खुद को हिंदू नहीं मानता था दक्षिण का यह दिग्गज नेता, कई बार रहे मुख्यमंत्री

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 मुथुवेल करूणानिधि ब्राह्मणवाद विरोधी द्रविड़ आंदोलन की पैदाईश थे। आधुनिक युग में तमिलनाडु में इस आंदोलन को व्यापक जन का आंदोलन बनाने वाले ई.वी. रामास्वामी यानि पेरियार (जन्म 17 सिंतंबर 1879-निधन 24 दिसंबर 1973) थे। उन्होंने ताजिंदगी हिंदू धर्म और ब्राह्मणवाद का जमकर विरोध किया। वर्ण-जाति व्यवस्था और जातिवादी पितृसत्ता खिलाफ निरंतर संघर्ष करते रहे। उन्हें धर्म और ईश्वर किसी रूप में स्वीकार नहीं थे। इसके साथ ही उन्होंने उत्तर भारतीय आर्य श्रेष्ठता के राष्ट्रवादी वर्चस्व को भी चुनौती दिया। पेरियार ने हिदूं धर्म और द्रविड़ परंपरा के बीच अंतर करते हुए लिखा, “हम लम्बे समय से कहते रहे हैं कि हिन्दू धर्म का अर्थ है आर्य धर्म और हिन्दू आर्य हैं। इसलिए हम यह कहते रहे हैं कि हम द्रविड़ों को खुद को हिन्दू नहीं कहना चाहिए न ही खुद को हिंदुत्व को मानने वाला कहना चाहिए।

इसी के अनुरूप सन् 1940 में जस्टिस पार्टी के प्रांतीय सम्मलेन में मेरी अध्यक्षता में एक प्रस्ताव पारित हुआ। फैसला किया गया कि हम द्रविड़ खुद को हिन्दू नहीं कहेंगे और न ही यह कहेंगे कि हम हिन्दू धर्म से ताल्लुक रखते हैं।” पेरियार के कथन की पुष्टि डॉ. आंबेडकर भी करते हैं। उन्होंने द्रविड़ संस्कृति को आर्य-ब्राह्मणवादी संस्कृति से अलगाते हुए लिखा है, “अनार्य, असुर, नाग और द्रविड़ एक ही हैं। जिनका निरंतर संघर्ष आर्य संस्कृति और सभ्यता से होता रहा है।” पेरियार ने ही द्रविड़ कडगम आंदोलन शूुरू किया। इस आंदोलन के उद्देश्य के बारे में उन्होंने लिखा, “‘द्रविड़ कड़गम आंदोलन’ का एक ही उद्देश्य और केवल एक ही निशाना है और वह है आर्य ब्राह्मणवादी वर्ण व्यवस्था का अंत कर देना, जिसके कारण समाज ऊंच और नीच जातियों में बांटा गया है। द्रविड़ कड़गम आंदोलन उन सभी शास्त्रों, पुराणों और देवी-देवताओं में आस्था नहीं रखता, जो वर्ण तथा जाति व्यवस्था को जस का तस बनाए रखे हैं”।पेरियार भारत की उस नास्तिक परंपरा के व्यक्तित्व थे, जो न तो वेदों में विश्वास करता था, न ही ईश्वर में। उन्होंने साफ शब्दों में घोषणा की थी कि ईश्वर की रचना धूर्तों ने की है।

उन्होंने लिखा, “ईश्वर की सत्ता स्वीकारने में किसी बुद्धिमत्ता की आवश्यकता नहीं पड़ती, लेकिन नास्तिकता के लिए बड़े साहस और दृढ विश्वास की जरुरत पड़ती है। ये स्थिति उन्हीं के लिए संभव है जिनके पास तर्क तथा बुद्धि की शक्ति हो”। उनके लिए धर्मग्रंथ और मंदिर बहुसंख्यक समाज को गुलाम बनाने के उपकरण थे। वे लिखते हैं, ““ब्राह्मणों ने हमें शास्त्रों ओर पुराणों की सहायता से गुलाम बनाया है। अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए मंदिर, ईश्वर और देवी-देवताओं की रचना की”।करूणानिधि ब्राह्मणवाद, आर्य संस्कृति और उच्च जातीय उत्तर भारतीय राष्ट्रवाद को चुनौती देने वाली दक्षिण की पेरियार की इसी द्रविड़ परंपरा की अंतिम कड़ी थे। पेरियार के शिष्य परंपरा के एक वारिस के रूप में करूणानिधि ने तमिलनाडु में ब्राह्मणवादी वर्चस्व को तोड़ने में अहम भूमिका निभाई थी। हालांकि यह भी सच है कि पेरियार को अपना गुरू मानने वाला यह व्यक्तित्व धीरे-धीरे अपना ताप, तेवर, मूल्य और वैचारिकता खोता गया और भारतीय राजनीति और राजनीतिज्ञों के कई पतनशील तत्वों से यह व्यक्तित्व भी आच्छादित हो गया। जिसका एक घृणित रूप वंशवाद भी था। कभी द्रविड़ संस्कृति और तमिल पहचान की राजनीति करने वाली करूणानिधि की पार्टी उनके बेटे-बेटियों की जागीर बन गई।

द्रविड़ मुनेत्र कड़गम भी अन्य दलों के जैसे व्यक्तिगत स्वार्थो और महत्वाकांक्षा का अखाड़ा बन गई।करूणानिधि ने तामिलनाडु को बनाया कल्याणकारी राज्यलेकिन मैं इस आलेख में उस करूणानिधि को याद करना चाहता हूं, जिन्होंने न केवल तमिलनाडु की राजनीति में ब्राह्मणवादी वर्चस्व को तोड़ने की प्रक्रिया को तेज किया, साथ ही समाज और संस्कृति पर उनके वर्चस्व को काफी हद तक तोड़ भी दिया। हम सभी जानते हैं कि तमिलनाडु के आर्थिक संसाधनों पर भी ब्राह्मणों का ही नियंत्रण था। इस वर्चस्व को तोड़ने में उनकी अहम भूमिका रही है। तमिलनाडु को मानवीय विकास के पैमाने पर देश के चंद राज्यों के बरक्स खड़ा करने में उनकी भूमिका को कम करके नहीं आंका जा सकता है। उन्होंने इस राज्य को एक कल्याणकारी राज्य में बदल दिया।

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