता है तो यह 2019 चुनाव से पहले भाजपा का तुरुप का पत्ता होगा. क्योंकि तब मोदी की हिन्दू ह्रदय सम्राट की छवि मजबूत होकर उभरेगी. और तब यह भी संभव है कि वह वाराणसी की बजाय अयोध्या से चुनाव लड़ जाएं और यूपी में दरकती अपनी राजनीतिक संभावनाओं को थाम लें.

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बसपा की महत्वपूर्ण बैठक कल दिल्ली में

नई दिल्ली। बहुजन समाज पार्टी से एक महत्वपूर्ण खबर है. बहुजन समाज पार्टी की बड़ी बैठक शनिवार 21 जुलाई को दिल्ली में होने जा रही है. इस बैठक में पार्टी के सभी अहम नेताओं को बुलाया गया है. बैठक में कई मुद्दों को लेकर महत्वपूर्ण फैसला होने की उम्मीद है. इस बैठक में गठबंधन को लेकर महत्वपूर्ण चर्चा होगी. पिछले दिनों में उत्तर प्रदेश में गठबंधन को लेकर बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी के बीच लगातार बैठकें हो रही हैं. इन बैठकों के बाद जो नतीजे निकले हैं, कल की बैठक में बसपा प्रमुख मायावती उस पर पार्टी के प्रमुख नेताओं से चर्चा करेंगी.

यह बात लगभग तय है कि बसपा प्रमुख मायावती आगामी लोकसभा चुनावों में चुनाव मैदान में उतरने जा रही हैं. चर्चा थी कि पार्टी के कुछ प्रमुख नेताओं को बसपा प्रमुख के लिए सुरक्षित सीट का चुनाव करने में लगाया गया था. बैठक में इस पर भी चर्चा होने की संभावना है.

मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ को लेकर गठबंधन होने या नहीं होने को लेकर अब तक कुछ भी साफ नहीं है. अभी तक जो सूचना है, उसके मुताबिक कांग्रेस पार्टी ने बसपा को तीनों राज्यों में गठबंधन के लिए पैकेज डील दे दी है. उसे स्वीकार करना है या फिर ठुकराना है, यह भी कल की बैठक का प्रमुख मुद्दा होगा.

इस बीच बसपा प्रमुख मायावती ने कर्नाटक में प्रभारी के पद पर रहते हुए महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले राज्यसभा सांसद अशोक सिद्धार्थ को भी मध्यप्रदेश और राजस्थान में लगा दिया है. फिलहाल कल की बैठक के लिए दिल्ली में बसपा नेताओं के पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया है. देखा होगा कि आखिर बसपा प्रमुख कल क्या फैसला लेती हैं.

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