फर्जी प्रमाण पत्र से नौकरी मामले में छत्तीसगढ़ सरकार के खिलाफ SC-ST युवाओं का नग्न प्रदर्शन

कहते हैं शर्म का एक पर्दा होता है। इंसानों में उस पर्दे का काम हमारे कपड़े करते हैं। लेकिन जब शर्म का वो पर्दा मजबूरी में हटाना पर जाए, आप सोच सकते हैं कि किसी इंसान की हालत क्या होती होगी। किस मजबूरी में वो ऐसा करता होगा। आज छत्तीसगढ़ में युवाओं ने बीच सड़क पर अपने कपड़े उतार दिए।

छत्तीसगढ़ में 267 फर्जी जाति प्रमाण पत्र के जरिये एससी-एसटी युवाओं के हिस्से की नौकरी खा जाने वाले सवर्णों के खिलाफ चुप्पी साधे कांग्रेस की भूपेश बघेल सरकार को जगाने के लिए एससी-एसटी युवाओं ने नग्न प्रदर्शन कर विरोध दर्ज कराया।

छत्तीसगढ़ में आज विधानसभा सत्र शुरु हुआ है। जब VVIP विधानसभा जा रहे थे, उसी समय दर्जन भर नौजवान पूरी तरह से नग्न हो कर सड़कों पर आ गए। इन नौजवानों की माँग थी कि फ़र्ज़ी आरक्षण प्रमाण पत्र के आधार पर नौकरी कर रहे लोगों पर कार्रवाई की जाए।

यह पूरा मामला तब का है जब छत्तीसगढ़ राज्य का निर्माण हुआ था। तब से अब तक फर्जी जाति प्रमाण पत्र के साहारे आरक्षण, नौकरी एवं राजनीतिक लाभ लेने की तमाम शिकायतें सामने आई है। इन शिकायतों के आधार पर प्रदेश सरकार ने उच्च स्तरीय जांच समिति का गठन किया था। इस जांच में समिति को कुल 758 शिकायते मिली जिसमें से 659 मामलों में जांच की गई। इसमें 267 ऐसे मामले सामने आए, जिसमें सवर्ण समाज के लोग फर्जी जाति प्रमाण पत्र के सहारे आरक्षण से नौकरी एवं राजनैतिक लाभ ले रहे थे। चौंकाने वाली बात यह रही कि इसमें सरपंच और पार्षद से लेकर पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी और उनके बेटे का नाम भी सामने आया था। इसके बाद सामान्य प्रशासन विभाग ने फर्जी लोगों को तत्काल नौकरी से बर्खास्त करने के आदेश दे दिए गए। लेकिन इस आदेश के तीन साल होने के बावजूद अब तक ऐसा हो नहीं पाया है।

साल 2020 में सामने आए इस मामले में छत्तीसगढ़ सरकार और मुख्यमंत्री भूपेश बघेल द्वारा अब तक कार्रवाई नहीं होने से नाराज एससी-एसटी वर्ग के युवाओं ने 19 जून से आमरण अनशन किया था। लेकिन सरकार ने उनकी एक न सुनी।

 जब भूपेश बघेल मुख्यमंत्री बने थे तो बहुजन समाज के लोगों ने दिल्ली में उनका सम्मान किया था। कहा गया था कि वो बहुजनों के हितों की रक्षा करेंगे। लेकिन ऐसा होता नहीं दिख रहा है। छत्तीसगढ़ के युवा लाज छोड़कर कपड़े उतार कर मैदान में आ गए हैं। और इतिहास गवाह है कि जब युवा मैदान में आता है तो बड़े-बड़े नेताओं को मैदान छोड़ना पड़ता है। छत्तीसगढ़ में जल्दी ही चुनाव है।

बेंगलुरु से बड़ी खबर, विपक्षी गठबंधन का ना नाम होगा INDIA

बेंगलुरु में विपक्ष की दो दिवसीय बैठक

बेंगलुरु में जुटे 26 राजनीतिक दलों ने अपनी दो दिन की बैठक के बाद नए गठबंधन की घोषणा कर दी है। नए गठबंधन का नाम Indian National Democratic Inclusive Alliance यानी INDIA होगा। शुरुआती तौर पर देखें तो विपक्ष की इस दो दिवसीय बैठक की यह बड़ी उपलब्धि मानी जाएगी।

साफ है कि भारतीय जनता पार्टी को रोकने के लिए इस बार विपक्ष ने पूरा जोर लगा दिया है। बंगलुरु में विपक्ष की दो दिवसिय बैठक में नेताओं का महाजुटान हुआ है। इस बैठक में 26 राजनीतिक दल जुटे।  जब नेताओं का इतना बड़ा जमावड़ा लगा हो तो  बैठक के दूसरे दिन से उनके अलग-अलग सुर सुनाई देने लगते हैं। लेकिन इस बार विपक्ष एक सुर में बोल रहा है। और वह है देश में महंगाई, बेरोजगारी को बढ़ा देने वाली एक समाज को दूसरे समाज का दुश्मन बना देने वाली भारतीय जनता पार्टी को रोकना।बेंगलुरु में विपक्ष की दो दिवसीय बैठक

इस बैठक में लालू से लेकर ममता, सपा नेता अखिलेश यादव से लेकर आप के अरविंद केजरीवाल सहित देश के अलग-अलग हिस्सों से दिग्गज जुटे हैं। सबने एक सुर से इस बैठक और एकजुटता को जरूरी बताया। ममता बनर्जी ने कहा कि यह बैठक बहुत जरूरी है। जबकि लालू यादव ने इस मौके पर कहा कि हम लोग देश के लिए जुटे हैं। जबकि केजरीवाल का कहना था कि जनता ने नरेन्द्र मोदी को 10 सालों का मौका दिया, लेकिन वह हर क्षेत्र में फेल रहे हैं।

साफ है कि विपक्षी खेमे ने अपना पूरा जोर लगा दिया है। दिल्ली में सत्ता के गलियारे में तमाम लोग डरे हुए हैं। जो मीडिया सत्ता के साथ मिलकर गाल बजाती थी, वह भी बदलाव की आहट देखने लगी है। कुल मिलाकर विपक्ष की गोलबंदी देश में उन तमाम लोगों को यह मैसेज देने में सफल होती हुई दिख रही है कि अगर आप बदलाव चाहते हैं तो यह मुमकिन है। विपक्ष 2024 में केंद्र में बदलाव के लिए साथ आ चुका है, देखना है, जनता उसके साथ कितना आती है।

 

अमेरिका में 14 अक्टूबर को होगा बाबासाहेब की 12 फीट ऊंची प्रतिमा का अनावरण, अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर ने तय की तारीख

अमेरिका से बड़ी खबर आई है। अमेरिका में अंबेडकरवादियों के संगठन अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर (AIC) ने अपने बड़े प्रोजेक्ट के उदघाटन की तारीख तय कर दी है। वाशिंगटन डीसी स्थित एआईसी के मुख्यालय पर बाबासाहेब की 12 फीट की प्रतिमा का अनावरण 14 अक्टूबर 2023 को किया जाएगा। यह मौका इसलिए ऐतिहासिक है क्योंकि भारत के बाहर पहली बार बाबासाहेब आंबेडकर की इतनी बड़ी प्रतिमा लगाई जा रही है। ऐसा कर अमेरिकी अंबेडकरवादियों ने इतिहास रच दिया है। एआईसी के अध्यक्ष राम कुमार जी ने इसकी घोषणा की। उन्होंने लिखा-

Jai Bheem! AIC is installing the statue of Babasaheb Dr. B.R. Ambedkar at it’s headquarters in Maryland. Ceremony of “Unveiling of the Statue” will happen on 14th October, 2023. It is the tallest statue of Babasaheb outside India. Please plan to attend and be part of this historic day in the global Ambedkarite movement. Please click the following link for details. RSVP is required to attend and help us in planning the event. उन्होंने इस दौरान एआईसी की वेबसाइट का लिंक भी साझा किया है, जिसमें तमाम जानकारियां हैं।

https://www.eventbrite.com/e/unveiling-of-the-largest-statue-of-dr-br-ambedkar-in-north-america-tickets-669020828307 इस खबर के सामने आते ही दुनिया भर से बधाईयों का तांता शुरू हो गया। जेएनयू के प्रोफेसर और अंबेडकर चेयर के प्रमुख प्रो. विवेक कुमार ने बधाई देते हुए लिखा-

Historic, unbelievable, a great achievement beyond imagination. Amidst onslaught from every sides you people have shown the world ‘do whatever you can’ we are are not going to stop. In spite of your pain and agony, in spite of hurdles of every kind you have set a positive agenda. This achievement should be celebrated and shared by every conscious- Ambedkarite- Buddhist, Bahujans, followers of Guru Ravidas , and upholders of social justice. Congratulations 👏 to the team AIC and their supporters. Prof Vivek Kumar HOD and Ambedkar Chair Professor, JNU

दलित दस्तक के संपादक अशोक दास ने इसे शानदार खबर बताते हुए एआईसी की पूरी टीम को बधाई दी है। एआईसी के सभी सदस्यों को बधाई देते हुए उन्होंने इसे गौरवान्वित करने वाला पल बताया। उन्होंने कहा कि इस मुहिम में सहयोग करने वाले हर एक साथी बधाई के पात्र हैं। गौरतलब है कि दलित दस्तक के संपादक अशोक दास ने साल 2020 में अपने अमेरिका दौरे के दौरान इस सेंटर को देखा था और इसकी योजनाओं के बारे में संस्थान के सदस्यों से बात की थी। दिल्ली से जब बाबासाहेब का स्टैच्यू अमेरिका गया था, उस प्रक्रिया में भी अशोक दास शामिल थे। दलित दस्तक के यू-ट्यूब चैनल पर इससे जुड़ी खबरें साझा की गई थी। उसका लिंक ये रहा-
     

मोदी के लिए मुश्किल भरा होगा मानसून सत्र, कांग्रेस ने बनाई ये खास रणनीति

20 जुलाई से संसद का मानसून सत्र शुरू होने वाला है। नया संसद बनने के बाद यह पहली बार है, जब संसद का सत्र चलेगा। इस बीच कांग्रेस पार्टी ने मोदी सरकार को घेरने के लिए खास रणनीति बना ली है। दरअसल मोदी सरकार कई मोर्चे पर विपक्ष के निशाने पर है। मणिपुर, रेलवे की सुरक्षा और महंगाई सहित तमाम मुद्दे ऐसे हैं, जिस पर कांग्रेस पार्टी मोदी सरकार को घेरने की तैयारी कर रही है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और महासचिव जयराम रमेश ने 15 जुलाई को प्रेस कांफ्रेंस कर उन तमाम मुद्दों की जानकारी दी, जिस पर वह सरकार को घेरने के लिए तैयार है। देखिए वीडियो-

मणिपुर मुद्दे पर मोदी सरकार की विदेशों में भारी बेइज्जती

भारत के मणिपुर राज्य में पिछले दो महीनों से जारी हिंसा की गूंज भले ही दिल्ली में बैठे सत्ताधारियों तक नहीं पहुंच रही हो, दुनिया में इसके कारण भारत की भारी फजीहत हो रही है। इसके बाद कांग्रेस पार्टी ने सदन में इस मुद्दे पर चर्चा की मांग कर दी है और सरकार को घेरा है।

दरअसल, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के फ्रांस दौरे के बीच, यूरोपीय संसद ने मणिपुर हिंसा पर एक प्रस्ताव पारित किया है। प्रस्ताव में कहा गया है कि यूरोपीय संघ भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख सदस्यों द्वारा की गई राष्ट्रवादी बयानबाजी की कड़े शब्दों में निंदा करता है। हालांकि भारत सरकार ने इस पर पलटवार करते हुए इसे आंतरिक मामला बताया है।

मणिपुर हिंसा का जिक्र फ्रांस के स्ट्रासबर्ग में चल रहे पूर्ण सत्र के दौरान तब हुआ जब मानव अधिकारों, लोकतंत्र एवं कानून के शासन के उल्लंघन के मामलों पर बहस हो रही थी। इस दौरान मणिपुर में जातीय झड़पों पर भी चर्चा हुई। मणिपुर हिंसा पर बहस को संसद के एजेंडे में बहस शुरू होने के दो दिन पहले ही शामिल किया गया था। मणिपुर की स्थिति पर एक प्रस्ताव ब्रसेल्स स्थित यूरोपीय संघ की संसद में रखा गया था।

लेकिन हैरानी की बात यह है कि इस चिंता को समझने की बजाय भारत के विदेश सचिव विनय क्वात्रा ने कहा कि ईयू में संबंधित सांसदों को स्पष्ट कर दिया गया है कि यह पूरी तरह से भारत का आंतरिक मामला है।

दूसरी ओर इस पूरे मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनकी सरकार घिरती जा रही है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने पीएम मोदी पर तंज कसते हुए कहा कि मणिपुर के मुद्दे पर यूरोपियन संसद तक चर्चा हो गई, लेकिन मोदी ने एक शब्द नहीं कहा। तो वहीं कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने इस मुद्दे पर सदन में प्रधानमंत्री की मौजूदगी में चर्चा कराए जाने की मांग की है।

मणिपुर में 3 मई से कुकी और मैतेई समुदाय के बीच हिंसा जारी है, जिसमें काफी जाने जा चुकी है। पिछले दिनों राहुल गांधी के मणिपुर दौरे के बाद से यह मुद्दा सुर्खियों में आया था और इस पर बहस तेज हो गई थी। जिसके बाद 12 जुलाई को यूरोपीय संसद ने इस पर बहस के बाद 13 जुलाई को मणिपुर पर एक प्रस्ताव पारित करते हुए भारत सरकार से हिंसा को रोकने और धार्मिक अल्पसंख्यकों की रक्षा के लिए तुरंत कार्रवाई करने का आवाह्न किया।

अब भारत सरकार भले ही इसे आंतरिक मामला कह कर अंतरराष्ट्रीय फजीहत से किनारा करना चाह रही है, लेकिन जिस तरह से मणिपुर में हिंसा को रोकने में सरकार उदासीन दिखी, वह बड़े सवाल खड़े करता है।

पटना विश्वविद्यालय में एससी-एसटी के साथ धोखा

31 अक्टूबर 2009 को पटना विश्वविद्यालय में पूर्व बैकलॉग की गणना के आधार पर प्रशाखा पदाधिकारी के पद के लिए 9 सीट निर्धारण किया गया था। ज्ञापन संख्या था 1577. पूरे पटना विश्वविद्यालय में प्रशाखा पदाधिकारी के 11 पद हैं और उस दौरान 10 पद खाली थे। पटना यूनिवर्सिटी की ओर से जारी ज्ञापन के मुताबिक एससी-एसटी को 9 पदों पर पद्दोन्नति का प्रस्ताव आया। इसमें एससी के लिए पांच और एसटी के लिए 4 पद सुरक्षित किये गए। लेकिन एससी-एसटी के कर्मचारियों को प्रशाखा पदाधिकारी के पद पर पद्दोन्नत नहीं कर असिस्टेंट से स्पेशल असिस्टेंट यानी सहायक से विशेष सहायक बना दिया गया। जबकि यह पद होता ही नहीं है।

इसके 14 साल बाद 11 मई 2023 को पटना विश्वविद्यालय ने ज्ञापन संख्या- 492 के जरिये प्रशाखा पदाधिकारी के छह सीटों पर प्रोमोशन कर दिया गया है। इसमें तीन एससी-एसटी को जबकि तीन जनरल को दे दिया गया है। जिसके खिलाफ अनुसूचित जाति- जनजाति के कर्मचारियों ने आवाज उठाई है। आरक्षित वर्ग के कर्मचारियों ने पदोन्नति के इस मामले में दो गंभीर आरोप लगाते हुए पटना विश्वविद्यालय के कुलसचिव और कुलपति से न्याय की गुहार लगाई है।

 एससी-एसटी वर्ग के कर्मचारियों का आरोप है कि जब साल 2009 में प्रशाखा पदाधिकारी पद के लिए बैकलॉग गणना के आधार पर एससी-एसटी के लिए 9 सीटें खाली थी तो साल 2023 में घटकर वह पांच सीटों पर कैसे सिमट गया? नए आदेश में एससी-एसटी के लिए पांच और जनरल की सीटें 5 कैसे हो गई?

इसका विरोध करते हुए एससी-एसटी वर्ग के कर्मचारियों ने पटना विश्वविद्यालय के कुलसचिव और कुलपति को ज्ञापन सौंपा है। एससी-एसटी कर्मियों की मांग है कि 11 मई 2023 को ज्ञापन संख्या- 492 के आलोक में पटना विश्वविद्यालय मुख्यालय में प्रशाखा पदाधिकारी के पद पर की गई प्रोन्नति को रद्द किया जाए।

इस मामले में एक दूसरा पहलू यह भी था कि बैकलॉग की गणना के आधार पर साल 2009 में हुई पद्दोन्नति का मामला हाई कोर्ट में चल रहा है। इसे आश्चर्य की बात कहे या पटना युनिवर्सिटी प्रशासन का दुस्साहस कहें कि यह सब तब किया गया जबकि उच्च शिक्षा निदेशक रेखा कुमारी ने मई 2023 को एक पत्र जारी कर पटना विश्वविद्यालय के कुलसचिव को कहा था कि चूंकि पद्दोन्नति का मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है, इसलिए इस बारे में किसी तरह का दखल न दिया जाए।

ऐसे में यह पूरा मामला पटना विश्वविद्यालय प्रशासन पर कई गंभीर सवाल खड़े करता है। सवाल यह भी है कि पटना विश्वविद्यालय के कुलसचिव को जनरल वर्ग के कर्मियों को लाभ पहुंचाने और एससी-एसटी के पदोन्नति के सवाल की अनदेखी करने की इतनी क्या जल्दी थी। क्या उन पर सुप्रीम कोर्ट की अवमानना का मामला दर्ज नहीं होना चाहिए।

फर्जी जाति प्रमाणपत्र से नौकरी लेने वाले सवर्णों के खिलाफ आमरण अनशन पर बहुजन युवा

एससी-एससी के फर्जी जाति प्रमाण के सहारे नौकरी कर रहे सवर्ण समाज के युवाओं के खिलाफ आरक्षित वर्ग के युवाओं ने मोर्चा खोल दिया है। साल 2020 में सामने आए इस मामले में छत्तीसगढ़ सरकार और मुख्यमंत्री भूपेश बघेल द्वारा अब तक कार्रवाई नहीं होने से नाराज एससी-एसटी वर्ग के युवा आमरण अनशन पर बैठ गए हैं। उनका आरोप है कि फर्जी जाति प्रमाण पत्र मामले में बर्खास्तगी का आदेश जारी होने के बावजूद अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है।

कांग्रेस की सत्ता वाले छत्तीसगढ़ राज्य में फर्जी जाति प्रमाण पत्र का मामला एक बार फिर गरमाया हुआ है। इसके खिलाफ नई राजधानी स्थित धरना स्थल पर आरक्षित वर्ग के युवा पिछले 4 दिनों से अनिश्चितकालीन आमरण अनशन पर हैं। दरसल यह पूरा मामला तब का है जब छत्तीसगढ़ राज्य का निर्माण हुआ था। तब से अब तक फर्जी जाति प्रमाण पत्र के साहारे आरक्षण, नौकरी एवं राजनीतिक लाभ लेने की तमाम शिकायतें सामने आई है। इन शिकायतों के आधार पर प्रदेश सरकार ने उच्च स्तरीय जांच समिति का गठन किया था। इस जांच में समिति को कुल 758 शिकायते मिली जिसमें से 659 मामलों में जांच की गई। इन 659 मामलों में 267 ऐसे मामले सामने आए, जिसमें सवर्ण समाज के लोगों ने फर्जी जाति प्रमाण पत्र के सहारे आरक्षण से नौकरी एवं राजनैतिक लाभ ले रहे थे। चौंकाने वाली बात यह रही कि इसमें सरपंच और पार्षद से लेकर पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी और उनके बेटे का नाम भी सामने आया था।

इसके बाद सामान्य प्रशासन विभाग के पत्र 7-16/2020/ 25.11.2020 के जरिये फर्जी लोगों को तत्काल नौकरी से बर्खास्त करने के आदेश दे दिए गए। लेकिन इस आदेश के तीन साल होने के बावजूद अब तक ऐसा हो नहीं पाया है।

जिसको लेकर एससी-एसटी वर्ग के युवाओं ने मोर्चा खोल दिया है। विनय कौशल के नेतृत्व में मनीष गायकवाड़, हरेश बंजारे, आशीष टंडन, लव कुमार सतनामी, रोशन जांगड़े 19 जून से अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठे हैं। इस आंदोलन को समर्थन देने के लिए दलित-आदिवासी युवाओं का हुजूम सामने आ गया है।

आंदोलन करने वाले युवाओं का कहना है कि हमारे अधिकारों पर सेंधमारी करने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई एवं उन्हे तत्काल प्रभाव से बर्खास्त किया जाए। इस मामले में साफ दिख रहा है कि छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार फर्जी जाति प्रमाण पत्र धारकों का संरक्षण कर रही है। यही वजह है कि कांग्रेस की सरकार तीन साल बाद भी अपराधियों पर कोई भी कार्यवाही नहीं कर पाई है। और तो और फर्जी जाति प्रमाण पत्र के आधार पर नौकरी करने वाले लोगों को प्रमोशन का इनाम भी दे रही है। इस मामले में खुद को पिछड़ों का मसीहा बताने वाले मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से लेकर दलित समाज से आने वाले कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और मोहब्बत की दुकान खोलने निकले कांग्रेस के बड़े नेता राहुल गांधी, सभी खामोश हैं। सबसे ज्यादा चिंता की बात यह है कि छत्तीसगढ़ विधानसभा में बैठे तमाम राजनीतिक दलों के आरक्षित विधायक भी इस मुद्दों पर चुप्पी साधे हुए हैं।

वर्जन :- फर्जी जाति प्रमाण पत्र के सहारे नौकरी करने वालों के खिलाफ आमरण अनशन का आज चौथा दिन है। सत्ता में बैठे हुए लोग फर्जी जाति प्रमाण पत्र धारकों को संरक्षण प्रदान कर रहे हैं जो हमारे संवैधानिक अधिकारों की हत्या में मददगार साबित हो रहे हैं। विनय कौशल आंदोलनकारी

हमारे लिए चिंता इस बात की भी है कि छत्तीसगढ़ विधानसभा में तमाम आरक्षित जनप्रतिनिधि इन मुद्दों पर चुप्पी साधे हुए हैं लेकिन जब चुनाव का समय आता है तब तमाम आरक्षित जनप्रतिनिधियों को आरक्षित निर्वाचन क्षेत्र ही नजर आता है लेकिन आज आरक्षित वर्ग के अधिकारों के साथ हो रहे डकैती हकमारी, लूटमारी पर वह लोग कहीं नजर नहीं आ रहे हैं। उच्च स्तरीय जाति प्रमाण पत्र छानबीन समिति बनाकर उनके ही रिपोर्ट को आधार मानते हुए शासन एवं प्रशासन कार्रवाई करने से डर रही है। आरक्षित वर्ग के हित में कुठाराघात करने के लिए सत्ता पक्ष एवं विपक्ष सब मिले हुए हैं। हमारे मुद्दे राजनीतिक विपक्ष के लिए भी कारगर साबित नहीं होते हैं। हमें अपनी लड़ाई खुद लड़नी पड़ती है। धनंजय बरमाल सोशल एक्टिविस्ट एवं दलित चिंतक अब होही न्याय कहकर सत्ता में आने वाली कांग्रेस की सरकार खुद कटघरे में है, तीन वर्ष बीत गए फर्जी जाति प्रमाण पत्र धारकों को तत्काल बर्खास्त कर कार्यवाही करने के आदेश को आज दिनांक तक पालन में नही लाया जा सका है। कार्यवाही करने के लिए जिम्मेदार अधिकारियों के हाथ पैर क्यों फूल रहे हैं? सरकारी आदेश का पालन नहीं हो रहा हमारे हक-अधिकारों पर सेंधमारी हुई है हम 4दिनों से भूखे है अनिश्चित कालीन धरना दे रहे है इस सरकार में वाकई न्याय होता है तो मुख्यमंत्री जी साबित करे जो दोषी लोग है उन्हे तत्काल बर्खास्त कर कानूनी कार्यवाही करे। मनीष गायकवाड़ आंदोलनकारी

श्रीनगर में हुई थी चौथी बौद्ध संगिति, शानदार है यहां का हरवन बौद्ध विहार

श्रीनगर स्थित हरवन बौद्ध स्तूप श्रीनगर स्थित शालीमार गार्डन जो डल झील के किनारे पर बनी हुई है, वहां से तीन किलोमीटर की दूरी पर दाहिने तरफ पहाड़ी की तलहटी में हरवन स्तूप और चैत्य स्थित है। यहीं पर सम्राट कनिष्क के शासनकाल में 78 ईस्वी में चौथी बौद्ध संगीति का आयोजन किया गया था। इस संगीति में संपूर्ण बुद्ध वाणी का संगायन और अनुमोदन किया गया था। इस संगीति के दौरान संपूर्ण बुद्ध वाणी को तांबे की प्लेटों पर खुदवा दिया गया था और उन प्लेटों को एक सुरक्षित स्थान पर रखवा दिया गया था जिससे बुद्ध वाणी दीर्घकाल तक सुरक्षित रहे। इन प्लेटों को अभी तक ढूंढने में सफलता नहीं मिली है। हाल ही में बौद्ध धम्म पर काम करने वाले स्कॉलर आनंद ने यहां का दौरा भी किया था। उन्होंने दलित दस्तक से यहां की तस्वीरें साझा की है।

श्रीनगर स्थित हरवन बौद्ध स्तूप बौद्ध स्कॉलर आनंद

हरवन बौद्ध विहार में श्रीनगर मंडल के भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की ओर से जो जानकारी का बोर्ड लगाया गया है, उसके मुताबिक, हरवन का कल्हण की राजतरंगिणी में वर्णित षड् र्हदवन के साथ तादात्म्य किया गया है। ऐसा अनुमान है क कनिष्क के शासन काल में चतुर्थ बौद्ध परिषद का आयोजन इसी स्थान पर हुआ था। यह भी माना जाता है कि कनिष्क (78 ईसवी) के समकालीन प्रसिद्ध बौद्ध भिक्षु नागार्जुन यहीं निवास करते थे। पहाड़ी के ऊपर की ओर बिखरे पुरावशेषों के अतिरिक्त अन्य उत्खनित भग्नावशेष ऊपरी और निचली दो स्तरों पर अवस्थित हैं। निचले स्तर के भग्नावशेषों में सम्मिलित हैं- अगढ़ित पत्थरों से बने चार कक्ष जो कि एक गलियारे द्वारा अलग किये गये हैं, जिनके पूर्व नें सीढ़ियां हैं, अगढ़ित पत्थरों से बने एक आयताकार प्रांगण में उत्तराभिमुख स्तूप का त्रयात्मक आधार और रोड़ी से बनी चारदीवारी है जो कि संभवतः एक मठ का भाग रहा होगा।

श्रीनगर स्थित हरवन बौद्ध स्तूप पर पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा दी गई जानकारी ऊपरी स्तर में एक प्रांगण है, जिसके मध्य अगढ़ित पत्थरों से निर्मित एक अर्धवृत्तकक्षीय संरचना है। इस कक्ष का प्रांगण ढली हुई तथा सादी टाइलो्ं से बना है जो कि अब मिट्टी से ढक दिया गया है। टाइलों पर टेढ़ी नक्काशी, वनस्पति, जीव जन्तु, मेष युद्ध, दूध पिलाती गाय, हिरण का पीछा कर तीर छोड़ता धनुर्धारी घुड़सवार, नृत्यांगना, छज्जे में बैठे वार्तालाप करते स्त्री-पुरुष इत्यादि अंकित हैं जो कश्मीर एवं मध्य एशिया की असाधारण कला को दर्शाते हैं। ऐसा अनुमान है कि इन वस्तुओं का निर्माण ईसवी सन् की प्रारंभिक शताब्दियों में किया गया था।

भीम आर्मी स्थापना दिवस पर चंद्रशेखर आजाद 21 जुलाई को जंतर-मंतर पर करेंगे प्रदर्शन

28 जून को खुद पर हुए हमले के बाद भीम आर्मी चीफ और आजाद समाज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष चंद्रशेखर आजाद रावण पहले एक जुलाई को राजस्थान के भरतपुर में गरजे। और अब एक नए जंग की तैयारी में हैं। चंद्रशेखर आजाद ने अपने समर्थकों से 21 जुलाई को दिल्ली के जंतर-मंतर पर आने की अपील की है। इसका ऐलान उन्होंने बुधवार 12 जुलाई की शाम को फेसबुक लाइव होकर किया।

चंद्रशेखर ने कहा कि आप जानते हैं कि 28 को क्या हुआ। लेकिन अब हजारों चंद्रशेखर हैं। देश के कोने-कोने में हैं। चंद्रशेखर ने कहा कि वो मनुवादियों की आंखों में चुभते हैं। उनका बस चले तो चंद्रशेखर के छोटे-छोटे टुकड़े कर दें। भीम आर्मी चीफ ने कहा कि लेकिन मैं अकेला नहीं हूं; जिनको ऐसी मुसीबतों का सामना करना पड़ता है। जिन्होंने भी समाज के लिए काम किया, उन्हें यह झेलना ही पड़ता है।

अपने करीब 25 मिनट के फेसबुक लाइव में चंद्रशेखर आजाद का जज्बा साफ दिखा। उन्होंने कहा कि मेरे आंदोलन के कुछ लोगों की दीवारें हिलेंगी। लेकिन मैं उनकी गोलियों से डरकर नहीं रुकूंगा। मैं चंद्रशेखर आजाद हूं। मैं आजाद पैदा हुआ हूं, आजाद जीयूंगा और आजाद मरूंगा।

अपने ऊपर चली गोली को चंद्रशेखर ने एक संदेश बताया। तमाम नेताओं का जिक्र किया और कहा कि मुझे डर नहीं है। इसके बाद आजाद समाज पार्टी के अध्यक्ष चंद्रशेखर आजाद मुद्दे पर आएं, और समाज से सम्मान को बचाने की अपील कर डाली। चंद्रशेखर ने कहा कि बहुजन समाज को लगातार लूटा गया है। उन्होंने ऐलान किया कि यह लड़ाई कमेरा बनाम लुटेरा की है।

अपने संबोधन में भीम आर्मी प्रमुख ने मनुवादियों पर जमकर निशाना साधा और उन्हें सीधी चुनौती दी। उन्होंने कहा कि वो मेरे खून से होली खेलना चाहते हैं। लेकिन मैं उनका पहला शिकार हो सकता हूं, आखिरी नहीं। चंद्रशेखर ने कहा कि यह मूंछ की लड़ाई है। और आपका भाई, आपका खून, आपका इंतजार करेगा।

अब देखना होगा कि भीम आर्मी चीफ और आजाद समाज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष चंद्रशेखर आजाद की इस अपील का क्या असर होगा। हालांकि यहां एक बात और ध्यान देने वाली है। चंद्रशेखर आजाद समर्थकों और समाज के लोगों का आवाह्न अपनी पार्टी के बैनर तले नहीं कर रहे, बल्कि भीम आर्मी की स्थापना दिवस पर बुला रहे हैं। तो क्या राजनीतिक गोलबंदी से इतर मनुवादियों के अत्याचार से लड़ने के लिए बनी भीम आर्मी के बैनर तले समर्थकों का आवाह्न कर चंद्रशेखर अपने ऊपर हमला करने वालों को मुंहतोड़ जवाब देना चाहते हैं? और इसी बहाने अपनी राजनीतिक ताकत भी दिखाना चाहते हैं।

चंद्रशेखर की इस अपील का कितना असर होगा, और उसका चंद्रशेखर आजाद सहित दलितों की राजनीति पर क्या असर होगा, यह तो 21 जुलाई को जुटने वाली समर्थकों की भीड़ से ही तय हो पाएगा।

राष्ट्रपति ने उच्च शिक्षण संस्थानों से एससी-एसटी के ड्रॉप आउट का मुद्दा उठाया

उच्च शिक्षा के जरिये ही युवा प्रतिकुल परिस्थितियों के कुचक्र से बाहर आ सकते हैं। उच्च शिक्षा में विद्यार्थियों को सुरक्षित और संवेदनशील वातावरण मिले। शिक्षकों और संस्थानों के प्रमुखों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि विद्यार्थी तनाव मुक्त होकर अध्ययन का आनंद ले सकें।

यह बातें भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने कही है। पिछले दिनों जजों के सामने जेलों में बंद एसटी-एसटी के लोगों के लिए आवाज उठा चुकी भारत की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू नेअब देश के विभिन्न टॉप विश्वविद्यालयों से एससी-एसटी के विद्यार्थियों के ड्रॉप आउट का मुद्दा उठाया है। अपने वक्तव्य में ओडिसा के छोटे से गांव से निकल कर शहर जाकर अध्ययन शिक्षा ग्रहण करने के अनुभव को साझा किया।

केंद्र सरकार द्वारा वर्ष 2019 में, दो वर्षों के आंकड़ों के आधार पर एक विश्लेषण किया गया था। जिसमें यह बात सामने आई है कि इस दौरान लगभग 2500 विद्यार्थियों ने IITs में अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी थी। उन विद्यार्थियों में लगभग आधे विद्यार्थी आरक्षित वर्गों से आए थे। आप खुद सुनिये राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने क्या कहा-

पसमांदा मुसलमान ही तो भाजपा का मारा है

भारतीय जनता पार्टी पसमांदा की राजनीति खुलकर कर रही है। वह सिद्धांत वह नारा कि भाजपा किसी जाति और मजहब के आधार पर राजनीति नहीं करती, कहां चला गया? भाजपा करती  है लेकिन  मानती भी नहीं या कोई जवाब भी  नहीं देती। विपक्ष जब तक जवाब माँगे तब तक कोई नया मुद्दा पैदा हो जाता है – जैसे समान नागरिक संहिता के कारण बेरोजगारी और महंगाई को लोग भूल जाएँगे । दूसरे दल तो स्पष्टीकरण भी देते फिरते हैं। उत्तर प्रदेश के हाल के स्थानीय चुनावों  में भाजपा को मुस्लिम बाहुल्य इलाके में कुछ सफलता मिली है, उससे उत्साहित होकर  पसमांदा मुसलमानों की बात कर रही है। कुल 395 मुस्लिम उम्मीदवारों को भी टिकट दिया था। जिसमें से 61 प्रत्याशियों ने जीत दर्ज की है। इस तरह से 15% ने सफलता प्राप्त किया है। क्या वही लोकसभा के चुनावों में भी होगा, यह जरूरी नहीं है। अब  यह देखना होगा कि पसमांदा मुस्लिम को कौन ज्यादा क्षति पहुंचा रहा है। पसमांदा मुसलमान की सामाजिक और बौद्धिक पूंजी नहीं के बराबर है  जैसे हिंदुओं में दलितों और पिछड़ों की है। सवर्ण मुसलमान की बौद्धिक और सामाजिक पूंजी सवर्ण हिंदू जैसी है। इनके पिछड़ने का मूल कारण यही है। इन्हें वे सरकारी लाभ न मिल सके जो दलितों- आदिवासियों को मिले।

        मॉब लिंचिंग किसकी होती है। पसमांदा मुसलमान ही पशु का व्यापार करता है और गौ रक्षक का प्रकोप इन्हीं पर तो पड़ता है। कथित सवर्ण मुसलमान  अगर बीफ के कारोबार में हैं तो वे शहरों में थोक विक्रेता हैं, जहां कोई असुरक्षा की स्थिति नहीं होती।  अशरफ़ मुसलमान  स्लॉटर हाउस के मालिक मिल जाएंगे। बड़े स्लाटर हाउस वैश्य समाज के नियंत्रण में हैं। ये पसमांदा मुस्लिम हैं जिन्हें गांव–गांव और गली–कूचे में जाना पड़ता है और पशुओं को जमा करके गाड़ियों में लाद कर बेचते हैं। रास्ते में अगर गौरक्षक के हत्थे चढ़े तो उनके प्रकोप का शिकार बन जाते हैं। फर्जी  पुलिस केस दर्ज होता है और उगाही तथा लाठी-डंडे के शिकार होते ही हैं ।

                  अगर  पसमांदा मुसलमानों से बीजेपी को प्यार है तो पिछले वर्ष उत्तर प्रदेश  के विधानसभा चुनावों में एक भी मुसलमान को  टिकट क्यों नहीं दिया? आबादी के अनुसार देखा जाए तो करीब 60 टिकट देना चाहिए था। क्या इसका कोई जवाब है? 2019 के  लोकसभा के चुनावों में  भी एक भी मुसलमान को टिकट नहीं दिया। इसके अतिरिक्त सशक्तिकरण के तमाम और आयाम हैं, वहां भी तो कुछ नहीं किया। कितने चीफ सेक्रेटरी, डीजी पुलिस, बोर्ड के चैयरमैन और अन्य कल्याणकारी पदों जैसे  प्रोफेसर,  कुलपति, सलाहकार आदि पर तैनात किया?  ऐसी बात नहीं है कि योग्य उम्मीदवारों की कमी हो। यही स्थिति दलितों और पिछड़ों की भी है। करीब 1000 यूनिवर्सिटी हैं उसमें  से कुछ में तो इन्हें वीसी बनाया जा सकता है।

बीजेपी के नेता खुले आम मुसलमानों के आर्थिक बहिष्कार की बात करते हैं और कौन अधिक प्रभावित होता है सिवाय पसमांदा के। चूड़ी बेचने वाले कौन है? ठेले पर सब्जी कौन बेचते  हैं? इनके साथ मार–पीट भी होती है। बीजेपी के कुछ सक्रिय कार्यकर्ताओं ने सार्वजनिक आवाहन किया कि इनसे सब्जी मत खरीदो और सारे आर्थिक संबंध  खत्म कर दो। इससे पसमांदा ही अधिक प्रभावित होता है।

2014 के बाद से बहुत सारे अधिकार और सुविधाएं खत्म की जा चुकी हैं। मौलाना आजाद स्कॉलरशिप उच्च शिक्षा के लिए मिलती थी , उसे  सामाजिक न्याय  एवं अधिकारिता मंत्रालय ने खत्म कर दिया। जहां-जहां निजीकरण हुआ वहां पसमांदा मुसलमानों और दलितों-पिछड़ों को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। नफरत इतनी बढ़ गई है कि मुसलमान, जो मिली–जुली आबादी में रहते थे, बेचकर अपने समुदाय में जा बसे। 2014 के बाद से भारत में तेजी से मिली–जुली आबादी में फासला बढ़ गया और लगातार बढ़ता ही जा रहा है। सवर्ण मुसलमान मिली–जुली अमीर बस्ती में आराम से रह रहे हैं। जिस बकरे को काटना होता है उसको खिला कर मोटा ताजा किया जाता है। सत्ता हासिल करने के लिए अब 9 वर्ष बाद पसमांदा मुसलमान याद आ रहे हैं। मुसलमानों में ऊंच-नीच और पिछड़ा और सवर्ण पाया जाता है । जिस देश का प्रमुख रीति–रिवाज जैसा होता है उसका असर अल्पसंख्यक पर भी पड़ता है। इस्लाम में जाति नहीं है लेकिन भारत के मुसलमान हिंदू समाज से प्रभावित हैं या यूं कहा जाए कि ये धर्मांतरित हुए हैं। मान लेते हैं बीजेपी को इनसे मुहब्बत हो भी गई है तो अभी क्या बिगड़ा है। तो फिर शुरू कर दें इनका उत्थान। लाखों पद सरकार में खाली हैं इनको मौका दें सेवा करने का । राज्य सभा और विधान परिषद में भेजें। विधान सभा और लोक सभा के चुनावों में टिकट दिया जाए। मंत्रि–परिषद में शामिल किया जाए। संविधान की धारा 341 में इन्हें शामिल किया जाए ताकि आरक्षण का लाभ मिल सके । इस तरह से तमाम अवसर हैं जहां इनको भागीदारी दी जा सकती है। बोलने से नहीं बल्कि करने से ही इनका सशक्तिकरण हो सकेगा।

बाबासाहेब के चरणों में: डॉ. अम्बेडकर से मुलाकात

मेरे पिता को अखबार पढ़ने का बहुत शौक था. जब 43-44 साल की छोटी सी उम्र में ही उनकी आंखों की रोशनी कम होने लगी तो मुझे रोजाना शाम को उनके लिए एक पेपर पढ़ना पड़ता था। जब उनकी मृत्यु हुई तब मैं लगभग सोलह वर्ष का था। जब वे बहुत छोटे थे तब वे डॉ. अम्बेडकर के बारे में बहुत प्यार से बात करते थे, जिसे हमारे सर्कल में कई लोग ‘उम्मीदकर’ कहकर पुकारते थे। वे महाराष्ट्रीयन नामों की रचना और उत्पत्ति के बारे में बहुत कम जानते थे। लेकिन हमारे लिए ‘उम्मीदकर’ का मतलब गलत उच्चारण वाले नाम से कहीं अधिक था। इसका मतलब था “आशा का अग्रदूत’ – ‘उम्मीद लाने वाला’। मेरे पिता की मृत्यु के लगभग दो महीने बाद डॉ. अंबेडकर, तत्कालीन वाइसराय कार्यकारी परिषद में लेबर सदस्य, कुछ आधिकारिक काम के सिलसिले में शिमला आए। कई लोगों ने उनसे उनके आधिकारिक आवास पर मुलाकात की।  मैं भी उनमें से एक था। रंगून के कार्यकारी अभियंता श्री रंगास्वामी लिंगासन के साथ, जो केंद्रीय लोक निर्माण विभाग के तहत अस्थायी रूप से कार्यरत थे, मैंने डॉ. अंबेडकर से मुलाकात की। श्री लिंगासन ने मुझे अंदर ले जाना पसंद नहीं किया क्योंकि वह डर रहे थे कि कहीं डॉक्टर साहब नाराज न हो जाएं। मैं उस बंगले के बाहर बैठ गया, जिसे रात भर सफेदी करके सुसज्जित किया गया था। डॉ. अंबेडकर के निजी सहायक के रूप में काम करने वाले एक युवा श्री बार्कर ने मुझे कुछ समय इंतजार करने के लिए कहा। श्री मैसी, वैयक्तिक सहायक, बहुत खुश नहीं थे लेकिन उन्होंने अनुमति देने से सीधे इनकार नहीं किया। इन सज्जनों में से श्री लिंगसन की मद्रास में कार्यकारी अभियंता के रूप में तैनाती के दौरान अकाल मृत्यु हो गई। बोर्कर की हवाई दुर्घटना में मृत्यु हो गई। श्री मैसी सेवानिवृत्त होकर करनाल में रहते हैं।

मैं सी.पी.डब्ल्यू.डी. में कार्यरत था। और श्रम विभाग के अंतर्गत स्थानांतरित होने का इच्छुक था। मैं बंगले के बाहर सात घंटे तक बैठकर इंतजार करता रहा और फिर देर शाम मिस्टर बार्कर ने मुझे अंदर बुलाया। वह हमारे समुदाय के सबसे महान व्यक्ति, हमारे नेता, हमारे गुरु और मार्गदर्शक के साथ मेरी पहली मुलाकात थी। मैंने कुछ मिनटों तक बात की और उन्होंने मुझसे मेरे माता-पिता और शिक्षा के बारे में पूछा और मैं तब क्या कर रहा था। वह खान बहादुर मुश्ताक अहमद गुरमानी के घर जाने के लिए तैयार हो रहे थे जहां उन्हें रात के खाने के लिए आमंत्रित किया गया था। यह एक संक्षिप्त साक्षात्कार था लेकिन ‘नेता’, ‘उम्मीदकर’ से मिलकर मेरी खुशी की कोई सीमा नहीं थी। अगर मेरे पिता जीवित होते तो मैं रात भर अपनी यात्रा के बारे में बात करता रहता। लेकिन उन्हें मरे हुए डेढ़ महीने से ज्यादा हो गया था। इस छोटे से साक्षात्कार में देखने और समझने के अलावा सीखने को कुछ नहीं था।

फिर, मैं 1945 में बर्मा मोर्चे से लौटने के बाद बंबई में उनसे मिला, जहां मैंने आर.ए.एफ. के साथ एक राडार इकाई पर काम किया था। मैं अन्य लोगों, अधिकतर राजनीतिक नेताओं के साथ उनसे मिलने जाता रहा था, लेकिन अपना मुंह बंद और कान खुले रखता था। आख़िरकार, 1953 में श्री शिव दयाल सिंह चौरसिया मुझे डॉ. अंबेडकर के पास ले गए। श्री चौरसिया ने मेरा परिचय एक ऐसे युवा व्यक्ति के रूप में कराया जो पढ़ने का बहुत शौकीन था और हमारी समस्याओं के प्रति एक गंभीर छात्र था। दयालु और साहसी शब्द लेकिन वे एक बौद्धिक दिग्गज को कैसे प्रभावित कर सकते थे। वह ऊँचे पैरों वाली कुर्सी पर, जो `26 अलीपुर रोड’ की एक विशेषता है, सिकुड़कर बैठे हुए, अपने हाथ में कुछ नोट कर रहे थे। वह अपनी कलम से नोट्स लेना पसंद करते थे और ऐसा करने में उन्हें आनंद आता था। उन्होंने ऐसा आभास दिया कि उन्हें हमारा आना पसंद नहीं आया और उन्होंने युवा पीढ़ी को डांटना शुरू कर दिया।

‘देखिए, मैं यहां लगातार तेरह घंटे काम करता हूं। आजकल के युवा अपना समय बेतहाशा खिताब की होड़ में बर्बाद करते हैं। इसके बाद हिंदी में नवयुवकों के विरुद्ध कटाक्ष किया गया। `कोना में खड़ा  हो कर  बीड़ी पीता है। शाम को छोकरी को बाजू में ले कर सिनेमा जाता है।”उसमें एक बिंदु और एक अकाट्य आरोप था। हमारी उम्र के कई युवा किसी और के श्रम का फल भोगने के अलावा कुछ नहीं करते। श्री चौरसिया ने उस असहमति नोट के बारे में कुछ बताया जो उन्होंने पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट पर लिखने का प्रस्ताव रखा था। उन्होंने श्री चौरसिया को डांटा, “मैं आपके अध्यक्ष काका कालेलकर को जानता हूं। मैं जानता हूं कि आप लोग क्या करने में सक्षम हैं…”

एक बार फिर, हम आयोग की इस रिपोर्ट पर चर्चा करने के लिए मिले, और बातचीत किसी अन्य विषय पर चली गई, जिसका सीधा संबंध पिछड़ा वर्ग आयोग से नहीं था।

यह हमारे रिश्ते के एक नए चरण की शुरुआत थी।’ मैं अक्सर उनसे मिलने जाता था, अपनी सेवाएँ देता था और उन समस्याओं पर चर्चा करने का अवसर चुराता था जो मेरे मन को परेशान करती थीं।

  मैं पुरातत्व पर एक किताब पढ़ रहा था। उन्होंने अपनी रुचि दिखाई और मेरे हाथ से पुस्तक छीनते हुए मुझसे प्रश्न किया, “आप पुरातत्व का अध्ययन क्यों कर रहे हैं?”

‘मानवविज्ञान और समाजशास्त्र को बेहतर ढंग से समझने के लिए’, मैंने उत्तर दिया। “मैंने पुरातत्व नहीं पढ़ा”, उन्होंने हस्तक्षेप किया। ‘सच है सर, लेकिन मुझे मानवविज्ञान और समाजशास्त्र पर किसी भी किताब के पहले तीन अध्यायों को समझने में कुछ कठिनाई महसूस होती है। इसके अलावा, सर, मुझे किसी शिक्षक के मार्गदर्शन में इन विषयों का अध्ययन करने का अवसर नहीं मिला है। इसके साथ ही किताब ख़त्म हो गयी और वह अपने आप में खो गए। कोई पांच दिन बाद उसने वह किताब लौटा दी।

मैंने हिम्मत जुटाकर उनकी लाइब्रेरी में झाँकने की इजाज़त माँगी। उन्होंने मुझसे पहले ही कहा था कि पुस्तकों को विषयानुसार व्यवस्थित करके इस प्रकार व्यवस्थित करूँ कि उन्हें आवश्यक पुस्तकों की खोज में अधिक समय न लगाना पड़े। इस पुस्तकालय में विविध विषयों पर 14000 पुस्तकें थीं। लेकिन साथ ही उन्हें ये भी पसंद नहीं था कि कोई उनकी लाइब्रेरी में ताक-झांक करे। उन्होंने कहा, ”मेरी पत्नी मेरी किताबों को लेकर बहुत संजीदा है।” वह ईर्ष्यापूर्वक अपनी पुस्तकों की रक्षा करते थे। वह उधार ले सकते थे और उधार लेते भी थे लेकिन उधार देने को तैयार नहीं थे। मैं पुस्तकों के प्रति उनके प्रेम को जानता था और यह भी कि दिल्ली में पुस्तकालयों को बाबा साहेब से पुस्तकें वापस लेने में कितनी कठिनाई होती थी। मुझे आसानी से रोका नहीं जा सकता था, इसलिए उन्होंने एक कहानी सुनाना शुरू किया। “देखो, मैं तुम्हें एक कहानी सुनाता हूँ। एक पादरी था जो बच्चों के लिए संडे स्कूल चलाता था। प्रार्थना सभा समाप्त होने के बाद, उसने इन बच्चों को चाय और नाश्ते के साथ मनोरंजन किया। एक दिन उनमें से एक बच्चा चुपचाप खाने की मेज से गायब हो गया। बिशप इस बच्चे की तलाश में गया और उसे बिशप की किताबों वाली अलमारी के पास खड़ा पाया। भूख और प्यार से, वह एक चित्र वाली किताब में से झाँक रहा था। बिशप को अपने पीछे खड़ा देखकर, बच्चे ने अपना सिर घुमाया और पूछा, “क्या यह आपकी किताब है? “हाँ, मेरे बेटे” बिशप ने उत्तर दिया। “क्या मैं इसे उधार ले सकता हूँ? बिशप ने बच्चे से किताब छीन ली, वापस अलमारी में रख दी और जल्दी से दरवाज़ा बंद कर दिया। ‘यह पुस्तकालय इसी तरह बनाया गया है मेरे बेटे,” उन्होंने कहा और बच्चे को वापस खाने की मेज पर ले गए।  हम हँसते-हँसते हँसते रहे और अनुरोध हँसी में डूब गया।”

भगवान दास

बहनजी की इस नई चाल से चंद्रशेखर को झटका!

भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर आजाद पर हमले के बाद उनसे मिलने वालों का जिस तरह तांता लगा रहा, उससे बसपा चौकन्नी हो गई है। युवा चेहरे के रूप में जिस तरह चंद्रशेखर आजाद को दलितों के बीच स्वीकारा जा रहा है, उसने बसपा पर एक मजबूत युवा चेहरे को सामने लाने का दबाव बना दिया है। शायद यही वजह है कि इस बार महीनों बाद बहुजन समाज पार्टी की बैठक दिल्ली में हुई। और नजारा भी बदला सा रहा।

आम तौर पर बैठक के दौरान बसपा सुप्रीमों मायावती ऊपर कुर्सी पर बैठती हैं, जबकि अन्य नेता सामने कुर्सी पर बैठते हैं। लेकिन इस बार बहनजी के साथ मंच पर नेशनल को-आर्डिनेटर आकाश आनंद और उनके पिता आनंद कुमार भी बैठे। आकाश को बसपा सुप्रीमों ने हाल ही में चार चुनावी राज्यो की जिम्मेदारी भी दी है। यानी कि अब तक बहनजी तमाम जिम्मेदारियां देकर आकाश आनंद के कद को धीरे-धीरे बढ़ाती रही हैं, लेकिन पहली बार आकाश को अपने बगल में बैठाकर बहनजी ने साफ कर दिया है कि पार्टी में नंबर दो आकाश ही होंगे।

तो साथ ही चंद्रशेखर के काट के रूप में युवा चेहरे के तौर पर आकाश को सामने खड़ा कर भी बहनजी ने दलित समाज को संदेश देने की कोशिश की है। हालांकि आकाश आनंद के सामने चंद्रशेखर के रूप में एक मजबूत चुनौती है। क्योंकि चंद्रशेखर आजाद ने जहां अपने संघर्ष के बूते अपनी पार्टी बनाई है, तो वहीं आकाश को अपने बुआ की विरासत मिल रही है। ऐसे में आकाश आनंद के सामने खुद को साबित करने की चुनौती बनी हुई है। देखना होगा कि जब दोनों चुनाव में जनता के बीच जाते हैं तो जनता किसे अपना नेता चुनती है। क्योंकि कोई चाहे किसे भी उत्तराधिकारी घोषित कर दे, लोकतंत्र में नेता तो जनता ही चुनती है।

कांशीराम की राह पर आर. एस प्रवीण

कांशीराम के एक वोट एक नोट की तरकीब को कौन नहीं जानता। अपने इसी आईडिया से उन्होंने भारतीय राजनीति की काया पलट कर दी थी। कांशीराम की इसी तरकीब को अपनाया है आईपीएस की नौकरी छोड़कर बहुजन समाज पार्टी तेलंगाना की बागडोर संभालने वाले आर. एस. प्रवीण ने। तेलंगाना में चुनाव नजदीक है और आर. एस. प्रवीण ने कुमुरामभीम- आसिफाबाद क्षेत्र के सिरपुर निर्वाचन क्षेत्र से अगला विधानसभा चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी है। चुनाव लड़ने की घोषणा और क्षेत्र के चुनाव के बाद अब आर.एस. प्रवीण लोगों से एक नोट- एक वोट की अपील कर रहे हैं।

 दरअसल तेलंगाना चुनाव में बहुजन समाज पार्टी सबको जोरदार टक्कर दे रही है। चाहे सत्ता में बैठे हुए के. चंद्रशेखर राव हों, कांग्रेस हो या फिर भाजपा, सभी के लिए बसपा मजबूत चुनौती पेश कर रही है। खास तौर पर जब से बहुजन समाज पार्टी ने प्रदेश में पार्टी की कमान पूर्व आईपीएस अधिकारी आर.एस.प्रवीण को दी है, तब से बसपा तेजी से मजबूत हुई है।

इससे डरे केसीआर ने दलितों के लिए पहले दलित बंधु योजना की घोषणा की, फिर चुनाव से पहले 125 फीट की बाबासाहेब डॉ. अंबेडकर की प्रतिमा का अनावरण कर दिया। हालांकि आर.एस प्रवीण इसे महज चुनावी स्टंट मानते हैं और दलितों-बहुजनों के अधिकारों की बात कर रहे हैं। आर.एस. प्रवीण ने बहुजनों के अधिकार की बात करते हुए बहुजन राज्याधिकार यात्रा निकाली। जिसके तहत वह गांव-गांव में घूम रहे हैं और बहुजन समाज को सत्ता हासिल करने के लिए कह रहे हैं। बहुजन समाज पार्टी अब तक कई बड़ी रैलियां भी कर चुकी है और उसमें जुट रही भीड़ ने सबको चौंका दिया है।

यही वजह है कि मुख्यमंत्री के.सी.आर तमाम योजनाओं के जरिए दलितों को आर्थिक लाभ देने की बात कर रहे हैं। के.सी.आर का कहना है कि दलित इंपावरमेंट स्कीम के तहत प्रदेश के सभी 11,900 परिवारों को दस-दस लाख रुपये देने की घोषणा की है। जबकि आर.एस. प्रवीण इसे चुनावी स्टंट बता चुके हैं। उनका आरोप है कि केसीआर अपने कुछ दलित कार्यकर्ताओं को इस योजना का लाभ देकर बाकी को बाद में योजना का लाभ देने का लालच दे रहे हैं। लेकिन चुनाव बाद क्या होता है, सबको पता है।

जहां तक तेलंगाना में दलितों की बात है तो सरकारी रिकार्ड के मुताबिक तेलंगाना में दलित समाज के 7 लाख 79 हजार 902 लोग खेती करते हैं। जिनके पास 13 लाख 58 हजार एकड़ खेती की जमीन है। तो वहीं प्रदेश में दलित समाज का तकरीबन 17 प्रतिशत वोट है। बहुजन राज्याधिकार यात्रा के जरिये बसपा तेजी से लोगों के बीच पहुंच रही है। तो वहीं इसमें एससी-एसटी सोशल वेलफेयर स्कूल के सेक्रेटी रहने के दौरान आर. एस. प्रवीण ने जिन लाखों बच्चों की जिंदगी बदली थी, उनका और उनके परिवार का समर्थन भी उन्हें मिल रहा है। कुछ मिलाकर तेलंगाना चुनाव में बहुजन समाज पार्टी अपनी मजबूत उपस्थिति से सबको चौंका सकती है।

मुसलमानों और क्रिश्चिन को एससी में शामिल करने के मुद्दे को चार प्वाइंट में समझिये

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मुसलमानों और ईसाइयों को एससी लिस्ट में लाने का सबसे बड़ा तर्क ये दिया जाता है कि सिखों (1956)और बौद्धों (1990) को बाद में इसमें लाया गया तो मुसलमानों और ईसाइयों को क्यों नहीं?

फैक्ट 1. सिख हमेशा से एससी लिस्ट में हैं। 1950 का ऑर्डर पढ़िए। साफ़ लिखा है कि सिखों में SC होंगे। ये झूठ दरअसल सबसे पहले कांग्रेसी सांसद और सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड चीफ़ जस्टिस रंगनाथ मिश्रा ने अपनी रिपोर्ट से फैलाया।

वह इंटरनेट और RTI से पहले का ज़माना था। साहब झूठ बोलकर निकल लिए। 1950 का ऑर्डर आम लोगों को उपलब्ध कहाँ होता? तो ये झूठ चल गया कि सिखों को 1956 में SC का दर्जा मिला। अब 1950 का ऑर्डर दर्जनों सरकारी वेबसाइट पर है। लाखों लोग पढ़ रहे हैं। मिश्रा का झूठ पकड़ा गया। सिखों के लिए 1950 के ऑर्डर में संशोधन नहीं हुआ है। वे 1950 से एससी में हैं।

2. भारतीय संविधान हिंदुओं की एक व्यापक परिभाषा देता है। अनुच्छेद 25 में इसे स्पष्ट किया गया है और हिंदुओं में सिख, जैन और बौद्धों को शामिल किया गया है। इसलिए हिंदुओं के प्रावधान उन पर लागू हैं। मुश्किल ये है कि लोग संविधान तक पलटकर नहीं देखना चाहते।

3. बौद्धों को एससी में शामिल नहीं किया गया है। नव बौद्धों को किया गया है। 1950 के ऑर्डर के समय से ये SC ही थे। 1990 का ऑर्डर निरंतरता में है।

4. मुसलमानों या ईसाइयों को SC में लाना 1950 के ऑर्डर का ही नहीं, अनुच्छेद 25 और संविधान सभा तथा पूना पैक्ट में बनी सहमति का भी उल्लंघन होगा।

दिलीप मंडल के ट्विटर पोस्ट से साभार

Punjabi play, Lacchu Kabadia, stimulates minds to overcome caste based discrimination By Chetna Association of Canada

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Chetna Association of Canada is pleased to announce its plans for hosting a Punjabi play, “Lacchu Kabadia”, on Sunday, July 23, at the North Delta Secondary School. The play is written, directed, and acted by a prominent visiting artist from Punjab, Dr. Sahib Singh.

According to Dr. Singh, “The play is being well received by the audience. It serves as an educational tool to reassess the impact of the age-old caste system on the Indian Subcontinent, and more recently, across the globe. Everyone can relate to the topic of the play regardless of their position in the caste hierarchy”, says Dr. Singh.

“It also inspires people negatively impacted by the caste system to rise, be empowered, and break the shackles of the caste system and live a life of dignity”, continued Dr. Singh.

Dr. Singh has written, directed, and performed in many plays and short films. Naam Likhari Nanaka, Samey di Daang, and Gurpurab are just a few of the creations of Dr. Singh.

In 2020, Dr. Sahib Singh was bestowed with the Shiromani Punjabi Natak Award, the highest award in this category, by the Punjabi Languages Department (Punjab, India).

Issue of caste has recently come into public domain in North America when the City of Seattle passed in February 2023 ordinance to ban cast based oppression in public services. Similar motion was also passed in the State of California by the Senate. In Canada, Toronto District School Board, City of Burnaby, and City of Brampton have also motions on this topic. Discussions with the BC government are also in process to take measures on addressing caste related discrimination in the province.

Free admission is available with complimentary passes. Visit:- www.chetna.ca  

 

अंबेडकरी आंदोलन के सजग प्रहरी और भीम पत्रिका के संपादक एल. आर. बाली का निधन

 अंबेडकरी आंदोलन के सजग प्रहरी और मासिक पत्र भीम पत्रिका, जालंधर के संपादक एवं लेखक एल.आर. बाली का छह जुलाई को दोपहर एक बजे निधन हो गया। आने वाले 20 जुलाई को वह 94 साल के होने वाले थे। इस उम्र में भी एल आर बाली बिल्कुल स्वस्थ और सक्रिय थे। उनके करीबियों ने बताया कि दोपहर एक बजे उन्होंने खाना खाया। इसके बाद उन्होंने तबियत खराब होने की बात कही, जिसके बाद उनके करीबी और रिश्तेदार उन्हें अस्पताल लेकर गए, जहां डॉक्टर ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। एल. आर बाली की जीवन काफी संघर्ष भरा रहा और अंबेडकरी आंदोलन के लिए उन्होंने काफी काम किया। वह बाबासाहेब के संपर्क में लगभग 6 सालों तक रहे। अंबेडकर वांग्मय प्रकाशिक करवाने में भी उनकी बड़ी भूमिका रही।  बाबासाहेब द्वारा लिखे साहित्य को हिन्दी और पंजाबी पाठकों के लिए मुहैया कराने में भी उनकी बड़ी भूमिका रही। उन्होंने दर्जन भर से ज्यादा पुस्तकें लिखी थी। एल. आर. बाली ने रंगीला गांधी नाम की किताब लिखी थी, जिसको लेकर काफी विवाद हुआ था। वह अपनी आखिरी सांस तक भीम पत्रिका नाम से पत्र प्रकाशित करते रहें।

दलित दस्तक के संपादक अशोक दास ने पिछले साल सितंबर महीने में उनसे मुलाकात कर उनका इंटरव्यू लिया था।

आदिवासी युवक पर पेशाब करने वाला भाजपा कार्यकर्ता गिरफ्तार

pravesh-shukla-arrested-sidhiभाजपा के शासन वाले मध्य प्रदेश के सीधी जिले में आदिवासी पर पेशाब करने वाले भाजपा कार्यकर्ता प्रवेश शुक्ला को मंगलवार देर रात गिरफ्तार कर लिया गया। इस पर नशे की हालत में युवक पर पेशाब करने का आरोप है। मंगलवार को इसका एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था। कुबरी बाजार का यह वीडियो 10 दिन पुराना बताया जा रहा है। आरोपी भी सीधी जिले से 20 किलोमीटर दूर कुबरी गांव का ही रहने वाला है। इस विवाद होने के बाद पुलिस बहरी थाने की एक टीम प्रवेश को ढूंढ़ रही थी।

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने आरोपी पर एनएसए लगाने की घोषणा पहले ही कर रखी थी और युवक की गिरफ्तारी के बाद उस पर एनएसए लगा दिया गया है। सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल होने के बाद भाजपा के तमाम नेता घटना की निंदा भी कर रहे हैं। लेकिन भाजपा के नेता आरोपी प्रवेश शुक्ला से पल्ला झाड़ रहे हैं। कहा जा रहा है कि प्रवेश शुक्ला सीधी जिले से विधायक केदारनाथ शुक्ला का प्रतिनिधि रह चुका है। वहीं दूसरी ओर भाजपा की चुप्पी और प्रवेश शुक्ला से पल्ला झाड़ने के बाद कांग्रेस पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अरुण यादव ने भाजपा द्वारा जारी एक पत्र को ट्विटर पर शेयर किया है, जिसमें साफ दिख रहा है कि प्रवेश शुक्ला भाजपा के युवा मोर्चा में मंडल उपाध्यक्ष है।

इस मामले पर उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री और बसपा सुप्रीमो मायावती ने ट्वीट कर आरोपी की संपत्ति जब्त करने की मांग की है। उन्होंने ट्विट में कहा, “एक आदिवासी/दलित युवक पर स्थानीय दबंग नेता के पेशाब करने की घटना अति शर्मनाक है। इस अमानवीय कृत्य की जितनी भी निंदा की जाए कम है। इसका वीडियो वायरल होने के बाद ही सरकार का जागना इनकी संलिप्तता को साबित करता है। यह भी अति-दुःखद। मुजरिम को बचाने व उसे अपनी पार्टी का न बताने आदि को त्याग कर अपराधी के खिलाफ केवल एनएसए नहीं, बल्कि उसकी संपत्ति जब्त/ध्वस्त करने की कार्रवाई करनी चाहिए।”

इस मामले में अब आरोपी के परिवार वाले मामले की लीपा-पोती में जुट गए हैं। आदिवासी युवक पर भी दबाव की बात सामने आई है। पीड़ित युवक ने तीन जुलाई को शपथ पत्र लिखकर फर्जी वीडियो को वायरल करने की बात कही है। हालांकि सवाल उठता है कि जब युवक की मानसिक हालत ठीक नहीं है, जैसा कि कई मीडिया रिपोर्ट में दावा किया जा रहा है, और जो युवक घटना का पुरजोर विरोध भी नहीं कर पाया, ऐसे में वह शपथ पत्र कैसे दाखिल कर सकता है? और वैसे भी… तस्वीरें झूठ नहीं बोला करती।

डा. तुलसीराम : कुछ यादें

21 जनवरी 1996 को साउथ एवेन्यु, दिल्ली में विमल थोरात की पीएचडी पुस्तक ‘मराठी दलित और साठोत्तरी हिन्दी कविता में सामाजिक और राजनीतिक चेतना’ के लोकार्पण-कार्यक्रम में मैंने पहली दफा डा. तुलसीराम को देखा और सुना था। चेचक के दागों से भरा उनका श्याम चेहरा देखकर मेरे जहन में जिगर मुरादाबादी और ओमपुरी का अक्स घूम गया था। प्रकृति ने दोनों को ही आकर्षक चेहरे नहीं दिए, पर एक में शे़र कहने की अगाध प्रतिभा थी, जिसने उन्हें महानतम शाइर बनाया, तो दूसरा एक बेहतरीन कलाकार के रूप में आज प्रसिद्ध है। तुलसीराम जी ने जब मंच पर अपने विचार रखे, तो उनके अगाध ज्ञान-भण्डार ने मुझे बहुत प्रभावित किया। उनका अद्वितीय सौंदर्य-बोध था। उन्होंने जिस बौद्ध-दृष्टि से दलित साहित्य की इतिहास-परम्परा को वहॉं रखा था, वह अद्भुत था। उसमें जातीय दृष्टि नहीं थी, बल्कि जाति-विरोध की चेतना पर जोर था। उनकी दृष्टि में दलित साहित्य का व्यापक दायरा था, जिसमें गैर-दलित भी दलित साहित्य लिख सकता था, अगर उसका लेखन वर्णव्यवस्था और जातिप्रथा के विरोध में है। उनके अनुसार दलित साहित्य की धारा का उद्गम बौद्ध साहित्य है। उन्होंने बौद्ध कवि अश्वघोष को जाति-विरोधी धारा का पहला कवि माना था, जिनकी कृति ‘वज्रसूची’ में वर्ण और जातिव्यवस्था का खण्डन मिलता है। मेरे लिए यह एकदम नया विचार था और काबिलेएतराज भी, क्योंकि उसे स्वीकारना मुश्किल था। बहरहाल, उस कार्यक्रम में उन्हें सिर्फ देखने-सुनने का ही अवसर मिला था, उनसे मुलाकात नहीं हो सकी थी। कार्यक्रम के बाद नमस्कार वगैरा की औपचारिकता ही शायद हो सकी थी। फिर भी, उनके व्यक्तित्व ने असर तो छोड़ा ही था।

शायद हम दोनों के बीच यह अपरिचय ही था, जब उन्होंने ‘भारत अश्वघोष’पत्रिका निकाली, तो उन्होंने न मुझे उसमें लिखने को कहा और न उसका कोई अंक मुझे भेजा। लेकिन, उसी दौरान जब मैंने ‘मांझी जनता’ का संपादन आरम्भ किया, तो मैंने उसका हर अंक उन्हें भेजा, बल्कि उसके लिए उनसे लिखने का अनुरोध भी किया था। उन्होंने ‘मांझी जनता’ के प्रकाशन पर अपनी खुशी इन शब्दों में प्रकट की थी—‘मांझी जनता’का हिन्दी प्रकाशन आपके निर्देशन में होगा, यह जानकर खुशी हुई। इस बीच आर्थिक अत्याचार की वजह से ‘अश्वघोष’ पत्रिका बन्द हो चुकी है। ऐसी स्थिति में ‘मांझी जनता’ का हिन्दी संस्करण निश्चित रूप से, दलित चेतना जगाने का महत्वपूर्ण काम करेगा। मुझे खुशी है।‘ (‘मांझी जनता’, 28 मई 2000)

दिल्ली मेरे लिए हमेशा ऐसी नगरी रही है, जहॉं जाने से मैं हमेशा बचता रहा हूँ। यहॉं तक कि कई महत्वपूर्ण सेमिनार भी इसलिए छोड़ देता हूँ कि दिल्ली का नाम सुनते ही हैवत सवार होने लगती है। इसलिए तुलसीराम जी को भी पुनः देखने का अवसर उसके कई साल बाद मिला। संयोग से यह दुबारा अवसर भी विमल थोरात के ही सौजन्य से उन्हीं के एक सेमिनार में मिला। वह सेमिनार शायद इंस्टीट्यूशनल ऐरिया, लोदी रोड स्थित भारतीय सामाजिक संस्थान के भवन में हुआ था। उस समय नागपुर में खैरलांजी-हत्याकाण्ड होकर चुका था। भारतीय लोकतन्त्र को कलंकित करने वाली वह घटना 29 सितम्बर 2006 को हुई थी। यह दीक्षा दिवस से एक दिन पहले की घटना है। मैं उस दिन नागपुर में ही था। दीक्षाभूमि पर नवबौद्धों और दलितों की विशाल भीड़ एकत्र थी, जिसमें अनेक नामी गिरामी दलित लेखक और नेता भी मौजूद थे। वे चाहते तो उस दिन खैरलांजी-कूच कर सकते थे, पर उन्होंने अत्याचार के विरुद्ध आवाज उठाने से ज्यादा धम्मदीक्षा को महत्व दिया। उसके कुछ दिनों बाद कानपुर में डा. आंबेडकर की मूर्ति तोड़े जाने की प्रतिक्रिया इतनी तीव्र हुई कि महाराष्ट्र में कुछ दलित संगठनों ने ट्रेनों पर पत्थराव किए। लेकिन खैरलांजी की घटना के विरुद्ध उनकी उदासीनता समझ से परे थी। इन्हीं कुछ बातों पर मेरा एक लेख किसी अखबार में छपा था, जो तुलसीराम जी की निगाह से भी गुजरा था। उस लेख से वे असहमत और नाराज थे। सेमिनार में भी मैंने सम्भवतः इसी विषय पर कुछ बोलते हुए यह भी कह दिया था कि डा. आंबेडकर ने योरोपियों की ‘आर्यन थियोरी’ का खण्डन किया है। उस वक्त मुझे इस बात का बिल्कुल इल्म नहीं था कि तुलसीराम जी मुझसे जले-भुने बैठे थे और यह कहकर मैंने उनके क्रोध में और घी डाल दिया था। पता तब चला, जब उन्होंने अपने सम्बोधन में मेरा नाम लिए बगैर ‘एक दलित चिन्तक ने लिखा है…….’ कहकर मेरी कटु आलोचना की। जाहिर है कि सेमिनार के बाद मेरा उनसे विवाद होना ही था और यह विवाद तनावपूर्ण हो गया था। कहना न होगा कि इस सेमिनार में मैंने तुलसीराम जी को दूसरी बार देखा था, पर परिचय उनसे मेरा यह पहला ही था, जिसने एक प्रकार से तनाव ही पैदा कर दिया था।

2006 के इस सेमिनार के बाद मुझे याद आता है, एक बार मैं अपने बेटे मोग्गल्लान से मिलने दिल्ली गया था, जो जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में छात्रावास में रहकर पढ़ रहा था। जब मैं जेएनयू गया, तो खयाल आया कि क्यों न तुलसीराम जी से भी मिल लिया जाय। बेटे ने बताया कि वे यहीं दक्षिणापुरम में रहते हैं। मैंने फोन करके उनसे समय लिया। मन में आशंका थी कि उस विवाद के बाद वे शायद ही मिलना चाहें। पर आशंका गलत निकली। वह बोले, ‘इस समय घर पर हूँ, आ जाइए।’ बड़े लोग उच्चता की ग्रंथी नहीं पालते, यह कहाबत उनसे मिलने के बाद सही साबित हुई। वे उन दिनों केरल से अपनी एक ऑंख का आपरेशन कराके लौटे थे, बाकी ठीक-ठाक ही लग रहे थे। हॉं, उनकी पत्नी जरूर बीमार थीं, शायद अर्थराइटिस से पीड़ित थीं। उन्होंने मुझे यथेष्ठ सम्मान दिया। दरअसल मेरी समाजवादी राजनीतिक विचारधारा ने उनके और मेरे बीच की दूरी खत्म की थी। मेरी तरह वे भी कांशीराम और मायावती की राजनीति को पूंजीवाद और ब्राह्मणवाद को मजबूत करने वाली समझते थे। इसलिए लगभग एक घंटे की उस मुलाकात में, जिसमें कोई तीसरा बन्दा शामिल नहीं था, हमारी बातें दलित साहित्य, दलित राजनीति और बौद्धधर्म के साथ-साथ दलितों को गुमराह करने वाले डा. धर्मवीर पर भी हुईं। पर इससे भी बड़ी उपलब्धि उस बातचीत की यह थी कि उन्होंने मुझे रूस में अपने प्रवास के अनुभव सुनाए थे, जो मेरे लिए दुर्लभ थे। यह जानकर मैं बहुत रोमांचित हुआ था कि उन्होंने मास्को में महापंडित राहुल सांकृत्यायन की रूसी पत्नी के पुत्र से मुलाकात की थी। आज मुझे लगता है कि वह पूरी बातचीत रिकार्ड करने लायक थी। डा. धर्मवीर के बारे में उन्होंने कहा था कि यह व्यक्ति दलित लेखकों की जातीय एकता भंग कर देगा। उनकी भविष्यवाणी आज सही साबित हुई। उनके आवास पर यही मेरी पहली और अन्तिम मुलाकात थी। इसके बाद उनसे सेमिनारों में तो मिलना हुआ, पर एक जगह बैठकर वैसी बातचीत फिर कभी नहीं हुई। हॉं, इस मुलाकात के बाद जो संकोच था, वह खत्म हो गया था और कुछ विशेष जानकारी के लिए मैंने उन्हें जब कभी भी फोन किया, उनका सकारात्मक रेस्पांस ही मिला।

29 नवम्बर 2010 को पटना विश्वविद्यालय, पटना में दलित साहित्य की सौन्दर्यशास्त्रीय समस्याओं पर एक राष्ट्रीय सेमिनार में मुझे व्याख्यान देना था। वहॉं पहुंचकर पता चला कि तुलसीराम जी भी आए हुए हैं। यह जानकर बहुत खुशी हुई कि चलो एक बार फिर उन्हें देखने और सुनने का अवसर मिल रहा है। सेमिनार में हम दोनों के सत्र अलग-अलग थे। मैं पहले सत्र के अध्यक्ष-मण्डल में शामिल था, अतः जाहिर था कि मुझे उसी सत्र में बोलना था। जब मैं बोल रहा था, तो मैंने देखा, तुलसीराम जी ने उसी समय हाल में प्रवेश किया था और श्रोतागण की अगली पंक्ति में बैठ गए थे। मेरे लिए यह भी खुशी की बात थी कि उन्होंने श्रोताओं के बीच बैठकर उस पूरे सत्र को अन्त तक सुना था। वरना, तो वे जिस ऊॅंचाई पर थे, उस स्तर के लोग अपने सत्र के समय ही हाल में प्रवेश करते हैं। मैं स्वयं कई सेमिनारों में नामवर सिंह को ऐसा करते देख चुका हूँ। अगला सत्र तुलसीराम जी का था। अब श्रोताओं के बीच बैठने की बारी हमारी थी। हमने पूरी तल्लीनता से तुलसीराम जी को सुना। मैंने देखा कि छात्रों के साथ-साथ प्रोफेसर भी उन्हें तन्मय होकर सुन रहे थे। यहॉं भी उनका सारा फोकस दलित साहित्य से ज्यादा बौद्ध साहित्य पर ही था। सत्र समाप्त होने के बाद उनसे औपचारिक बातचीत ही हुई, क्योंकि उन्हें उसी वक्त दिल्ली के लिए निकलना था। उसी दिन मुझे मालूम हुआ कि उन्हें हफ्ते में दो बार डायलिसिस करानी पड़ती है। अगले दिन उनकी डायलिसिस होनी थी। इसलिए उसी दिन उनका दिल्ली पहुंचना जरूरी था। हमने उन्हें एयरपोर्ट के लिए विदा किया। इस तरह यह उनसे मेरी चौथी मुलाकात थी।

मेरी अगली भेंट उनसे 8 नवम्बर 2012 को काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी में हुई थी। वहॉं हिन्दी विभाग ने ‘धर्म की अवधारणा और दलित चिन्तन’ विषय पर एक राष्ट्रीय सेमिनार आयोजित किया था। इस सेमिनार में मैं मुख्य वक्ता था और तुलसीराम जी मुख्य अतिथि थे। मुख्य अतिथि के रूप में यहॉं भी उन्हें मेरे बाद ही बोलना था। पर, यहॉं मेरे साथ वे मंच पर उपस्थित थे। मैं जानता था कि तुलसीराम जी की दृष्टि में सिर्फ बुद्ध हैं और बुद्ध के सिवा कुछ नहीं है। उनकी धर्म की अवधारणा बुद्ध से शुरु होकर बुद्ध पर ही खत्म होती है। मैं इस अवधारणा से आज भी इत्तेफाक नहीं रखता। अतः मैंने अपने व्याख्यान में धर्म को पूंजीवाद का प्रपंच कहा और कबीर-रैदास का उदाहरण देते हुए इस बात पर जोर दिया कि दलित चिन्तन में धर्म की अवधारणा कभी भी वर्ण और जातिवादी नहीं रही। डा. आंबेडकर ने भी इसी सोच की वजह से बौद्धधर्म अपनाया था। इसलिए दलितों का धर्मान्तरण भी उन्हीं धर्मों में हुआ, जिनमें जातिभेद नहीं था। मैंने कहा कि दलित धर्म की अवधारणा में परलोक मिथ्या और जगत सत्य है। मैंने देखा कि तुलसीराम जी बहुत गौर से मुझे सुन रहे थे। लेकिन उनके चेहरे पर कोई भाव नहीं था। अन्त में तुलसीराम जी का व्याख्यान हुआ। जैसा मैंने सोचा था, तुलसीराम जी के एक घण्टे के व्याख्यान के केन्द्र में बौद्ध साहित्य ही था। उन्होंने देर तक अश्वघोष की ‘बज्रसूची’ पर चर्चा की और उसके विकास के रूप में दलित धर्म को परिभाषित किया। मुझे सहसा 1996 का उनका वह वक्तव्य याद आ गया, जिसका जिक्र मैं शुरु में कर चुका हूँ। बौद्ध साहित्य पर उनका अध्ययन अगाध था, इसमें सन्देह नहीं; पर वे कोरे दार्शनिक नहीं थे। बुद्ध की करुणा और मैत्री ने उनके चिन्तन को समतावादी बनाया था। यद्यपि, वे राहुल सांकृत्यायन से प्रभावित थे। पर, उनकी जीवन-यात्रा राहुल जी से भिन्न थी। राहुल जी को बुद्ध की अगली मंजिल में कार्लमार्क्स मिले थे, पर तुलसीराम जी मार्क्स से आंबेडकर की ओर आए थे और आंबेडकर से बुद्ध तक पहुंचे थे। वे अन्त तक बुद्ध, मार्क्स और आंबेडकर के साथ ही जिए। इनमें से किसी भी एक को छोड़ना उनके लिए मुश्किल था। ये उनके चिन्तन के अनिवार्य त्रिरत्न थे।

6 अगस्त 2013 को उत्तर प्रदेश सरकार के एक तानाशाह मन्त्री ने मेरी एक फेसबुक टिप्पणी पर मुझे गिरफ्तार करा दिया था। यह खबर जब मीडिया ने प्रसारित की, तो दूसरे दिन तुलसीराम जी का फोन आया। बोले- ‘मैं आपके साथ हूँ, डरने की बिल्कुल जरूरत नहीं है। यह समाजवादी सरकार नहीं है, फासीवादी सरकार है।’ यही नहीं, जब ‘जन संस्कृति मंच’ ने 11 अगस्त 2013 को प्रेस क्लब, नई दिल्ली में मेरी गिरफ्तारी और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के हनन के विरोध में प्रेस कांफ्रेंस की, तो जहॉं अन्य बहुत से दलित लेखकों ने अपने मुंह सिल लिए थे, वहॉं तुलसीराम जी और विमल थोरात ने पूरी शिद्दत से उसमें भाग लिया था। तुलसीराम जी ने उस कांफ्रेंस में उत्तर प्रदेश सरकार की लोकतन्त्र-विरोधी और फासीवादी नीतियों की जमकर आलोचना की। क्या पता था कि उस कांफ्रेस में मैं उनसे अन्तिम बार मिल रहा था। उसके बाद फिर कभी उनसे मिलना नहीं हो सका था।

हॉं, उनका एक फोन जरूर उसके कुछ दिन बाद आया था। हुआ यह था कि 8 अक्टूबर 2013 को तत्कालीन केन्द्रीय राज्य मंत्री जितिन प्रसाद ने बेगम नूर बानो और कांग्रेसी विधायक नवेद मियां के आवास ‘नूर महल’ में हार पहिनाकर मेरा स्वागत किया था। नूर महल ने इस स्वागत का फोटो इस खबर के साथ अखबारों को जारी कर दिया था कि मैंने कॉंग्रेस ज्वाइन कर ली है। अगले दिन 9 अक्टूबर के सभी अखबारों में वह फोटो इस हेडिंग के साथ छपा कि मैं कॉंग्रेसी हो गया हूँ। मैं हक्का-बक्का! पर, खण्डन इसलिए नहीं कर सका कि आजम के खिलाफ लड़ाई में मुझे कॉंग्रेस के समर्थन की जरूरत थी। लेकिन, इस खबर का छपना था कि देश भर से लानतें-मलानतों के फोन आने लगे। सबसे ज्यादा गुस्सा मुझे अपने वाम साथियों का झेलना पड़ा। इसी बीच तुलसीराम जी का फोन आया। मुझे लगा कि वे भी मेरी आलोचना ही करेंगे, पर नहीं, उन्होंने तो मुझे कॉंग्रेस में जाने पर बधाई दी। मेरे सफाई देने पर भी उन्होंने कहा कि मैंने सही पार्टी ज्वाइन की है, क्योंकि तमाम कमियों और भ्रष्टाचार के बावजूद कॉंग्रेस ही है, जिसमें अभी लोकतन्त्र बचा हुआ है। हालांकि मेरी स्थिति उस समय यह थी कि मुझे न उगलते बन रहा था और न निगलते। पर, उनकी बधाई आज भी मुझे सोचने पर मजबूर करती है।

अगस्त 2014 में दिल्ली विश्वविद्यालय के शोध छात्र एवं कवि धर्मवीर यादव ने मुझे फोन किया कि वह तुलसीराम सर पर एक पत्रिका के लिए विशेषांक निकालने की योजना बना रहे हैं, जिसके लिए वह मुझ से उनकी आत्मकथा पर कुछ लिखाना चाहते थे। इस के लिए मैंने उन्हें बधाई देते हुए कहा कि मैं उनकी आत्मकथा पर नहीं, पत्रकारिता पर लिखना चाहता हूँ, अगर मुझे ‘भारत अश्वघोष’ की फाइलें मिल जाएँ। उन्होंने सभी अंकों की फोटो प्रतियॉं कराकर भेजने की हामी भर ली। मुझे अगले महीने 20 सितम्बर को एक सेमिनार में नागपुर जाना था और 22 सितम्बर को वापस लौटना था। फ्लाइट दिल्ली से ही थी। अतः मैंने धर्मवीर को कहा कि वह मुझे 22 सितम्बर को सुबह दस बजे एयरपोर्ट पर या 11 बजे दरियागंज में स्वराज प्रकाशन में मिलें। कुछ बातचीत भी हो जाएगी और मैं वहीं आपसे ‘आश्वघोष’ के अंक ले लूँगा। इस तरह 22 सितम्बर को धर्मवीर कई घण्टे मेरे साथ रहे, तुलसीराम जी के बहुत सारे पहलुओं पर उनसे बातचीत हुई। मुझे यह जानकर खुशी हुई कि उन्होंने तुलसीराम जी के साथ निकट का आत्मीय सम्बन्ध बना लिया था। खैर, मैंने ‘डा. तुलसीराम और उनकी पत्रकारिता’ शीर्षक से साढ़े पॉंच हजार शब्दों का एक लम्बा लेख लिखा और 6 नवम्बर 2014 को धर्मवीर को मेल कर दिया। कुछ दिन बाद धर्मवीर यादव ने बताया कि उन्होंने उस लेख को तुलसीराम जी को पढ़कर सुनाया था, और उनकी प्रतिक्रिया काफी अच्छी थी। आज यह मेरे लिए गर्व की बात है कि उनके जीवन-काल में ही मैं उन पर कुछ लिखकर उनकी प्रशंसा पा सका था।

फरवरी 2015 के पहले हफ्ते की कोई तारीख थी, जब धर्मवीर यादव ने फोन पर खबर दी कि तुलसीराम जी सर गुड़गॉंव के अस्पताल में भर्ती हैं, और काफी सीरियस हैं। यह मेरे लिए क्या, पूरे साहित्यिक जगत के लिए अच्छी खबर नहीं थी। मैंने धर्मवीर यादव को कहा कि मैंने विश्व पुस्तक मेले के लिए दो दिन 19-20 फरवरी को दिल्ली में रहने का कार्यक्रम बनाया है। 20 को सुबह ही तुलसीराम जी से मिलने चलेंगे। पर, वह दिन कभी नहीं आया। 12 फरवरी को सुबह करीब 9 बजे धर्मवीर का फोन आया कि तुलसीराम जी सर को कल शाम ही गुड़गॉंव से ले आया गया था। लेकिन आज सुबह वे खत्म हो गए। मेरे लिए एकदम दुखद खबर थी। मैंने तत्काल फेसबुक पर लिखा- ‘मुर्दहिया’ और मणिकर्णिका’ आत्मकथा पुस्तकों के लेखक, समाजवादी चिन्तक और जेएनयू के प्रोफेसर डा. तुलसी राम नहीं रहे। हिन्दी साहित्य की यह बहुत बड़ी क्षति है।’इसके बाद तो फेसबुक पर श्रद्धांजलियों का तांता लग गया।

12 फरवरी को वे वहॉं चले गए- जहॉं से कोई लौटकर नहीं आता। जाने वालों की सिर्फ याद आती है। उनकी भी अब यादें ही आएंगी। हिन्दी में उनके लेखों की संख्या हजार से भी ऊपर हो सकती है। मगर वे असंकलित ही हैं, वरना उनके कई खण्ड प्रकाशित हो गए होते। अगर वे स्वस्थ रहे होते, तो अवश्य ही बहुत काम करते। पर डायलिसिस ने उनको तोड़कर रख दिया था। पिछले कुछ सालों से वे अपनी आत्मकथा लिख रहे थे, जिसके दो खण्ड- ‘मुर्दहिया’ और ‘मणिकर्णिका’ प्रकाशित होकर व्यापक चर्चा में आ गए थे। 1997-98 में उन्होंने ‘भारत अश्वघोष’ का सम्पादन किया था। यही दो महत्वपूर्ण काम उन्हें साहित्य और पत्रकारिता में अमर बनाए रखेंगे। तुलसीराम जी सचमुच बहुत याद आते हैं।

आषाढ़ पूर्णिमा ही गुरु पूर्णिमा है, बुद्ध ही गुरु हैं

आषाढ़ी पूर्णिमा का दिन तथागत बुद्ध के अनुयायियों के लिए एक बड़ा दिन होता है। दरअसल बुद्धिस्टों के लिए हर पूर्णिमा खास होता है। 3 जुलाई को आषाढ़ी पूर्णिमा के दिन जब गुरु पूर्णिमा मनाई जा रही है और लोग अपने गुरुओं को याद कर रहे हैं, बौद्ध धम्म के अनुयायी भी इस दिन बुद्ध को याद कर उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित कर रहे हैं। धम्मा लर्निंग सेंटर, वाराणसी के प्रमुख भिक्खु चंदिमा ने सभी धम्म प्रेमियों को इस दिन की बधाई दी है। वो लिखते हैं- धम्मचक्कपवत्तन दिवस (आषाढी पूर्णिमा/गुरू पूर्णिमा) की मंगल कामनाएं। आज आषाढी पूर्णिमा है, आज ही के दिन तथागत बुद्ध ने सारनाथ में पंच वर्गीय भिक्खुओ को धम्मचक्कपवत्तनसुत्त का उपदेश दिया था। आषाढी पूर्णिमा को ही गुरु पूर्णिमा कहा जाता हैं। आइए! लोकगुरु, महागुरू, विश्वगुरू तथागत बुद्ध के प्रति कृतज्ञता भाव प्रकट करें।

पटना में रहने वाले वरिष्ठ पत्रकार और मिशन जय भीम पत्रिका के संपादक बुद्ध शरण हंस लिखते हैं- महान अर्थशास्त्री गौतम बुद्ध को कोटिश: नमन। आज ही के दिन आषाढ पूरनिमा को गौतम बुद्ध ने सारनाथ में ईसा से 500 वर्ष पहले सहज, सुखी, सम्मानित जीवन जीने के पांच सूत्र बतलायें। पहला आपस में लड़ाई झगड़ा मार-काट नहीं करने से इंसान सुखी रहेगा। किसी की कोई भी वस्तु की चोरी बेईमानी नहीं कर इंसान सुखी रहेगा। व्यभिचार से दूर रहकर इंसान सुखी रहेगा। झूठ या ग़लत बातें नहीं बोलकर इंसान सुखी रहेगा। किसी तरह का नशा- नहीं कर इंसान सुखी रहेगा। तब के विदेशीय आर्य वराहमनो में उपरोक्त सारे अवगुण थे। उन अवगुणों से बचने के लिए तथागत ने इसी आषाढ पूरनिमा के दिन पंचशील की शिक्षा दी थी। ऐसा ही शुभ हो। आपका जीवन मंगलमय हो।

धम्म चारिका करते भिक्खु चंदिमाबौद्ध विद्वान और लेखक एवं साहित्यकार आनंद श्रीकृष्ण ने सबको गुरु पूर्णिमा की बधाई देते हुए लिखा है- आषाढ़ पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। आषाढ़ पूर्णिमा को ही तथागत गौतम बुद्ध ने सारनाथ के मृगदाय वन में पंचवग्गीय भिक्षुओं को धम्मचक्कपवत्तन उपदेश देकर धम्म देशना की शुरुआत की थी। इसलिए इस दिन को गुरु पूर्णिमा भी कहा जाता है। बुद्ध पूर्णिमा के बाद यह दूसरा महत्वपूर्ण दिन माना जाता है। इस दिन उपासक उपासिकाएं उपोसथ रखकर पुण्य लाभ अर्जित करते हैं।

बौद्ध धम्म पर काफी तथ्यात्मक जानकारियां सामने लाने वाले इतिहासकार राजेन्द्र प्रसाद सिंह ने भी बुद्ध पूर्णिमा की बधाई दी है। उन्होंने लिखा है- आषाढ़ पूर्णिमा ही गुरु पूर्णिमा है। बुद्ध ही गुरु हैं। बुद्ध ही गुरु हैं। इसी गुरु ने गुरु पूर्णिमा के दिन सारनाथ में पहली बार सार्वजनिक ज्ञान दिया था। बुद्ध ही गुरु हैं। इनकी ही शिक्षाएँ दुनिया भर में अनूदित हुईं। बुद्ध ही गुरु हैं। अनेक देशों में इसी गुरु के कारण अनेक शिक्षा – केंद्र खोले गए। बुद्ध ही गुरु हैं। इन्हीं का ज्ञान पाने के लिए अनेक विदेशी भारत आए। बुद्ध ही गुरु हैं। अनेक भिक्खुओं ने इसी गुरु के ज्ञान का अनेक देशों में प्रचार किए। बुद्ध ही गुरु हैं। इसलिए अनेक देशों में पढ़ाई का सत्र गुरु पूर्णिमा के माह जुलाई से आरंभ होता है। बुद्ध ही गुरु हैं। अनेक राजाओं ने गुरु पूर्णिमा के दिन अनेक भिक्खु – संघों को शिक्षा हेतु अनेक गाँव दान दिए।