बिहार में NDA का खेल खराब कर सकते हैं उपेंद्र कुशवाहा: सर्वे

नई दिल्ली। केंद्रीय मंत्री और आरएलएसपी के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा बीते कुछ समय से बिहार की सियासी गलियारे में चर्चा में बने हुए हैं. एनडीए में सीट चल रहे सीटों के बंटवारे के कवायद के बीच कुशवाहा पर सबकी नजरे हैं. सियासी खीर बनाने की बात कहकर कुशवाहा ने राजनीतिक तापमान बढ़ा दिया था. हाल ही में उनकी पार्टी की तरफ से दिए गए बयान से ऐसी अटकलें लगाई जा रही है कि वे बिहार में महागठबंधन का दामन थाम सकते हैं. हालांकि खुद कुशवाहा ये साफ कर चुके हैं कि वे नरेंद्र मोदी को दोबारा प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहते हैं.

साल 2014 के लोकसभा चुनाव में पार्टी ने तीन सीटों पर जीत हासिल की थी. अब कुशवाहा की पार्टी का कहना है कि वक्त बदल चुका है, इसलिए उन्हें ज्यादा सीटें चाहिए. बता दें कि कुर्मी से ज्यादा बिहार में कोइरी की आबादी है.

ये तो वक्त बताएगा कि सीटों के बंटवारे में कुशवाहा की पार्टी के खाते में कितनी सीटें आती हैं और क्या वे एनडीए के साथ बने रहते हैं या नहीं. लेकिन अगर कुशवाहा एनडीए का साथ छोड़ते हैं और अभी चुनाव हुए तो एनडीए को नुकसान होगा. सिर्फ कुशवाहा की ही पार्टी नहीं अगर केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान की पार्टी भी एनडीए का साथ छोड़ दे तो बिहार में नुकसान होगा. एबीपी न्यूज़ और सी-वोटर के सर्वे में ये बात सामने आई है. यानी बिहार में एनडीए को अगर ज्यादा सीटें जीतनी हैं तो सिर्फ नीतीश कुमार ही नहीं बल्कि एलजेपी और आरएलएसपी को साथ रखना होगा.

अगर LJP और RLSP यूपीए में गई तो?

कुल सीट- 40

एनडीए- 22 यूपीए- 18

हालांकि अगर बिहार में अगर मौजूदा सर्वे बरकरार रहा तो एनडीए को 40 में से 31 सीटें मिलेंगी.

अगर मौजूदा एनडीए बना रहा तो ?

कुल सीट- 40

एनडीए- 31 यूपीए- 9

कैसे हुआ सर्वे?

ये सर्वे अगस्त के आखिरी हफ्ते से लेकर सितंबर के आखिर हफ्ते तक किया गया है. ये सर्वे देश भर में सभी 543 लोकसभा सीटों पर किया गया है और 32 हजार 547 लोगों की राय ली गई है.

Read it also-दलित दस्तक मैग्जीन का सितम्बर 2018 अंक ऑन लाइन पढ़िए
  • दलित-बहुजन मीडिया को मजबूत करने के लिए और हमें आर्थिक सहयोग करने के लिये आप हमें paytm (9711666056) कर सकतें हैं। 

दलित दस्तक मैग्जीन का सितम्बर 2018 अंक ऑन लाइन पढ़िए

0
दलित दस्तक मासिक पत्रिका ने अपने छह साल पूरे कर लिए हैं. जून 2012 से यह पत्रिका निरंतर प्रकाशित हो रही है. मई 2018 अंक प्रकाशित होने के साथ ही पत्रिका ने अपने छह साल पूरे कर लिए हैं. हम आपके लिए सांतवें साल का दुसरा अंक लेकर आए हैं. इस अंक के साथ ही दलित दस्तक ने एक नया बदलाव किया है. इसके तहत अब दलित दस्तक मैग्जीन के किसी एक अंक को भी ऑनलाइन भुगतान कर पढ़ा जा सकता है.

ई-मैगजीन पूरा पढ़े सिर्फ 10/-रुपये के सहयोग राशि 9711666056 पर PAYTM के माध्यम से सहयोग करें

मैगजीन सब्स्क्राइब करने के लिये यहां क्लिक करें मैगजीन गैलरी देखने के लिये यहां क्लिक करें

आरक्षण की प्रासंगिकता..

आरक्षण एक गंभीर विषय है. आरक्षण के संबंध में लोगों की गलत धारणा को दूर करने के लिए इसका पोस्टमार्टम करना जरूरी है. आरक्षण अवसर की समानता का मामला है. आरक्षण प्रतिनिधित्व का मामला है . आरक्षण भागीदारी का मामला है. आरक्षण कोई योग्यता का मामला नही है. आरक्षण कोई भीख नहीं है. आरक्षण विशेषाधिकार के बदले (In place of) मिला एक छोटा सा अधिकार है. 24 सितंबर 1932 को यरवदा सेंट्रल जेल में गांधी टीम और डॉ.भीमराव अंबेडकर के बीच हुए समझौते का मामला है. तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैम्जे मैकडोनाल्ड ने डॉ अंबेडकर को कम्युनल अवार्ड (सांप्रदायिक पंचाट) के माध्यम से चार प्रकार के विशेषाधिकार प्रदान किए थे.- 1. राइट ऑफ एडल्ट फ्रेंचाइजी 2. राइट ऑफ डुवल वोट 3. राइट ऑफ सेपरेट सेटलमेंट 4. राइट ऑफ सेपरेट इलेक्टोरल

इन चार प्रकार के विशेषाधिकारों के बदले (In place of) गांधी एंड टीम ने डॉ आंबेडकर को सामाजिक, शैक्षिक एवं आर्थिक बराबरी के लिए यह (आरक्षण )देने का वादा किया था कि हम आने वाले 10 वर्षों में इस देश के दबे कुचले पिछड़े समाज को देश की मुख्यधारा में सम्मिलित कर देंगें. उन्हें बराबर कर देंगें.

आज आजादी के 70 साल से भी अधिक का समय बीत रहा है . लेकिन दबे कुचले पिछड़े समाज की सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक स्थिति जस की तस बनी हुई है . गांधी एंड टीम के द्वारा किये गये वादे को गांधी एंड टीम की संतानों ने पूरा नही किया . गांधी एंड टीम के लोगों ने पूना समझौते में हुए डॉ अंबेडकर के साथ अपने वादे से मुकर कर अंबेडकर और अंबेडकर के लोगों के साथ धोखा किया है.

आरक्षण को देश की सामाजिक, शैक्षिक ,आर्थिक और राजनीतिक समानता के लिए एक हथियार बनाया गया था . इसके माध्यम से देश में समता, ममता, भाईचारा और न्याय स्थापित होगा. देश की संपूर्ण संपदा पर सबका बराबर हक और अधिकार होगा. यह मानक निर्धारित किया गया था.

आज आरक्षण को बहुत ही संकुचित नजरिए से देखा जा रहा है, जो कि सर्वथा गलत है. आरक्षण योग्यता का मामला नही है. आरक्षण कोई भीख और खैरात नही है . आरक्षण अवसर की समानता और प्रतिनिधित्व का मामला है . आरक्षण कोई नया मामला नहीं है .आरक्षण वैदिक काल से चली आ रही व्यवस्था है.

जिस तरह से एक व्यक्ति की दो संताने हैं, तो पिता की संपूर्ण संपत्ति में दोनों संतानों का बराबर हक और अधिकार है . ऐसा नही है कि एक संतान अधिक योग्य है तो उसे तीन चौथाई हिस्सा दे दिया जाए और एक संतान कम योग्य है तो उसे केवल एक चौथाई हिस्सा ही दे कर समझा बुझा दिया जाए. पिता की संपत्ति में दोनों संतानों का बराबर का हिस्सा है . यही न्याय संगत है और यही तर्कसंगत भी है.

जिस तरह व्यक्ति के शरीर में दो पैर हैं . एक पैर में जूता पहनाया जाए दूसरे में नही. एक में पायल पहनाई जाए दूसरे में नही . एक हाथ में कंगन पहनाई जाए दूसरे में नही . एक आंख में काजल लगाया जाए दूसरे में नही . चश्मे में एक शीशा लगाया जाए दूसरे में नही, तो अटपटा लगेगा. बुरा लगेगा. भद्दा लगेगा. जब तक दोनों पैरों में जूते नहीं होंगें. दोनों पैरों में पायल नही होगी . दोनों हाथों में कंगन नही होगा. दोनों आंखों में काजल नही होगा . चश्मे में दोनों शीशा नही होगा . शोभा नही देगा. उसी प्रकार देश का संपूर्ण विकास तब तक नही होगा, जब तक हर व्यक्ति का, हर समाज का विकास नहीं होता है.

जिस प्रकार एक असमतल जमीन में अच्छी फसल नही पैदा हो सकती है, उसी प्रकार असमान देश कभी विकास और तरक्की नही कर सकता है. जहां पर ऊंची जमीन होगी, वहां पानी नही पहुंचेगा और फसल सूख जाएगी. जहां जमीन नीची होगी वहां पानी अधिक रुकेगा और फसल सड़ जाएगी. वही हाल समाज और देश का है . समाज और देश को प्रगति के पथ पर ले जाना है तो समता, ममता, न्याय और भाईचारे का माहौल बनाना होगा.

जो देश समता, ममता, न्याय और भाईचारे के अनुसार चल रहे हैं वे निरंतर आगे बढ़ रहे हैं . जो देश इसके खिलाफ हैं वे निरंतर पतन की ओर जा रहे हैं . यही वजह है कि आजादी के 70 सालों में भारत देश विकसित होने के बजाय विकास सील से भी नीचे जा रहा है.

वर्ष 1945 में जापान में परमाणु बम से हमला हुआ था . जापान पूरी तरह से ध्वस्त हो गया था. परमाणु बम का असर आज भी जापान में दिखाई देता है. नागासाकी हिरोशिमा में अभी भी बच्चे अपंग और अपाहिज पैदा होते हैं . लेकिन उसके बावजूद भी जापान आज विश्व के विकसित देशों में शुमार होता है . वहीं भारत 1947 में अंग्रेजों से आज़ाद होता है. आजाद होने के बावजूद भी सामाजिक, शैक्षिक, सांस्कृतिक, आर्थिक रूप से बहुत ही पिछड़ा है . भारत आज विकासशील देशों की श्रेणी से भी हट गया है . दुनिया के 100 विश्वविद्यालयों में भारत का कोई भी विश्वविद्यालय नही सम्मिलित है.

सेना में कोई आरक्षण नहीं है . उसके बावजूद भी चीन कई किलोमीटर भारत पर कब्जा कर चुका है. पाकिस्तान आए दिन हमला करके हमारे सैनिकों को मार गिराता है . बांग्लादेश घुसपैठ कर जाता है . श्रीलंका से घुसपैठिए आ जाते हैं. जो लोग यह कहते हैं कि आरक्षण से अयोग्य लोग आ जाते हैं तो सेना में तो कोई आरक्षण नहीं है फिर ऐसा क्यों हो रहा है. खेलों में कोई आरक्षण नही है . भारत विश्वकप फुटबाल कभी नही जीत पाया है . ओलंपिक खेलों में भारत कभी भी शीर्ष पर नही रहा है. टेनिस के चारों ग्रैंड स्लैम कभी नही जीत पाया है. आदि आदि.

न्यायपालिका में कोई आरक्षण नही है , उसके बावजूद भी लाखों की संख्या में मामले लंबित क्यों हैं. अपराध कम क्यों नहीं हो रहे हैं. लोगों को समय पर न्याय क्यों नहीं मिल पा रहा है. आदि आदि.

राजनीतिक आरक्षण जो केवल 10 वर्षों के लिए निर्धारित किया गया था . उसे हर 10 साल बाद क्यों बढ़ा दिया जाता है. इस राजनैतिक आरक्षण के खिलाफ शायद ही कोई बयान देता हो लेकिन सामाजिक शैक्षिक आर्थिक समानता के लिए किए गए वादे वाले आरक्षण के खिलाफ सभी लोग अनाप-शनाप बयान देते रहते हैं.

जब तक देश में जातियां हैं . आरक्षण को खत्म नहीं किया जा सकता है. जातियां खत्म कर दीजिए आरक्षण अपने आप खत्म हो जाएगा. अगर समाप्त करना ही है तो आरक्षण नही जातियां खत्म करिये.

सुनील दत्त (प्रवक्ता )भूगोल एवं सामाजिक चिंतक, Read it also-सपा-बसपा समर्थकों को अपने पाले में लाने के लिए भाजपा का नया दांव
  • दलित-बहुजन मीडिया को मजबूत करने के लिए और हमें आर्थिक सहयोग करने के लिये आप हमें paytm (9711666056) कर सकतें हैं। 

कांशीराम पुण्यतिथि से शुरू होगा बसपा का 2019 के लिए चुनावी कैंपेन

नई दिल्ली। अगले साल 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव अभियान की शुरूआत करन के लिए बसपा ने पूरी तरह से कमर कस लिया है. बसपा प्रमुख मायावती ने अपने जनाधार को वापस लाने के लिए पार्टी संस्थापक कांशीराम की पुण्यतिथि के दिन को चुना है.

9 अक्टूबर को कांशीराम की 12वीं पुण्यतिथि को राजधानी लखनऊ में बसपा विशाल रैली आयोजित कर रह रही है. लखनऊ के कांशीराम इको गार्डन में होने वाली रैली में मायावती शक्ति प्रदर्शन करके विपक्ष दलों को अपनी ताकत का एहसास कराना चाहती है. इसके बाद प्रदेश के सभी 18 मंडलों में अलग-अलग तारीख में रैली करने की योजना बनाई गई है.

लोकसभा चुनाव के मद्देनजर बसपा के लिए औपचारिक प्लेटफॉर्म तैयार करने की गरज से यह रैली काफी अहम मानी जा रही है. इसीलिए बसपा के मंडल प्रभारियों को निर्देश दिए गए है. प्रत्येक जोनल कोऑर्डिनेटर को अपने मंडल से 15 से 20 हजार पार्टी कार्यकर्ताओं को लाने के लिए बसपा के प्रदेश अध्यक्ष आरएस कुशवाहा ने निर्देश दिया है.

कुशवाहा ने बताया कि कांशीराम इको गार्डन में होने वाली रैली में दो लाख से ज्यादा लोगों के शामिल होने का अनुमान है. हर मंडल के पदाधिकारी को रैली को सफल बनाने के लिये अपने क्षेत्र से लोगों को लाने के दिशा निर्देश दिये गये है.

उन्होंने बताया कि इस मौके पर पार्टी प्रमुख के मौजूद रहने की पूरी संभावना है. हालांकि उनके शामिल होने की आधिकारिक घोषणा अभी नहीं की जा रही है.

बता दें कि बसपा के संस्थापक कांशीराम का निधन अक्टूबर 2006 को हुआ था. बसपा अध्यक्ष मायावती उनकी याद में करीब हर साल लखनऊ में एक बड़ी रैली करती रही आ रही हैं. लेकिन इस बार लोकसभा चुनाव के लिहाज से बसपा की रैली काफी महत्वपूर्ण मानी जा रही है.

बसपा ने इस रैली को सफल बनाने के लिए काफी तैयारियां कर रखी हैं. लोगों की भीड़ जुटाने के लिए करीब एक दर्जन ट्रेन, 210 बसें बुक की गई हैं. इसके अलावा पार्टी नेताओं से छोड़ी गाड़ियों के जरिए भी पहुंचने के लिए कहा गया है.

बता दें कि मौजूदा समय में बसपा के एक भी सांसद नहीं है. जबकि इससे पहले पार्टी के पास 21 सांसद थे. 2017 के विधानसभा चुनाव बसपा का पूरी तरह से सफाया हो गया था. महज 19 विधायक की जीत सके थे, लेकिन राज्य के हुए उपचुनाव में बीजेपी को मिली हार के बाद से बदले समीकरण में एक बार फिर बसपा की राजनीतिक अहमियत बढ़ी है.

माना जा रहा है कि बसपा 2019 में यूपी में सपा के साथ मिलकर चुनाव मैदान में उतर सकती है. हालांकि मायावती ने खुद ही कहा है कि अगर सम्मानजनक सीटें मिलेंगी तभी वह गठबंधन करेंगी.

Read it also-सपा-बसपा समर्थकों को अपने पाले में लाने के लिए भाजपा का नया दांव

  • दलित-बहुजन मीडिया को मजबूत करने के लिए और हमें आर्थिक सहयोग करने के लिये आप हमें paytm (9711666056) कर सकतें हैं। 

कांग्रेस के साथ गठबंधन पर बसपा ने लगाया फुल स्टॉप

लखनऊ। कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह के इस बयान को लेकर कि मायावती कांग्रेस से इसलिए समझौता नहीं कर रही हैं क्योंकि उन्हें सीबीआई का डर है, बसपा प्रमुख मायावती ने कांग्रेसी नेता को आड़े हाथों लिया है. उन्होंने कहा है कि कांग्रेस पार्टी का शीर्ष नेतृत्व यानि राहुल गांधी व श्रीमती सोनिया गांधी भाजपा को रोकने के लिए कांग्रेस और बसपा का समझौता चाहते हैं लेकिन वरिष्ठ कांग्रेसी नेता व मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रहे श्री दिग्विजय सिंह जैसे निजी स्वार्थी नेता नहीं चाहते है कि ऐसा हो। 3 अक्टूबर को मीडिया को जारी प्रेस कांफ्रेंस में बसपा प्रमुख ने ये बात कही.

दिग्विजय सिंह के इस आरोप पर कि बी.एस.पी. केन्द्र की बी.जे.पी. सरकार व उसकी सी.बी.आई व ई.डी. आदि एजेन्सी से डरी हुई है, बसपा प्रमुख ने उन्हें जमकर खरी-खोटी सुनाई. बसपा प्रमुख ने कहा कि यह पूरी तरह से असत्य, निराधार व तथ्यहीन है. साथ ही यह कांग्रेस पार्टी का दोहरा चरित्र व मापदण्ड है.

बसपा की राष्ट्रीय अध्यक्ष ने दोहराया कि बी.एस.पी. एक राजनीतिक पार्टी के साथ-साथ एक मूवमेन्ट भी है और इसका नेतृत्व किसी के भी दबाव के आगे ना तो कभी झुका है और ना ही कभी कोई समझौता ही किया है जो जग-जाहिर है। उऩ्होंने कहा कि अब जबकि देश में लोकसभा के साथ-साथ राजस्थान, मध्य प्रदेश,छत्तीसगढ़ आदि राज्यों में विधानसभा के आम चुनाव सर पर हैं तो चुनावी गठबन्धन के मामले में कांग्रेस पार्टी का रवैया, हमेशा की तरह, बीजेपी को परास्त करने का नहीं बल्कि अपनी सहयोगी पार्टियों को ही चित करने का ज़्यादा लगता है, जो काफी दुर्भाग्यपूर्ण है.

उन्होंने कहा कि कांग्रेस पार्टी अपनी इस प्रकार की गलत नीतियों का नुकसान बार-बार उठा रही हैं फिर भी यह पार्टी अपने आपमें सुधार नहीं कर रही है। बसपा प्रमुख ने आरोप लगाया कि देश की आम जनता बीजेपी सरकार से बुरी तरह से पीड़ित व त्रस्त है और इस अहंकारी, जातिवादी व निरंकुश सरकार को उखाड़ फेंकना चाहती है, लेकिन इसके लिए कांग्रेस पार्टी की ग़लतफहमी के साथ-साथ उसका अहंकार भी अब सर चढ़कर बोलने लगा है कि वह अकेले ही अपने बलबूते पर बीजेपी को हराने का काम कर लेगी। इससे साफ है कि कांग्रेस की रस्सी जल गई है लेकिन ऐंठन अभी भी नहीं गई है.

कांग्रेस पार्टी के इसी प्रकार के दुःखद रवैये के परिणामस्वरूप ही बी.एस.पी. ने पहले कर्नाटक और फिर छत्तीसगढ़ में क्षेत्रीय पार्टी के साथ मिलकर चुनाव लड़ने का फैसला लिया और अब बी.एस.पी. मूवमेन्ट के व्यापक हित में राजस्थान व मध्य प्रदेश में भी बी.एस.पी. ने अकेले अपने बलबूते पर ही चुनाव लड़ने का फैसला किया है, क्योंकि कांग्रेस पार्टी के नेताओं के रवैये से लगता है कि वे लोग बीजेपी को सत्ता से हटाने के लिये गंभीर होने के बजाय, बी.एस.पी. को ही खत्म करने में ज्यादा दिलचस्पी रखते हैं.

बसपा प्रमुख ने साफ किया कि बी.एस.पी. ने व्यापक देशहित को ध्यान में रखकर व बीजेपी जैसी घोर जातिवादी व साम्प्रदायिक पार्टी को सत्ता से दूर रखने के लिये हमेशा ही कांग्रेस पार्टी का साथ दिया है और इस सम्बंध में काफी बदनामी भी मोल ली है, लेकिन इसके एवज़ में बी.एस.पी. नेतृत्व का एहसानमन्द व शुक्रगुजार होने के बजाय कांग्रेस पार्टी ने बीजेपी की तरह ही, हमेशा दग़ा किया व पीठ पीछे छुरा घोंपने का काम किया है। ऐसी स्थिति में पार्टी व मूवमेंट के हित में बी.एस.पी. कांग्रेस पार्टी के साथ किसी भी स्तर पर कहीं भी मिलकर चुनाव नहीं लडे़गी.

Read it also-सपा-बसपा समर्थकों को अपने पाले में लाने के लिए भाजपा का नया दांव
  • दलित-बहुजन मीडिया को मजबूत करने के लिए और हमें आर्थिक सहयोग करने के लिये आप हमें paytm (9711666056) कर सकतें हैं। 

लोकसभा अध्यक्ष ही आरक्षण के प्रावधानों अवगत नहीं तो बाकी का क्या

विदित हो कि अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति व अन्य पिछड़े वर्ग को सरकारी नौकरियों व शिक्षा में प्रदत्त संवैधानिक आरक्षण का सवर्णों के अनेकानेक संगठनों द्वारा देश के हर कौने में हमेशा नाना प्रकार से विरोध किया जाता रहा है.  ऐसे में कुछ ही दिन पूर्व संघ् प्रमुख मोहन भागवत कहते हैं, ‘सामाजिक विषमता हटाने के लिए संविधान के तहत सभी प्रकार के आरक्षण को संघ का समर्थन है…और रहेगा. उनका कहना है कि आरक्षण नहीं, बल्कि आरक्षण की राजनीति समस्या है. ऐतिहासिक – सामाजिक कारणों से समाज का एक अंग पीछे है. बराबरी तब आएगी, जब जो लोग ऊपर हैं, वो झुकेंगे. समाज के सभी अंगों को बराबरी में लाने के लिए आरक्षण जरूरी है. हजार वर्ष से यह स्थिति है कि हमने समाज के एक अंग को विफल बना दिया है. जरूरी है कि जो ऊपर हैं वह नीचे झुकें और जो नीचे हैं वे एड़ियां उठाकर ऊपर हाथ से हाथ मिलाएं. इस तरह जो गड्ढे में गिरे हैं उन्हें ऊपर लाएंगे. समाज को आरक्षण पर इस मानसिकता से विचार करना चाहिए. सामाजिक कारणों से एक वर्ग को हमने निर्बल बना दिया. स्वस्थ समाज के लिए एक हजार साल तक झुकना कोई महंगा सौदा नहीं है. समाज की स्वस्थता का प्रश्न है, सबको साथ चलना चाहिए.’..
भागवत जी के इस कथन को पढ़ने के बाद तो जैसे लगा कि संघ भारत का सबसे आदर्श संगठन है, किंतु संघ की कथनी और करनी में जमीन और आसमान का अंतर है. कहना अतिशयोक्ति न होगा कि आरक्षण के विरोध में जितने भी आन्दोलन हो रहे हैं अथवा किए जाए जा रहे हैं, सब के सब संघ और सत्ता द्वारा प्रायोजित ही लगते हैं… राजनीतिक लाभ लेने के लिए इन आन्दोलनों के पीछे विपक्षी दलों का हाथ भी हो सकता, इससे भी इंकार नहीं किया जा सकता.
आर एस एस और भाजपा की नीयत और निति में वैसे तो अंतर नहीं है क्योंकि आर एस एस भाजपा की पैत्रिक संस्था है। किंतु एक दूसरे को अलग-अलग दिखाने के प्रयोग हमेशा करते रहे हैं। इसका ताजा उदाहरण ये कि जब आर एस एस के प्रमुख मोहन भागवत  अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति व अन्य पिछड़े वर्ग को सरकारी नौकरियों व शिक्षा में प्रदत्त संवैधानिक आरक्षण का समर्थन कर रहे हैं तो भाजपा सरकार में लोकसभा में अध्यक्ष पर विराजमाज माननीय सुमित्रा महाजन आरक्षण का विरोध कर रहीं हैं। हिन्दी न्यूज – 01.0.2018 के माध्यम से यह जान पड़ा है कि सुमित्रा जी ने कहा है कि डा. आंबेडकर भी सिर्फ 10 साल के लिए आरक्षण चाहते थे. सुमित्रा महाजन ने पार्लियामेंट की भूमिका को भी कठघरे में खड़ा करते हुए कहा कि संसद भी आरक्षण को सिर्फ आगे बढ़ाता रहा. हर बार दस साल के लिए आरक्षण बढ़ा दिया जाता रहा है. लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने सवाल किया है कि क्या शिक्षा और नौकरियों में हमेशा के लिए आरक्षण दिया जाना ठीक है?  उन्होंने कहा, “बी आर आंबेडकर भी केवल 10 साल के लिए आरक्षण चाहते थे.” देश को आगे बढ़ाने और सामाजिक समरसता के लिए उन्होंने बी  आर आंबेडकर के पदचिह्नों पर चलने का आह्वान करते हुए कहा, “जब तक हम देशभक्ति की भावना को नहीं बढ़ायेंगे तब तक देश का विकास संभव नहीं है.” यहाँ सुमित्रा जी को यह जानने की खासी जरूरत है कि डा. अम्बेडकर ने ‘सामाजिक समरसता’ की बात कभी भी नहीं अपितु ‘सामाजिक समानता’ की बात थी।
सुमित्रा महाजन ने पार्लियामेंट की भूमिका को भी कठघरे में खड़ा करते हुए कहा कि संसद भी आरक्षण को सिर्फ आगे बढ़ाता रहा. हर बार दस साल के लिए आरक्षण बढ़ा दिया गया. एक बार तो इसे 20 साल के लिए आगे बढ़ा दिया गया, आखिर ऐसा कब तक चलेगा. इसे आगे बढ़ाते रहने के पीछे क्या सोच है? उन्होंने कहा, “हमारे लिए सभी धर्म समान हैं. आज देश और समाज को तोड़ने वाली ताकतें सक्रिय हैं. सरल स्वभाव वाले आदिवासियों का धर्म परिवर्तन किया गया. लेकिन, हमारी सरकार ने धर्म परिवर्तन विरोधी कानून बनाया है.”  इससे पहले उन्होंने कहा था कि आरक्षण को लेकर सभी दलों को मिलकर विचार विमर्श करना चाहिए.
मैं विनम्र भाव से सुमित्रा महाजन जी को अवगत कराना चाहता हूँ कि संविधान के तहत अनुसूचित/अनुसूचित जनजातियों को नौकरियों में प्रदत्त आरक्षण की कोई नियत समय सीमा नहीं है. हाँ! संविधान के तहत अनुसूचित/अनुसूचित जनजातियों को राजनीति में प्रदत्त आरक्षण की समय सीमा जरूर दस वर्ष थी. इस समय सीमा के बाद इसे भी समाप्त करने की व्यवस्था नहीं है, अपितु इसे जारी रखने के लिए समीक्षा करने का प्रावधान है जिसके आधार पर वर्चस्वशाली राजनीतिक दल अपने राजनीतिक लाभ के लिए इसे निरंतर बढ़ाते आ रहे हैं.
अफसोस कि बात तो ये है देश की लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन जैसे विद्वान लोग भी यदि तथ्यों की जानकारी किए बिना ही ऐसे-वैसे भ्रामक बयान देकर जनता को गुमराह करने का काम करते हैं तो देश की बाकी जनता क्या करेगी. उन्हें मालूम होना चाहिए कि संविधान के तहत अनुसूचित/अनुसूचित जनजातियों को नौकरियों में आरक्षण की प्रदत्त व्यवस्था इन लोगों की गरीबी हटाने के लिए नहीं अपितु शासन-प्रशासन में समुचित भागीदारी के भाव से की गई थी. संविधान में अनेक ऐसे प्रावधान भी समाविष्टश किए गए हैं जिससे कि अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लोग राष्ट्रा की मुख्या धारा से जुड़ने में समर्थ हो सकें. भारतीय समाज में उसी सम्मान और समानता के साथ रह सकें जैसे कि समाज के अन्य संप्रभु समाज जी रहा है.
इन्हें जान लेना चाहिए कि संविधान का अनुच्छे द 46 प्रावधान करता है कि राज्यत समाज के कमजोर वर्गों में शैक्षणिक और आर्थिक हितों विशेषत: अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों का विशेष ध्यारन रखेगा और उन्हेंक सामाजिक अन्यावय एवं सभी प्रकार के शोषण से संरक्षित रखेगा. शैक्षणिक संस्थाजनों में आरक्षण का प्रावधान अनुच्छे्द 15(4) में किया गया है जबकि पदों एवं सेवाओं में आरक्षण का प्रावधान संविधान के अनुच्छे्द 16(4), 16(4क) और 16(4ख) में किया गया है. विभिन्न् क्षेत्रों में अनुसूचित जनजातियों के हितों एवं अधिकारों को संरक्षण एवं उन्न(त करने के लिए संविधान में कुछ अन्या प्रावधान भी समाविष्टं किए गए हैं जिससे कि अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लोग राष्ट्र  की मुख्यय धारा से जुड़ने में समर्थ हो सके. भारतीय समाज में उसी सम्मान और समानता के साथ रह सकें जैसे कि समाज के अन्य संप्रभु समाज जी रहा है.
किंतु क्या ऐसा आजतक संभव हो पाया है? सच तो ये है कि आज तक अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों को नौकरियों में प्रदत्त आरक्षण का एक बड़ा भाग रिक्त ही पड़ा है. यहाँ यह समझने की जरूरत है कि अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लोगों को नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था केवल  आर्थिक अवस्था को सुधारने भर के लिए नहीं की गई थी अपितु जाति प्रतिशत के आधार पर समाज और शासन में भागीदारी के लिए की गई थी. संविधान के अनुच्छेपद 23 के तहत और भी जन हितकारी प्रावधान किए गए, जिनका यहाँ उल्लेख करना विषयांतर ही कहा जाएगा. गौरतलब है कि संविधान के 117वें संविधान संशोधन के तहत समाज के एस सी और एस टी को सरकारी नौकरियों में पदोन्नत्ति में आरक्षण की वकालत की गई किंतु सरकारी नौकरियों में पदोन्नत्ति  की बात तो छोड़िए, उच्च शिक्षा तक में आरक्षण पर छुरी चलती जा रही है. वैसे भी सरकारी नौकरिय़ां तो ना के बराबर रह गई हैं.
ज्ञात हो कि निजी क्षेत्र में आरक्षण की व्यवस्था नहीं है. ऐसे में भाजपा के शीर्ष नेता सुब्रहमनियम स्वामी का यह कहना, ‘सरकारी नौकरियों में एस सी और एस टी को मिलने वाले आरक्षण के नियमों को इतना शिथिल कर दिया जाएगा कि आरक्षण को किसी भी नीति के तहत समाप्त करने की जरूरत ही नहीं होगी, धीरे-धीरे स्वत: ही शिथिल हो जाएगा.’…आजकल यह सच होता नजर आ रहा है. इस पर भी दलित समाज सामाजिक हितों को आँख दिखाकर अपने – अपने निजी हितों के लिये राजनीतिक खैमों में बँटता ही जा रहा है, जबकि जरूरत तो सामाजिक और राजनीतिक पटल पर एक होने की है. और इस सबके लिए दलित समाज का तथाकथित बुद्धिजीवी और राजनीतिक वर्ग ही जिम्मेवार है.
हाल के दिनों में ही नहीं दसकों से विभाजनकारी ताकतें देश में आरक्षण की ‘मियाद’  को लेकर चिल्लपौं कर रही है, सुमित्रा महाजन ने बिना किसी पुष्ठ जानकारी के उसे हवा देने का ही काम किया है। यानी आरक्षण ‘मियाद’ तय करने की वकालत करने में लगी हुई हैं. उनका मानना है कि ‘पिछड़ी जातियों को दिए गए आरक्षण की कोई अवधि तय नहीं की गई. इसके कारण भारतीय समाज में संतुलन तेजी से नष्ट हो रहा है.’ वास्तव में यह उन लोगों की मानसिक बौखलाहट इसलिए है कि आज उन्होंने कभी भी कोई सार्थक दलील के हक में कोई सबूत पेश नहीं किया और न  किसी सन्दर्भ का हवाला दिया.
आज तक ऐसा कोई उदाहरण नहीं मिलता जिससे आरक्षण सामाजिक ‘संतुलन’ को बिगाड़ने का काम करता है, बल्कि सामाजिक संतुलन बनाने में मदद करता है. आरक्षण जातिवाद भी नहीं फैलाता, क्योंकि जातिवाद तो पहले से ही भारतीय समाज में व्याप्त है. सच तो ये है आरक्षण जातीय भेदभाव और गैरबराबरी को दूर करने की दिशा में काम करता है. आरक्षण सैकड़ों वर्षो से वंचित रहे समुदायों को सामाजिक प्रतिनिधित्व प्रदान करता है और प्रशासन में कायम कुछ खास जातियों के एकाधिकार को खत्म करने की कोशिश करता है. इसलिए आरक्षण खत्म करने या फिर उसकी मियाद तय करने की बात करना न सिर्फ अतार्किक है, बल्कि समता-विरोधी भी है.
स्मरण रहे कि संविधान ने तीन समाजिक वर्गो को आरक्षण मुहैया कराया है. पहला वर्ग एससी (अनुसूचित जाति/दलित) का है, दूसरा एसटी (अनुसूचित जनजाति/आदिवासी) और तीसरा ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) है. एससी को आरक्षण इसलिए दिया गया, क्योंकि वे हमेशा छुआछूत के शिकार रहे हैं और वे हर क्षेत्र में वंचित रहे हैं. दूसरी तरफ एसटी जातीय समाज से पृथक जंगलों पहाड़ों व दुर्गम स्थानों में रहते रहे हैं, मगर वे भी एससी की ही तरह हर क्षेत्र में वंचित रहे हैं. ओबीसी सामाजिक और शैक्षणिक तौर से पिछड़े हैं. इन वर्गो के आरक्षण पर कुछ लोग सवाल तो उठाते हैं, मगर वे इस बात का जिक्र नहीं करते कि क्या वाकई में ये सामाजिक वर्ग समाज में बराबरी पा चुके हैं? वे लोग तर्क देते हैं कि ‘हर चीज की एक उम्र होती है, लेकिन आरक्षण की कोई उम्र तय नहीं की गई है.’
यदि उनके इस तर्क को मान भी लिया जाय तो क्या उन लोगों के पास इस बात का उत्तर है कि जातिवाद की मियाद क्या है. उनसे कौन पूछे कि जब हजारों-साल पुरानी जाति अभी तक भी जिंदा है तो उससे उम्र में कहीं छोटा आरक्षण के औचित्य पर क्यों सवाल उठाया जा रहा है? आरक्षण विरोधियों से यदि यह पूछ लिया जाए कि आरक्षण के प्रावधान क्या हैं?… तो शायद इसका उनके पास कोई उत्तर नहीं होगा. कारण यह है कि उनका विरोध किसी ज्ञान पर आधारित नहीं, केवल पूर्वाग्रही है. उनको यह भी मालूम होना चाहिए कि देश की 85 % जनता को महज 50% आरक्षण का प्रावधान है, वो भी रुग्ण मानसिकता वाले प्रशासन द्वारा पूरा नहीं किया जाता और  शेष 15%  भारतीय सवर्ण आवादी  को 50%. फिर यहाँ मैरिट की बात को लेकर टकराव कहाँ है? एक बात और कि निजी सेक्टर में समाज के उपेक्षित वर्ग की नुमाइंदगी काफी कम है. जिसका साफ-साफ कारण है कि निजी सेक्टर में आरक्षण का प्रावधान ही लागू नहीं है.
ऐसे लोगों को यह भी जान लेना चाहिए कि आरक्षण भारतीय समाज में समता, समानता और मैत्री भाव उत्पन्न करने का एक साधन ही नहीं अपितु समाज के उपेक्षित वर्ग की सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था में भागीदारी निश्चित करने की एक विधि है. यह भी कि आरक्षण के संवैधानिक प्रावधान के बावजूद भी तय कोटा आज तक भी पूरा नहीं किया गया है. और तो और भाजपा के शासन में बकाया पदों को निरस्त कर अनारक्षित वर्ग को दे दिया जा रहा है. अटल सरकार से पहले एस सी/ एस टी का मिलाजुला आरक्षण 22.5% था किंतु अटल जी सरकार के दौरान इसे दो हिस्सों में बांट दिया गया… यथा एस सी को 15% और एस टी को 7.5% …. इस प्रावधान से एस सी और एस टी की न भरे जाने वाली सीटें या तो खाली रहेंगी या अनारक्षित वर्ग को दे दी जाएंगी. पहले ये होता था कि यदि एस सी और एस टी की सीटे एक दूसरे को प्रदान कर दी जाती थीं…अब नहीं. आज न तो एस सी, एस टी और ओ बी सी का कोटा शतप्रतिशत पूरा किया गया है और न इसके प्रयास ही किए जा रहे है. ऐसे में आरक्षण का जारी रहना अत्यंत ही जरूरी है.
  • दलित-बहुजन मीडिया को मजबूत करने के लिए और हमें आर्थिक सहयोग करने के लिये आप हमें paytm (9711666056) कर सकतें हैं। 

ईवीएम पर दिल्ली में राष्ट्रीय सेमिनार में उठे अहम सवाल

नई दिल्ली। ईवीएम को लेकर सामाजिक संगठन मैदान में आने लगे हैं. देश की राजधानी दिल्ली में इसको लेकर 3 अक्टूबर को एक राष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन किया गया, जिसमें बुद्धीजिवियों ने ईवीएम पर गंभीर सवाल उठाया. चर्चा का विषय था, ‘मतदान के लिए ई0वी0एम0 कितना लोकतांत्रिक-कितना पारदर्शी’. इस परिचर्चा में वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश, कुर्बान अली, दिलीप मंडल सहित जे0एन0यू0 के प्रोफेसर और विख्यात समाजशास्त्री डॉ. विवेक कुमार और एन0आर0एम0यू0 के अध्यक्ष कामरेड हरभजन सिंह सिद्धू समेत कई अन्य बुद्विजीवियों ने भी अपने विचार व्यक्त किये.

वरिष्ठ पत्रकार एवं दलित सामाजिक कार्यकर्ता दिलीप मंडल ने कहा कि विश्व के चार देशों में ई0वी0एम0 का प्रयोग होता है. ये देश ब्राजील, वेनुजुएला, भूटान और भारत हैं. उऩ्होंने सवाल उठाया कि अमेरिका जैसे विकसित देश में बैलेट पेपर से मतदान होता है लेकिन भारत में ई0वी0एम0 से. उन्होंने कहा कि जिस देश में ई0वी0एम0 से चुनाव नहीं होता भारत वहां से ई0वी0एम0 की चिप मंगवाता है. अगर चिप में कोई गड़बड़ी नहीं हो सकती तो वो देश खुद ई.वी.एम से चुनाव क्यों नहीं करवाता. दिलीप मंडल ने कहा कि जो लोग खराब ई0वी0एम0 को सही कर सकते हैं वो लोग ई0वी0एम0 में गड़बड़ी क्यों नहीं कर सकते हैं.

बीबीसी के साथ रह चुके वरिष्ठ पत्रकार कुर्बान अली ने बताया कि भाजपा सरकार आज ई0वी0एम0 में गड़बड़ी को नकार रही है, जबकि उसी सरकार के नेता जी0वी0एल नरसिंह राव ने ई0वी0एम0 में गड़बड़ी पर एक किताब लिखी, जिसकी भूमिका भाजपा के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवानी ने लिखी थी.

वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश ने कहा कि ई0वी0एम0 का प्रचलन सन् 1982 में शुरू हुआ. सन् 2004 में पूरे देश में ई0वी0एम0 से मतदान शुरू हुए. भाजपा ने पहले ई0वी0एम0 पर सवाल उठाए, लेकिन अब सत्ता में आने के बाद वो ई0वी0एम0 में गड़बडियों को नकार रही है. उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में भी ई0वी0एम0 में गड़बड़ियां होने के बावजूद केन्द्र सरकार, चुनाव आयोग, अधिकारी, कार्पोरेट और नेता सामूहिक स्वार्थ के चलते ई0वी0एम0 का बचाव कर रहे हैं.

वरिष्ठ पत्रकार ने कहा कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय और दिल्ली उच्च न्यायालय ने भी माना है कि ई0वी0एम0 को हैक किया जा सकता है. उन्होंने कहा कि भारत सरकार द्वारा निर्वाचन का कानून बनाया गया, जिसमें मतदान की तीन प्रक्रिया स्वतंत्रता, निष्पक्षता और पारदर्शिता को निहित किया गया, लेकिन ई0वी0एम0 इन तीनों का पालन नहीं करती. ई0वी0एम0 में बटन दबाने वाले मतदाता को पता नहीं चलता कि आपने किसको वोट दिया. आप साबित नहीं कर सकते कि आपने किसको वोट दिया. केन्द्र सरकार और भाजपा बैलेट पेपर से मतदान नहीं करवाना चाहती और कहती है कि बैलेट पेपर से मतदान होने से बूथ कैप्चरिंग का खतरा है. वरिष्ठ पत्रकार ने यह भी कहा कि ई0वी0एम0 दलितों और पिछड़ो के पक्ष में नही है. ई0वी0एम0 लोकतंत्र एवं संविधान के खिलाफ है. यह मतदाताओं की स्वतंत्रता और निष्पक्षता के खिलाफ है.

जे0एन0यू0 के प्रोफेसर विवेक कुमार ने कोडिंग का मुद्दा उठाया. उन्होंने कहा कि इसे जनता से छिपाया नहीं जा सकता है. परिचर्चा के दौरान कामरेड हरभजन सिंह सिद्धू (अध्यक्ष NRMU) ने भी अपने विचार रखे.ई0वी0एम0 गड़बड़ी का शिकार हुई नगर निगम चुनाव प्रत्याशी अपूर्वा वर्मा ने अपने अनुभवों को साझा किया. कुल मिलाकर ई.वी.एम को लेकर हुई यह बहस काफी सार्थक रही. इसमें श्रोताओं की भी भागेदारी रही. मंच का संचालन हिन्द वॉच के संपादक सुशील स्वतंत्र ने किया.

Read it also-लाल बहादुर शास्त्री : स्वस्थ्य राजनीति का अंतिम पड़ाव
  • दलित-बहुजन मीडिया को मजबूत करने के लिए और हमें आर्थिक सहयोग करने के लिये आप हमें paytm (9711666056) कर सकतें हैं। 

बसपा व जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ गठबंधन के मायने

छत्तीसगढ़। मध्यप्रदेश व राजस्थान में विगत माह में विधानसभा चुनाव संपन्न होने हैं,ऐसे में चुनावी सरगर्मी चरम पर है. इस गर्मी का ताप और तब बढ़ गई जब बसपा प्रमुख मायावती व जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ के अध्यक्ष अजीत जोगी का संयुक्त रूप से हस्ताक्षर की प्रति सामने आया. इसी के साथ मायावती व जोगी ने संयुक्त रूप से छत्तीसगढ़ की आगामी विधानसभा गठबंधन में लड़ने का फैसला लिया गया. यह फैसला कांग्रेसियों सहित कम्युनिस्टों को तनिक भी रास नहीं आ रहा ह. सबकी भौंहें इस निर्णय से मायावाती पर चढ़ी है. इस निर्णय से खफा कुछ दलित बहुजनवादी कार्यकर्ताओं व समर्थकों में भी देखी जा रहीं हैं. वहीं मनुवादी चिंतकों में इस मूलनिवासी राजनीतिक गठबंधन को लेकर जलन, कपट व भारी आक्रोश देखी जा रही हैं. यह सदमें में है कहीं उनकी ब्राह्मणवादी राजनीति सिकुड़ कर बंद न हो जाए.

भारतीय जनता पार्टी की केंद्र सहित भारत के अधिकतम राज्यों के सत्ता में काबिज होने के बाद, साथ ही साथ भारत की सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरने के बाद बसपा सुप्रीमो मायावाती व सपा अध्यक्ष ने उत्तर प्रदेश में लोकसभा के उपचुनाव में सपा-बसपा गठबंधन ने दलित-बहुजन राजनीति को आगे बढ़ाया दोनों ही सीटें इस गठबंधन ने अपने नाम किया. इसके बाद कर्नाटक में हुए लोकसभा चुनाव भी दलित- बहुजन राजनीति की बढ़ती हुई साख व सक्रियता को दर्शाती है. 

अब बात करते हैं छत्तीसगढ़ की आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर, लोगों में यह कयास लगाई जा रही है बसपा व जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ गठबंधन केवल कांग्रेस का ही वोट काटेंगे जिससे भाजपा को बढ़त मिलेंगी. इस तरह से भाजपा फिर यहाँ कमल खिलायंगे. लेकिन यह साधारण बोल- चाल में ही अच्छा लगता है. लेकिन मामला यह है कि पिछले विधानसभा में बसपा ने कांग्रेस के भारी वोट काटे थे जिसके परिणामस्वरूप सूबे में कमल ही खिला था. 20 से 22 सीटों पर बसपा निर्णायक भूमिका में थी. इस तरह से कांग्रेस को करारी हार का सामना करा पड़ा था.

ज्ञातव्य हो कि प्रदेश में दलित आदिवासी व पिछड़े समुदाय की बहुलता है. यहाँ सवर्ण वोटर ज्यादा मायने नहीं रखता है.यहाँ 90 विधानसभा सीटें हैं जिनमें 29 अनुसूचित जनजाति के लिए व 10 सीटें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं. वर्तमान में 10 दलित समुदाय के लिए आरक्षित सीटों में से 01 सीट बसपा के खाते में व शेष 09 सीट बीजेपी के पास है. लेकिन तब तक जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ नामक पार्टी का उदय भी नहीं हुआ था, कांग्रेस पार्टी का बड़ा चेहरा पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी भी कांग्रेस पार्टी में ही थे. वर्तमान में अजीत जोगीकी पार्टी जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ लोगों की जुंबा पर चढ़ने लगा है. कांग्रेस व बीजेपी राष्ट्रीय पार्टी होने के कारण स्थानीय मुद्दे को गौण कर देते हैं. वहीं जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़, छत्तीसगढ़ के हित के मुद्दे को यहाँ के मूलनिवासी संस्कृति,जननायक, नायिकाएँ, भाषा- बोली, परिधान आदि को विशेष ध्यान दें रहें हैं. स्थानीय मुद्दे को लेकर यह पार्टी बहुत ही तेजी से पूरे प्रदेश सहित देश भर में अपनी अलग पहचान बनाने लगे हैं. दलित वोट बसपा के खाते में व पिछड़े व आदिवासी वोट जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ के खाते में जाने वाली है. विधानसभा चुनाव में यह स्थानीय मुद्दे बहुत ही अधिक महत्त्व रखते हैं. बसपा के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष व पामगढ़ के लोकप्रिय पूर्व विधायक दाऊराम रत्नाकर की फिर से वापसी हो गई है, यह प्रदेश में बसपा का प्रमुख चेहरा माना जाता है. पिछले चुनाव में बसपा से अलग होने के कारण बसपा को भारी नुकसान उठाना पड़ा था. दाऊराम रत्नाकर की बसपा में वापसी ने छत्तीसगढ़ बसपा सहित बसपा के राष्ट्रीय पैनल में जान फूंक दी है. दाऊराम रत्नाकर का जांजगीर-चांपा, कोरबा, बिलासपुर इन जिलों के सतनामी वोटर सहित प्रदेश भर के सतनामियों में गहरी पैठ मानी जाती है.

बसपा व जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ इस बार निर्णायक भूमिका में हैं. सूबे में 90 सीटें हैं उनमें से 39 सीटें दलित व आदिवासियों के लिए आरक्षित हैं. यहाँ पिछले विधानसभा चुनाव में बीजेपी व कांग्रेस के सीटों में मामूली अंतर ही देखने को मिलता था. उस समय तक प्रदेश में कांग्रेस के बड़े नाम अजीत जोगी ही थे. बसपा व जोगी की पार्टी जैसे भी हो कम से कम सीटें भी जीतकर लाती है बावजूद इसके इनके ही सीटों के समर्थन से सूबे का मुख्यमंत्री का चेहरा साफ हो जाएगा. आगामी विधानसभा चुनाव में सत्तारूढ़ भाजपा व विपक्षी कांग्रेस के बीच विधानसभा जीती हुई सीटों का अंतर बहुत ही कम रहेंगी ऐही स्थिति में बसपा व जोगी पार्टी का गठबंधन का समर्थन ही आगामी सूबे के मुखिया सहित मंत्रिमंडल को तय करेंगे.

पिछले विधानसभा में 90 सीटों में सेसत्तारूढ़ भाजपा 49 सीटें, कांग्रेस 39 सीटें व बसपा के खाते में 01 व निर्दलीय 01सीट था. उस समय तक बसपा का स्थानीय कोई बड़ा चेहरा नहीं था साथ ही एकजुटता से चुनाव भी नहीं लड़ो गई थी. इस कारण से अनुसूचित जाति के आरक्षित सीट में 10 में 09 सीटों पर भाजपा ने कब्जा किया था. वहीं कांग्रेस को बस्तर संभाग से बढ़त मिली थी. इस बार भी दलित वोटर को बसपा व आदिवासी व पिछड़े वोटर को जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ साधने के फिराक में है. इसके लिए लोकप्रिय प्रत्याशी को यह पार्टी मैदान में उतार रही हैं. जोगी पार्टी आदिवासी क्षेत्रों में जमकर प्रचार शुरू कर दी है. आदिवासियों में पिछड़ों में जोगी की अच्छी पकड़ मानी जाती है. जिसका फायदा इस बार इस गठबंधन को मिलने वाली है.

जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ ने किसानों के लिए धान का समर्थन मूल्य बढ़ाने, किसानों के लिए बिजली बिल माफ करने सहित किसानों को कर्ज में छूट संबंधी गाँव,गरीब व किसान की हित से जुड़ी घोषणा पत्र जारी किया है. इससे पहले भी जोगी सूबे के मुख्यमंत्री रहते हुए गाँव, गरीब किसान के साथ ही दलित, आदिवासी व पिछड़े के पक्ष में अनेकों काम किए हैं जो कि आज भी लोगों को मुंह जुबानी याद हैं. जिसका फायदा निश्चित रूप से जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ व बहुजन समाज पार्टी को अवश्य मिलेगा.

डॉ. विशाल नंदेश्वर

Read it also-भाजपा को 21 तो कांग्रेस को 13 सीटों पर त्रिकोणीय संघर्ष में उलझाएगी बसपा
  • दलित-बहुजन मीडिया को मजबूत करने के लिए और हमें आर्थिक सहयोग करने के लिये आप हमें paytm (9711666056) कर सकतें हैं। 

दलित दस्तक मैग्जीन का अक्टूबर 2018 अंक ऑन लाइन पढ़िए

0
दलित दस्तक मासिक पत्रिका ने अपने छह साल पूरे कर लिए हैं. जून 2012 से यह पत्रिका निरंतर प्रकाशित हो रही है. मई 2018 अंक प्रकाशित होने के साथ ही पत्रिका ने अपने छह साल पूरे कर लिए हैं. हम आपके लिए सांतवें साल का दुसरा अंक लेकर आए हैं. इस अंक के साथ ही दलित दस्तक ने एक नया बदलाव किया है. इसके तहत अब दलित दस्तक मैग्जीन के किसी एक अंक को भी ऑनलाइन भुगतान कर पढ़ा जा सकता है.

ई-मैगजीन पूरा पढ़े सिर्फ 10/-रुपये के सहयोग राशि 9711666056 पर PAYTM के माध्यम से सहयोग करें

मैगजीन सब्स्क्राइब करने के लिये यहां क्लिक करें मैगजीन गैलरी देखने के लिये यहां क्लिक करें

लाल बहादुर शास्त्री : स्वस्थ्य राजनीति का अंतिम पड़ाव

अक्सर लोग अपने और अपने परिवार के बारे में सोचते हैं. परिवार के दु:ख-सुख की सीमा ही उनका कार्य-क्षेत्र होता है. कुछ जाति और वर्ग तक सोचते हैं. जहाँ हित सध जाए ठीक. और कुछ लोग राष्ट्र तक ही सोचते हैं – वह भी सत्ता की राजनीति तक. उन्हें समाज के दु:ख-सुख से कुछ लेना-देना नहीं होता. इस परिप्रेक्ष्य में लाल बहादुर शास्त्री कहीं भी नहीं ठहर पाते. उनका सम्पूर्ण जीवन अपने-पराए की भावना से मुक्त रहा. एक आदमी का चरित्र ही जिया उन्होंने. बिना लाग-लपेट की राजनीति (स्वस्थ्य राजनीति), समाज के दु:ख-सुख का अहसास और उसका निवारण ही उनकी राजनीति का हिस्सा बनी रही.

लाल बहादुर शास्त्री के प्रधान मंत्री बनने के बाद, यह चर्चा अवश्य उभरी के जनवरी 1964 में जब शास्त्री जी को, हज़रत मुहम्म्द के बाल की चोरी की आड़ में हज़रत बल दरगाह काण्ड के तहत भड़के उपद्रवों को शांत कराने के लिए, कश्मीर जाना था तो नेहरू जी ने शास्त्री जी को अपना कोट और जूते देकर अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था. फलत: 27 मई 1964 को नेहरू जी के निधन के उपरांत सर्वसम्मति से शास्त्री जी को प्रधान मंत्री बनाया गया था. किंतु यह एक मिथक भर लगता है. उस समय के राजनीतिक भूगोल पर शास्त्री जी जैसा बेदाग न कोई चाँद था और न ही तारा. इन्दिरा गान्धी अभी अपरिपक्व थीं. परिणामत: काँग्रेस के सामने शास्त्री जी को प्रधान मंत्री बनाने के अलावा कोई विकल्प ही न था. नेहरू जी के कोट और जूते की ओट में शास्त्री जी के उन्नत, निर्मल, गरिमामय और त्यागमय व्यक्तित्व को छिपाया नहीं जा सकता. आज कितने राजनेता हैं जो शास्त्री जी की तरह आए दिन घट रही दुर्घटनाओं की जिम्मेदारी अपने सिर पर उठाकर कुर्सी का मोह छोड़ने को तैयार हैं. वे शास्त्री जी ही थे कि जिन्होंने दक्षिण-भारत में अरियालूर रेल-दुर्घटना का दायित्व अपने ऊपर लेकर मंत्री पद को त्याग दिया.

अगस्त 1962 में ‘कामराज योजना’ के तहत जब केंद्र के मंत्रियों को स्वेच्छा से अपने पद छोड़ने थे तो लाल बहादुर शास्त्री उनमें सबसे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने तत्काल अपने पद से त्याग-पत्र दे दिया था. इस त्यागमूर्ति को पदलोलुपता तनिक भी न छू सकी. फिर भी शास्त्री जी का प्रधान मंत्री बनाया जाना आश्चर्यजनक जरूर था. क्योंकि गाँधी ने नेहरू परिवार के राजकुल का पौधा बड़ी कुशलता से रोपा था. उस पौधे को किस तरह की खाद गाँधी जी ने दी, इसका अन्दाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि यह वकील परिवार कुछ वर्षों में ही राजकुल में परिवर्तित हो गया. गाँधी जी ने लगभग वंशवाद की परम्परा को ध्यान में रखा था जिसका उदाहरण शास्त्री जी की मृत्यु के बाद का राजनीतिक काल है. राजीव गाँधी के निधन के बाद का समय भी नेहरू-कुल से ही कोई प्रतिनिधि ढूँढने में ही गुजर रहा था. यह वंश परम्परा का ही परिणाम है कि आए दिन काँग्रेस के वरिष्ठ नेता अलग-अलग झुंड बनाकर सोनिया गाँधी से भेंट-वार्ता के लिए जाते रहे. जबकि वो न तो काँग्रेस से कोई सीधा सम्बन्ध रखती हैं और न ही किसी मंत्री जैसे पद पर हैं. फिर वंश-परम्परा के चलते प्रधान मंत्री से लेकर काँगेस के सभी राजनेता उनका आशीर्वाद प्राप्त करने के काफी व्याकुल हैं. क्या ऐसे में शास्त्री जी का प्रधान मंत्री बनना एक अजूबा नहीं था.

आज जबकि स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व के जो राष्ट्रीय लक्ष्य व आदर्श जो भारतीयों को सामुहिक रूप से स्फूरित करते थे, जैसे बिखर गए हैं. राष्ट्रीय स्वाभिमान जैसे विलुप्त हो गया है. भारतीय राजनीति का शील भंग हो गया है. आस्थाएं दगमगा रही हैं. सामाजिक न्याय का लक्ष्य मात्र भाषणों और कागजों में सिमट कर रह गया है. नीति और नीयत सब डगमगा रहे हैं. भारतीयता जैसे नैपथ्य में चली गई है. धर्मान्धता , पदलोलुपता और विलासता राजनीतिक मंच पर निर्वसन थिरक रही है. समाज में हिंसा और भ्रष्टाचार निरंतर निर्बाध गति से बढ़ता जा रहा है. लोगों की मानसिकता हिंसक होती जा रही है. राजनैतिक नारे दिशाहीनता ही पैदा कर रहे हैं. जाति-प्रथा के पोषक ही जातियता बढ़ने का शोर अलापने लगे हैं. इस सबका कारण यह कतई नहीं है कि हमारे नेता अज्ञानी हैं. उनकी दुर्बलता महज इतनी है कि वो केवल सत्ता की भाषा को ज्यादा अहमियत देते हैं. जनता के दुख-सुख से उन्हें कोई सरोकार नहीं है. वस्तुत: गाँधी ने अपने नेतृत्व में काँग्रेस को जिस ढाँचे मे ढाला, उससे जनता से सीधे सम्पर्क का दायित्व सर्वोच्च नेता के हाथ में चला गया जो जनता से अपनी बात तो करते हैं, उनकी सुनते भी हैं. आज मंत्री तो क्या उनके चमचों की संतानें/साथी/सहयोगी स्वयं को ही मंत्री जानकर व्यवहार करते हैं. ऐसे में शास्त्री जी के विचारों की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है. शास्त्री जी जमीन से जुड़े व्यक्ति थे. जमीन के दुख-दर्द को समझते थे. उनके जीवन की अनेक घटनाएं ऐसी हैं जो उनके व्यक्तित्व की गरिमा को न केवल व्यक्त करती हैं अपितु आज की राजनीति के गिरते आचरण का खुलासा करती हैं.

उत्तर प्रदेश में जब वे गृह मंत्री थे तब उनके घर में कूलर तक भी नहीं था, उन्होंने अपने परिवार जनों को समझाते हुए कहा था – “देखो! तुम देश के अति साधारण नागरिक हो. फिर यह भी संभव है कि मैं आज मंत्री हूँ, शायद कल न रहूँ. तब तुम लोगों को कूलर का अभाव और भी कष्टदायक होगा. फिर यह भी बताओ कि क्या मैं देश के सभी गरीबों के घर कूलर लगवा सकूँगा.”

उनके प्रधानमंत्री काल में उनके परिवार के एक बच्चे द्वारा फार्म प्राप्त करने के लिए सामान्य परिवार के बच्चों की पंक्ति में खड़े होना, अपने आप में एक अजब सी दास्तान है. किंतु है सत्य. अध्यापक के पूछने पर उस बच्चे का जवाब भी उदाहरणीय है. बालक ने कहा था – मैंने तो नियम का ही पालन किया है. जब सब जने पंक्ति में खड़े हैं तो मुझे भी पंक्ति में ही खड़ा होना चाहिए. इसी प्रकार की एक और घटना है कि शास्त्री जी मंत्री रहते हुए महीने के अंत में उनके नाती ने उनसे नई स्लेट लाने के लिए कहा. शास्त्री जी का उत्तर था कि दो-चार दिन की और प्रतीक्षा करो, महीने के आखरी दिन हैं, तनख्वाह मिलने पर स्लेट दिला दूँगा.

इन संदर्भों में, एक गरीब का बेटा अंत तक गरीब ही बना रहा. शास्त्री जी कहा करते थे कि जब तक देश उन्नति नहीं कर लेता, तब तक अपनी गरीबी का भी परित्याग नहीं करूँगा. वे भगवान बुद्ध से अति प्रभावित थे. वे कहते थे कि भगवान बुद्ध ने भी कहा था कि जब तक सम्पूर्ण मानवता को मुक्ति नहीं मिल जाती, तब तक मैं इस रसहीन मुक्ति को लेकर क्या करूँगा. शास्त्री जी के संदेश में सबके मन की बात का संप्रेषण होता था, तब ही उनका ‘जय किसान’, ‘जय जवान’ का नारा इतना फला-फूला कि जनता, किसान और भारतीय जवानों के सामने वर्ष 1965 के युद्ध में पाकिस्तान को पराजय का मुँह देखना पड़ा. शांति-वार्ता के दौरान उनका यह कहना कि देश का साधारण व्यक्ति युद्ध नहीं करना चाहता, वह शांति चाहता है. ताशकन्द समझौते का कारण बना. समझौता सम्मानपूर्वक सम्पन्न हो गया. किंतु दुख तो इस बात का है कि जब शांति-वार्ता के बाद उन्हें दिल का दौरा पड़ा और सदैव के चिरनिद्रा में चले गए.

आज जबकि देश के छोटे-बड़े नेता भ्रष्टाचार की लपेट में हैं – चाहे बोफोर्स तोप का मामला हो या हर्षद मेहता को शेयर काण्ड, चाहे चीनी घोटाले का मामला हो या मुलायम सिंह यादव द्वारा बन्दरबाँट, धार्मिक उन्माद का मामला हो , या मंदिर-मस्जिद का मामला, या फिर सामाजिक न्याय के मार्ग में विवाद हो, पुरातन संस्कृति का विध्न हो या फिर सत्ता-प्राप्ति के लिए मुखौटा राजनीति, श्रृषिकेश के शंकराचार्य द्वारा यौन-शोषण का मामला हो या चन्द्रा स्वामी की राजनीतिक दलाली का किस्सा हो, सबके सब में सत्ताधीशों के होने का जग-जाहिर संकेत हैं. मान-मर्यादा चली जाए, पर सत्ता पर कब्जा बना रहे, यह है आज की राजनीति का चरित्र. दिन को रात कहना पड़े या रात को दिन कोई परहेज नहीं, किंतु सत्ता बनी रहे. इसे राजनीति कहने में जीभ अटकती है क्योंकि राजनीति तो किसी भी राज्य/देश की वह नीति होती है जिसके अनुसार प्रजा का शासन तथा पालन और अन्य राज्यों से व्यवहार होता है. इसे कूटनीति (किटिल नीति) कहना ज्यादा उचित होगा.

यूँ तो भारत के कई नेता आजादी से पूर्व ही राजनीति त्याग कर कूटनीति में लिप्त हो गए थे किंतु भारत को आजाद करवाकर सत्ताधीश बनाने की ललक में संगठित थे. वैसे भी उनके सामने मसला मात्र भारत की आजादी का था, सत्ता-सुख भोगने का नहीं. फिर भी राजनीतिक गलियारों में तत्कालीन राजनीति की स्थिति अन्धों में काणें सरदार जैसी थी. उस समय कुछ तो ठीक था ही, किंतु आज बाप-रे-बाप, किसी को कुर्सी के अलावा कुछ नजर ही नहीं आता. ऐसे में यह कहना अतिश्योक्ति नहीं कि लाल बहादुर शास्त्री के निधन के साथ ही स्वस्थ्य राजनीति का पटाक्षेप हो गया. लगता है उनका दौर स्वस्थ्य राजनीति का अंतिम पड़ाव था. Read it also-सियासत / सीट बंटवारे के बाद बसपा ने बदली रणनीति

  • दलित-बहुजन मीडिया को मजबूत करने के लिए और हमें आर्थिक सहयोग करने के लिये आप हमें paytm (9711666056) कर सकतें हैं। 
 

कल 3 अक्टूबर को EVM पर बड़ी बहस 

नई दिल्ली। ईवीएम सही या गलत, इसको लेकर छिड़ी बहस अब राजनीतिक गलियारे से निकल कर आम जनता और देश के बुद्धिजीवी और चिंतकों तक आ गई है. इसी मुद्दे पर 3 अक्टूबर को देश की राजधानी दिल्ली में एक परिचर्चा आयोजित की गई है. परिचर्चा का विषय है-“मतदान के लिए EVM कितना लोकतांत्रिक- कितना पारदर्शी?”

यह परिचर्चा कंस्टीट्यूशन क्लब के डिप्टी स्पीकर हॉल में दोपहर 2 बजे से होगा. इस कार्यक्रम में वक्ता के रूप में मीडिया जगत के दिग्गज पत्रकार उर्मिलेश, कुरबान अली, जेएनयू के प्रोफेसर आनंद कुमार, वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल, NRMU के प्रेसिडेंट कामरेड हरभजन सिंह सिद्धू और सुप्रीम कोर्ट के वकील मौजूद रहेंगे.

Read it also-दलितों का विरोध राष्ट्रव्यापी मुद्दा क्यों नहीं बन पाता?
  • दलित-बहुजन मीडिया को मजबूत करने के लिए और हमें आर्थिक सहयोग करने के लिये आप हमें paytm (9711666056) कर सकतें हैं। 

मध्य प्रदेश से बीजेपी को हटाने के लिए साथ आईं आठ पार्टियां, कांग्रेस की नो-एंट्री

भोपाल। इस साल के अंत में मध्यप्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ गठबंधन बनाने के लिए आठ राजनीतिक दलों की रविवार को भोपाल में बैठक हुई. इसमें शामिल आठों पार्टियों ने बीजेपी को सत्ता से हटाने का संकल्प लिया लेकिन कांग्रेस को भी इस गठबंधन में शामिल कर महागठबंधन बनाने के मुद्दे पर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) ने विरोध किया. इस कारण कांग्रेस को इस गठबंधन में मौका नहीं मिल सका.

लोकतांत्रिक जनता दल के सलाहकार गोविन्द यादव ने बताया, ‘संवैधानिक लोकतंत्र बचाने एवं वैकल्पिक राजनीति की खातिर मध्यप्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव के लिए गैर-बीजेपी राजनैतिक दलों के गठबंधन निर्माण के लिए आठ विभिन्न राजनैतिक दलों की बैठक भोपाल में हुई. इस बैठक में लोकतांत्रिक जनता दल, सीपीआई, सीपीएम, बहुजन संघर्ष दल, गोंडवाना गणतंत्र पार्टी, समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय समानता दल और प्रजातांत्रिक समाधान पार्टी शामिल हुई.’

सीपीआई और सीपीएम ने किया कांग्रेस का विरोध

यादव ने बताया कि सीपीआई और सीपीएम ने संपूर्ण विपक्षी एकता के लिए गैर बीजेपी गठबंधन निर्माण पर सैद्धांतिक सहमति व्यक्त की लेकिन कांग्रेस के साथ चुनाव पूर्व पूर्ण गठबंधन नहीं करने का फैसला लिया. शेष अन्य दलों ने संपूर्ण विपक्षी एकता के लिए कांग्रेस के साथ चुनाव पूर्व पूर्ण गठबंधन का समर्थन किया. उन्होंने कहा कि इन आठों दलों की अगली बैठक 7 अक्टूबर को आयोजित की गई है.

बता दें कि यादव वर्तमान में लोक क्रांति अभियान के संयोजक हैं. वह मध्यप्रदेश जनता दल (यूनाइटेड) के अध्यक्ष भी रह चुके हैं. उन्होंने कहा कि बीएसपी द्वारा मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए 22 प्रत्याशियों की 20 सितंबर को की गई घोषणा के बाद यह कदम उठाया जा रहा है, ताकि विपक्षी दलों के वोटों का विखराव न हो और बीजेपी को लगातार चौथी बार सत्ता में आने से रोका जा सके.

गैर-बीजेपी वोटों के बिखराव को रोकने की कोशिश

यादव ने बताया कि बीएसपी ने मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव अकेले लड़ने का ऐलान गुरुवार को कर दिया और वह सभी 230 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारेगी इसलिए हम गैर बीजेपी वोटों के बिखराव को रोकने के लिए गठबंधन करेंगे, ताकि बीजेपी को हराया जा सके. उन्होंने कहा कि विधानसभा के चुनाव के लिए अब बहुत कम समय बचा है. लंबे समय से महागठबंधन के लिए प्रयास कर रही कांग्रेस अब तक सफल नहीं हो पाई है इसलिए हम इस महागठबंधन के लिए प्रयास कर रहे हैं.

Read it also-मायावती ने फेरा कांग्रेस की उम्मीदों पर पानी
  • दलित-बहुजन मीडिया को मजबूत करने के लिए और हमें आर्थिक सहयोग करने के लिये आप हमें paytm (9711666056) कर सकतें हैं। 

SBI ने ATM से कैश निकालने की दैनिक सीमा में की बड़ी कटौती

0

नई दिल्ली। देश के सबसे बड़े बैंक, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) ने एटीएम से कैश निकालने के नियमों में कुछ बड़े बदलाव किए हैं. SBI ने कैश निकालने की दैनिक सीमा में बड़ी करने का फैसला किया है. SBI के ग्राहक 31 अक्टूबर से एक दिन में अधिकतम 20 हजार रुपये कैश ही एटीएम से निकाल सकेंगे, अभी तक यह सीमा 40 हजार रुपये थी.

SBI ने ब्रान्चों में भेजे आदेश दिया है कि एटीएम ट्रांजेक्शन में धोखाधड़ी की बढ़ती शिकायतों को देखते हुए और डिजिटल-कैशलेस ट्रांजेक्शन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से कैश निकासी सीमा को घटाने का फैसला किया गया है. ‘Classic’ और ‘Maestro’ प्लेटफॉर्म पर जारी डेबिट कार्ड से निकासी सीमा को घटाया गया है.

कैश निकासी सीमा में कटौती फेस्टिवल सीजन से ठीक पहले हुई है. सरकार द्वारा डिजिटल ट्रांजेक्शन पर जोर दिए जाने के बावजूद कैश की डिमांड अधिक बनी हुई है. कुछ अनुमानों के मुताबिक बाजार में कैश फ्लो नोटबंदी से पहले के स्तर तक पहुंच गया है.

पिछले कुछ वर्षों में कई मामलों में पाया गया है कि कार्ड का क्लोन बनाने वाले धोखेबाज आम बैंक कस्टमर्स के डेबिट कार्ड का PIN चोरी से लगाए गए कैमरों और इलेक्ट्रॉनिक डिवाइसेज से पता कर लेते हैं.

Read it aslo-मायावती ने फेरा कांग्रेस की उम्मीदों पर पानी
  • दलित-बहुजन मीडिया को मजबूत करने के लिए और हमें आर्थिक सहयोग करने के लिये आप हमें paytm (9711666056) कर सकतें हैं। 

विवेक तिवारी हत्याकांड पर बहनजी का बड़ा बयान

लखनऊ। विवेक तिवारी हत्याकांड को लेकर बसपा सुप्रीमो मायावती ने प्रदेश की योगी सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं. उन्होंने कहा कि योगी सरकार में प्रदेश के ब्राह्मणों का शोषण हो रहा है. पूरे प्रदेश में भय का माहौल व्याप्त है. उन्होंने हत्याकांड की उच्चस्तरीय जांच करने की मांग करते हुए आरोप लगाया कि सरकार सिर्फ खानापूर्ति कर रही है. बसपा प्रमुख ने लखनऊ में मीडिया से ये बातें कही.

बसपा प्रमुख ने सीएम योगी को निशाने पर लेते हुए कहा कि सरकार इस मामले पर सिर्फ खानापूर्ति कर रही है. अब तक अफसरों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई है. अगर मैं मुख्यमंत्री योगी की जगह होती तो अब तक अफसरों के खिलाफ एक्शन ले लेती. योगी ने पीड़ित परिवार से मुलाकात की और मदद का आश्वासन दिया. ऐसा करके सरकार किसी तरह मामले को दबाना चाहती है. सिर्फ इतना करने से ही काम नहीं चलेगा. जब प्रदेश की राजधानी में ये हाल है तो पूरे प्रदेश की स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है.

यूपी की पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि ऐसा लगता है कि प्रदेश में अब कानून-व्यवस्था नाम की चीज नहीं है. चुनाव में भाजपा ने सपने दिखाए थे कि कानून का राज स्थापित होगा लेकिन हर वादे की तरह ये भी हवा-हवाई साबित हुआ. मायावती ने कहा कि हमने सतीश चंद्र मिश्रा जी को पीड़ित परिवार से मिलने भेजा है. सतीश वकील हैं. अगर परिवार चाहे तो वह (सतीश) मामले की पैरवी करने के लिए भी तैयार हैं.

Read it also-प्रमोशन में आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट के फैंसले का मायावती ने किया स्वागत
  • दलित-बहुजन मीडिया को मजबूत करने के लिए और हमें आर्थिक सहयोग करने के लिये आप हमें paytm (9711666056) कर सकतें हैं। 

8वीं पास के लिए 16 हजार की नौकरी यहां है

नई दिल्ली। कोलकाता हाईकोर्ट ने ग्रुप डी के पदों के लिए आवेदन मंगाए हैं. ये भर्तियां फराश, पियोन, अर्दली, बरकंदज़, दरवान, नाइट गार्ड व क्लीनर के 221 पदों के लिए होनी हैं. इच्छुक और योग्य उम्मीदवार कोलकाता हाईकोर्ट की ऑफिशियल वेबसाइट calcuttahighcourt.gov.in पर जाकर ऑनलाइन अप्लाई कर सकते हैं. योग्यता इन पदों पर आवेदन करने के लिए उम्मीदवारों को किसी भी मान्यता प्राप्त संस्थान से 8वीं कक्षा पास करना जरूरी है. इसके अलावा उसे बंगाली और इंग्लिश भाषा पढ़नी आती हो. उम्र सीमा उम्मीदवार की उम्र 18 साल से 40 साल के बीच होनी जरूरी है. आवेदन शुल्क- सामान्य वर्ग- 400 रुपए एससी/एसटी वर्ग- 150 रुपए सैलरी 4,900 से 16,200 रुपये महीना अंतिम तारीख- 29 अक्टूबर चयन प्रक्रिया- सफल उम्मीदवारों का चयन लिखित परीक्षा के आधार पर किया जाएगा. कैसे करें आवेदन उम्मीदवारों को ऑनलाइन माध्यम से ही अप्लाई करना होगा. इच्छुक और योग्य उम्मीदवार आधिकारिक वेबसाइट calcuttahighcourt.gov.in पर जाकर ऑनलाइन आवेदन करें. Read it also-राज्य दे सकते हैं प्रमोशन में आरक्षण: सुप्रीम कोर्ट
  • दलित-बहुजन मीडिया को मजबूत करने के लिए और हमें आर्थिक सहयोग करने के लिये आप हमें paytm (9711666056) कर सकतें हैं। 

योगी से मिलीं विवेक तिवारी की पत्नी, 40 लाख मिला

लखनऊ। यूपी की राजधानी लखनऊ में पुलिस की गोली से विवेक तिवारी की मौत के मामले में मृतक की पत्नी कल्पना तिवारी ने सीएम योगी आदित्यनाथ से मुलाकात की. सोमवार सुबह हुई इस मुलाकात में कल्पना के साथ उनके भाई भी मौजूद थे. इस दौरान मुख्यमंत्री ने उन्हें 25 लाख रुपये का मुआवजा के अलावा दोनों बेटियों और विवेक की मां के लिए 5-5 लाख रुपये का फिक्स डिपोजिट देने का ऐलान किया. इससे पहले रविवार को विवेक तिवारी का अंतिम संस्कार कर दिया गया. उनकी पत्नी ने पति की मौत की जांच SIT से करने की मांग की. Read it also-हत्या के इस मामले से मुश्किल में सीएम योगी
  • दलित-बहुजन मीडिया को मजबूत करने के लिए और हमें आर्थिक सहयोग करने के लिये आप हमें paytm (9711666056) कर सकतें हैं। 
   

हिंदी दलित साहित्य का धारावी केन्द्र शाहदरा-दिल्ली

गए दिनों जामिया मिलिया विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग की विभागाध्यक्ष डा. हेमलता माहेश्वर अपने शोधकर्ता छात्र के साथ मेरे घर आई थीं. तब उनके साथ दलित साहित्य आंदोलन के इतिहास पर बातों-बातों में एक गंभीर चर्चा हुई। पहली पीढी के रचनाकारों के संघर्ष को सुन/जानकर वो इतनी अचंभित हुईं कि यकायक  उनके मुख से निकल पड़ा कि पूर्वी दिल्ली का शाहदरा क्षेत्र तो दलित साहित्य के विकास, प्रचार और प्रसार के लिहाज से जैसे मुम्बई ‘धारावी’ है. उसी दिन दैनिक जागरण में छपी खबर के जरिए यह भी जानने को मिला कि विश्व विख्यात मुक्केबाज माइक टायसन ने कहा कि झुग्गियों से आते हैं स्टार.  टायसन ने यह भी इच्छा जाहिर की कि उनकी इच्छा ताजमहल व मुंबई की “धारावी” को देखने की चाहत है. उल्लेखनीय है कि  पिछले दिनों रजनीकांत की पिक्चर “काला” देखी तो झोपड़ पट्टी से उठी ज्वालामुखी को काले, लाल रंग मे फटते देखा और देखते ही देखते समता व स्वतंत्रता की विजय चाहत से पूरा ‘धारावी’ जनसमूह धरती आसमान सहित नीला-नीला दिखने लगा.
मराठी दलित साहित्य मुंबई की झोपड़ पट्टी से ही उभरा था. दलित पैंथर के कारण ही दलित साहित्य अपनी अस्मिताओं के प्रखर सवालों को केंद्र मे रख आंदोलनात्मक स्वरुप ले सका और सन् 60 के दशक में परम्परावादी साहित्य के सामने गंभीर चुनौती खडी कर दी. यहाँ यह बताना मैं जरूरी समझता हूँ कि यथोक्त प्रकरण ने ही इस लेख को लिखने के लिए मुझे प्रेरित किया है. यह भी कि  मुंबई का ‘धारावी’ क्षेत्र एशिया का सबसे बडा झोपड़ पट्टी का स्लम एरिया था जंहा से शोषण के खिलाफ मोर्चा लगा आवाज उठाने वालो में विश्व विख्यात लोककवि/ शायर अन्नाभाऊ साठे, बाबूराव बाबुल, अर्जुन डांगले, पदमश्री दया पंवार प्रमुख कवि/लेखक रहे हैं, जिन्होनें दलित पैंथर की नींव रखी. बाद में  मुंबई,  नागपुर, नासिक, औरंगाबाद आदि केंन्द्र इनके कार्यक्षेत्र बनें। यह वह दौर था जब दलित साहित्य ने व्यवस्था के विरूद्ध परम्परावादी साहित्यकारों को एक खुली चुनौती दी और लोकशाही में अपने बुनियादी हकूक के सवालो को उठाया था. इसी प्रकार हिन्दी पट्टी में पूर्वी दिल्ली का शाहदरा क्षेत्र दलित साहित्य आंदोलन का केन्द्र ही नही रहा बल्कि भारत की राजनीतिक राजधानी को नानाप्रकार से प्रभावित करता रहा है. जनांदोलन में इस क्षेत्र की सबसे अधिक भागीदारी आज भी होती है. सच मायने में पूर्वी दिल्ली का शाहदरा क्षेत्र उत्तर भारत में हिंदी दलित साहित्य आंदोलन के लिहाज से मुम्बई  का यह ‘धारावी” है. आज यंहा एक ‘ साहित्यकार चौक’  भी है जंहा दैनिक रुप से क्षेत्रीय साहित्यकारों की बैठकी होती है.
उपेक्षित बहुसंख्यकों की आवाज ही दलित साहित्य आंदोलन है जो बुध्द, कबीर, फूले, डा.अम्बेडकर की विचारधारा को केन्द्र में रखकर दुनिया में सामाजिक न्याय हेतु दस्तक दे रहा है. बात सत्तर के दशक की है जब दिल्ली का शाहदरा क्षेत्र खेतिहर क्षेत्र हुआ करता था. जिसमें नयी-नयी रिहायशी कालोनियां बस् रही थीं. उत्तर भारत के लोग दिल्ली मे सरकारी नौकरियों के लिए आए तो कुछ देवनगर/बापा नगर किराए पर रहने लगे तो कुछ सरकारी नौकरियों के कारण अपनी स्थाई छत के लिए रिहायशी जगह ढूढने लगे और शाहदरा में आकर उ.प्र. व अन्य प्रदेशों के लोग जमीन खरीद कर बसने लगे तो कुछ सरकारी क्वार्टरों मे रहने लगे.
शाहदरा क्षेत्र मे ‘ गोवर्धन बिहारी ‘एक विख्यात नाम था. जो दो व्यक्ति और एक शरीर (आत्मा) के नाम से जाने जाते थे. जो दलित समाज के समाज सुधारक जनकवि थे. जिनका लोहा समकालीन साहित्यकार मसलन, संस्कृत के उद्भट विद्वान भरत राम भट्ट, पदमश्री क्षेम चंद सुमन, कैलाश चंद तरुण, हंसराज रहबर,पं त्रिलोक चंद “आजम”, आचार्य चतुरसैन शास्त्री, फतेहचंद शर्मा ‘आराधक’,  डा.विजेन्द्र स्नातक, पदमश्री डा.श्याम सिंह ‘शशी’ , डा.बृजपाल सिहं संत, डा. जगन्नाथ हंस, डा.शंकर देव अवतरे, मदन विरक्त, डा.धर्मवीर शर्मा आदि मानते थे. आचार्य जनकवि बिहारी लाल हरित जंहा समाज सुधारक कवि थे तो उनके संपर्क  बाबा साहब डा.अम्बेडकर व बाबू जगजीवन राम से भी घनिष्ठ संबध रहे थे. जिनके नाम से गोवर्धन बिहारी कालोनी शाहदरा में बसी है. बाद में यमुनापार, शाहदरा में सादतपुर कालोनी, दयाल पुर में बसीं. यंहा बाबा नागार्जुन आकर बसे और उनसे प्रभावित लोगों/साहित्यकारों ने आकर जमीन खरीदकर अपने निजी मकान बनाये जिनमें हरिपाल त्यागी, रामकुमार कृषक, महेश दर्पण, माहेश्वर, रुपसिंह चंदेल आदि जनवादी विचारधारा के लेखकों /पत्रकारों ने अपने-अपने निवास बनाए. इसका एक कारण एशिया का प्रिंटिंग प्रकाशन का उधोग नवीन शाहदरा में होना भी था. आज भी यमुनापार में प्रकाशको की भरमार है. उत्तर भारत का हिन्दी साहित्य ज्यादातर यही छपता है.
एक तरफ परम्परागत साहित्यकार थे तो दूसरी तरफ प्रगतिशील जनवादी साहित्यकार, इसी में एक तीसरी धारा के दलित साहित्यकार अपना साहित्यिक दबदबा बनाए हुए थे. इस त्रिवेणी धारा में आपसी साहित्यिक तालमेल हमेशा बना रहा और साहित्यिक विमर्श /चर्चा परिचर्चा/कवि-सम्मेलन आदि चलते रहते थे. यंहा अनेकों साहित्यिक संगठनों द्वारा आयोजन समय-समय पर आयोजित किए जाते रहते थे जो परम्परा अब कम होती जा रही है.
आचार्य जनकवि बिहारी लाल हरित के सानिध्य में अनेकों दलित साहित्यकारों ने आज अपने लेखन से राष्ट्रीय एवं अंतराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई है. जिनमें एल.एन.सुधाकर, एन.आर.सागर, डा.राजपाल सिंह ‘राज’, डा.सोहनपाल सुमनाक्षर, यादकरण याद, डा.कुसुम वियोगी, कवि/पत्रकार व ख्यात आलोचक तेजपाल सिंह ‘तेज’  इंजि.श्याम सिंह,  प्रख्यात आलोचक कंवल भारती, बुध्द संघ प्रेमी, नत्थू सिंह ‘पथिक’ , जसराम हरनोटिया, मंशा राम विद्रोही, रामदास शास्त्री,  आर.डी.निमेष, मोतीलाल संत, कर्मशील अधूरा, बी.डी.सुजात, अनुसूईया ‘अनु’ ,धनदेवी, आनंद स्वरुप, के.पी.सिंह आदित्य, जालिम सिंह ‘ निराला’ , मान सिंह ‘मान’, लख्मी चंद सुमन आदि प्रमुख हैं. वर्तमान में डा. जयप्रकाश कर्दम, ईश कुमार गंगानिया, शीलबोधी, राजेश कुमार हरित, रुप चंद गौतम पत्रकार आदि इसी क्षेत्र से दलित साहित्य का प्रतिनिधित्व करते हैं.
1984 में भारतीय साहित्य मंच (पंजि.) भारतीय दलित साहित्य अकादमी का गठन किया गया तो  15,अगस्त 1997 को दलित लेखक संघ का गठन भी यमुनापार शाहदरा, रामनगर विस्तार अवस्थित मेरे ही निवास व प्रयास पर अनेक सहयोगी साहितकारों के सहयोग से ही हुआ था. वर्ष 2001 में मेरे चंडीगढ़ नियुक्ति के दौरान डा.अम्बेडकर स्टडी सर्कल चंडीगढ़ के माध्यम से 21 वीं शताब्दी का प्रथम दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय दलित साहित्यकार सम्मेलन आयोजित किया गया जिसमें देश विदेश से लगभग 450 अकादमिक व नान-अकादमिक सामाजिक कार्यकर्ता कवि लेखक साहित्यकारों ने भाग लिया था. जिसमें मुकेश मानस द्वारा ख्यातिनाम दलित कवियों की कविताओं की पोस्टर प्रदर्शनी भी लगायी थी. जिसका कोर्डिनेटर मैं स्वयं रहा, रजनी तिलक व अश्वनी कुमार ने इस आयोजन मे महती भुमिका निभाई.
उल्लेखनीय है इस दो दिवसीय कार्यक्रम का संचालन तेजपाल सिंह ‘तेज’ द्वारा ही किया गया। इस प्रकार  दलित साहित्य पूरी शिद्दत के साथ पूरे भारत मे छा गया. इस आयोजन मे विशेष रुप पंजाब के क्रांति चेता कवि लाल सिंह ‘दिल ‘ को आमंत्रित किया गया था. बाद के  दिनों में दलित लेखक संघ के बैनर तले डा. तेज सिंह के अध्यक्ष रहते उनके नेतृत्व में दो-तीन सेमिनार भी आयोजित किए गये। डा. तेज सिंह के संपादन में दलित लेखक संघ की केन्द्रीय पत्रिका ‘ अपेक्षा ‘ भी निकली. दलित साहित्य के मूल मे डा. अम्बेडकर की वैचारिकी ही सर्व स्वीकार्य है, जो विषमता मूलक समाज में सदैव केंद्र मे रहेगी. बकौल डा. विमलकीर्ती – प्रगतिशील लेखक आधुनिक काल के बाद को उत्तर आधुनिक काल /उत्तर सती कह कर अपने लेखन को आगे बढते हैं तो अम्बेडकरवादी दलित साहित्यकार आधुनिक काल के बाद के काल को अर्थात 1947 से ” प्रश्नोत्तर काल का साहित्य ( सन् 1947 से आज तक ) मानते है. दलित साहित्यकारों ने समाज की जड़ता व विद्रूपताओ पर करारा प्रहार किया है. जो दलित उत्पीडित समाज के सामाजिक/सांस्कृतिक/आर्थिक,शैक्षणिक /धार्मिक व राजनीतिक प्रश्नों को लेकर व्यवस्था के सामने बेबाक हो, अपनी अस्मिताओं के संरक्षण के सवालों को लेकर खडे हुए हैं और सतत लिख रहे हैं. दलित साहित्य सही अर्थो मे व्यवस्था परिवर्तन के साथ जातिविहीन, वर्गविहीन समाज की स्थापना को संघर्षरत साहित्य ही है.
राजनीतिक आंदोलन की जमीन तैयार करने मे अम्बेडकरवादी साहित्यकारों की महती भूमिका को कभी भुलाया व नकारा नहीं जा सकता. आज दलित साहित्य पुरे देश व दुनिया में अपनी दस्तक ही नही दे रहा है बल्कि शैक्षिक पाठ्यक्रमों मे शामिल कर देश-विदेशों मे पढाया भी जा रहा है. आज पुस्तकों के बाजार में तीसरी धारा के दलित साहित्य को पढने वालो का एक व्यापक पाठक वर्ग उभर कर सामने आया है जो अपनी अस्मिता के सवालों को इस साहित्य मे खोजता  है और पढ लिखकर सामाजिक न्याय आंदोलन का सूत्रधार भी बनता है. आज दूसरी पीढी के अनेक कवि/ कवियत्री व लेखक/पत्रकार साहित्यकारों ने अपनी मजबूत दस्तक देनी शुरू कर दी है जो एक समतामूलक समाज के निर्माण हेतु अच्छा संकेत है.

डा.कुसुम वियोगी

Read it also-कार में गाना बजाने पर दलित युवक की पिटाई, मां पर भी हमला

  • दलित-बहुजन मीडिया को मजबूत करने के लिए और हमें आर्थिक सहयोग करने के लिये आप हमें paytm (9711666056) कर सकतें हैं। 

बिहारः नीतीश की योजना को पूरा करने में गई दलित वार्ड सदस्य की जान, राजपूत मुखिया ने पीट कर मार डाला

 

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की महत्वकांक्षी योजना सात निश्चय योजना को ईमानदारी से जमीन पर उतारने की जिद ने एक दलित युवक की जान ले ली. प्रदेश के छपरा में एक गुंडे मुखिया मुन्ना सिंह और उसके समर्थकों ने दिव्यांग दलित वार्ड सदस्य को पीट-पीट कर मार डाला. घटना सारण जिले के डेरनी थाना क्षेत्र के डीह पिरारी पंचायत में 22 सितंबर को घटी.

दरअसल मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने चुनाव के दौरान सात निश्चय योजना का जिक्र किया था. इस योजना को नीतीश हर हाल में पूरा करना चाहते थे. इन सात निश्चय में शिक्षा, सड़क, बिजली, शौचालय, पानी, रोजगार, महिलाओं को रोजगार जैसे मुद्दे शामिल किए गए थे. बड़ा बदलाव करते हुए सरकार ने पंचायत के हर वार्ड सदस्य को विकास कार्यों में सहयोगी बनाने का निर्णय लिया था, जिसमें राज्य के एक लाख 14 हजार 733 वार्ड सदस्यों को भागीदार बनाया गया. यही बात मुखिया के पद पर कब्जा जमाए कथित ऊंचे तबके के लोगों को चुभने लगी, क्योंकि कुछ भुगतान में वार्ड सदस्य की सहमति जरूरी थी.

आरोपी मुखिया मुन्ना सिंह

जानकारी के अनुसार 22 सितंबर की रात को वार्ड सदस्य नंद कुमार राम से चेक पर साइन लेने के लिए मुखिया मुन्ना सिंह अपने समर्थकों के साथ उसके घर पहुंच गया. लेकिन योजना में गड़बड़ी के कारण वार्ड सदस्य नंद कुमार राम ने चेक पर साइन करने से मना कर दिया. इंकार सुनने के बाद मुखिया और उनके समर्थकों ने वार्ड सदस्य को बेरहमी से पीटा. गंभीर रूप से घायल वार्ड सदस्य को पीएमसीएच में भर्ती कराया गया, जहां 26 सितंबर को देर रात उनकी मौत हो गई. डीह पिरारी पंचायत के मुखिया मुन्ना सिंह समेत 10 लोगों को नामजद अभियुक्त बनाया है.

मृतक वार्ड सदस्य ने अपने नजदीकियों को बताया था कि सात निश्चय योजना की राशि को मुखिया बंदरबांट करना चाह रहा है. इसलिए जबरन चेक पर हस्ताक्षर कराना चाह रहा था. इसको लेकर वार्ड सदस्य बराबर विरोध करता था. वह राशि गलत तरीके से निकासी होने से रोक रहा था. घरवालों का कहना है कि इसको लेकर मुखिया से महीनों से विवाद चल रहा था. जिसके बाद आखिरकार वार्ड सदस्य नंद कुमार राम को इसकी कीमत जान देकर चुकानी पड़ी. अब देखना यह है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की जिस महत्वकांक्षी योजना को सच्चाई से जमीन पर लागू करने के कारण एक दलित विक्लांग वार्ड सदस्य को अपनी जान देनी पड़ी, मुख्यमंत्री और स्थानीय प्रशासन उसे न्याय दिला पाते हैं या नहीं.

Read it also: दलितों का विरोध राष्ट्रव्यापी मुद्दा क्यों नहीं बन पाता?
  • दलित-बहुजन मीडिया को मजबूत करने के लिए और हमें आर्थिक सहयोग करने के लिये आप हमें paytm (9711666056) कर सकतें हैं। 

दलितों का विरोध राष्ट्रव्यापी मुद्दा क्यों नहीं बन पाता?

भारत देश में पद्मावती विवाद जैसे फ़िज़ूल मुद्दे आंदोलन का रूख अख्तियार कर लेते हैं, परंतु दलितों का विरोध प्रदर्शन कभी राष्ट्रव्यापी आंदोलन नहीं बन पाता. जबकि भारत में दलितों की जनसंख्या, पद्मावती विवाद को लेकर तोड़-फोड़ करके राष्ट्र का नुकसान करने वाले जाति वर्ग की जनसंख्या से कई गुना अधिक है. कारण क्या है? आइए समझते हैं…

{मीडिया की भूमिका}

आंदोलन अचानक नहीं खड़ा होता है…आंदोलन को खड़ा करना पड़ता है… पहली क्रिया को देखकर ही दूसरी प्रतिक्रिया होती है. पहले चिंगारी निकलती है, फिर धीरे-धीरे वह आग बनती है. पहले एक आवाज़ उठती है, फ़िर उस आवाज़ को सुनकर ही उसके समर्थन में दूसरी आवाज़ उठती है.

पद्मावती मामले में मीडिया की भूमिका को आपको ठीक से समझना चाहिए. मीडिया ने शुरू से ही इस विवाद में काफ़ी दिलचस्पी दिखाई है, और पद्मावती का विरोध कर रहे जाति समुदाय को खूब प्रचार दिया है. पद्मावती के विरोध की हर घटना को टी०वी० ने सभी जगह दिखाया है. और यही सब देख-देखकर ही यह विरोध प्रदर्शन अपने पैर पसारता गया. धीरे-धीरे इस विरोध में हर राज्य से संबंधित जाति समुदाय के लोग जुड़ते गए. और यह बड़ा बनता गया. हम यह कह सकते हैं कि मीडिया ने ही इस विरोध प्रदर्शन को अपने कैमरे के जरिए घर-घर तक पहुँचा दिया.

अब ज़रा दलितों के विरोध प्रदर्शन पर आइए…

जो मीडिया का कैमरा अन्य जगह बहुत तीव्र गति से घूमता है, वही कैमरा दलित आंदोलन पर न जाने कहाँ खो जाता है. उदाहरण-

गुजरात के उना में दलितों को महिन्द्रा ज़ायलो गाड़ी से बाँधकर निर्ममता से लोहे की बेंते मारी गई. जिसके बाद गुजरात भर में दलितों ने संवैधानिक व शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन किया जिसमें उन्होने मरी हुई गायों को उठाकर उसकी खाल उतारने की जगह उन मरी हुई गायों को हर जिले के कलेक्ट्रेट कार्यालय में फेंक आए और कहा ‘तुम्हारी माँ, तुम ही सँभालो’. काफ़ी दिनों तक यह विरोध प्रदर्शन चला…परंतु किसी न्यूज़ चैनल नें इस विरोध प्रदर्शन में तनिक भी दिलचस्पी नहीं ली. समाचार पत्रों में भी यह विरोध प्रदर्शन जगह नहीं बना पाया. जिसके कारण यह बड़ा आंदोलन बनने से पहले ही दब गया. अगर इसे मीडिया ने दिखाया होता, तो निश्चित रूप से गुजरात के विरोध प्रदर्शन का असर इतर राज्यों में भी दिखाई पड़ता, परंतु गुजरात के दलित आंदोलन कि सवर्ण आधिपात्य वाली गोदी मीडिया ने कोख में ही भ्रूण हत्या कर दी.

दूसरा उदाहरण लीजिए-

कुछ दिनो पूर्व भीमा कोरेगाँव में दलित समुदाय अपने महार सैनिकों की जीत का जश्न मनाने एकत्रित हुए. जिन पर अचानक भगवा झंडा लिए हथियारबंद हिंदूवादियों ने हमला कर दिया, व दलितों को दौड़ा दौड़ा कर पीटा व उनकी गाड़ियों के शीशे तोड़ दिए. इस हमले के विरोध में महाराष्ट्र में दलित समुदाय के लोगों ने बहुत भारी विरोध प्रदर्शन किया. परंतु भीमा कोरेगाँव में हुए दलित उत्पीड़न की खबर किसी चैनल (सिवाय एन०डी०टी०वी० के) ने नहीं दिखाई. इसलिए वह विरोध प्रदर्शन भी महाराष्ट्र में ही दबकर रह गया.

यह तो रही मीडिया की भूमिका जो बहुत ज़रूरी होती है. परंतु मीडिया में हद से ज्यादा सवर्ण वर्ग के आधिपात्य के चलते मीडिया बहुजनों के मुद्दों को निगल जाता है, और डकार भी नहीं लेता. (अमेरिका में मीडिया हाउसेज़ अपने न्यूज़ चैनल में अश्वेतों की नियुक्तियों पर खासा ध्यान रखते हैं)

{समाज की भूमिका}

जब जब दलित अपने हक के लिए खड़ा होगा ! तुरंत ही कुछ ऐंटीना धारियों को डर लगने लगता है कि जिस फर्जी हिंदुत्व के नाम पर उन्होने विराट हिंदू एकता स्थापित कर अपना राज स्थापित किया है, वह विराट हिंदू एकता टूट रही है. अब वह आपको वापस अपने फर्जी विराट हिंदू एकता में शामिल करने के लिए जुगत भिड़ाने लगते हैं. इसके तहत तुरंत ही वो किसी एक मुसलमान को उन दलितों के विरूद्ध खड़ा कर देते हैं… ताकि दलितों के सवर्णों के खिलाफ़ उबल रहे गुस्से को हिंदू-मुसलमान ऐंगल देकर अपनी रोटी सेंकी जाए. और दुर्भाग्यवश ऐसा हो भी जाता है. दलित आंदोलन अपने मूल मुद्दे से भटककर हिंदू-मुसलमान विवाद बन जाता है. जिसमें लाठियाँ तो दलित खाता है, परंतु बाद में राज सवर्ण करते हैं. (वे आप पर राज इसलिए नहीं कर रहे हैं, क्योंकी वे बुद्धिमान है! बल्कि इसलिए कर रहें हैं क्योंकी आप बेवकूफ़ है)

{राजनीति की भूमिका}

दलितों को हमेशा कोर वोट बैंक माना गया है, क्योंकी दलित केवल झंडा और निशान देखकर वोट करता है. जिसका फ़ायदा सभी पार्टियाँ उठाती हैं. जिस पार्टी को दलितों का वोट मिलता आया है, वे इसलिए कुछ नहीं बोलती क्योंकी उन्हे तो दलितों का समर्थन है ही! और जिस पार्टी को दलितों का वोट नहीं मिलता है, वे खुलकर दलितों के मुद्दों को दरकिनार कर दूसरी जातियों को अपनी ओर खींचती है. परंतु सवर्ण वोटर बहुत चालाकी से हर चुनाव में अपना पाला बदलते रहते हैं. वे कभी कांग्रेस में रहे…फिर एक वर्ग सतीश मिश्रा के कारण बसपा में गया, और दूसरा वर्ग रघुराज प्रताप सिंह के कारण सपा में आया ! आजकल वे सभी भाजपा में हैं. वे कभी किसी एक के नहीं रहे, और इस बात का उन्हे लाभ भी खूब मिला. वे किसी के कोर वोटर नहीं बनते, जिसके कारण हर पार्टी उन्हे अपनी तरफ़ खींचने की जुगत में रहती है. इसी कारण पार्टियाँ दलित मुद्दों पर ध्यान नहीं देती क्योंकी उन्हे पता है कि दलितों का वोट तो वहीं जाएगा, जहाँ हमेशा से जाता रहा है. इसी कारण दलितों के आंदोलनों को राजनैतिक साथ भी नहीं मिल पाता.

इन्ही सब सम्मिलित कारणों से दलितों का आंदोलन कभी राष्ट्रव्यापी नहीं बन पाता.

बहुत लंबा झोल-झाल है… हर किसी को समझना चाहिए.

प्रतीक सत्यार्थ

Read it also-मायावती ने फेरा कांग्रेस की उम्मीदों पर पानी

  • दलित-बहुजन मीडिया को मजबूत करने के लिए और हमें आर्थिक सहयोग करने के लिये आप हमें paytm (9711666056) कर सकतें हैं। 
 

हत्या के इस मामले से मुश्किल में सीएम योगी

0

लखनऊ। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को महराजगंज की सत्र अदालत ने 19 साल पुराने एक मामले में नोटिस भेजा है और एक हफ़्ते के भीतर नोटिस का जवाब देने को कहा है. मामले की अगली सुनवाई 27 अक्टूबर को होगी. हालांकि, इस मामले को महराजगंज की ही सीजेएम कोर्ट ने पिछले दिनों ख़ारिज कर दिया था लेकिन हाईकोर्ट ने इसे दोबारा शुरू करने का आदेश दिया है.

मामला 1999 का है. जब महराजगंज के पचरुखिया में क़ब्रिस्तान और श्मशान की ज़मीन को लेकर हुए विवाद के मामले में गोरखपुर के तत्कालीन सांसद योगी आदित्यनाथ समेत कुछ लोगों के ख़िलाफ़ महराजगंज कोतवाली में केस दर्ज किया था. इस विवाद में समाजवादी पार्टी की नेता तलत अजीज़ के सुरक्षा गार्ड और पुलिस कांस्टेबल सत्यप्रकाश यादव की गोली लगने से मौत हो गई थी. इस मामले में तलत अजीज़ ने योगी और उनके साथियों के ख़िलाफ़ 302, 307 समेत आईपीसी की कई धाराओं में एफ़आईआर दर्ज कराई थी जबकि बाद में महराजगंज कोतवाली के तत्कालीन एसओ बीके श्रीवास्तव ने भी योगी और 21 अन्य लोगों के ख़िलाफ़ आईपीसी की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया था.

वहीं, इस मामले में तीसरी एफ़आईआर तत्कालीन सांसद और मौजूदा सीएम योगी आदित्यनाथ की ओर से तलत अजीज़ और उनके साथियों के ख़िलाफ़ दर्ज कराई गई थी जिसमें तलत अजीज़ और उनके साथियों पर योगी के काफ़िले पर हमला करने का आरोप लगाया गया था. राज्य की तत्कालीन कल्याण सिंह सरकार ने मामले की जांच सीबीसीआईडी से कराई थी जिसने अंतिम रिपोर्ट लगाकर बाद में मामले को बंद कर दिया था.

Read it also-सपा-बसपा समर्थकों को अपने पाले में लाने के लिए भाजपा का नया दांव
  • दलित-बहुजन मीडिया को मजबूत करने के लिए और हमें आर्थिक सहयोग करने के लिये आप हमें paytm (9711666056) कर सकतें हैं।