300 दलितों ने अपनाया बौद्ध धर्म

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बुद्धिज्म

भदोही। उत्तर प्रदेश के भदोही जिले के एक गांव की दलित बस्ती में तीन दिन में 300 लोगों ने बौद्ध धर्म अपना लिया. सारनाथ से आए बौद्ध धर्म के अनुयायी की देखरेख में पूरी कवायद की गई. उसके बाद बस्ती के लोगों ने हिंदू देवी-देवताओं के चित्र नहर में विसर्जित कर दिए.

ज्ञानपुर से करीब पांच किलोमीटर दूर स्थित कसिदहां गांव की दलित बस्ती में रविवार को 100 लोगों ने हिंदू धर्म त्याग कर बौद्ध धर्म अपना लिया. पिछले तीन दिनों में बस्ती के कुल 300 लोगों ने बौद्ध धर्म अपनाया है. सारनाथ से आए बुद्ध घोष राम वचन, विश्व बौद्ध महासभा के अध्यक्ष आलोक बौद्ध और अरविंद बौद्ध की देखरेख में बस्तीवासियों ने धर्म परिवर्तन किया. रविवार को जुलूस निकाल बस्ती के लोगों ने हिंदू देवी देवताओं के चित्र और प्रतिमाएं नहर में विसर्जित कर दीं.

कसिदहां दलित बस्ती निवासी एवं बौद्ध धर्म अपनाने वाले अधिवक्ता कोमल राम और सुरेंद्र कुमार ने कहा कि हिंदू धर्म शुरू से दलितों का उत्पीड़न करता आया है. उत्पीड़न से बचने के लिए धर्म परिवर्तन किया. उन्होंने आगे कहा कि हर वर्ग के लोग दलितों को प्रताड़ित करते थे. इससे परेशान होकर बस्ती के लोगों ने बौद्ध धर्म अपना लिया.

गौरतलब है कि कुछ दिन पहले भी उत्तर प्रदेश के नौतनवां में 20 दलित लोगों ने बौद्ध महासम्मेलन में बौद्ध धर्म अपनाया है.

अमर ऊजाला से साभार

दलाई लामा से मिलने वालों को धमकी दे रहा है चीन

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दलाई लामा

बीजिंग। विदेशी नेता सोच भी नहीं सकते थे कि निर्वासित तिब्‍बती धर्मगुरु दलाई लामा के साथ उनकी मुलाकात इतनी भारी पड़ेगी और उन्‍हें चीन के क्रोध का सामना करना पड़ेगा. एक चीनी अधिकारी ने कहा है कि दलाई लामा से व्यक्तिगत तौर पर मिले विदेशी नेता कल्पना भी नहीं कर सकते थे कि यह मुलाकात उनके लिए चीन के गुस्से का कारण बन जाएगा.

चीन दलाई लामा को खतरनाक अलगाववादी के तौर पर देखता है जिन्‍होंने चीनी नियमों के खिलाफ उठने में असफल रहने के बाद 1959 में भारत में शरण ली थी. नोबेल शांति पुरस्‍कार विजेता दलाई लामा का कहना है कि वे केवल अपने हिमालयी पैतृक निवासस्‍थान के लिए स्वायत्ता की चाह रखते हैं.

दलाई लामा के विदेशी दौरे से चीन क्रोधित है और चीन के गुस्‍से के परिणाम के डर से कम से कम राष्ट्रीय नेता उनसे मिलने को तैयार हैं. हालांकि कुछ ने बीजिंग को यह कहते हुए समझाने का प्रयास किया है कि वे आधिकारिक तौर पर नहीं बल्कि व्यक्तिगत रूप से मिल रहे हैं. कम्युनिस्‍ट पार्टी की तिब्‍बत वर्किंग ग्रुप के प्रमुख झांग यीजिओंग ने बताया कि दलाई लामा से मिलने वालों का कोई बहाना नहीं चलेगा.

1950 में चीन ने शांतिपूर्ण मुक्ति कहकर तिब्बत पर कब्ज़ा कर लिया और आर्थिक साधनों का उपयोग करते हुए दलाई लामा का समर्थन देने वालों को दंड दिया ताकि वे अपना समर्थन न दें. चीन ने तिब्बत में अधिकारों के दुरुपयोग के आरोपों को जोरदार तरीके से गलत करार दिया और कहा कि इसके शासन के तहत दूरदराज और पिछड़े क्षेत्र में भी समृद्धि आया है. साथ ही यह तिब्बती लोगों के धार्मिक और सांस्कृतिक अधिकारों का पूर्ण सम्मान करता है.

चीन ने यह भी कहा कि तिब्‍बत इसका अभिन्‍न अंग है और यह सदियों से इसका रहा है. 2006-2010 तक तिब्‍बत में काम करने वाले झांग ने बताया कि तिब्‍बती बौद्ध विशेष धर्म है जिसका जन्‍म प्राचीन चीन में हुआ. यह चीनी धर्म है. यह बाहर से नहीं आता.

राहुल गांधी से डरे मोदी का महीने में तीसरा गुजरात दौरा

Modi vs rahul नई दिल्ली। गुजरात को लेकर पीएम मोदी और अमित शाह भले ही ‘ऑल इज वेल’ का दावा कर रहे हों लेकिन सच यह है कि भाजपा गुजरात चुनाव को लेकर काफी डरी हुई है. जिस तरह से गुजरात में चुनाव की तारीखों को रोक कर रखा गया है, उससे भाजपा की स्थिति को समझा जा सकता है. तो वहीं अक्टूबर महीने में पीएम मोदी तीसरी बार गुजरात जा रहे हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 22 अक्टूबर को फिर से गुजरात आएंगे. इस दौरे के दौरान वह वड़ोदरा और भावनगर जिलों में कई परियोजनाओं का उद्घाटन और शिलान्यास करेंगे. गुजरात चुनाव की घोषणा को रोक लेने के समय ही कांग्रेस सहित तमाम विपक्ष ने इसकी आशंका जाहिर की थी. अब वो बात सच हो गई है. दरअसल पिछले करीब 15 सालों में भाजपा पहली बार गुजरात में नरेंद्र मोदी के बिना चुनाव लड़ रही है. मोदी गुजरात से बाहर हैं तो राहुल गांधी लगातार गुजरात का दौरा कर भाजपा और पीएम मोदी पर निशाना साध रहे हैं. राहुल गांधी के एक के बाद एक हमले से मोदी और अमित शाह दोनों परेशान हैं. कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी भाजपा के गुजरात मॉडल पर लगातार सवाल उठा रहे हैं. तो साथ ही राहुल गांधी ने भाजपा और प्रधानमंत्री के विकास के दावे पर भी तंज कसा है. राहुल गांधी की गुजरात में सक्रियता को लेकर मोदी की बेचैनी को इसी से समझा जा सकता है कि पिछले गुजरात दौरे के समय मोदी का पूरा भाषण राहुल गांधी पर ही केंद्रित था. जाहिर है गुजरात चुनाव 2019 के चुनाव की रुपरेखा तय करने वाला होगा. और मोदी और शाह इसे किसी भी कीमत पर हारना नहीं चाहेंगे. फिलहाल तो गुजरात चुनाव मोदी बनाम राहुल गांधी होता दिखाई दे रहा है.

‘भुखमरी’ से मरने वाली संतोषी की मां से मारपीट

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सिमडेगा

नई दिल्ली। झारखंड के सिमडेगा ज़िले में भुखमरी से मरने वाली लड़की की मां से गांव की कुछ औरतों ने मारपीट की है. बीते शुक्रवार की रात गांव में रहने कुछ महिलाओं ने कोयली देवी से मारपीट की. महिलाओं का आरोप था कि बेटी संतोषी कुमारी की भुखमरी से मौत का आरोप लगाकर कोयली देवी ने गांव का नाम बदनाम किया है.

इसके बाद शनिवार सुबह कोयली देवी पास के गांव में रहने वाली सामाजिक कार्यकर्ता तारामणि साहू के घर चली गईं. साहू ने बताया कि कोयली देवी के साथ मारपीट करने के बाद उन्हें जबरन गांव से निकालने की कोशिश की गई. उनके सामान को घर से बाहर फेंक दिया गया था. शनिवार सुबह सुरक्षा देने की मांग करते हुए हमने इसकी सूचना उपज़िलाधिकारी को दे दी है.

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इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में सिमडेगा के उप संभागीय पुलिस अधिकारी एके सिंह ने कहा, ‘हमने जलडेगा थाना इंचार्ज और ब्लॉक विकास अधिकारी को उनके गांव भेज दिया है. पता लगा कि कोयली देवी अपने घर में नहीं हैं. सुरक्षा का आश्वासन देकर उन्हें साहू के घर से वापस उनके घर लाया गया है.’

सिंह कहते हैं, ‘अभी तक कोयली देवी ने किसी महिला की पहचान नहीं की है. अगर वह कोई औपचारिक शिकायत करती हैं तो हम एफआईआर दर्ज करेंगे. हम उनके घर की सुरक्षा भी बढ़ाएंगे. अभी के लिए जलडेगा थाना इंचार्ज और ब्लॉक विकास अधिकारी उनके घर पर तैनात हैं.’

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गौरतलब है कि कोयली देवी ने बताया था कि राशन कार्ड को आधार कार्ड से नहीं जोड़ पाने की वजह से पिछले आठ महीने से उन्हें सरकारी राशन नहीं मिल रहा था. इस वजह से उनकी 11 साल की बेटी संतोषी कुमारी ने 8 दिन से खाना नहीं खाया था और बीते 28 सितंबर को भूख से उसकी मौत हो गई.

GST और डिजिटल इंडिया पर तंज कसने वाली फिल्म से घबराई भाजपा

  मर्सल

नई दिल्ली। अभिनेता विजय फिल्म ‘मर्सल’ को लेकर देश की राजनीति गरमा गई है. फिल्म के डायलॉग से भारतीय जनता पार्टी और डॉक्टरों को दिक्कत होने लगी है. भाजपा के नेताओं और डॉक्टरों ने फिल्म की कुछ बातों को लेकर ऐतराज जताया है. ‘मर्सल’ दीपावली के दिन रिलीज हुई है.

दरअसल, फिल्म में ऐसे कई डायलॉग है जिसमें जीएसटी और डिजिटल इंडिया कैंपेन पर तंज कसा गया है. फिल्म के एक सीन में विजय कहते हैं, “सिंगापुर 7% जीएसटी लगाकर भी सभी को फ्री हेल्थकेयर दे रहा है, जबकि 28% लगाने वाला भारत यह सुविधाएं नहीं दे पा रहा है.”

शुक्रवार को भाजपा महासचिव एच राजा ने कहा कि पार्टी आलोचना का स्वागत करती है, लेकिन झूठ को सहन नहीं करेगी. यह सफेद झूठ है कि सिंगापुर में हेल्थ पूरी तरह फ्री है. हमारे भारत में भी शिक्षा और स्वास्थ्य गरीबों के लिए फ्री हैं. मर्शल केवल विजय की नरेंद्र मोदी के लिए नफरत का नतीजा है.

डॉक्टर पर तंज कसते हुए विजय कहते हैं, “लोग सरकारी अस्पताल में सुविधाओं के न मिलने पर निजी अस्पताल में जाते हैं. डॉक्टर इस पेशे का इस्तेमाल सिर्फ पैसा कमाने के लिए कर रहे हैं.” इस पर तमिलनाडु के डॉक्टरों ने ऐक्टर विजय की फिल्म ‘मर्सल’ खिलाफ विरोध जताने के लिए एक अनोखा तरीका अपनाया है. राज्य के डॉक्टर ‘मर्सल’ देखने के लिए दर्शकों को सिनेमाहॉल में जाने की बजाय इसके पाइरेटेड वर्जन को देखने की सलाह दे रहे हैं. उनका कहना है कि इस फिल्म में डॉक्टरों का गलत चित्रण किया गया है.

कांग्रेस उपाध्‍यक्ष राहुल गांधी ने भी इस मामले में पीएम नरेंद्र मोदी को नसीहत दी है. भाजपा पर निशाना साधते हुए राहुल ने ट्वीट किया कि ‘मिस्टर मोदी, सिनेमा तमिल संस्कृति और भाषा की गहरी अभिव्यक्ति है. मर्सल में हस्तक्षेप करके तमिल अभिमान का ‘राक्षसीकरण’ मत कीजिए.’

तमिलनाडु भाजपा के प्रेसिडेंट थमिलीसाई सौंदरराजन ने फिल्म से इन सीन को हटाने की मांग की है. वहीं केंद्रीय मंत्री राधाकृष्णन ने भी सौंदरराजन की मांग का समर्थन किया. उन्होंने कहा कि फिल्म में जीएसटी के बारे में जो झूठ फैलाए गए हैं, वैसे सीन को हटाया जाना चाहिए.

पटना हाईकोर्ट ने बिहार बोर्ड पर लगाया 5 लाख का जुर्माना

Priyanka Singh

पटना। देशभर की शिक्षाव्यवस्था पर आए दिन सवा उठते रहते हैं. मानव संसाधन मंत्रालय हो या फिर राज्य का शिक्षा विभाग धांधलेबाजी और गड़बड़ियां करता रहता है. इसी क्रम में बिहार की शिक्षा व्यवस्था पर एक बार फिर सवाल उठने लगे है. पटना हाईकोर्ट ने लापरवाही के लिए जिम्मेदार बिहार बोर्ड पर 5 लाख रुपए का जुर्माना लगाया है.

हाईकोर्ट ने यह जुर्माना उनकी एक गलती के लिए लगाया गया है. बिहार बोर्ड ने एक छात्रा प्रियंका सिंह को पास होने के बावजूद भी फेल कर दिया था. इस साल दसवीं की परीक्षा में उसे संस्कृत में चार और विज्ञान में 29 नंबर दिए गए थे. जबकि प्रियंका का कहना था कि उसने पेपर अच्छा दिया है.

जब इस पूरे प्रकरण में दोबारा कॉपियों की जांच की गई तो प्रियंका को फिर से संस्कृत और विज्ञान में फेल कर दिया गया. लेकिन अपनी पढ़ाई पर भरोसा रखने वाली प्रियंका ने पटना हाईकोर्ट में याचिका दायर कर इस मामले की तह तक पहुंचने का फैसला कर लिया था. जब छात्रा की कॉपी जमा करने के लिए बिहार बोर्ड से कहा गया तो जो कॉपी जमा कराई गई उसमें छात्रा की हैंडराइटिंग मैच नहीं कर रही थी. अदालत ने फटकार लगाते हुए बोर्ड से कहा कि जल्द से जल्द छात्रा की मूल कॉपी जमा कराई जाए.

पकड़े जाने के डर से बोर्ड के अधिकारियों ने गलत बारकोडिंग होने की बात कही लेकिन कोर्ट के सामने जांच हुई तब प्रियंका के संस्कृत में 61 और विज्ञान में 80 नंबर आए जिसके बाद कोर्ट ने बिहार बोर्ड पर 5 लाख का जुर्माना लगा दिया.

अफगानिस्तान की 2 मस्जिदों में आत्मघाती हमला, 72 मरे

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अफगानिस्तान

काबुल। अफगानिस्तान की राजधानी और पश्चिमी प्रांत घोर में शुक्रवार को मस्जिदों पर हुए दो आत्मघाती हमलों में करीब 70 लोगों की मौत हो गई. अधिकारियों ने इस बात की जानकारी दी. सार्वजनिक स्वास्थ्य मंत्रालय के प्रवक्ता मोहम्मद इस्माइल कवुसी ने बताया कि एक मस्जिद में एक आत्मघाती हमलावर ने विस्फोट किया, जिसमें मुख्य रूप से शिया हजारा अल्पसंख्यक मौजूद थे. विस्फोट उस वक्त हुआ जब इमाम जामम मस्जिद के अंदर शाम को लगभग 6.00 बजे सैकड़ों लोग नमाज के लिए इकट्ठा हुए थे. अमेरिका ने इस हमले की निंदा की है.

पुलिस प्रवक्ता बशीर मुजाहिद ने बताया कि जब बम विस्फोट हुआ, तब हमलावर मंडली के बीच खड़ा था. हजारा, एक जातीय समूह को मूल के रूप में मंगोलियाई माना जाता है, यह ज्यादातर शिया इस्लाम के अनुयायी हैं, जो अफगानों के विशाल बहुमत सुन्नी मुसलमान के बाद दूसरी सबसे बड़ी शाखा है.

काबुल में विस्फोट के करीब एक घंटे पहले, एक आत्मघाती हमलावर ने घोर प्रांत के डु-लायना जिले के ख्वाजगन मस्जिद में विस्फोटक किया था. प्रांत के गवर्नर के प्रवक्ता अब्दुल हाई खताबी ने कहा कि हमला एक तालिबान विरोधी आतंकवादी, फजल हयात खान ने किया और उसके आदमी अंदर प्रार्थना कर रहे थे. घोर के पुलिस प्रवक्ता इक्बाल नेजामी के मुताबिक, खान और उसके कई लोग समेत 30 की इस हमले में मौत हो गई.

MNS की फिर गुंडागर्दी, उत्तर भारतीय फेरीवालों को पीटा

Raj thakrey

सांगली। महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के कार्यकर्ताओं ने दिवाली पर जमकर गुंडागर्दी मचाई. मनसे कार्यकर्ताओं ने महाराष्ट्र के सांगली जिले में उत्तर भारतीयों को निशाना बनाते हुए तोड़फोड़ की. राज ठाकरे की पार्टी मनसे कार्यकर्ताओं ने महाराष्ट्र के सांगली में सड़क पर सामान बेचने वाले उत्तर भारतीयों से कहा था कि वो यहां से अपना सामान हटा लें. जब कुछ लोगों ने सामान नहीं हटाया तो मनसे कार्यकर्ताओं ने उनका सामन सड़क पर फेंक दिया और दुकानों में तोड़फोड़ की.

राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना अब गुंडागर्दी पर उतर आई है. एलफिंस्टन स्टेशन पर हुए हादसे के बाद अपनी महासभा ने फेरीवालों के खिलाफ आवाज उठाते हुए शहर के लिए मुसीबत बताया था. सांगली में उत्तर भारतीय लोग बिना इजाजत के अपना व्यापर कर रहे थे. इसी बात से नाराज होकर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के कार्यकर्ताओं ने तोड़फोड़ की है.

राज की ललकार के बाद समूचा रेलवे प्रशासन, रेलवे परिसरों से फेरीवालों को हटाने में जुट गया था और रोज कमाने-खाने वाले फेरीवाले, रेलवे परिसरों के आस-पास धंधा लगाकर परिवार पालने वाले और उन पर आश्रित हजारों लोगों की रोजी-रोटी छीन ली गई थी.

आपको बता दें कि महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के कार्यकर्ताओं द्वारा महाराष्ट्र में पहले भी इस तरह की घटनाओं को अंजाम दिया जा चुका है.

‘आधार’ ने फिर ली 3 लोगों की जान

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Aadhar

नई दिल्ली। कर्नाटक के गोकर्णाना गांव में एक दलित परिवार के तीन भाई तीन सप्ताह के अंदर राश्न न मिलने की वजह से मर गए. एक अखबार में छपी रिपोर्ट के मुताबिक इन्हें राशन देने से इनकार कर दिया गया, क्योंकि इनका राशन कार्ड आधार लिंक नहीं थे. इस रिपोर्ट के बाद पास एक एक एनजीओ ने इस मुद्दे को उठाया.

पीपुल्स यूनियन ऑफ सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) नाम के गैर-सरकारी संगठन ने खोज शुरू की तो पता चला कि इस परिवार को आखिरी बार दिसंबर 2006 में सब्सिडी वाले चावल, गेहूं और चीनी प्राप्त हुई थी. साल 2006 के बाद से इन्हें औपचारिक रूप से राशन प्राप्त नहीं हुआ है. रिपोर्ट में कहा गया है कि दुकानदार ने इन्हें मार्च के महीने में मुफ्त सामान दिया था.

नारायण, वेंकटतारम और सुबुबु मारू मुखरी अपनी मां के साथ गांव में रहते थे. स्थानीय कार्यकर्ताओं और अखबार ने दावा किया है कि इन तीनों की मौत राशन की कमी के कारण 2 जुलाई और 13 जुलाई के बीच हुई. हालांकि प्रशासन अधिकारियों ने इस बात का खंडन किया है. अधिकारियों का कहना है कि इनकी मौत शराब के कारण हुई है राशन की कमी के कारण नहीं.

राजस्व विभाग के मुताबिक दलित परिवार की वार्षिक आय 11,000 रुपये है. परिवार में सबसे बड़ी नागमा (मां) हैं, उनके चार पुत्र, पत्नी हैं. नागमा ने इस बात को स्वीकार किया है कि उसके दो बेटे शराब पीते थे हालांकि, उन्होंने कहा कि उनके परिवार काम ठीक चल रहा था वो हर महीने राशन ले रही थी.

वनइंडिया से साभार

जातिवादी गुंडों ने फूंके महादलितों के 70 घर

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खगाड़िया, बिहार

पटना। देशभर में एकतरफ जहां दीवाली का जश्न मना रहा था वहीं दूसरी तरफ सुशासन बाबू नीतीश कुमार के राज में महादलितों पर अत्याचार हुआ. बिहार के खगड़िया जिले के छमसिया गांव में जातिवादी गुंडों ने महादलित परिवारों पर हमला कर दिया. इस हमले में जातिवादी गुंडों ने लगभग 70 घरों को आग लगा दी. कई परिवार बेघर हो गए. पीड़ित लोग अपने परिवार के साथ सड़क पर आ गए. लगभग 70 परिवार सड़क पर रहने को विवश हैं.

बताया जाता है कि इस इलाके में जमीन के कब्जे और वर्चस्व को लेकर दो जातियों में पहले से विवाद चला आ रहा था. दीपावाली से एक दिन पहले शाम को जातिवादियों ने महादलित परिवारों को डराने और दहशत फ़ैलाने के उद्देश्य से घटना को अंजाम दिया. जातिवादी गुंडों ने महादलितों के लगभग 70 घरों में आग लगा दी. और दहशत फ़ैलाने के लिए कई राउंड गोलियां भी चलाईं.

गांव के ही रहने वाले 50 वर्षीय अर्जुन सदा ने बताया कि घर में जितना समान था जल गया. करीब 50 की संख्या में लोग गोली चलाते हुए आए और एक तरफ से घरों में आग लगाना शुरू किया. इससे घर में रखा सारा समान जल गया. दो बकरियां भी जल गई.

घटना के बाद पीड़ित परिवारों के घर के बच्चे भूख से तड़प रहे हैं. पीड़ित परिवारों के घरों के साथ-साथ खाने-पीने का समान भी जल गए. अन्न का एक भी दाना नहीं बचा है. हालांकि घटना के बाद जिला प्रशासन ने कुछ राहत सामग्री वितरित की है. लेकिन अपना सबकुछ आग में जलता देखकर उनके आंखों के आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे हैं. घटना से पीड़ित परिवार काफी डरे हुए हैं.

खगड़िया एसपी मीनू कुमारी ने कहा कि जिन लोगों ने इस घटना को अंजाम दिया उनकी पहचान कर प्राथमिकी दर्ज की जा रही है. साथ ही कड़ी कार्रवाई का भरोसा भी पीड़ित परिवारों को दिया गया है.

मुख्य सचिव ने दिया था आधार न होने पर राशन कार्ड रद्द करने का आदेशः राज्य खाद्य मंत्री

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Santoshi Kumari

सिमडेगा। झारखंड के सिमडेगा जिले में भूख से तड़पकर 11 साल की बच्ची संतोषी कुमारी की मौत के बाद राज्य सरकार निशाने पर है. आधार कार्ड नहीं होने से परिवार को राशन नहीं मिला. घर में अनाज का एक दाना नहीं था. परिवार के लोग कुछ दिन से भूखे थे. राज्य के खाद्य आपूर्ति मंत्री सरयू राय ने इस मामले में अपनी ही सरकार पर सवाल उठाए हैं. उनका कहना है कि उनके अफसर तो किसी भी निर्देश का पालन ही नहीं करना चाहते.

झारखंड के खाद्य आपूर्ति मंत्री सरयू राय ने सीएम के मुख्य सचिव राजबाला वर्मा पर मामले का ठीकरा फोड़ा है. उनके मुताबिक, मुख्य सचिव ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये वैसे लोगों का राशन कार्ड को रद्द करने का निर्देश दिया था, जिनके पास आधार कार्ड नहीं है. सरयू राय के मुताबिक, विभागीय मंत्री होने के बाद भी कई अफसर उनकी बात नहीं सुनते. अफसरों की लापरवाही से एक बच्ची की भूख से जान चली गई.

इस घटना की स्वतंत्र जांच करने वाली फैक्ट-फाइंडिंग टीम का कहना है कि संतोषी के परिवार को 8 महीने से राशन नहीं मिला. राशन देने वाले का कहना है कि परिवार का राशन कार्ड आधार नंबर से जुड़ा नहीं है. इसलिए राशन नहीं दिया गया.

केंद्रीय खाद्य मंत्री रामविलास पासवान ने कहा है कि अधिकारियों की टीम तथ्यों की जांच के लिए सिमडेगा ज़िले में भेजी जा रही है. उन्होंने कहा कि ये मामला बेहद गंभीर है और इस मौत के लिए ज़िम्मेदार लोगों के खिलाफ राज्य सरकार को सख्त कार्रवाई करनी चाहिए. उन्होंने कहा कि देश में कहीं भी खाद्य सुरक्षा कानून के तहत राशन कार्ड को ‘आधार’ से जोड़ना अनिवार्य नहीं किया गया है. उन्होंने बताया कि खाद्य सचिव से कहा गया है कि वे जल्दी अधिकारियों की एक टीम झारखंड भेजें और इस मामले के तथ्यों की तहकीकात करें.

बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि आधार कार्ड नहीं होने से सरकार किसी को राशन के लाभ से वंचित नहीं कर सकती. ऐसे में मुख्य सचिव का ये निर्देश सुप्रीम कोर्ट की आदेश के खिलाफ है.

बता दें कि 11 साल की संतोषी कुमारी ने 8 दिन से खाना नहीं खाया था. 28 सितंबर को उसकी मौत हो गई थी. उसकी मां ने बताया कि दुर्गा पूजा की छुट्टियों के चलते स्कूल बंद हो गया था. इस वजह से संतोषी को मिड डे मील भी नहीं मिल सका. वह भात (चावल) मांगते-मांगते मर गई.

जियो ने पहली बार बढ़ाए टैरिफ प्लान के दाम…

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jio

मुंबई। रिलायंस जियो ने बुधवार को अपनी वेबसाइट में नए धन धना धन टैरिफ प्लान की घोषणा कर दी. इस नए प्लान के तहत जियो ने अपने टैरिफ रैट में वृद्धि करते हुए 399 के प्लान को 459 का कर दिया है. यह प्लान 19 अक्टूबर से सभी वर्तमान और नए ग्राहकों पर लागू होगा. इसके तहत जो सुविधा 399 के टैरिफ प्लान में मिलती थी अब उसके लिए 459 रुपए देने होंगे. 399 के प्लान में जियो 84 दिनों के लिए प्रतिदिन 1 जीबी 4 जी डेटा देता था, लेकिन अब इस प्लान के लिए 459 रुपए का टैरिफ लेना होगा. वहीं 399 का प्लान भी जारी रहेगा, लेकिन उसमें दिनों की संख्या घटाते हुए 70 दिन कर दी गई है. यानी 70 दिनों में 70 जीबी डेटा मिलेगा. 459 के टैरिफ प्लान में 1 जीबी हाई स्पीड डाटा के साथ असीमित वॉयस कॉल और जियो एप सेवाएं उपलब्ध होंगी.

वहीं, 149 रुपये की योजना के तहत अब प्रत्येक बिलिंग साइकल में 2 जीबी की जगह पर 4 जीबी डेटा मिलेगी. साथ ही मुफ्त वॉयस कॉलिंग और जियो एप्स का एक्सेस भी मिलेगा. ज्यादा डेटा इस्तेमाल करने वालों के लिए जियो 509 रुपये की योजना लेकर आया है, जिसमें ग्राहकों को 2 जीबी डेटा रोजाना 49 दिनों के लिए मिलेगा. साथ ही अन्य सेवाओं का असीमित एक्सेस मिलेगा.

जिन लोगों को बिना किसी बाधा के हाई स्पीड डेटा एक्सेस चाहिए, उनके लिए जियो लंबी अवधि का नॉन-एफयूपी प्लान्स पेश करता है. 999 की योजना में 3 महीने के लिए 60 जीबी का हाई स्पीड डेटा मिलेगा, वहीं 6 महीने के प्लान 1999 रुपए में 125 जीबी की बाधारहित हाई स्पीड डेटा प्रदान करेगा. सब्सक्राइबर वार्षिक प्लान के लिए 4999 रुपए का विकल्प भी चुन सकते हैं जो 350 जीबी हाई स्पीड डेटा प्लान अवधि के लिए प्रदान करता है. छोटे मूल्य रिचार्ज के लिए, जियो ने बेहद-सस्ते दैनिक और साप्ताहिक पैक पेश किए हैं. इन योजनाओं के अंतर्गत, एक उपयोगकर्ता 19 रुपए में 1 दिन और 52 रुपए में 1 सप्ताह और 98 रुपए में दो सप्ताह के लिए फ्री वॉयस, एसएमएस, असीमित डेटा (0.15 जीबी दैनिक) प्राप्त कर सकता है.

आदिवासी दंपति ने कुछ यूं पेश की प्रकृति प्रेम की अनूठी मिसाल…

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झारखंड

रांची। झारखंड के आदिवासी जन्मजात प्रकृति प्रेमी होते हैं, साथ ही प्रकृति की पूजा करना उनके संस्कृति में शामिल है. पेड़-पौधे, जल, जंगल जमीन से उनका विशेष लगाव होता है. वैसे बदलते वक़्त के साथ सरकार भी पर्यावरण की सुरक्षा के लिए वृक्षारोपण को बढ़ावा देने का कार्यक्रम चला रही है. इसी के तहत एक नव-विवाहित आदिवासी दंपति ने एक अनोखी पहल की है. इस दंपती ने शादी के रिसेप्शन पार्टी में उन्हें बधाई देने आए सभी लोगों को एक-एक पौधा दिया.

मेहमानों को भेंट किया पौधा अपने प्रकृति प्रेम की अनूठी मिसाल पेश करते हुए रांची के एक नवविवाहित आदिवासी दंपति एरिक विल्सन तिग्गा और आसमानी कुजूर ने रिसेप्शन में आए मेहमानों को न सिर्फ पौधा भेंट किया, बल्कि उनसे यह वादा भी लिया वे इस पौधे को अपने घर-आंगन और आसपास की खाली पड़ी जमीन पर लगाएंगे और उसकी देखभाल भी करेंगे.

नवदंपति की इस पहल की रिसेप्शन में आये सभी मेहमानों ने मुक्त कंठ से प्रशंसा की. नवदंपति के मुताबिक पेड़-पौधे और जंगल से ही प्रकृति बच सकती है. वैसे पर्यावरण की सुरक्षा के लिए सरकार पौधरोपण को बढ़ावा तो दे रही है, लेकिन बिना जनभागिता के यह संभव नहीं है. ऐसा लोगों में जागरूकता बढ़ा कर किया जा सकता है. इसी उद्देश्य के तहत हमने रिसेप्शन में पौधे बांटने का फैसला लिया.

नवदंपति ने 2000 पौधे बांटे नवदंपति के मुताबिक उन्हें रिसेप्शन में आये मेहमानों के लिए तोहफे देने का विचार मन में आया. काफी मंथन के बाद यह फैसला लिया गया कि मेहमानों को पौधे दिए जाएं. इसके लिए आस-पास के नर्सरियों के अलग-अलग प्रजातियों के 2000 पौधे मंगवाए गए. पौधे बांटने के बाद नवदंपति काफी सुकून महसूस कर रहे हैं.

आजतक से साभार

संगीत सोम साहिब क्या शाहजहाँ हिटलर से भी बुरा था?

संगीत सोम

शाहजहाँ ने जितनी शदीद मोहब्बत से मुमताज़ की याद में ताजमहल बनवाया था आज वो उससे ज़्यादा शदीद नफ़रत का शिकार है. वो दुनिया के सात अजूबों में है. वो युनेस्को की वर्ल्ड हैरिटेज की फेहरिस्त में है. उसे देखने के बाद बिल क्लिंटन ने कहा था कि “आज मुझे अहसास हुआ कि इस दुनिया में दो तरह के लोग हैं. एक वो जिन्होंने ताज देखा है और दूसरे वो जिन्होंने ताज नहीं देखा.” इस दुनिया में ताज से खूबसूरत इमारतें हो सकती हैं, लेकिन उनमें से कोई ताज नहीं है क्योंकि इसकी बुनियाद में एक शहंशाह का दिल रखा है. हिंदोस्तां पे और हिंदोस्तां के दो तिहाई सूबों पर हुकूमत करने वाली बीजेपी के मेरठ ज़िले के एमएलए संगीत सोम ने एक पब्लिक मीटिंग में ऐलान किया कि ताजमहल को इतिहास से निकाल दिया जाना चाहिए. यह देश का दुर्भाग्य है कि उसका नाम इतिहास में है. उसको बनाने वाले शाहजहाँ ने हिंदुओं का सर्वनाश किया था और यह भी कहा कि वो गारंटी देते हैं कि इतिहास फिर से लिखा जाएगा.

ताजमहल के बनने के 350 साल बाद भी उस पर लोगों की राय अलग है. उसे देखने का नज़रिया भी जुदा-जुदा. साहिर लुधियानवी तो अपनी महबूबा से ताजमहल में मिलने से इनकार करते हैं. अपनी मशहूर नज़्म “ताजमहल” में लिखते हैं कि “ताज तेरे लिए इक मज़हर-ए-उलफत ही सही. तुझको इस वादी-ए- रंगीं से अक़ीदत ही सही…मेरी महबूब कहीं और मिलाकर मुझसे….बज्मे शाही में गरीबों का गुज़र क्या मानी.” साहिर कहते हैं, “किसी शहंशाह की महफ़िल में गरीबों का गुज़र कहां है? इसलिए कहीं और मिलो. और वो और तल्खी से कहते हैं कि “अनगिनत लोगों ने दुनिया में मोहब्बत की है. कौन कहता है कि सादिक़ ना थे जज़्बे उनके. लेकिन उनके लिए तशहीर का सामान नहीं…क्योंकि वो लोग भी अपनी ही तरह मुफ़लिस थे.” (दुनिया में तमाम लोगों ने सच्ची मोहब्बत की है…लेकिन उसकी पब्लिसिटी नहीं कर पाए क्योंकि वो भी अपनी तरह गरीब थे.) यही नहीं टैगोर ने ताज को “वक़्त के चेहरे पे आंसू का क़तरा” लिखा… बांग्ला कवि क़ाज़ी नज़रुल इस्लाम को ताज के संग-ए-मरमर से लहू गिरता नज़र आया. शायर नाज़िर ख़य्यामी ने लिखा कि..”ताज इक ठंडी इमारत के सिवा कुछ भी नहीं. ताज इक मुर्दा मोहब्बत के सिवा कुछ भी नहीं…” लेकिन वो इनमें से किसी ने नहीं कहा जो संगीत सोम कह रहे हैं.

अगर संगीत सोम के इस फ़ॉर्मूले को लागू कर दिया जाए कि इतिहास में जो कुछ नापसंद हो उसे मिटा दिया जाए तो पूरी दुनिया मिट जाएगी क्योंकि दुनिया की तारीख में कुछ भी ऐसा नहीं है जिसे नापसंद करने वाले मौजूद ना हों. बक़ौल संगीत सोम “शाहजहाँ ने उत्तर प्रदेश और हिन्दुस्तान के सभी हिंदुओं का सर्वनाश करने का काम किया था.” लेकिन इतिहास में ऐसा कोई सुबूत नहीं मिलता. बावजूद इसके कि कई इतिहासकार शाहजहाँ को अपने पिता और दादा से ज़्यादा रेडिकल मुस्लिम मानते हैं. लेकिन क्या शाहजहाँ ने देश पर अग्रेज़ों से ज़्यादा ज़ुल्म किया? फिर अगर अँग्रेज़ों की नफ़रत में उनकी निशानी मिटाने लगेंगे तब तो पार्लियामेंट हाउस से लेकर प्रेसीडेंट हाउस तक सब मिटाना पड़ेगा. फिर उनकी ज़ुबान कैसे मिटा देंगे जो आपके ज्ञान का सबसे बड़ा ज़रिया है?

और दुनिया की तारीख में शायद हिटलर से बड़ा विलेन कोई हुआ नहीं. जिसने सेकेंड वर्ल्ड वॉर की शुरुआत की. जिसने 1938 से 1943 के बीच यूरोप के 15 देशों पर क़ब्ज़ा कर यहूदियों को चुन-चुन कर मारा. जिसने दुनिया की दो तिहाई यहूदी आबादी को क़त्ल कर दिया और जिसने 1941 में दुनिया के सारे यहूदियों को क़त्ल करने का फरमान सुनाया. लेकिन आज की तारीख में भी कभी नाज़ी यूरोप कहलाने वाले तमाम यूरोपियन देशों में हिटलर के “कनसेंट्रेशन कैंप” और “गैस चेंबर” टूरिस्ट प्लेस हैं, क्योंकि वो इतिहास का हिस्सा हैं. आज जर्मनी भले हिटलर को नापसंद करे लेकिन सेकेंड वर्ल्ड वॉर की भयानक यादों से जुड़ी जगहें जर्मन टूरिज्म डिपार्टमेंट के टूर पैकेज का हिस्सा हैं. संगीत सोम साहिब क्या शाहजहाँ हिटलर से भी बुरा था?

मुझे मालूम नहीं कि संगीत सोम देश के बाहर कहीं गये हैं या नहीं…अगर देश के बाहर ना भी गये हों तो एक बार लखनऊ आकर देखें….जहाँ अभी भी हनुमान जी के सबसे बड़े मंदिर के कलश पर पीतल का “चाँद तारा” बना है क्योंकि उसे अवध के नवाब असफुदौला की मां बहू बेगम ने बनवाया था और अगर लखनऊ न भी आते हों तो अयोध्या तो जाते ही होंगे. इस बार रुक के देख लेंगे रामजन्मभूमि के रास्ते पर पाँच वक़्त के नमाज़ी ज़हूर ख़ान पूजा सामग्री बेचते हैं और यह तो उनको बिल्कुल ही नहीं पता होगा कि अयोध्या में दंत धावन कुंड के साथ में एक “सत्य स्नेही मंदिर” है जिसमें सात धर्मों की पूजा होती है. उन सात धर्मों में इस्लाम भी एक है. यहाँ पुजारी सुबह शाम राम, लक्ष्मण, बुद्ध, महावीर और प्रभु यीशू के अलावा काबा की तस्वीर की भी आरती करते हैं. इसलिए चश्मा बदल के दुनिया देखिए. दुनिया में अभी भी बहुत कुछ पॉज़िटिव और खूबसूरत है.

कमाल खान का यह लेख एनडीटीवी से साभार है.

बाढ़ पीड़ितों के साथ राहत कार्य में हुआ जातीय और धार्मिक भेदभावः रिपोर्ट

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Flood in bihar

पटना। इस साल लगभग पूरे भारत में बाढ़ से जनजीवन त्रस्त रहा. अलग-अलग राज्यों में हजारों लोगों की मौतें भी हुई. इनमें सबसे ज्यादा तबाही बिहार में हुई. जहां करोड़ों लोगों को बाढ़ की वजह से शिविर कैंपों में रहना पड़ा. बाढ़ त्रासदी में फंसे लोगों के लिए सरकार ने बढ़े स्तर पर बचाव और राहत कार्य भी किया. इन बचाव और राहत कार्यों में दलितों के साथ काफी भेदभाव किया गया. इस मुद्दे पर ‘नेशनल कंपेन ऑन दलित ह्यूमैन राइट्स’ ने रिपोर्ट पेश कर खुलासा किया है.

रिपोर्ट में बताया गया कि बिहार के अधिकांश इलाकों में आई बाढ़ के दौरान कोई भी राहत शिविर का संचालन नहीं हुआ. सरकारी राहत कार्यक्रम पूरी तरह से बड़ी जातियों के द्वारा संचालित किया गया. महादलित, अल्पसंख्यक, वंचित समाज के लोगों की उपेक्षा की गई. नेशनल कंपेन ऑन दलित ह्यूमैन राइट्स ने रिपोर्ट में बताया कि सरकारी बचाव दल के लोगों ने मुख्य सड़क, मार्ग इत्यादि के किनारे फंसे लोगों को निकाला जबकि अंदर के गांव जहां पर बहुत बड़े स्तर पर गरीब आबादी रहती है उसको छोड़ दिया. गांधी संग्रहालय में आयोजित राज्य स्तरीय बैठक में रिपोर्ट में कहा गया कि जहां भी शिविर चले वहां बिहार सरकार एवं केंद्र सरकार के तय मानकों का पालन नहीं हुआ. कई राहत शिविरों में बड़ी जाति के लोगों ने दलित, महादलित को खाना, रहने तथा सोने की सुविधा नहीं दी. जातिगत तथा धार्मिक भेदभाव की परख के लिए नेशनल दलित वाच, नेशनल कैंपेन ऑन दलित ह्यूमन राइट्स तथा जन जागरण शक्ति संगठन की ओर से एक जांच दल ने अररिया और किशनगंज जिले के बाढ़ प्रभावित गांवों का दौरा किया. इस टीम ने सरकारी राहत एवं बचाव कार्यक्रम को दलित, वंचित, मुस्लिम समाज के नज़रिए से प्रमुख गड़बड़ियां उजागर की. कार्यक्रम में मुख्य रूप से अररिया, किशनगंज, चंपारण, छपरा जिलों के बाढ़ पीड़ितों नें भाग लिया.