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भविष्य के अंबेडकर को पहचानने का वक्त

सन 1913 में एक युवा भीमराव न्यूयॉर्क के कोलंबिया विश्वविद्यालय पहुँचे। विषय अर्थशास्त्र था लेकिन जो चीज़ उनके भीतर सबसे गहरी उतरी वह दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर जान डेवी की कक्षाओं से आई। डेवी कहते थे कि जो विचार असल ज़िंदगी में काम न आए, जो इंसान की तकलीफ को कम न कर सके वो विचार भला किस काम का? यह बात अंबेडकर के भीतर घर कर गई। ठीक से देखिए, यही बात बुद्ध ने कही थी।

इंसानी सभ्यता की सेहत एक छोटे से सूत्र पर टिकी है। जब भी इंसानों ने मिलकर काम किया, जब भी श्रमिक को उसका उचित फल मिला, जब भी मेहनत और उसके मुआवजे, या कर्म और कर्मफल के बीच सीधा रिश्ता बना, तब-तब समाज देश और सभ्यता आगे बढ़ी। इतिहास गवाह है कि जिन समाजों ने इस न्याय को बनाए रखा, उन्होंने शहर बसाए, व्यापार किया, ज्ञान रचा और नई पीढ़ियों को एक बेहतर दुनिया सौंपी। दूसरी तरफ़ जिन समाजों ने जन्म को कर्म से बड़ा माना, जिन्होंने किसी के श्रम की गरिमा को उसके वंश से तय किया, वे समाज भीतर से खोखले होते गए, चाहे उनकी बाहरी चमक कितनी भी तेज़ रही हो।
डॉ. अंबेडकर इसी ऐतिहासिक सच्चाई को अपने जीवन और विचार का केंद्रीय सूत्र बनाकर चले। उन्होंने देखा कि भारतीय समाज में एक ऐसी संरचना गहराई से जड़ें जमाए बैठी है जो इंसान की पहचान को उसके जन्म से तय करती है, उसकी क्षमता और परिश्रम को नहीं। इस संरचना ने न केवल श्रम की क़ीमत की अनदेखी की बल्कि श्रमिक के ‘इंसान होने’ पर ही सवाल खड़े कर दिए। अंबेडकर ने तर्क, इतिहास और कानून की भाषा में यह साबित किया कि कोई भी व्यवस्था जो जन्म को योग्यता का आधार बनाए, वह न केवल अन्यायपूर्ण है बल्कि मानव सभ्यता के विकास में सबसे बड़ी बाधा भी है।
भारत के मध्यकालीन और ग़ुलाम भारत तक के इतिहास में एक जिंदा बौद्धिक और आध्यात्मिक धारा रही है जिसने इस सवाल पर बहुत ज़ोर दिया है। इस धारा के चिंतकों और साधकों ने, चाहे वे किसी भी पंथ या क्षेत्र से आए हों, एक बात समान रूप से कही कि इंसान की श्रेष्ठता उसके कुल या जाति से नहीं, उसके कर्म और आचरण से तय होती है।
जन्मजात श्रेष्ठता पर खड़ी परम्परा के ख़िलाफ़ एक ऐसी परम्परा भी रही है जिसने अपनी आजीविका, अपने शिल्प और अपने दैनिक श्रम को ही साधना का माध्यम बनाया। उस परम्परा में कपड़ा बुनना, चमड़ा सिलना, घड़े बनाना और भक्ति एक साथ चलते थे। मिट्टी सानना और मन को माँजना एक ही क्रिया थी। यह एक क्रांतिकारी दर्शन था जो उस समय की प्रभुत्वशाली व्याख्याओं को चुनौती दे रहा था। गोरख, कबीर, रैदास और नानक सहित भक्ति काल के सारे संत इसी परंपरा के वाहक हैं। अंबेडकर इसी परंपरा के आधुनिक उत्तराधिकारी हैं, हालांकि उनकी भाषा नई है, वो कानूनी, मेथोडॉलॉजिकल और वैज्ञानिक भाषा है।
अंबेडकर ने देखा कि जन्म को आधार बनाकर किया गया सामाजिक विभाजन एक गहरा मनोवैज्ञानिक और दार्शनिक षडयंत्र है। इसमें पीड़ित इंसान को यह भरोसा दिलाया जाता है कि उसके शोषण या बदहाली का जिम्मेदार वो ख़ुद है। हर पीढ़ी में उसे कथा सुनाई जाती है कि उसके पिछले जन्मों के कर्म के कारण वो तकलीफ़ में है। ये बड़ी मजेदार तरकीब है जो केवल भारत में पायी जाती है। इसे कर्म का सिद्धांत कहते हैं, असल में भारत के दुर्भाग्य की जड़ ये कर्म का सिद्धांत ही है, इसी में से आत्मा और पुनर्जन्म का सिद्धांत निकलता है। कर्म, आत्मा और पुनर्जन्म – ये एक ही जहरीली पोटली के चट्टे बट्टे हैं।
अंबेडकर कहते हैं कि जो व्यवस्था पीड़ित को ही दोषी ठहराए, वह किसी भी सभ्य समाज का निर्माण नहीं कर सकती। आप आज अपने आसपास के समाज को, सड़कों को, नदियों को पब्लिक स्पेस की गंदगी प्रदूषण और भयानक अव्यवस्था को देख लीजिए, आपको समझ आयेगा कि अंबेडकर के कहने का क्या मतलब है।
सौभाग्य से अंबेडकर की उच्च शिक्षा यूरोप अमेरिका में हुई। वे सच्चे अर्थों में नए विचारों से परिचित हुए।
सन 1913 में एक युवा भीमराव न्यूयॉर्क के कोलंबिया विश्वविद्यालय पहुँचे। विषय अर्थशास्त्र था लेकिन जो चीज़ उनके भीतर सबसे गहरी उतरी वह दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर जान डेवी की कक्षाओं से आई। डेवी कहते थे कि फिलॉस्फी का मकसद विचारों की असमानी उड़ान भर नहीं है। जो विचार असल ज़िंदगी में काम न आए, जो इंसान की तकलीफ को कम न कर सके वो विचार भला किस काम का?
यह बात अंबेडकर के भीतर घर कर गई। ठीक से देखिए, यही बात बुद्ध ने कही थी, अगर हवा हवाई दार्शनिक बातें जीवन का दुख दूर ना कर सके तो उन बातों का क्या मूल्य है? इसीलिए अंबेडकर ने हर फिलोसफी और फ़िलोसोफ़र से से एक ही सवाल पूछा – “क्या तुम्हारा ज्ञान, तुम्हारा सिस्टम इंसान को इंसान के पास लाता है या दूर करता है?”
अब आप सोचिए भारत के ज्ञान और ज्ञानियों से इसका क्या उत्तर मिला होगा उन्हें?
जान डेवी की एक बात और थी जो अंबेडकर के लिए बहुत जरूरी कसौटी बन गई। डेवी ने लिखा था कि लोकतंत्र केवल गवर्नेंस का एक सिस्टम नहीं है, बल्कि यह एक साझेदारी और संवाद पर खड़ी जीवन शैली है। जिसमें एक दूसरे से जुड़े हुए अनुभव होते हैं, जहाँ अपने साथी के प्रति सम्मान और आदर की भावना होती है। अंबेडकर ने इसी बात को संविधान की आत्मा बनाया। स्वतंत्रता और समानता की बात तो बहुत लोग करते थे, लेकिन बंधुत्व अंबेडकर का अपना शब्द था। उन्होंने कहा था कि बिना बंधुत्व के बाकी दोनों मूल्य कागज़ पर लिखे अक्षर मात्र हैं। यही सांझापन लोकतंत्र की जान है और आज इसी पर सबसे ज़्यादा हमले हो रहे हैं। भारत से लेकर पश्चिम एशिया तक, अमेरिका से लेकर यूरोप तक, और हर देश के अपने अंदरूनी जीवन में भी।
अब भारत से और आज के दौर से से आगे निकलकर भविष्य के अंबेडकर को पहचानिए।
आजकल AI और मशीन लर्निंग का भौकाल बना हुआ है। जल्दी ही हम जातिवाद और पूंजीवाद के एक भयानक नए और साझे अवतार से टकराने वाले हैं। ये नया राक्षसी अवतार श्रम और इंसानी गरिमा के पूरे ढाँचे को हिला देगा। आज भी आप इसके असर देख सकते हैं। आगे तो भयानक तांडव होने वाला है। वे काम जो ऐतिहासिक रूप से समाज के सबसे वंचित वर्गों के पास थे, जो उनकी रोजी-रोटी का एकमात्र साधन थे, वे तेज़ी से मशीनें हड़प लेंगी। आज ही देख लीजिए, गड्ढे खोदने वालों का सारा काम जेसीबी मशीन ने ले लिया है। छत की ढलाई में पहले पचास मज़दूर एकसाथ दिन भर काम करते थे, एक मशीन तीन घंटे में कर देती है।
अब एक नए तरह के “यूजलेस क्लास” का जन्म होने वाला है। इस लोगों की किसी को ज़रूरत नहीं होगी। ना ये कुछ बना सकते हैं ना कुछ खरीद सकते हैं। और सबसे ख़तरनाक बात कि ये कुछ नया सीख भी नहीं सकते। अब इनका क्या किया जाये? क्या कोई नई बीमारी या छोटा मोटा युद्ध या बड़ा दंगा फैलाकर इन्हें ख़त्म कर दिया जाये? या इनकी खोपड़ियों में कुछ डालकर इन्हें ज़ोंबी बना दिया जाये? ये कोई साइंस फिक्शन का सवाल नहीं है, ये निकट भविष्य में करोड़ों लोगों की जिंदगी से जुड़ा एक बड़ा सवाल है।
यहाँ मजे की बात ये है कि जो वर्ग पहले जन्म आधारित भेदभाव के कारण नीच या अछूत बनाये गए थे, अब उन्हीं को ये नई व्यवस्था “यूजलेस क्लास” में सबसे पहले तब्दील करेगी । उन्हें पहले “नीच जन्म” बताकर बेकार घोषित किया जाता था, अब बाज़ार उन्हें आर्थिक रूप से उपयोग/अनुपयोग के आधार पर बेकार साबित करने वाला है। गौर से देखिए, बस भाषा बदली है, तर्क वही है। और जरा कल्पना कीजिए इन लोगों की संख्या कितनी होगी? पूरे यूरोप की आबादी से भी ज़्यादा होगी। इससे भी अधिक खतरनाक बात ये है कि AI वाला सिस्टम जिस स्रोत से ज्ञान हासिल कर रहा है वो स्रोत ख़ुद तमाम भेदभाव के ज़हर से भरा है।
जिन सोशल मीडिया फीड्स, टेक्स्ट, वीडियो, रिपोर्ट्स, राजनीतिक विश्लेषणों आदि पर आजकल इसकी ट्रेनिंग चल रही है उसमें इतिहास के सबसे बदबूदार अध्याय जस के तस शामिल हैं। जब कोई एल्गोरिदम यह तय करता है कि किसे कर्जा मिलेगा, किसे नौकरी मिलेगी, किसी नामी इंस्टिट्यूट या यूनिवर्सिटी में किसे प्रवेश मिलेगा तब ये फ़ैसला कैसे होगा? एल्गोरिदम इंसानी करतूतों से ही सीख रहा है कि कौन ऊँचा है कौन नीचा है। जाति, जेंडर और क्लास सहित तमाम आधारों पर चलने वाली बदमाशियों एल्गोरिदम्स की खोपड़ी में भी घुस चुकी हैं।
पहले एक आदमी का चेहरा या नाम देखकर दूसरा आदमी भेदभाव करता था। अब AI से एल्गोरिदम एक सेकंड में करोड़ों लोगों को हमेशा के लिए दौड़ से ही बाहर कर देगा। यह शुरू हो चुका है। अब आने वाले समय में यही सबसे बड़ा खतरा है। अब अंबेडकर के योगदान पर फिर से विचार कीजिए। आपको भविष्य के अंबेडकर नजर आने लगेंगे। जब भेदभाव किसी इंसान के चेहरे के पीछे से काम करता था तो उसे चुनौती दी जा सकती थी, उसके ख़िलाफ़ आंदोलन हो सकता था, उसके ख़िलाफ़ कोर्ट जा सकते थे। लेकिन अब उस भेदभाव ने एक एल्गोरिदम का अवतार धर लिया है। अब उसे पहचानना भी कठिन है टक्कर देने की तो बात ही छोड़िये।
कबीर रैदास और अंबेडकर ने जिस अदृश्य दीवार को पहचाना था, आज वह दीवार डिजिटल कोड में तब्दील हो गई है।
वैश्विक स्तर पर देखिए आज क्या हो रहा है? आँख खोलकर देखिए एक उन्नत तकनीक जब अय्याश और अनैतिक लोगों के हाथ में जाती है तो क्या होता है। उनके हाथों में आने के बाद सबसे उन्नत तकनीक दमन का सबसे ख़तरनाक उपकरण बन जाती है। आज AI आधारित निगरानी और आक्रमण के सिस्टम्स को देखिए, वे पहले की तुलना में हज़ारों गुना जहरीले बन गए हैं। और तुर्रा ये कि यह सब विकास, सुरक्षा और आधुनिकता के नाम पर हो रहा है। यहीं अंबेडकर की प्रासंगिकता अपने सर्वोच्च रूप में सामने आती है।
अंबेडकर ने कहा था कि किसी भी व्यवस्था को परखने की एकमात्र कसौटी यह है कि वह इंसान की गरिमा को बढ़ाती है या घटाती है। यह सवाल आज AI के नीति निर्माताओं से भी पूछा जाना चाहिए। अंबेडकर ने यह भी कहा था कि शिक्षा केवल सूचना प्रदान करने का माध्यम नहीं है, वह नैतिक चेतना के निर्माण का माध्यम है। आज 21वीं सदी में इस शिक्षा में डिजिटल साक्षरता, एल्गोरिदम की समझ और तकनीकी अधिकारों की जानकारी भी शामिल होनी चाहिए। अंबेडकर का “शिक्षित बनो, संगठित बनो, संघर्ष करो” का सूत्र आज भी उतना ही सटीक है, बस संघर्ष का क्षेत्र बदल गया है।
सन 1952 में कोलंबिया विश्वविद्यालय ने अंबेडकर को मानद डॉक्टरेट देने के लिए बुलाया था। जान डेवी उस वक्त अंतिम साँसें ले रहे थे। उनकी मुलाकात नहीं हो सकी। लेकिन डेवी का वह विचार ज़िंदा रहा जो कहता था कि संवाद ही सभ्यता है, साझापन ही लोकतंत्र है। अंबेडकर ने इसे बुद्ध के धम्म में और भी गहराई से महसूस किया । अब संघ क्या होता है? संघ यानी मिलकर जीने का अभ्यास। करुणा क्या है? करुणा यानी दूसरे का दर्द अपना दर्द मानना। यह डेवी के लोकतंत्र का ही बौद्ध रूप था, लेकिन जड़ें और भी पुरानी थीं, और शाखाएँ और भी विस्तृत।
Baba Saheb Ambedkarआज भारत के सामने सबसे बड़ा सवाल ये है कि वह अपनी सामाजिक और तकनीकीगत नीतियों का निर्माण किस मूल्यबोध या नैतिकता से करे? क्या भारत में कुछ नैतिकता बची है? अंबेडकर का लेखन इस दिशा में बहुत काम का है। सन 1947 में मिली राजनीतिक आज़ादी असल में सच्ची आज़ादी की पहली सीढ़ी थी। सामाजिक, आर्थिक और तकनीकी न्याय की वह वृहत्तर स्वतंत्रता अभी आनी बाकी है जिसका सपना अंबेडकर ने देखा था। वह स्वतंत्रता जन्म से नहीं, गरिमा से परिभाषित होगी। वह केवल भारत की नहीं, समस्त मानवता की होगी। और उस आज़ादी के रास्ते में अंबेडकर एक मशाल की तरह हैं जो बुझाई नहीं जा सकती।

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