यूनेस्को मुख्यालय में लगी डॉ. बीआर आंबेडकर की प्रतिमा

यूनेस्को मुख्यालय पेरिस में डॉ. आम्बेडकर की प्रतिमा26 नवंबर यानी संविधान दिवस का दिन इस साल खास रहा। इस दिन पेरिस स्थित UNESCO के मुख्यालय में बाबासाहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर की प्रतिमा का अनावरण किया गया। यह पहली बार है जब किसी अंतरराष्ट्रीय संस्था के मुख्यालय में भारत के संविधान निर्माता डॉ. अंबेडकर की प्रतिमा स्थापित की गई है। यह स्थापना डॉ. आंबेडकर के वैश्विक प्रभाव को दर्शाती है। यूनेस्को मुख्यालय में डॉ. आंबेडकर की प्रतिमा को विश्व मंच पर उनके विचारों और योगदान को मिली बड़ी मान्यता के प्रतीक के तौर पर देखा जा रहा है।

भारत द्वारा 1949 में भारतीय संविधान को अपनाए जाने की 75वीं वर्षगांठ के मौके पर यूनेस्को जैसे संस्थान में यह प्रतिमा स्थापित होना बताता है कि बाबासाहेब डॉ. अंबेडकर के द्वारा समानता, सामाजिक न्याय, मानव गरिमा की रक्षा, वंचित तबके और महिलाओं के लिए शिक्षा का अधिकार और लोकतांत्रिक सशक्तिकरण के विचार और इस दिशा में किये गए काम सिर्फ भारत तक सीमित नहीं हैं, बल्कि पूरी दुनिया और समाजों के लिए भी प्रेरणा बन चुके हैं। यह प्रतिष्ठान दुनिया को याद दिलाता है कि अंबेडकर आधुनिक लोकतंत्र और मानवाधिकारों के सबसे प्रासंगिक वैश्विक विचारकों में से एक हैं।

यूनेस्को मुख्यालय पेरिस में डॉ. आम्बेडकर की प्रतिमायूनेस्को के इस कदम पर खासकर भारत में खासा उत्साह है। तमाम अंबेडकवादी और न्याय पसंद लोग यूनेस्को के इस कदम की सराहना कर रहे हैं। भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी इस पर खुशी जताते हुए सोशल मीडिया एक्स पर लिखायह हमारे लिए अत्यंत गर्व की बात है कि संविधान दिवस के अवसर पर, पेरिस स्थित यूनेस्को मुख्यालय में डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर की प्रतिमा का अनावरण किया गया। यह डॉ. आंबेडकर और भारतीय संविधान के निर्माण में उनकी भूमिका को उपयुक्त श्रद्धांजलि है। उनके विचार और आदर्श आज भी हम सभी को शक्ति और आशा प्रदान करते हैं।

यूनेस्कों के इस कदम पर तमाम अन्य प्रतिक्रियाएं भी सामने आई है। क्योंकि यह महज एक प्रतिमा नहीं है, बल्कि बाबासाहेब आंबेडकर की उस विरासत का सम्मान है जिसने मानवता को सिखाया कि समाज तभी आगे बढ़ता है जब हर व्यक्ति को समान अवसर, सम्मान और न्याय मिले। UNESCO में डॉ. आंबेडकर की प्रतिमा की स्थापना डॉ. अंबेडकर की विचारधारा के अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत होने का प्रमाण है।

ज्योतिबाराव फुले और डॉ. आंबेडकर के बीच समानता

ज्योतिबा फुले और बाबा साहेब अम्बेडकर का जीवन और कर्तृत्व बहुत ही बारीकी से समझे जाने योग्य है। आज जिस तरह की परिस्थितियाँ हैं उनमे ये आवश्यकता और अधिक मुखर और बहुरंगी बन पड़ी है। दलित आन्दोलन या दलित अस्मिता को स्थापित करने के विचार में भी एक “क्रोनोलाजिकल” प्रवृत्ति है, समय के क्रम में उसमें एक से दूसरे पायदान तक विकसित होने का एक पैटर्न है और एक सोपान से दूसरे सोपान में प्रवेश करने के अपने कारण हैं। ये कारण सावधानी से समझे और समझाये जा सकते हैं।

 अधिक विस्तार में न जाकर ज्योतिबा फुले और डॉ. आम्बेडकर के उठाये कदमों को एक साथ रखकर देखें। दोनों में एक जैसी त्वरा और स्पष्टता है। समय और परिस्थिति के अनुकूल दलित समाज के मनोविज्ञान को पढ़ने, गढ़ने और एक सामूहिक शुभ की दिशा में उसे प्रवृत्त करने की दोनों में मजबूत तैयारी दिखती है। और चूंकि कालक्रम में उनकी स्थितियां और उनसे अपेक्षाएं भिन्न है, इसलिए एक ही ध्येय की प्राप्ति के लिए उठाये गए उनके कदमों में समानता होते हुए भी कुछ विशिष्ट अंतर भी नजर आते हैं।

ज्योतिबा के समय में जबकि शिक्षा दलितों के लिए एक दुर्लभ आकाशकुसुम था, और शोषण के हथियार के रूप में निरक्षरता और अंधविश्वास जैसे “भोले-भाले” कारणों को ही मुख्य कारण माना जा सकता था– ऐसे वातावरण में शिक्षा और कुरीति निवारण– इन दो उपायों पर पूरी ऊर्जा लगा देना आसान था। न केवल आसान था बल्कि यही संभव भी था। और यही ज्योतिबा ने अपने जीवन में किया भी। क्रान्ति-दृष्टाओं की नैदानिक दूरदृष्टि और चिकित्सा कौशल की सफलता का निर्धारण भी समय और परिस्थितियाँ ही करती हैं।

इस विवशता से इतिहास का कोई क्रांतिकारी या महापुरुष कभी नहीं बच सका है। ज्योतिबा और उनके स्वाभाविक उत्तराधिकारी डॉ. आम्बेडकर के कर्तृत्व में जो भेद हैं उन्हें भी इस विवशता के आलोक में देखना उपयोगी है। इसलिए नहीं कि एक बार बन चुके इतिहास में अतीत से भविष्य की ओर चुने गये मार्ग को हम इस भाँति पहचान सकेंगे, बल्कि इसलिए भी कि अभी के जाग्रत वर्तमान से भविष्य की ओर जाने वाले मार्ग के लिए पाथेय भी हमें इसी से मिलेगा।

ज्योतिबा के समय की “चुनौती” और आंबेडकर के समय के “अवसर” को तत्कालीन दलित समाज की उभर रही चेतना और समसामयिक जगत में उभर रहे अवसरों और चुनौतियों की युति से जोड़कर देखना होगा। जहां ज्योतिबा एक पगडंडी बनाते हैं उसी को आम्बेडकर एक राजमार्ग में बदलकर न केवल यात्रा की दशा बदलते हैं बल्कि गंतव्य की दिशा भी बदल देते हैं।

नए लक्ष्य के परिभाषण के लिए आम्बेडकर न केवल मार्ग और लक्ष्य की पुनर्रचना करते हैं बल्कि अतीत में खो गए अन्य मार्गों और लक्ष्यों का भी पुनरुद्धार करते चलते हैं। फूले में जो शुरुआती लहर है वो आम्बेडकर में प्रौढ़ सुनामी बनकर सामने आती है, और एक नैतिक आग्रह और सुधार से आरम्भ हुआ सिलसिला, किसी खो गए सुनहरे अतीत को भविष्य में प्रक्षेपित करने लगता है। आगे यही प्रक्षेपण अतीत में छीन लिए गए “अधिकार” को फिर से पाने की सामूहिक प्यास में बदल जाता है।

इस यात्रा में पहला हिस्सा जो शिक्षा, साक्षरता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण जन्माने जैसे नितांत निजी गुणों के परिष्कार में ले जाता था, वहीं दूसरा हिस्सा अधिकार, समानता और आत्मसम्मान जैसे कहीं अधिक व्यापक, इतिहास सिद्ध और वैश्विक विचारों के समर्थन में कहीं अधिक निर्णायक जन-संगठन में ले जाता है। इतना ही नहीं बल्कि इसके साधन और परिणाम स्वरूप राजनीतिक उपायों की खोज, निर्माण और पालन भी आरम्भ हो जाता है।

यह नया विकास स्वतन्त्रता पश्चात की राष्ट्रीय और स्थानीय राजनीति में बहुतेरी नयी प्रवृत्तियों को जन्म देता है। जो समाज हजारों साल से निचली जातियों को अछूत समझता आया था उसकी राजनीतिक रणनीति में जाति का समीकरण सर्वाधिक पवित्र साध्य बन गया।

ये ज्योतिबा और आम्बेडकर का किया हुआ चमत्कार है, जिसकी भारत जैसे रुढ़िवादी समाज ने कभी कल्पना भी न की थी। यहाँ न केवल एक रेखीय क्रम में अधिकारों की मांग बढ़ती जाती है बल्कि उन्हें अपने दम पर हासिल करने की क्षमता भी बढ़ती जाती है।

इसके साथ साथ इतिहास और धार्मिक ग्रंथों के अँधेरे और सडांध-भरे तलघरों में घुसकर शोषण और दमन की यांत्रिकी को बेनकाब करने का विज्ञान भी विकसित होता जाता है। ये बहुआयामी प्रवृत्तियाँ जहां एक साथ एक ही समय में इतनी दिशाओं से आक्रमण करती हैं कि शोषक और रुढ़िवादी वर्ग इससे हताश होकर “आत्मरक्षण” की आक्रामक मुद्रा में आ जाता है। एक विस्मृत और शोषित अतीत की राख से उभरकर भविष्य के लिए सम्मान और समानता का दावा करती हुयी ये दलित चेतना, इस पृष्ठभूमि में लगातार आगे बढ़ती जाती है।

सिनेमा के इस दौर में होमबॉउन्ड क्यों जरूरी है?

जुलाई की बात है, देश के कुछ युवा वर्ग सिनेमा घरों मे रोते बिलखते, खुद का शर्ट फाड़ते दिखे। ये महज़ एक फिल्म का जादू था जिसका नाम सैंयारा है, कह सकते हैं, हमें कुछ ठीक-ठीक क्रांति जैसा देखने को मिला। ऐसा इसीलिए कहा जा सकता है कि कई जगहों पे बेहोशी की भी खबर आई। युवाओं के मानसिक दबाव को इस फिल्म ने और बढ़ा दिया, शर्ट के पैसे गए सो अलग और सेहत बिगड़ी उसके लिए दवाइयों के भी पैसे लगे होंगे।

 उसी के कुछ समय पहले अप्रैल में एक और फिल्म परदे पर आई थी। ‘फुले’, महात्मा ज्योतिबा राव फुले और माता सावित्री बाई फुले के पूरी ज़िंदगी और उनके सामाजिक परिवर्तन के काम को परदे पर लाया गया, पर इस फिल्म का विरोध लगभग पूरे देश में हुआ। विरोध इसीलिए शुरू हुए क्योंकि एक समाज अपने काले इतिहास को काला नहीं मानती। मसलन इन विरोधों को सरकार की ओर से खारिज भी नहीं किया गया। रिलीज डेट आगे बढ़ा दी गई और सेंसर बोर्ड ने सीन्स कटवाए। दिल्ली में जब हवा के लिए प्रोटेस्ट करने पर पुलिस छात्रों को जमीन पे रगड़ रही है, उसी दिल्ली के लुटियन ज़ोन में प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के गेट पर ब्राह्मण महासभा का बैनर, फुले फिल्म के विरोध मे पोस्टर टंगता है। जब फिल्में धर्म से जुड़ी हो तो उन सिनेमाओं को सरकार टैक्स फ्री करती है। वहीं दूसरी तरफ फुले जैसी फिल्मों के ऊपर तलवार लटकती है, उसके थिएटर रिलीज को इतना सीमित कर दिया जाता है कि वह आम जनता तक पहुंच भी नहीं पाती। तो क्या यह माना जाए कि एक वर्ग विशेष ही यह फैसला लेगा कि उसके मुताबिक क्या सही है, कौन क्या देखेगा? जो वो तय करेंगे वही जनता देखेगी, पूरा सामाजिक ढांचा कुछ चुनिंदा हाथों में बरकरार है।

इन दोनों फिल्मों का ज़िक्र इसीलिए जरूरी है ताकि हम जान सके जनता को क्या पसंद है, दूसरा ये की अगर कोई सिनेमा रेशनेलिटी और इतिहास को साथ लेकर सामने लाना चाहे तो वो मुश्किल है, क्योंकि कुछ लोग ही तय करेंगे कौन क्या देखेगा, सच, झूठ या कट्टरता।

2020 के मई महीने में पैन्डेमिक के वक्त एक तस्वीर खूब तेजी से वायरल हुई थी, तस्वीर में एक आदमी दूसरे आदमी के गोद में बदहवास लेटा है, यह तस्वीर ऐसा फैला की अमेरिका में न्यूयॉर्क टाइम्स के पत्रकार बशरत पीर इस स्टोरी को कवर करने आये और फिर इस पर न्यूयॉर्क टाइम्स में “A Friendship, a pandemic and a death besides the highway” के टाइटल से ओपीनियन प्रकाशित हुआ। हम ये बिल्कुल नहीं कह रहे की कोविड ने सबको बराबर का झटका नहीं दिया। क्या अमीर, क्या गरीब, क्या दलित, क्या पिछड़ा लॉकडाउन में सब बंद थे। इस महामारी से सबको बराबर का झटका मिला। पर यह भी समझना होगा कि सभी सूरत या हैदराबाद मीलों में कमाने नहीं जाते। जो जाते हैं उनमें से ज़्यादातर पिछड़े, दलित, गरीब होते हैं। अगर कोविड से बचना है तो अकेले रहना होगा उसके लिए घर चाहिए, पर उनके पास हज़ारों किलोमिटर दूर एक बस्ती में छोटा सा खपड़ैल का मकान है, इससे ये समझ आता है कि कोविड की मार दरकिनार कर दिए समाज के लिए एक चोट बनकर उभरा जिसने अचानक से उन्हें घाव दिया।

बीते सितंबर मे नीरज घेवान द्वारा निर्देशित फिल्म होम बॉउन्ड रिलीज हुई, जो इसी सच्ची घटना पर आधारित है। सामाजिक उत्पीड़न को दर्शाती यह फिल्म छात्र, मजदूर, महिला, दलित और मुस्लिम के ज़िंदगी के सच को यथास्थिति पेश करती है। फिल्म की कामयाबी के मायने अगर बॉक्स ऑफिस है, तो इसने उतनी कमाई नहीं की। पर बात करें तो यह फिल्म भारत की ओर से ऑस्कर के लिए चुनी गई है। कॉन्स फिल्म फेस्टिवल के प्रीमियर पर इसे 9 मिनट का स्टैन्डींग ओवैशन मिला। नेटफलिक्स पर रिलीज हुई इस फिल्म में जाह्नवी कपूर, ईशान खट्टर और विशाल जेठवा हैं। दो दोस्तों की कहानी है जो आज का सच दिखाती है। खोखले छत से गिरता पानी और उसी घर में बाबासाहब की तस्वीर, पर्स में बाबसाहब की तस्वीर, सूरत जाते मीलों में मजदूर और कोरोना। ये कहानी देश के लाखों गाँव घरों की है।

5 बरस पहले जब लॉकडाउन लगा था, हवा साफ हो गई थी। सुनी सड़कों पर अगर कोई था तो सिर्फ मजदूर। रोजगार एवं श्रम मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार कोविड के वक्त 1.06 करोड़ पलायन कामगार अपने गृह राज्य वापस लौटे। साधन नहीं थे, तो कई पैदल निकल चल दिए। जागरूकता के अभाव में बहुतों को नहीं पता चला की भला कोरोना है क्या?

नीरज धेवान की यह फिल्म इसीलिए भी जरूरी है कि लाखों बच्चे सिर्फ एक सरकारी नौकरी के लिए जीवन लगा देते हैं। रेल्वे ग्रुप डी, कांस्टेबल, आरआरबी एनटीपीसी आदि जैसे ग्रुप सी और ग्रुप डी टियर की नौकरियां उन्हें जिंदगी बदलने का एकमात्र जरिया लगती हैं। पर परीक्षा बीत जाता है और बचता है तो सिर्फ इंतज़ार या फिर पेपर लीक हो जाता है। नौकरी की इस जंग में एक ऐसा भी वक्त आता है जब नौकरी के सपने छोड़ और परिवार की जिम्मेदारियों के बोझ में दबा युवा को मजदूर बनना पड़ता है।

कैसे एक परिवार में लड़कियां पढ़ना चाहती हैं पर पढ़ने का हक सिर्फ लड़कों को मिलता है। कैसे नाम के साथ ‘कुमार’ लगाना एक शर्म का भाव देता है। क्योंकि तुम्हारी जाति लोगों को पता चल जाएगी और कैसे किसी के मुसलमान होने के कारण उसपर पाकिस्तान परस्त होने का ठप्पा लग दिया जाता है। ये सारे स्टिग्मा इंसान के साथ चिपके रहते हैं; जो ताउम्र नहीं जाते।

प्रेम भी है, प्रेम में पढ़ना, प्रेम के लिए पढ़ना, और बड़ा बनने का ख्वाब। पर बड़ा बनना सबके हिसाब से अलग-अलग हो सकता है। किसी को अपनी खपरैल के छत से अपने शरीर पर सिपाही का कपड़ा दिखता है तो किसी को अपने रेल्वे क्वार्टर से आईएएस बनने का ख्वाब। पर ख्वाब तो ख्वाब होते हैं, उनमें नाप तोल कैसा। पर प्रेम तो माँ का भी है जो दलित स्त्री है और बच्चों को सरकारी स्कूल में मीड डे का खाना खिलाती है, पर भला ऐसा हो सकता है कि किसी दलित के हाथ का कोई छुआ भी खा ले। उदाहरण के तौर पर कुछ महीनों पहले कर्नाटक में एक दलित महिला के हेड कुक बनने पर वहाँ के अधिकतर बच्चों ने टीसी ले लिया था।

यह दो दोस्तों की कहानी है जिन्हें बिरयानी बहुत पसंद है। बेरोज़गारी, स्त्री, मजदूरी, घर की पहली ईंट, छुआछूत, रेल की भीड़, धर्म और जाति के नाम पर भेदभाव, गरीबी ये सब सिनेमा में है। आपको अपनी नजर से देखना चाहिए, हो सकता है आपको लगे की, आप पूरे बखत बैठे-बैठे खुद को और साफ कर रहे हैं और जब फिल्म खत्म हो, तब आपको आपके किताब का पन्ना और मुलायम लगने लगे।

दिल्ली का वह बंगला, जहां बैठकर बाबासाहेब ने लिखा था भारत का संविधान

तस्वीर में पीछे दिख रहा आवास, बंगला नंबर 1, तिलक मार्ग, इंडिया गेट है। यह वही ऐतिहासिक बंगला है जहां 1947-51 तक बाबा साहेब अंबेडकर भारत के कानून मंत्री की हैसियत से रहे, लेकिन उससे भी अधिक महत्व की बात ये है कि यही वह धरोहर हैं जहां बैठ कर बाबा साहेब ने इस देश का लोकतांत्रिक समतामूलक प्रबुद्ध संविधान लिखा। पहले यह रोड़ #हार्डिंग_एवेन्यू कहलाता था, लेकिन कांग्रेस शासनकाल में शरारत पूर्ण तरीके से इस जगह को घनघोर जातिवादी तिलक के नाम पर तिलक मार्ग का नाम दे दिया गया।
1978 से यहां पर पौलैंड के राजदूत का आवास है अभी भी यह बंगला अपने मूल रूप, जैसा बाबा साहेब के समय में था बना हुआ है। दो एकड़ एरिया में फैला यह बंगला, भारत के संवैधानिक इतिहास एवं नारी मुक्ति आंदोलन की एक महान धरोहर है जिसे विदेशी सरकार को सौंप कर सरकारों ने जघन्य ऐतिहासिक अत्याचार किया है। हालांकि पोलैंड के राजदूतों ने बाबा साहेब के अध्ययन कक्ष एवं अन्य यादों को अभी भी संजोकर रखा है और वो आने वाले हर राजदूत को बताकर जाते हैं कि यह बाबा साहेब की विरासत एवं ऐतिहासिक पूंजी है लेकिन भारतीय सरकारों का रवैया निहायत की गैर जिम्मेदाराना एवं अफ़सोसजनक रहा है।
यह भी सनद रहे कि इस बंगले में रहकर ही बाबा साहेब ने भारतीय नारी मुक्ति के ऐतिहासिक दस्तावेज #हिंदू_कोड_बिल की रचना भी की थी और उसे संसद में पेश किया था लेकिन उस बिल को ब्राह्मणवादी तत्वों ने पारित नही होने दिया, और हिन्दू कोड बिल पास नहीं होने देने के विरोध में बाबा साहेब ने भारत के कानून मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया, और #हार्डिंग_एवेन्यू_बंगला_नंबर_1 खाली कर, #26_अलीपुर_रोड पर शिफ्ट हो गए और वही अपनी अंतिम सांस ली, आज वह आवास #महा_परिनिर्वाण_भूमि के नाम से जाना जाता है। इसलिए बंगला नंबर एक तिलक मार्ग, नारी मुक्ति भूमि के रूप में भी स्वीकार की जानी चाहिए।
जब कभी भी संभव हो इस बंगले की यात्रा जरुर करनी चाहिए। साथ ही प्रबुद्ध समाज को अब और इंतजार न करते हुए, और खासतौर से उन लोगों को जो बाबा साहेब के आन्दोलन के लाभार्थी हैं इस ऐतिहासिक स्थल को इसकी महानता पुनर्स्थापित करने का आन्दोलन पूरी सिद्दत से शुरू करना चाहिये।
दिल्ली यूनिवर्सिटी के दयाल सिंह कॉलेज में प्रोफेसर डॉ. राजकुमार द्वारा यह तस्वीर 26 नवंबर, 2025 को 1 तिलक मार्ग, इंडिया गेट नई दिल्ली पर ली गई है।

संविधान का वह 10 महत्वपूर्ण आर्टिकल, जिसके बारे में हर भारतीय को पता होना चाहिए

26 नवंबर की तारीख भारत के इतिहास में संविधान दिवस के तौर पर दर्ज है। साल 1949 में इसी दिन भारत की संविधान सभा ने डॉ. बी.आर. आंबेडकर की अध्यक्षता में लिखे गए दुनिया के सबसे बड़े लिखित संविधान को अंगीकृत किया था। संविधान न केवल देश की शासन-व्यवस्था का आधार है, बल्कि नागरिकों को अधिकार, स्वतंत्रता और सुरक्षा भी देता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या देश के हर नागरिक को संविधान की वे मूल बातें पता हैं, जो उसकी रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करती हैं? और जिसके बारे में उन्हें जरूर जानना चाहिए।

हम आपको यहां बता रहे हैं संविधान के 10 ऐसे ज़रूरी अनुच्छेद (Articles), जिन्हें हर भारतीय को जानना चाहिए:

  1. अनुच्छेद 14 — समानता का अधिकार (Right to Equality)

भारत का हर नागरिक कानून के सामने बराबर हैं। धर्म, जाति, लिंग, भाषा या जन्मस्थान के आधार पर उससे भेदभाव नहीं किया जा सकता।

  1. अनुच्छेद 15 — भेदभाव का निषेध

राज्य किसी नागरिक के साथ धर्म, जाति, लिंग, जन्मस्थल के आधार पर भेदभाव नहीं कर सकता। संविधान के अनुच्छेद 15 में ही SC/ST/OBC और महिलाओं के लिए विशेष प्रावधान शामिल हैं।

  1. अनुच्छेद 17 — अस्पृश्यता का उन्मूलन

किसी के साथ जाति या धर्म के नाम पर भेदभाव अपराध है। जो भी इस तरह की अस्पृश्यता को बढ़ावा दे, या करे वह कानूनन दंडनीय है। इस अनुच्छेद को दलित और आदिवासी समाज के अधिकारों की रीढ़ भी कहा जाता है।

  1. अनुच्छेद 19 — छह मूल स्वतंत्रताएँ

यह अनुच्छेद हर नागरिक को अभिव्यक्ति, आंदोलन, संगठन, पेशा चुनने और मूल स्थान परिवर्तन करने की स्वतंत्रता देता है।

  1. अनुच्छेद 21 — जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार

“जीवन का अधिकार” केवल जीवित रहने का नहीं, बल्कि इज़्ज़त के साथ जीने  का अधिकार है। यह संविधान का सबसे शक्तिशाली अनुच्छेद माना जाता है।

  1. अनुच्छेद 21A — शिक्षा का अधिकार

संविधान का यह आर्टिकल 6 से 14 साल के हर बच्चे को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार देता है।

  1. अनुच्छेद 23 — मानव तस्करी और जबरन मजदूरी पर प्रतिबंध

बधुआ मज़दूरी, बंधक मज़दूर प्रथा और मानव तस्करी अपराध है। एससी-एसटी समाज को सालों बंधुआ मजदूर के रूप में प्रताड़ित किया जाता रहा है। SC/ST समुदाय को सुरक्षा देने में यह बहुत महत्वपूर्ण अनुच्छेद साबित हुआ है।

  1. अनुच्छेद 32 — संवैधानिक उपचार का अधिकार

संविधान निर्माता डॉ. अंबेडकर ने इसे “संविधान का हृदय और आत्मा” कहा था। अगर आपके अधिकारों का हनन हो तो आप इस अनुच्छेद में मिले अधिकारों के जरिये सीधे सुप्रीम कोर्ट जा सकते हैं।

  1. अनुच्छेद 46 — कमजोर वर्गों की शिक्षा और आर्थिक सुरक्षा

राज्य का दायित्व है कि वह SC/ST/OBC समुदाय के हितों की रक्षा करे और उनके लिए विशेष नीतियाँ बनाएं।

  1. अनुच्छेद 51A — नागरिकों के मूल कर्तव्य

जहां संविधान भारत के हर नागरिकों को विशेष सुविधा देता है, वैसे ही नागरिकों से कुछ उम्मीद भी करता है। जैसे—संविधान का पालन, स्त्री-सम्मान, वैज्ञानिक सोच, पर्यावरण की रक्षा, राष्ट्रीय एकता आदि।

इस तरह 26 नवंबर का दिन यानी संविधान दिवस केवल एक औपचारिक दिन नहीं, यह हमें याद दिलाता है कि हमारे अधिकार तभी सुरक्षित रहते हैं, जब नागरिक उन्हें जानते हों और उनका उपयोग करते हैं।

डॉ. सीमा माथुर ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर बढ़ाया भारत का मान

दिल्ली। दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर, शोधकर्ता, महिला अधिकार कार्यकर्ता और जानी-मानी अम्बेडकरवादी डॉ. सीमा माथुर को बैंकॉक में आयोजित 6th World Environment Summit 2025 में प्रतिष्ठित ESDA Women Empowerment Award 2025 से सम्मानित किया गया है। यह पुरस्कार उन्हें Women and Dalit Empowerment श्रेणी में दिया गया।

यह अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन 9 से 12 नवंबर तक बैंकॉक, थाईलैंड के Ambassador Hotel में आयोजित हुआ। सम्मेलन का आयोजन Environment and Social Development Association (ESDA) और University of Delhi ने मिलकर किया, जबकि कार्यक्रम का होस्ट भारत सरकार की Ministry of Environment, Forest & Climate Change रहा। सम्मेलन में Maldives के Villa College, और Nigeria की एक यूनिवर्सिटी भी भागीदार रहीं।

डॉ. सीमा माथुर वर्षों से महिलाओं के अधिकार, दलित एवं हाशिए पर खड़े समुदायों का सशक्तिकरण, मानवाधिकार, लोकतंत्र और जनभागीदारी पर काम करने के लिए जानी जाती हैं। डॉ. सीमा माथुर National Council of Women Leaders और अंबेडकरवादी लेखक संघ की सह-संस्थापक हैं। NCDHR और AIDMAM जैसी राष्ट्रीय मानवाधिकार संस्थाओं से भी जुड़ी हैं।

डॉ. सीमा माथुर दिल्ली विश्वविद्यालय के कलिंदी कॉलेज में लंबे समय से राजनीतिक विज्ञान पढ़ा रही हैं। उन्होंने जामिया मिलिया इस्लामिया से पीएचडी और दिल्ली विश्वविद्यालय से पोस्टग्रेजुएशन की डिग्री ली है। उन्हें UGC द्वारा प्रदान किया गया प्रतिष्ठित Rajiv Gandhi National Fellowship (JRF & SRF) प्राप्त हो चुका है। डॉ. सीमा अनेक राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय सेमिनारों में शोध पत्र प्रस्तुत कर चुकी हैं।  उनके 30 से अधिक शोध प्रकाशित हो चुके हैं।

डॉ. सीमा माथुर को इससे पहले भी कई पुरस्कार मिल चुके हैं, जिसमें- वीरांगना अवार्ड 2024, सावित्रीबाई फुले सम्मान 2022, नारी शक्ति एक्सिलेंस अवार्ड 2020 शामिल हैं। डॉ. माथुर को मिले ये पुरस्कार महिलाओं और दलित महिलाओं के सशक्तिकरण में उनके लगातार प्रयासों का प्रमाण है। डॉ सीमा माथुर को बैंकॉक में मिला ESDA Women Empowerment Award 2025 न केवल डॉ. सीमा माथुर की व्यक्तिगत उपलब्धि है, बल्कि भारत में महिला अधिकार आंदोलन, दलित विमर्श, अम्बेडकरवादी चिंतन को दुनिया भर में पहचान दिलाने वाला क्षण है।

सच्चिदानंद सिन्हा को जानिये, जिनके निधन को समाजवादी विचारधारा के एक युग का अंत कहा जा रहा है

वो साल था 1984 का। पंजाब आतंकवाद के कारण जल रहा था। वहां से रोज बेगुनाहों के कत्ल के समाचार आ रहे थे। पंजाब को लेकर सारा देश चिंतित था। तब पंजाब की स्थिति पर चर्चा करने के लिए समाजवादी आंदोलन से जुड़े राजनीतिक कार्यकर्ताओं,अध्यापकों, छात्रों वगैरह की दो दिवसीय बैठक चली। उसमें सच्चिदानंद सिन्हा और किशन पटनायक जैसे विद्वानों ने भी अपने वक्तव्य दिए। तब सच्चिदानंद सिन्हा की सलाह पर सबने तय किया कि हम लोग दिल्ली से अमृतसर तक की एक शांति मार्च निकालेंगे। यह एक बड़ा फैसला इसलिए था क्योंकि पंजाब में खून-खराबा बढ़ता जा रहा था। इसके बाद शांति मार्च की तैयारी में भाई जसवीर,सुनील जी, चेंगल रेड्डी, लिंगराज और अरविंद मोहन जैसे साथी जुट गए। अब शांति मार्च की तारीख तो याद नहीं पर इसकी शुरुआत राजघाट से हुई। उसमें सच्चिदानंद सिन्हा आगे-आगे चल रहे थे सांप्रदायिक सौहार्द और देश की एकता के नारे लगाते हुए। सच्चिदानंद सिन्हा, जिन्हें हम सब लोग सच्चिदा बाबू कहते थे, का कल बिहार में उनके गांव में निधन हो गया। सच्चिदा बाबू से पहला परिचय 1982 या 1983 में हुआ था। मुलाकात रफी मार्ग में यूएनआई बिल्डिंग के लॉन में हुई थी। उसके बाद उनसे घनिष्ठता बढ़ती गई। वहां पर उनके चाहने वाले और समाजवादी साथी मिला करते थे। हर बैठक में 20-22 साथी शामिल हो जाते थे। सच्चिदानंद सिन्हा ने अपना पूरा जीवन समाजवादी विचारों, गांधीवादी मूल्यों और वैकल्पिक राजनीति को समर्पित कर दिया। वे सादगी की मिसाल थे। उन्होंने कभी सत्ता की लालसा नहीं की, न ही कोई बड़ा पद स्वीकार किया। उनका जीवन और लेखन समाजवाद की उस शुद्ध धारा का प्रतिनिधित्व करता है जो राममनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण और किशन पट्टनायक जैसे विचारकों से प्रेरित थी, लेकिन हमेशा आलोचनात्मक दृष्टि रखती थी।सच्चिदानंद सिन्हा का लेखन उनकी सबसे बड़ी पूंजी था। उन्होंने लगभग दो दर्जन पुस्तकें लिखीं, जिनमें राजनीति, अर्थशास्त्र, संस्कृति, पर्यावरण, दर्शन और समाजशास्त्र जैसे विविध विषय शामिल हैं। राजकमल प्रकाशन ने उनके प्रमुख लेखन को आठ खंडों में ‘सच्चिदानंद सिन्हा रचनावली’ के रूप में प्रकाशित किया है, जो उनकी वैचारिक गहराई का प्रमाण है। इस काम को अरविंद मोहन जी ने किया। दोनों गोल मार्केट में कुछ समय तक साथ भी रहा करते थे। उनका लेखन जटिल विचारों को सरल भाषा में प्रस्तुत करने के लिए जाना जाता है। उनकी प्रमुख रचनाओं में ‘केस एंड क्रिएशन’, ‘संस्कृति विमर्श’, ‘संस्कृति और समाजवाद’, ‘मानव सभ्यता और राष्ट्र-राज्य’, ‘एडवेंचर्स ऑफ लिबर्टी’ (आजादी के अपूर्व अनुभव), ‘जिंदगी: सभ्यता के हाशिये पर’, ‘कड़वी फसल’ और ‘मार्क्सवाद और गांधीवाद’ जैसी किताबें शामिल हैं। उनकी पुस्तक ‘द इंटरनल कॉलोनी’ (1973) में उन्होंने बिहार को केंद्र की आंतरिक उपनिवेश के रूप में चित्रित किया, जो क्षेत्रीय असमानता पर पहली गंभीर चर्चाओं में से एक थी। कहते हैं कि यह किताब उस समय बिहार के मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर ने भी गंभीरता से पढ़ी और अध्ययन के लिए अधिकारियों को निर्देश दिया था। सच्चिदानंद सिन्हा के साथ योगेन्द्र यादवसिन्हा जी का लेखन मुख्यधारा के समाजवाद से अलग था। वे लोहियावादी थे, लेकिन आज की सत्ता-केंद्रित समाजवादी राजनीति से दूर रहे। ‘सोशलिज्म एंड पावर’ (1974) में उन्होंने सत्ता और समाजवाद के अंतर्विरोध को उजागर किया। आपातकाल के दौरान ‘इमरजेंसी इन पर्सपेक्टिव’ (1977) और जनता पार्टी सरकार के बाद ‘द परमानेंट क्राइसिस’ (1978) जैसी किताबों में उन्होंने लोकतंत्र की रक्षा और समाजवादी विकल्पों पर जोर दिया। उनका लेखन केवल सैद्धांतिक नहीं था; यह जीवन से जुड़ा था। 1942 में वे नौवीं कक्षा के छात्र थे जब भारत छोड़ो आंदोलन में कूद पड़े। पढ़ाई छूट गई, लेकिन ज्ञान की प्यास नहीं। वे लोहिया के संपर्क में आए। दिल्ली में रहते हुए (1969-1987) उनका घर विचारकों का अड्डा था, लेकिन 1987 के बाद वे मुजफ्फरपुर लौट आए और गांव की सादगी में वैचारिक लेखन जारी रखा। फ्रेंच और जर्मन भाषाओं का ज्ञान उन्हें वैश्विक विचारों से जोड़ता था, लेकिन उनकी जड़ें बिहार की मिट्टी में थीं। मुझे याद आ रहा है 1984 का वह काला दौर जब दिल्ली में सिखों का कत्लेआम हुआ था। सच्चिदानंद सिन्हा जी की सरपरस्ती में साथियों ने सिखों के पुनर्वास और दोषियों को सजा दिलाने के लिए एक रिपोर्ट भी तैयार की थी। सच्चिदानंद सिन्हा का निधन एक युग का अंत है। वे उस पीढ़ी के अंतिम चिंतक थे जो समाजवाद को सत्ता का साधन नहीं, मानव मुक्ति का मार्ग मानते थे।

विवेक शुक्ला के फेसबुक वॉल से
योगेन्द्र यादव ने लिखा- सच्चिदाजी नहीं रहे। 19 नवंबर 2025 को वो हमें छोड़ गए और उनके जाने के साथ ही भारतीय समाजवादी विचार परम्परा के एक युग का अवसान हो गया। मुझ जैसे ना जाने कितने युवाओं का वैचारिक प्रशिक्षण सच्चिदानंद सिन्हा को पढ़कर और सुनकर हुआ था। हिंदी और अंग्रेज़ी में दर्जनों किताबें, सैकड़ों लेख- अधिकांश बिहार के एक गाँव में बैठकर लिखे गए। अर्थव्यवस्था से लेकर कला तक, गांधी से मार्क्स और नक्सलवाद तक- हमारे युग का कोई कोना सच्चिदाजी की कलम से ना छूटा। उम्मीद है अकादमिक जगत आने वाले समय में उनके आंतरिक उपनिवेशवाद के सिद्धांत, जाति व्यवस्था की नई व्याख्या, पूंजीवाद के पतझड़ के विश्लेषण और अन्य स्थापनाओं पर गौर करेगा। अलविदा सच्चिदाजी! मेरा सौभाग्य था कि आपका सानिध्य और आशीर्वाद मिला। सुखद संयोग था कि पिछले महीने मुजफ्फरपुर में आपसे मुलाक़ात हो पायी। आपकी नई नवेली दाढ़ी के पीछे चिर परिचित निश्छल मुस्कान और खिली हँसी संजो कर रखूँगा।

नीतीश 10वीं बार बने सीएम, देखिए शपथ लेने वाले कैबिनेट की पूरी लिस्ट

बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते हुए नीतीश कुमार, दूसरी तस्वीर में साथ में पीएम मोदीनीतीश कुमार ने 10वीं बार बिहार के मुख्यकमंत्री के तौर पर आज 20 नवंबर 2025 को शपथ ली। उनके साथ 26 अन्य ने भी मंत्री पद की शपथ ली, जिसमें सम्राट चौधरी और विजय कुमार सिन्हा शामिल हैं। इस शपथ ग्रहण के साथ ही नीतीश कुमार देश में सबसे ज्यादा बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने वाले नेता बन गए हैं।

सीएम नीतीश कुमार की नई कैबिनेट में-: सम्राट चौधरी, विजय कुमार सिन्हा, विजय कुमार चौधरी, बिजेन्द्र प्रसाद यादव, श्रवण कुमार, मंगल पाण्डेय, डॉ. दिलीप कुमार जायसवाल, अशोक चौधरी, लेशी सिंह, मदन सहनी, नितिन नवीन, राम कृपाल यादव, संतोष कुमार सुमन, सुनील कुमार, मोहम्मकद जमा खान, संजय सिंह टाईगर, अरुण शंकर प्रसाद, सुरेन्द्र मेहता, नारायण प्रसाद, रमा निषाद, लखेन्द्र कुमार रौशन, श्रेयसी सिंह, प्रमोद कुमार, संजय कुमार, संजय कुमार सिंह और दीपक प्रकाश शामिल रहे।

शपथ लेने वाले 26 मंत्रियों में भाजपा के कोटे से 14, जदयू से 08, लोजपा (रामविलास)-02, हम- 01 और राष्ट्रीय लोक मोर्चा से 01 नाम शामिल है।

इस मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह समेत यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और एनडीए के तमाम दिग्गऔज नेता और कई राज्यों के मुख्य मंत्री भी मौजूद रहे। मुख्यमंत्री के तौर पर नीतीश कुमार 19 साल से ज्यादा का सफ़र तय कर चुके हैं। बिहार के इतिहास में अभी तक किसी भी मुख्यमंत्री का कार्यकाल इतना लंबा नहीं रहा है। अगर नीतीश 6 साल और मुख्यमंत्री बने रहें तो वह देश में सबसे ज्यादा समय तक मुख्यमंत्री बनने का रिकार्ड भी बना पाएंगे?

 

देश में सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री बने रहने का रिकॉर्ड पवन कुमार चामलिंग के नाम है. पवन चामलिंग 1994 से लेकर 2019 तक सिक्किम के मुख्यमंत्री रहे। 12 दिसंबर 1994 को पहली बार मुख्यमंत्री बने थे और 26 मई 2019 तक, लगभग 24 साल और 165 दिन तक मुख्यमंत्री के रूप में कार्य किया।

आदिवासियों के लिए यूपी सरकार का बड़ा फैसला

लखनऊ। राज्य सरकार प्रदेश के सभी आदिवासी परिवारों को विकास योजनाओं से पूर्ण रूप से जोड़ने के लिए एक बड़े कार्यक्रम की शुरुआत करने जा रही है। सरकार का लक्ष्य है कि इस परियोजना को अगले दो वर्षों के भीतर पूरा कर लिया जाए। सामाजिक कल्याण मंत्री असीम अरुण ने बताया कि यह काम उसी तर्ज पर किया जाएगा, जैसा बक्सर जनजाति के लिए किया गया था। बक्सर समुदाय के करीब 800 परिवार बिजनौर में रहते हैं।

बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती के उपलक्ष्य में आयोजित सप्ताह-भर चले समारोह के समापन पर बुधवार 19 नवंबर को बोलते हुए अरुण ने बताया कि केंद्र और राज्य सरकारों ने ‘पीएम जनजाति आदिवासी न्याय महाअभियान’ नामक योजना शुरू की थी, जिसके तहत बिजनौर में रहने वाले इन 800 बक्सर परिवारों को लक्षित किया गया।
इन परिवारों को आदिवासियों में भी सबसे अधिक पिछड़ा पहचाना गया था। अब ये परिवार पेंशन, छात्रवृत्ति, ऋण, रोजगार आदि सभी सरकारी योजनाओं से संतृप्त (सैचुरेटेड) हो चुके हैं और निरंतर लाभ प्राप्त कर रहे हैं।

अरुण ने कहा, “बिरसा मुंडा जयंती के सप्ताह-भर के आयोजन के दौरान हमने कई महत्वपूर्ण नीतिगत चर्चाएं कीं। उत्तर प्रदेश में लगभग 13 लाख आदिवासी व्यक्ति रहते हैं, जो सोनभद्र, चंदौली, मिर्ज़ापुर, श्रावस्ती, बलरामपुर, महाराजगंज आदि जिलों में फैले हुए हैं। यह तय किया गया है कि हम इस अभियान को एक लक्षित दृष्टिकोण के साथ आगे बढ़ाएंगे, और बक्सर जनजाति की सफलता को एक मानक मॉडल के रूप में अपनाएँगे।”

असीम अरुण के मुताबिक योजना के तहत विभाग ने पहले ही अधिकांश आदिवासी परिवारों का मैपिंग कर लिया है। ज़ीरो पॉवर्टी स्कीम सिस्टम का उपयोग करते हुए हर परिवार को एक फैमिली आईडी दी जाएगी, जिसकी मदद से सरकार यह पहचान सकेगी कि उस परिवार के कौन-से सदस्य किस योजना के लिए पात्र हैं।

अरुण ने आगे कहा कि “हमारा उद्देश्य है कि प्रत्येक परिवार को सभी विकास योजनाओं के उनके हक के लाभ पूरी तरह मिलें। इसके अलावा, हम उन्हें सतत रोजगार में भी मदद करेंगे। उन्होंने विकास को दो हिस्सों में बांटने के लिए कहा। पहला हिस्सा सरकारी योजनाओं के माध्यम से, जो सरकार की गारंटी हैं, और दूसरा हिस्सा अतिरिक्त साधनों से, जैसे डेयरी स्थापित करने में सहायता आदि।”

बिहार चुनावः जमीन पर बहुजन एकता जरूरी, तभी चुनावी जीत संभव

बिहार के कुछ इलाकों में दस दिनों तक घूमने के बाद यह पता चल गया था कि एनडीए की स्थिति मजबूत है। दस लोगों में से 7 लोग यही कह रहे थे। मैं ज्यादातर दलित और कुछ पिछड़ी बस्तियों में गया था। वो खबरें चलानी शुरू कि तो कमेंट आने लगे कि- “आप भाजपाई हो गए हैं।” क्योंकि दलित-बहुजन समाज का बुद्धिजीवी वर्ग बस यह चाहता है कि लोग जमीन पर कुछ भी कहें, आप एक खास दल कि बुराई करते रहो। सिर्फ वही बाईट दिखाओ, जिसमें लोग उसे कोसे, गालियां दे।
दरअसल दलित बस्तियों में दलित समाज का बड़ा वर्ग मोदी जी का नाम ले रहा था। नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव से ज्यादा। भाजपा ने यह जैसे भी कर दिखाया हो, यह जमीनी हकीकत दिखी।
समस्या यह है कि बुद्धिजीवी वर्ग और राजनीतिक दल अब भी पुराने सामाजिक गणित पर चलते हैं। वो मान लेते हैं कि
दलित है तो भाजपा के खिलाफ वोट देगा, यादव है तो राजद के साथ जाएगा और मुसलमानों की तो मजबूरी ही है। लेकिन जमीन पर ऐसा नहीं है। पिछड़े वर्ग में मुझे सिर्फ यादव ही राजद के साथ मजबूती से खड़े दिखे। हालांकि कुछ अन्य पत्रकार मित्रों ने सोशल मीडिया पर यह लिखा था कि यादव समाज के तमाम लोग भी भाजपा के समर्थन में हैं। दलित तो काफी बंटे थे। भाजपा ने अपने गठबंधन का गुलदस्ता भी शानदार सजाया था। इसमें समाज के हर वर्ग में समर्थन रखने वाले दल और नेता थे।
तो क्या यह माना जाए कि अब दलितों का झुकाव पिछड़ी जातियों की पार्टियों, खासकर यादव नेतृत्व वाली पार्टियों से घट रहा है? आप कह सकते हैं कि यूपी में बसपा के समर्थकों का वोट सपा को गया, लेकिन इसमें सपा की कोई अपनी सफलता नहीं है। बल्कि यह इसलिए हुआ क्योंकि यूपी में बसपा के आंदोलन के कारण वहां का वोटर ज्यादा जागरूक है। वह संविधान पर खतरे और भाजपा सरकार की चालबाजियों को बेहतर समझ रहा है।
दूसरी बात, तमाम बहुजन नायक और विचारक सामाजिक आंदोलन और सामाजिक एकता को राजनीतिक आंदोलन से अहम मानते रहे हैं। यह इसलिए कि जब दलितों-पिछड़ों के बीच सामाजिक एकता बढेगी, तभी वह राजनीतिक सफलता में बदल सकती है। अब यह नहीं हो रहा है। लालू यादव जी के साथ दलित समाज इसलिए खड़ा हुआ क्योंकि तब बिहार में सामंतवाद ज्यादा था। दलित समाज पीड़ित था। लेकिन लालू यादव के सत्ता में आने के बाद यह सामंतवाद कमजोर हुआ तो उसके बदले ओबीसी समाज का एक विशेष वर्ग मजबूत हो गया और कमोबेश उसने नव सामंतवादी रूप धर लिया।
देश के तमाम हिस्सों से आने वाली खबरें बताती है कि दलितों पर अत्याचार करने के मामले में पिछड़ा वर्ग भी कम नहीं है। खासकर मजबूत ओबीसी जातियां। ऐसे में गांव का वह पीड़ित दलित समाज चुनाव के वक्त आखिर उनके नेतृत्व वाले दलों को समर्थन क्यों देगा, यह बड़ा सवाल है? तब भी जबकि भाजपा लगातार देश के तमाम राज्यों में दलितों, आदिवासियों और पिछड़ी जातियों को मुख्यमंत्री बना रही है। आप उसे भले रबर स्टॉम्प कहें, लेकिन इतनी राजनीतिक समझ गांव के दलितों और आदिवासियों में कितनी है।
इसलिए अगर बिहार में राजद या फिर यूपी में सपा (बसपा की बात बाद में) को जीतना है तो गांंव-गांव में सबसे पहले तो उन्हें दलितों को अपना भाई मानकर उन्हें सम्मान देना होगा और उनपर अत्याचार बंद करना होगा। दूसरी बात, अगर सामंतवादी समाज दलितों पर अत्याचार करे तो दलितों के साथ न्याय के लिए खड़ा होना होगा। जब तब यह सामाजिक एकता नहीं बनेगी, राजनीतिक एकता और जीत संभव नहीं है।

टीना डाबी और दीपना नेत्रपाल: दो अम्बेडकरवादी महिलाओं ने रचा इतिहास

नई दिल्ली। अंबेडकरी समाज से आने वाली बाड़मेर जिले की आईएएस अधिकारी टीना डाबी ने एक बार फिर इतिहास रच दिया है। बाड़मेर ज़िले ने जल संचय जन भागीदारी पुरस्कार  जीतकर पूरे देश में पहला स्थान हासिल किया है। यह उपलब्धि टीना डाबी की अगुवाई में संभव हुई, जिन्होंने जिले में हजारों पारंपरिक टांकयानी भूमिगत जल संरचनाओं को पुनर्जीवित कराया और जल संरक्षण को एक जन आंदोलन का रूप दिया।

इस पुरस्कार के तहत बाड़मेर को 2 करोड़ रुपये की राशि मिलेगी। यह सम्मान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू 18 नवंबर को दिल्ली के विज्ञान भवन में दे रही हैं। ‘कैच द रेन’ अभियान के तहत पूरे देश को 10,000 से ज़्यादा जल भंडारण संरचनाएँ बनाने का लक्ष्य दिया गया था, सबसे आगे निकलते हुए बाड़मेर ने इस लक्ष्य को न सिर्फ पूरा किया, बल्कि उत्तरी क्षेत्र में टॉप पोज़िशन लेकर सबको पीछे छोड़ दिया।

विज्ञान भवन में आयोजित कार्यमक्रम में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के पीछे खड़ी टीना डाबीबता दें कि टीना डाबी ने साल 2015 UPSC परीक्षा में टॉप करके नई मिसाल कायम की थी। तब से कलेक्टर के रूप में वह जिस भी जिले में गईं, वहां उनके काम के अनोखे अंदाज की चर्चा रही। और अब बाड़मेर में जल संरक्षण को लेकर उनकी पहल पूरे भारत के लिए मॉडल बन गई है।

इसी तरह की एक और शानदार खबर दक्षिण भारत से आई है, जो कि अंबेडकरी समाज के लिए गर्व की बात है। बेंगलुरु स्थित क्षेत्रीय प्रशिक्षण केंद्र और क्षमता निर्माण एवं ज्ञान केंद्र की प्रिंसिपल डायरेक्टर दीपना नेत्रपाल को राष्ट्रीय CAG पुरस्कार से नवाजा गया है। खास बात यह है कि यह सम्मान पाने वाली वह देश की पहली दलित महिला अधिकारी हैं।

जीएसटी अवार्ड के दौरान दीपना नेत्रपालदीपना नेत्रपाल को यह पुरस्कार GST ऑडिट में नई पहल और बेंगलुरु में ट्रेनिंग सिस्टम के बड़े बदलाव के लिए दिया गया है। क्षमता निर्माण, पब्लिक अकाउंटिंग और प्रशिक्षण के क्षेत्र में दीपना नेत्रपाल के प्रयासों ने पूरे ऑडिट सिस्टम को नया रूप देने में अहम भूमिका निभाई है।

जिस तरह वंचित समाज से आने वाली दोनों महिलाओं ने यह शानदार उपलब्धि हासिल की है, उसने यह दिखा गया है कि चाहे प्रशासनिक नेतृत्व हो या कोई नई पहल, महिलाएं और खासकर दलित-बहुजन समाज की महिलाएं इसमें पीछे नहीं है।

बिहार में राज उसी का, दलित वोटर जिसका

बिहार चुनाव के दूसरे चरण में सबकी निगाहें दलित और मुसलमान मतदाताओं पर है। दूसरे चरण में जिन 122 विधानसभा सीटों पर मतदान हो रहा है, उसमें लगभग 100 सीटें ऐसी है, जिस पर जीत-हार का फैसला दलित मतदाता करेंगे। यह समाज जिधर जाएगा, सत्ता उधर ही जाएगी। ऐसा इसलिए कि दूसरे चरण के मतदान में जिन सीटों पर वोटिंग हो रही है, वहां दलित समाज की आबादी 18 फीसदी है।

वहीं दूसरी ओर मुसलमान वोटरों पर भी सबकी निगाहे हैं। क्योंकि इसी चरण में सीमांचल समेत तीन दर्जन सीटों पर हार-जीत का फैसला मुस्लिम समाज करेगा। माना जा रहा है कि मुस्लिम वोट गठबंधन को मिलेगा, लेकिन मुस्लिम वोटरों को रिझाने के लिए ओवैसी की पार्टी AIMIM और प्रशांत किशोर की पार्टी जनसुराज भी मैदान में है।

2020 चुनाव की बात करें तो एनडीए को अंग प्रदेश, तिरहुत और मिथिलांचल में जबकि राजद और महागठबंधन को मगध क्षेत्र में अच्छी बढ़त हासिल हुई थी। सीमांचल में कांटे के मुकाबले और AIMIM की मौजूदगी के कारण एनडीए को मामूली बढ़त हासिल हुई थी।

इस चरण में सबसे अहम दलित समाज है। इन क्षेत्रों में कुल 18 फीसदी की हिस्सेदारी रखने वाले दलित समाज में 2.5 फीसदी मुसहर समाज और पांच फीसदी पासवान यानी दुसाध समाज के वोटर शामिल हैं। करीब सौ सीटें ऐसी हैं, जहां दलित मतदाताओं की आबादी 30 से 40 हजार के बीच है।

दलित वोटों की बात करें तो बहुजन समाज पार्टी भी एक बड़ा फैक्टर है। बसपा ने शुरुआत में सभी 243 सीटों के लिए उम्मीदवारों की घोषणा की थी, लेकिन कुछ नामांकन रद्द होने के बाद अब केवल 190 उम्मीदवार ही मैदान में हैं। रविदास समाज के बीच पार्टी को जन समर्थन हासिल है। पिछले विधानसभा चुनावों में, बसपा ने 78 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे और उसे 2.37% हासिल किया था। तब बसपा ने चैनपुर सीट जीती थी, जिसके विधायक बाद में जदयू में शामिल हो गए।

हालांकि इस बार गठबंधन का गणित 2020 के मुकाबले अलग है। 2020 के चुनाव में VIP पार्टी एनडीए के साथ थी, तो चिराग पासवान ने अकेले चुनाव लड़ा था। चिराग पासवान यानी लोकजनशक्ति पार्टी रामविलास के अकेले चुनाव मैदान में होने से जनता दल यूनाइटेड को सीधे 22 सीटों का नुकसान हुआ था। इस बार चिराग एनडीए के साथ हैं तो VIP महागठबंधन के साथ, ऐसे में चुनावी नतीजे कितने प्रभावित होंगे, यह तो चुनावी नतीजों से पता चलेगा। लेकिन आंकड़ों की बात करें तो महागठबंधन ने 2020 के चुनाव में इन सीटों पर 66 में 50 सीटें जीती थीं, जबकि BJP ने 42 सीटें और JDU ने 20 सीटें जीती थीं। कुल मिलाकर इस चरण में सबकी निगाहें दलित और मुस्लिम मतदाताओं पर टिकी है। नतीजे बताएंगे कि उनका भरोसा जीतने में कौन सा राजनीतिक दल कितना कामयाब हुआ है।

एक सितारा टूट गयाः भदन्त ज्ञानेश्वर महाथेर नहीं रहे

यूँ भारत में “पंडित” शब्द बहुत रूढ़ अर्थों में प्रयोग किया जाता है लेकिन बौद्ध अर्थों में पांच विद्याओं से मंडित व्यक्ति को पंडित कहतें हैं: 1. शब्द विद्या 2. हेतु विद्या 3. शीलकर्म विद्या 4. चिकित्सा विद्या 5. अध्यात्म विद्या

आधुनिक शब्दावली में इसे निम्नवत कहेंगे: 1. शब्द विद्या अर्थात भाषा विज्ञान अथवा language science or linguistics 2. हेतु विद्या अर्थात तर्क शास्त्र यानी logic या reasoning 3. शीलकर्म विद्या यानी कौशल या आजीविका लायक शिल्प अर्थात हुनर यानी Skills 4. चिकित्सा विद्या यानी medical science 5. अध्यात्म विद्या अर्थात spiritual science

इन पांच विद्याओं से मंडित व्यक्ति को पंडित कहा जाता है। “पंडित” शब्द में संलग्न उपसर्ग “पं” पांच के अर्थ में है। धम्मपद में पूरा एक अध्याय है- पंडित वग्गो। यूँ प्रचलित परम्परा में भी पंडित शब्द की बड़ी उदात्त परिभाषा दी गयी है:

मातृवत परदारेषु परदृव्यं लोष्टवत। आत्मवतसर्वेषु यः जानाति सः पंडितः।।

अर्थात् परस्त्री को माँ की तरह देखने वाला, दूसरे के धन को कंकड़, पत्थर समझने वाला, दूसरों में अपना ही स्वरूप देखना, जो ऐसा जानता है वह पंडित है।

बौद्धकाल में तक्षशिला विश्वविद्यालय में उपरोक्त वर्णित पांच विद्याओं से मंडित को “पंडित” की उपाधि यानी डिग्री प्रदान की जाती थी। पंडितों के पंडित को यानी पंडित उपाधि पाए लोगों पढ़ाने वाले को महापंडित की उपाधि दी जाती थी और महापंडित के भी उपाध्याय को “अग्ग महापंडित” उपाधि प्रदान की जाती थी। पालि भाषा में “अग्ग” उपसर्ग यानी “अग्र” का अर्थ होता है- सर्वश्रेष्ठ। अग्गमहापंडित अथवा अग्रमहापंडित यानी श्रेष्ठतम पंडित।

मूलतः बर्मा अर्थात म्यान्मार के तथा कुशीनगर में प्रवासरत रहे पूज्य भदन्त ज्ञानेश्वर महाथेर को सन् 1997 में म्यान्मार की सरकार द्वारा “अग्गमहापंडित” की उपाधि प्रदान की गयी।

“अग्ग महासद्धम्म जोतिका धजा” की उपाधि वर्ष 2005 में प्रदान की गयी, वर्ष 2016 में “अभिधम्म महासद्धम्म जोतिका धजा” से विभूषित किया गया और 04 जनवरी 2021, बर्मा के स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर वहाँ की सरकार ने पूज्य भदन्त ज्ञानेश्वर महाथेर को अपने देश के महानतम सम्मान “अभिधजा महारथ गुरू” प्रदान किया है, जैसे भारत का सर्वोच्च राजकीय “भारत रत्न” होता है, वैसे।

“अभिधजा महारथ गुरू” थेरवाद का उच्चतम सम्मान है। एक अर्थ में यह सारे विश्व में थेरवाद का गौरव है। यह सम्मान भारत में प्रवास कर रहे, भारतीय नागरिकता के साथ भारत को धन्य कर रहे पूज्य भदन्त ज्ञानेश्वर महाथेर भारत की भूमि में ही शान्त हो गये। दिनांक 31 अक्टूबर’2025 को 90 वर्ष की आयु में लम्बी बीमारी के बाद पूज्य भदन्त ने लखनऊ के मेदान्ता अस्पताल में शरीर त्याग दिया। संघ द्वारा लिये गये निर्णय के अनुसार पूज्य का पार्थिव शरीर थाई बुद्ध विहार, कुशीनगर में 10 नवम्बर’2025 तक दर्शनार्थ पूजित होता रहेगा। अंतिम संस्कार 11 नवम्बर’2025 को होगा।

सन् 1936 में जन्मे पूज्य भदन्त ज्ञानेश्वर महाथेर का जन्म मूलतः बर्मा का है लेकिन अपने स्वदेशीय गुरू पूज्य भदन्त चन्द्रमणि जी के साथ वे आजीवन के लिए भारत आ गये और यहीं के होकर रह गये।

पूज्य भदन्त चन्द्रमणि महाथेर के द्वारा 14 अक्टूबर’1956 को अशोक विजयदशमी के दिन नागपुर में बोधिसत्व बाबा साहेब को तथा साथ उनके लाखों अनुयायियों को बुद्ध धम्म की दीक्षा प्रदान की गयी थी। वे उस समय भारत में रह रहे थेरवाद के वरिष्ठतम भिक्खु थे। इन अर्थों में पूज्य भदन्त ज्ञानेश्वर महाथेर बोधिसत्व बाबा साहेब के गुरुभाई थे।

27 फरवरी’2021, शनिवार, माघ पूर्णिमा उपोसथ के दिन समन्वय सेवा संस्थान भारत द्वारा पूज्य भदन्त ज्ञानेश्वर महाथेर को “Gem of Dhamma Award” प्रदान कर आशीर्वाद लिया गया था। उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा अन्तरराष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान (संस्कृति विभाग उत्तर प्रदेश) के तत्वावधान में आयोजित बुद्धिस्ट कानक्लेव-2021 में भी पूज्य का मार्च 2021 में सम्मान किया गया था।

आज धम्म के आकाश से एक सितारा टूट गया। समन्वय परिवार को पूज्य का सतत आशीर्वाद मिलता रहा है। समस्त समन्वय परिवार शोकाकुल है।


बौद्ध विद्वान राजेश चंद्रा द्वारा दी गई श्रद्धांजलि साभार प्रकाशित

जोगेंद्र नाथ मंडल पाकिस्तान से भारत क्यों वापस आए?

1946 के संयुक्त भारत की अंतरिम सरकार के पहले कानून मंत्री जोगेंद्र नाथ मंडल पूर्वी बंगाल के एक प्रमुख अनुसूचित जाति के नेता थे। वे भारत विभाजन के बाद पाकिस्तान की संविधान सभा के सदस्य बने रहे। उन्होंने पाकिस्तान में कई महत्वपूर्ण पदों को सुशोभित किया, जिनमें पाकिस्तान संविधान सभा के कार्यवाहक अध्यक्ष होने के साथ-साथ पाकिस्तान के पहले कानून मंत्री और श्रम मंत्री भी बनाए गये। जिन्ना ने पाकिस्तान संविधान सभा को संबोधित करते हुए पाकिस्तान को एक धर्मनिरपेक्ष पाकिस्तान बनाने और अल्पसंख्यकों को विशेष विशेषाधिकार प्रदान करने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराई। हालाँकि, 11 सितंबर, 1948 को जिन्ना की मृत्यु  के बाद जब दलितों पर अत्याचार बढ़ गया और उसके बाद 1950 में प्रधानमंत्री लियाकत अली खान ने पाकिस्तान को इस्लामिक राष्ट्र बनाने की घोषणा की। इसके विरोधस्वरूप जोगेंद्र नाथ मंडल ने सरकार से इस्तीफा दे दिया। यह मुस्लिम लीग द्वारा उनके साथ किए गए विश्वासघात का स्पष्ट संकेत था, क्योंकि पाकिस्तान जिन्ना के शुरुआती वादों के विपरीत एक धर्मशासित राज्य बनने की ओर अग्रसर होने लगा था। पाकिस्तान के एक धर्मतंत्रीय व्यवस्था की ओर बढ़ने के बाद, जोगेंद्र नाथ मंडल ने दुखी होकर विरोधस्वरूप मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया और 1950 में भारत लौट आए। उन्होंने  मुख्य रूप से पाकिस्तान के इस्लामिक राज्य बनाने के खिलाफ विरोध करने और मुस्लिम लीग द्वारा किए गए वादों को तोड़ने की ओर ध्यान आकर्षित करने के लिए मंत्रिमंडल से त्यागपत्र दे दिया।

  जिन्ना के धर्मनिरपेक्षता और अल्पसंख्यक अधिकारों के वादों के कारण जोगेंद्र नाथ मंडल ने उनका साथ दिया था। वे पाकिस्तान में इसलिए भी रुके थे क्योंकि पूर्वी बंगाल के चटगाँव और जेसोर-खुलना जैसे कुछ जिले हिंदुओं और अछूतों के वर्चस्व वाले थे, जिनकी आबादी 54% थी। जिसमें अनुसूचित जातियों की आबादी 30% से अधिक थी। मंडल अपने गृह जिले बारिसाथ से चुने गए थे, जो इन क्षेत्रों से सटा हुआ था। उल्लेखनीय है कि भारत के विभाजन के दौरान, चटगाँव और खुलना, दोनों गैर-मुस्लिम बहुल क्षेत्र, पाकिस्तान को आवंटित किए गए, जबकि ये वे क्षेत्र थे जिन्हें विभाजन के दिशा-निर्देशों के अनुसार भारत का हिस्सा होना चाहिए था। माना जाता है कि सरदार पटेल और उनके कांग्रेस सहयोगियों ने डॉ. आंबेडकर को बॉम्बे से केंद्रीय विधान सभा में प्रवेश करने से रोकने में भूमिका निभाई थी। डॉ. आंबेडकर को राजनीतिक रूप से हाशिए पर धकेलने के लिए चटगांव और खुलना को पाकिस्तान में स्थानांतरित करने का एक ठोस प्रयास किया गया था, जो स्वतंत्रता के बाद स्पष्ट हो गया।

भारत के बजाय पाकिस्तान में रहने का निर्णय लेने के पीछे जोगेंद्र नाथ मंडल का कारण यह था कि बंगाल में दलितों और मुसलमानों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति काफी हद तक समान थी। दोनों समुदाय मुख्य रूप से किसान या मछुआरे या कारीगर थे। बहुत कम लोग कुलीन थे। दलितों और मुसलमानों के हित समान थे। उनकी जनसंख्या का अनुपात लगभग एक तिहाई था। वे एक साथ मित्रतापूर्वक रह सकते थे। दूसरे, स्वतंत्र भारत में हिंदुओं का वर्चस्व होगा और दलितों का दर्जा दोयम दर्जे का होगा। उन्हें लगा कि दलितों को भारत में समान अवसर नहीं मिलेंगे और उनका दमन किया जाएगा। लेकिन पाकिस्तान में दलितों की स्थिति के बारे में जोगेंद्र नाथ मंडल का आकलन गलत साबित हुआ। पाकिस्तान दलितों के लिए वह देश नहीं बन सका जिसकी जोगेंद्र नाथ मंडल ने कल्पना की थी। लेकिन भारत के दलितों के बारे में उनका आकलन कमोबेश सही साबित हुआ। क्योंकि इन्हीं कारणों से बाबासाहेब आंबेडकर ने खुद नेहरू मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया था। आजादी के चार साल बाद भी बाबासाहेब आंबेडकर भारत में उतने ही हताश और निराश थे, जितने जोगेंद्र नाथ मंडल पाकिस्तान में थे। अपने इस्तीफे में बाबासाहेब आंबेडकर ने संविधान में प्रावधानों के बावजूद दलितों पर हो रहे अत्याचार और हिंदू कोड बिल के मुद्दे पर गुस्सा जाहिर किया था।

  हम जोगेंद्र नाथ मंडल के आभारी हैं, जिनकी वजह से भारत को डॉ. आंबेडकर जैसा संविधान विशेषज्ञ मिला। 1946 में जब संविधान सभा के सदस्यों के चुनाव की बात आई, तो कांग्रेस ने महाराष्ट्र में बाबा साहब आंबेडकरके लिए न केवल सभी दरवाजे और खिड़कियां बंद कर दीं, बल्कि उनके लिए कोई वेंटिलेटर भी नहीं छोड़ा। तब जोगेंद्र नाथ मंडल ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल करके 1946 में बाबा साहब आंबेडकर को बंगाल से संविधान सभा के लिए चुनवाया। जोगेंद्र नाथ मंडल की राजनीतिक यात्रा के संदर्भ में कहा जाता है कि डॉ. आंबेडकर ने 1950 में जोगेंद्र नाथ मंडल को भारत लौटने की सलाह दी थी। जिस कारण जोगेंद्र नाथ मंडल भारत वापस आए। जोगेंद्र नाथ मंडल की पाकिस्तान से वापसी को एक विद्रोह और धर्मनिरपेक्ष सिद्धांतों के साथ विश्वासघात के रूप में  अंतरराष्ट्रीय मंच पर देखा गया। भारत लौटने के बाद जोगेंद्र नाथ मंडल ने दो संसदीय चुनाव लड़े, जिनमें से दोनों में ही वे हार गए और अंततः 5 अक्टूबर, 1968 को उनका निधन हो गया।

  जोगेंद्र नाथ मंडल की भारत वापसी के आलोचकों को यह समझना चाहिए कि उनका निर्णय आत्मसम्मान की इच्छा से प्रेरित था, सत्ता की प्यास से नहीं। कई मौजूदा राजनीतिक नेताओं के विपरीत जो व्यक्तिगत लाभ को प्राथमिकता देते हैं, मंडल की कार्रवाई गरिमा के सिद्धांत पर आधारित थी। भारत में उनकी वापसी महज एक राजनीतिक पैंतरेबाजी नहीं थी; यह जिन्ना की मृत्यु के बाद उनके साथ हुए टूटे वादों और विश्वासघात का जवाब था। उनकी वापसी स्वार्थी महत्वाकांक्षाओं के लिए नहीं बल्कि आत्मसम्मान की जरूरत से हुई थी, जो सार्वजनिक जीवन में गरिमा के महत्व को समझने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए एक आवश्यक मूल्य है।

  जो लोग जोगेन्द्र नाथ मंडल के भारत वापस आने की आलोचना करते हैं। इस आधार पर हिंदू मुस्लिम विभेद खड़ा करते हैं उन्हें यह जानना चाहिए कि जोगेन्द्र नाथ मंडल सत्ता को लात मार कर आने वाला स्वाभिमान था। जोगेन्द्र नाथ मंडल का पाकिस्तान में रुतबा और दर्जा पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के बाद का था। जैसे ही प्रधानमंत्री लियाकत अली खान ने 1950 में पाकिस्तान को इस्लामिक राष्ट्र बनाने की घोषणा की, अपने स्वाभिमान से लबरेज जोगेन्द्र नाथ मंडल ने मंत्रीपद  जैसे सम्मानित पद को लात मार कर भारत में सामान्य जीवन व्यतीत करने आए थे।

  जोगेन्द्र नाथ मंडल चाहते तो पाकिस्तान में रह कर व्यक्तिगत रूप से मौज मजे कर सकते थे। पर उन्होंने उसका विरोध किया और त्याग पत्र देकर वापस आए। उनका वापस आना आज के नेताओं जैसा स्वयं की सत्ता के लिए समाज और देश का सौदा करने जैसा नहीं था। भारत में प्रभावशाली जातियां और उसके नेता स्वयं के सत्ता और पद पाने के लालच में कुटिल दाव पेंच करते रहते हैं, राक्षसी संघर्ष में लीन रहते हैं, अपनी पार्टी और सरकार को चूना लगाने से भी नहीं चूकते हैं।

  यहां तक कि कभी-कभी अपने दल की सरकारों को भी ज्योतिरादित्य सिंधिया, हेमंत विश्व शर्मा और अन्यो की तरह स्वार्थ पूरा नहीं होने पर पलट देते हैं। वे अपनी ही सरकारों को बेशर्मीपूर्वक ब्लैकमेल और अस्थिर करते रहते हैं। अपनी पार्टी की सरकार को भी गिरा देते हैं। अपने तुच्छ स्वार्थ के लिए भारत के कई राज्यों को मनमाने और बेढंगे तरीके से विभाजित भी किया है। भारत का विभाजन भी तो हिंदू मुस्लिम के सत्ता पर वर्चस्व को लेकर ही तो हुआ।

 मेरे एक मित्र ने पूछा कि जोगेंद्र नाथ मंडल ने पाकिस्तान सरकार में अपना प्रतिष्ठित पद छोड़कर भारत लौटने का फैसला क्यों किया? और उसके बाद वे अपेक्षाकृत साधारण जीवन जी रहे थे। क्या यह जिन्ना की मृत्यु के बाद दलित-मुस्लिम विश्वास के टूटने के कारण था? यह सच है कि जिन्ना की मृत्यु के बाद, पाकिस्तान में तीव्र आंतरिक सत्ता संघर्ष हुआ, जिससे रक्तपात और राजनीतिक अराजकता फैल गई। देश को अपना संविधान बनाने में भी दो दशक से अधिक का समय लगा। हालाँकि, सत्ता, स्वाभिमान और वर्चस्व के लिए इसी तरह के संघर्ष भारत में भी देखे जा सकते हैं, न केवल दलितों और मुसलमानों के बीच, बल्कि विभिन्न प्रमुख हिंदू जातियों के बीच भी। भारत में, जाति-आधारित संघर्ष प्रचलित हैं, यहाँ तक कि ब्राह्मणों, ठाकुरों और अन्य प्रभावशाली जातियों जैसे समूहों के बीच भी, जो कभी-कभी अस्तित्व और सत्ता के लिए गठबंधन बनाते हैं, लेकिन बाद में तीखे संघर्षों में उलझ जाते हैं। ये समूह अक्सर एक-दूसरे से लड़ते झगड़ते रहते हैं, जिससे उनकी अपनी पार्टियों और संगठनों में अस्थिरता पैदा होती है। कई बार, राजनीतिक दल के कुछ लोग अपने स्वार्थी, संकीर्ण हितों के लिए अपनी सरकारों को भी गिरा देते हैं। निहित स्वार्थों से प्रेरित यह सत्ता संघर्ष किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं है। इसी तरह, कुछ राजनीतिक दलों ने सत्ता और प्रभुत्व हासिल करने के लिए भारत में तर्कहीन और मनमाने ढंग से राज्यों का विभाजन किया है। यह समझना महत्वपूर्ण है कि भारत का विभाजन, हिंदू और मुस्लिम समुदायों के भीतर कुछ नेताओं द्वारा खेले गए सत्ता के खेल का परिणाम था। जोगेंद्र नाथ मंडल के बलिदान के महत्व को समझने के लिए इस संदर्भ को समझना आवश्यक है।

 जो आलोचक यह दावा करते हैं कि भारत में उच्च जाति के सवर्ण हिंदू दलितों पर अत्याचार नहीं करते हैं, या वे उनके साथ सम्मान से पेश आते हैं, वे या तो अज्ञानी हैं या छलीकपटी हैं। ऐसी आलोचनाएं एक ऐसी मानसिकता को प्रकट करती हैं जो दलितों द्वारा भारत में सामना किए जाने वाले वास्तविक, प्रणालीगत भेदभाव को बहुत कम करके आंकती है। डॉ. आंबेडकर के अनुभव की तरह ही जोगेंद्र नाथ मंडल का अनुभव भी यह दर्शाता है कि सत्ता और प्रतिष्ठा के पदों पर बैठे लोगों को भी अक्सर अपना आत्म-सम्मान बनाए रखने के लिए कठिन निर्णय लेने पड़ते हैं। डॉ. आंबेडकर ने खुद 1951 में केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया था, इसलिए क्योंकि उन्होंने अपने सिद्धांतों और आत्म-सम्मान से समझौता करने से इनकार कर दिया था। जोगेंद्र नाथ मंडल की तरह ही आंबेडकर के कार्यों ने राजनीतिक महत्वाकांक्षा पर सम्मान के महत्व को उजागर किया। विभाजन के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच, जिसमें लोग एक-दूसरे के देशों में बसने के लिए सीमा पार करते थे, केवल धार्मिक या राजनीतिक कारणों से नहीं बल्कि व्यक्तिगत पसंद, सुविधा और आत्म-सम्मान की खोज से प्रेरित था। एक से दूसरे देश में बसना एक जटिल प्रक्रिया थी जो किसी साधारण हिंदू-मुस्लिम विभाजन का पालन नहीं करती थी। उदाहरण के लिए, एम.ए. जिन्ना की बेटी दीना वाडिया ने पाकिस्तान में बसने के कई प्रस्तावों के बावजूद भारत में रहना चुना। दीना वाडिया के बेटे नुस्ली वाडिया भारत में एक प्रसिद्ध उद्योगपति हैं। इसी तरह, मोहम्मदअली करीम छागला, जिन्होंने जिन्ना के साथ एक जूनियर वकील के रूप में काम किया था, ने पाकिस्तान नहीं जाने का फैसला किया। यहां तक ​​​​कि 15 अगस्त 1973 को लाहौर में पैदा हुए अदनान सामी खान (दिवंगत अरशद शमी खान के बेटे, एक पाकिस्तानी वायु सेना अधिकारी, जिन्होंने 1965 के भारत-पाक युद्ध में लड़ाई लड़ी थी) को 2016 में भारत की नागरिकता दी गई। दीना वाडिया और अरशद सामी खान के बारे में जानकारी गूगल पर भी उपलब्ध है।

  भारत विभाजन और जिन्ना की मृत्यु के बाद, पाकिस्तान के गठन के दौरान पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में बसे कुछ मुसलमान 1971 के बांग्लादेश मुक्ति युद्ध के दौरान भारत लौट आए। यह दर्शाता है कि कैसे व्यक्तियों और परिवारों ने धार्मिक या राष्ट्रवादी सीमाओं का पालन करने के बजाय बदलती राजनीतिक गतिशीलता, व्यक्तिगत अनुभवों और आत्म-सम्मान के अवसरों के आधार पर निर्णय लिए।

 इसे समझ कर ही जोगेन्द्र नाथ मंडल के त्याग पूर्ण कार्यो को समझा जा सकता है। जोगेन्द्र नाथ मंडल का उल्लेख करते हुए ये लोग ऐसा चित्रित करते हैं जैसे भारत में सवर्ण दलितों के साथ अत्याचार करते नहीं है बल्कि उन्हें सर आंखों पर बैठा कर रखते हैं। अपने परिवार के बड़े जैसा इज्जत देते हैं। इससे आरोप लगाने वाले की कुटिल मानसिकता का पता चलता है। जिन्ना की मृत्यु 11 सितंबर 1948 को हई, इसके बाद जोगेन्द्र नाथ मंडल के मंत्री पद से त्यागपत्र 8 अक्टूबर 1950 की प्रति को पढा जाना चाहिए। जोगेंद्र नाथ मंडल एक ऐसे संघर्षशील, गतिशील और जीवटवान राजनेता थे, जिनका जीवन, संघर्ष और सिद्धांत एक प्ररेणा है। उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि।

 

 

IPS पूरन कुमार की आत्महत्या पर महिला IAS का पोस्ट, उठाए गंभीर सवाल

*रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई* *तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई* आपको इस तरह नहीं जाना चाहिए था, सर। आपको क्या किसी को भी इस तरह नहीं जाना चाहिए। एक सक्षम, प्रतिभाशाली और प्रतिबद्ध वरिष्ठ IPS अधिकारी, Sh Y Puran Kumar जिसने अपनी अपनी ज़िंदगी के सबसे सक्रिय साल देश और समाज की सेवा में लगा दिए, उसे यूँ चले जाने देना हमारे समाज और सिस्टम दोनों के लिए बहुत बड़ा सवाल है। एक ऐसा सवाल जिन पर एक समाज के तौर पर हमें वाक़ई ठहरकर सोचने की ज़रूरत है। सिर्फ़ फ़ॉर्मल सिम्पथी के लिए नहीं, बल्कि रियल इंट्रोस्पेक्शन के लिए। हमने अपने इन्स्टिट्यूशंस के अंदर ये कैसा माहौल बना लिया है? आख़िर यह कौन सा सिस्टम है जहां उस सिस्टम के ही एक महत्वपूर्ण हिस्से को… इतना अनदेखा, अनसुना किया जाता है कि वो भीतर तक टूट जाता है और हारकर ऐसा एक्स्ट्रीम स्टेप उठाने पर मजबूर हो जाता है। Frankly, no one should ever be pushed to that edge- to feel unseen, unheard, or broken inside a system they once believed in. कहीं हम भूल तो नहीं गए कि एक अधिकारी के रूप में देश की सेवा कर रहा व्यक्ति आख़िरकार एक जीता-जागता इंसान है। ईश्वर से मेरी बस इतनी ही प्रार्थना है कि वो दिवंगत आत्मा को शांति दे , उनके परिवार को ये दुख सहने की शक्ति दे और सभ्य समाज और ऑफ़िसर्स फ़्रटर्निटी के रूप में, हमें इतना साहस दे कि कलेक्टिवली हम सिस्टम में वो बदलाव लाने का प्रयास कर पाएँ जिनकी सख़्त ज़रूरत है। ताकि आगे से हमारा कोई भी साथी, जूनियर या सीनियर, कभी भी, हमारे बीच से अचानक, यूँ ही, हमें अलविदा कहे बग़ैर न चला जाए। *जलते घर को देखने वालों फूस का छप्पर आपका है* *आपके पीछे तेज़ हवा है आगे मुकद्दर आपका है* *उस के क़त्ल पे मैं भी चुप था मेरा नम्बर अब आया* *मेरे क़त्ल पे आप भी चुप है अगला नम्बर आपका है*

बिहार चुनाव से पहले दलितों-आदिवासियों से तेजस्वी यादव के 17 वादे

पटना। आंकड़े बताते हैं कि बिहार का हर पाँचवाँ वोटर दलित है। ऐसे में इस चुनाव में दलित मतदाता सबके लिए अहम बने हुए हैं और हर दल उन्हें लुभाने की कोशिश में जुट गया है। इसके लिए सत्ता पक्ष से लेकर विपक्ष तक तमाम घोषणाएं कर रहे हैं। इसी बीच रविवार 5 अक्तूबर को नेता प्रतिपक्ष और विपक्ष के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार तेजस्वी यादव एक अहम कार्यक्रम में शामिल हुए। “अंबेडकर दलित-आदिवासी अधिकार संवाद” नाम से पटना में आयोजित कार्यक्रम में तेजस्वी यादव ने दलित आदिवासी वर्ग की भागीदारी और सामाजिक एवं आर्थिक न्याय के लिए 17 बिन्दुओं का “दलित-आदिवासी न्याय संकल्प” पेश किया। राजद नेता तेजस्वी यादव ने रविवार को पटना स्थित वेटनरी कॉलेज मैदान में आयोजित “आंबेडकर दलित-आदिवासी अधिकार संवाद” के मंच से ऐतिहासिक एलान किया। उन्होंने कहा कि यदि बिहार में हमारी सरकार बनी, तो एससी-एसटी एक्ट को बचाने के लिए आंदोलन में शामिल एक लाख से अधिक दलित-आदिवासी कार्यकर्ताओं पर दर्ज मुकदमे वापस लिये जाएंगे। साथ ही “इन सभी लोगों को ‘आंबेडकर सेनानी’ का दर्जा दिया जाएगा और उन्हें नकद पुरस्कार और प्रशस्ति-पत्र भी दिए जाएंगे। तेजस्वी यादव ने ऐलान किया कि उनकी सरकार बनते ही मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में अनुसूचित जाति, जनजाति और अतिपिछड़ा वर्ग के सामाजिक-शैक्षणिक मामलों की निगरानी के लिए एक उच्चाधिकार समिति का गठन किया जाएगा, जिसकी बैठक हर तीन महीने में होगी। और अध्यक्षता मुख्यमंत्री खुद करेंगे। “दलित-आदिवासी वर्ग को आर्थिक रूप से सशक्त करने के लिए तेजस्वी यादव ने 5,000 करोड़ रुपये का ‘उद्यमिता कोष’ बनाने की भी घोषणा की। उनका कहना था कि इस वर्ग के युवाओं को ठेकेदारी और व्यापार के क्षेत्र में बढ़ावा दिया जाएगा।”

उच्च शिक्षा में नई पहल का वादा करते हुए तेजस्वी यादव ने कहा कि सरकार बनने पर हम दलित-आदिवासी छात्रों को देश-विदेश की प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटियों- जैसे हार्वर्ड और ऑक्सफोर्ड- में पढ़ने का अवसर मुहैया कराएंगे। इसके लिए सरकार हर साल 200 छात्रों को विदेश भेजेगी। संविधान विरोधी ताकतों और भाजपा पर तीखा हमला करते हुए तेजस्वी यादव ने कहा कि- “ऐसा कोई माई का लाल नहीं जो बाबा साहेब के बनाए संविधान और आरक्षण को खत्म कर सके।” उच्च शिक्षा संस्थानों में NFS यानी नॉट फाउंड सुटेबल को खत्म करने की बात करते हुए तेजस्वी ने कहा कि सरकार बनते ही हर डिग्रीधारी को नौकरी दी जाएगी और आरक्षण की सीमा बढ़ाई जाएगी। तेजस्वी यादव का 17 सूत्रीय “दलित-आदिवासी न्याय संकल्प” 1. उच्चाधिकार समिति: मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में एससी-एसटी और अतिपिछड़ा वर्ग के सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक विकास की निगरानी हेतु उच्च स्तरीय समिति गठित होगी, जिसकी साल में चार बैठकें होंगी। 2. सरकारी सेवा में समानता: सरकारी नौकरियों और पदोन्नति में भेदभाव खत्म कर जाति सर्वे के अनुसार एससी-एसटी को समानुपातिक आरक्षण दिया जाएगा। 3. आरक्षण सीमा बढ़ाने की पहल: 50% आरक्षण सीमा को बढ़ाने के लिए विधानमंडल में कानून पारित कर इसे संविधान की नौवीं अनुसूची में शामिल करने का प्रस्ताव केंद्र को भेजा जाएगा। 4. बजट में हिस्सेदारी: आबादी के अनुपात में बजट आवंटन सुनिश्चित करने के लिए एससी-एसटी उपयोजना कानून लागू किया जाएगा। 5. शिक्षा में समान अवसर: डॉ. आंबेडकर शैक्षिक समावेश योजना के तहत सामाजिक और शैक्षिक खाई पाटने के लिए नीति, बजट और संसाधनों की गारंटी होगी। 6. विदेशी शिक्षा छात्रवृत्ति: हर साल एससी-एसटी समुदाय के 200 छात्रों को विदेशों की शीर्ष यूनिवर्सिटियों में पढ़ने के लिए छात्रवृत्ति दी जाएगी। 7. अत्याचार पर रोक: एससी-एसटी पर होने वाले अत्याचारों की निगरानी के लिए हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता में राज्य स्तरीय निगरानी समिति बनाई जाएगी। 8. मनरेगा में प्राथमिकता: मनरेगा के तहत दलित-आदिवासी किसानों की जमीनों के विकास को प्राथमिकता दी जाएगी। 9. उद्यमिता कोष: दलित-आदिवासी युवाओं में व्यवसाय और ठेकेदारी को बढ़ावा देने के लिए 5,000 करोड़ रुपये का उद्यमिता कोष बनाया जाएगा। 10. चयन प्रक्रिया में “Not Found Suitable” जैसी मनमानी व्यवस्था को अवैध घोषित किया जाएगा। 11. सभी भूमिहीन दलित-आदिवासियों को ग्रामीण क्षेत्रों में 5 डिसमिल और शहरी क्षेत्रों में 3 डिसमिल जमीन दी जाएगी। 12. शिक्षा अधिकार कानून के तहत निजी स्कूलों की आरक्षित सीटों का आधा हिस्सा एससी-एसटी और पिछड़े वर्गों के बच्चों के लिए निर्धारित होगा। 13. ठेकों में आरक्षण: ₹25 करोड़ तक के सरकारी ठेकों और सप्लाई कार्यों में एससी-एसटी व पिछड़ा वर्ग को 50% आरक्षण दिया जाएगा। 14. निजी कॉलेजों में आरक्षण: संविधान की धारा 15(5) के तहत सभी निजी शिक्षण संस्थानों में भी आरक्षण लागू किया जाएगा। 15. आरक्षण के सही क्रियान्वयन और निगरानी के लिए स्वतंत्र प्राधिकरण का गठन होगा। सूची में बदलाव केवल विधानमंडल की मंजूरी से ही संभव होगा। 16. हर विभाग में संबंधित मंत्री की अध्यक्षता में एससी-एसटी संस्थाओं के साथ वार्षिक समीक्षा बैठक होगी। 17. आंबेडकर सेनानी सम्मान: 2018 के एससी-एसटी एक्ट आंदोलन में गिरफ्तार एक लाख से अधिक दलितों पर दर्ज मुकदमे वापस लिए जाएंगे, और उन्हें “आंबेडकर सेनानी” का दर्जा, सम्मान राशि और प्रशस्ति पत्र दिया जाएगा।

सामंत के मुंशी का आधुनिक संस्करण है प्रशांत किशोर

पिछले लगभग दस-बारह सालों से विभिन्न राजनीतिक दलों के लिए राजनीतिक रणनीतिकार के तौर पर काम कर रहे थे। सुना है इस काम में इन्होंने काफी धन कमाया। बाद में इन्हें लगा क्यों ना सीधे ही राजनीति में ही हाथ आजमाए जाएं। तो इन्होंने लगे हाथ ‘जन सुराज’ नाम से एक बिहार केंद्रित पार्टी बना ली। इस के बाद इन्होंने बिहार में अपनी यात्रा शुरू की। लेकिन पता लगता है कि यात्रा को कोई खास समर्थन नहीं मिला। इस के बाद ये इधर-उधर की हांकने लगे। चूंकि भारतीय राजनीति जाति आधारित है, और ये जिस जाति से आते हैं प्रत्यक्ष रूप से उस का राजनीति में विलोपन होता जा रहा है। यही शायद इन का दुख था। इसी के चलते इन्होंने पिछले दिनों ‘न्यूज नेशन’ चैनल पर 23 सितंबर, 2025 को ‘हमार बिहार कान्क्लेव’ में दलितों की सबसे बड़ी जाति चमार को गाली के रूप में प्रयोग करते हुए ‘चोर चमार’ शब्द का इस्तेमाल किया। जो बेहद आपत्तिजनक है।

ऐसे लगता है चमारों ने इन्हें और इन की तथाकथित पार्टी को किसी तरह का कोई भाव नहीं दिया। इसीलिए ये फड़फड़ा रहे हैं और गाली-गलौच की भाषा पर उतर आए हैं। पता यह लगता है कि इन का पूरा नाम प्रशांत किशोर पांडे है और ये दलितों से खार खाए बैठे हैं। असल में यह बयान इन्होंने पूरे होशो-हवास में और सोच समझ कर दिया है, ताकि ये किसी भी तरह लाइमलाइट में बने रहें और खुद को अप्रासंगिक होने से बचा सकें। ऐसे बयान अक्सर जातिवादी-वर्णवादी द्विजों की तरफ से सुनने को मिलते हैं। कोई यह नहीं कह सकता कि ऐसा कहकर ये अपनी मानसिक भड़ास निकालते हैं, बल्कि यह दलितों के विरुद्ध इन की रणनीति का हिस्सा होता है। चूंकि अब दलित चिंतन पूरी तरह से ‘आजीवक धर्म चिंतन’ में बदल चुका है, इसलिए इनकी सारी तिकड़में और रणनीतियां तत्काल पकड़ में आ जाती हैं। प्रशांत पांडे के कथन में इन की मानसिक बुनावट का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। कहने वाला कह सकता है ‘पांडे के भांडे बिके नहीं, देखो कैसे बिलबिलाए।

वैसे, इन के कथन से ब्राह्मण की मानसिकता को समझा जा सकता है। तुलसी की संताने अभी भी सुधरने का नाम नहीं ले रहीं। वैसे बताया जा सकता है, आज जो इन्होंने चमार के साथ चोरी का समास जोड़ा है कल को ये किसी अन्य जाति के साथ भी ऐसे ही कर सकते हैं। यह ब्राह्मण की सदियों पुरानी आदत है। बताइए, लगभग छह सौ साल पहले पन्द्रहवीं शताब्दी में कबीर साहेब इन्हीं के पूर्वज पांडे को फटकार लगाते हुए कहा है, ”पांडे, कौन कुमति तोहि लागी?” और आज इक्कीसवीं सदी में भी पांडे को ही समझाना पड़ रहा है! इस का अर्थ हुआ कि ये सुधरने वालों में नहीं हैं। तो, कोई यह ना समझे कि पढ़ लिख कर इन जैसे जातिवादी मानसिकता से बाहर आ गए हैं। इसीलिए बार-बार बताया जाता है कि पढ़ने-लिखने से कोई ज्ञानवान और समझदार नहीं हो जाता।

इन के इस कथन से सामंत के मुंशी की मानसिकता को भी समझा जा सकता है। साहित्य में पहली बार इन्होंने ही ‘चोरी चमारी’ जैसे समास का प्रयोग किया है। ये भी उन्हीं का अनुकरण करते दिखाई देते हैं। जो लोग प्रेमचंद को प्रगतिवादी बताते रहते हैं, वे इन प्रशांत किशोर पांडे का चेहरा अच्छे से देख लें। ये सामंत के मुंशी का ही आधुनिक संस्करण हैं।

बताइए, दुनिया की सबसे शरीफ कौम को चोर कहा जा रहा है। ऐसे में इन की जाति को क्या कहा जाए? सर्वप्रथम तो इन की जाति असभ्य लोगों की श्रेणी में आ जाती है। किसी को यह भ्रम नहीं होना चाहिए कि तुलसीदास कोई बहुत अच्छे लेखक थे। तुलसीदास और पांडे का डीएनए समान होता है। काफी कोशिश के बाद मैं इन के लिए कोई गाली नहीं खोज पा रहा हूं। यही कह सकता हूं कि इन की और इन जैसों की मति मारी गई है। जहां तक चोरी की बात है तो कबीर साहेब ने साफ-साफ शब्दों में कहा है : “बाम्मण ही सब कीन्हीं चोरी। बाम्मण ही को लागल खोरी।।”

प्रशांत किशोर को अपने इस आपराधिक कृत्य की बिना देरी किए माफी मांगनी चाहिए। अगर किसी चमार ने कोई अप्रिय कदम उठा लिया तो कोई कुछ नहीं कर पाएगा। वैसे भी राजनीति में यह दौर जूते-चप्पल और थप्पड़ों का चल रहा है। जिस का हरगिज समर्थन नहीं किया जा सकता। लेकिन इन जैसों के कथनों का तो बिल्कुल भी समर्थन नहीं किया जा सकता। तो, जितना जल्दी हो सके ये चमार जाति से अपना माफीनामा उसी मंच पर लेकर आए जिस पर इन्होंने ये कु-बोल कहे हैं ।

असल में, इन की दुकानदारी उठ चुकी है। कोई भी राजनीतिक दल इनकी सेवाएं नहीं ले रहा है। ऐसे में ये बेरोजगार होकर सड़क पर हैं। इसका इन्होंने जो रास्ता निकाला, वह था अपनी राजनीतिक पार्टी बनाने का। उस पर भी कोई इन्हें घास नहीं डाल रहा। ऐसे में इन्होंने जो रास्ता निकाला है वह है किसी जाति को टारगेट कर अपने को प्रासंगिक बनाए रखना। इस में इन्होंने दुनिया की सबसे सभ्य और इस देश की सबसे बड़ी जाति चमार को टारगेट किया है। लेकिन, चमार इस जैसों के झांसे में आ कर प्रतिक्रियावादी बनने वाले नहीं हैं। चमार अपनी परंपरा के मूल धर्म आजीवक में आ चुके हैं। आजीवक चिंतन में इन जैसों को सभ्यता का पाठ पढ़ाया जा रहा है।

वैसे, अगर प्रशांत किशोर पांडे यह कहते कि मैं ब्राह्मण हूं चमार नहीं, तब भी बात थोड़ी समझ में आती। क्योंकि, ब्राह्मण और चमार अलग परंपरा के लोग हैं। जिन का मेल संभव नहीं है। जिसे स्वामी अछूतानंद ने हिन्दू (ब्राह्मण) और आदिहिन्दू के रूप में चिह्नित किया है। आदिहिन्दू अर्थात चमार अपनी आजीवक परंपरा में मोरलिटी पर स्थित हैं। जबकि ब्राह्मण अपनी द्विज परंपरा में जारकर्म को झेलने को अभिशप्त है। कबीर साहेब ने ब्राह्मण को यूं ही नहीं कहा, “मैं कहता सुरझावन हारी, तू राखे उरुझाय रे।”

इन्होंने ‘चोर चमार’ समास का जो आपराधिक प्रयोग किया है। इन दो शब्दों को हम ऐसे भी देख सकते हैं, चोर और चमार। चूंकि चमार चोर तो होते नहीं, ये विशुद्ध चमार होते हैं। चमार पैदा होना ‘नियति’ है। इसीलिए वे चमार होते हैं। और, नियति का अर्थ पिता की पहचान से होता है, अर्थात चमार का पिता चमार ही होता है। अब हम इस चोर चमार में से चमार को अलग कर लेते हैं। तब बचता है ‘चोर’ जो इन के के माथे पर चिपक जाता है। कोई भी कह सकता है चोर पांडे। ये कितनी कोशिश कर लें इस से बचने की लेकिन बच नहीं सकते। वैसे भी इतिहास में यह बताना मुश्किल है कि किसने यह कहा था कि मैं आपकी गालियां आप से नहीं लेता। तब वह गाली उसी देने वाले के पास ही लौट जाती है। ऐसे लगता है यह महान मक्खलि गोसाल ने ही कहा होगा। क्योंकि, गोसाल को महावीर और इन के ब्राह्मण शिष्यों ने अमोघ, मूर्ख, धूर्त और न जाने कैसी-कैसी गालियां दी हैं। जिन्हें गोसाल ने उन के पास ज्यों कि त्यों लौटा दिया। आज सामंत के मुंशी और इन पांडे जी के पास भी इन की गालियां लौट आई हैं।

इस समास का प्रयोग क्यों ना प्रशांत किशोर पांडे पर ही किया जाए। चूंकि, इनके द्वारा बोले कु-बोल में ये चमार तो हो नहीं सकते। क्योंकि जैसा बता दिया गया है, पैदा होना नियति के अधीन है। फिर, चाहे वह चमार हो या ब्राह्मण। अब बचता है चोर। तो इन के चोर होने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। क्योंकि, चोर पकड़े जाने पर दूसरों को ही चोर-चोर कह कर चिल्लाने लगता है। ऐसे लगता है इन की कोई चोरी पकड़ी गई है। और लगता है इन की यह चोरी भी किसी चमार ने ही पकड़ी है। तभी यह ऐसे बड़बड़ा रहे हैं। सामंत के मुंशी की ऐसी चोरी महान आजीवक चिंतक डॉ. धर्मवीर ने पकड़ी है। जिसका ‘प्रेमचंद की नीली आंखें’ में विस्तार से वर्णन किया गया है।

वैसे, कोई ऐसा कैसे बोल सकता है जैसा इन्होंने बोला है। असल में यह मूलभूत परंपराओं का ही अंतर है। जिसे धार्मिक अंतर भी कहा जा सकता है। दलितों की परंपरा में विवाह में ‘तलाक’ अनुमत है। तलाक की स्वतंत्रता से दलित जारकर्म से बचे रहते हैं। बताया जाए, जारकर्म ही दुनिया की सबसे बड़ी चोरी होती है। जारकर्म में उलझे व्यक्ति के सामने दुनिया की बाकी चोरियां छोटी पड़ जाती हैं। असल में, जारकर्म चोरियों की मां है। सारी चोरियां जारकर्म से ही पैदा होती हैं। चूंकि दलितों में विवाह एक सामाजिक समझौता है जिस में तलाक अनुमत है। इसीलिए वे जारकर्म से बचे रहते हैं। ऐसे में किसी तरह की ‘चोरी जारी’ का सवाल ही नहीं उठता।

दलितों अर्थात आजीवकों में जारकर्म पर तलाक की परंपरा के विपरीत द्विज या ब्राह्मणी विवाह व्यवस्था में तलाक अनुमत नहीं है। इस से होता क्या है? इस से होता यह है कि बिना तलाक के विवाह में जारकर्म पीछे-पीछे चला आता है। इन के कथित पवित्र विवाह में एक बार विवाह हो गया तो तलाक दिया ही नहीं जा सकता। तब स्त्री और पुरुष कोई भी आसानी से जारकर्म में गिर सकता है। यही इन की चर्चित जीवन शैली है, जो जारकर्म से अभिशप्त है। और, जारकर्म से बड़ी चोरी कोई होती नहीं। इसलिए बाकी सब चोरियां द्विजों अर्थात वर्णवादियों के जीवन में खुद-ब-खुद चली आती हैं। इसके उदाहरणों से यह लेख कभी खत्म नहीं हो सकता।

इन्होंने जो बोला है उस मूल कहावत पर आया जाए। मूल कहावत है ‘चोरी जारी’, इस में सीधे-सीधे जार और चोर को एक बताया गया है। जो सही भी है। इस कहावत से जार सदियों से मुंह छुपाता घूम रहा है। बाद में इसने चालाकी से इसे ‘चोरी चकारी’ में बदल दिया। लेकिन इसमें भी जार ही फंसता है। क्योंकि, जार निठल्ला होता है। वह किसी तरह का कोई काम नहीं करता। जारकर्म ही उसके लिए एकमात्र काम होता है। यहां भी जार ही पकड़ा जा रहा है। वह पिंजरे में फंसे चूहे की तरह फड़फड़ाता है। आगे चलकर सामंत के मुंशी ने इसी फड़फड़ाहट से निकलने के लिए अपनी लेखनी में इसे ‘चोरी चमारी’ कर दिया। जिस की खोल-बांध महान आजीवक चिंतक डॉ. धर्मवीर अच्छे से कर चुके हैं। तो, पांडे जी का फड़फड़ाना सभी को समझ आ रहा है।

इन्होंने जिस रणनीति के तहत ‘जन सुराज’ नामक पार्टी का गठन किया है उस का एक एजेंडा बिहार में भूमि सुधार या वितरण का है। ऐसे लगता है इन्होंने आचार्य विनोबा भावे के भू-दान आंदोलन का ठीक से अध्ययन कर लिया है। तभी इन्होंने भूमि वितरण को अपना एजेंडा बनाया है। यूं, इन से पूछा जा सकता है, कथित भू-दान आंदोलन में किन लोगों ने भूमि दान की थी? दान के रूप में वह भूमि किन्हें मिली थी? और, उस भूमि पर आज किन लोगों का कब्जा है? ये इस के आंकड़े सार्वजनिक कर दें, ताकि दलितों को इन के इस एजेंडे को ठीक से समझने में मदद मिल सके। तो, किसी को भ्रम ना रहे, इन की तथाकथित जन सुराज पार्टी भू-दान आंदोलन का ही बदला रूप है।

पूछना यह भी है, प्रशांत किशोर पांडे के इस असंसदीय कथन पर कहां हैं कुकुरमुत्तों की तरह फैले ‘दलित लेखक संघ’ और दलितों के नाम पर राजनीति करने वाले संगठन। जो ऐसे जातिवादी लोगों को इन की सही जगह नहीं दिखाते। तब ऐसे दलित लेखक संघों और राजनीतिक संगठनों से चमारों को क्या फायदा? ऐसे संगठनों से चमारों को तत्काल प्रभाव से बाहर आ जाना चाहिए। और, नेतृत्व अपने हाथ में रखते हुए इस देश और समाज को सही दिशा दिखानी चाहिए। फिर आप देखेंगे, इनके जैसे कहां विलुप्त हो गए यह पता भी नहीं चलेगा।


इस आलेख के लेखक कैलाश दहिया दलित कवि, आलोचक और कला समीक्षक हैं।

अंबेडकर यूनिवर्सिटी लखनऊ में दलितों-पिछड़ों पर हमला

लखनऊ। लखनऊ स्थित बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय में बुधवार 17 सितंबर को धार्मिक आयोजन को लेकर विवाद हो गया। बाद में यह विवाद हिंसक टकराव में बदल गया, जिसमें दलित छात्रों के साथ मारपीट की खबर है। पीड़ित छात्रों का आरोप है कि विश्वविद्यालय परिसर में उच्च पदाधिकारियों के इशारे पर बाहरी गुंडों को बुलाकर उनपर हमला कराया गया। इस दौरान अंबेडकर भवन के सामने लाठी-डंडों और धारदार हथियारों से दलित छात्रों पर हमला किया गया, जिसमें दर्जनों छात्र गंभीर रूप से घायल हो गए। इस मामले में छात्र संगठनों ने मांग की है कि- 1. घायल छात्रों के इलाज की तुरंत समुचित व्यवस्था कराई जाए और इसका पूरा खर्च विश्वविद्यालय प्रशासन वहन करे। 2. इस पूरे षड्यंत्र की निष्पक्ष न्यायिक जांच हो। 3. दोषियों पर कठोर कार्रवाई हो। इस मामले में अब तक किसी बाहरी गुंडे या दोषी अधिकारी पर कोई कार्यवाही नहीं होने से भी कई तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। साफ़ है की यह घटना विश्वविद्यालय की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती है। इस घटना को लेकर दलित दस्तक ने वीडियो रिपोर्ट की है, जिस पर तमाम जानकारियां देख सकते हैं। लिंक यह रहा-

चीफ जस्टिस गवई की ‘भगवान’ पर टिप्पणी से बवाल, जनिया पूरा मामला

“जाइए और अपने देवता से कहिए कि वे ही कुछ करें… आप विष्णु जी के कट्टर भक्त हैं, तो अब प्रार्थना कीजिए।” सुप्रीम कोर्ट में खजुराहो की भगवान विष्णु की मूर्ति से जुड़ी एक मामले की सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस बी.आर. गवई की इस टिप्पणी से बवाल मच गया है। हिन्दुओं ने धार्मिक भावना आहत होने की बात कहते हुए चीफ जस्टिस को घेरना शुरू कर दिया है।

दरअसल मध्यप्रदेश के खजुराहो के जवरी मंदिर में भगवान विष्णु की मूर्ति सालों से खंडित अवस्था में है। एक याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगाई कि इस मूर्ति को फिर से जोड़ा जाए, ताकि आस्था पूरी तरह बहाल हो सके। CJI बी.आर. गवई और जस्टिस ए.जी. मसीह की बेंच ने इसे आर्किलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया यानी ASI का मामला बताते हुए और ‘पब्लिसिटी इंटरेस्ट लिटिगेशन’ कहते हुए इस अपील को खारिज कर दिया।

कोर्ट का तर्क था कि यूनेस्को विश्व धरोहर परिसर का हिस्सा होने के कारण संरक्षित स्मारकों में “मूल संरचना जोड़कर पुनर्निर्माण” जैसी मांगें पुरातत्व क़ानून के तहत एएसआई के दायरे में आती हैं; न्यायालय सीधे ऐसे पुनर्स्थापन के आदेश नहीं देता। लेकिन इस दौरान चीफ जस्टिस बी.आर. गवई द्वारा मजाकिया लहजे में की गई टिप्पणी से बवाल मच गया है और उनके खिलाफ कुछ वकीलों ने मोर्चा खोल दिया है। चीफ जस्टिस गवई ने याचिकाकर्ता से कहा- ‘जाओ और भगवान से ही कुछ करने को कहो। आप कहते हैं कि आप भगवान विष्णु के कट्टर भक्त हैं। तो जाओ और अब प्रार्थना करो।’

CJI की इस टिप्पणी पर कई अधिवक्ताओं ने आपत्ति जताते हुए इसे भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाला बताया है और सीजेआई की टिप्पणी के विरोध में खुला पत्र लिखा है। उनका कहना है कि न्यायपालिका को आस्था-संबंधी मामलों में भाषा को लेकर संवेदनशील होना चाहिए। विरोध करने वाले वकीलों ने चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया से उनका बयान वापस लेने की मांग की है। देखना होगा कि यह मुद्दा कहां जाकर रुकता है।

जानिये मॉरीशस बनने की कहानी, दलितों का है सबसे बड़ा योगदान

मॉरीशस की तस्वीर, फोटो साभारः गूगलसाल 2021 की बात है। मॉरिशस से एक व्यक्ति अपनी जड़ों की तलाश में भारत आया। यह तलाश उसे पूर्वांचल लेकर आया। यह उसके लिए हैरान करने वाला था। तब जाकर एक रिसर्च की शुरूआत हुई। इस रिसर्च में जो सामने आया, उसने पूर्वांचल के दलितों का मॉरिशस को बनाने में योगदान की कहानी को परत-दर-परत सामने लाना शुरू कर दिया।

 इस रिसर्च को करने वाले बीएचयू के डीएन साइंटिस्ट प्रोफेसर ज्ञानेश्वर चौबे ने चार सालों के रिसर्च में अहम जानकारियां जुटाई है। रिसर्च के मुताबिक मॉरिशस में रहने वाले भारतीयों की कुल जनसंख्या के डीएनए का करीब 55% यूपी के पूर्वांचल और बिहार के भोजपुरी बोलने वाले दलित समाज से मिलता हैं। इसमें पूर्वांचल के साथ खासकर बक्सर, आरा, भभुआ, छपरा और सासाराम के दलित समाज के लोगों के डीएनए से मैच हुआ है। वर्तमान में मॉरिशस की आबादी 12 लाख है। यानी आज जिस मॉरिशस की खूबसूरती की दुनिया भर में चर्चा है, उसे बनाने में सबसे ज्यादा योगदान दलितों का है।

AI द्वारा बनाई गई प्रतीकात्मक तस्वीरमॉरीशस की खोज सन् 1502 में हुई। 1670 में यहां अफ्रीकी बसाए गए। 1810 में अंग्रेजों ने मॉरिशस पर कब्जा कर लिया। पहली बार यहां दलितों के जाने की भी अपनी कहानी है।

दलित पहली बार मॉरीशस कब गए?

  • 1834 में ब्रिटिश हुकूमत ने गुलामी समाप्त की, लेकिन उन्हें गन्ने की खेती के लिए मजदूर चाहिए थे।
  • इसके बाद भारत से गिरमिटिया मज़दूरों को ले जाया गया। ब्रिटिश एजेंट इन मजदूरों को “गिरमिट” (agreement) के नाम पर 5 साल के अनुबंध से ले जाते थे।
  • पहला जहाज़ एटलस 2 नवंबर 1834 को कलकत्ता से मॉरीशस पहुँचा।
  • इसमें मुख्यतः बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश, झारखंड और बंगाल के लोग थे। जिसमें बड़ी आबादी दलित, पिछड़े और वंचित जातियों की थी। इन क्षेत्रों से गए दलित समुदायों में मुख्यतः चमार, धोबी, डोम, पासी, मुसहर, कहार, नाई आदि जातियाँ शामिल थीं।

AI द्वारा बनाई गई प्रतीकात्मक तस्वीरमॉरीशस बनाने में दलितों की भूमिका

  • गन्ने की खेती और चीनी उद्योग मॉरीशस की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। इसे खड़ा करने का काम अधिकतर भारतीय मजदूरों ने किया, जिनमें बड़ी संख्या दलितों की थी।
  • खेत, कारखाने, सड़कें, रेलवे और बंदरगाह—इन सभी बुनियादी ढाँचों के निर्माण में दलित प्रवासी सबसे आगे रहें। हालांकि उन्हें सबसे कठिन और अपमानजनक काम सौंपा जाता था, लेकिन यही श्रम मॉरीशस की आर्थिक नींव बना।
  • मॉरीशस जाने वालों में दलित महिलाएं भी थे, जिन्होने खेतों में पुरुषों के बराबर काम किया, और घरेलू नौकरानी के रूप में भी शोषण झेला।

महान नॉवेलिस्ट विलियम ने लिखा हैं कि “यूपी और बिहार के भोजपुरी बोलने वाले ये सबसे कमजोर तबके के लोग जब जंजीरों में बंध कर गन्ने और कपास की खेती करते थे। यह काम असहनीय दर्द देने वाला था। लेकिन उन्होंने उस दर्द को सहा और मॉरीशस में खुद को जमा लिया।

रिपोर्ट बताती है कि मॉरीशस में मौजूद आबादी में जो भारतीय हैं, उसमें 55 प्रतिशत लोगों का डीएनए भोजपुरी भाषी दलित समाज से मिलता है। 35 फीसदी डीएनए द्रविड़ समाज से आने वाले लोगों का था जबकि 4 प्रतिशत डीएनए ब्राह्मण और क्षत्रिय समाज से मिलता है।

खास बात यह भी है कि यह समाज मॉरीशस में होने के बावजूद आज भी अपनी बोली और अपनी संस्कृति को नहीं भूला। भोजपुरी और छठ आज भी यहां के लोगों की रगो में बसता है। यानी जिस दलित समाज को भारतीय धर्मग्रंथ और समाज आज भी सबसे ज्यादा नाकाबिल और छोटा समझता है, उसने मॉरीशस जैसा एक देश बना डाला।