दलित से दोस्ती निभाना महिला को पड़ा भारी

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तेलंगाना की इंदिरा ऊंची जाति से ताल्लुक रखती हैं, लेकिन अब उन्हें एक दलित का समर्थन करने के लिए रेड्डी समुदाय से बहिष्कार का सामना करना पड़ रहा है. कथित अत्याचार के एक मामले में दलित का पक्ष लेना उन पर भारी पड़ रहा है. यहा मामला भारत के 71वें स्वतंत्रता दिवस पर सामाने आया है. 50 साल की समा इंदिरा तेलंगाना में राजन्ना सिरसिला ज़िले के वेमुलापदा मंडल से हैं. उन्हें एक दलित का साथ देने के मामले में धमकी मिली है. समा इंदिरा के भतीजे ने बताया, “वे हमें धमकी दे रहे हैं. वे हमें स्थाई रूप से समाज से बहिष्कार करने की धमकी दे रहे हैं. हमने एक दलित परिवार की मदद की इसलिए वे ऐसा व्यवहार कर रहे हैं. हमने अपनी ज़मीन दलित को पट्टे पर दी है इसलिए उन्हें यह बर्दाश्त नहीं हो रहा है.” इंदिरा के पास 10 एकड़ ज़मीन है और उन्होंने इनमें से दो एकड़ ज़मीन कोमापली लक्ष्मी को पट्टे पर दी है. समा इंदिरा की कोमापली लक्ष्मी बचपन की दोस्त हैं और वह दलित समुदाय से हैं. प्रशासन से शिकायत वह पिछले एक दशक से धान की खेती कर रही हैं. लेकिन समस्या तब शुरू हुई जब पड़ोस के एक भूस्वामी ने पट्टे पर दी हुई ज़मीन के बगल में ज़मीन ख़रीदी. वह शख्स रेड्डी समुदाय से है. उसने पट्टे पर ली गई ज़मीन पर खेती करने को लेकर आपत्ति जताई. उसने अपनी ज़मीन से होकर गुज़रने पर भी आपत्ति जताई. क़रीब आठ महीने पहले लक्ष्मी के खेत की पूरी फ़सल नष्ट कर दी गई थी. इंदिरा ने इस मामले की लक्ष्मी के साथ प्रशासन में शिकायत की. इसके बाद उन पर हमले हुए और उनसे कहा गया कि वो लक्ष्मी से ज़मीन वापस ले लें. इंदिरा ने बीबीसी से कहा, “मैंने ऐसा करने से इनकार कर दिया क्योंकि लक्ष्मी मेरी बचपन की दोस्त है. रेड्डी समुदाय ने मुझे सामाजिक रूप से बहिष्कार करने की घोषणा की है.” इस बहिष्कार में रेड्डी समुदाय के संगठन ने कथित तौर पर कहा है कि इंदिरा से बात करने वालों पर पांच हज़ार रुपये का जुर्माना लगेगा. कहा जा रहा है कि इंदिरा के भाई पर उनकी बेटी की शादी में शामिल होने पर 20 हज़ार रुपये का जुर्माना देने पर मजबूर किया गया. मामला दर्ज इंदिरा की दो बेटियां हैं. इंदिरा ने इस बात को स्वीकार किया कि वह सामाजिक बहिष्कार के कारण काफ़ी दुखी हैं. उन्होंने कहा कि लक्ष्मी को दो एकड़ ज़मीन देने के कारण गांव वालों ने यह क़दम उठाया है. इंदिरा ने कहा, ”हमलोग की ज़मीन पर कोई चहारदीवारी नहीं है. रेड्डी ने इस मुद्दे को लेकर लक्ष्मी को अपमानित किया है. मैं चाहती हूं कि ग्राम पंचायत इस मामले में हस्तक्षेप करे लेकिन वो तैयार नहीं हैं. हालांकि हमलोग इस मामले में शुल्क भी देने को तैयार हैं.” इस मामले में पुलिस ने अनुसूचित जाति/जनजाति प्रताड़ना क़ानून के तहत मामला दर्ज कर लिया है. इसके साथ अन्य क़ानूनों के तहत रेड्डी कम्युनिटी असोसिएशन के नौ सदस्यों के ख़िलाफ़ भी पुलिस ने मुक़दमा दर्ज किया है. इसमें असोसिएशन के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष भी शामिल हैं. रेड्डी असोसिएशन के सदस्यों का कहना है कि इंदिरा जानबूझकर दलितों को प्रोत्साहित कर रही हैं. साभारः बीबीसी हिंदी. इमरान कुरैशी की रिपोर्ट

उच्च शिक्षा के लिए बनेगा विशेष स्थायी कोष

नई दिल्ली। सरकार माध्यमिक और उच्च शिक्षा के लिए फंड की कमी को दूर करने के लिए एक नया कोष बनाने जा रही है. इस कोष की राशि की समय सीमा वित्त वर्ष के साथ समाप्त नहीं होगी और जरूरत के मुताबिक कभी भी इस्तेमाल किया जा सकेगा. इस आशय के प्रस्ताव को बुधवार को केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में मंजूरी मिल सकती है.

मानव संसाधन विकास मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक, इस कोष के लिए राशि आयकर पर लगने वाले एजुकेशन सेस से ली जाएगी. मंत्रालय शुरुआती तौर पर 3000 करोड़ रुपये का कोष तैयार करना चाहता है. इस कोष का इस्तेमाल स्कूलों और स्नातक स्तर के कालेजों में विभिन्न सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए किया जा सकेगा. मानव संसाधन विकास मंत्रालय के प्रस्ताव के मुताबिक, यह फंड नॉन लैप्सेबल होगा. यानी वित्त वर्ष की समाप्ति के बाद इसमें बची राशि को देश की समेकित निधि में वापस नहीं भेजा जाएगा. बल्कि सतत इस्तेमाल के लिए राशि उपलब्ध रहेगी. अभी तक मंत्रालय के पास ऐसी कोई व्यवस्था नहीं थी जिसके तहत उच्च शिक्षा के विकास के लिए एजुकेशन सेस से मिलने वाली राशि को बचाए रखा जा सके. इसीलिए एक नॉन लैप्सेबल फंड बनाने की जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही थी.

इस तरह के कोष के गठन का प्रस्ताव संप्रग सरकार के समय में भी बना था. उस वक्त प्रारंभिक शिक्षा कोष की तर्ज पर इसके लिए माध्यमिक व उच्च शिक्षा कोष का नाम दिया गया था. 2007 में संप्रग सरकार ने देश में उच्च शिक्षा के विकास के लिए धन एकत्र करने के उद्देश्य से एक प्रतिशत का सेस लगाया था. लेकिन तब ऐसा कोई फंड नहीं होने के चलते जितनी राशि का इस्तेमाल नहीं हो पाता था वह समेकित निधि में चली जाती थी. लेकिन केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी के बाद जब यह फंड अस्तित्व में आ जाएगा तो माध्यमिक व उच्च शिक्षा के लिए चल रही स्कीमों के लिए यहां से वित्तीय मदद मुहैया कराई जा सकेगी.

मोदी सरकार ने रिलायंस को दिया 1700 करोड़ का झटका

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नई दिल्ली। सरकार ने रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (आर.आई.एल.) और उसके भागीदारों पर बंगाल की खाड़ी की परियोजना में लक्ष्य से कम गैस का उत्पादन करने के मामले में 26.4 करोड़ डॉलर (1,700 करोड़ रुपए) का एक नया जुर्माना लगाया है. कृष्णा-गोदावरी बेसिन के फील्ड डी6 में 2015-16 के दौरान तय लक्ष्य से कम उत्पादन के मामले में यह कार्रवाई की गई है. इसके साथ ही एक अप्रैल 2010 से लेकर छह वर्ष में इस परियोजना में उत्पान लक्ष्य से पीछे रहने के कारण कंपनी पर कुल 3.02 अरब डॉलर का जुर्माना लाया जा चुका है. यह जुर्माना परियोजना की गैसतेल की बिक्री से परियोजना-लागत निकालने पर रोक के रूप में है. यह जानकारी पैट्रोलियम मंत्रालय के एक अधिकारी ने दी.

केजी-डी6 परियोजना में आर.आई.एल. के साथ ब्रिटेन की बी.पी. कंपनी और कनाडा की निको रिसोर्सेज शामिल हैं. परिेयोजना का विकास एवं परिचालन वसूलने पर पाबंदी से उत्पादन लाभ में सरकार का हिस्सा बढ़ेगा. अधिकारी ने कहा कि परियोना विकास पर लागत-वसूली की रोक के आध्यार पर सरकार ने अपने हिस्से के लाभ में अतिक्त 17.5 करोड़ डॉलर का दावा किया है. इस परियोजना के धीरूभाई अंबानी-1 और 3 गैस फील्ड में दैनिक 8 करोड़ घनफुट गैस के उत्पादन के लक्ष्य से साथ परियोजना खर्च की मंजूरी दी गई थी. पर 2011-12 में उत्पादन 3.533 करोड़ घन मीटर, 2012-13 में 2.088 करोड़ घन मीटर तथा 2013-14 में घट कर 97.7 लाख घन मीटर दैनिक रह गया. इस समय यह आर घट कर दैनिक 40 लाख घन मीटर से कम है.

केरल लव जिहाद मामले में NIA करेगा जांच: सुप्रीम कोर्ट

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दिल्ली। केरल में कथित लव जिहाद के एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार और एनआईए से जवाब तलब किया है. मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पूछा कि एक बालिग महिला ने अपनी मर्जी से धर्म परिवर्तन और शादी कर ली है, तो उसे अपने पति से अलग कैसे किया जा सकता है.

एनआईए इस बात की जांच कर रही है कि क्या महिला के तार अंतर्राष्ट्रीय आतंकी संगठन से जुड़े हैं. इसके अलावा कोर्ट ने लड़की के पिता से भी जवाब मांगा है, क्योंकि वो महिला फिलहाल अपने पिता के साथ किसी अज्ञात जगह पर रह ही है. कोर्ट ने सभी पक्षों से 16 अगस्त तक मामले की अगली सुनवाई तक जवाब दाखिल करने का आदेश दिया है. रिटायर्ड जज आरवी रवींद्रन की देखरेख में ये जांच होगी, क्योंकि घटना के पीछे चरमपंथी हाथ होने की बात कही जा रही है. इससे पहले कोर्ट ने केरल पुलिस को आदेश दिए थे कि वो इस केस से जुड़ी सभी जानकारी एनआईए को सौंप दे. इससे पहले कोर्ट ने पुलिस को मामले की सख्त जांच के लिए कहा था. बता दें कि ये मामला केरल का है, जिसमें हिंदू लड़की को बहला-फुसलाकर शादी करने का आरोप है.

केरल हाईकोर्ट इस शादी को रद्द कर चुका है, जहां इसे ‘लव जेहाद’ का मामला बताया था. वहीं, शादी रद्द किए जाने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंचे मुस्लिम पति का कहना है कि उसकी पत्नी(पूर्व) बालिग है और किसी से भी शादी करने के साथ ही किसी भी धर्म को मानने के लिए स्वतंत्र है. इस पूरे मामले में सुप्रीम कोर्ट ने एनआईए को जांच करने का आदेश दिया है. और कहा कि वो 10 दिनों के अंदर जरूरी सबूत पेश करे. सुप्रीम कोर्ट ने लड़की के पिता को भी आदेश दिया है कि वो 10 दिनों के भीतर ऐसे कागजात प्रस्तुत करे, जिसमें लड़की को बहला-फुसलाकर शादी कराई गई है.

इस मामले को केरल हाईकोर्ट ने लव जिहाद का मामला बताते हुए शादी को रद घोषित कर दिया था और महिला को उसके पिता के पास भेज दिया था. सुप्रीम कोर्ट में युवक ने अपने वकील कपिल सिब्बल और इंदिरा जयसिंह के जरिए अपील की कि उसकी पत्नी(पूर्व) बालिग है और किसी भी धर्म को मानने के साथ ही किसी भी व्यक्ति से शादी करने को स्वतंत्र है. इसके बाद दोनों वकीलों ने दलील दी कि केरल हाई कोर्ट ने शादी रद्द करने का आदेश दिया और पति को पत्नी से मुलाकात करने तक पर रोक लगा दी है. इस आदेश पर सुप्रीम कोर्ट जांच कराए. उन्होंने लड़की के बयान दर्ज कराने की भी मांग की.

पीएम मोदी के गुजरात में दलित मां-बेटे को नंगा कर पीटा

 

अहमदाबाद। 15 अगस्त को ही हमने आज़ादी की 71वीं सालगिरह मनाई लेकिन अभी तक हम जातिवाद से मुक्त नहीं हो पाए. जातिवाद से जुड़ी ऐसी ही एक घटना गुजरात में हुई है. जहां एक दलित महिला और उसके बेटे को नंगा कर बेरहमी से पीटा गया. इस मामले में 5 मुख्य आरोपी के अलावा 20 अन्य के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है.

12 अगस्त की यह घटना आणंद जिले के कासोर गांव की है. दलित जाति के मणिबेन (45) और शैलेश रोहित (21) मरे हुए जानवरों की खाल उतारने का काम करते हैं. जिसे गांव के उच्च समाज से संबंध रखने वाले दरबार समुदाय के लोग पसंद नहीं करते थे इसलिए उन्होंने खाल उतारने के काम को बंद करने कहा. लेकिन जब यह नहीं किया तो शनिवार की रात उसी समुदाय के करीब 20 आरोपियों ने पीड़ित के घर पर हमला कर शैलेश और उसकी मां को न केवल जातिसूचक गालियां दी. बल्कि दोनों के कपड़े उतार कर उनकी बेरहमी से पिटाई भी की. घटना के बाद शैलेश ने पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई गई.

संबंधित वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक करें इस मामले में पुलिस ने बताया कि गांव में करीब 25 परिवार खाल उतारने का काम करते हैं. इस मामले में मुख्य रूप से 5 आरोपी और 20 लोगों की भीड़ के सभी आरोपियों के खिलाफ आईपीसी की धारा 323, 506 (2) और एससी/एसटी एक्ट का मामला दर्ज किया गया है. ये सभी लोग स्थानीय भगवा संगठनों से जुड़े है. सभी आरोपी फरार हो गए हैं. फिलहाल पुलिस मामले की जांच कर रही है.

गौरतलब रहे कि ऊना कांड के दौरान भी मरे हुए मवेशियो का चमड़ा निकालने रहे दलित युवको की गौहत्या का आरोप लगाकर पिटाई की गई थी. इस पिटाई का वीडियो वायरल होने के बाद जमकर बवाल हुआ था, दलित संगठनों ने पूरे गुजरात में बड़े पैमाने पर आंदोलन किया था.

मंच पर ‘दलित’ MLA को नहीं मिली जगह, बोले- मैं आज भी गुलाम हूं, दे दूंगा इस्तीफा

   

भिवानी। पूरे देश की तरह भिवानी में भी आजादी के 70 साल पूरे होने पर जश्न मनाया गया. भीम स्टेडियम में आयोजित स्वतंत्रता दिवस कार्यक्रम के दौरान मंच पर जगह नहीं मिलने पर बवानीखेड़ा से भाजपा विधायक विशंभर सिंह गुस्से से तिलमिला गए और कार्यक्रम बीच में ही छोड़कर अपनी कार में जाकर बैठ गए.

तय समय पर वित्त मंत्री कैप्टन अभिमन्यु ने नेहरू पार्क में शहीद स्मारक पर शहीदों को श्रद्धांजलि दी. इसके बाद भीम स्टेडियम में राष्ट्रीय ध्वज फहराकर सलामी ली. मुख्य अतिथि कैप्टन अभिमन्यु जनता को संबोधित कर ही रहे थे कि इसी दौरान बवानीखेड़ा से भाजपा विधायक बिशंभर सिंह स्टेज पर बैठने की जगह नहीं मिलने से नाराज होकर कार्यक्रम छोड़ कर चल पड़े.

 भाजपा नेता और प्रशासनिक अधिकारियों ने उन्हें मनाने की काफी कोशिश लेकिन पहले वो नहीं माने. विधायक ने कहा कि वो अभी भी गुलाम हैं वो इस्तीफा दे देंगे लेकिन वापस कार्यक्रम में नहीं जाएंगे. करीब 10 मिनट तक सीआईडी इंस्पेक्टर आजाद ढांडा, सीटीएम महेश कुमार, तहसीलदार संजय बिश्नोई, भाजपा नेता ऋषि शर्मा के काफी समझाने के बाद विधायक को मनाया और स्टेज पर विधायक घनश्याम सर्राफ के पास बैठाया गया. विधायक विशंभर का कहना है कि उनकी अनदेखी हो रही है. आपको बता दें कि विशंभर सिंह रिजर्व सीट से भाजपा के टिकट पर चुनाव जीते हैं.

विराट से मिलने श्रीलंका पहुंची अनुष्का

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नई दिल्ली। कैंडी टेस्ट में पारी और 171 रनों के अंतर से श्रीलंका को हराकर भारतीय टीम में ऐतिहासिक कारनामा कर दिया है. भारतीय टीम ने तीन टेस्ट मैचों की सीरीज को क्लीन स्वीप किया है और यह पहली बार है जब विदेशी धरती पर भारतीय टीम ने यह कारनामा किया है. पहले बल्लेबाजों और फिर गेंदबाजों के शानदार प्रदर्शन से भारतीय टीम ने केवल तीन दिनों में यह मैच अपने नाम किया. टॉस जीतकर पहले बल्लेबाजी करने उतरी टीम इंडिया ने शिखर धवन (119), हार्दिक पांड्या (108) के शतकों और लोकेश राहुल के (85) अर्धशतक की बदौलत अपनी पहली पारी में 487 रन बनाए.

श्रीलंका का टेस्ट सीरीज में सफाया करने के बाद कप्तान विराट कोहली को लगातार बधाइयां मिल रही हैं. विराट भी इतिहास रचने के बाद काफी खुश हैं. उनकी इस खुशी में शामिल होने बॉलीवुड अभिनेत्री अनुष्का शर्मा भी श्रीलंका जा पहुंचीं. टीम इंडिया के कप्तान और अनुष्का शर्मा साथ में श्रीलंकाई सरजमीं पर है. इन दोनों की तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हुई है, जिसमें ये दोनों श्रीलंकाई फैंस के साथ दिख रहे हैं. फोटो में टीम इंडिया के हेड कोच रवि शास्त्री भी हैं.

बता दें कि पिछले कुछ समय से टीम इंडिया के कप्तान विराट कोहली और बॉलीवुड अदाकारा अनुष्का शर्मा को लेकर अफवाहों का बाजार गर्म है. इन दोनों के रिलेशनशिप को लेकर कई तरह के कयास लगाए जा रहे हैं. हाल ही में दोनों न्यूयार्क में थे. अनुष्का आईफा अवॉर्ड्स के लिए वहां गई हुई थीं तो अनुष्का से मिलने के लिए विराट भी वहां जा पहुंचे थे. चैंपियंस ट्रॉफी खत्म होने के बाद और वेस्टइंडीज दौरे से पहले विराट ने न्यूयार्क में अनुष्का के साथ क्वालिटी टाइम बिताया.

 

अगर तिरंगा फहराना ही देशभक्ति है तो संघ पंद्रह साल पहले ही देशभक्त हुआ है

15 अगस्त को मदरसों पर तिरंगा फहराने संबंधी योगीजी का हालिया आदेश सिर-आंखों पर है. उन्हें पूरी तसल्ली हो जाए इसलिए तिरंगा फहराने की वीडियो रिकॉर्डिंग कराने में भी हमें कोई ऐतराज नहीं होना चाहिए.

आखिर देशभक्ति मापने का जो पैमाना उन्होंने तैयार किया है उस पर खरा उतरना हमारा फर्ज है. लेकिन इस प्राथमिक सहमति के बाद क्या हमें योगीजी सहित सभी नवदेशभक्तों को प्रसिद्ध नागपुर केस नंबर 176 की याद दिलाने की इजाजत है? आखिर जब पैमाना बनाया ही गया है तो क्यों न हम सब उस पर खड़े होकर अपनी-अपनी देशभक्ति माप लें?

अगस्त 2013 को नागपुर की एक निचली अदालत ने वर्ष 2001 के एक मामले में दोषी तीन आरोपियों को बाइज्जत बरी कर दिया था. इन तीनों आरोपियों बाबा मेंढे, रमेश कलम्बे और दिलीप चटवानी का जुर्म तथाकथित रूप से सिर्फ इतना था कि वे 26 जनवरी 2001 को नागपुर के रेशमीबाग स्थित आरएसएस मुख्यालय में घुसकर गणतंत्र दिवस पर तिरंगा झंडा फहराने के प्रयास में शामिल थे.

राष्ट्रप्रेमी युवा दल के यह तीनों सदस्य दरअसल इस बात से क्षुब्ध थे कि स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस जैसे अवसरों पर भी आरएसएस के दफ्तरों में कभी तिरंगा नहीं फहराया जाता.

सवाल यह है कि जिस भवन पर यह युवक तिरंगा फहराना चाहते थे वो कोई मदरसा नहीं था. वो तो आरएसएस का राष्ट्रीय मुख्यालय था जिसकी देशभक्ति पर आज कोई भी सवाल खड़ा नहीं किया जा सकता. तब फिर क्या वजह थी कि संघ इस कोशिश पर इतना तिलमिला गया कि तीनों युवकों पर मुकदमा दर्ज हो गया और 12 साल तक वो लड़के संघ के निशाने पर बने रहे.

यह भी पूछना लाजमी है कि नागपुर की अदालत में यह मुकदमा दर्ज होने के बाद 2002 में आरएसएस मुख्यालय पर तिरंगा झंडा फहराने का निश्चय क्यों किया गया? क्या इसलिए कि आरएसएस यह समझ गया था कि इस मुकदमे का हवाला देकर उसकी देश के प्रति निष्ठा पर सवाल खड़े किये जायेंगे? या इसलिए कि भगवा झंडे के बजाय तिरंगे से जुड़ी जनभावनाओं का सहारा लेकर उसे अपना प्रभाव-क्षेत्र बढ़ाना आसान लगने लगा था?

क्या यह कहा जा सकता है कि अगर तिरंगा फहराना ही देशभक्ति है तो आरएसएस तो अभी जुम्मा-जुम्मा पंद्रह साल पहले ही देशभक्त हुआ है. अगर ऐसा नहीं है तो क्या 2002 के पहले तिरंगा भारतीय राष्ट्र का राष्ट्रध्वज नहीं था या फिर आरएसएस खुद अपनी आज की कसौटी पर कहें तो देशभक्त नहीं था?

जिस देश में आधुनिक संदर्भ में झंडे का इतिहास तकरीबन सौ साल पुराना हो, वहां देशभक्ति के मामले में इतनी लेट लतीफी पर यह सवाल तो बनता है.

इसके पहले ऐसा सिर्फ दो बार हुआ था. पहला 15 अगस्त 1947 को और दूसरा 1950 में तब जब सरदार पटेल ने गांधीजी की हत्या में संलिप्तता के मामले में संघ पर लगा प्रतिबंध हटाने के पहले तिरंगे को राष्ट्रध्वज मानने के लिए गोलवलकर को मजबूर किया था.

क्या किसी देशभक्त को तिरंगा फहराने के लिए या उसे अपना राष्ट्रध्वज फहराने के लिए मजबूर करना पड़ता है? जैसे आज संदेहास्पद रूप से देशद्रोही लोगों को झंडा फहराने के लिए देशभक्त सरकार मजबूर कर रही है.

अगर नहीं तो क्या वजह थी कि गोलवलकर को तिरंगे को राष्ट्रध्वज मानने के लिए सरदार पटेल को ‘मजबूर’ करना पड़ा? दरअसल यह मजबूरी ही वो गुत्थी है जिसे सुलझाने में समूचा संघ परिवार हाल-फिलहाल लगा हुआ है.

मजबूरी यह है कि आज भी इस देश में आपको अपनी राष्ट्रभक्त सिद्ध करते हुए बताना पड़ेगा कि भारतीय स्वाधीनता संघर्ष में आपने क्या और कितना बलिदान दिया?

भले ही पिछले सात दशकों से दिन-रात गांधी-नेहरू के बहाने पूरी आज़ादी की लड़ाई को बदनाम करने में कोई कोर-कसर न छोड़ी गयी हो, अभी भी आम भारतीय की जनचेतना में यह देशभक्ति की सबसे पहली कसौटी है.

भले ही पिछले कई दशकों में सरदार वल्लभभाई पटेल जैसे कद्दावर कांग्रेसी नायकों को चुराकर अपना बनाने के प्रयास किये गए हों, लोग पूछते हैं कि आपने आज़ादी की लड़ाई में कहां-कहां और कितनी बार जेल काटी?

मजबूरी यह है कि आज भी एक आम भारतीय को तिरंगा हाथ में लेकर देश के नाम पर भावुक किया जा सकता है क्योंकि तिरंगा भारत की स्वतन्त्रता और संप्रभुता का सबसे महान प्रतीक है. भारत की संविधान सभा ने 22 जुलाई 1947 को जिस तिरंगे को अंगीकार किया था वो दरअसल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के झंडे का संशोधित संस्करण था.

राष्ट्रध्वज पर प्रस्ताव को रखते हुए नेहरू जानते थे कि आरएसएस और हिंदू महासभा जैसे सांप्रदायिक दल झंडे की सांप्रदायिक व्याख्या करने का प्रयास करेंगे. इसलिए पहले की व्याख्याओं से इतर वो तिरंगे के तीनों रंगों की एक धर्मेतर व्याख्या करना चाहते थे ताकि सांप्रदायिक दल इसकी आड़ में अपना विभाजनकारी एजेंडा आगे न बढ़ा सकें.

क्योंकि तिरंगे झंडे के खिलाफ आरएसएस और हिंदू महासभा के नेता आग उगलते घूम रहे थे.

आरएसएस के दूसरे सरसंघचालक गोलवलकर ने गुरु पूर्णिमा के अवसर पर एक आम सभा को संबोधित करते हुए साफ़ कहा था कि ‘सिर्फ और सिर्फ भगवा ध्वज ही भारतीय संस्कृति को पूरी तरह प्रतिबिंबित करता है’ . ‘हमें पूरा यकीन है’, उन्होंने आगे कहा था, ‘अंततः पूरा देश भगवा ध्वज के सामने ही अपना सिर झुकाएगा.’

इसी तरह, हिंदू महासभा के नेता वीडी सावरकर ने संविधान सभा में कहा था कि ‘भारत का प्रतीक सिर्फ भगवा-गेरू रंग ही हो सकता है.’ उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा था कि अगर किसी झंडे में ‘कम से कम एक पट्टी भी भगवा नहीं होगी, हिन्दू उसे अपना झंडा नहीं मानेंगे.’

सवाल उठता है कि जब केसरिया रंग झंडे में पहले से ही मौजूद था, सावरकर और गोलवलकर आदि उस रंग की अलग व्याख्या क्यों करना चाहते थे? या अगर वो अलग व्याख्या करना चाह ही रहे थे तो उसमें गलत क्या था?

सबसे बड़ी समस्या यह थी कि हिंदू महासभा और आरएसएस उसी ढर्रे पर सोच रहे थे जिस पर चलकर मुस्लिम लीग ने मुसलमानों के नाम पर पाकिस्तान बना लिया था. उनकी देश की परिभाषा बेहद संकुचित थी जिसमें पाकिस्तान बन जाने जैसे ही खतरे छुपे हुए थे.

उनका भगवा भारत के अन्य सभी अल्पसंख्यकों के ऊपर हिंदुओं के प्रभुत्व का हामी था जिसमें ईसाई और मुसलमान सहित सभी गैर हिंदू दोयम दर्जे के नागरिक बन जाने थे.

बहरहाल, सावरकर के हिसाब से हिंदुस्थान (हिंदुस्तान नहीं, हिंदू और स्थान की संधि) का ‘आधिकारिक झंडा सिर्फ़ और सिर्फ़ कुण्डलिनी और कृपाण के साथ भगवा ध्वज ही हो सकता था.’ साथ ही उन्होंने साफ़ घोषित कर दिया कि ‘हिंदू किसी भी कीमत पर वफादारी के साथ अखिल हिंदू ध्वज यानी भगवा ध्वज के सिवा किसी और ध्वज को सलाम नहीं कर सकते.’

इसी तर्ज पर गोलवलकर ने चेताया था कि ‘यह (तिरंगा) कभी भी हिंदुओं के द्वारा न अपनाया जायेगा और न ही सम्मानित होगा’. उनके मुताबिक़ ‘तीन का शब्द तो अपने आप में ही अशुभ है और तीन रंगों का ध्वज निश्चय ही बहुत बुरा मनोवैज्ञानिक प्रभाव डालेगा और देश के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होगा’.

यही वजह है कि आरएसएस कभी भी तिरंगे को भारतीय राष्ट्र का ध्वज नहीं मानता. आज़ादी के बाद भी आरएसएस और हिंदू महासभा ने खुद को विभाजन और भगवा ध्वज को राष्ट्रध्वज न मानने की वजह से उत्सवों से दूर रखा.

जब तक आरएसएस देश की राजनीति के मुख्य विमर्श से दूर रही, तिरंगे और भारतीय स्वाधीनता संघर्ष को लेकर उसकी राय का कोई बड़ा महत्त्व न रहा. लेकिन एक बार राजनीतिक परिदृश्य पर हावी होते ही उसने देश का रुख समझ न सिर्फ तिरंगा बल्कि स्वाधीनता संघर्ष को लेकर अपनी आपत्तियों को भी कालीन के नीचे सरका देने में भलाई समझी.

इसीलिए यह नवदेशभक्त हर जगह तिरंगे को उसके विचार, भावना और प्रतीकात्मक महत्त्व से ज्यादा उसकी लंबाई-चौड़ाई और ऊंचाई पर ध्यान देते हैं. वो लोगों को इतनी बार तिरंगा दिखा देना चाहते हैं कि लोगों को यकीन हो जाए कि वो ही इस देश में इकलौते देशभक्त हैं. यह उनके भीतर का भय और आत्मविश्वासहीनता है जो उन्हें हद से ज्यादा दिखावटी बनाती है.

अब चूंकि तिरंगे को लेकर खुद आरएसएस का इतिहास भी कोई साफ-सुथरा नहीं है, इसलिए उसे और उसके द्वारा नियंत्रित सरकारों को भी आत्मसुधार का प्रयास करना चाहिए.

अगर आपके पास इस बात के पुख्ता सबूत है कि कुछ मदरसे तिरंगे को अपना राष्ट्रध्वज नहीं मानते तो आपका फर्ज है कि आप उनको ऐसा करने के लिए मजबूर करें. लेकिन साथ ही यह प्रार्थना भी है कि तिरंगा फहराने और उसकी वीडियो रिकॉर्डिंग करने का आदेश आरएसएस के दफ्तरों को भी दिया जाए तो ही देशभक्ति की भावना के साथ पूरा न्याय होगा.

यह लेख सौरभ बाजपेयी का है. (लेखक राष्ट्रीय आंदोलन फ्रंट के संयोजक हैं)

साभारः द वायर

गोरखपुर हादसे पर संघचालक ने लगाई योगी को फटकार

गोरखपुर। गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में मासूमों की मौत का मामला योगी सरकार का पीछा नहीं छोड़ रहा है. विपक्षी दलों और आम लोगों के गुस्से की शिकार योगी सरकार पर अब संघ ने भी सवाल उठाया है. अवध प्रांत के संघचालक प्रभु नारायण ने इस मामले पर योगी सरकार को लगातार लगाई है. असल में सरकार की सफाई व आंकड़े राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को रास नहीं आ रही है.

गोरखपुर में मासूमों की मौत के मामले में योगी सरकार के रवैये से भड़के संघ चालक प्रभु नारायण ने योगी को सरकार को कठघरे में खड़ा करते हुए कहा – “ गोरखपुर की दर्दनाक घटना से पूरा देश स्तब्ध है. इस घटना के बाद सीएम, स्वास्थ्य मंत्री व चिकित्सा शिक्षा मंत्री ने जो विचार व्यक्त किया, उससे मैं दुखी हूं. दोषी कोई भी हो, सरकार नैतिक जिम्मेदारी से नहीं बच सकती. जो सफाई व आंकड़े दिए गए, वह उचित प्रतीत नहीं होता. चाहे दोषी कोई भी हो, सरकार इस हादसे की नैतिक जिम्मेदारी से नहीं बच सकती है. इसके लिए पूरे मंत्रिमंडल सहित भाजपा संगठन को प्रायश्चित करना चाहिए. जब राजनेता विरोध दिवस, शौर्य दिवस मनाते हैं तो इस संवेदनशील मुद्दे पर प्रयश्चित क्यों नहीं करते?”

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संघ चालक ने यह विचार अपने फेसबुक पोस्ट पर लिखा है. संघ से जुड़े इस बड़े पदाधिकारी की इस टिप्पणी के बाद संगठन में भी योगी सरकार की खूब किरकिरी हो रही है. पार्टी और संगठन के भीतर इस बात की चर्चा तेज है कि योगी सरकार ने इस मुद्दे पर जिस तरह संवेदनहीनता दिखाई उससे गलत संदेश गया है. खास तौर पर मुख्यमंत्री के अपने क्षेत्र में ऐसा होने से भी सवाल उठ रहे हैं.

शरद खेमे पर हमलावर हुए नीतीश, दो दर्जन नेताओं को निकाला

पटना। जनता दल यू में शरद और नीतीश खेमे के बीच हमले तेज हो गए हैं. बात यहां तक पहुंच गई है कि दोनों गुट एक-दूसरे से जुड़े नेताओं को नुकसान पहुंचाने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे हैं. शरद यादव के तीन दिवसीय बिहार दौरे के दौरान उनके साथ रहे तकरीबन दो दर्जन नेताओं को जदयू से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है. खास बात यह है कि इस सूची में पार्टी के तमाम बड़े और पुराने नेता शामिल हैं.

नीतीश कुमार के इशारे पर 14 अगस्त को लिए एक बड़े फैसले में बिहार प्रदेश अध्यक्ष वशिष्ठ नारायण सिंह ने शरद यादव खेमे के माने जानेवाले 21 नेताओं को पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से निलंबित कर दिया. इसमें पार्टी के बड़े दलित चेहरे और पूर्व मंत्री रमई राम और पूर्व सांसद अर्जुन राय जैसे बड़े नेताओं का नाम भी शामिल है. इन नेताओं पर यह आरोप है कि शरद यादव की तीन दिवसीय बिहार यात्रा के दौरान ये नेता शरद यादव के साथ थे. जबकि बिहार इकाइ के इन नेताओं का आरोप है कि नीतीश कुमार बिना सभी से सलाह लिए तमाम निर्णय खुद लेते हैं. संबंधित वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक करें असल में जब से नीतीश कुमार ने बीजेपी के साथ गठबंधन की सरकार बनाई. जदयू के कई नेता उनके खिलाफ हो गए हैं. शरद यादव का दावा है कि कई राज्य इकाइयां उनके साथ हैं जबकि पार्टी अध्यक्ष नीतीश कुमार को केवल बिहार इकाई का समर्थन हासिल है. हालांकि नीतीश कुमार की इस कार्रवाई से यह साफ हो गया है कि बिहार ईकाई के भी कई नेता शरद यादव के साथ हैं. इससे बिहार में नीतीश कुमार की मुश्किल बढ़ गई है. जिन नेताओं को निकाला गया है, उनका नाम यूं है- (1) रमई राम – पूर्व मंत्री (2) अर्जुन राय- पूर्व सांसद, सीतामढ़ी (3) राजकिशोर सिन्हा – पूर्व विधायक, वैशाली (4) विजय वर्मा – पूर्व स.वि.प. मधेपुरा (5) धनिकलाल मुखिया – जिलाध्यक्ष, सहरसा (6) सियाराम यादव – पूर्व जिलाध्यक्ष, मधेपुरा (राज्य परिषद सदस्य) (7) विन्देश्वरी सिंह – पूर्व प्रदेश अध्यक्ष, जद (यू) श्रमिक प्रकोष्ठ (8) इसराईल मंसूरी – राज्य परिषद सदस्य, मुजफ्फरपुर (9) मिथलेश कुशवाहा – जिलाध्यक्ष, तकनीकी प्रकोष्ठ (10) निरंजन राय – राज्य परिषद सदस्य, गायघाट, मुजफ्फरपुर (11) देवकांत राय – दरभंगा (12) टिन्कु कसेरा – मधुबनी (13) जयकुमार सिंह- सोनबरसा (14) धीरेन्द्र यादव – कहरा (15) उदयचन्द्र साहा (16) विरेन्द्र आजाद- बिहारी गंज (17) सुरेश यादव – सतर कटैया (18) विजेन्द्र यादव – सौर बाजार (19) रमण सिंह – मधेपुरा (20) कमल दास – मधेपुरा (21) देवेन्द्र साह – सीतामढ़ी

मोदी की राह में रोड़ा बनीं ममता बनर्जी

नई दिल्ली। स्वतंत्रता दिवस को लेकर 15 अगस्त से पहले केंद्र की मोदी सरकार ने सभी राज्यों से एक अपील की. प्रधानमंत्री मोदी के न्यू इंडिया (नया भारत) की सोच

को लेकर स्कूलों में कार्यक्रम आयोजित करने को कहा था. तमाम राज्यों ने इसे माना भी, लेकिन इस फैसले को लेकर मोदी की राह में पश्चिम बंगाल की

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी आ खड़ी हुईं. बनर्जी के पश्चिम बंगाल में स्कूलों को केंद्र के इस सर्कुलर को मानने पर रोक लगा दी गई है.

ममता के इंकार के बाद असहज हुए केंद्र सरकार ने अपना विरोध दर्ज कराया, लेकिन ममता बनर्जी मोदी के खिलाफ खड़ी रहीं. केंद्रीय एचआरडी मिनिस्टर

प्रकाश जावडेकर ने ममता बनर्जी की अगुआई वाली तृणमूल सरकार के इस फैसले को दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया है. असहज हुए जावडेकर ने कहा कि यह

सेक्यूलर एजेंडे का हिस्सा है, राजनीतिक पार्टी का एजेंडा नहीं. हालांकि ममता बनर्जी ने आरोप लगाया है कि ऐसे सर्कुलर जारी कर केंद्र सरकार अपने एजेंडे को राज्यों पर थोप रही है, जिसे वह कत्तई नहीं मानेंगी.

धर्म ने विज्ञान को आगे बढ़ाने वालों की हत्या कर दी?

कल ट्रेन में सफर के दौरान चार युवा इंजीनियर्स से बात करने का मौका मिला. चारों एक दूसरे से परिचित होते हुए अपनी पढ़ाई, कमाई, अनुभव, कम्पनी आदि का बखान कर रहे थे. जाहिर हुआ कि चारों देश की सबसे अच्छी सॉफ्टवेयर कम्पनियों में कार्यरत हैं, दो पुणे में एकसाथ है दूसरे दो मुंबई एकसाथ काम करते हैं. अगली कुछ छुट्टियों में चारों दिल्ली की तरफ जा रहे थे.

बातचीत करते हुए हमने साथ मे चाय ली, उन्होंने उत्सुकता से मुझसे पूछा कि आप क्या करते हैं? मैंने उत्तर दिया कि मैं सोशल रिसर्च का काम करता हूँ. वे अधिक अंदाजा नहीं लगा सके और पूछने लगे कि इसमें क्या काम होता है और इसको करने से क्या फायदा होता है?

उनकी दुविधा समझते हुए मैंने प्रतिप्रश्न किया कि आप बताएं कि कम्प्यूटर साइंस में क्या काम होता है और उससे क्या फायदा होता है? उन्होंने बताया कि कम्प्यूटर साइंस सब तरह के यांत्रिकरण, ऑटोमेशन और गणनाओं का आधारभूत टूल बन गया है, हर विषय मे हर काम में हर तरह की खोज में कम्प्यूटर की भूमिका बढ़ गयी है.

मैंने पूछा कि कम्प्यूटर साइंस की जानकारी से आप क्या क्या समझ या समझा सकते हैं? वे बोले कि हम बता सकते हैं कि किस तरह के काम के लिए कैसा सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर लगेगा, कैसे काम किया जा सकता है. अधिक एफिशियंसी के लिए किस नई तकनीक का कैसे उपयोग हो सकता है इत्यादि.

मैने उन्हीं के उत्तर को आधार बनाते हुए कहा कि ठीक इसी तरह समाज विज्ञान है उससे हम बता सकते हैं कि कोई समाज सभ्यता, विज्ञान और तकनीक पैदा कर सकेगा या नहीं, या कि कोई समाज आने वाले समय मे सभ्य और अमीर होगा या और अधिक बर्बर या गरीब होता जाएगा?

मैंने एक उदाहरण देते हुए बात रखी कि एक तरह से ये माना जा सकता है सोशल साइंस किसी देश मे समाज की वास्तविकता, उसकी समस्याओं, संभावित समाधानों और बदलाव के तरीकों की रिसर्च करता है. जैसे आपके कम्प्यूटर साइंस का अपना विस्तार है वैसे ही समाज विज्ञान भी है. वे समाज विज्ञान शब्द सुनकर चौंके, उन्हें समझने में दिक्कत हो रही थी कि समाज का अध्ययन विज्ञान कैसे हो सकता है? सामाजिक नियम, भोजन, रहन सहन, सामाजिक संरचना, परम्परा, जाति, वर्ण, धर्म आदि का अध्ययन विज्ञान कैसे हो सकता है?

विज्ञान शब्द को तकनीक के अर्थ में समझने की उनकी ट्रेनिंग के कारण वे सामाजिक “विज्ञान” को समझ नहीं पा रहे थे. इसीलिये उन्हें यह भी अजीब लग रहा था कि इस “विज्ञान” पर पढ़े-लिखे से नजर आने वाले ये सज्जन क्या काम करते होंगे?

उन्होंने सीधे से पूछ लिया कि कोई उदाहरण देकर समझाएं कि इस तरह की रिसर्च में होता क्या है? मैंने उन्हें उन्ही के विषय मे समझाने की कोशिश करते हुए कहा कि समाज विज्ञान आपको यह बताता है कि किस तरह का समाज सभ्य, वैज्ञानिक और विकसित होगा और किस तरह का समाज असभ्य, गरीब और अवैज्ञानिक होता जाएगा. जैसी मैंने उम्मीद की थी वे गरीबी, सभ्यता, संस्कृति आदि की बजाय विज्ञान में रुचि लेने लगे और पूंछने लगे कि समाज विज्ञान किसी देश के भौतिक विज्ञान और तकनीक के विकास पर क्या जानकारी देगा? या भविष्यवाणी कर सकता है?

ये विषय उनके पसन्द का था सो वे उत्सुकता से सुनने लगे. मैंने कहा कि सभी समाज विज्ञान और तकनीक को पैदा नहीं कर सकते, कुछ समाज दूसरों से बेहतर विज्ञान और सभ्यता की समझ रखते हैं इसलिए वे सारा विज्ञान और तकनीक पैदा करते हैं और शेष अविकसित असभ्य और पिछड़े समाजों को तकनीक और विज्ञान बेचते हैं. इसपर वे पूछने लगे कि कौनसे समाज विकसित और वैज्ञानिक हैं और कौन से पिछड़े हैं?

मैंने उदाहरण दिया कि बहुत मोटे तौर पर यूरोपीय, अमरीकन समाज जो कि आस्तिकता और धर्म की गुलामी से आजाद हो रहे हैं, उनको तुलनात्मक रूप से विकसित और वैज्ञानिक रुझान का माना जा सकता है और अरब, अफ्रीका, एशिया के वे सभी समाज जो किसी काल्पनिक ईश्वर और स्वर्ग नरक को मानते हैं उन्हें पिछड़ा हुआ माना जा सकता है.

ये सुनते ही उन्हें धक्का लगा, वे कहने लगे कि वैसे तो भारत में हमारा समाज भी आस्तिक है, धार्मिक है, ईश्वर और स्वर्ग नरक को मानता है तो क्या भारत पिछड़ा और असभ्य है? मैंने कहा कि इस बात को दूसरे ढंग से समझने की कोशिश करते हैं, क्या आपको लगता है कि सभ्यता, विज्ञान, संपन्नता और तरक्की का आपस में सीधा संबंध है?

थोड़े विचार के बाद वे मानने को राजी हो गए कि सभ्य समाज ही अपने परिश्रम और साहस से वैज्ञानिक और अमीर हो सकता है. असभ्य समाज अंधविश्वासी गरीब और पिछड़े रहने को बाध्य हैं. इस सभ्यता का सीधा संबंध लोकतंत्र और सुशासन और विकास से कैसे जुड़ता है इसे वे थोड़ा-थोड़ा देख पा रहे थे लेकिन धर्म और आस्तिकता से इसका संबंध बिल्कुल नहीं जोड़ पा रहे थे.

मैंने पूछा कि जिन व्यक्तियों ने विज्ञान में मौलिक खोजे की हैं उनमें से अधिकतर लोग किस रुझान के थे? क्या वे ईश्वर स्वर्ग नरक, देवी देवता, आत्मा, पुनर्जन्म और इनसे जुड़े किसी तरह के कर्मकांड में भरोसा रखते थे या नास्तिक थे? उन्होंने कहा कि ज्यादातर लोग नास्तिक ही थे, लेकिन इसका ये मतलब नहीं कि वैज्ञानिक होने में ईश्वर आत्मा या कर्मकांड से कोई रुकावट पैदा होती है. वे सभी इस बात का दावा कर रहे थे कि धार्मिक, पूजा पाठी और श्राद्ध तर्पण आदि करते हुए भी वैज्ञानिक हुआ जा सकता है.

मैंने कहा अगर ऐसा है तो फिंर आप ऐसे श्राद्ध तर्पण कर्मकांड करने वाले चार पांच वैज्ञानिकों और उनकी मौलिक खोजों के नाम बताइये. एक ने उदाहरण दिया कि रामानुजन हुए हैं जिन्होंने गणित में नई खोजें कीं. वे शाकाहारी, मन्त्रपाठी और कर्मकांडी ब्राह्मण थे. रामानुजन के अलावा वे किसी और का नाम न बता सके.

मैंने पूछा कि इस कर्मकांड, शाकाहार और धर्म ने रामानुजन को मदद की या इसी ने उनकी जान ले ली? वे चौंके, बोले इस धर्म ने उनकी जान कैसे ली? क्या मतलब है आपका? मैंने कहा कि रामानुजन छुआछूत मानते थे वे ईसाई मांसाहारी रसोइए के हाथ का खाना नहीं लेते थे, सर्द मौसम में भी शराब या ब्रांडी नहीं पीते थे, सिर्फ अपने हाथ का पका दाल चावल खाते थे और पवित्रता की सनक ऐसी थी कि लंदन की सर्दी में भी दिन में कई कई बार नहाकर पूजा पाठ करते थे. कुपोषण और निमोनिया से उनकी मौत हो गयी. अब बताइये धर्म ने उन्हें फायदा किया या नुकसान किया? क्या धर्म और पूजा अर्चना ने उन्हें विज्ञान को आगे बढ़ाने योग्य बनाया या उनकी हत्या कर दी? उनकी तरह रोज कर्मकांड करने वाले कितने लोग गणितज्ञ बने?

इस सवाल पे वे एकदूसरे का मुंह ताकने लगे. लेकिन फिर भी वे स्वीकार नहीं कर रहे थे कि धर्म और विज्ञान में विरोध का संबंध हैं. उनमें से एक युवक जिसके हाथ मे ढेर सारी अंगूठियां थी और लाल-पीले धागे बंधे थे. वो बोला कि धार्मिक और पूजापाठी लोगों ने भी साइंस और तकनीक बनाई है. हमारे ऋषि मुनि अपनी तकनीक के बल पर एक से दूसरे स्थान पर पहुंच जाते थे. उनके पास भी एटॉमिक टेक्नोलॉजी थी. वे पशु पक्षियों से भी बात कर पाते थे.

इस पर उस युवक का मित्र बोला कि उसने भी महाभारत में पढ़ा है कि मंत्र की शक्ति से लोग हवा में भी उड़ सकते थे. फिर वे चारों बताने लगे कि साउंड वेव्स बहुत ताकतवर होती हैं शायद प्राचीन काल मे हमारे ऋषि मुनियों के पास कोई टेक्नोलॉजी थी जिसके जरिये वे एक जगह से दूसरी जगह पहुंच जाते थे, मंत्र के जरिये ब्रह्मास्त्र जैसे एटॉमिक मिसाइल जैसा कोई बम छोड़ सकते थे.

अब चौंकने की बारी मेरी थी. अब तक जो युवक (इनमे से दो IIT से पढ़े हुए हैं) क्लाउड टेक्नोलॉजी, नैनो टेक्नोलॉजी और क्वान्टम कम्प्यूटर की बात कर रहे थे वे एकदम से तंत्र-मंत्र और महाभारत कालीन एटॉमिक मिसाइल तक पहुंच गए.

मैंने कहा चलो मान लिया कि महाभारत के समय में क्वांटम टेलीपोर्टेशन और एटॉमिक टेक्नोलॉजी थी. अब ये बताइये कि ऐसी टेक्नॉलोजी उन्होंने किस तरह के मकानों प्रयोगशालाओं या विश्वविद्यालयो में बैठकर बनाई होगी? किस तरह की धातु या प्लास्टिक आदि का इस्तेमाल किया होगा? इतनी उन्नत टेक्नोलॉजी को बनाने या चलाने के लिए उन्नत धातुविज्ञान, रसायन, कम्युनिकेशन, ट्रांस्पोर्टेशन, सड़कें, कार, ट्रेन मोटर वाहन आदि चाहिए या नहीं? लेकिन आपके ऋषि मुनि तो लकड़ी की खड़ाऊ पहनकर बिना सिले कपडे लपेटकर पैदल या बैलगाड़ी या घोड़े के रथ पर यात्रा कर रहे हैं? तीर कमान, गदा, तलवार फरसा आदि लेकर घूम रहे हैं. कागज या लैपटॉप की बजाय केले के या ताड़ के पत्तों पर लिख रहे हैं. ये कैसे संभव है?

अब उनके जवाब सच मे चकरानेवाले थे. एक युवक बोला कि हो सकता है कि उन्होंने अपने ज्ञान से ये समझ लिया हो कि ट्रांसपोर्ट, मोटर कार मशीनें आदि पर्यावरण के लिए खतरनाक है इसलिए वे “ईको फ्रेंडली” तरीके से जीते रहे हों. इसीलिए शायद उन्होंने बायो-डिग्रेडेबल मकान, यूनिवर्सिटी, रथ, सड़कें, कपड़े, बर्तन, आदि बनाये हो जिनके सबूत आजकल की खुदाई या पुरातत्व को नहीं मिलते. हो सकता है कि वे सादा जीवन उच्च विचार वाले लोग हों और ज्यादा सुविधापूर्ण मकान, यंत्र आदि न बनाये हो, वे सिर्फ कंद मूल खाते रहे हों, एनर्जी और पर्यावरण को बचाते रहे होंगे.

मैंने उनकी आंखों में झांकते हुए पूछा कि क्या आपको हकीकत में ये लगता है कि ऋषि मुनियों के पास ऐसी टेक्नोलॉजी रही होगी जिसका आज कोई सबूत कोई निशान तक नही है? वे चारों पूरे आत्मविश्वास से बोले कि ये एकदम संभव है उन्होंने कुछ डॉक्यूमेंट्रीज के नाम गिनाए जिसने पिरामिड की टेक्नॉलिजी, माया सभ्यता, द्वारिका, सुमेरियन सभ्यता जैसी प्राचीन विकसित सभ्यताओ और उनकी तकनीकी उन्नति की बात की गई थी.

मैंने अंत मे पूछा कि चलो मान लेते हैं कि ये सब तकनीक और साइंस ऋषि मुनियों के पास था, तो आज उनके वंशज विज्ञान तकनीक के मामले में यूरोप-अमेरिका का मुंह क्यों ताकते हैं? इसका जवाब और भयानक दिया उन्होने. वे बोले कि हम लोग अपने पुराने साइंस को भाषा को इतिहास को भूल चुके हैं, बीच के समय में मुसलमानों, अंग्रेजों ने हमारे ज्ञान-विज्ञान को नष्ट कर दिया. इसीलिए न हमारा विज्ञान बचा न तकनीक के कोई सबूत. इसीलिए हम दूसरों पर निर्भर हैं.

इस चर्चा के बाद मैं सोचता रहा कि ये उच्च शिक्षित मोटी तनख्वाह वाले शहरी युवा हैं या कि गांव के किसी मंदिर के सामने बैठे तोते वाले ज्योतिषी और पंडित हैं? मैं बार बार उनकी शक्लें और उनके महंगे मोबाइल और कपड़े जूते आदि देखता रहा. ऐसा लग रहा था जैसे कि चार पाषाण कालीन जीवाश्मों से बात कर रहा हूं. फिर बार-बार यही ख्याल आता रहा कि ये युवक या इनके जैसे युवक भारत मे कोई साइंस या तकनीक पैदा कर सकते हैं?

‘सरकार के मुताबिक मेरे दादा आदिवासी पर मैं नहीं’

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छत्तीसगढ़ के कबीरधाम में अपने युवा साथियों के साथ आदिवासियों की बैगा बोली में गीत गाने वाले शिवराम बैगा की पीड़ा है कि उनके नाते-रिश्ते और गांव के लोग तो मानते हैं कि वो आदिवासी हैं लेकिन सरकार ऐसा नहीं मानती. सरकारी दस्तावेज़ में उनके दादा के नाम के साथ बैगा के बजाए बइगा लिख दिया गया है और उसके बाद हुई जनगणना में उन्हें बैगा आदिवासी समुदाय से बाहर कर दिया गया.

पिछले कई सालों से शिव और उनका परिवार आदिवासियों को मिलने वाली आरक्षण समेत तमाम सुविधाओं से वंचित है.

शिवराम बैगा अकेले नहीं हैं जिनके साथ ऐसा हुआ है. छत्तीसगढ़ में ऐसे लाखों लोग हैं जिनकी जाति संबधी दस्तावेज़ों में मात्रा, वर्ण, शब्द और भाषा की गड़बड़ियों ने उन्हें आदिवासी समुदाय से बाहर कर दिया है.

ज़ाहिर है, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक रुप से आदिवासी होने के बाद भी उन्हें सरकार आदिवासी नहीं मानती. जांजगीर-चांपा ज़िले के कमली सराईपाली गांव के रहने वाले कीर्तन लाल सिदार कहते हैं- “मेरे बड़े पिताजी और उनके बेटे को तो सरकार आदिवासी मानती है लेकिन मुझे और मेरे परिवार के दूसरे सदस्यों को आज भी ग़ैर-आदिवासी माना जाता है.”

छत्तीसगढ़ में कुल 42 आदिवासी जातियां हैं. लेकिन विभिन्न आदिवासी समुदाय से जुड़े राज्य सरकार के 27 प्रस्ताव पिछले कई सालों से केंद्र सरकार के अलग-अलग कार्यालयों में धूल खाते पड़े हैं. इस सूची को दुरुस्त करने का काम केंद्र सरकार के हिस्से होता है. लेकिन आदिवासियों से जुड़ी सरकारी फाइलों की रफ़्तार बेहद धीमी है. इसमें से अधिकांश प्रस्ताव उन मुद्दों से संबंधित हैं, जहां अंग्रेज़ी, हिंदी और छत्तीसगढ़ी में अनुवाद की गड़बड़ियों के कारण जातियों का अलग-अलग विभाजन हो गया.

राज्य की 42 आदिवासी जातियों की सरकारी सूची से जिनकी जाति के नाम में एक मात्रा की भी गड़बड़ी हुई, उन्हें सरकार ने आदिवासी समुदाय से अलग कर दिया. उदाहरण के लिये सवर और सवारा को तो सरकार आदिवासी मानती है लेकिन अंग्रेज़ी से हिंदी अनुवाद की गड़बड़ी के कारण हज़ारों लोगों के दस्तावेज़ में सौंरा, साओंरा, सौरा, सहरा, साओरा और सौरा दर्ज़ हो गया. ऐसी गड़बड़ियां ब्रिटिश शासनकाल में भी हुईं और आज़ादी के बाद भी.

रायपुर के अजय कुमार नागवंशी कहते हैं-“मेरे दस्तावेज़ में नागवंशी के बजाए नागबंसी लिखा हुआ है. इसी तरह हज़ारों-लाखों लोग हैं, जिनके प्रमाण पत्रों में नगवंसी, नगवन्सी, नागबंसि, नगबंसी, नगवासी, नागबसि, नगबसी लिखा हुआ है. हमारी पुरखों को तो आदिवासी माना गया, हमारे रीति रिवाज़, खान-पान और शादी ब्याह भी आदिवासी समुदाय में होता है. लेकिन सरकार हमें आदिवासी नहीं मानती.” इस तरह की मात्रात्मक गड़बड़ियों के कई मामले राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के पास लंबित हैं. आयोग के अध्यक्ष नंद कुमार साय भी मानते हैं कि इन गड़बड़ियों को बहुत पहले ही सुधार लिया जाना चाहिए था.

साय कहते हैं, “अनुस्वार, मात्रा और भाषा की छोटी-छोटी ग़लतियों की बड़ी सज़ा लाखों लोगों को मिल रही है. इसमें तुरंत बदलाव होना चाहिए. हालांकि यह हमारे क्षेत्राधिकार का मामला नहीं है, तब भी हम इसमें हस्तक्षेप करेंगे और इसे दुरुस्त करने का काम करेंगे.” ‘जल, जंगल और ज़मीन’ की लड़ाई में पिछले कई सालों से सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता गौतम बंदोपाध्याय का कहना है कि जातिगत नाम में वर्ण और मात्राओं की भाषायी गड़बड़ियों के कारण ग़ैर-आदिवासी ठहरा दिये गये समुदायों को सरकार आदिवासी होने की मान्यता देने के बजाए उनमें से कई को पिछड़े वर्ग में शामिल कर रही है.

गौतम बंदोपाध्याय का दावा है कि पूरे देश में ऐसी परिस्थितियां हैं. गौतम कहते हैं, “2011 की जनगणना में बोलियों के आधार पर 1084 ऐसी जातियों की पहचान हुई थी, जो आदिवासी समुदाय के थे. ऐसी 705 जनजातियों को तो सरकार से मान्यता मिली. लेकिन 379 जनजातियां इससे बाहर ही रहीं.” वो कहते हैं, “संकट ये है कि आदिवासी समाज की सांस्कृतिक अस्मिता और उनके डीएनए को किनारे कर के सरकारों ने कई को तो पिछड़े वर्ग में शामिल कर दिया. यह और भी भयावह है.” अनुस्वार, वर्ण, शब्द और भाषा की शुद्धता ज़रुरी है इस बात को आदिवासी समाज से बाहर कर दिए गये लोगों से बेहतर कोई नहीं समझ सकता. लेकिन उनकी तक़लीफ को सरकार समझे तब कहीं बात आगे बढ़े.

साभारः बीबीसी हिंदी, यह रिपोर्ट आलोक प्रकाश पुतुल की है.

आजादी के संघर्ष के बहुजन नायक

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तमाम मामलों में एक सोची-समझी साजिश के तहत बहुजनों के इतिहास को या तो नजर अंदाज कर दिया गया या फिर उसे मिटाने की कोशिश की गई. आजादी के आंदोलन में भी यही हुआ. लेखनी पर जिनका एकाधिकार रहा उन्होंने मनचाहे तरीके से इतिहास को दर्ज किया. लेकिन अब इतिहास की परतों में से तमाम बहुजन नायक बाहर आने लगे हैं. देश की आजादी की लड़ाई के दौरान तमाम बहुजन नायक ऐसे रहें जो अंग्रेजों के सामने चट्टान की तरह खड़े रहे. दलित दस्तक ऐसे दर्जन भर नायकों को सामने लेकर आया है।

वैसे तो देश की आजादी का पहला स्वतंत्रता संग्राम 1857 का माना जाता है लेकिन अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह का बिगुल 1780-84 में ही बिहार के संथाल परगना में तिलका मांझी की अगुवाई में शुरू हो गया था. तिलका मांझी युद्ध कला में निपुण और एक अच्छे निशानेबाज थे. इस वीर सपूत ने ताड़ के पेड़ पर चढ़कर तीर से कई अंग्रेजों को मौत के घाट उतार दिया था. इसके बाद महाराष्ट्र, बंगाल और उड़ीसा प्रांत में दलित-आदिवासियों ने अंग्रेजों के खिलाफ बगावत शुरू कर दी. इस विद्रोह में अंग्रेजों से कड़ा संघर्ष हुआ जिसमें अंग्रेजों को मुंह की खानी पड़ी. सिद्धु संथाल और गोची मांझी के साहस और वीरता से भी अंग्रेज कांपते थे. बाद में अंग्रेजों ने इन वीर सेनानियों को पकड़कर फांसी पर चढ़ा दिया.

इसके बाद अंग्रेजों के विरुद्ध क्रांति का बिगुल 1804 में बजा. छतारी के नवाब नाहर खां अंग्रेजी शासन के कट्टर विरोधी थे. 1804 और 1807 में उनके बेटों ने अंग्रेजों से घमासान युद्ध किया. इस युद्ध में जिस व्यक्ति ने उनका भरपूर साथ दिया वह उनका परम मित्र उदईया था, जिसने अकेले ही सैकड़ों अंग्रेजों को मौत के घाट उतारा. बाद में उदईया पकड़ा गया और उसे फांसी दे दी गई. उदईया की गौरव गाथा आज भी क्षेत्र के लोगों में प्रचलित हैं.

चेतराम जाटव और बल्लू मेहतर 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में शहीद होने वाले दो प्रमुख नाम चेतराम जाटव और बल्लू मेहतर के भी थे। उन्होंने आजादी के लिए न केवल फिरंगियों से टक्कर ली बल्कि देश की आन-बान और शान के लिए कुर्बान हो गए. क्रांति का बिगुल बजते ही देश भक्त चेतराम जाटव और बल्लू मेहतर भी 26 मई 1857 को सोरों (एटा) की क्रांति की ज्वाला में कूद पड़े. वे इस क्रांति की अगली कतार में खड़े रहे. फिरंगियों ने दोनों दलित क्रांतिकारियों को पेड़ में बांधकर गोलियों से उड़ा दिया और बाकी लोगों को कासगंज में फांसी दे दी गई.

बांके चमार इसी तरह 1857 की जौनपुर क्रांति के दौरान जिन 18 क्रांतिकारियों को बागी घोषित किया गया उनमें सबसे प्रमुख बांके चमार थे। बांके चमार को जिंदा या मुर्दा पकडऩे के लिए ब्रिटिश सरकार ने उस जमाने में 50 हजार का इनाम घोषित किया था. बांके को गिरफ्तार कर मृत्यु दंड दे दिया गया.

वीरा पासी

जलियांवाला बाग के बाद दूसरे सबसे बड़े सामूहिक नरसंहार की गवाह बनी थी रायबरेली की माटी, जहां अंग्रेजों ने सैकड़ों किसानों को घेरकर बर्बरतापूर्वक गोलियों से भून दिया था. उसी रायबरेली की धरती ने स्वाधीनता की लड़ाई में वीरा पासी जैसा नायक दिया. इस नायक ने अंग्रेजों को लोहे के चने चबवा दिए. इस योद्धा से खौफजदा अंग्रेजी सरकार ने वीरा पासी को जिंदा या मुर्दा पकड़ने के लिए 50 हजार रुपये का इनाम घोषित किया था. वीरा पासी रायबरेली क्षेत्र के राणा बेनी माधव के मुख्य सिपहसालार और अंगरक्षक थे. अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई में उन्होंने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया.

बुद्धु भगत गुमनामी में खो गए जिन शहीदों का नाम आता है, उनमें वीर बुद्धु भगत भी थे। छोटा नागपुर के वे ऐसे जननायक थे, जिन्होंने न केवल अंग्रेजों के छक्के छुड़ाए बल्कि उन्हें उरांव आदिवासी इलाका छोड़ने को मजबूर भी कर दिया। इस युद्ध में उनकी बेटियां रुनिया और झुनिया ने भी अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध में हि्स्सा लिया और शहीद हो गईं।

1857 के स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं ने भी न केवल बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया बल्कि प्राणों की आहुति भी दी.

वीरांगना झलकारी बाई वीरांगना झलकारी बाई ऐसी ही एक वीरांगना थीं। यह चर्चित बात है कि झलकारी बाई और लक्ष्मीबाई की सकल-सूरत एक दूसरे से काफी मिलती जुलती थी, इसलिए अंग्रेज झलकारीबाई को ही रानी लक्ष्मीबाई समझकर काफी देर तक लड़ते रहे. बाद में झलकारीबाई शहीद हो गईं लेकिन इतिहासकारों ने झलकारीबाई के योगदान को हाशिए पर रखकर रानी लक्ष्मीबाई को ही वीरांगना का ताज दे दिया.

वीरांगना ऊदादेवी वीरांगना ऊदादेवी का नाम भी प्रमुखता से लिया जाता है। 16 नवम्बर 1857 को लखनऊ के सिकन्दरबाग चौराहे पर घटित इस अपने ढंग के अकेले बलिदान को इतिहास के पन्नों से दूर ही रखा गया. ऊदादेवी नवाब वाजिद अली शाह की बेगम हजरत महल की महिला सैनिक दस्ते की कप्तान थीं. इनके पति का नाम मक्का पासी था. जो लखनऊ के गांव उजरियांव के रहने वाले थे. अंग्रेजों ने लखनऊ के चिनहट में हुए संघर्ष में मक्का पासी और उनके तमाम साथियों को मौत के घाट उतार दिया था. पति की मौत का बदला लेने के लिए वीरांगना ऊदादेवी 16 नवंबर 1857 सिकंदर बाग (लखनऊ) में एक पीपल के पेड़ पर चढ़कर 36 अंग्रेज फौजियों को गोलियों से भून दिया था और बाद में खुद भी शहीद हो गईं थीं.

महाबीरी देवी वाल्मीकि दलित समाज की महाबीरी देवी वाल्मीकि को तो आज भी बहुत कम लोग जानते हैं. मुजफ्फरपुर की रहने वाली महाबीरी को अंग्रेजों की नाइंसाफी बिलकुल पसंद नहीं थी. अपने अधिकारों के लिए लडऩे के लिए महाबीरी ने 22 महिलाओं की टोली बनाकर अंग्रेज सैनिकों पर हमला कर दिया. अंग्रेजों को गांव देहात में रहने वाली दलित महिलाओं की इस टोली से ऐसी उम्मीद नहीं थी. अंग्रेज महाबीरी के साहस को देखकर घबरा गए थे. महाबीरी ने दर्जनों अंग्रेजों को मौत के घाट उतार दिया और उनसे घिरने के बाद खुद को भी शहीद कर लिया था.

रामपति चमार चौरी-चौरा का इतिहास खंगालने पर यह साफ हो जाता है कि स्वतंत्रता आंदोलन में रामपति चमार और उनके अन्य साथियों का भी उल्लेखनीय योगदान है.

सुभाष चंद्र बोस जब सुभाष चंद्र बोस ने ब्रिटिश सरकार को खदेडऩे के लिए 26 जनवरी 1942 को आजाद हिन्द फौज बनाई और “तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दुंगा” की अपील की तो कैप्टन मोहन लाल कुरील की अगुवाई में हजारों दलित भी फौज में शामिल हो गए. यहां तक की चमार रेजीमेंट पूरी तरह आजाद हिन्द फौज में विलीन हो गई.

इसी तरह के तमाम ऐसे बहुजन नायक हैं जिनका योगदान कहीं दर्ज न हो पाने से वो इतिहास के पन्नों में गुम हो गए. उन तमाम बहुजन नायकों को दलित दस्तक की श्रद्धांजलि.

ऐसा हुआ तो शरद यादव के पास होगी जदयू की कमान

नई दिल्ली। जनता दल यूनाइडेट में फूट पर चुकी है. पार्टी के दो बड़े नेताओं शरद यादव और नीतीश कुमार के आमने-सामने आ जाने के बाद अब लड़ाई असली जनता दल यू को लेकर है. नीतीश कुमार के स्वार्थी रवैये से नाराज शरद यादव अब अन्य प्रदेश इकाईयों को एकजुट करने में जुटे हैं. यादव गुट का दावा है कि उसे 14 राज्य इकाइयों का समर्थन है. अगर यादव के दावे पर भरोसा किया जाए तो असली जनता दल यू शरद यादव के पास है, जबकि नीतीश कुमार सिर्फ बिहार में सिमट कर रह जाएंगे. ऐसे में अब असली जदयू की लड़ाई छिड़ गई है. असल में शरद खेमे की यही शिकायत है कि महागठबंधन तोड़ने का फैसला सिर्फ बिहार की इकाई कैसे कर सकती है. शरद यादव के करीबी सूत्रों ने साफ कर दिया है कि यादव पार्टी नहीं छोड़ेंगे, ऐसे में अब शरद यादव अपने धड़े को ‘असली ‘ जदयू के रूप में पेश करने की तैयारी में जुटे हैं. इसके लिए वह चुनाव आयोग जाने की तैयारी में हैं.

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जनता दल यू के कोटे से राज्यसभा के दो सांसद भी शरद के साथ हैं. यह बात शरद यादव के हक में जा रही है. यादव ने नीतीश कुमार के उस बयान को भी खारिज कर दिया है, जिसमें उन्होंने कहा कि पार्टी का अस्तित्व बिहार तक सीमित है. यादव ने कहा कि पार्टी की हमेशा से राष्ट्रीय स्तर पर पहचान रही है. पार्टी अपनी इसी पहचान को नीतीश कुमार को सामने रख कर आगे बढ़ाना चाहती थी और मोदी के खिलाफ नीतीश कुमार को विपक्ष के चेहरे के तौर पर पेश करना चाहती थी. लेकिन भाजपा के साथ जाकर नीतीश ने अपनी पार्टी के साथ-साथ पूरे विपक्ष को ही सकते में डाल दिया. एक तथ्य यह भी है कि जब समता पार्टी का जदयू में विलय हुआ था तो उस समय शरद यादव पार्टी प्रमुख थे. हालांकि नीतीश और शरद यादव के बीच राजनैतिक रस्सा-कस्सी में नया मोड़ 17 अगस्त को शरद यादव और 19 अगस्त को नीतीश कुमार की अध्यक्षता में होने वाली बैठक के बाद आ सकता है. इसके बाद पटना में 27 अगस्त को लालू यादव भी विपक्षी दलों को एक मंच पर एकजुट करेंगे. इस महारैली से क्या निकल कर आता है यह भी देश की राजनीति में बहुत कुछ तय करेगा.