विश्वविद्यालय में आरक्षण पर भिड़े मोदीजी के मंत्री

नई दिल्ली। सरकार के दो मंत्री आमने-सामने आ गए हैं. मामले को लेकर प्रकाश जावड़ेकर और थावरचंद गहलोत आपस में भिड़ गए हैं. असल में मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने 5 मार्च को भर्ती के लिए नया रोस्टर लागू करने का आदेश जारी किया था. इसे लेकर सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री थावरचंद गहलोत ने आपत्ति जताई है.

गहलोत ने नए रोस्टर का विरोध करते हुए प्रधानमंत्री कार्यालय को चिट्ठी लिखी है. चिट्ठी में गहलोत ने इस आदेश को वापस लेने के लिए पीएम मोदी से गुहार लगाई है. इसमें तर्क दिया गया है कि नए रोस्टर से पिछड़ा, अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों को भर्तियों में लाभ नहीं मिल पाएगा. मंत्रालय के अनुसार देश के अनुसूचित जाति, जनजाति व अन्य पिछड़ा वर्ग के शिक्षक संगठन इसका विरोध कर रहे हैं.

दरअसल सभी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में प्रोफेसरों की भर्ती के लिए साल 2007 से रोस्टर लागू था. इसमें विश्वविद्यालय या कॉलेज को एक यूनिट माना जाता था. और भर्ती निकलने की स्थिति में यह भर्ती पूरी यूनिट के लिए होती थी. यानी यदि किसी यूनिवर्सिटी में 50 पदों पर भर्ती निकली है तो आरक्षण के नियम के मुताबिक उसमें चौथा पद पिछड़े वर्ग के लिए, 7वां अनुसूचित जाति के लिए और 14वां अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित होता था.

मगर एचआरडी मंत्रालय के नए आदेश के मुताबिक, विश्वविद्यालयों और कॉलेजों को एक यूनिट नहीं माना जाएगा. इसकी जगह उस ‘विषय विभाग’ को यूनिट माना जाएगा जिसमें भर्तियां होनी हैं. सोशल जस्टिस मंत्रालय का मानना है कि एक विभाग में भर्तियां कम निकलती हैं. मसलन कहीं 3 तो कहीं 4 तो कहीं 6 पद होते हैं. ऐसे में अनुसूचित जाति या जनजाति के लोगों का नंबर कट ही जाएगा. सामाजिक न्याय मंत्री थावरचंद गहलोत इसी का विरोध कर रहे हैं. उनका कहना है कि अगर यह आदेश लागू हो गया तो फिर दलितों और पिछड़ों को आरक्षण का लाभ नहीं मिल सकेगा. फिलहाल मामला प्रधानमंत्री के पास है और देखना है कि वह इस बारे में क्या फैसला लेते हैं.

अब तक 44 : एनकाउंटर के नाम पर हत्याएं जारी…

उत्तर प्रदेश में योगी सरकार के पदभार संभालनें के बाद 20 मार्च 2017 से फरवरी 2018 करीब 11 महीने में लगभग साढ़े ग्यारह सौ इनकाउंटर होचुके हैं जिनमें 44 कथित अपराधी मारे गए और डेढ़ हज़ार के करीब घायल हुए हैं. कानून व्यवस्था ठीक करने के नाम पर होने वाले इन इनकाउंटरोंपर अब सवाल उठने लगे हैं. इनकाउंटरों के तौर तरीके, पुलिस की कहानी, इनकाउंटर पीड़ितों के ज़ख्मों आदि की पड़ताल करने पर सवालों का उठनालाज़मी भी है. सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि ‘मुठभेड़ की जाती है या हो जाती है’? मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बयानों को देखें तो इस नतीजेपर पहुंचना मुश्किल नहीं है कि भुठभेड़ की जाती है और ऐसा कथित अपराधियों को चिन्हित कर के होता है. इसका मतलब यह कि आमतौर परमुठभेड़ पूर्व नियोजित (निश्चित रूप से सभी मुठभेड़ नहीं) होती है. ऐसे में इन घटनाओं को मुठभेड़ माना भी जाए या नहीं? कानून की नज़र में इसतरह की मुठभेड़ में हाने वाली मौत नहीं हत्या है? उस कानून की नज़र में जिसके पास अपनी आंख नहीं होती. वह आरोपपत्रों और गवाहों की आंखसे देखता है. बेगुनाहों की रिहाई के लिए संघर्ष करने वाले संगठन रिहाई मंच के एक प्रतिनिधि मंडल ने आज़मगढ़ जनपद में इसी तरह की मुठभेड़ोंमें मारे जाने वाले चार कथित अपराधियों के परिजनों और आसपास के लोगों से मिलकर जुटाए गए तथ्यों के आधार पर सवाल उठाते हुए इन्हें हत्याबताया है.

रिहाई मंच महासचिव राजीव यादव के नेतृत्व में आज़मगढ़ में मुठभेड़ में मारे गए छन्नू सोनकर, रामजी पासी, जयहिंद यादव और मुकेश राजभर केपरिजनों और ग्रामवासियों से मिलने के बाद जो अंतरिम रिपोर्ट जारी की है वह चिंता उत्पन्न करने वाली है. छन्नू सोनकर को अमरूद के बाग़ सेपुलिस वाले ले गए और जब वह देर रात तक घर नहीं वापस आया तो परिजनों ने उसके मोबाइल पर फोन किया. पता चला कि वह जहानागंज थानेमें है. पिता झब्बू सोनकर और उसकी बहनों ने बताया कि अगली सुबह दो पुलिस वाले उनके घर पहुंचे और बताया कि छन्नू का जिला अस्पताल मेंइलाज चल रहा है. वहां पहुंचने के बाद परिजन को मुठभेड़ में उसके मारे जाने के बारे में पता चला. मुकेश राजभर की मां ने बताया कि उनका बेटाकानपुर मज़दूरी करता था. 15 दिन पहले पुलिस वाले उसके घर गए थे और गाली गलोज और मारपीट की थी और मुकेश का कानपुर का पता मांगाथा. उसकी मां का आरोप है कि पुलिस वाले उससे रिश्वत में बड़ी रक़म मांग रहे थे. उसने बताया कि 26 जनवरी को 9 बजे पुलिस ने उसे कानपुरसे उठाया था. दिन में बारह बजे रामजन्म सिपाही ने फोन कर के उसकी मां से पूछा था कि उसके पास कितना खेत है तो उसने उससे कहा था किमुकेश को ले गए हो लेकिन मारना पीटना मत, लेकिन पुलिस ने उसको इनकाउंटर में मार डाला. मुकेश को सीने में एक गोली मारी गई थी. उसपर बंदी रक्षक को गोली मारने का आरोप पुलिस ने लगाया है. जयहिंद यादव के पिता शिवपुजन यादव ने बताया कि जयहिंद उनको साथ लेकर दवालाने जा रहा था. सादे कपड़ों में कुछ लोगों ने उसे उठा कर बोलेरो में भर लिया और चले गए. उसके बाद सूचना मिली कि उसकी मुठभेड़ में मौतहो गई. उसे 21 गोलियां लगी थीं. क्षेत्र पंचायत सदस्य रहे रामजी पासी के पिता दिनेश सरोज का कहना था कि पुलिस ने पहले उस पर फर्जीमुकदमें लगाए और फिर फर्जी मुठभेड़ में उसकी हत्या कर दी. उनका कहना था कि रामजी ने 600 मतों से क्षे़त्र पंचायत चुनाव जीता था जिसकेकारण कुछ सवर्ण लोग उससे जलते थे और मुठभेड़ में उन लोगों का भी हाथ है.

रिहाई मंच प्रतिनिधि मंडल ने बाराबंकी में पुलिस इनकाउंटर में घायल रईस अहमद के परिजनों से भी मुलाकात की. रईस की पत्नी ने बताया कि 30दिसम्बर को अंधेरा होते ही मुखबिर आबिद के साथ सादे कपड़ों गाड़ी में आए जवान उसे गांव से ही उठा कर ले गए. जिला पंचायत चुनाव लड़ चुकेरईस की पत्नी ने बताया कि उसके पति की गांव के कुछ लोगों से प्रधानी के चुनाव को लेकर रंजिश थी. उसको इससे पहले नहर काटने के आरोप मेंफंसाया गया था. उसने यह भी आरोप लगाया कि अंबारी बाज़ार के पास उसकी मुठभेड़ में हत्या करने की योजना थी लेकिन बात के फैल जाने केकारण करीब एक सप्ताह बाद बाराबंकी में उसे फर्जी मुठभेड़ में घायल कर दिया गया.

पुलिस ने मारे गए सभी कथित अपराधियों पर कई अपराधों में लिप्त होने का आरोप लगाया है और उन्हें इनामी भी बताया है. इसके अतरिक्त इनमुठभेड़ों के बाद पुलिस की कहानी में कई चीज़ें ऐसी है जो सभी मामलों में एक जैसी हैं. जैसे सभी अभियुक्त बाइक से जा रहे थे और उनमें से हरएक के साथ उनका एक साथी भी था. पुलिस ने जब उन्हें रोकने की कोशिश की तो बाइक सवारों ने उन पर गोलियां चलाना शुरू कर दिया. पुलिसने जवाबी फायर किया तो अभियुक्तों को गोली लगी जिसमें वे घायल हो गए लेकिन उनके साथी फरार होने में सफल रहे. मुठभेड़ के बाद मौके सेबाइक के अलावा हर घटना में एक हथियार भी बरामद हुआ. रिहाई मंच महासचिव राजीव यादव ने सवाल किया कि बाइक सवार से मुठभेड़ मेंकिसी को 21 गोलियां कैसे लग सकती हैं और 21 गोलियां लगने के बाद पुलिस का यह कहना कि अस्पताल ले जाते समय जयहिंद की मौत हुईऐसा स्वभाविक नहीं लगता. इसी तरह मुकेश राजभर के सीने में जिस स्थान पर गोली लगी और जिससे उसकी मौत भी हो गई उस स्थान पर गोलीलगने के बाद कुछ मिनटों तक ही जीवित रहने की सम्भावना रह जाती है ऐसे में पुलिस जिला अस्पताल में उपचार के दौरान उसकी मौत की बातकह कर संदेह ही उत्पन्न कर रही है.

उठ रहे सारे सवालों मद्दे नज़र उत्तर प्रदेश राज्य मानवाधिकार आयोग ने आजमगढ़ के मुकेश राजभर, जयहिन्द यादव, रामजी पासी और इटावा के अमन यादव के फर्जी मुठभेड़ पर जाँच बैठा दिया. उत्तर प्रदेश की विधान सभा में भी विपक्षी दलों ने फर्जी मुठभेड़ के नाम पर की जा रही हत्या का सवाल उठाया.

दरअसल मुठभेड़ों का यह अभियान कानून व्यवस्था का मामला कम और इनकाउंटर पॉलिटिक्स का ज़्यादा लगता है. भाजपा सरकारअपराधियों के प्रति कठोर दिखने के साथ ही राजनीतिक हिसाब किताब भी चुकता कर रही है. इनकाउंटर में मारे जाने वालों में मुसलमान, दलितऔर पिछड़ों की संख्या सबसे ज़्यादा है जबकि कई नामी स्वर्ण अपराधी या भाजपा की शरण में चले जाने वाले निश्चिंत घूम रहे हैं. दूसरी तरफमुठभेड़ों के बढ़ते हुए आंकड़े ही यह बताने के लिए काफी हैं कि बताते हैं कि सब कुछ ठीक नहीं है. 20 मार्च 2017 से शुरू इस अभियान के पहले 6महीने में कुल 420 इनकाउंटर हुए थे जिनमें 15 लोग मारे गए थे जबकि यह आंकड़ा 3 फरवरी 2018 को क्रमशः 1142 और 38 था. टाइम्स आफइंडिया के मुताबिक़ फरवरी की शुरूआत में ही 48 घंटों में प्रदेश में कुल 15 इनकाउंटर हुए. सरकार की तरफ से पुलिस को मिलने वाली वाहवाही औरपदोन्नति की होड़ में इसके और बढ़ने की आशंका है. जाहिर है इसमें योगी सरकार की दिलचस्पी किसी से छुपी हुई नहीं है और यह कानून व्यवस्थाको लेकर कम राजनीतिक ज़्यादा है

मसीहुद्दीन संजरी

योगी सरकार के एक साल पर मायावती का तंज- ‘एक साल-बुरी मिसाल’

नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने अपना एक साल पूरा कर लिया है. योगी सरकार के एक साल पूरा होने पर एक बयान जारी करते हुए पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने इसे ‘एक साल-बुरी मिसाल’ का नाम दिया है. पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि यही कारण है जनता ने गोरखपुर और फुलपूर उपचुनाव में उन्हें सबक सिखा दिया है और सरकार को जीरो अंक दिया है.

सीएम योगी को कठघरे में खड़ा करते हुए बसपा प्रमुख ने कहा कि प्रदेश की आमजनता से घोर वादाखिलाफी, उसे केवल लच्छेदार बातों में फुसलाने व धार्मिक उन्मादों में बहकाने की भूल करने का ही नतीजा है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को अपनी परंपरागत लोकसभा सीट भी गंवानी पड़ी है. इससे पहले शहरी निकाय के चुनाव में भी वो अपने मठ की सीट पर चुनाव हार गए थे.

बसपा प्रमुख ने आरोप लगाया कि- योगी की सरकार द्वारा एक वर्ष के भीतर सर्वसमाज के गरीबों, मजदूरों, बेरोजगारों व आम जनता के हित व कल्याण पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय कर्मकाण्ड व पूजा पाठ में ज्यादा ध्यान दिया गया. योगी को राजधर्म का पाठ पढ़ाते हुए बसपा प्रमुख ने कहा कि जनता के हित के लिए सही नीयत व निष्ठा भाव से काम करना ही असली पूजा व सच्चा राजधर्म है.

राज्य में हो रहे पुलिस इंकाउंटर पर सवाल उठाते हुए बसपा प्रमुख ने कहा, “सीएम योगी ने अपनी पार्टी के नेताओं पर से दंगा आदि के आपराधिक मुकदमें वापस लेकर सरकारी मेहरबानी की जबकि दूसरे लोगों की पुलिस इनकाउंटर में हत्या करके कानून व्यवस्था को दुरुस्त करने का गलत प्रयास किया जा रहा है. इससे भाजपा की पक्षपाती और द्वेषपूर्ण नीति का पर्दाफाश होता है.”

सीएम योगी पर चुटकी लेते हुए मायावती ने कहा कि योगी सरकार को आर.एस.एस और नरेन्द्र मोदी को खुश करने के लिए व्यर्थ का काम करने की बजाय प्रदेश के 22 करोड़ गरीबों, मजदूरों व आम जनता के हित में सही कार्य प्रणाली के साथ काम करने की जरूरत है. पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि जिस प्रकार केंद्र में नरेन्द्र मोदी सरकार भ्रष्टाचार उन्मूलन व कालाधन वापसी आदि के खास महत्व के मुद्दों पर पूरी तरह से फेल साबित हुई है, ठीक उसी प्रकार प्रदेश की योगी सरकार भी किसानों की कर्जमाफी, गन्ना किसानों का बकाया, युवाओं और छात्रों के हित के बायदे और जनहिताय के मामलों में बुरी तरह से विफल साबित हुई है.

अब सीएम योगी का ठाकुरवाद नजर क्यों नहीं आता

उत्तर प्रदेश की सत्ता में जब भी समाजवादी पार्टी आती है तो उस पर यादववाद का आरोप लगने लगता है. ऐसे ही बसपा की सरकार में कुमारी मायावती के मुख्यमंत्री बनते ही उनपर जाटववाद का आरोप लगता है. मीडिया ढूंढ़-ढूंढ़ कर उन यादव और जाटव अधिकारियों के नाम गिनाती है, जो प्रमुख पदों पर बैठे होते हैं. इन दोनों पार्टियों पर जातिवाद का आरोप लगाया जाता रहता है, लेकिन भाजपा और कांग्रेस की सरकार आते ही ऐसी चर्चा बंद हो जाती है. न तो मीडिया अधिकारियों की जाति की चर्चा करता है न ठाकुरवाद और ब्राह्मणवाद की. लेकिन हकीकत यह है कि भाजपा की सरकार आते ही प्रदेश के सभी प्रमुख पदों पर ठाकुरों और ब्राह्मणों का कब्जा हो जाता है.

यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के एक साल पूरा होने के साथ ही उन पर जातिवाद का आरोप लगने लगा है. कहा जा रहा है कि शासन और प्रशासन में इन दिनों ठाकुरों का वर्चस्व कायम है. योगी सरकार में प्रमुख पदों पर बैठे अफसर इसका सबूत भी हैं.

योगी आदित्यनाथ ने यूपी सरकार के लिए महाधिवक्ता के रूप में राघवेंद्र सिंह को चुना. योगी के महाधिवक्ता भी राजपूत समाज से आते हैं. यूपी के हरदोई के रहने वाले राघवेंद्र सिंह 1980 से इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ में प्रैक्टिस कर रहे हैं. उन्होंने वकालत की शुरुआत 1977 में हरदोई से की थी. इसी तरह उत्तर प्रदेश के थानों में ठाकुरों का कब्जा है. पूर्वांचल के अधिकतर थानों का जिम्मा राजपूतों को सौंपा गया है. एक समय हालत ये थी कि वाराणसी के 24 थानों में 23 पर सवर्ण और उनमें भी ज्यादातर राजपूत काबिज थे. इसी तरह से इलाहाबाद के 44 थानों में से 42 पर सवर्ण कोतवाल और थानाध्यक्ष बनाए गए. इसके अलावा सूबे के ज्यादातर जिलों में डीएम और एसपी राजपूत समाज के नियुक्त किए गए.

अब जरा योगी जी के मंत्रिमंडल में भी झांकते हैं. योगी आदित्यनाथ के मंत्रिमंडल के 44 मंत्रियों में से 7 राजपूत समाज से हैं, जो कि 16 फीसदी है. बीजेपी के 325 विधायकों में से 56 विधायक राजपूत हैं, जो कि 18 फीसदी हैं. जबकि सूबे में राजपूत समाज की आबादी सिर्फ 7 फीसदी के आस-पास है.

योगी आदित्यनाथ भी राजपूत समाज से आते हैं. इसी का नतीजा है कि गोरखपुर में ब्राह्मण और राजपूतों के बीच वर्चस्व की जंग है. राजपूतों का केंद्र मठ बना है तो ब्राह्मण का हाता है. भाजपा के बीच चर्चा तेज है कि सपा को जहां दलितों और पिछड़ों के एकजुट होने का लाभ मिला, तो वहीं ब्राह्मणों और ठाकुरों के बीच वर्चस्व का खामियाजा भुगतना पड़ा.

चारा घोटाले के चौथे आरोप में भी लालू यादव को सजा

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रांची। रांची के बिरसा मुंडा जेल में बंद बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री एवं राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव को विशेष सीबीआई अदालत ने चारा घोटाले से जुड़े चौथे मामले में भी दोषी करार दिया. लालू यादव पर दुमका कोषागार से तीन करोड़, तेरह लाख रुपये का गबन करने का आरोप सिद्ध हुआ है. इस मामले में सजा का एलान 21 मार्च से 23 मार्च के बीच किया जाएगा. हालांकि इसी मामले में अदालत ने बिहार के दूसरे पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्रा समेत 12 लोगों को सबूतों के अभाव में बाइज्जत बरी कर दिया. लालू इससे पहले भी चारा घोटाले के तीन मामले में दोषी ठहराए जा चुके हैं

चारा घोटाले के कांड संख्या आरसी 38ए/96 में सीबीआई की विशेष अदालत ने आरजेडी सुप्रीमो लालू यादव सहित 18 आरोपियो को दोषी करार दिया है. सभी दोषियो को 21, 22 और 23 मार्च तक वीडियो कांफ्रेंसिंग के माध्यम से सजा सुनाई जाएगी. 6-6 के ग्रुप में सजा सुनाई जाएगी. चारा घोटाले के दुमका कोषागार से तीन करोड़, तेरह लाख रुपये के गबन के मामले में 31 लोगों के खिलाफ सीबीआई की विशेष अदालत का बहुप्रतीक्षित फैसला सोमवार दोपहर बाद आया जिसमें सीबीआई के विशेष न्यायाधीश शिवपाल सिंह ने जहां लालू समेत 19 को दोषी करार दिया वहीं पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्रा, पूर्व विधायक ध्रुव भगत, पूर्व सांसद जगदीश शर्मा, पूर्व मंत्री विद्या सागर निषाद, पूर्व विधायक आर के राणा समेत 12 लोगों को सबूतों के अभाव में बरी करने का आदेश दिया.

रंजीत कुमार

18 मार्च को आगरा में जुटे हजारों अम्बेडकरवादी

आगरा। 18 मार्च को पूरा आगरा शहर सफेद कपड़ों मे लिपटे लोगों और पंचशील के झंडों से पटा हुआ था. यह नजारा शहर में किसी का भी ध्यान खिंचने के लिए काफी था. असल में ये तमाम लोग बाबासाहेब को याद करने के लिए इकट्ठा हुए थे. 18 मार्च 1956 को बाबासाहब डॉ. आम्बेडकर ने आगरा के रामलीला मैदान में बहुत ही महत्वपूर्ण भाषण दिया था. उस भाषण में बाबासाहेब ने समाज से अपनी अपेक्षा और थोड़ी निराशा जाहिर की थी. तब से हर वर्ष इस दिन आगरा में हजारों अम्बेडकरवादी इकट्ठा होकर जैसे बाबासाहेब की कही बात को पूरा करने का प्रण लेते हैं. रविवार 18 मार्च को भी आगरा में लालकिला के सामने रामलीला मैदान में विशाल बौद्ध धम्म दीक्षा समारोह का आयोजन किया गया. कार्यक्रम में देश के विभिन्न हिस्सों से लोग पहुंचे थे. पूरा मैदान पंचशील के झंडों और गुब्बारों से पटा हुआ था. इस दिन को चेतना दिवस के रूप में मनाया जाता है.

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि बाबासाहेब के पोते प्रकाश आंबेडकर थे. इस दौरान लोगों का उत्साह देखते ही बन रहा था. जगह जगह से आए लोगों से पूरा मैदान खचाखच भरा हुआ था. लोग गाजे-बाजे के साथ कार्यक्रम में पहुंचे थे. तो आयोजकों ने मंच पर बहुजन कलाकारों को भी जगह दी थी, जिन्होंने अम्बेडकरी आंदोलन के गाने गाएं. कार्यक्रम के दौरान ऐसा दर्जनों बार हुआ जब बाबासाहेब के नाम के नारे लगें. कार्यक्रम में महिलाओं की भागेदारी भी अच्छी खासी रही, तो इस मैदान में अम्बेडकरी साहित्य भी बिक रहा था.

इस मैदान की अहमियत इसलिए भी है, क्योंकि यहां एक बुद्ध विहार भी है, जिसमें बाबासाहेब ने खुद तथागत बुद्ध की प्रतिमा स्थापित की थी. पिछले कई सालों से यहां अम्बेडकरवादियों का मेला लगता है. और सबसे बड़ी बात यह है कि लोग लाए नहीं जाते, बल्कि खुद के पैसे खर्च कर पहुंचते हैं. और लोगों के पहुंचने का यह सिलसिला और धम्म की ओर आने वाले लोगों का कारवां साल-दर-साल बढ़ता जा रहा है.

दिनेश कार्तिक ने ऐसे बनाएं 8 गेंदों पर 29 रन

नई दिल्ली। बांग्लादेश के खिलाफ टॉस जितने के बाद कप्तान रोहित शर्मा ने पहले गेंदबाजी का फैसला लिया बांग्लादेश ने पहले बल्लेबाजी करते हुए निर्धारित 20 ओवरों में 8 विकेट खो कर 166 रन बनाए जिसके जवाब में भारतीय टीम ने 20 ओवरों में 6 विकेट पर 168 रन बना कर श्रंखला पर कब्ज़ा कर लिया। जीत का रास्ता रोहित शर्मा ने तैयार किया जिसे मंजिल तक दिनेश कार्तिक ने पहुँचाया.

दिनेश कार्तिक की आतिशी बल्‍लेबाजी (29 रन, 8 गेंद) की बदौलत भारत ने आखिरी गेंद पर बांग्‍लादेश को निदास ट्रॉफी 2018 के फाइनल में 4 विकेट से हरा दिया। उन्‍होंने खुद अपनी इस पारी को यादगार पारियों में शुमार किया है। आखिरी गेंद पर छक्‍का लगाकर फाइनल जिताने वाले कार्तिक इकलौते बल्‍लेबाज बन गए हैं। कार्तिक की पारी ने मैच का रुख पलटकर रख दिया, वरना भारतीय टीम रन बनाने को तरस रही थी. टूर्नामेंट में पहली बार बल्‍लेबाजी कर रहे विजय शंकर के बल्‍ले पर गेंद नहीं आ रही थी और 18वें ओवर में चार डॉट गेंदों में दबाव बहुत बढ़ा दिया.

आइए एक नज़र डालते हैं कि आखिर कैसे कार्तिक ने 8 गेंदों पर 29 रन बटोरे.

12 गेंद पर जीत के लिए 34 रनों की जरूरत

18.1- (छह रन) रुबेल हुसैन की गेंद पर दिनेश ने धमाकेदार छक्का जड़ दिया. कार्तिक पहले से ही क्रीज के बाहर खड़े थे. लो फुलटॉस गेंद पर उन्होंने लॉन्ग ऑन के ऊपर से छक्का लगा दिया.

11 गेंद पर जीत के लिए 28 रनों की जरूरत 18.2 (चार रन) रुबेल की खराब यॉर्कर का कार्तिक ने एक बार फिर से फायदा उठाया. इस बार लॉन्ग ऑन की दायीं तरफ चार रनों के लिए गेंद बांउड्री के बाहर पहुंच गई. 10 गेंद पर जीत के लिए 24 रनों की जरूरत

18.3 (छह रन) हुसैन की गेंद पर कार्तिक ने एक और करारा छक्का जड़ दिया. गेंद लेग स्टंम्प पर थी कार्तिक ने स्क्वायर लेग के ऊपर से छक्का लगा दिया. ये ठीक वैसा ही छक्का था जो महमुदुल्लाह ने पिछले मैच में श्रीलंका के खिलाफ लगाकर अपनी टीम को रोमांचक जीत दिलाई थी.

9 गेंद पर जीत के लिए 18 रनों की जरूरत

18.4 (डॉट बॉल) ये ऑफ स्टंम्प के बाहर स्लोअर बॉल थी. कट करने के प्रयास में कार्तिक चूक गए. कॉट बिहाइंट की अपील भी हुई. लेकिन गेंद बल्ले से नहीं टकराई थी.

8 गेंद पर जीत के लिए 18 रनों की जरूरत

18.5 (2 रन) इस बार लॉन्ग-ऑफ पर खेल कर कार्तिक ने 2 रन लिए.

7 गेंद पर जीत के लिए 16 रनों की जरूरत

18.6 (चार रन ) कार्तिक का ये चौका लाजवाब था. घुटने के बले झुकते हुए कार्तिक ने गेंद को स्कूप कर दिया. गेंद बिजली की रफ्तार से लॉन्ग लेग की बाऊंड्री के बाहर चार रनों के लिए चली गई.

4 गेंद पर जीत के लिए 10 रनों की जरूरत

19.3 (एक रन) सौम्या सरकार ने कार्तिक को यॉर्कर डाल कर दबाव बनाने की कोशिश की. लेकिन कार्तिक ने डीप-प्वाइंट की तरफ खेल कर एक रन ले लिया.

1 गेंद पर जीत के लिए 5 रनों की जरूरत

19.6 (छह रन) ये वो छक्का था जिसे बार-बार देखने को दिल करता है. गेंद ऑफ स्टंम्प पर थी, इस गेंद पर छक्का लगाना आसान नहीं था लेकिन कार्तिक ने कवर के ऊपर से ऐसा छक्का लगाया कि बांग्लादेशी खिलाड़ी हक्के-बक्के रह गए गए. गेंद दूर सीमा रेखा के बाहर गिरी… ये वो विजयी रन थे जिसे देख कर भारतीय फैंस भी हैरान रह गए. कार्तिक के इस छक्के ने असंभव जीत को संभव बना दिया.

   

योगी सरकार में उपेक्षा से परेशान पिछड़े समाज के मंत्री ने खोला मोर्चा

लखनऊ। उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार सत्ता का पहला साल पूरा होने पर जहां अपनी उपलब्धियां गिना रही है. वहीं, सपा और बसपा विकास की गति रुक जाने का आरोप लगा रहे हैं. इस बीच अब योगी आदित्यनाथ सरकार में एक मंत्री ने ही मुख्यमंत्री योगी की मंशा पर सवाल खड़े किए हैं.

सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के अध्यक्ष और योगी कैबिनेट में मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने अपनी ही सरकार पर बड़ा हमला बोला है. राजभर ने आरोप लगाया है कि मौजूदा यूपी सरकार सिर्फ मंदिरों पर ध्यान दे रही है. और जिन गरीबों ने उसे वोट दिया, उन पर सरकार तवज्जो नहीं दे रही है. राजभर ने ये भी आरोप लगाया कि सरकार की तरफ से दावे बहुत किए जाते हैं, लेकिन जमीन पर कुछ होता हुआ दिखाई नहीं दे रहा. ओपी राजभर ने सरकार पर गठबंधन धर्म का पालन नहीं करने का भी आरोप लगाया है और कहा है कि भाजपा के लोग 325 सीट के नशें में पागल होकर घूम रहे हैं.

दूसरी ओर राजभर के बयान पर यूपी के स्वास्थ्य मंत्री और भाजपा नेता सिद्धार्थनाथ सिंह ने जवाबी हमला बोला है. सिद्धार्थनाथ सिंह ने कहा कि राजभर हमारी सरकार में मंत्री हैं और अगर उन्हें कुछ समस्या है तो कैबिनेट में अपनी बात रखें. सिंह ने कहा कि आप सरकार में रहकर इस तरीके से सार्वजनिक तौर पर आलोचना नहीं कर सकते.

असल में केंद्र और उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत मिलने के कारण भारतीय जनता पार्टी सहयोगी दलों को कोई तव्वजो नहीं दे रही है. खासकर दलित और पिछड़े वर्ग के नेताओं और उनसे जुड़ी पार्टियों को भाजपा और उसके नेता बिल्कुल तव्वजो नहीं दे रहे हैं. इसी कारण बिहार में जीतन राम मांझी एनडीए को छोड़कर महागठबंधन में शामिल हो गए हैं. उदित राज भी लगातार हाशिए पर हैं. बसपा छोड़कर भाजपा में पहुंचे स्वामी प्रसाद मौर्या और दारा सिंह चौहान को भी भाजपा में उतनी तव्वजो नहीं मिल रही है, जितनी बसपा में थी. इसी सूची में नया नाम ओपी राजभर का आया है. ओम प्रकाश राजभर अक्सर योगी सरकार को घेरते रहे हैं. लेकिन अब वो आर-पार की लड़ाई के मूड में आ गए हैं.

सीसीटीवी से नहीं, शिक्षा व्यवस्था की खोखली जड़ में खाद डालने से होगा सुधार

CCTV कैमरे लगवा दिए गए, नकलबाजी पर लगाम लगा दी गयी. हजारों-लाखों छात्रों ने पेपर बीच में छोड़ दिये, नकलबाजों ने डर कर परीक्षा छोड़ दी यह कहकर सरकार ने खूब अपनी पीठ थपथपाई… चलो नकल रोकने के लिए आपकी तारीफ की जानी चाहिए.

पर इस राज्य शिक्षा का नासूर सा घाव कब ठीक करोगे, उत्तर प्रदेश के सरकारी स्कूलों की हालत यह है कि अध्यापक खुद खराब अंग्रेजी, गणित, विज्ञान जैसे विषयों की कमजोरी से जूझ रहे हैं और जानकार अध्यापक पढ़ाने में मानसिक दिक्कत समझते हैं ये न जाने क्यों है कभी पता नहीं लगा !

सरकारी स्कूलों में आज भी उपस्थिति को लेकर कोई खास नियम नहीं, और छुट्टियां तो इतनी मिलती हैं जिनका कोई ठिकाना नहीं. न जाने कितने स्कूलों में बच्चे पहले- दूसरे घण्टे के बाद गायब हो जाते हैं जिसकी अध्यापक को आदत सी हो गयी है जिस पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता.

किसी को उत्तर प्रदेश राज्य बोर्ड की शिक्षा का स्तर नापना है तो 2 दिन की क्लास जॉइन करके देखिएगा की वहाँ भविष्य के लिए किस तरह खच्चर तैयार किये जा रहे हैं.

किसी भी छात्र की शिक्षा, अगर उसके पास 11th में विज्ञान, गणित है तो 4 ट्यूशन के बिना अधूरी है. कम से कम तीन ट्यूशन तो लगाने ही लगाने हैं गणित, भौतिक, रसायन… इसमें भी अगर अंग्रेजी विषय खुद से कर पाया तो ठीक बाकी इनमें कहीं भी चूक कर दी तो फेल होना पक्का है.

कभी कोई अध्यापक आने वाले रेगुलर फार्म्स, तरह-तरह की सरकारी नौकरियां, फ़ैशन डिजाइनिंग, ग्राफिक डिजाइनिंग जैसे Creative कोर्स के बारे में बताकर कोई अपना दिमाग खर्च नहीं करना चाहता, कोई भविष्य का मोटिवेशन ज्ञान न के बराबर.

कुछ इस तरह का अनुभव मेरा है बाकी वर्तमान स्कूली छात्र तो इस शिक्षा व्यवस्था को लेकर सर पकड़ लेते हैं.

हर तकनीकी पढ़ाई में अंग्रेजी.. दिल्ली विश्वविद्यालय का हर कोर्स अंग्रेजी में.. भारत की टॉप की यूनिवर्सिटी का हर कोर्स अंग्रेजी में.. IIT, IIM, PMT, B-Tech, B.SC Polytechnic सारे कोर्स अंग्रेजी में और उत्तर प्रदेश राज्य बोर्ड के स्कूलों की अंग्रेजी गड्ढे में.

तो बताएं कैसे बच्चा शिक्षित बनें? कैसे वो रोजगार के लायक हो, कैसे वह सरकारी नौकरी ले, कैसे वह प्रोफेशनल कोर्स सम्भालें और क्यों न वह बेरोजगार बने.

CCTV लगाकर वाहवाही लूटना आसान है पर जमीनी हकीकत खुलती है तो पाँव के नीचे से जमीन सरक जाती है और सच यही है जो साफ साफ लिखा है.

अरे करो ठीक सीसीटीवी लगाकर ही, फुटेज क्लास के पढ़ाते अध्यापकों की भी तो चेक करो, शिक्षा के स्तर पर भी तो सीसीटीवी लगाओ.

सीसीटीवी पुलिस थाने, तहसील, कोर्ट, हर सरकारी विभाग में भी तो लगवाओ जहाँ से भ्रष्टाचार का जन्म होता है जब कर रहे तो सबके साथ समान व्यवहार करो, दोगला रवैया क्यों और कब तक ?

–Ankur sethi

ग्राउंड रिपोर्ट: मां से जानिए कैसा था उनका बेटा मधु

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तीन हफ़्ते पहले केरल के जंगल में मधु नामक जिस आदिवासी युवक की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई, वो हमेशा अपनी मां से कहते थे कि गुफ़ाओं में रहने को लेकर वो उनकी चिंता न किया करें. मधु अपनी मां से कहते थे कि उनके बारे में वो फ़िक्र न किया करें क्योंकि वो जानवरों के साथ वहां सुरक्षित हैं. मधु की मां बेटी के साथ खाना खाते हुए एकाएक रोने लगती हैं.

मधु ने कभी नहीं सोचा होगा कि लोग उनकी हत्या कर देंगे. खाना चोरी करने के शक़ में 23 फ़रवरी को जब उनकी पीट-पीटकर हत्या कर दी गई तब उसमें से कुछ युवा सेल्फ़ी ले रहे थे.

मधु की 56 वर्षीय मां मल्ली अपने बेटे के जंगल की गुफ़ा में रहने के विचार को कभी भी पसंद नहीं करती थीं. वो अट्टापडी क्षेत्र के साइलेंट वेली नेशनल पार्क के अपने छोटे से घर से कुछ किलोमीटर दूर रहते थे.

मल्ली ने बीबीसी हिंदी से कहा, “मधु जब जंगल में सुरक्षित रहने की बात करता था तो मुझे भरोसा था. लोगों ने चोरी का इल्ज़ाम लगाकर मेरे बेटे की हत्या कर दी.”

आंसू पोंछते हुए मल्ली कहती हैं, “वह चोर नहीं था. वो वैसा नहीं था कि चोरी करेगा. किसी की इजाज़त के बिना दूसरे का खाना खाना हमारी संस्कृति में ही नहीं है. ज़रूरत पड़ने पर वो हमेशा पूछता था.” कुछ लोगों के समूह ने जब ज़बर्दस्ती मधु को रोका तो उनके पास एक छोटा सा बैग था, जिसमें कुछ खाने के पैकेट थे. तब उन्होंने उनके बैग को टटोला और उसमें उन्हें कुछ पैकेट मिले. इसके बाद भीड़ ने उन्हें पीटना शुरू कर दिया. बाद में किसी ने पुलिस को बुला लिया. अस्पताल ले जाते समय पुलिस की जीप में ही उनकी मौत हो गई.

पालक्काड ज़िले में मन्नारकड से मुक्कली पहुंचने के बाद कार छोड़नी पड़ती है और जीप शटल सेवा लेनी होती है. यह शटल सेवा पथरीले इलाक़े में जनजातीय अस्पताल तक पहुंचाती है. यहां के रास्तों को रोड नहीं कहा जा सकता है. अस्पताल से 100 मीटर पहले जंगल में जाने के लिए एक पगडंडी जाती है जहां कोई भी शख़्स मधु का घर बता सकता है.

मधु के दादा का घर चिंदकीपाज़ायुर में था. तीन दशक पहले शादी के बाद मल्ली वहां चली गई थीं. पति की अचनाक मौत के बाद वह अपनी मां के घर आ गईं और बच्चों को पालने लगीं. दोनों बेटियों सरासु (29) और चंद्रिका (28) ने पड़ोसी ज़िले वायनाड के आदिवासी स्कूल में 12वीं तक की पढ़ाई की.

सभी भाई-बहनों में सबसे बड़े मधु ने कोकमपलाय सरकारी स्कूल में छठी क्लास तक की पढ़ाई की. इसके बाद वह जंगल से शहद और जड़ी-बूटी इकट्ठा करने में लग गए जिसे वह चिंडक्की के कुरुम्बा अनुसूचित जनजाति सहकारी समिति में बेचा करते थे.

मल्ली ने आंगनवाड़ी केंद्र में सहायक के रूप में काम करना शुरू किया तो उन्हें 196 रुपए मिलते थे. उनकी बेटी जब बड़ी हुईं तो वो अपने पति के घर वापस लौट आईं.

16 वर्ष की उम्र में मधु अजीब सा बर्ताव करने लगे. वो शांत रहते या कभी हिंसक हो जाते. उनका परिवार उन्हों कोझिकोड के मानसिक स्वास्थ्य संस्थान लेकर गया.

मल्ली कहती हैं, “उन्होंने दवाई दी और वह कुछ दिनों तक खाता रहा, लेकिन बाद में उसने खाने से इनक़ार कर दिया.” उन्होंने कहा, “लेकिन कुछ समय बाद मधु ने गुफ़ा में जाना और वहां रहना शुरू कर दिया. एक बार जब वह ग़ायब हो गया था तो हमने पुलिस में शिकायत की थी. पुलिस ने उन्हें गुफ़ा में पाया था, लेकिन उसने घर वापस आने से इनकार कर दिया था.” मल्ली का कहना है कि वह अपने बेटे को दिन में दो बार खाना देने में समर्थ थीं. मधु जब गुफ़ा में रहते थे तो वह यह सुनिश्चित करती थीं कि उन्हें खाना मिले. उनकी आय 6000 तक पहुंच गई है और उनके दामाद भी घर में मदद करते हैं. मधु की मौत का कारण क्या भूख थी या मानसिक रूप से बीमार लोगों को लेकर उदासीनता?

ज़िले के स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. प्रभु दास बताते हैं, “वह अकेले रहता था और इस कारण से भूखा था. वह किसी को नुक़सान पहुंचाना नहीं चाहता था.”

राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन की परियोजना निदेशक सीमा भास्कर कहती हैं, “आदिवासी संस्कृति में खाने को लेकर भावना अलग होती है. वे सोचते हैं कि खाना सिर्फ़ एक व्यक्ति से जुड़ा है. लोग आपको कई दिनों तक साथ खाना खिलाते हैं. इसी वजह से मैं सोचती हूं कि वह नहीं जानते होंगे कि खाना लेना चोरी होती है.”

अट्टापडी में मधु में अकेले मानसिक रूप से बीमार शख़्स नहीं थे. डॉ. दास कहते हैं, “राज्य के मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम के तहत 350 मरीज़ दर्ज़ हैं लेकिन 50 मरीज़ ही नियमित रूप से इलाज के लिए आते हैं.”

पहचान न ज़ाहिर करने की शर्त पर एक कार्यकर्ता ने अलग ही सवाल उठाया. उन्होंने कहा, “यह साफ़ है कि यह भूख की वजह से नहीं था. यह मानसिक बीमारी के कारण भी हो सकता है. यह भी हो सकता है कि वह किसी ग़ैर-क़ानूनी चीज़ के बारे में जान गए हों. आमतौर पर मधु जिस गुफ़ा में रहते थे वहां आसानी से कोई नहीं जाता है. उस क्षेत्र में दाख़िल होने से पहले वनकर्मियों को भी अनुमति लेनी होती है. तो वहां कैसे कई लोग पहुंचे और उन्हें पीट-पीटकर मार डाला.” मधु की कथित हत्या मामले में पुलिस ने 14 लोगों को गिरफ़्तार किया है.

साभार बीबीसी

एक्टर इरफ़ान खान ने ट्विटर के जरिये किया अपनी बीमारी का खुलासा

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एक्टर इरफ़ान खान ने 5 मार्च को बताया था कि वो एक ख़तरनाक बीमारी से पीड़ित हैं, जिसके बाद उनके सभी फैंस बीमारी के बारे में अंदाजा लगा रहे है के उनके चहेते एक्टर को क्या बीमारी हो सकती है

शुक्रवार को ट्वीट कर इरफ़ान ने बताया कि उन्हें ‘न्यूरोएंडोक्राइन ट्यूमर’ हैट्वीट में उन्होंने लिखा है, “जीवन में अनपेक्षित बदलाव आपको आगे बढ़ना सिखाते हैं. मेरे बीते कुछ दिनों का लब्बोलुआब यही है. पता चला है कि मुझे न्यूरोएंडोक्राइन ट्यूमर हो गया है. इसे स्वीकार कर माना मुश्किल है. लेकिन मेरे आसपास जो लोग हैं, उनका प्यार और उनकी दुआओं ने मुझे शक्ति दी है. कुछ उम्मीद भी बंधी है. फ़िलहाल बीमारी के इलाज के लिए मुझे देश से दूर जाना पड़ रहा है. लेकिन मैं चाहूंगा कि आप अपने संदेश भेजते रहें.”

अपनी बीमारी के बारे में इरफ़ान ने आगे लिखा है, “न्यूरो सुनकर लोगों को लगता है कि ये समस्या ज़रूर सिर से जुड़ी बीमारी होगी. लेकिन ऐसा नहीं है. इसके बारे में अधिक जानने के लिए आप गूगल कर सकते हैं. जिन लोगों ने मेरे शब्दों की प्रतीक्षा की, इंतज़ार किया कि मैं अपनी बीमारी के बारे में कुछ कहूं, उनके लिए मैं कई और कहानियों के साथ ज़रूर लौटूंगा.”

एनएचएस डॉट यूके के मुताबिक़, ‘न्यूरोएंडोक्राइन ट्यूमर’ एक दुर्लभ किस्म का ट्यूमर होता है जो शरीर में कई अंगों में भी विकसित हो सकता है.

हालांकि मरीज़ों की संख्या बताती है कि ये ट्यूमर सबसे ज़्यादा आँतों में होता है. इसका सबसे शुरुआती असर उन ब्लड सेल्स पर होता है जो ख़ून में हार्मोन छोड़ते हैं.

मरीज़ के शरीर में ये ट्यूमर किस हिस्से में हुआ है, उसी से इसके लक्षण तय होते हैं. मसलन, अगर ये पेट में हो जाए तो मरीज़ को लगातार कब्ज़ की शिक़ायत रहेगी. ये फ़ेफ़डों में हो जाए तो मरीज़ को लगातार बलगम रहेगा. ये बीमारी होने के बाद मरीज़ का ब्लड प्रेशर और शुगर लेवल बढ़ता-घटता रहता है.

न्यूरोएंडोक्राइन ट्यूमर होने के विविध कारण हो सकते हैं. लेकिन ये आनुवांशिक रूप से भी होती है. माना जाता है कि जिनके परिवार में इस तरह के मामले पहले रह चुके हों, वो लोग इसके रिस्क में ज़्यादा होते हैं. कई डिटेल ब्लड टेस्ट, स्कैन और बायोप्सी करने के बाद ही ये बीमारी पकड़ में आती है.

ट्यूमर किस स्टेज में है, वो शरीर में किस हिस्से में है और मरीज़ की सेहत कैसी है. इन सबके आधार पर ही ये तय होता है कि मरीज़ का इलाज कैसे किया जाएगा, सर्जरी के ज़रिए इसे निकाला जा सकता है.

समाजवादी पार्टी के दफ्तर में क्यों लगी बहनजी की तस्वीर

उत्तर प्रदेश। गोरखपुर और फूलपुर उपचुनाव में बसपा के समर्थन से समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार को मिली जीत ने कई चीजें बदल दी है. इस चुनाव के बाद से लेकर अब तक कई बातें ऐसी हुई है, जिसकी कुछ वक्त पहले किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी. मसलन अखिलेश यादव का मायावती के घर जाना और दोनों के बीच घंटे भऱ की मुलाकात. इस मुलाकात ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक ऐसा बदलाव किया है, जिसके बारे में राजनीतिक दिग्गजों ने भी नहीं सोचा होगा.

असल में लखनऊ स्थित समाजवादी पार्टी के दफ्तर के बाहर लगे पोस्टर में अखिलेश यादव के साथ बसपा सुप्रीमो मायावती की तस्वीर भी नजर आ रही है.पोस्टर में फूलपुर और गोरखपुर के उपचुनाव में मिली जीत के लिए आभार प्रकट किया है. पोस्टर में मुलायम सिंह यादव और आजम खान की तस्वीर ऊपर की तरफ बनी है. और नीचे दाएं तरफ सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव और बसपा अध्यक्ष मायावती की तस्वीर साथ-साथ लगी है. खास बात यह भी है कि इसमें अखिलेश यादव से ज्यादा बड़ी तस्वीर बसपा प्रमुख मायावती की लगी है. इसे समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ता तारिक अहमद लारी ने लगवाया है.

तस्वीर समाचार एजेंसी एएनआई ने ट्वीट की है. यह तस्वीर हर किसी का ध्यान खींच रही है, क्योंकि उपचुनाव से पहले तक समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी एक दूसरे के प्रति कठोर रुख रखती रही हैं. अब दोनों पार्टियों के बीच इस करीबी को देखकर सभी लोग भौचक हैं.

छत्तीसगढ़ में मायावती ​ने दिग्गज नेताओं की करवाई घर वापसी

छत्तीसगढ़। चुनाव से पहले बहुजन समाज पार्टी के लिए एक बड़ी खबर है. पार्टी अध्यक्ष कुमारी मायावती के निर्देश के बाद तीन दिग्गज नेताओं की घरवापसी करवा ली गई है. 16 मार्च की देर रात पामगढ़ से तीन बार विधायक रहे वरिष्ठ नेता दाऊ राम रत्नाकर सहित सीपत से विधायक रह चुके रामेश्वर खरे, उदल किरण और आर सी बांझिल को वापस पार्टी में शामिल कर लिया गया है. बसपा प्रमुख मायावती के इस कदम को काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है.

22 मार्च 2011 को इन चारों नेताओं समेत अन्य नेताओं को पार्टी विरोधी गतिविधि में पार्टी से निष्कासित कर दिया गया था. पार्टी ने दाऊ राम रत्नाकर पर पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के करीबी और उन्हें अंदरूनी रुप से लाभ पहुंचाने का आरोप भी लगाया था. लंबे समय तक पार्टी का नेतृत्व करने के कारण रत्नाकर की पार्टी कार्यकर्ताओं में दखल काफी अच्छी थी, लिहाजा उनके निष्कासन के बाद बहुत से कार्यकर्ताओं ने पार्टी से अलविदा कह दिया था, इसके बाद वे रत्नाकर की बनाई हुई “बहुजन समाज मुक्ति मोर्चा” में शामिल हो गए थे. इसके बाद प्रदेश में बसपा पटरी पर नहीं आ सकी. लेकिन अब इस दिग्गज नेता की वापसी से बसपा लड़ाई में आ गई है.

प्रदेश चुनाव को लेकर बसपा कितनी गंभीर है यह रत्नाकर समेत अन्य नेताओं की घर वापसी से साफ समझा जा सकता है. छत्तीसगढ़ संगठन को मजबूत करने के साथ-साथ बसपा अपनी खोई हुई सीटों पर भी वापसी करने का मन बना चुकी है. रत्नाकर की वापसी के फैसले से जहां पुराने कार्यकर्ताओं में खुशी का माहौल है वही आगामी चुनाव में बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद जाग उठी है. 15 मार्च को कांशीराम के जन्मदिन पर ‘सत्ता प्राप्त करो संकल्प’ लेकर बसपा ने विधानसभा चुनाव का बिगुल भी फूंक दिया है.

प्रदेश में बसपा के ताकत की बात करें तो यहां बसपा के 5 लाख 35 हजार से ज्यादा मतदाता हैं, जो राजनीतिक गणित बनाने और बिगाड़ने के लिए काफी है. जब राज्य का गठन हुआ था, तब साल 2003 के विधानसभा चुनाव में बसपा के 3 विधायक चुने गए थे. 2008 में 2 विधायक और साल 2013 में बसपा का एक विधायक हैं. 2018 के विधानसभा चुनाव में बसपा और कांग्रेस के बीच भी गठबंधन की बात चल रही हैं. छत्तीसगढ़ में इस साल के आखिर में चुनाव होने हैं.

कांग्रेस महाअधिवेशन में जारी बुकलेट की पांच खास बातें

नई दिल्ली। दिल्ली के इंदिरा गांधी स्टेडियम में कांग्रेस का 84वां अधिवेशन चल रहा है. इसमें पार्टी अगले पांच साल की दशा-दिशा तय करने में जुटी है. इस दौरान आर्थिक और विदेशी मामलों सहित चार महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किए जाएंगे. ऐसे में कांग्रेस पार्टी ने किसानों को मुख्य रूप से अपने एजेंडे में शामिल किया है. साथ ही रोजगार, अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा को भी कांग्रेस ने प्रमुखता से अपने एजेंडे का हिस्सा बनाया है. इस संबंध में पार्टी ने बुकलेट जारी की हैं, जो पार्टी कार्यकर्ताओं को बांटी जाएंगी. इसमें कांग्रेस ने मोदी सरकार की तमाम योजानओं को नए नारे देकर घेरने की कोशिश की है. बुकलेट की खास बातें यूं है.

1. रोजगार … अच्छे दिन, नौकरी बिन

रोजगार के मामले को राहुल गांधी ने सबसे बड़ा मुद्दा बनाया है. कांग्रेस पार्टी के महाधिवेशन हो रहा है, तो उसमें भी रोजगार की समस्या को उठाया जा रहा है. बुकलेट में एक नारा भी दिया गया कि अच्छे दिन, नौकरी बिन.

2. अर्थव्यवस्था … मेक इन इंडिया प्रोग्राम का शेर दहाड़ने में नाकामयाब रहा

अर्थव्यवस्था से जुड़े सवालों पर मोदी सरकार की योजनाओं को भी कठघरे में खड़ा किया गया है. उज्जवला योजना जैसे फ्लैगशिप प्रोग्राम की सच्चाई बताने का दावा किया है. इसके अलावा मेक इन इंडिया प्रोग्राम का शेर दहाड़ने में नाकामयाब रहा, ऐसे भी आरोप बुकलेट में हैं. आम आदमी की जेब पर पड़ने वाले असर को भी रेखांकित किया गया है. एनपीए को भी इसमें शामिल किया है.

3. किसान

पूरे देश में किसान कर्ज माफी और फसल के सही दामों को लेकर आंदोलन कर रहे हैं. कांग्रेस ने भी मोदी सरकार और बीजेपी की राज्य सरकारों के खिलाफ उपजे किसानों के गुस्से को अपने एजेंडे में शामिल किया है कार्यकर्ताओं से ये मुद्दे उठाने का आह्वान किया है.

4. मोदी सरकार के दौरान लूट

विजय माल्या, नीरव मोदी और मेहुल चोकसी जैसे उदाहरणों के साथ इन घटनाओं को कांग्रेस ने मोदी सरकार की लूट का नाम दिया है. साथ ही ये बताया गया है कि कैसे देश का पैसा लूटने वाले इन बड़े कारोबारियों को विदेश जाने दिया गया.

5. राष्ट्रीय सुरक्षा

सरकार में आने से पहले बीजेपी पाकिस्तान और कश्मीर पर सख्त रुख की पैरोकारी करती थी. कांग्रेस ने सवाल उठाए हैं कि मौजूदा सरकार पाकिस्तान की मदद कर रही है. बुकलेट में कहा गया है कि चीनी सेना पाकिस्तान में बैठे आतंकी मसूद अजहर की मदद करती है और भारत सरकार चीन से लगातार कारोबार बढ़ा रही है और आयात कर रही है. कश्मीर के हालत का भी जिक्र है.

कांग्रेस के महाअधिवेशन में राहुल गांधी के भाषण की 10 बड़ी बातें

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नई दिल्ली। कांग्रेस के 84वें महाधिवेशन में पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी ने भाजपा पर जमकर निशाना साधा. उन्होंने कहा कि देश को बांटने की कोशिश हो रही है. राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि विपक्ष लोगों में जहर घोलने का काम कर रही है. इससे पहले कांग्रेस अधिवेशन के लिए पहुंचे राहुल गांधी को पारंपरिक टोपी पहनाई गई और वंदे मातरम् के साथ झंडा फहराया गया. कांग्रेस ने मोदी सरकार के खिलाफ 5 बुकलेट जारी कर सरकार पर सवाल उठाया है. राहुल गांधी के भाषण की 10 बड़ी बातें-

1. ये देश सबका है, हर धर्म का है, हर जात का है हर व्यक्ति का है, जो भी काम कांग्रेस पार्टी करेगी वो पूरे देश के लिए करेगी. देश के हर व्यक्ति के लिए करेगी और किसी को पीछे नहीं छोड़ेगी.

2. देश के एक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति से लड़ाया जा रहा है. लेकिन हमारा और हमारी पार्टी का काम जोड़ने का काम है.

3. देश में गुस्सा फैलाया जा रहा है, देश को बांटा जा रहा है.

4. युवा कांग्रेस पार्टी को आगे ले जाएंगे तो वरिष्ठ नेताओं के बिना हमारी पार्टी आगे नहीं बढ़ सकती.

5. मेरा काम वरिष्ठ और युवा नेताओं को जोड़ने का है. इन दोनों के साथ मिलकर पार्टी को एक नई दिशा दिखाने का काम है.

6. देश के करोड़ों थके युवा, जो मोदी जी की ओर देखते हैं तो उन्हें रास्ता नहीं दिखाई देता है. उन्हें समझ नहीं आता कि उन्हें रोजगार कहां से मिलेगा. किसानों को सही दाम कब मिलेगा.

7. देश रास्ता खोज रहा है. ऐसे में देश को सिर्फ कांग्रेस पार्टी ही रास्ता दिखा सकती है.

8. कांग्रेस पार्टी और विपक्ष में बहुत बड़ा फर्क है. वो क्रोध और गुस्से का प्रयोग करते हैं और हम प्यार और भाईचारे में यकीन रखते हैं.

9. हम महाधिवेशन के जरिए भविष्य की बात कर रहे हैं. हमारी परंपरा में बदलाव किया जाता है लेकिन बीते हुए समय को भूला नहीं जाता.

10. सेशन का लक्ष्य देश को और कांग्रेस को रास्ता दिखाना है. ये अधिवेशन नेतृत्व का नहीं, कार्यकर्ताओं का है.

महाधिवेशन में दोपहर 3 बजे सोनिया गांधी भी पार्टी नेताओं को संबोधित करेंगी और तमाम बड़े मसलों पर राय रखेंगी. बता दें कि दिल्ली के इंदिरा गांधी इंडोर स्टेडियम में कांग्रेस इस अधिवेशन का आयोजन किया गया है.

अम्बेडकरवादी होने के कारण 15 महीने में 8 ट्रांसफर, सैलरी भी रोकी

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भीलवाड़ा। बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर की बात करना और उनकी प्रतिमा को स्थापित करने के लिए खड़ा होना एक अम्बेडकरवादी के लिए इतना भारी पड़ गया कि उस पर सरकार और विभाग की नजर टेढ़ी हो गई. नतीजा उस पर मनगढंत आरोप लगाकर पिछले पंद्रह महीनों में उसका 8 ट्रांसफर किया जा चुका है और 15 महीनों से विभाग ने उसकी सैलरी रोक दी है. पीड़ित के साथ उत्पीड़न की यह इंतहा तब है जब न तो उसके ऊपर कोई आपराधिक मुकदमा है और न ही विभागीय शिकायत. मामला विधानसभा तक में उठ चुका है लेकिन उसे अभी तक न्याय नहीं मिला है.

घटना राजस्थान के भीलवाड़ा की है. वाल्मीकि जाति के अशोक कुमार चिन्नाल यहां स्वास्थ विभाग में नौकरी करते हैं. अशोक अम्बेडकरवादी हैं और सामाजिक मंचों पर भी सक्रिय रहते हैं. अशोक के गांव भीलवाड़ा जिले के हलेड़ में एक सरकारी जमीन खाली पड़ी थी. 2013 में अशोक सहित तमाम अम्बेडकरवादी इस पर बाबासाहेब की प्रतिमा स्थापित करना चाहते थे. गांव के सरपंच से NOC मिलने के बाद 25 दिसंबर 2013 को वहां बाबासाहेब की प्रतिमा लगा दी गई. सत्ताधारी दल भाजपा के कार्यकर्ताओं ने इसे अपनी जमीन बताते हुए बाबासाहेब की प्रतिमा को तोड़ दिया, हालांकि अशोक सहित अन्य अम्बेडकरवादियों के विरोध के कारण वह इस पर कब्जा नहीं कर सकें. चूंकि अशोक ज्यादा सक्रिय और मुखर थे सो उनको घेरने की कोशिशें शुरू हो गई. 2015 में उन्हें बाबासाहेब की जयंती के बाद एक मामूली शिकायत पर अशोक को घेरने का मौका मिल गया.

अशोक पर न सिर्फ हमला हुआ, बल्कि उनके विभाग ने भी उन्हें परेशान करने में कोई कसर नहीं छोड़ा. आलम यह हुआ कि किसी खास व्यक्ति के इशारे पर विभाग ने उन्हें लगातार परेशान करना शुरू कर दिया. उनके एक के बाद एक ट्रांसफर किए गए और पिछले कई महीनों से उनकी सैलरी रोक दी गई. अशोक का आरोप है कि उनपर हमले किए गए. एक ट्रक दुर्घटना में अशोक के भाई की मौत हो गई, जबकि अशोक गंभीर रूप से घायल हो गए.

अशोक के पक्ष में राजस्थान में बसपा के विधायकों ने मामला विधानसभा तक में उठाया. झूंझुनू के खेतरी से बसपा विधायक पूरण मल सैनी ने विधानसभा में मामले को उठाते हुए अशोक को फिर से पहले की तरह मुख्यालय पर ट्रांसफऱ करने और उनका वेतन बहाल करने की मांग की. उन्होंने बाबासाहेब की खंडित की गई प्रतिमा को भी ठीक कर फिर से स्थापित करने की मांग की, लेकिन इसके बावजूद भी अशोक की परेशानी कम नहीं हुई है.

अशोक का कहना है कि अगर मैंने कोई गलती की है तो पुलिस मुझ पर एफआईआर दर्ज कर कार्रवाई करे. विभाग मुझे क्यों परेशान कर रहा है और मेरा वेतन क्यों रोक दिया गया है, यह मेरी समझ से परे है. अशोक राजस्थान में न्याय का हर दरवाजा खटखटा चुके हैं, लेकिन उन्हें अब तक न्याय नहीं मिला है. अशोक चिन्नाल के पक्ष में अब अम्बेडकरवादी संगठन एकजुट होने लगे हैं. डॉ. भीमराव अम्बेडकर विकास समिति ने राज्यपाल कल्याण सिंह को पत्र लिखकर अशोक के लिए न्याय मांगा है और न्याय नहीं मिलने की सूरत में बड़े आंदोलन की चेतावनी दी है. लेकिन अम्बेडकरवादी होने और बाबासाहेब अम्बेडकर की प्रतिमा स्थापित करने के कारण अशोक जिस तरह पूरे प्रदेश सरकार की नजरों में चुभ गए हैं वह सरकार की सोच पर सवाल उठाता है.

उपचुनावों में मिली जीत बीएसपी और सपा के लिए एक सबक

2014 के लोकसभा और उत्तर प्रदेश में 2017 में हुए विधान सभाई चुनावों में बी. एस. पी. को मिली हार को देखते हुए यह लगने लगा था कि बी. एस. पी. का वोट बैंक खिसक रहा है. उस दौरान पड़े वोटों का प्रतिशत जिस गति से बढ़ा, उससे लग तो रहा था कि बी.एस.पी. निश्चित रूप से नीचे खिसकेगी, किंतु इतना बुरा हाल होगा यह कतई नहीं सोचा था. यह भी नहीं लग रहा था कि बढ़ा हुआ वोट किसी एक करवट बैठ जाएगा, जैसा कि हुआ. सभी दलों की सभाओं में अप्रत्याशित भीड़ जुटी. क्षेत्रीय दलों की सभाओं में भी अच्छी- भीड़ देखी गई.  किन्तु वो मतों में परिवर्तित नहीं हो सकी. सोचा था कि बढ़ा हुआ वोट बिखरेगा, किंतु ऐसा हुखासीआ नहीं. आखिर क्यों? यह एक सोचनीय विषय है. किंतु उत्तर प्रदेश में हुए निकाय चुनावों में बसपा को मिली कामयाबी और फूलपुर और गोरखपुर में हुए हालिया दो उपचुनावों में बसपा के समर्थन से सपा को मिली जीत ने सिद्ध कर दिया कि बसपा का वोटर आज भी कायम है.

वर्ष 2007 के विधान सभा चुनावों में बी.एस.पी. को 85 आरक्षित सीटों में से 61 आरक्षित सीटों पर जीत मिली थी. जबकि इस बार बी.एस.पी. की सबसे बड़ी हार केवल दलितों के लिए आरक्षित सीटों पर ही हुई थी. इसका कारण यह रहा कि अन्य दलों ने बी.एस.पी. के दलित उम्मीदवारों के खिलाफ कई-कई निर्दलीय दलित उम्मीदवार मैदान में उतार दिए. परिणाम यह हुआ कि दलित वोटों का तो बिखराव हो गया और गैर-दलित मत बी.एस.पी. के खाते में आए ही नहीं. फलत: आरक्षित सीटों पर बी.एस.पी. के उम्मीदवार ही ज्यादा हारे. यह एक सोची-समझी साजिश थी. प्रतिक्रियात्मक दृष्टिकोण से कहा जा सकता है कि आरक्षित सीटों पर समाज विरोधी दलितों ने अन्य दलों के जाल में फंसकर बी.एस.पी. के खिलाफ काम किया. यहाँ यह सवाल भी उठ सकता है कि फिर सामान्य सीटों पर बी.एस.पी. के उम्मीदवार कैसे जीत जाते हैं. प्रश्न बेशक जायज है. इसके उत्तर में इतना ही कहा जा सकता है कि सामान्य सीटों पर चुनाव लड़ रहे बी.एस.पी. के उम्मीदवारों के हक में दलित मतों का लगभग 80-85 प्रतिशत मत तो मिल ही जाते हैं, साथ ही गैर-दलितों के मत भी बी.एस.पी. के खाते में चले जाते हैं. किंतु 2017 के चुनावों में ऐसा कुछ भी नहीं हो पाया.

 बी.एस.पी. के आला कमान को यह भी नहीं भूलना चाहिए कि बी.एस.पी. का जमीनी कार्यकर्त्ता हवाई यानी गली-कूचे की नेतागीरी करने में ज्यादा रुचि लेने लगा है. काम करने में कम. यहां तक कि वोटरों के घरों तक वोटर-पर्चीयां तक नहीं पहुँचा पाते. नतीजा ये होता है कि बी.एस.पी. के वोटरों का लगभग 10-12 प्रतिशत वोट ही नहीं डाल पाता. यहां तक कि ज्यादातर वोटरों को अपने पोलिंग बूथ का ही पता नहीं होता. इलाकाई कार्यकर्त्ताओं से पूछने पर भी कोई सकारात्मक उत्तर नहीं मिलता. बूथ पर व्यवस्था के नाम पर कुछ भी दिखाई नहीं देता.

  दिक्कत एक और भी है कि दलितों में शामिल कुछेक जातियां अपने आपको दलित मानने को ही तैयार नहीं हैं.  संविधान के आर्टिकल 16.4 के तहत अन्य पिछड़ा वर्ग भी दलितों में आता है. किंतु अफसोस कि वो अपने आप को ब्राह्मण ही मानने पर उतारू है जिसके चलते समूचे दलित समाज का अनहित हो रहा है.

इस संबंध में जे.एन.यू के प्रोफेसर डॉ. विवेक कुमार कहते हैं, “इस प्रकार हिन्दुत्व बहुजनवाद पर भारी पड़ गया. 1978 के पश्चात जातीय अस्मिताओं का प्रयोग कर जिस उत्तर प्रदेश में बामसेफ, डीएस-4 तथा बहुजन समाज पार्टी के सहारे “बहुजन” का एक बड़ा समीकरण बना था, उस समीकरण को बीजेपी ने अपने तौर पर चुनौती दी. इस जातीय अस्मिता के नवीन समीकरण का सूत्रपात करने वाले स्वयं नरेन्द्र मोदी थे. मोदी ने उप्र की जनसभाओं में अपनी अस्मिता को खूब उछाला. उन्होंने अपने आपको पिछड़े वर्ग का बताया. उन्होंने एक रैली में यहाँ तक कहा – “आने वाला दशक पिछड़ों एवं दलितों का होगा.”  मैं समझता हूँ कि मोदी यहाँ दलितों और पिछड़ों के नाम एक अप्रत्यक्ष सवाल भी छोड़ जाते हैं. और वह सवाल है कि अब दलितों और पिछड़ों को सोचना होगा कि वो परम्परागत जातिगत और धार्मिक व्यवस्था अर्थात साम्प्रदायिकता का हिस्सा बनकर जीना चाहते हैं अथवा दलितों और पिछड़ों के तमाम के तमाम राजनीतिक घटक तमाम मतभेदों को भुलाकर एक होकर समाज के दमित और वंचित वर्ग को आगे बढ़ने का मार्ग प्रशस्त करते हैं.

 जाहिर है कि मोदी तो यही चाहेंगे कि दलित और पिछड़े लोग बीजेपी के साथ ही बने रहें. आखिर मोदी के भी तो अपने निजी निहित हैं. अब यह दलितों और पिछड़ों को सोचना है कि उनका भला कहाँ है. यह भी जाहिर है कि यदि दलित और पिछड़े वर्ग से आने वाले तमाम नेता यदि अपने-अपने निजी स्वार्थो और जातीय अहम को छोड़कर पिछले चुनावों में प्राप्त मतों के प्रतिशत के आधार पर एक होकर चुनाव लड़ते हैं तो 2019 के आम चुनावों के नतीजे कुछ अलग ही होंगे. यदि ऐसा हो पाता है तो उम्मीद की जा सकती है कि भारत में मानवाधिकारों की किसी हद तक रक्षा हो सकती है, अन्यथा नहीं.

दिक्कत एक और भी है कि दलितों में शामिल कुछेक जातियां अपने आपको दलित मानने को ही तैयार नहीं हैं. संविधान के आर्टिकल 16.4 के तहत अन्य पिछड़ा वर्ग भी दलितों में आता है, किन्तु अफसोस कि वो अपने आप को ब्राह्मण ही मानने पर उतारू है जिसके चलते समूचे दलित समाज का अनहित हो रहा है.  मेरा मानना है कि यदि बी.एस.पी. और सपा आपस में एक हो जाएं तो इनके हाथों में न केवल राज्यों की सता होगी अपितु केंद्रीय-सत्ता भी इनके हाथों में ही होगी. अक्सर देखा गया है कि किसी भी उपचुनाव में प्राय: सत्ताधारी दल की ही जीत होती है, मगर उत्तर प्रदेश में इस बार ऐसा न हो सका. अत: हाल ही में उत्तर प्रदेश में फूलपुर और गोरखपुर में हुए उपचुनावो में बी. एस. पी. के समर्थन से सपा के प्रत्याशियों की भारी जीत तो इस ओर ही संकेत कर रही है. पर इन्हें समझाए कौन? जरूरत है तो केवल निजित्व की भावना से उबरकर सामाजिक हितों की साधना हेतु काम करने की. अब 2019 के लोकसभा चुनाव होने हैं, देखते हैं क्या होगा?

 लेखक:  तेजपाल सिंह तेज चर्चित पत्रिका अपेक्षा के उपसंपादक, आजीवक विजन के प्रधान संपादक तथा अधिकार दर्पण नामक त्रैमासिक के संपादक रहे हैं. स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त होकर आप इन दिनों स्वतंत्र लेखन के रत हैं. हिन्दी अकादमी (दिल्ली) द्वारा बाल साहित्य पुरस्कार ( 1995-96) तथा साहित्यकार सम्मान (2006-2007) से सम्मानित किए जा चुके हैं.

 

क्या दलित और मुसलमान तय करेंगे कर्नाटक का राजनीति भविष्य?

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न्यूज 18 ने जनगणना के आंकड़ों में जो पाया उसके मुताबिक, दलितों और मुस्लिमों की संख्या लिंगायत और वोक्कालिगा की जनसंख्या से अधिक है. राज्य में अनुसूचित जातियों की संख्या कुल आबादी की 19.5% है जो कि राज्य में सबसे बड़े जातीय समूह के रूप में उभरा है. इसके बाद मुस्लिमों का स्थान है जो कि राज्य की कुल जनसंख्या का 17 प्रतिशत हैं. इन दोनों समुदायों के बाद लिंगायत व वोक्कालिगा का स्थान आता है जो कि क्रमशः 14 फीसदी व 11 फीसदी हैं.

अन्य पिछड़ा वर्गों में कुरुबा राज्य की कुल जनसंख्या में अकेले 7 फीसदी हैं. बता दें कि राज्य में 20 फीसदी जनसंख्या अन्य पिछड़ा वर्ग की है. आंकड़ों के अनुसार राज्य में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, मुसलमान व कुरुबा की जनसंख्या को मिला दें तो ये राज्य की कुल जनसंख्या की 47.5 फीसदी जनसंख्या हो जाती है. मुख्यमंत्री के AHINDA (अल्पसंख्यक, पिछड़ा वर्ग व दलित) वर्ग को अपनी ओर करने का समीकरण अचूक है, जिसकी सफलता कांग्रेस को जीत के काफी नज़दीक ला सकती है. हालांकि लिंगायत व वोक्कालिगा दोनों जातियों ने इस डेटा को नकारा है. वीराशैव-लिंगायत महासभा की राष्ट्रीय सचिव एचएम रेणुका प्रसन्ना ने कहा कि जस्टिस ‘चिन्नप्पा रेड्डी कमीशन’ की रिपोर्ट के अनुसार 1980 में हमारी जनसंख्या राज्य की कुल जनसंख्या की 16.92 फीसदी थी और ‘हवनूर कमीशन’ के अनुसार हमारी जनसंख्या 17.23 फीसदी थी. तो ये कैसे संभव है कि 30 सालों बाद हमारी आबादी अब घटकर मात्र 14 फीसदी रह गई हो. प्रसन्ना ने आरोप लगाया कि सिद्धारमैया वास्तविक आंकड़ों के साथ अपने लाभ के अनुसार खेल रहे हैं. वोक्कालिगा समुदाय का भी यही मानना है. सरकार में ही वोक्कालिगा समुदाय के एक मंत्री ने कहा कि वोक्कालिगा की कुल जनसंख्या राज्य की कुल जनसंख्या की 16 फीसदी है न कि 11 फीसदी. एक वोक्कालिगा ब्यूरोक्रेट ने कहा कि यदि ये आंकड़े सही हैं तो पिछले 70 सालों से जो दबदबा कर्नाटक की राजनीति में वोक्कालिगा और लिंगायत का बना हुआ था वो खत्म हो जाएगा और आगे से अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, कुरुबा व मुसलमान ही कर्नाटक के भाग्य का निर्णय करेंगे. हालांकि मुख्यमंत्री सिद्दारमैया ने इसे अफवाह बताया और कहा कि सरकार ने ऐसा कोई डेटा जारी ही नहीं किया है. उन्होंने इस पर कोई भी टिप्पणी करने से मना कर दिया. कर्नाटक के बीजेपी अध्यक्ष बीएस येदियुरप्पा और जेडीएस के राज्य प्रमुख एचडी कुमारस्वामी ने कहा कि सिद्धारमैया सरकार राज्य को फिर एक बार जातिगत आधार पर बांटने की कोशिश कर रही हैं. सूत्रों के मुताबिक कांग्रेस सरकार अभी दुविधा में है कि रिपोर्ट को सार्वजनिक किया जाए कि नहीं क्योंकि इससे वोक्कालिगा व लिंगायत समुदाय नाराज़ हो सकता है और इससे सामाजिक-राजनीतिक उथल-पुथल मच सकती है. एक अधिकारी ने बताया कि चुनावों के पहले जातिगत जनगणना के आधार पर मिले आंकड़ों को जारी नहीं किया जायेगा, क्योंकि ये बहुत खतरनाक साबित हो सकता है. जातिगत जनगणना के अनुसार राज्य में दलित 19.5 प्रतिशत, अनुसूचित जनजाति 5 प्रतिशत, मुसलमान 16 प्रतिशत, कुरुबा 7 प्रतिशत, बाकी के ओबीसी 16 प्रतिशत, लिंगायत 14 प्रतिशत, वोक्कालिगा 11 प्रतिशत, ब्राह्मण 3 प्रतिशत, ईसाई 3 प्रतिशत, बौद्ध व जैन 2 प्रतिशत बाकी के 4 प्रतिशत हैं.  कर्नाटक की कुल जनसंख्या 6 करोड़ है जिसमें 4.90 करोड़ रजिस्टर्ड मतदाता हैं. साभार न्यूज 18

केजरीवाल के खिलाफ आप के पंजाब इकाई में बगावत

नई दिल्ली। दिल्ली के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल द्वारा अकाली नेता बिक्रम सिंह मजीठिया से लिखित में माफी मांगने के बाद आप के भीतर बगावत छिड़ गया है. इस माफी से पार्टी के सांसद और पंजाब अध्यक्ष भगवंत मान ने पंजाब प्रदेश अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा दे दिया है.

मान ने खुद ही ट्विट कर इसकी जानकारी दी. भगवंत मान ने ट्वीट किया, ”मैं पंजाब प्रदेश अध्यक्ष के पद से इस्तीफा दे रहा हूं. ड्रग माफिया के ख़िलाफ मेरी लड़ाई जारी रहेगी. पंजाब के आम आदमी होने के नाते मैं भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई भी जारी रखूंगा.” दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने पंजाब के एक कोर्ट में हलफ़नामा दाख़िल कर शिरोमणि अकाली दल के महासचिव बिक्रम सिंह मजीठिया से माफ़ी मांगी थी.

पिछले साल हुए पंजाब विधानसभा चुनाव के दौरान अरविंद केजरीवाल ने बिक्रम सिंह मजीठिया के कथित तौर पर पंजाब के ड्रग माफ़िया के साथ संबंध होने के आरोप लगाए थे. इन आरोपों को ग़लत बताते हुए बिक्रम सिंह मजीठिया ने केजरीवाल, आप सांसद संजय सिंह और पार्टी प्रवक्ता आशीष खेतान के ख़िलाफ़ अमृतसर कोर्ट में मानहानि का मुक़दमा कर दिया था. केजरीवाल के माफी मांगने के बाद उन्होंने भी मामला खत्म कर दिया. गुरुवार शाम को मजीठिया ने केजरीवाल का माफ़ीनामा ट्वीट किया था.

तो क्या 2019 में मायावती बनेंगी विपक्ष की धुरी!

गोरखपुर और फूलपुर उपचुनावों में सपा-बसपा गठबंधन को मिली जीत के बाद देश की राजनीतिक फिजां बदलने लगी है. वैसे तो भाजपा को मध्यप्रदेश, राजस्थान और बिहार उपचुनाव में भी हार का मुंह देखना पड़ा था, लेकिन यूपी की हार सिर्फ दो सीटों की हार नहीं थी. असल में गोरखपुर और फूलपुर की हार भाजपा के किले के दरकने जैसा है. पिछले तीन दशक से पूर्वांचल का सबसे मजबूत गढ़ बने गोरखपुर की हार भाजपा के एक मजबूत किले के ढहने जैसा है. गोरखपुर और फूलपुर देश के सबसे बड़े सूबे के मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री की हार है. भाजपा को मिली इस हार के पीछे सबसे बड़ा कारण बहुजन समाज पार्टी और इसकी मुखिया मायावती बन कर उभरी हैं.

भाजपा की हार के बाद उनके बयान से विपक्षी दलों की सुगबुगाहट तेज हो गई है. गोरखपुर और फूलपुर की जीत के बाद कुमारी मायावती ने कहा कि उन्होंने भाजपा को सबक सिखाने के लिए सपा को समर्थन दिया था. साथ ही उनका यह बयान भी चर्चा में है कि भाजपा के खिलाफ समूचे विपक्ष को साथ आना चाहिए. बसपा प्रमुख के इस बयान के बाद यह चर्चा तेज हो गई है कि मायावती 2019 चुनाव के केंद्र में रहेंगी. समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने जिस तरह से मायावती को लेकर अपनी रुचि दिखाई है, उससे यह भी लग रहा है कि सपा को मायावती को आगे रखकर चुनाव लड़ने में कोई दिक्कत नहीं होगी.

भाजपा को हराने के लिए जिस तरह से विपक्ष गोलबंद हो रहा है उसमें बसपा की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है. अब तक गठबंधन की राजनीति से दूर रही बसपा का नजरिया भी अब गठबंधन की राजनीति को लेकर बदलने लगा है. 15 मार्च को चंडीगढ़ की रैली में भी मायावती ने गठबंधन की राजनीति का संकेत दे दिया है. ऐसे में अगर राष्ट्रीय स्तर पर कोई गठबंधन होता है तो मायावती एक महत्वपूर्ण फैक्टर बनकर सामने आएंगी. कांग्रेस के अलावा तमाम विपक्षी दलों में मायावती इकलौती ऐसी नेता और बहुजन समाज पार्टी इकलौती ऐसी पार्टी है, जिसके समर्थक देश भर में हैं. और वह हर प्रदेश में सहयोगी पार्टी को अपना वोट ट्रांसफर करवाने में सक्षम है.