मुंबई। 6 नवंबर को मराठों द्वारा निकाली गई बाइक रैली के बाद अब दलित, मुस्लिम और ओबीसी एकजुट होकर मुंबई की सड़कों पर बाइक रैली निकालेगा. मुंबई में मराठा समाज दलित अत्याचार अधिनियम पर समीक्षा की मांग कर रहा है जिसके खिलाफ दलित समाज 26 नवंबर को बाइक रैली का आयोजन करने जा रहा है. इसके बाद यह रैली 24 दिसम्बर को एक विशाल विरोध प्रदर्शन में बदल जाएगी.
इस बाइक रैली का उद्देश्य है कि दलित, ओबीसी और मुस्लिम को एकजुट होकर मराठों के खिलाफ आवाज उठाए. यह रैली बांद्रा से दादर के चैतन्यभूमि तक जाएगी. इसमें करीब 5000 बाइकर्स हिस्सा लेंगे. रैली के आयोजक रमेश गायकवाड़ का कहना है कि यह रैली 26 नवंबर को इसलिए आयोजित की जा रही है क्योंकि बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर द्वारा बनाए गए संविधान को 24 नवंबर 1949 को ही अपनाया गया है और यह 26 जनवरी 1950 को प्रभाव में आया. इसलिए हम इसे संविधान के प्रतीक के रूप में आयोजित कर रहे हैं.
गायकवाड़ ने कहा कि इसके बाद दलित अत्याचार अधिनियम में मराठों द्वारा संशोधन के विरोध में 24 दिसंबर को एक विशाल रैली का आयोजन किया जाएगा. उन्होंने कहा कि अगर सरकार ने मराठा समाज के इस मांग को मान लिया तो दलितों और पिछड़ों को अपने अधिकार से वंचित होना पड़ेगा. उन्होंने कहा कि सरकार मराठों को कोई भी आरक्षण दे हमें कोई भी समस्या नहीं है लेकिन हम दलित अत्याचार अधिनियम में बदलाव नहीं होने देंगे, इससे दलितों पर अत्याचार और बढ़ जाएंगे.
1989 में केंद्र सरकार द्वारा बनाए अनुसूचित जाति और जनजाति ( अत्याचार निवारण) कानून बनाया गया. इस कानून को बनाने का मकसद अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों पर होने वाली हिंसा को रोकना और उन्हें मुख्यधारा में लाना था. मराठा रैली को टक्कर देने के लिए दलित, ओबीसी और मुस्लिम निकालेंगे ”बाइक रैली”
मुंबई। 6 नवंबर को मराठों द्वारा निकाली गई बाइक रैली के बाद अब दलित, मुस्लिम और ओबीसी एकजुट होकर मुंबई की सड़कों पर बाइक रैली निकालेगा. मुंबई में मराठा समाज दलित अत्याचार अधिनियम पर समीक्षा की मांग कर रहा है जिसके खिलाफ दलित समाज 26 नवंबर को बाइक रैली का आयोजन करने जा रहा है. इसके बाद यह रैली 24 दिसम्बर को एक विशाल विरोध प्रदर्शन में बदल जाएगी.
इस बाइक रैली का उद्देश्य है कि दलित, ओबीसी और मुस्लिम को एकजुट होकर मराठों के खिलाफ आवाज उठाए. यह रैली बांद्रा से दादर के चैतन्यभूमि तक जाएगी. इसमें करीब 5000 बाइकर्स हिस्सा लेंगे. रैली के आयोजक रमेश गायकवाड़ का कहना है कि यह रैली 26 नवंबर को इसलिए आयोजित की जा रही है क्योंकि बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर द्वारा बनाए गए संविधान को 24 नवंबर 1949 को ही अपनाया गया है और यह 26 जनवरी 1950 को प्रभाव में आया. इसलिए हम इसे संविधान के प्रतीक के रूप में आयोजित कर रहे हैं.
गायकवाड़ ने कहा कि इसके बाद दलित अत्याचार अधिनियम में मराठों द्वारा संशोधन के विरोध में 24 दिसंबर को एक विशाल रैली का आयोजन किया जाएगा. उन्होंने कहा कि अगर सरकार ने मराठा समाज के इस मांग को मान लिया तो दलितों और पिछड़ों को अपने अधिकार से वंचित होना पड़ेगा. उन्होंने कहा कि सरकार मराठों को कोई भी आरक्षण दे हमें कोई भी समस्या नहीं है लेकिन हम दलित अत्याचार अधिनियम में बदलाव नहीं होने देंगे, इससे दलितों पर अत्याचार और बढ़ जाएंगे.
1989 में केंद्र सरकार द्वारा बनाए अनुसूचित जाति और जनजाति ( अत्याचार निवारण) कानून बनाया गया. इस कानून को बनाने का मकसद अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों पर होने वाली हिंसा को रोकना और उन्हें मुख्यधारा में लाना था. अनुसूचित जाति का अर्थ तो हमको पता है, लेकिन अनुसूचित का मतलब जानते है क्या?
आज हमारे समाज में हर तरफ आरक्षण को केवल आर्थिक उन्नति के नज़रिये से देखा जा रहा है. जबकि भारतीय संविधान में आरक्षण का उद्देश्य समाज में हर वर्ग को बराबरी का प्रतिनिधित्व देने के लिए किया गया था परंतु समझने वाली बात ये है की आज़ादी के 70 साल बाद भी क्या सभी लोग सभी वर्गों को अपने बराबर समझते हैं? शायद इसका जवाब हर भारतीय बुद्धिजीवी जानता है. यह भी समझना होगा की आरक्षण ऐसी कौन सी विधि है? जिससे हर इंसान आर्थिक तरक्की प्राप्त कर लेता है. आज राजनीतिक लाभ लेने के लिए कोई इसकी समीक्षा करना चाहता है और कोई समीक्षा का विरोध कर अपना वोट बैंक बढ़ाना चाहता है इसपर पूरी जानकारी रखना सभी लोगों के लिए आवश्यक है.
सन् 1931 में पहली बार तत्कालिक जनगणना आयुक्त (मि. जेएच हटन) ने संपूर्ण भारत के अस्पृश्य जातियों की जनगणना की और बताया कि भारत में 1108 अस्पृश्य जातियां है, ये वो जातियां थीं जिनका धर्म नहीं था. इसलिए, इन जातियों को बहिष्कृत जाति कहा गया है. उस समय के ब्रिटिश प्रधानमंत्री (रैम्से मैक्डोनाल्ड) ने देखा कि हिन्दू, मुसलमान, सिख, एंग्लो इंडियन की तरह (बहिष्कृत जातियां एक स्वतंत्र वर्ग) है, इसलिए उनकी “सूची” तैयार करवाई गयी. उस सूची में समाविष्ट जातियों को ही अनुसूचित जाति कहा जाता है. इसी के आधार पर भारत सरकार द्वारा अनुसूचित जाति अध्यादेश 1935 के अनुसार कुछ सुविधाएं दी गई हैं. उसी आधार पर भारत सरकार ने अनुसूचित जाति अध्यादेश1936 जारी कर आरक्षण की सुविधा प्रदान की. 1936 के उसी अनुसूचित जाति अध्यादेश में बदलाव कर अनुसूचित जाति अध्यादेश 1950 पारित कर आरक्षण का प्रावधान किया गया.
भारत में आज भी जाति-धर्म के नाम पर कुछ मतलबी और ख़ुदग़र्ज़ लोग समाज में विभिन्न गलतफहमी पैदा कर केवल अपनी राजनैतिक रोटियां सेंक रहे हैं. जिन्हें खुद भी नही पता की अनुसूचित का मतलब क्या है. आरक्षण लोकतंत्र में सभी वर्गों को बराबरी का अवसर देने की पद्धति मात्र है न की आर्थिक रूप से सबल बनाने की कोई स्कीम. आरक्षण उनको मिला जिनके पूर्वजों को सैकड़ो वर्षो तक कभी बराबर का अधिकार नहीं मिला वो कहीं न कहीं मानसिक और शारीरिक गुलामी का शिकार था. लेकिन आज आरक्षण को लोग अलग-अलग देखते हैं. आरक्षण की गलत व्याख्या करते हैं. आज भी उच्च सेवाओं में इन वर्गों का प्रतिनिधित्व बहुत कम है. इस बात का मतलब यह नहीं है की इन वर्गों में क्षमता की कमी है बल्कि यह अवसर की कमी थी जो आरक्षण के माध्यम से इन वर्गों को सामाजिक तौर ऊपर या बराबर उठने का मौका मिला है. आज भी जाति के नाम पर अत्याचार हो रहे है जिसे यूनाइटेड नेशन्स ने संज्ञान में लिया और जिसे देखते हुए भारत सरकार ने अनुसूचित जाति/जनजाति अत्याचार निरोधक कानून में वर्ष 2016 में कई बदलाव किये. इसका मतलब यदि कानून बना तो आज भी अत्याचार हो रहे है और इन वर्ग के लोगों को न्याय नहीं मिल पा रहा इसीलिए भारत सरकार ने कानूनों पर बदलाव किया है.
समाज में सबको बराबरी का अवसर मिले. परंतु आज भी इन वर्गों के लोगो का उच्च पदों पर न पहुंच पाने का कारण समाज में व्याप्त परिवारवाद और पूंजीवाद है. पूंजीवाद और परिवारवाद धन और परिवार के दम पर उच्च पदों पर पहुंच गया और अन्य वर्ग के लोगों को वहां तक नहीं पहुंचने दे रहा है. ऐसे तत्व समाज में है जो आरक्षण को आर्थिक उन्नति से जोड़ कर देखते हैं जोकि संविधान में आरक्षण की दी व्यवस्था की सोच से विपरीत है. जिसका ध्यान समाज में रह रहे बुद्धिजीवियों को जरूर रखना होगा.
लेखक कानपुर में पासी प्रगति संस्थान से जुड़े हैं. यहां सेक्शन से नहीं, जाति के हिसाब से होते हैं अलग टीचर और क्लास
ग्वालियर (एमपी)। शिवपुरी के ढकरौरा के प्रायमरी स्कूल में बच्चों के साथ भेदभाव का मामाल सामने आया है. यहां दलित और उच्च जाति के बच्चे एक साथ एक क्लास में बैठकर नहीं पढ़ते. इनको पढ़ाने के लिए शिक्षक भी अलग-अलग है. यही नहीं मिड डे मील को आदिवासी रसोइया बनाता है इसलिए दबंग बच्चे उसे खाते भी नहीं है. बीते शुक्रवार को (डिपार्टमेंट प्रोमोशन कमेटी) डीपीसी के शिरोमणि दुबे ने जब इस स्कूल को निरीक्षण किया तो इस बात का खुलासा हुआ. डीपीसी ने इस मामले में शिक्षकों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा.
ढकरौरा प्रायमरी स्कूल का शुक्रवार को जब दो अलग-अलग कतारों में बच्चे बैठे दिखे उन्होंने इसका कारण पूछा तो शिक्षकों ने बताया कि गुर्जर समाज और आदिवासी बच्चे यहां अलग-अलग कतार में बैठाकर पढ़ाया जाता है. जब बच्चे से यह पूछा गया कि उसे पढ़ाने वाला अतिथि शिक्षक संग्राम भी आदिवासी ही हैं, तो उसने बेबाकी से जवाब दिया कि ये हमारे नहीं आदिवासियों बच्चों के शिक्षक है, हमें तो दूसरे शिक्षक पढ़ाते हैं. जब मिड डे मील के बारे में पूछा तो गुर्जर समाज के बच्चों ने बताया कि वह स्कूल में मिड डे मील नहीं खाते हैं, क्योंकि वह आदिवासियों द्वारा बनाया गया है.
छात्र वकील गुर्जर का कहना था कि वह ऊंची जात के हैं, आदिवासियों के हाथ का बना खाना कैसे खा सकते हैं. आज बच्चे कम है इसलिए एख क्लास में बैठें, ज्यादा बच्चे आने पर अलग-अलग लगती है. रामवरण आदिवासी नाम के एक बच्चे ने बताया कि यदि वह गुर्जरों के बच्चों के साथ खेलते हैं या साथ बैठकर पढ़ने का प्रयास करते हैं तो उनके बीच झगड़ा हो जाता है. पूर्व में कई बार झगड़ा हो चुका है.
अतिथि शिक्षक संग्राम आदिवासी ने बताया कि बच्चों को कई बार समझाते है कि वह ऊंच-नीच, जात-पात की बात न करा करें, लेकिन वह मानते ही नहीं हैं. वह एसडीएम भी इसीलिए नहीं खातें है कि वह आदिवासी द्वारा बनाया जाता है.
निरीक्षण में यह बात मेरे संज्ञान में आई है, इस प्रकरण में शिक्षकों को नोटिस देकर जवाब तलब किया जा रहा है, यह पता लगाया जा रहा है कि आखिर यह स्थति क्यों बनी है. प्रथम दृष्टया शिक्षकों के निलंबन की कार्रवाई की जा रही है. दलित डॉक्टर ने कहा- जातिगत भेदभाव और मानसिक उत्पीड़न करता था प्रिंसिपल, मामला दर्ज
पटना। बिहार के सबसे बड़े अस्पताल पीएमसीएच में बुधवार को प्रिंसिपल ने दलित जूनियर डॉक्टर को पीटा. सीनियर डॉक्टर और सुरक्षागार्ड की पिटाई से दलित डॉक्टर आलोक कुमार का एक कान का पर्दा फट गया है. डॉ. आलोक कुमार ने सीनियर डॉक्टर के खिलाफ पटना पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज करवाई है.
उन्होंने पुलिस को दिए गए शिकायत पत्र में बताया की प्रिंसिपल एसएन सिंहा और उसके साथ तीन लोगों ने 16 नवंबर को सुबह मुझे लाठी-डंडे से पीटा और जातिसूचक गालिया भी दी. डॉ. आलोक कुमार ने आरोप लगाया कि प्रिंसिपल सिंहा ने उनके साथ जातिगत भेदभाव करते आए है और उनका मानसिक उत्पीड़न भी कर रहै थे.अपनी शिकायत पत्र में डॉ. आलोक ने कहा कि प्रिंसिपल अपने आप को बचाने के लिए मुझ पर गलत इल्जाम लगा रहे हैं और केस वापस लेने की धमकी दे रहे है. इसके अलावा वो मेरा कैरियर बर्बाद करने भी धमकी दे रहे हैं.
डॉक्टर का पीएमसीएच में इलाज चल रहा है. पीड़ित जूनियर डॉक्टर आलोक कुमार ने प्रिंसिपल पर दलित उत्पीड़न का केस दर्ज कराया है. बदले में प्रिंसिपल एसएन सिन्हा ने डॉ.अलोक पर सरकारी काम में बाधा डालने का काउंटर केस कर दिया है. हालांकि डॉक्टर की पिटाई के विडियो में प्रिंसिपल सिन्हा दलित डॉक्टर पर ताबड़तोड़ थप्पड़ मारते नजर आ रहे हैं.
गौरतलब है कि मामला पटना मेडिकल कॉलेज का है. जहां तुच्छ जाति के प्रिंसिपल डॉक्टर एसएन सिन्हा ने एक दलित जूनियर डॉक्टर अलोक कुमार को थप्पड़ मारा. इसके साथ ही वह उन्हें जातिसूचक गाली भी दे रहे हैं. यह घटना उस वक्त हुई जब आलोक कुमार मोटरसाइकिल से कहीं जाने की तैयारी कर रहे थे. सीनियर डॉक्टर ने कॉलेज परिसर में के गेट पास ही अपने सुरक्षा गार्डो के साथ उन्हे रोक लिया और गाली देते हुए थप्पड़ मारना शुरू कर दिया. उसके बाद भी दलित डॉक्टर ने कोई तीखी प्रतिक्रिया नहीं की और चुपचाप जाने की कोशिश करने लगे. लेकिन जातिवादी डॉक्टर ने उसे मोटरसाइकिल से उतरने पर मजबूर कर दिया. ”अगर तेरा पैर हमारे खेत में पड़ गया तो फसल नष्ट हो जाएगी”
भोपाल। दीपावली के बाद भाईदूज का दिन. गांव के सवर्ण समाज के लोगों ने खेत की मेड़ से निकल रहे अहिरवार समाज के एक व्यक्ति को यह कहकर रोक दिया है अगर तेरा पैर हमारे खेत में पड़ गया तो फसल नष्ट हो जाएगी. इसलिए अब सरकारी रास्ते से घूमकर जाना. जो एक किलोमीटर दूर है. अहिरवार समाज द्वारा विरोध करने पर विवाद बढ़ गया.
10 नवंबर को गांव की एक सामूहिक बैठक बुलाई गई. इसमें सीएम हेल्पलाइन में शिकायत करने वाले गुलाब सिंह अहिरवार के भाई को बुलाया गया. सवर्ण समाज के लोगों ने पंचनामा बनाया. इसको गांव के चौराहे पर चस्पा कर दिया गया. इसमें लिखा गया कि अहिरवार समाज के लोगों की अगर किसी ने दाढ़ी-कटिंग बनाई तो उसे जान से मार देंगे. यह भी फरमान जारी किया गया कि अहिरवार समाज के लोग नजरे झुकाकर निकलें. होटल में इन्हें गिलास की जगह चुल्लू में पानी दिया जाए. यह भी हिदायत दी गई कि मेले में नए कपड़े पहनकर न जाएं. औरतें सजधज के न निकलें. यदि कोई ऐसा करेगा तो ठीक नहीं होगा. यदि समाज के लोग शिकायत करेंगे तो घर जला दिया जाएगा.
ये बातें बैरसिया के नायसमंद गांव में अहिरवार समाज के लोगों ने जिला प्रशासन और पुलिस विभाग और मीडियाकर्मियों को बताई. बीते मंगलवार को कलेक्टर के पास हुई शिकायत के बाद अफसर गांव में लोगों से बातचीत करने पहुंचे थे. लोगों की बात सुनकर सब सन्न रह गए. बैरसिया एसडीओ बीना सिंह और एसडीएम राजीव नंदन श्रीवास्तव ने रहवासी जंगबहादुर सोलंकी और प्राण सोलंकी से इस संबंध में पूछताछ की तो उन्होंने ऐसी किसी भी घटना से इंकार किया.
सामूहिक भोज कल
मामले खत्म करने और गांव में शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए एसडीएम राजीव नंदन श्रीवास्तव ने शुक्रवार(18 नवंबर) को गांव में सामूहिक भोजन करने का आदेश दिया है. इसमें अहिरवार समाज के लोग खाना परोसेंगे और सभी खाना खाएंगे. गांव में पुलिस बल तैनात है.
गांव में दाढ़ी बनाने और बाल काटने पर रोक
सीएम हेल्पलाइन में गुलाब सिंह अहिरवार ने 10 दिसंबर 2015 को शिकायत की थी. इसमें बताया गया कि सेन समाज, अहिरवार जाति के पुरुषों के दाढ़ी-बाल नहीं काटते हैं. एक साल बाद 3 नवंबर को नजीराबाद पुलिस ने कार्रवाई शुरू की. अजाक डीएसपी दिनेश जोशी के निर्देश पर पुलिस ने एक स्थानीय नाई से पांचों लोगों की शेविंग-कटिंग करा दी. इस घटना से नाराज गांव के पूरे सेन समाज ने अहिरवार समुदाय के लोगों की हजामत बंद कर दी.
साभारः दैनिक भास्कर नोटबंदी के आर्थिक आपातकाल से दूर क्यों हैं पूंजीपति-नेता?
तय तो ये था ज़ुल्म के नाख़ून काटे जायेंगे
लोग नन्ही तितलियों के पर क़तर कर आ गये
-कुँवर बेचैन
कितनी सटीक बैठती है ये 2 लाइने मौजूदा सरकार पर. भाजपा नरेंद्र मोदी की अगुआई में ये ही लाईन बोलकर तो सत्ता में आई थी. रामदेव बाबा ने भी तो यही वायदा किया था कि अगर भाजपा सत्ता में आयी तो विदेशों में जमा (बाबा रामदेव के अनुसार 400 लाख करोड़) काला धन 100 दिन में वापिस लाएगी. काला धन आने से भारत के प्रत्येक नागरिक के खाते में 15-15 लाख आ जायेंगे. वायदे तो और भी बहुत किये थे इस सरकार ने लेकिन हम सिर्फ इस काले धन पर ही बात करेंगे. भारत की जनता, खासकर युवा जो गरीबी और बेरोजगारी से बहुत ज्यादा तंग था वो इस 15 लाख वाले वादे के जाल में फंस गया. वादा भी 100 दिन में पूरा करने का वायदा. देश के आवाम के सामने पहली बार वादा पूरा करने का समय निर्धारित किया गया. फिर क्या था जनता ने भाजपा की मत पेटियो को अनुमान से ज्यादा भर दिया.
सरकार बनी उसके बाद 10 दिन गुजरे, 20 दिन गुजरे, 100 दिन भी गुजर गए और गुजर गए 2.5 साल इन वर्षों में सरकार की वादा खिलाफी के खिलाफ आवाम में गुस्सा पनपने लगा, आवाम अपने आपको ठगा महसूस कर रहा था. सत्ता धारी पार्टी के नुमाइंदे मुंह छिपाते फिर रहे थे. तभी 8 नवम्बर को मोदी ने आर्थिक आपातकाल की घोषणा कर दी. आर्थिक आपातकाल जो सीधा-सीधा आम जनता के खिलाफ लागू किया गया एक जनविरोधी फैसला है. लेकिन मोदी ने अपने सम्बोधन में इस फैसले को ऐसे पेश किया कि ये आर्थिक आपातकाल अमीर लोगो को तबाह कर देगा. मेहनतकश आवाम जो लुटेरे पूंजीपतियों से नफरत करता है उसमें खुशी की लहर दौड़ गयी. उनको इस फैसले से महसूस हुआ की उनको लूटने वाले पूंजीपति, भ्रष्ट नौकरशाह को अब मिटना पड़ेगा. लेकिन फैसले के अगले दिन से ही मेहनतकश आवाम हजारों की तादात में बैंको के आगे अपनी मेहनत की कमाई को सफेद करवाने के लिए भूखा प्यासा खड़ा है.
वही दूसरी तरफ लुटेरा पूंजीपति, नौकरशाह इस योजना का ब्रांड एम्बेस्डर बना हुआ है. दिलचस्प बात यह है कि देश के बड़े पूंजीपति, नौकरशाह, फिल्मी अभिनेताओं में काले धन पर इस तथाकथित “सर्जिकल स्ट्राइक” से कोई बेचैनी या खलबली नहीं दिखायी दे रही है. जिनके पास काला धन होने की सबसे ज़्यादा सम्भावना है, उनमें से कोई बैंकों की कतारों में धक्के खाता नहीं दिख रहा है. उल्टे वे सरकार के इस फैसले का स्वागत कर रहे हैं. वही इस फैसले से अब तक 20 आम गरीब लोग मर चुके है. लेकिन क्या किसी काले धन रखने वाले चोर की मौत हुई है. ऊपर से काला धन रखने वाले इस आर्थिक आपातकाल के पक्ष में उपदेश दे रहे हैं.
वही देश का मजदूर किसान बहुत ज्यादा दुखी है. क्योंकि अभी-अभी किसान को फसल का रुपया मिला है. उसने बच्चों की शादी की प्लांनिग की हुई है. शादियों कि डेट निकलवाई हुई है. नया मकान बनाने के लिए पुराना मकान तोड़ा हुआ है. ऐसे 100 काम है. ऐसे ही खेत मजदूर जिसको फसल कटाई से लेकर ढुलाई तक का रुपया मिलना था वो नही मिला है जिस कारण उसको 2 वक्त की रोटी के लाले पड़े हुए है इसलिए वो भी बहुत परेशान है. बंगाल से खबर है कि नकदी की कमी से उत्तर बंगाल में 5 लाख मजदूरों को दैनिक -साप्ताहिक वेतन नहीं मिल पाया. ऐसी ही स्थिति देश के अनेक इलाकों में है, अस्पतालों में मरीजों का इलाज नहीं हो पा रहा, बाजार बन्द पड़े है.
इस फैसले के पीछे राज क्या है-
मोदी सरकार जब आज देश की जनता के सामने अपने झूठे वायदों, बेतहाशा महंगाई, बढ़ती बेरोजगारी और किसान-मजदूर आबादी की भयंकर लूट, दमन, दलितों, अल्पसंख्यकों पर हमले तथा अपनी सांप्रदायिक फासिस्ट नीतियों के कारण अपनी जमीन खो चुकी है तब फिर एक बार नोट बंद कर कालेधन के जुमले के बहाने अपने को देशभक्त सिद्ध करने की कोशिश कर रही है.
काले धन की असलियत-
देश में काले धन का सिर्फ 6 प्रतिशत नगदी के रूप में है. आज कालेधन का अधिकतम हिस्सा रियल स्टेट, विदेशों में जमा धन और सोने की खरीद आदि में लगता है. कालाधन भी सफेद धन की तरह बाजार में घूमता रहता है और इसका मालिक उसे लगातार बढ़ाने की फिराक में रहता है. आज देश की 90 फीसदी सम्पत्ति महज 10 फीसदी लोगों के पास है और इसमें से आधे से अधिक सम्पत्ति महज एक फीसदी लोगों के पास है. यह देश के मेहनत और कुदरत की बेतहाशा लूट से ही सम्भव हुआ है. मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद इसमें बेतहाशा बढ़ोत्तरी हुई है. काला धन खत्म करने के वायदे और अभियान के शोर के बीच देश से करोड़ों डॉलर की रकम विदेश भेज दी गई है. विदेशों में उपहार, दान, चिकित्सा, स्वयंसेवी संगठनों द्वारा परोपकारी कार्य, शिक्षा और अन्य कई मदों के बहाने करोड़ों रुपए बाहर भिजवाने में सत्ता में बैठी कोई सरकार पीछे नहीं रही. न तो यूपीए के जमाने की मनमोहन सिंह सरकार और न ही मौजूदा नरेंद्र मोदी सरकार.
काला धन को खत्म करने के इस हल्लाबोल के बीच रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया का एक दस्तावेज केंद्र में सत्ता पर काबिज लोगों की नीयत पर सवाल उठा रहा है. मौजूदा वित्त वर्ष में अभी तक की अवधि में ही 4.6 बिलियन डॉलर की रकम विभिन्न दस्तावेजों की आड़ में बाहर भेज दी गई है. मोदी सरकार के काले धन की नौटंकी का पर्दा इसी से साफ हो जाता है जब मई 2014 में सत्ता में आने के बाद जून 2014 में ही विदेशों में भेजे जाने वाले पैसे की प्रतिव्यक्ति सीमा 75,000 डॉलर से बढ़ाकर 1,25,000 डॉलर कर दिया और जो अब 2,50,000 डॉलर है.
आज देश में मौजूद कुल 500 और 1000 की नोटों का मूल्य 14.18 लाख करोड़ है जो देश में मौजूद कुलकाले धन का महज 3 फीसदी है. जिसमें जाली नोटों की संख्या सरकारी संस्थान ‘राष्ट्रीय सांख्यकीय संस्थान’ के अनुसार मात्र 400 करोड़ है. अगर एकबारगी मान भी लिया जाए कि देश में मौजूद इन सारी नोटों का आधा कालाधन है (जो कि है नहीं) तो भी डेढ़ फीसदी से अधिक काले धन पर अंकुश नहीं लग सकता. दूसरी तरफ जिन पाकिस्तानी नकली नोटों की बात कर मोदी सरकार लोगों को गुमराह कर रही है वह तो 400 करोड़ ही है जो आधा फीसदी भी नहीं है. दूसरे, सरकार ने 2000 के नये नोट निकाले हैं जिससे आने वाले दिनों में भ्रष्टाचार और काला धन 1000 के नोटों की तुलना में और बढ़ेगा. इस पूरे मामले पर मुझे एक कहानी याद आ रही है
कहानी इस प्रकार है-
किसी गांव में एक आदमी कब्रिस्तान में कब्रें खोद कर मुर्दों के शरीर से कपड़े आभूषण वगैरह चुराया करता था. लोग हजार तरीके अपनाते पहरेदारियां करते मगर वो चोर मौका लगते ही कब्रों को लूट लिया करता था. गांव तो गांव आसपास के कई कस्बे और शहरों में भी उसका खौफ था. लोग अपनी तरफ से पूरी कोशिशें करते और चोर अपनी तरफ से. इसी तरह दिन बीतते रहे. और एक दिन चोर का अंतिम समय भी आ गया. उसने अपने पुत्र को बुलाया और कहा कि बेटा मेरी आखिरी इच्छा है कि मरने के बाद लोग मुझे अच्छे इंसान के रुप में याद करें.
ये कहकर वो मर गया और लोगों ने चैन की सांस ली कि चलो बला टली. अब गांव में फिर कोई मौत हुई मगर ये क्या इस बार तो न केवल कब्र लूटी गई बल्कि मुर्दे को पेड़ से उल्टा लटका दिया गया था. गांव वाले परेशान. तहकीकात पर पता चला कि ये कुकर्म चोर के बेटे ने किया था. अब तो पहले से भी ज्यादा बुरा हाल हो गया. आये दिन दफनाने के बाद कब्रों से निकाल कर मुर्दे नग्न हालत में पेड़ों पर उल्टे लटके मिलने लगे. हर तरफ हर कोई बस एक ही बात कहता कि इससे तो वो चोर भला था जो केवल कब्र लूटा करता था मुर्दों की बेइज्जती तो नहीं करता था. मतलब पिछली सरकार चोर तो ये सरकार महाचोर.
इसलिए मेरे मेहनतकश साथियों मोदी सरकार के इस जनविरोधी फैसले का डट कर विरोध कीजिये और मोदी सरकार पर स्विस बैंक के उन काले धन वाले खाता धारकों के नाम उजाकर करने और उस सम्पत्ति को सरकारी घोषित करने का दबाव बनाइये, बैंको के उन 86 खाता धारकों का नाम उजाकर करने और उनसे रुपया वापिस लेने का दबाव बनाइये जिन्होंने देश के बैंको को दिवालिया होने के कागार पर ला खड़ा किया है. बैंको के 9 हजार करोड़ हजम करने वाले विजय माल्या को आपकी सरकार ने बड़ी ही सुरक्षा के साथ देश से बाहर सुरक्षित जगह पर जाने दिया उसको वापिस लाकर जेल में डाला जाए व 9 हजार करोड़ की ब्याज सहित वापसी सरकार माल्या से करे. इसको लेकर एकजुट हो दबाव बनाए. एकजुट होकर, इस जनविरोधी फैसले का और नाटकबाज सरकार का मजबूती से मुकाबला कीजिये. दलित साहित्य बेचने वाले के साथ हिंदूवादी संगठनों ने की मारपीट
छतरपुर (एमपी)। राकेश कुशवाहा छतरपुर के महाराजा गोर्वमेंट कॉलेज के गेट नंबर चार के सामने दलित दस्तक पत्रिका, दास प्रकाशन और सम्यक प्रकाशन की पुस्तकें और अन्य दलित साहित्य और पत्रिकाए बेचते हैं. उनका दलित साहित्य और पत्रिका बेचना हिंदूवादी संगठनों को रास नहीं आ रहा था. इसलिए हिंदूवादी संगठन आरएसएस, विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल और भाजपा के लोगों ने राकेश कुशवाहा से मारपीट की. इतना ही नहीं उन लोगों ने दुकान के मालिक को भी धमकी देकर उनसे दुकान खाली करवाने को भी बोला.
हिंदूवादी संगठनों ने पुलिस को बुलाकर उसपर सामाजिक व्यवस्था बिगाड़ने का आरोप भी लगाया. छतरपुर कोतवाली के सीनियर इंस्पेक्टर आरएन पटेरिया उसे मारते-पीटते थाने लेकर गए. राकेश कुशवाहा ने दलित दस्तक को बताया कि एसआई ने उन्हें जातिसूचक गालियां दी और उन्हें दुकान बंद करने की धमकी देकर जेल में बंद कर दिया. 24 घंटे के बाद ही पुलिसवालों ने कुशवाहा की जमानत स्वीकार की.
राकेश कुशवाहा कॉलेज के सामने एक किराए की दुकान चलाते है और दुकान के पीछे ही उनका घर है. दुकान पर वह सिर्फ दलित साहित्य की किताबें और पत्रिकाएं ही बेचते हैं. लेकिन भाजपा के छात्र संगठन एबीवीपी का कार्यकर्ता अचल जैन, आरएसएस का अमित तिवारी और भाजपा के कार्यकर्ता भरत साहू और जयप्रकाश उसकी दुकान पर आकर तोड़फोड़ करने लगे और दलित साहित्य न बेचने की धमकी देने लगे. जब राकेश ने विरोध किया तो उसके साथ मारपीट की.
इस मामले पर सम्यक प्रकाशन के संस्थापक शांति स्वरूप बौद्ध का कहना है कि दक्षिणपंथी लोग किताब लिखने वालों को कुछ नहीं बोलते, क्योंकि उनसे लड़ना उनके बस की बात नहीं है. लेकिन ये लोग गरीब विक्रेताओं को परेशान करते हैं और उनके साथ मारपीट करते हैं. ललई सिंह यादव जब सच्ची रामायण लेकर आएं तो हिन्दूवादी संगठनों ने इस किताब को बैन करने के लिए सुप्रीम कोर्ट तक लड़ाई लड़ी, लेकिन वो हार गए. हालांकि आज भी वे इस तरह के साहित्य को बेचने वाले गरीब अम्बेडकरवादियों को परेशान करते रहते हैं. यह घटना भी इसी तरह की घटना है. दलित दस्तक ने भी इस घटना की निंदा की है. नास्तिक ही असली पात्र हैं- ओशो
मैं नास्तिकों की ही तलाश में हूं, वे ही असली पात्र हैं. आस्तिक तो बड़े पाखंडी हो गए हैं. आस्तिक तो बड़े झूठे हो गए हैं. अब आस्तिक में और सच्चा आदमी कहां मिलता है? अब वे दिन गए, जब आस्तिक सच्चे हुआ करते थे. अब तो अगर सच्चा आदमी खोजना हो तो नास्तिक में खोजना पड़ता है.
आस्तिक के आस्तिक होने में ही झूठ है. उसे पता तो है नहीं ईश्वर का कुछ, और मान बैठा है. न आत्मा का कुछ पता है, और विश्वास कर लिया है. यह तो झूठ की यात्रा शुरू हो गयी. और बड़े झूठ! एक आदमी छोटे-मोटे झूठ बोलता है, उसको तुम क्षमा कर देते हो. क्षमा करना चाहिए. लेकिन ये बड़े-बड़े झूठ क्षम्य भी नहीं हैं. ईश्वर का पता है? अनुभव हुआ है? दीदार हुआ है? दर्शन हुआ है? साक्षात्कार हुआ है? कुछ नहीं हुआ. मां-बाप से सुना है. पंडित-पुरोहित से सुना है. आसपास की हवा में गूंज है कि ईश्वर है, मान लिया है. भय के कारण, लोभ के कारण, संस्कार के कारण. यह मान्यता दो कौड़ी की है. यह असली आस्तिकता थोड़े ही है. यह नकली आस्तिकता है. असली आस्तिकता असली नास्तिकता से शुरू होती है.
नास्तिक कौन है? नास्तिक वह है जो कहता है, मुझे अभी पता नहीं, तो कैसे मानूं? जब तक पता नहीं, तब तक कैसे मानूं? जानूंगा तो मानूंगा. और जब तक नहीं जानूंगा, नहीं मानूंगा.
मैं ऐसे ही नास्तिकों की तलाश में हूं. जो कहता है जब तक नहीं जानूंगा तब तक नहीं मानूँगा, मैं उसी के लिए हूं. क्योंकि मैं जनाने को तैयार हू. आओ, मैं तुम्हें ले चलूं उस तरफ! मैंने देखा है, तुम्हें दिखा दूं! आस्तिक को तो फिकर ही नहीं है देखने की. वह तो कहता है, हम तो मानते ही हैं, झंझट में क्या पड़ना! हम तो पहले ही से मानते हैं. यह उसकी तरकीब है परमात्मा से बचने की. उसकी परमात्मा में उत्सुकता नहीं है. इतनी भी उत्सुकता नहीं है कि इंकार करे. वह परमात्मा को दो कौड़ी की बात मानता है, वह कहता है, क्या जरूरत है फिकर करने की? असल में परमात्मा की झंझट में वह पड़ना नहीं चाहता, इसलिए कहता है कि होगा, जरूर होगा, होना ही चाहिए; जब सब लोग कहते हैं तो जरूर ही होगा. इसको बातचीत के योग्य भी नहीं मानता है. इस पर समय नहीं गंवाना चाहता है. वह कहता है, यह एक औपचारिक बात है, कभी हो आए चर्च, कभी हो आए मंदिर, कभी रामलीला देख ली-सब ठीक है. अच्छा है, सामाजिक व्यवहार है. सबके साथ रहना है तो सबके जैसा होकर रहने में सुविधा है. सब मानते हैं, हम भी मानते हैं. अब भीड़ के साथ झंझट कौन करे? और झंझट करने-योग्य यह बात भी कहां है? इसमें इतना बल ही कहां है कि इसमें हम समय खराब करें?
तुम देखते हो, लोग राजनीति का ज्यादा विवाद करते हैं, बजाय धर्म के. बड़ा विवाद करते हैं कि कौन-सी पार्टी ठीक! बड़ा विवाद करते हैं कि कौन-सा सिद्धांत ठीक! धर्म का तो विवाद ही खो गया है! धर्म का विवाद ही कौन करता है? अगर तुम एकदम बैठे हो कहीं होटल में, क्लबघर में और एकदम उठा दो कि ईश्वर है या नहीं; सब कहेंगे कि भई होगा, बैठो, शांत रहो, जरूर होगा, मगर यहाँ झंझट तो खड़ी न करो। कौन इस बकवास में पड़ना चाहता है?
नास्तिक अभी भी उत्सुक है. नास्तिक का मतलब यह है–वह यह कहता है कि परमात्मा अभी भी विचारणीय प्रश्न है; खोजने-योग्य है; जिज्ञासा-योग्य है; अभियान-योग्य है. जाऊंगा, खोजूंगा। नास्तिक यह कह रहा है कि मैं दावं पर लगाने को तैयार हूं. समय, तो समय लगाऊंगा.
मेरे अपने देखे जगत में जो परम आस्तिक हुए हैं, उनकी यात्रा परम नास्तिकता से ही होती है, क्योंकि सचाई से ही सचाई की खोज शुरू होती है. कम-से-कम इतनी सच्चाई तो बरतो कि जो नहीं जानते हो उसको कहो मत कि मानता हूं.
नास्तिक की भूल कहां होती है? नास्तिक की भूल इस बात में नहीं है कि वह ईश्वर को नहीं मानता, नास्तिक की भूल इस बात में है कि ईश्वर के न होने को मानने लगता है. तब भूल हो जाती है. फर्क समझ लेना.
अगर आस्तिक ईमानदार है तो वह इतना ही कहेगा कि मुझे पता नहीं, मैं कैसे कहूं कि है, मैं कैसे कहूं कि नहीं है? अपना अज्ञान घोषणा करेगा; लेकिन ईश्वर के संबंध में हां या नहीं का कोई निर्णीत जवाब नहीं देगा. यह असली नास्तिक है. जो नास्तिक कहता है कि मुझे पता है कि ईश्वर नहीं है, यह झूठा नास्तिक है. यह आस्तिक जैसा हि झूठा है. आस्तिक ने एक तरह की झूठ पकड़ा है-बिना पता हुए कहता है कि ईश्वर है, इसने दूसरी तरह की झूठ पकड़ा है–बिना पता हुए कहता है कि ईश्वर नहीं है. दोनों झूठ हैं.
असली नास्तिक कहता है, मुझे पता नहीं, मैं अज्ञानी हूं, मैंने अभी नहीं जाना है, इसलिए मैं कोई भी निर्णय नहीं दे सकता, मैं कोई निष्कर्ष घोषित नहीं कर सकता.
मगर यही तो खोजी की अवस्था है. यही तो जिज्ञासा का आविर्भाव है. यहीं से तो जीवन की यात्रा शुरू होती है.
तुम कहते हो, ‘आत्मा-परमात्मा, पूर्वजन्म-पुनर्जन्म, मंत्र-तंत्र , चमत्कार- भाग्यादि में मेरा कतई विश्वास नहीं है. मैं निपट नास्तिक हूं.’ तो तुम ठीक आदमी के पास आ गए. अब तुम्हें कहीं जाने की कोई जरूरत न रही. मैं भी महा नास्तिक हूं. दोस्ती बन सकती है. मैं तुम्हारी ‘नहीं’ को ‘हां’ में बदल दूंगा. मगर यह बदलाहट किसी विश्वास के आरोपण से नहीं-यह बदलाहट किसी अनुभव से. और वह अनुभव शुरू हो गया है. किरण उतरने लगी है. तुम कहते हो, ‘आपके प्रवचनों में अनोखा आकर्षण है तथा मन को आनंद से अभिभूत प्रेरणाएं मिलती हैं.’ शुरू हो गयी बात, क्योंकि परमात्मा आनंद का ही दूसरा नाम है. परमात्मा कुछ और नहीं है, आनंद की परम दशा है, आनंद की चरम दशा है. परमात्मा सिर्फ एक नाम है आनंद के चरम उत्कर्ष का. शुरू हो गयी बात. तुम मुझे सुनने लगे, डोलने लगे मेरे साथ; तुम मुझे सुनने लगे, मस्त होने लगे; तुम मेरी सुराही से पीने लगे; शुरू हो गयी बात. तुम रंगने लगे मेरे रंग में. अब देर की कोई जरूरत नहीं है. तुम संन्यासी बनो. बनना ही होगा! अब बचने का कोई उपाय भी नहीं है. अब भागने की कोई सुविधा भी नहीं है.
मेरे संन्यास में आस्तिक स्वीकार है, नास्तिक स्वीकार है. आस्तिक को असली आस्तिक बनाते हैं, क्योंकि आस्तिक झूठे हैं. नास्तिक को परम नास्तिकता में ले चलते हैं, क्योंकि परम आस्तिक और परम नास्तिक एक ही हो जाते हैं. कहने-भर का भेद है. आखिरी अवस्था में ‘हां’ और ‘न’ में कोई भेद नहीं रह जाता; वे एक ही बात को कहने के दो ढंग हो जाते हैं.
-ओशो यह उत्सवी देश परम पीड़ा से गुजर रहा है
मैंने कई कारपोरेट घरानों के बड़े लोगों से निजी तौर पर बात की. सबको छह माह पहले से पता था कि हजार और पांच सौ के नोट खत्म किए जाने हैं. मुझसे किसी एक ने संपर्क नहीं किया कि उसके यहां करोड़ दो करोड़ काला धन सड़ रहा है, उसे ह्वाइट कर दे. मैंने तमाम संभावित काले धनियों को फोन किया कि अगर कुछ हो तो बताओ, अपन लोगों के पास बहुते एकाउंट है खपाने के लिए, सबने कहा- सब सेटल हो गया.
यानि इस देश के भ्रष्टाचारियों, कारपोरेट घरानों, नेताओं, अफसरों सबने पैसे सेटल कर लिए थे. थोड़े बहुत जो बड़े लोगों के पास काला धन है तो उसे ह्वाइट करने के लिए दस परसेंट पर दो हजार के नोट होम डिलीवरी करने वाले पैदा हो गए हैं. विदेश में लाखों करोड़ रुपये पड़े काले धन को लाने में नाकाम और देश के सैकड़ा के करीब बड़े लोगों को जिनने हजारों करोड़ बैंक लोन गटक रखा है, को सुप्रीम कोर्ट में बचाने वाली मोदी सरकार अपने इस नोटबंदी की करतूत से जो लाभ हासिल करना चाहती है, उसके मुकाबले नुकसान बहुत ही ज्यादा है.
जाने कितने हजार करोड़ का वर्किंग हावर खत्म हुआ. जगह जगह काम ठप है. लोग आत्महत्याएं कर रहे हैं. करीब दो दर्जन लोग जान दे चुके हैं. जाने कितने लोग मानसिक अवसाद में हैं. जिस योजना से सिर्फ मिडिल क्लास, लोअर मिडिल क्लास, बेहद गरीब आदि को ही परेशानी हो रही है तो उस योजना को आखिर किसके फायदे के लिए लाया गया है?
अपनी अंतरात्मा में झांकिए, कुछ देर के लिए कस्बों में निकलिए. शादी ब्याह श्मशान जीवन मरण उत्सव को देख आइए, सब कुछ स्थगित-सा है या अवसाद का शिकार है.. यह उत्सवी देश परम पीड़ा से गुजर रहा है. क्या जीने का अधिकार सिर्फ बडे़ लोगों को ही है? क्योंकि उनके पास तेज दिमाग और जबरदस्त लायजनिंग क्षमता है? कितने बड़े लोगों ने जान दी? कितने बड़े लोगों ने आपसे अपना धन सफेद करने के लिए संपर्क किया? उपर वालों को सब बता दिया गया था इसलिए उन्हें कोई कष्ट नहीं.
और आखिर में, अपना पक्ष हमेशा आम जनता के दुखों सुखों को ध्यान में रखकर बनाना चाहिए, न कि तकनीकी आंकड़े और जुमलों के आधार पर..
यशवंत सिंह की फेसबुक वॉल से साभार ओशो-विचारः क्या बुद्ध भगवान के अवतार हैं?
ओशो रजनीश ने तथागत बुद्ध पर दुनिया के सबसे सुंदर प्रवचन दिए हैं. इस प्रवचन माला का नाम है “एस धम्मो सनंतनो”. लाखों देशी और विदेशी लोग हैं, जो बौद्ध नहीं है लेकिन वे तथागत बुद्ध से अथाह प्रेम करते हैं और उनकी विचारधारा अनुसार ही जीवनयापन कर रहे हैं. पढ़िए बुद्ध के संबंध में ओशो के विचारः-
बौद्ध धर्म किसी दूसरे धर्म के प्रति नफरत नहीं सिखाता और न ही वह किसी अन्य धर्म के सिद्धांतों का खंडन ही करता है. बौद्ध धर्म न तो वेद विरोधी है और न हिन्दू विरोधी. तथागत बुद्ध ने तो सिर्फ जातिवाद, कर्मकांड, पाखंड, हिंसा और अनाचरण का विरोध किया था. गौतम बुद्ध के शिष्यों में कई ब्राह्मण थे. आज भी ऐसे लाखों ब्राह्मण हैं जो बौद्ध बने बगैर ही तथागत बुद्ध से अथाह प्रेम करते हैं और उनकी विचारधारा को मानते हैं.
बुद्ध ने अपने धर्म या समाज को नफरत या खंडन-मंडन के आधार पर खड़ा नहीं किया. किसी विचारधारा के प्रति नफरत फैलाना किसी राजनीतिज्ञ का काम हो सकता है और खंडन-मंडन करना दार्शनिकों का काम होता है. बुद्ध न तो दार्शनिक थे और न ही राजनीतिज्ञ. बुद्ध तो बस बुद्ध थे. हजारों वर्षों में कोई बुद्ध होता है. बुद्ध जैसा इस धरती पर दूसरा कोई नहीं. लेकिन दुख है कि कुछ लोग बुद्ध का नाम बदनाम कर रहे हैं.
क्या बुद्ध हिन्दुओं के अवतार हैं?: बुद्ध को हिन्दुओं का अवतार मानना उचित नहीं है. उनका तर्क यह है कि किसी भी पुराण में उनके विष्णु अवतार होने का कोई उल्लेख नहीं मिलता है…
… कल्किपुराण के पूर्व के अग्नि पुराण (49/8-9) में बुद्ध प्रतिमा का वर्णन मिलता है:- “भगवान बुद्ध ऊंचे पद्ममय आसन पर बैठे हैं. उनके एक हाथ में वरद तथा दूसरे में अभय की मुद्रा है. वे शान्तस्वरूप हैं. उनके शरीर का रंग गोरा और कान लंबे हैं. वे सुंदर पीतवस्त्र से आवृत हैं.” वे धर्मोपदेश करके कुशीनगर पहुंचे और वहीं उनका देहान्त हो गया. कल्याण पुराणकथांक (वर्ष 63) विक्रम संवत 2043 में प्रकाशित. पृष्ठ संख्या 340 से उद्धृत. इस वर्णन में यह कहीं नहीं कहा गया कि वे विष्णु अवतार हैं.
बुद्ध किस जाति या समाज के थे ये सवाल मायने नहीं रखता. गौतम बुद्ध ने खुद को न तो कभी क्षत्रिय कहा, न ब्राह्मण और न शाक्य. हालांकि शाक्यों का पक्ष लेने के कारण कुछ लोग उनको शाक्य मानकर शाक्य मुनि कहते हैं. क्या बुद्ध खुद को किसी जाति या समाज में सीमित कर सकते हैं? बुद्ध को इस तरह किसी जाति विशेष में सीमित करना या उन्हें महज मुनि मानना बुद्ध का अपमान ही होगा. बुद्ध से जो सचमुच ही प्रेम करता है वह बुद्ध को किसी सीमा में नहीं बांध सकता. भगवान बुद्ध को जो पढ़ता समझता हैं वह किसी भी दूसरे समाज के लोगों के प्रति नफरत का प्रचार नहीं कर सकता है. यदि वह ऐसा कर रहा है तो वह विश्व में बौद्ध धर्म की प्रतिष्ठा को नीचे गिरा देगा. बुद्धं शरणं गच्छामि.
बुद्ध ऐसे हैं जैसे हिमाच्छादित हिमालय. पर्वत तो और भी हैं, हिमाच्छादित पर्वत और भी हैं, पर हिमालय अतुलनीय है. उसकी कोई उपमा नहीं है. हिमालय बस हिमालय जैसा है. गौतम बुद्ध बस गौतम बुद्ध हैं. पूरी मनुष्य-जाति के इतिहास में वैसा महिमापूर्ण नाम दूसरा नहीं. गौतम बुद्ध ने जितने हृदयों की वीणा को बजाया है, उतना किसी और ने नहीं. गौतम बुद्ध के माध्यम से जितने लोग जागे और जितने लोगों ने परम- भगवत्ता उपलब्ध की है, उतनी किसी और के माध्यम से नहीं.
-ओशो गोरखनाथ मंदिर में बुद्ध और कबीर के बारे में फैलाई जा रही है भ्रांति
गोरखपुर। संत कबीर कांशी के लहरतारा तालाब में कमल के पत्ते पर प्रकट हुए थे और बुद्ध विष्णु के अवतार थे. ऐसा हम नहीं कह रहे हैं, बल्कि संत कबीर और तथागत गौतम बुद्ध के बारे में यह पक्तियां गोरखपुर स्थित गोरखनाथ मंदिर में प्रस्थापित कबीर और बुद्ध की प्रतिमा पर लिखा हुआ है. गोरखनाथ मंदिर के महंत भाजपा नेता योगी आदित्यनाथ हैं. तथागत बुद्ध को विष्णु का अवतार बताने की बात इसलिए भी हास्यास्पद है क्योंकि तथागत बुद्ध ईश्वर पूजा के खिलाफ थे और स्वयं को भगवान मानने से इंकार करते थे. बावजूद इसके मनगढ़ंत तथ्यों का गठन कर जहां लोगों को भ्रामक जानकारी दी जा रही है तो वहीं संत कबीर और महामानव तथागत बुद्ध की विचारधारा को भी कुंद करने की कोशिश की जा रही है.
ब्राह्मणवादी ताकतों द्वारा बहुजन समाज में जन्में कबीर और दुनिया को शांति, प्रज्ञा, करुणा और शील का संदेश देने वाले तथागत बुद्ध को हिन्दुवादी आवरण में भी लपेटने की कोशिश की जा रही है. इससे बौद्ध धम्म और कबीर पंथ को मानने वाले लोगों में रोष है. बहुजन और बौद्ध साहित्य को लेकर गंभीर शोध करने वाले बौद्ध चिंतक शांति स्वरूप बौद्ध इस पर रोष जताते हुए कहते हैं कि बौद्ध साहित्य में विष्णु का शब्द ही नहीं है. बौद्ध धर्म में अवतारवाद भी नहीं है. यह तो ब्राह्मणवादियों ने बौद्ध धर्म को दबाने के लिए किया है. उनका आरोप है कि ब्राह्मणों ने बौद्ध विरासत पर डाका डाला है.
शांति स्वरूप कहते हैं कि “ब्राह्मणी मान्यता के अनुसार इक्ष्वाकु राजा रामचन्द्र के आदिपुरुष माने गए हैं. जो लोग शाक्यराज ओक्काक को इक्ष्वाकु साबित करते नहीं अघाते, उन्हें यह ध्यान देना चाहिए कि राम के आदिपुरुष इक्ष्वाकु हो सकते हैं, मगर शाक्यराज ओक्काक तथागत बुद्ध (कुमार सिद्धार्थ) के पुरखे तो हैं, पर आदिपुरुष नहीं.” उन्होने आरोप लगाया कि बौद्ध विरासत को हथियाने का प्रयास सरासर ऐतिहासिक बेईमानी है.
संत कबीर का कमल के पत्ते पर प्रकट होने वाली पंक्ति पर शांति स्वरूप बौद्ध ने कहा कि बच्चा कमल पर प्रकट नहीं होता है. यह सब गोरखनाथ वालो का गोरखधंधा है. ऐसा कर वो आम जनता में यह अंधविश्वास फैला रहे हैं. कमल का फूल कीचड़ में खिलता है. इसका संदर्भ इसलिए है कि यह बदबूदार जगह पर खुशबू फैलाता है. ये सब ब्राह्मणवादियों की साजिश रही है. ब्राह्मणवादी बहुजन महापुरुषों को अपना बताकर लोगों को भटका रहे हैं. धन पर ओशो की इस सटीक और खरी टिप्पणी को पढ़ें
धन का शास्त्र समझना चाहिए. धन जितना चले उतना बढ़ता है. चलन से बढ़ता है. समझो कि यहां हम सब लोग हैं, सबके पास सौ-सौ रुपए हैं. सब अपने सौ-सौ रुपए रखकर बैठे रहें! तो बस प्रत्येक के पास सौ-सौ रुपए रहे. लेकिन सब चलाएं. चीजें खरीदें, बेचें. रुपए चलते रहें. तो कभी तुम्हारे पास हजार होंगे, कभी दस हजार होंगे. कभी दूसरे के पास दस हजार होंगे, कभी तीसरे के पास दस हजार होंगे. रुपए चलते रहें, रुकें न कहीं. रुके रहते, तो सबके पास सौ-सौ होते. चलते रहें, तो अगर यहां सौ आदमी हैं तो सौ गुने रुपए हो जाएंगे. इसलिए अंग्रेजी में रुपए के लिए जो शब्द है वह करेंसी है. करेंसी का अर्थ होता है: जो चलती रहे, बहती रहे. धन बहे तो बढ़ता है.
अमरीका अगर धनी है, तो उसका कुल कारण इतना है कि अमरीका अकेला मुल्क है जो धन के बहाव में भरोसा करता है. कोई रुपए को रोकता नहीं. तुम चकित होओगे जानकर यह बात कि उस रुपए को तो लोग रोकते ही नहीं जो उनके पास है, उस रुपए को भी नहीं रोकते जो कल उनके पास होगा, परसों उनके पास होगा! उसको भी, इंस्टालमेंट पर चीजें खरीद लेते हैं. है ही नहीं रुपए, उससे भी खरीद लेते हैं. इसका तुम अर्थ समझो.
एक आदमी ने कार खरीद ली. पैसा उसके पास है ही नहीं. उसने लाख रुपए की कार खरीद ली. यह लाख रुपया वह चुकाएगा आने वाले दस सालों में. जो रुपया नहीं है वह रुपया भी उसने चलायमान कर दिया. वह भी उसने गतिमान कर दिया. लाख रुपए चल पड़े. ये लाख रुपए अभी हैं नहीं, लेकिन चल पड़े. इसने कार खरीद ली लाख की. इसने इंस्टालमेंट पर रुपए चुकाने का वायदा कर दिया. जिसने कार बेची है, उसने लाख रुपए बैंक से उठा लिए. कागजात रखकर. लाख रुपए चल पड़े. लाख रुपयों ने यात्रा शुरू कर दी!
अमरीका अगर धनी है, तो करेंसी का ठीक-ठीक अर्थ समझने के कारण धनी है. भारत अगर गरीब है, तो धन का ठीक अर्थ न समझने के कारण गरीब है. धन का यहां अर्थ है बचाओ! धन का अर्थ होता है चलाओ. जितना चलता रहे उतना धन स्वच्छ रहता है. और बहुत लोगों के पास पहुंचता है. इसलिए जो है, उसका उपयोग करो. खुद के उपयोग करो, दूसरों के भी उपयोग आएगा.
लेकिन यहां लोग, न खुद उपयोग करते हैं, न दूसरों के उपयोग में आने देते हैं! और धीरे—धीरे हमने इस बात को बड़ा मूल्य दे दिया. हम इसको सादगी कहते हैं. यह सादगी बड़ी मूढ़तापूर्ण है. यह सादगी नहीं है. यह सादगी दरिद्रता है. यह दरिद्रता का मूल आधार है.
चलाओ! कुछ उपयोग करो. बांट सको बांटो. खरीद सको खरीदो. धन को बैठे मत रहो दबाकर! यह तो तुम्हें करना है तो मरने के बाद, जब सांप हो जाओ, तब बैठ जाना गड़ेरी मारकर अपने धन के ऊपर! अभी तो आदमी हो, अभी आदमी जैसा व्यवहार करो.
कहै वाजिद पुकार, प्रवचन-९, ओशो जमीन हड़पने के लिए सवर्णों ने की दलित वृद्ध की हत्या, पुलिस भी दे रही है साथ
महोबा। आज यहां हम 21वीं सदी में चांद पर जाने की बात कर रहे है मगर अभी भी ऊंचनीच का बंधन अभिशाप बना हुआ है. बुंदेलखंड के महोबा में ऐसा ही एक मामला सामने आया है जिसमें एक दलित वृद्ध की सिर्फ इसलिए हत्या कर दी गई क्योंकि वो ब्राह्मणों के समीप अपना आशियाना बनाकर रहने की कोशिश कर रहा था. ब्राह्मणों को ये बात नगवार गुजरी और उन्होंने दलित वृद्ध की लाइसेंसी बंदुक की बटों से पीट-पीट कर हत्या कर दी. इस घटना से मृतक के परिजन सदमे में है और उन्हें अपने जीवन पर भी खतरा मंडराता दिखाई दे रहा है.
देश के सभी राजनीतिक दल दलितों को बराबरी का सम्मान दिलाने की बात करते है, इसके लिए जागरूकता का काम भी किया जाता है. मगर आज भी दलितों को न केवल अपमान झेलना पड़ता है बल्कि उन्हें ऊंचनीच की भेंट चढ़ा दिया जाता है. महोबा जनपद में हुई दलित की हत्या इसी का एक उदाहरण है. दरअसल महोबा के थाना पनवाड़ी के ग्राम रूपनोल में सवर्णों का वर्चस्व है. इसी गांव में रहने वाले 55 वर्षीय दयाराम अहिरवार को पिछले वर्ष पूर्व प्रधान द्वारा आवासीय पट्टा आबंटित किया गया था. जिसके अंतर्गत कुछ जमीन पट्टे में दी गई थी.
ये जमीन गांव में रहने वाले पंडित बाबूलाल के बगल में थी. दलित को जमीन पट्टे में मिली तो सवर्णो को बड़ा नागवार गुजरा. इस बात को लेकर दलित के परिवार को बाबूलाल, जगदीश और धीरेंद्र ने प्रताड़ित करना शुरू कर दिया. 20 नवंबर को सवर्णों ने दलित की जमीन पर जबरन कब्जा कर रहे थे तभी दलित दयाराम भी मौके पर पहुंच गया और उसने जमीन पर कब्जे का विरोध किया. फिर क्या था सवर्ण बाबूलाल, जगदीश और धीरेंद्र ने दलित वृद्ध को बंदूकों की बटों से पीटना शुरू कर दिया.
वृद्ध चीख-पुकार सुनकर दलित का पुत्र राजेश और पत्नी राजकुमारी भी मौके पर पहुंच गए. सवर्ण उन्हें भी पीटने के लिए दौड़े मगर आस-पास के लोगों के आ जाने पर वो लोग भाग गए. वृद्ध को घायल अवस्था में थाना पनवाड़ी लाया गया. दलित ने सवर्णों द्वारा बेरहमी से पीटने का बयान दिया और उसे इलाज के लिए पनवाड़ी सामुदायिक केंद्र में भर्ती कराया गया. जहां बाद में उसने दम तोड़ दिया. दलित की मौत होने की सूचना मिलते ही पुलिस भी अस्पताल पहुंच गई और शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया.
मृतक के पुत्र राजेश का कहना है कि गांव में दलितों के कुछ ही परिवार है. ऐसे में ब्राह्मण जाति के लोग उन पर अत्याचार करते हैं और उन्हें आये दिन सताया जाता है. पट्टे की जमीन मिलने से सवर्ण नाराज थे और उन्हें आये दिन धमकी देकर जमीन छोड़ने के लिए दबाव बना रहे थे. राजेश ने कहा कि सवर्णों ने मेरे पिता की हत्या कर दी और अब हमें भी जीने नहीं देंगे. पुलिस ने भी कम धाराओं में मुकदमा दर्ज किया है और अभी तक आरोपियों को गिरफ्तार नहीं किया.
पुलिस सवर्णों के प्रभाव में काम कर रही है. वहीं मृतक दलित की पत्नी राजकुमारी ने बताया की सवर्ण उन्हें काफी समय से प्रताड़ित कर रहे थे. वो पूरे परिवार को जान से मारना चाहते थे मगर हम बच गए. उन्हें अपनी सुरक्षा की चिंता सता रही है. वहीं इस मामले में पुलिस अधिक्षक गौरव सिंह का कहना है कि घटना की जांच की जा रही है. मौत कैसे हुई ये पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही पता चलेगा. मृतक द्वारा खुद बयान दिए जाने पर पुलिस कप्तान ने बताया कि अभी इसकी जानकारी नहीं है. जांच कराई जा रही है जो भी दोषी होगा उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी. पुलिस का रवैया दलितों के प्रति न तो उदार नजर आ रहा है और न ही न्यायहित में. ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि दलित की हत्या के मामले में उसके परिवार को कितना और कब न्याय मिलेगा? कौन-कौन से ‘ऐसे मामले’ हैं जिनमें राजनीति नहीं, कीर्तन होना चाहिए
आए दिन कोई न कोई नेता या संवैधानिक प्रमुख, अपने ठोंगे से मूंगफली की तरह उलट कर ये सुझाव बांटने लगता है कि ऐसे मामलों में राजनीति नहीं होनी चाहिए. हम कंफ्यूज़ हैं कि वो कौन से ‘ऐसे मामले’ हैं जिनपर राजनीति नहीं हो सकती है. मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने ये बात कही है. खुद संवैधानिक पद पर रहते हुए आरोपी को क्रूर आतंकवादी बता कर ट्वीट कर रहे हैं, क्या ये राजनीति नहीं है? क्या ये उन्हीं ‘ऐसे मामलों’ में राजनीति नहीं है, जिन पर राजनीति न करने की सलाह बाकियों को दे रहे हैं? क्या मुख्यमंत्री को इतना तो पता होगा कि जब तक आरोप साबित नहीं होते तब तक किसी को आतंकवादी नहीं कहना चाहिए. पर वे खुलकर क्रूर आतंकवादी लिख रहे हैं. इसका मतलब यह नहीं कि मारे गए लोग निर्दोष हैं पर सज़ा अदालत देगी या मुख्यमंत्री ट्वीटर पर देंगे. क्या इस देश में सिखों को, मुसलमानों को और बड़ी संख्या में हिन्दुओं को फर्ज़ी एनकाउंटर में नहीं मारा गया है? क्या ये सही नहीं है कि सभी दलों की सरकारों ने ये काम किया है? अगर एनकाउंटर संदिग्ध नहीं होते हैं तो सुप्रीम कोर्ट ने गाइडलाइन क्यों बनाई है? क्या मुख्यमंत्री को सुप्रीम कोर्ट का आदर नहीं करना चाहिए?
एनकाउंटर अदालत की निगाह में एक संदिग्ध गतिविधि है. एक नहीं, सैंकड़ों उदाहरण दे सकता हूं. वैसे भी इस मामले किसी राज्य का मुख्यमंत्री कैसे बिना साबित हुए क्रूर आतंकवादी लिख सकता है. क्या हमारे राजनेता अपने ऊपर लगे आरोपों को बिना फैसले या जांच के स्वीकर कर लेते हैं? मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अपनी पार्टी के नेताओं और सरकार के अधिकारियों पर व्यापम घोटाले के तहत लगे आरोपों को बिना अंतिम फैसले के स्वीकार करते हैं. जब हमारे नेताओं ने अपने लिए कोई आदर्श मानदंड नहीं बनाए तो दूसरों के लिए कैसे तय कर सकते हैं.
मध्य प्रदेश के एंटी टेरर स्कावड का प्रमुख कह रहा है कि भागे कैदियों के पास बंदूक नहीं थी. तो फिर तस्वीर में कट्टे कहां से दिख रहे हैं. फिर आई जी पुलिस तीन दिन से किस आधार पर कह रहे हैं कि कैदियों ने जवाबी फायरिंग की. सरपंच का बयान है कि वे पत्थर चला रहे थे. दो आईपीएस अफसरों के बयान में इतना अंतर है. क्या इनमें से कोई एक अफसर गद्दार है? देशभक्त नहीं है? क्या इनमें से कोई एक आईपीएस इन क़ैदियों से सहानुभूति रखता है? क्या हम इस स्तर तक आने वाले हैं? रमाशंकर यादव को मारकर अमरूद की लकड़ी और तीस चादरों से सीढ़ी बना रहे थे, उस वक्त जेल प्रशासन क्या कर रहा था. क्या सिपाही लोग भी लकड़ी लाने चले गए थे? क्या ये सवाल न पूछा जाए.
यह बात सबसे ख़तरनाक राजनीति है कि राजनीति नहीं होनी चाहिए. दिल्ली में एक पूर्व सैनिक ने आत्महत्या की. फिर वही बात कि राजनीति नहीं होनी चाहिए. तो क्या राजनीति बंद हो जानी चाहिए. इसे लेकर आप पाठक बिल्कुल भ्रम में न रहे कि यह बात शिवराज सिंह चौहान या बीजेपी के ही नेता मंत्री कहते हैं. आप गूगल करेंगे तो आपको सरकार में रहते हुए कांग्रेस के मंत्रियों का भी यही बयान मिलेगा. मौजूदा ग़ैर बीजेपी सरकारों के मंत्रियों का भी यही बयान मिलेगा. उनके दौर में भी ऐसे मामलों में धक्का मुक्की मिलेगी. सवाल यही है कि तब उनके और अब इनके के बीच क्या बदला? क्या बदलाव सिर्फ सत्ता पर कब्ज़े के लिए होता है? उस कब्ज़े को बनाए रखने के लिए होता है? शहीद हेमराज के घर कितना तांता लगा था. क्या वहां ये नेता तीर्थ करने गए थे? क्या वो राजनीति नहीं थी. क्या वो ग़लत राजनीति थी? आज भी शहीद हेमराज के परिवार की तमाम शिकायतें हैं. वहां जाने वाले नेताओं में कोई दोबारा गया? तो फिर रामकिशन ग्रेवाल के परिवारों से मिलने की बात राजनीति कैसी है? क्या ये इतना बड़ा अपराध है कि एक उपमुख्यमंत्री को आठ घंटे हिरासत में ले लिया जाए. राहुल गांधी को थाने-थाने घुमाया जाए. ऊपर से ग्रेवाल के बेटों के साथ जो पुलिस ने किया वो क्या था. क्या नेताओं को बेटों से न मिलने देना, राजनीति नहीं है? ऐसे मामले तो देश के होते हैं तो सरकार के मंत्री क्यों नहीं गए रामकिशन के परिवार से मिलने. क्या इस देश के नेताओं ने सैनिकों की शहादत को दलों में बांट लिया है?
दरअसल, आप पाठकों को यह खेल समझना होगा. हर राजनीतिक दल के भीतर राजनीति समाप्त हो गई है. किसी दल में आंतरिक लोकतंत्र नहीं रहा. दलों के भीतर लोकतंत्र ख़त्म करने के बाद अब उनकी नज़र देश के भीतर लोकतंत्र को समाप्त करने की है. इसीलिए राजनीति नहीं करने का लेक्चर झाड़ने वाले नेताओं की बाढ़ आ गई है. उत्तर प्रदेश में आतंक के झूठे केसों में फंसाए गए नागरिकों के अधिकारों की मांग को लेकर रिहाई मंच ने प्रदर्शन किया. आप पता कीजिए कि रिहाई मंच के राजीव यादव को पुलिस ने किस कदर मारा है. वहां तो बीजेपी भी इस मसले पर चुप है और बीजेपी की सरकार पर सवाल उठाने वाले भी चुप हैं. यूपी हो या दिल्ली या मध्य प्रदेश कहीं भी सवाल करने वालों की ख़ैर नहीं है. अलग अलग संस्थानों के पत्रकारों से मिलता रहता हूं. सभी डरे हुए लगते हैं. नहीं सर, लाइन के ख़िलाफ़ नहीं लिख सकते मगर असली कहानी ये है. सही बात है, कितने पत्रकार इस्तीफा दे सकते हैं, इस्तीफा तो अंतिम हल नहीं है. क्या हमारा लोकतंत्र इतना खोखला हो गया है कि वो दस पचास ऐसे पत्रकारों का सामना नहीं कर सकता जो सवाल करते हैं. क्यों मुझसे आधी उम्र का नौजवान पत्रकार सलाह देता है कि आपकी चिन्ता होती है. कोई नौकरी नहीं देगा. क्यों वो अपनी नौकरी की चिंता में डूबा हुआ है कि कुछ लिख देंगे तो नौकरी जाएगी. इस भ्रम में मत रहिए कि ये दिल्ली की बात है. हर राज्य के पत्रकारों से यही सुन रहा हूं.
आप पाठक और दर्शक इतना तो समझिये कि किसी भी नेता या दल को पसंद करना आपकी अपनी राजनीतिक समझ का मामला है. आप बिल्कुल पसंद कीजिए लेकिन किसी नेता का फैन मत बनियेगा. जनता और फैन में अंतर होता है. फैन अपने स्टार की बकवास फिल्म भी अपने पैसे से देखता है. जनता वो होती है जो नेताओं का बकवास नहीं झेलती. सवालों से ही आपका अपने राजनीतिक निर्णय के प्रति भरोसा बढ़ता है. यह तभी होगा जब आम पत्रकार डरा हुआ नहीं होगा. अगर नेता इस तरह सवाल करने पर हमला करेंगे तो मेरी एक बात लिखकर पर्स में रख लीजिए. यही नेता एक दिन आप पर लाठी बरसायेंगे और कहेंगे कि देखो, हमने सवाल पूछने वाले दो कौड़ी के पत्रकारों को सेट कर दिया, अब तुम ज्यादा उछलो कूदो मत.
ऐसा होगा नहीं. ऐसा कभी नहीं हो सकता. निराश होने की ज़रूरत भी नहीं है. फिर भी पत्रकारों के भीतर भय के इस माहौल को दूर करने की ज़िम्मेदारी जनता की भी है. जब वो सत्ता बदल सकती है तो प्रेस के भीतर घुस रही सत्ता को भी ठीक कर सकती है. इसलिए आप किसी के समर्थक हों, सवाल कीजिए कि ये क्या अखबार है, ये क्या चैनल है, इसमें ख़बरों की जगह गुणगाण क्यों हैं. हर ख़बर गुणगाण की चासनी में क्यों पेश की जा रही है. इसमें सवाल क्यों नहीं हैं. सवाल पूछना कब देश विरोधी और लोकतंत्र विरोधी हो गया.
क्यों हर दूसरा आदमी मीडिया की आज़ादी को लेकर बात कर रहा है? आप पाठक और दर्शक जो महीने से लेकर अब तो घंटे-घंटे डेटा के पैसे दे रहे हैं, पता तो कीजिए कि वास्तविकता क्या है? हमारी आज़ादी आपकी आज़ादी की पहली शर्त है. तीन दिन से इंटरनेशनल कॉल के ज़रिये कई लोग फोन कर भद्दी गालियां दे रहे हैं, अगर आपने अपनी राजनीतिक आस्था के चलते इनका बचाव किया तो ऐसे लोगों के पास आपका भी फोन नंबर होगा. आपकी भी बारी आएगी. रामनाथ गोयनका पुरस्कार वितरण के समापन भाषण में इंडियन एक्सप्रेस के संपादक राजकमल झा ने प्रधानमंत्री के सामने ही एक किस्सा सुना दिया. एक बार अखबार के संस्थापक और स्वतंत्रता सेनानी रामनाथ गोयनका जी से किसी मुख्यमंत्री ने कह दिया कि आपका रिपोर्टर अच्छा काम कर रहा है. गोयनका जी ने उसे नौकरी से निकाल दिया. आज ऐसे पत्रकारों को सरकार इनाम देती है. सुरक्षा देती है. आप पाठकों को सोचना चाहिए. कल सुबह जब अख़बार देखियेगा, चैनल की हेडलाइन देखियेगा, तो सोचियेगा. और हां, कहियेगा कि ऐसे सभी मामलों में राजनीति होनी चाहिए क्योंकि राजनीति लोकतंत्र की आत्मा है. लोकतंत्र का शत्रु नहीं है.
साभारः रविश कुमार के ब्लॉग कस्बा से. शोषण के गढ़ हैं भारत के शैक्षिक संस्थान
बाबासाहेब ने कहा था कि हम किसी भी दिशा में मुड़े जातिवाद का राक्षस आगे खड़ा मिलेगा. समाज में व्याप्त जातिवाद आज एक नये रूप-रंग में हमारे सामने आ गया है. जातिवाद ने अपना चेहरा समय के साथ साथ बदल लिया है, अगर गांव देहात को एक बार के लिए छोड़ भी दिया जाये तो शहरी संस्कृति में यह एक नये रूप में हमारे सामने हैं. लगता है कि सुरसा के मुख की तरह बढते जा रहे बाजारवाद का यह भी अहम हिस्सा बन गया है. देखने में यह साफ-सुथरा नजर आता है पर अंदर से पहले से ज्यादा घिनौना और खतरनाक है. खासकर शिक्षण संस्थाओं में यह सीधे तौर पर नजर नहीं आता परंतु यह अन्दर ही अंदर इनकी गरिमा को खोखला करने पर तुला है. जब से उदारीकरण व निजीकरण के रंग में यह ढला है तब से इसने ब्राह्मणवाद का एक ओर नया चौला पहन लिया है.
अब यह संविधान के तहत दिये प्रतिनिधित्व पर हमला नहीं करता बल्कि उनको ही खत्म करने पर तुला है जो प्रतिनिधित्व लेने के योग्य बन चुके है. यह हमाला अब उन पर काम कर रहा है जो योग्य नहीं है. इनका निशाना अब सीधे योग्यता पर ही है. ना बजेगा बांस, न बजेगी बांसुरी. इसकी चिर्ताथता नजर आ रही है. चाहे वह हरियाणा में मिर्चपुर में जिन्दा जलाने वाली लड़की हो, रोहित वेमुला हो, या फ़िर अब लखनऊ विश्वविधायलय से निष्कासित छात्र हो या इन शिक्षण संस्थाओं में पढ़ाने वाले दलित शिक्षक हो. अब यह ऐसा कोई भी मौका नहीं चूकना चाहता.
बार-बार छात्रों की प्रतिभा और अध्यापकों की योग्यता पर प्रश्न खड़े कर उसे इतना मजबूर किया जाता है कि वह इन शिक्षण संस्थाओं से अपने आप मुंह मोड़ ले या फिर उनकी भाषा और उनकी संस्कृति को अपना ले, उनके साथ खड़े हो जाये. अगर उनकी अपनी भाषा, अपनी अभिव्यक्ति है तो वह उनके बर्दास्त के बाहर है. यह न सिर्फ़ मेरे साथ एक शिक्षक होने के नाते हो रहा है बल्कि शायद हर उस शिक्षक के साथ है जो अपनी बात रखने का हौंसला रखते है. उन्हें इतना टोर्चर किया जाता है कि वह खुद पर ही संदेह करना शुरु कर देता है कि कहीं ये सब ही तो ठीक नहीं है, शायद मैं ही गलत होंऊ. पर इस ब्राह्मणवाद को समझना ज्यादा कठीन भी नहीं है. यह ब्राह्मणवाद उस कछुए की तरह है जो सामने खतरा देख अपने पैर और गर्दन को सिकोड़ लेता है पर जैसे ही खतरा निकल जाता है यह फिर से अपने पर निकाल लेता है, और आगे बढ़ता है. इसे हम भारतीय प्राचीन समाज के नजरिये से जांच-परख सकते है.
मेरे महाविद्यालय में जो दिल्ली विश्वविद्यालय का जाना माना महाविद्यालय है. शोषण और अपनाम करने के अलग अलग तरीके ढूंढ लेता है. पिछले वर्ष मैने अपने संस्कृत विभाग की सबजैक्ट सोसायटी की संयोजिका होने के नाते अन्तर्महाविद्यालयीय श्लोकोच्चारण और प्रश्नमंच प्रतियोगिता आयोजित की थी. संयोजिका होने के नाते वितरीत किये जाने वाले सर्टिफ़िकेट पर मेरे हस्तक्षार होने थे और साथ में ही प्रींसिपल जे.पी. मिश्र के होने थे. मैने सभी सर्टिफ़िकेट पर साइन किये थे और उसके बाद प्राचार्य के कक्ष मे साइन करने के लिए मैं खुद लेकर गयी. उन्होने कहा मैं सेमिनार कक्ष में ही साइन करके भेज दूंगा. मैं वापिस प्रोग्राम स्थल जो महाविद्यालय का सेमिनार हाल था आ गयी थी.
प्रोग्राम चल रहा था. मैं सर्टिफ़िकेट मुझ तक पंहुचने का इन्तजार कर रही थी. उस वक्त मेरे ही कुलिग श्री. वत्स माइक पर बोल रहे थे कि अचानक उनका फोन बज उठा. हम सब मंच पर थे और हमारे सामने हमारे संस्कृत के सभी छात्र-छात्राएं. उन्होने वहीं पर खड़े ही खड़े फोन उठा लिया. सबको सुन रहा था कि प्राचार्य क्या बोल रहे हैं, उन्होंने उनसे पूछा कि क्या सर्टिफ़िकेट पर साइन कर दूं. मैं सुनकर दंग रह गयी. क्या मेरे साइन देखकर उन्हे साइन नहीं करनी चाहिए. मेरा अपमान किया उन्होने. जबकि मैं ही नहीं सबने सुना. क्या इज्जत रही मेरी. पल नहीं लगा उनको मेरी औकात दिखाने में. श्री वत्स ने क्या कहा- “कर दिजिए साइन, मैडम ने तो किया हुआ है, उसमें मुझसे पूछने की क्या आवश्यकता है” ये माइक से ही बोला जा रहा था. मंच पर विभाग के सभी अध्यापक और बाहर से आये हुए तीन निर्णायक भी थे. मैं आंखे नीची करके बैठी रही. मन तो किया की प्रोग्राम छोड़कर सीधा आफिस में जाऊं और इसका जवाब मांगू. पर वे यही तो चाहते थे कि हम अपनी सारी अनर्जी जलते भुनते निकाल लें और छात्र भी ये समझे कि हम कोई प्रोग्राम ही नहीं करवा सकते. गुस्से में या तश में आकर हम विश्वविद्यालयों की जिम्मेदारी हीं न ले और इनको ये ही मौका मिलता रहे कि हम केवल आरक्षण लेकर नौकरी पा जाते है और तो हमे कुछ आता जाता नहीं. इसलिए मन मसोस कर रह गयी. क्या जब भी कोई प्रोग्राम किया जाता है तो उस पर साइन किसी ओर व्यक्ति से पूछकर वे करते है? ऐसा कोई सिद्धांत नहीं है. फिर क्युं उन्हें मेरे साइन को देखकर भी किसी ओर से पूंछकर साइन किये. इसमें ब्राह्मणवाद काम कर रहा था, जातिवाद का जहर इनके दिमागों में कूट-कूट कर भरा है. ये कभी मौका नहीं छोड़ते कि कोई बिना अपमान के छूट जाये. इसमें खास बात यह भी थी कि वे मेरे ही विभाग के भी थे.
ऐसी बहुत सी घटनायें शिक्षण संस्थाओं में घटती है जो उनके लिए बहुत छोटी-छोटी होती है परन्तु हमारे लिए हमारी अस्मिता का प्रश्न. मुझे एक दिन प्राचार्य ने अपने कक्ष में बुलाया और कहा कि अब के एग्जाम वर्ष 2016-2017 में आपको कोरडिनेट करना है. उस समय प्राचार्य के पी.ए. दिनेशा जी भी वहीं थे और हमारे स्टाफ कॉन्सिल के अध्यापक और अध्यापकों के साथ सभी बैठे थे. मैने हां की.
आज दिनांक 9/11/2016 को स्टाफ रूम में प्राचार्य महोदय आये तो मेरी ही एक कुलिग राधिका ने उनसे एग्जाम कोरडिनेट करने के बारे में पूछा तो मैने भी उनकी बात पूरी होने के बाद पूछ लिया कि मुझे अभी तक लैटर नहीं मिला है और न हीं कोई ऑफिस से फोन आया कोरडिनेट करने के लिए. प्राचार्य ने कहा-“ तुम्हे नहीं रखा उसमें”, मैने पूछा क्यूं नहीं रखा तो उन्होंने बताया की तुम्हारे बहुत से फ्रेंड्स है इसलिए नहीं लगाया, सबने मना किया कि तुम्हे न रखा जाये”, मैने पूछा फ्रेंड्स यहां पर किसके नहीं है, सबके हैं, मैं जानती हुं कि आपने क्य़ू किया. आपको क्या लगता है कि मुझे इस तरह रोकने से मैं रुक सकती हूं. वे अच्छी तरह जानते है कि प्रमोशन में कोरडिनेट करने के प्वाईंट मिलते है. कहीं मुझे मिल न जाये इसलिए वे नहीं चाहते थे कि मैं कॉलेज मे रहते हुए कोई प्रमोशन पा लूं.
प्रमोशन रोक देने के लिए वे क्या इस स्तर पर जाकर भी सोच सकते हैं, या जो बेगारी हम दलितों से वे एग्जाम में ड्यूटी लगवा लगवाकर करवाते हैं और दूसरे सो कॉल्ड अपर कास्ट के टीचर मौज उड़ाते हैं, इस पर कहीं मेरे एग्जाम कंडक्ट करवाने से तो उनको कोई प्रोब्लम नहीं हो जायेगी, इसलिए उन्होंने मुझे हटा दिया. वे और कुछ नहीं बोले. पर मेरी लिए उनकी चुप्पी भी तीर की तह से लग रही थी, पर आज मैने अपने आपको इतना मजबूत कर लिया था कि मेरी आंख से पानी न निकले, वे इसी का इन्तजार कर रहे थे. मैं इस अपमान का घूंट पिये वही सीट पर बैठी रही. ये उन घटनाओं में एक ओर शोषण की घटना थी मेरे लिए, मेरे काम पर, मेरी जिम्मेदारी पर प्रश्नचिहन कि हम अभी भी रिलायबल नहीं है, हम पर विश्वास नहीं किया जा सकता. क्यों?
उतर साफ है, धुंधला नहीं, कोई कोहरा नहीं कि हम दलित अभी इतने उनके विश्वास से पात्र नहीं है कि हम इस जिम्मेदारी को सम्भालने के लिए तैयार हो. नौकरी तो उन्होंने देने दी क्योंकि बाबासाहेब ने आरक्षण के प्रावधान दिये है. संविधान में पर इसे व्यवहारिकता में लाना और असल जामा पहनाना अभी भी ब्राह्मणवाद के हाथ में ही है. इन सब पर सवाल उठना अब भी बाकि है. वे अब हम जैसे जागरुक शिक्षकों को भी हांकना चाहते है पर वे अब नहीं हांक पायेंगे. आज कम से कम मुझे इस बात का संतोष है कि मैने उनके सामने कभी उनके अपनों के सामने आंख में आंख मिलाकर कह दिया कि मैं सब जानती हूं कि आपने ऐसा क्यूं किया. आप मुझे रोक नहीं पायेंगे. कम से कम अपनी बात कहने के इस साहस को मैं उनके मुंह पर लगा तमाचा मानती हुं. ये शिक्षण संस्थाओं के पहले भी इसके दरवाजे हमारे लिए सदियों तक बंद रहे, और आज भी शोषण के गढ़ बन रहे हैं परंतु कब तक वे इसे स्थिर कर पायेंगे.
पिसती रहेगी मानवता, समय की धार से कब तक
अंधियारे को चीरकर, उजाला होगा कब तक.
डॉ. अम्बेडकर की राजनीति
डॉ. अम्बेडकर दलित राजनीति के जनक माने जाते हैं क्योंकि उन्होंने ही सबसे पहले दलितों के लिए राजनैतिक अधिकारों की लडाई लड़ी थी. उन्होंने ही भारत के भावी संविधान के निर्माण के संबंध में लंदन में 1930-32 में हुए गोलमेज़ सम्मलेन में दलितों को एक अलग अल्पसंख्यक समूह के रूप में मान्यता दिलाई थी और अन्य अल्पसंख्यकों मुस्लिम, सिख, ईसाई की तरह अलग अधिकार दिए जाने की मांग को स्वीकार करवाया था. 1932 में जब “कम्युनल अवार्ड” के अंतर्गत दलितों को भी अन्य अल्पसंख्यकों की तरह अलग मताधिकार मिला तो गांधीजी ने उसके विरोध में यह कहते हुए कि इससे हिन्दू समाज टूट जायेगा, आमरण अनशन की धमकी दे डाली. जबकि उन्हें अन्य अल्पसंख्यकों को यह अधिकार दिए जाने में कोई आपत्ति नहीं थी. अंत में अनुचित दबाव में मजबूर होकर डॉ. आम्बेडकर को गांधीजी की जान बचाने के लिए “पूना पैकट” करना पड़ा और मजबूरन दलितों के राजनैतिक स्वतंत्रता के अधिकार की बलि देनी पड़ी तथा संयुक्त चुनाव क्षेत्र और आरक्षित सीटें स्वीकार करनी पड़ीं.
गोलमेज़ कांफ्रेंस में लिए गए निर्णय के अनुसार नया कानून “गवर्नमेंट ऑफ इंडिया 1935 एक्ट” 1936 में लागू हुआ. इसके अंतर्गत 1937 में पहला चुनाव कराने की घोषणा की गयी. इस चुनाव में भाग लेने के लिए डॉ. अम्बेडकर ने अगस्त 1936 में इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी (स्वतंत्र मजदूर पार्टी) की स्थापना की और बम्बई प्रेज़ीडैन्सी में 17 सीटों पर चुनाव लड़ा और 15 सीटें जीतीं. इसके बाद उन्होंने 19 जुलाई, 1942 को आल इंडिया शैडयूल्ड कास्ट्स फेडरेशन बनायी. इस पार्टी से उन्होंने 1946 और 1952 में चुनाव लड़े परन्तु इसमें पूना पैक्ट के दुष्प्रभाव के कारण उन्हें कोई विशेष सफलता नहीं मिली. फलस्वरूप 1952 और 1954 के चुनाव में डॉ. अम्बेडकर स्वयं हार गए. अंत में उन्होंने 14 अक्तूबर 1956 को नागपुर में आल इंडिया शैडयूल्ड कास्ट्स फेडरेशन को भंग करके रिपब्लिकन पार्टी आफ इंडिया (आरपीआई) नाम से नयी पार्टी बनाने की घोषणा की. इसके लिए उन्होंने इस पार्टी का संविधान भी बनाया. वास्तव में यह पार्टी उनके परिनिर्वाण के बाद 3 अक्तूबर, 1957 को अस्तित्व में आई. इस विवरण के अनुसार बाबासाहेब ने अपने जीवन काल में तीन राजनैतिक पार्टियां बनायीं. इनमें से वर्तमान में आरपीआई अलग-अलग गुटों के रूप में मौजूद है. वर्तमान संदर्भ में यह देखना ज़रूरी है कि बाबासाहेब ने जिन राजनैतिक पार्टियों के माध्यम से राजनीति की क्या वह जाति की राजनीति थी या विभिन्न वर्गों के मुद्दों की राजनीति थी. इसके लिए उनके द्वारा स्थापित पार्टियों के एजेंडा का विश्लेषण ज़रूरी है.
सबसे पहले बाबासाहेब की स्वतंत्र मजदूर पार्टी को देखें. डॉ. अम्बेडकर ने अपने बयान में पार्टी के बनाने के कारणों और उसके काम के बारे में स्पष्टीकरण देते हुए कहा था- “’इस बात को ध्यान में रखते हुए कि आज पार्टियों को सम्प्रदाय के आधार पर संगठित करने का समय नहीं है, मैंने अपने मित्रों की इच्छाओं से सहमति रखते हुए पार्टी का नाम तथा इसके प्रोग्राम को विशाल बना दिया है ताकि अन्य वर्ग के लोगों के साथ राजनीतिक सहयोग संभव हो सके. पार्टी का मुख्य केंद्रबिंदु तो दलित जातियों के 15 सदस्य ही रहेंगे परन्तु अन्य वर्ग के लोग भी पार्टी में शामिल हो सकेंगे.’” पार्टी के घोषणापत्र में भूमिहीन, गरीब किसानों और पट्टेदारों और मजदूरों की ज़रूरतों और समस्याओं का निवारण, पुराने उद्योगों की पुनर्स्थापना और नए उद्योगों की स्थापना, छोटी जोतों की चकबंदी, तकनीकी शिक्षा का विस्तार, उद्योगों पर राज्य का नियंत्रण, भूमि के पट्टेदारों का ज़मीदारों द्वारा शोषण और बेदखली, औद्योगिक मजदूरों के संरक्षण के लिए कानून, सभी प्रकार की कट्टरपंथी और प्रतिक्रियावाद को दण्डित करने, दान में मिले पैसे से शिक्षा प्रसार, गांव के नजरिये को आधुनिक बनाने के लिए सफाई और मकानों का नियोजन और गांव के लिए हाल, पुस्तकालय और सिनेमा घर आदि का प्रावधान करना था. पार्टी ने मुख्यतया किसानों और गरीब मजदूरों के कल्याण पर बल दिया था. पार्टी की कोशिश लोगों को लोकतंत्र के तरीकों से शिक्षित करना, उनके सामने सही विचारधारा रखना और उन्हें कानून द्वारा राजनीतिक कार्रवाही के लिए संगठित करना आदि था. इससे स्पष्ट है कि इस पार्टी की राजनीति जातिवादी न होकर वर्ग और मुद्दा आधारित थी और इसके केंद्र में मुख्यतया दलित थे. यह पार्टी बम्बई विधान सभा में सत्ताधारी कांग्रेस की विपक्षी पार्टी थी. इस पार्टी ने अपने कार्यकाल में बहुत जनोपयोगी कानून बनवाये थे. इस पार्टी के विरोध के कारण ही फैक्टरियों में हड़ताल पर रोक लगाने संबंधी औद्योगिक विवाद बिल पास नहीं हो सका था.
अब बाबासाहेब द्वारा 1942 में स्थापित आल इंडिया शिडयूल्ड कास्ट्स फेडरेशन के उद्देश्य और एजेंडा को देखा जाये. डॉ. अम्बेडकर ने इसे सत्ताधारी कांग्रेस और सोशलिस्ट पार्टियों के बीच संतुलन बनाने के लिए तीसरी पार्टी के रूप में स्थापित करने की बात कही थी. पार्टी के मैनिफिस्टो में कुछ मुख्य मुद्दे थे. मसलन, सभी भारतीय समानता के अधिकारी हैं, सभी भारतीयों के लिए धार्मिक, आर्थिक और राजनैतिक समानता की पक्षधरता, सभी भारतीयों को अभाव और भय से मुक्त रखना राज्य की जिम्मेवारी है, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व का संरक्षण, आदमी का आदमी द्वारा, वर्ग का वर्ग द्वारा तथा राष्ट्र का राष्ट्र द्वारा उत्पीड़न और शोषण से मुक्ति और सरकार की संसदीय व्यवस्था का संरक्षण, आर्थिक प्रोग्राम के अंतर्गत बीमा का राष्ट्रीयकरण और सभी सरकारी कर्मचारियों के लिए अनिवार्य बीमा योजना और नशेबंदी का निषेध था. यद्यपि यह पार्टी पूना पैक्ट के कारण शक्तिशाली कांग्रेस के सामने चुनाव में कोई विशेष सफलता प्राप्त नहीं कर सकी, परन्तु पार्टी के एजेंडे और जन आंदोलन जैसे भूमि आन्दोलन आदि के कारण अछूत एक राजनीतिक झंडे के तले जमा होने लगे जिससे उनमें आत्मविश्वास बढ़ने लगा. फेडरेशन के प्रोग्राम से स्पष्ट है कि यदपि इस पार्टी के केंद्र में दलित थे परन्तु पार्टी जाति की राजनीति की जगह मुद्दों पर राजनीति करती थी और इसका फलक व्यापक था.
जैसा कि ऊपर लिखा जा चुका है कि बाबासाहेब ने बदलती परिस्थितियों और लोगों की ज़रुरत को ध्यान में रख कर एक नयी राजनीतिक पार्टी “रिपब्लिकन पार्टी आफ इंडिया” की स्थापना की घोषणा 14 अक्तूबर, 1956 को की थी और इसका संविधान भी उन्होंने ही बनाया था. इस पार्टी को बनाने के पीछे उनका मुख्य उद्देश्य एक ऐसी पार्टी बनाना था जो संविधान में किये गए वादों के अनुसार हो और उन्हें पूरा करना उसका उद्देश्य हो. वे इसे केवल अछूतों की पार्टी नहीं बनाना चाहते थे क्योंकि एक जाति या वर्ग के नाम पर बनायी गयी पार्टी सत्ता प्राप्त नहीं कर सकती. वह केवल दबाव डालने वाला ग्रुप ही बन सकती है. आरपीआई की स्थापना के पीछे कुछ मुख्य ध्येय था. जैसे-
(1) समाज व्यवस्था से विषमतायें हटाई जाएं ताकि कोई विशेषाधिकार प्राप्त तथा वंचित वर्ग न रहे.
(2) दो पार्टी सिस्टम हो एक सत्ता में दूसरा विरोधी पक्ष
(3) कानून के सामने समानता और सबके लिए एक जैसा कानून हो
(4) समाज में नैतिक मूल्यों की स्थापना
(5) अल्पसंख्यक लोगों के साथ सामान व्यवहार
(6) मानवता की भावना जिसका भारतीय समाज में अभाव रहा है
पार्टी के संविधान की प्रस्तावना में पार्टी का मुख्य लक्ष्य व उद्देश्य न्याय, स्वतंत्रता, समता व बंधुता” को प्राप्त करना था. पार्टी का कार्यक्रम बहुत व्यापक था. पार्टी की स्थापना के पीछे बाबासाहेब का उद्देश्य था कि अल्पसंख्यक लोग, गरीब मुस्लिम, गरीब ईसाई, गरीब तथा निचली जाति के सिक्ख तथा कमज़ोर वर्ग के अछूत, पिछड़ी जातियों के लोग, आदिम जातियों के लोग, शोषण का अंत, न्याय और प्रगति चाहने वाले सभी लोग एक झंडे के तले संगठित हो सकें और पूंजीपतियों के मुकाबले में खड़े होकर संविधान तथा अपने अधिकारों की रक्षा कर सकें. (दलित राजनीति और संगठन – भगवान दास)
आरपीआई की विधिवत स्थापना बाबासाहेब के परिनिर्वाण के बाद 1957 में हुई और पार्टी ने नए एजेंडे के साथ 1957 व 1962 का चुनाव लड़ा. पार्टी को महाराष्ट्र के अलावा देश के अन्य हिस्सों में भी अच्छी सफलता मिली. शुरू में पार्टी ने ज़मीन के बंटवारे, नौकरियों में आरक्षण, न्यूनतम मजदूरी, दलितों से बौद्ध बने लोगों लिए आरक्षण आदि के लिए संघर्ष किया. पार्टी में मुसलमान, सिक्ख और जैन आदि धर्मों के लोग शामिल हुए. उनमें पंजाब के जनरल राजिंदर सिंह स्पैरो, दिल्ली में डॉ. अब्बास मलिक, उत्तर प्रदेश में राहत मोलाई, डॉ. छेदी लाल साथी, नासिर अहमद, बंगाल में श्री एस. एच. घोष आदि प्रसिद्ध व्यक्ति और कार्यकर्ता हुए. 1964 में 6 दिसंबर से फरवरी 1965 तक पार्टी ने स्वतंत्र भारत में ज़मीन के मुद्दे को लेकर पहला जेल भरो आन्दोलन चलाया जिसमें तीन लाख से अधिक पार्टी कार्यकर्ता जेल गए. सरकार को मजबूर होकर भूमि आवंटन और कुछ अन्य मांगें माननी पड़ीं.
इस दौर में आरपीआई दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों की एक मज़बूत पार्टी के रूप में उभर कर सामने आई. परन्तु 1962 के बाद यह पार्टी टूटने लगी. इसका मुख्य कारण था कि इस पार्टी से उस समय की सब से मज़बूत राजनैतिक पार्टी कांग्रेस को महाराष्ट्र में खतरा पैदा हो रहा था. इस पार्टी की एक बड़ी कमजोरी थी कि इसकी सदस्यता केवल महारों तक ही सीमित थी. कांग्रेस के नेताओं ने इस पार्टी के नेताओं की कमजोरियों का फायदा उठा कर पार्टी में तोड़फोड़ शुरू कर दी. सबसे पहले उन्होंने पार्टी के सबसे शक्तिशाली नेता दादा साहेब गायकवाड़ को पटाया और उन्हें राज्य सभा का सदस्य बना दिया. इस पर पार्टी दो गुटों में बंट गयी. गायकवाड का एक गुट कांग्रेस के साथ था जबकि दूसरा बी.डी.खोब्रागडे गुट विरोध में था. इसके बाद अलग नेताओं के नाम पर अलग गुट बनते गए और वर्तमान में यह कई गुटों में बंट कर बेअसर हो चुकी है. इन गुटों के नेता रिपब्लिकन नाम का इस्तेमाल तो करते हैं परन्तु उनका इस पार्टी के मूल एजेंडे से कुछ भी लेना देना नहीं है. वे अपने-अपने फायदे के लिए अलग पार्टियों से समझौते करते हैं और यदा-कदा लाभ भी उठाते हैं.
एस. आर. दारापुरी, राष्ट्रीय प्रवक्ता, आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट केंद्र सरकार चाहती है न पढ़ें दलित छात्र, इसलिए रोकी छात्रवृत्तिः टम्टा
नई टिहरी। राज्यसभा सांसद प्रदीप टम्टा ने केंद्र सरकार पर निशाना साधा. उन्होंने कहा कि देश के अंदर कांग्रेस ही दलितों की हितैषी है. टम्टा ने कहा कि केंद्र सरकार ने दो साल से अनुसूचित जाति के छात्रों को मिलने वाली एक अरब 27 करोड़ रुपये छात्रवृत्ति जारी नहीं की है. अगर भाजपा दलित हितैशी होती तो दलित छात्रों की छात्रवृति को नहीं रोकती. प्रदीप टम्टा ने कहा कि भाजपा दलितों के बीच जाकर गलत बयानबाजी कर रही है.
बीते रविवार को कांग्रेस के प्रतापनगर विधानसभा के अनुसूचित जाति सम्मेलन में राज्यसभा सांसद प्रदीप टम्टा ने कहा केंद्र सरकार दलित छात्रों को आगे बढ़ने का अवसर नहीं देना चाहती. इतना ही नहीं भाजपा के लोग धर्म और जाति के नाम पर वोट की राजनीति करते है, जिससे पूरे समाज की सामाजिक समरसता एवं विकास की गति को नुकसान होता है.
विधायक विक्रम नेगी ने कहा कि प्रदेश सरकार ने सभी वर्गों का ध्यान रखते हुए योजनाओं को धरातल पर उतारा है. जिला पंचायत सदस्य व कांग्रेस अनुसूचित जाति विभाग के प्रदेश उपाध्यक्ष मुरारीलाल खंडवाल ने केंद्र सरकार पर दलितों की उपेक्षा का आरोप लगाते हुए एससीपी की योजनाओं हेतु जिलास्तर पर बजट आवंटन करने समेत कई समस्याओं को रखा. जाति: भारत से ब्रिटेन तक
रिटेन में जातिगत भेदभाव के विरूद्ध कानून बनाने की मांग और इसकी कोशिशों के विरोध ने एक बार फिर जाति-व्यवस्था और इसके पोषकों, समर्थकों के बारे में सोचने को विवश किया है. भारतीय, विशेष रूप से हिंदू समाज में जाति, जातिवाद, जातिगत भेदभाव और अस्पृश्यता के अस्तित्व के बावजूद देश में यह कहने या दावा करने वालों की कमी नहीं है कि समाज में आज जाति की कोई प्रासंगिकता नहीं रह गयी है. जाति और तदजनित ऊंच-नीच का भेदभाव और अस्पृश्यता जैसी कोई बात अब समाज में नहीं रह गयी है. यह केवल दूर-दराज गांवों में अशिक्षित, अर्द्ध-शिक्षित लोगों में ही थोड़ी बहुत जीवित है. शिक्षा और आर्थिक विकास के साथ-साथ यह वहां पर भी समाप्त हो जाएगी. उनके तर्क का आधार यह है कि भारतीय समाज में जाति की बुराई का कारण शिक्षा की कमी के कारण रही. जहां-जहां तक शिक्षा का प्रसार हो रहा है जाति अपना अस्तित्व खोती जा रही है. इसके समर्थन में कई उदाहरण भी दिए जाते हैं. इस प्रकार के दावे और कथन प्राय: सवर्ण हिंदुओं द्वारा किए जाते हैं.
समाज से जाति के उन्मूलन का दावा करने वाले लोग गर्व के साथ यह बताना भी नहीं भूलते कि हम दलितों के साथ कोई भेदभाव नहीं करते, उनके घर जाते हैं, उनके साथ उठते-बैठते और खाते-पीते हैं. दलितों को अपने घरों में वे कितना बुलाते हैं, कितना खिलाते-पिलाते हैं. दलितों के घरों में जाकर मांस और मदिरा सेवन का सुख प्राप्त करने वाले सवर्ण क्या अपने घरों में भी उसी प्रकार दलितों को मांस और मदिरा का सेवन कराते हैं. प्रश्न यह है कि जितने अधिकार और स्वतंत्रता से सवर्ण लोग दलितों के घरों में जाते हैं और जितना सम्मान पाते हैं क्या उतने ही अधिकार और स्वतंत्रता से दलित उनके घरों में आते-जाते हैं या आ-जा सकते हैं. क्या सवर्णों द्वारा अपने घरों में दलितों को उतना ही सम्मान दिया जाता है, जितना वे दलितों के घरों में पाते हैं. यदि ऐसा नहीं है तो फिर उनके बीच समानता कैसी है. फिर किस आधार पर कहा जा सकता है कि जातिगत भेदभाव समाप्त हो गया है. सवर्णों द्वारा दलितों के घर जाकर उनके साथ बैठकर खाने-पीने मात्र से जातिगत भेदभाव को समाप्त हुआ नहीं माना जा सकता.
जहां तक अशिक्षा को जातिगत भेदभाव का आधार मानने का प्रश्न है, यह एक निहायत खोखला तर्क है. भारत से इंग्लैण्ड, अमेरिका और अन्य देशों में उच्च शिक्षा, रोजगार और व्यापार के लिए जाने वाले लोग प्राय: शिक्षित हैं. और इन देशों में काले-गोरे रंग के आधार पर नस्लीय भेदभाव भले ही है, किंतु एक ही जैसे रंग रूप वाले लोगों के बीच जाति जैसा कोई भेदभाव और अस्पृश्यता वहां पर नहीं है. यह भी एक सच है कि भारत से विदेशों में जाकर नौकरी, व्यापार करने वाले अधिकांश लोग उच्च जातीय हैं. प्रारम्भ में तो सब के सब वही जाते थे. बाबासाहेब आम्बेडकर के लम्बे और कठिन संघर्ष के परिणामस्वरूप स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात दलितों को शिक्षा के अवसर मिले और उनकी आर्थिक स्थिति में थोड़ा सुधार हुआ तो कुछ दलित भी दूसरों की देखादेखी अब विदेशों में जाने लगे हैं. सदियों से जातिगत घृणा, अपमान, उपेक्षा और उत्पीड़न की मार झेलने वाले दलित समाज का कोई भी व्यक्ति जाति को अपनाना नहीं चाहता, अपितु वह इससे मुक्त होना चाहता है. समाज में इस बात के अनेक उदाहरण मिल जाएंगे जहां दलितों ने अपनी जाति छिपायी है. कई दलित लेखकों ने इस तथ्य को अपनी आत्मकथाओं या आत्म-कथ्यों में अभिव्यक्त किया है. बाबासाहेब आम्बेडकर को बड़ौदा राज्य की नौकरी के दौरान रहने के लिए मकान नहीं मिलने के कारण अपनी जाति छिपाकर रहना पड़ा था. यह स्थिति आज भी है. दलितों के लिए अपनी जाति छिपाकर सवर्णों के बीच रहना सरल नहीं है, क्योंकि बाद में सच्चाई पता चलने पर उनको जिस अपमान और जिल्लत का सामना करना पड़ता है वह कष्टपूर्ण मौत से भी बढकर है. और प्राय: ऐसा होता है. बाबासाहेब आम्बेडकर के साथ भी ऐसा ही हुआ था.
ब्रिटेन में जातिगत भेदभाव के खिलाफ कानून की मांग और कोशिश इस बात का प्रमाण है कि ब्रिटेन में जातिगत भेदभाव है और यह भेदभाव किन्हीं अन्य समुदायों के बीच नहीं भारत से वहां पर गए सवर्ण हिंदुओं द्वारा दलितों के साथ किया जाता है. क्योंकि ब्रिटिश समाज में जाति-भेद और अस्पृश्यता नहीं है. नस्ल भेद के आधार पर समस्त भारतीय उनके लिए हीन हैं, क्योंकि वे गोरे नहीं, काले या गेहुंए हैं. नस्ल भेदीय दृष्टि से सवर्ण और दलित में कोई भेद नहीं है क्योंकि दोनों एक ही रंग के हैं. हालांकि जातिगत भेदभाव के खिलाफ कानून बनाने की प्रक्रिया ब्रिटेन में शुरू हुई है, किंतु अमेरिका, जर्मनी, कनाडा आदि अनेक देशों में, जहां पर भारतीय काफी संख्या में हैं, भी सवर्ण हिंदुओं द्वारा दलितों के साथ इसी प्रकार का जातिगत भेदभाव किया जाता है. जातिगत भेदभाव का सबसे बड़ा प्रमाण अमेरिका से प्रकाशित होने वाली पत्रिका प्रवासी टाइम्स है, जिसमें अन्य सामग्री के साथ वैवाहिक विज्ञापन भी प्रकाशित होते हैं. एकाध अपवाद को छोड़कर ये समस्त विज्ञापन उसी प्रकार जाति आधारित होते हैं जिस प्रकार भारत में होते हैं. यह देखना आश्चर्यजनक है कि ब्रिटेन, अमेरिका आदि खुले समाजों में रहते हुए भी तथाकथित सवर्ण हिंदू जातीय संकीर्णता में क्यों बंधे रहते हैं. नए देश और समाज में वहां की व्यवस्था और कानून के अनुसार ही चला जाता है. विदेशों में रहने वाले भारतीय (तथाकथित सवर्ण हिंदू) उन देशों के कानूनों का तो पालन करते हैं, उनके रहन-सहन, खान-पान, भाषा और पहनावे को भी सहज अपना लेते हैं. किंतु अपने धर्म और संस्कृति को जीवित रखते हैं, या कहिए अपने धर्म और संस्कृति को नहीं छोड़ते हैं. हिंदू समाज के लिए वर्ण-जाति-व्यवस्था उनके धर्म का आधार है. यज्ञोपवीत आदि संस्कारों के द्वारा बाल्यावस्था से ही व्यक्ति को श्रेष्ठता और हीनता का पाठ सिखाया जाता है. जातिगत भेदभाव के विषाणु यहीं से उसके मानस को विषाक्त बनाना शुरू कर देते हैं. वर्ण-जाति व्यवस्था यदि समानता की शत्रु और मनुष्यता के लिए विष है तो हिंदू धर्म विष उत्पादन का कारखाना और सवर्ण हिंदू समाज विष का रक्षक, प्रचारक और विक्रेता है. सवर्ण हिंदू जहां भी जाता है अपने साथ वर्ण-व्यवस्था और जातिवाद के विषाणु अपने साथ लेकर जाता है तथा वहां के समाज को भी जाति के इस जहर से विषाक्त बनाता है. जाति हिंदू धर्म की विशेषता है और सवर्ण हिंदुओं ने कसम खायी हुई है कि कहीं भी रहेंगे अपनी विशेषता को नहीं छोड़ेंगे. वर्ण-जाति व्यवस्था के रूप में हिंदू धर्म का पढाया हुए असमानता के पाठ का प्रभाव ही है कि तथाकथित सवर्ण हिंदू या तो किसी की अधीनता में रहेगा या किसी को अपने अधीन बनाकर रखेगा. वह समानता और सदभाव के साथ मिल-जुलकर नहीं सकता. यह उसकी नैतिकता, सैद्धांतिकी या आचार संहिता में ही नहीं है.
भारत देश और समाज का कितना अहित शताब्दियों से वर्ण-जाति व्यवस्था ने किया है, यह एक इतिहास है. ब्रिटेन का समाज और राजनेता इससे अनभिज्ञ नहीं होंगे. ब्रिटिश सरकार को सशक्त कानून बनाकर जातिगत भेदभाव को यहीं पर रोकना चाहिए, यही ब्रिटिश और विश्व मानव समाज के हित में है. अन्यथा ब्रिटिश समाज का ताना बाना भी जातिगत भेदभाव से अप्रभावित नहीं रहेगा. जाति का जहर जितना फैलता जाएगा समाज और राजनीति यह सबको प्रभावित करेगा और इससे ब्रिटेन भारत की तरह देश और समाज दोनों ही रूप में विभाजित और कमजोर ही बनेगा सशक्त नहीं.
लेखक जाने-माने साहित्यकार और स्तंभकार हैं. जब हम सवाल नहीं पूछ पाएंगे, तो क्या करेंगे?
दिल्ली में सरकारी स्कूलों को बंद करने का फैसला किया गया है. गुड़गांव के भी कुछ स्कूलों को बंद करने का फैसला किया गया है. हवा ही कुछ ऐसी है कि अब जाने क्या क्या बंद करने का फैसला किया जाएगा. हम जागरूक हैं. हम जानते भी हैं. आज बच्चा बच्चा पीएम के साथ साथ पीएम 2.5 के बारे में जानने लगा है. मगर हो क्या रहा है. इस सवाल को ऐसे भी पूछिये कि हो क्या सकता है.
अभी अभी तो रिपोर्ट आई थी कि कार्बन का भाई डाई आक्साईड का हौसला इतना बढ़ गया है कि अब वो कभी पीछे नहीं हटेगा. दिल्ली की हवा आने वाले साल में ख़राब नहीं होगी बल्कि हो चुकी है. अब जो हो रहा है वो ये कि ये हवा पहले से ज़्यादा ख़राब होती जा रही है. दरअसल जवाब तो तब मिलेगा जब सवाल पूछा जाएगा, सवाल तो तब पूछा जाएगा जब नोटिस लिया जाएगा, नोटिस दिया नहीं जाएगा.
आपने नचिकेता की कहानी तो सुनी ही होगी. बालक नचिकेता की कहानी हमें क्यों पढ़ाई गई. नचिकेता के सवालों ने उसके पिता वाजश्रवा को कितना क्रोधित कर दिया. क्रोध में वाजश्रवा ने नचिकेता को यमराज को ही दान कर दिया. नचिकेता ने देख लिया कि पिता सब कुछ दान देने के नाम पर अपने लोभ पर काबू नहीं पा रहे हैं. अच्छी गायों की जगह मरियल और बूढ़ी गायें दान में दे रहे हैं. नचिकेता हैरान रह जाता है. सोचता है कि पिता ने दुनिया को कहा कुछ, और कर कुछ रहे हैं. यह भ्रम नहीं टूटता अगर नचिकेता सवाल नहीं करता. नचिकेता पिता से बुनियादी सवाल करता है कि मुझे दान करना होगो तो किसे करोगे. ताम कस्मै माम दास्यसि? यानी पिता मुझे किसे दान करेंगे. वाजश्रवा को गुस्सा आता है और कहते हैं कि मृत्युव त्वाम दास्यामि. यानी जा मैं तुझे मृत्यु को दान करता हूं. याद रखियेगा, हज़ारों साल पहले की यह कहानी नचिकेता के बाप के दानवीर होने के कारण नहीं जानी जाती है, नचिकेता के नाम से जानी जाती है.
अथॉरिटी और पुलिस कब सवाल से मुक्त हो गए. अथॉरिटी का मतलब है जवाबदेही. बगैर जवाबदेही के अथॉरिटी या पुलिस कुछ और होती होगी. जब हम सवाल नहीं पूछ पाएंगे, कुछ बता नहीं पायेंगे तो क्या करेंगे.
मूक अभिनय को अंग्रेज़ी में माइम कहते हैं. इसकी अथॉरिटी कला की दुनिया में कितनी है मैं नहीं जानता लेकिन हम सबको माइम आर्ट के बारे में जानना चाहिए. यूपीएससी नहीं तो बीपीएससी में तो आ ही जाएगा कि भारत में माइम कला के उदभव और विकास की यात्रा पर लघु निबंध लिखें. कोलकाता के निरंजन गोस्वामी ने बताया कि 2500 साल पुराने नाट्य शास्त्र में भी मूक अभिनय का उल्लेख मिलता है. भारतीय मूक कलाकारों ने सब कुछ यूरोप से नहीं लिया है बल्कि बहुत कुछ अपनी परंपराओं से भी विकसित किया है. बल्कि दुनिया में जो टेकनिक अपनाई जाती है उसमें भारतीय असर ही ज्यादा है. बीबीसी के अनुसार कोलकाता से चुप्पी की आवाज़ नाम की एक पत्रिका भी छपती है जो कई देशों में पढ़ी जाती है. मूक अभिनय में आप संवाद मन में बोलते हैं ताकि दर्शक सुनाई देते हैं. मन की बात नहीं करने पर चेहरे पर भाव नहीं आता है. इस वक्त भारत में माइम की कई रिपोर्टरी कंपनी खुल गई है. कोलकाता में हर साल बीस पचीस टीमें आती हैं. आम तौर पर आप चार्ली चैपलिन के ज़रिये मूक अभियन को याद रखते हैं. आम तौर पर दुख और सुख को ही इसके ज़रिये व्यक्त किया जाता है. जैसे आप जब चार्ली चैपलिन को देखते हैं तो हंसी आती है मगर कलाकार के मन का भाव दुखी है.
आमतौर पर शुक्रवार के रोज़ फिल्मों की ही बात होती है, लेकिन माइम यानी मूक अभिनय की हम बात करेंगे. आज के माहौल में जब हवा ख़राब है, कार्बन कणों की मात्रा काफी बढ़ गई है तो क्यों न इन कलाकारों की सोहबत में हम आज की शाम गुज़ारें और महसूस करें कि जब हमारा बोलना बंद हो जाएगा तो मन में तैरते हुए भाव चेहरे पर कैसे आएंगे. आप क्या करेंगे ताकि लोगों को पता चल सके कि क्या बोलना चाहते हैं. बोलने से याद आया कि सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने नोटिस भेजा है कि 9 नवंबर के दिन एनडीटीवी इंडिया का प्रसारण एक दिन के लिए स्थगित करना होगा. एनडीटीवी का जवाब है कि ये दुखद है कि सिर्फ़ एनडीटीवी को इस तरह निशाना बनाया गया. सभी चैनलों और अख़बारों में (पठानकोट हमले की) ऐसी ही कवरेज थी. (पठानकोट हमले पर) एनडीटीवी की कवरेज ख़ास तौर पर संतुलित रही. प्रेस को ज़ंजीरों में जकड़ने वाले आपातकाल के काले दिनों के बाद एनडीटीवी पर इस तरह की कार्रवाई असाधारण है. एनडीटीवी सभी विकल्पों पर विचार कर रहा है.
देश भर से हमें समर्थन मिल रहा है. आप सभी का शुक्रिया. नोटिस की सर्वत्र निंदा हो रही है. एनडीटीवी जल्द ही सूचित करेगा कि आगे का रास्ता क्या होगा. हम अपना काम उसी बुलंदी और इकबाल से करते रहेंगे. ख़ैर वैसे भी सवालों से घबरा कर बहुत लोग मुझसे दूर जा चुके हैं. तभी सोचा कि कुछ ऐसा किया जाए जिसमें सवालों का डर न रहे. दिन ढले न ढले दिल ज़रूर बहले. इससे पहले कि आप घर में भी मास्क पहनकर टीवी देखने लगें, हम आपके साथ कुछ बात करना चाहते हैं. रामनाथ गोयनका पुरस्कार के दौरान प्रधानमंत्री के भाषण के बाद धन्यवाद भाषण देते हुए इंडियन एक्सप्रेस के संपादक राजकमल झा ने एक बात कही थी. अगर कोई पत्रकार इस वक्त प्राइम टाइम देख रहा है तो राजकमल झा की इस बात को लिखकर पर्स में रख ले. अगर किसी पॉकेटमार ने उसका कभी पर्स उड़ा भी लिया तो राजकमल झा की इस बात को पढ़ कर हमेशा के लिए बदल जाएगा और एक अच्छा नागरिक बन जाएगा. वो बात ये है, ”इस साल मैं 50 का हो रहा हूं और मैं कह सकता हूं कि इस वक्त जब हमारे पास ऐसे पत्रकार हैं, जो रिट्वीट और लाइक के ज़माने में जवान हो रहे हैं, जिन्हें पता नहीं है कि सरकार की तरफ से की गई आलोचना हमारे लिए इज्ज़त की बात है.”
साभारः एनडीटीवी से लिया गया है. यह प्राइम टाइम का लिखित रूप है. प्रिंसिपल ने दलित छात्र से जबरन साफ कराया स्कूल का शौचालय
नई दिल्ली। कौशाम्बी के प्राथमिक विद्यालय भैरवा में एक दलित छात्र से शौचालय साफ कराने की शर्मनाक घटना सामने आई है. आरोप विद्यालय के प्रधानाध्यापक पर है. घटना के बाद बच्चे ने घर पहुंचकर अपनी नानी को पूरी बात बताई. प्रधानाध्यापक के खिलाफ नानी ने कौशाम्बी थाने में तहरीर दी है, लेकिन पुलिस ने अब तक कोई कार्रवाई नहीं की. बीते गुरूवार को नानी छात्र को लेकर जिला मुख्यालय जा रही थीं, लेकिन कुछ लोगों ने रास्ते में उन्हें रोक लिया और अफसरों तक नहीं पहुंचने दिया.
प्राथमिक विद्यालय भैरवा में कक्षा एक में पढ़ने वाला पांच वर्षीय छात्र भैरवा गांव में ही अपनी नानी मालती देवी के साथ रहता है. 24 अक्तूबर को वह स्कूल गया तो प्रधानाध्यापक रावेंद्र सिंह ने उसे स्कूल का शौचालय साफ करने को कहा. शिवा ने मना किया तो उसे डांटा गया और ऐसा करने के लिए मजबूर किया गया. शौचालय साफ होने के बाद शिवा पर पानी डालकर भीगे कपड़ों में उसे घर भेज दिया गया.
ठिठुरते और रोते हुए वह घर पहुंचा तो नानी मालती देवी उसकी हालत देख सन्न रह गईं. पूछने पर उसने अपनी नानी को घटना की जानकारी दी, जिस पर मालती देवी आगबबूला हो गईं. वह शिवा को लेकर सीधे कौशाम्बी थाने पहुंच गईं. उन्होंने थाने में प्रधानाध्यापक के खिलाफ शिकायत दी.
हफ्ते भर बाद भी कार्रवाई नहीं हुई तो मालती देवी गुरूवार को अफसरों से मिलने जिला मुख्यालय की ओर से चल पड़ीं लेकिन गांव के ही कुछ लोगों ने उन्हें रास्ते में रोक लिया. सुलह-समझौते के लिए काफी देर तक पंचायत चली लेकिन मालती देवी अपने नाती को न्याय दिलाने के लिए अड़ी रहीं. वह अब पीछे हटने को तैयार नहीं हैं और प्रधानाध्यापक के खिलाफ हर हाल में कार्रवाई चाहती हैं.
कौशाम्बी थाने के एसओ ने कहा कि ‘मामले की तहरीर मिली है. त्योहार होने के कारण स्कूल बंद हो गए थे, इसलिए जांच नहीं हो पाई है. जल्द ही इस मामले में कार्रवाई की जाएगी.’ 
