Thursday, February 12, 2026
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महाराष्ट्र के आदिवासी युवक शंकर भील को अमेरिकी यूनिवर्सिटी से 75 लाख की फेलोशिप

महाराष्ट्र के रहने वाले शंकर भील का चयन पीएचडी के लिए अमेरिका के यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया में हुआ है। यह यूनिवर्सिटी सैन डिएगो में है। भील आदिवासी समुदाय से आने वाले शंकर वहां एथेनिक स्टडीज की पढ़ाई करेंगे।

जलगांव/ महाराष्ट्र। महाराष्ट्र के रहने वाले 26 साल के आदिवासी समाज के युवा शंकर भील का चयन पीएचडी के लिए अमेरिकी के यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया में हुआ है। सैन डिएगो में स्थित इस यूनिवर्सिटी से वह एथेनिक स्टडीज की पढ़ाई करेंगे। शंकर को 9 महीने के लिए 71 हजार डॉलर की फंडिंग मिली है। भारतीय रुपये में यह 70-75 लाख के करीब होती है। अरुण को पहले 9 महीने के लिए फैलोशिप मिली है, फेलोशिप के बाद पहले दो साल कोर्स वर्क होगा, फिर एग्जाम और फिर रिसर्च का काम होगा। शंकर यह रिसर्च करेंगे कि आदिवासियों की जमीन किस तरह गैर आदिवासियों के हाथों में चली गई।

शंकर महाराष्ट्र के जलगांव जिले के एक छोटे से गांव नागझिरी के रहने वाले हैं। करीब 100 लोगों के घर वाले इस गांव में ज्यादातर लोग दिहारी मजदूरी करते हैं। कई लोग बंधुआ मजदूरी भी करते हैं। शंकर के मां और भाई अब भी मजदूरी करते हैं। शिक्षा की बात करें तो इस गांव में शंकर और उनके भाई को मिलाकर कुल चार बच्चों ने ही बारहवीं तक की पढ़ाई की है। इसमें भी शंकर इकलौते हैं, जिन्होंने बारहवीं से आगे की पढ़ाई की है।

12वीं पास करने के बाद शंकर ने पुणे से ग्रेजुएशन किया। इसके बाद उनका चयन अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी में मास्टर्स कोर्स के लिए हुआ। शंकर की जिंदगी में बड़ा मोड़ तब आया जब शंकर बहुजन इकोनॉमिक्स ग्रुप से जुड़े। यह ग्रुप वंचित समाज के छात्रों को मेंटरशिप देता है। इससे जुड़ने के बाद शंकर ने पीएचडी की तैयारी की।

शंकर के पिता अरुण बुधा भिल मजदूर थे। जब शंकर 11वीं में थे, तभी उनके पिता की मौत हो गई। बावजूद इसके शंकर ने हिम्मत नहीं हारी। शंकर अपनी इस कामयाबी का श्रेय अपनी मां सिंधू बाई भिल को देते हैं, जिन्होंने शंकर के हौसलों को टूटने नहीं दिया, जिससे शंकर बड़े सपने देख सके।

इस सफर में शंकर को सिर्फ आर्थिक दिक्कतों का ही नहीं बल्कि सामाजिक पहचान के कारण ताने भी झेलने पड़े। बीबीसी ने शंकर की इस कामयाबी पर एक स्टोरी की है। उस स्टोरी में शंकर ने अपना दर्द साझा करते हुए कहा-
लोगों कहते हैं कि मैं एसटी वर्ग से हूं इसलिए मुझे आरक्षण का फायदा मिला। लेकिन अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी बेंगलुरु एक निजी यूनिवर्सिटी है। वहां कोई आरक्षण नहीं है। अब मैं अमेरिका जा रहा हूं, वहां भी कोई आरक्षण नहीं है।

बात-बात पर आरक्षण वाला होने का दर्द झेलने वाले शंकर अरुण भिल अपने रिसर्च के जरिये आदिवासी समाज के दर्द और संघर्ष को आवाज देना चाहते हैं।

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