मंत्रिमंडल विस्तार में ब्राह्मणों को लॉलीपॉप, जानिए किस समाज को मिली कितनी सीटें

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने दूसरे कार्यकाल के पहले कैबिनेट विस्तार में 36 नए मंत्रियों को जगह दी है। इसमें से सबसे ज्यादा 7 मंत्री उत्तर प्रदेश से बनाए गए हैं। उत्तर प्रदेश से जिन 7 नेताओं को मंत्रिमंडल में शामिल किया गया है, उसमें महाराजगंज से सांसद पंकज चौधरी, अपना दल की अनुप्रिया पटेल, आगरा से सांसद एसपी बघेल, पांच बार सांसद रहे भानु प्रताप वर्मा, मोहनलालगंज से सांसद कौशल किशोर, राज्यसभा सांसद बीएल वर्मा और लखीमपुर खीरी से सांसद अजय कुमार मिश्रा का नाम शामिल है। यानी इसमें एक ब्राह्मण को छोड़कर बाकी छह का ताल्लुक ओबीसी और दलित समाज से है और वो भी गैर-यादव और गैर-जाटव हैं।

यानी की अगले साल उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव को देखते हुए पार्टी ने राज्य में अपने जातीय गणित को ठीक करने की कोशिश की है। मंत्रीमंडल में शामिल सात चेहरों में पंकज चौधरी और अनुप्रिया पटेल ओबीसी के कुर्मी समाज से हैं। कौशल किशोर दलित वर्ग के पासी समाज से हैं जो कि जाटव के बाद उत्तर प्रदेश में सबसे बड़ा वोटर है। बीएल वर्मा ओबीसी के लोध समाज से आते हैं और भानु प्रताप वर्मा भी दलित वर्ग से हैं। यानी साफ दिख रहा है कि उत्तर प्रदेश का ब्राह्मण समाज एक बार फिर भाजपा में हाशिये पर आ गया है। और इस मंत्रिमंडल विस्तार में उसे झटका लगा है।

कैबिनेट विस्तार से पहले मंत्री पद के लिए यूपी से ब्राह्मण चेहरे के तौर पर रीता बहुगुणा जोशी और हाल ही में कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आए जितेंद्र प्रसाद जैसे नामों की चर्चा थी, लेकिन इन बड़े नामों को दरकिनार करते हुए अजय मिश्रा को जगह दी गई, जो कि न तो कोई जाना-पहचाना नाम हैं और न ही पार्टी का ब्राह्मण चेहरा ही हैं। यानी योगी आदित्यनाथ पर जिस तरह ब्राह्मणों के विरोध के आरोप लगते रहे हैं, वह आरोप एक बार फिर पुख्ता हो गया है।

हालांकि सवाल यह है कि क्या इन जातिगत समीकरणों को साधने से ही भाजपा की उत्तर प्रदेश की सत्ता में वापसी हो जाएगी। योगी सरकार पर कोविड से निपटने में हुई अव्यवस्था को लेकर जो गंभीर आरोप लगे हैं, क्या लोग उसे भूल जाएंगे? क्या ऑक्सीजन, वेंटिलेटर और अस्पतालों में बेड की कमी से हुई मौतों को प्रदेश की जनता नजरअंदाज कर देगी?

हालांकि यहां सोचने वाली बात यह भी है कि भाजपा, संघ और मोदी दलितों और पिछड़ों की सत्ता में हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए राजी क्यों रहे हैं? जबकि आरएसएस और भाजपा की विचारधारा इन दोनों वर्गों के खिलाफ रही है। साफ है कि भाजपा और संघ दोनों को पता है कि वह भले ही कितने भी दांवे कर ले, केंद्र और राज्यों की सत्ता पर तभी काबिज रह सकते हैं जब उनके साथ दलित और पिछड़े यानी की बहुसंख्यक समाज के वोटरों का समर्थन हो। दलित, आदिवासी और पिछड़े समाज के नेता भले ही पचासी प्रतिशत बहुजन और पंद्रह प्रतिशत सवर्णों का फार्मूला भूल गए हों, भाजपा और संघ को यह याद है। इसलिए वह शीर्ष नेतृत्व पर काबिज रहने के लिए दलितों और पिछड़ों को तात्कालिक लाभ देकर अपने पाले में रखने की रणनीति पर चलती है। जिस दिन दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक इस रणनीति को समझ लेंगे, सत्ता उनके हाथ में होगी।

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