भाजपा नेता का दलित प्रेमः दलित के घर होटल का खाना

लखनऊ। पार्टी के दबाव और वोट के लालच में भाजपा के नेता भले ही दलितों की चौखट लांघने को तैयार हो जा रहे हैं, उनके भीतर का ‘जातिवाद’ अब भी मौजूद है. यूपी में दलितों के घर एडवेंचर करने पहुंच रहे सरकार के मंत्री दलितों के घर तो चले जा रहे हैं, लेकिन दलितों के घर का खाना उनकी हलक के नीचे नहीं उतर रहा है.

योगी सरकार में राज्य मंत्री सुरेश राणा मंगलवार को जब अलीगढ़ में एक दलित के घर खाना खाने पहुंचे. लेकिन वहां पहुंच कर उन्होंने लाव-लश्कर के साथ होटल से मंगाया हुआ खाना खाया. मंत्री अलीगढ़ की तहसील खैर इलाके में जब खाना खाने पहुंचे तो उन्होंने वहां सलाद, दाल-मखनी, छोले-चावल, पालक-पनीर, उड़द की दाल, मिक्स वेज, रायता, तंदूरी रोटी के अलावा मिठाई में गुलाब-जामुन, कॉफी और मिनरल वाटर का लुत्फ उठाया. इतना ही नहीं बीजेपी की ओर से कोशिश है कि सरकार के मंत्री दलित के घर ही रात गुजारें और खाना वहां पर खाएं. लेकिन, सुरेश राणा दलित के घर पर रुकने की बजाय सामुदायिक केंद्र में रुके जहां उनके आराम के लिए पूरा इंतजाम किया गया था.

इससे पहले मुख्यमंत्री योगी भी निशाने पर रह चुके हैं. योगी आदित्यनाथ ने भी प्रदेश के प्रतापगढ़ इलाके में दलित परिवार के घर जाकर खाना खाया था. लेकिन वहां योगी के लिए उन्हीं की मंत्री स्वाति सिंह रोटी सेकती देखी गईं.

 

That’s how India celebrated Buddha Poornima!

2018 Buddha Poornima, was a day of celebration and reverence as the day went by in India. We present you updates from various corners of the country where Buddha Poornima was celebrated with reverence and Dhamma values were shared and propagated.

Starting on the day of 26th April, an All India Buddhist Conference was held at Bamiyan Buddha Vihar, AmbedkarPuram, Saharanpur, Uttar Pradesh. Bauddha Dhamma Unnati Samajik Sansthan, Sahranpur, Uttar Pradesh and Metta Maitri Sangha, Nagpur organized this conference. During this10 day Dhamma camp in Bamiyan Buddha Vihar, there was active discussion and participation from participants from varied age groups. Vigorous discussions on topics such as: ‘Buddha’s Dhamma as spirituality or social revolution, need of Dhamma or Dharma in politics today, use of Dhamma in day to day life, Vipassana a part of Buddhism or Vipassana is whole Buddhism occurred. This ten-day camp from 16th April to 25th April was abuzz with activity with teachings of Buddha being propagated through various mediums such as Meditation, Exercise, Karate basics, Vandana_trisharan Panchasheel, 3 sessions with various topics in Buddhism, Games and feedback session under the guidance of Bhante Suniti and Bhikunni Maitiya. Not only that, Bhante Suniti and Bhikkuni Maitiya took the participants for one day educational tour to Kalsi, Uttarakhand, to observe Edicts of Ashoka, also known as Ashok Sila lekh and visited Mindrolling Tibetian Seminary at Dehradun. On the day of Buddha Poornima, Buddhist citizens of Dehradun observed a Dhamma Parikrama for world peace and harmony. Organized by Doon Buddhist Committee at Parade Ground, Dehradun, the celebrations were graced by the presence of His Eminence Choegon Rinpoche Tenzin Chokyi Gyatso. During this 2562 Buddha Poornima celebration at Dehradun, His Eminence spoke of not only Buddha and his Dhamma but also the transition that the country is going through. The transition from the times when Gandhi’s portrait was always placed before His Holiness Dalai Lama to now when in 2018 Babasaheb Ambedkar’s portrait has replaced Gandhi. On this occasion, Bahujan singer-song writer, Himanshu unveiled his debut audio Cd, “Mahakarunic the Lord Buddha.” This event saw a gathering of about one and half thousand people. Slums of marginalized communities at Panchsheel Nagar, Sion, Mumbai were pulsating with Bhim songs of revolutionary balladeer and Dalit activist, Shambha ji Bhagat. The man who is known for his fearless clarity, ‘we are not here to entertain you, we are here to disturb you.’ Speaking to the balladeer about his Buddha Poornima celebration he shared, “the audience that I have been performing for years is now going through a transition; a sociological change perhaps. Earlier people took time to understand what our songs were all about but now, the audience is aware of the nuances of our political commentary. Now the audience has evolved to understand whom are we talking about and what system are we attacking. Interestingly during this transition women’s participation has considerably increased.” Nagpur’s Bheem Chowk saw massive participation from various Buddhist rallies from different Buddha Vihars. In presence of Bhikkuni Sumedha, Bhante Suniti and Bhikkuni Maitriya, the evening began with Buddha vandana, Trisharan, Panchasheel, candle lighting, and garlanding of Babasaheb’s statue. A small pravachan and kheer daan also occurred.

​ JYOTI NISHA

4 दिन में ‘एवेंजर्स: इन्फिनिटी वॉर’ ने कमाए 100 करोड़

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हॉलीवुड सुपरहीरो फिल्म ‘एवेंजर्स: इन्फिनिटी वॉर’ दुनियाभर में कमाई के नए रिकॉर्ड स्थापित कर रही है. फिल्म के इंडियन बॉक्स ऑफिस कलेक्शन ने ट्रेड एक्सपर्ट्स को भी चौंका दिया है. एवेंजर्स ने 4 दिनों में 147.21 करोड़ रुपये की ग्रॉस कमाई कर ली है. भारत में इस सुपरहीरो फ्लिक की ताबड़तोड़ कमाई ने कई पिछली हॉलीवुड फिल्मों के रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए हैं. अप्रैल के आखिरी हफ्ते में रिलीज हुई एवेंजर्स ने बॉलीवुड बॉक्स ऑफिस के कलेक्शन ग्राफ को कई प्रतिशत ऊपर कर दिया है. ट्रेड एक्सपर्ट तरण आदर्श ने एवेंजर्स को गेम चेंजर बताया है. उनका अनुमान है कि ये फिल्म आसानी से ‘द जंगल बुक’ के लाइफटाइम बिजनेस को तोड़ देगी. साथ ही भारत में सबसे ज्यादा कमाई करने वाली हॉलीवुड फिल्म बनकर उभरेगी.  

यूपी बोर्ड की परीक्षा को लेकर जरूरी खबर

लखनऊ। उत्तर प्रदेश बोर्ड की परीक्षा को लेकर कुछ बदलाव किए गए हैं. यह जानकारी परीक्षा में बैठने वाले बच्चों से लेकर उनके अभिभावकों के लिए महत्वपूर्ण है. अगले वर्ष से यूपी बोर्ड में हर विषय के दो पेपर होने की बजाय एक ही पेपर की परीक्षा होगी. कई बार बेवजह परीक्षाओं की तारीखें बढ़ती रहती थी, आने वाले साल से परीक्षाओं को भी 15 दिन में समेटा जाएगा. इसे वर्ष 2018-19 के शैक्षिक सत्र में लागू कर दिया गया है.

माध्यमिक शिक्षा परिषद की सचिव नीना श्रीवास्तव के मुताबिक, इस सत्र से एनसीईआरटी का पाठ्यक्रम लागू हो रहा है. सीबीएसई में एनसीईआरटी का पाठ्यक्रम लागू है और वहां हाईस्कूल व इंटर में हर विषय के एक-एक प्रश्नपत्र की परीक्षा होती है. एक ही पेपर होने से एक तरफ जहां विद्यार्थियों पर दबाव कम होगा वहीं मूल्यांकन व परीक्षा परिणाम तैयार करने में भी कम समय लगेगा. वहीं उत्तर पुस्तिकाएं और प्रश्नपत्र भी कम छपवाने पड़ेंगे. एनसीईआरटी ने दो की जगह एक पेपर करने की सारी कवायद पूरी कर ली गई है. अब इसमें नौंवी और 11वीं के प्रश्न नहीं पूछे जाएंगे. अभी तक कक्षा 9-10 के सवाल हाईस्कूल में और 11-12वीं के पाठ्यक्रम के सवाल इंटरमीडिएट में पूछे जाते थे.

वहीं अगले वर्ष भी बोर्ड परीक्षाएं फरवरी में करवाई जाएंगी. प्रयोगात्मक परीक्षाएं दिसंबर 2018 में शुरू होंगी. इसके लिए छात्र-छात्राओं के पंजीकरण के लिए वेबसाइट खोल दी गई है. परीक्षा के फॉर्म अगस्त में भरवाए जाएंगे. ऐसे में जरूरी है कि परीक्षार्थी और अभिभावक संभावित समय को ध्यान में रखते हुए परीक्षा की तैयारी करें.

कैराना उपचुनाव में भाजपा के लिए मुसीबत

लखनऊ। उत्तर प्रदेश की कैराना लोकसभा सीट के लिए होने वाले आगामी उपचुनाव को लेकर एक बार फिर हलचल तेज हो गई है. इस सीट को लेकर भाजपा नेताओं में डर का माहौल है. जातीय समीकरणों के लिहाज से सपा-बसपा का गठबंधन भाजपा के सामने अपनी सीट बरकरार रखने के लिये कड़ी चुनौती साबित हो सकता है.

मुस्लिम और दलित बहुल कैराना सीट पर सपा और बसपा मिलकर उसके सामने फिर कड़ी चुनौती पेश कर सकती हैं. इस लोकसभा सीट के लिये उपचुनाव 28 मई को होगा. वर्ष 2014 में हुए लोकसभा चुनाव में ‘मोदी लहर’ और राजनीतिक रूप से खासा दबदबा रखने वाले मुनव्‍वर हसन के परिवार में वोटों के बंटवारे के बीच भाजपा के हुकुम सिंह ने कैराना लोकसभा सीट जीती थी. अब उनके निधन के बाद यह सीट खाली हुई है. उपचुनाव की तारीख़ का ऐलान होने से पहले ही यहां चुनावी माहौल बनना शुरू हो चुका था. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा रिक्‍त की गयी गोरखपुर और उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य द्वारा छोड़ी गयी फूलपुर लोकसभा सीट पर मिली हार के बाद भाजपा कैराना लोकसभा उपचुनाव को लेकर बेहद सतर्क है.

कैराना लोकसभा क्षेत्र में लगभग 17 लाख मतदाता हैं. इनमें तीन लाख मुसलमान, लगभग चार लाख पिछड़े और करीब डेढ़ लाख वोट जाटव दलितों के हैं, जो बसपा का परम्‍परागत वोट बैंक माना जाता है. यहां यादव मतदाताओं की संख्‍या कम है ऐसे में यहां दलित और मुस्लिम मतदाता खासे महत्‍वपूर्ण हो जाते हैं. इस क्षेत्र में हसन परिवार का खासा राजनीतिक दबदबा माना जाता रहा है.

वर्ष 1996 में इस सीट से सपा के टिकट पर सांसद चुने गये मुनव्‍वर हसन की पत्‍नी तबस्‍सुम बेगम वर्ष 2009 में इस सीट से संसद जा चुकी हैं. वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में इस परिवार में टूट हुई थी. तब मुनव्‍वर के बेटे नाहीद हसन सपा के टिकट पर और उनके चाचा कंवर हसन बसपा के टिकट पर चुनाव लड़े थे, मगर दोनों को पराजय का सामना करना पड़ा था. हालांकि नाहीद दूसरे स्‍थान पर रहे थे.

इस सीट पर राष्‍ट्रीय लोकदल (रालोद) भी प्रभावी रहा है और वर्ष 1999 तथा 2004 के लोकसभा चुनाव में उसके प्रत्‍याशी यहां से सांसद रह चुके हैं. अगर सपा, बसपा के साथ रालोद का वोट भी जुड़़ जाता है तो भाजपा के लिये मुश्किल और बढ़ सकती है.

बौद्ध धर्म क्यों अपना रहे हैं भारत के दलित?

रविवार की रात को बुद्ध पूर्णिमा के पावन अवसर पर गुजरात के ऊना गांव के दलित परिवार समेत राज्य के विभिन्न स्थानों से आये 300 से अधिक दलितों ने अंबेडकर द्वारा प्रचारित बौद्ध धर्म को अंगीकार किया.

बौद्ध धर्म के मानने वालों के लिए बुद्ध पूर्णिमा सबसे अधिक महत्वपूर्ण दिन है. वैशाख में पड़ने वाली इस पूर्णिमा के दिन ही शाक्य कुल के राजा शुद्धोधन के घर में सिद्धार्थ का जन्म हुआ था, इसी दिन लंबी तपश्चर्या के बाद सिद्धार्थ गौतम को ज्ञान की प्राप्ति हुई और वे विश्व में बुद्ध के नाम से विख्यात हुए और इसी दिन उनका परिनिर्वाण हुआ. रविवार की रात को बुद्ध पूर्णिमा के पावन अवसर पर गुजरात के ऊना गांव के उस दलित परिवार समेत 300 से अधिक दलितों ने बौद्ध धर्म को अंगीकार किया. इस परिवार के सदस्यों को जुलाई 2016 में हिंदुत्व से प्रेरित तथाकथित गौरक्षकों ने बेरहमी के साथ कोड़ों से मारा था.

इसके पहले 11 अप्रैल को महाराष्ट्र के शिरसगांव में 500 से अधिक दलितों ने बौद्ध धर्म अपनाया था. इन दोनों घटनाओं को पिछले सालों में लगातार बढ़े जातिगत तनाव और बढ़ते जा रहे अत्याचारों के खिलाफ दलितों के सामाजिक-राजनीतिक प्रतिरोध के रूप में देखा जा रहा है.

दिलचस्प बात यह है कि गुजरात विधानसभा में भारतीय जनता पार्टी के विधायक प्रदीप परमार भी धर्मांतरण के समय उपस्थित थे और उनका कहना था कि वह विधायक केवल इसलिए हैं क्योंकि भीमराव अंबेडकर ने ऐसा संविधान बनाया कि एक दलित होते हुए भी वह विधायक बन पाए. जब से केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार आयी है, तब से देश भर में गौरक्षा के नाम पर मुसलमानों और दलितों पर हमले बढ़े हैं और इस कारण जातिगत एवं साम्प्रदायिक तनाव में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है. ऐसा नहीं है कि इस सरकार के सत्तारूढ़ होने के पहले स्थिति बहुत बेहतर थी. हिन्दू समाज की सवर्ण जातियों में दलितों के प्रति स्वाभाविक रूप से हिकारत और नफरत का भाव रहता है जिसके पीछे जातिगत श्रेष्ठता की भावना है.

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार वर्ष 2007 और 2017 के बीच दस सालों के दौरान दलितों के प्रति अपराधों में 66 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई और दलित महिलाओं पर होने वाले बलात्कारों की संख्या दो गुनी हो गयी. इसलिए उत्तर प्रदेश हो या महाराष्ट्र या गुजरात या राजस्थान, दलितों के बीच बेचैनी और असंतोष बढ़ता जा रहा है और पिछले एक साल से इसकी अभिव्यक्ति धरनों, प्रदर्शनों और आन्दोलनों के माध्यम से हो रही है. उत्तर प्रदेश में चंद्रशेखर रावण और गुजरात में जिग्नेश मेवाणी इसी प्रक्रिया के दौरान उभरे युवा दलित नेता हैं.

समस्या यह है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके जैसे अन्य हिंदुत्ववादी संगठन अंबेडकर के जीवनकाल में हमेशा उनका विरोध और ‘मनुस्मृति’ जैसे जातिव्यवस्था के पोषक एवं समर्थक धर्मग्रंथों का समर्थन करते रहे. इसलिए अब जब प्रधानमंत्री मोदी अंबेडकर की प्रशंसा करते हैं, बौद्ध भिक्षुकों को दलितों के बीच अपने संदेश के साथ भेजते हैं और उनकी पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जब दलितों के घरों में जाकर वहां खाना खाने के बहुप्रचारित और सार्वजनिक आयोजन करते हैं, तो इस सबको दलित गंभीरता से नहीं लेते और इसे केवल दिखावा और छलावा ही समझते हैं. अंबेडकर ने तो अपनी मृत्यु से लगभग बीस वर्ष पहले घोषणा कर दी थी कि उनका जन्म भले ही एक हिन्दू के रूप में हुआ हो, उनकी मृत्यु हिन्दू के रूप में नहीं होगी. अपनी मृत्यु से दो माह पहले अक्टूबर 1956 में अपने हजारों अनुयायियों के साथ अंबेडकर ने हिन्दू धर्म त्याग कर बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिया था और तभी से प्रतिवर्ष दलित अपना असंतोष और विरोध व्यक्त करने के लिए धर्मांतरण का सहारा लेते हैं.

अगले साल लोकसभा चुनाव होने वाले हैं और उसके पहले कई विधानसभा चुनाव होने हैं. दलितों की आबादी भारत की कुल आबादी का लगभग बीस प्रतिशत है. अब इस आबादी को दबा कर रखना अधिक से अधिक मुश्किल होता जा रहा है लेकिन फिर भी सरकारें उनके उत्थान के लिए सार्थक और कारगर उपाय करने के बजाय केवल प्रतीकात्मकता का सहारा लेती हैं. आने वाले दिनों में इन प्रतीकात्मक कदमों का कोई खास असर होने वाला नहीं है क्योंकि अब दलितों के बीच अपनी अस्मिता, आत्मगौरव और अधिकार की चेतना बढ़ रही है. उनकी समस्याओं का समाधान बुनियादी सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक परिवर्तनों के नहीं होने वाला. अब उनके बीच पढ़े-लिखे और आधुनिक चेतनासम्पन्न युवाओं का नेतृत्व पनप रहा है. यह नेतृत्व समाज में सम्मान के साथ जीने का अधिकार और सत्ता में वाजिब हिस्सेदारी मांग रहा है. उसके बिना यह संतुष्ट होने वाला नहीं. निहित स्वार्थों के लिए यह खतरे की घंटी है. साभारः DW.COM

हरामी व्यवस्थाः गेहूं काटने से मना करने पर नोच डाली मूंछें

बदायुं। उत्तर प्रदेश के भाजपा शासनकाल में जातिवादियों का मन बढ़ता जा रहा है. एक नए मामले में दलित समाज के एक व्यक्ति द्वारा गेहूं काटने से इंकार करने पर उसकी मूंछे नोच दी गई. घटना बदायुं जिले के आजमपुर बिसौरिया गांव की है. इंकार के बाद न सिर्फ मजदूर की मूंछ नोची गई बल्कि उसे पेड़ से बांधकर बुरी तरह पीटा गया. पीड़ित का नाम सीताराम है जो खेतिहर मजदूर है.

अभी रुकिए. खबर में अत्याचार की और कहानी बाकी है. पीड़ित सीताराम ने अपने साथ हुए अत्याचार की शिकायत जब पुलिस से की तब पुलिस ने शुरुआत में इस मामले पर कोई कार्रवाई नहीं की. घटना के करीब एक हफ्ते बाद सिटी एसपी जितेंद्र कुमार श्रीवास्तव के आदेश पर इस मामले में आरोपियों के खिलाफ शिकायत दर्ज की गई. अपनी शिकायत में सीताराम ने गांव के ठाकुर समेत अन्य व्यक्तियों के ऊपर मारपीट करने का आरोप लगाया है.

 मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक यह घटना 23 अप्रैल की है. घटनाक्रम के मुताबिक जब गांव के ठाकुर विजय सिंह, विक्रम सिंह, शैलेंद्र और पिंकू सिंह ने जब सीताराम को खेत पर गेहूं काटने को कहा, तब दलित मजदूर ने कहा कि वह दो दिन बाद यह काम करेगा. सीताराम द्वारा इनकार करने पर वे सभी इतने नाराज हो गए कि उन्होंने मजदूर की पिटाई कर दी. सभी लोग मिलकर पहले तो सीताराम को चौपाल तक लेकर गए, जहां उसे एक पेड़ से बांधा गया और जमकर पीटा गया. उसके बाद भड़के हुए लोगों ने गुस्से में उसकी मूंछ तक नोंच डाली.

उल्लेखनीय है कि जब देश मजदूर दिवस मना रहा है और मजदूरों के हक की बात कर रहा है, ऐसे में एक मजदूर द्वारा अपनी मर्जी से काम नहीं कर पाने की स्वतंत्रता का यह मामला सामने आया है.

श्रमिकों के बारे में क्या सोचते थे डॉ. आंबेडकर?

आज 1 मई को अंतरराष्ट्रीय श्रमिक दिवस है. भारत के श्रमिक वर्ग के शत्रु कौन हैं और श्रमिक वर्ग की मूल समस्या क्या है? इस बारे में डॉ. आंबेडकर ने कहा है कि “मेरी मान्यता यह है कि इस देश में कामगारों को दो शत्रुओं का मुकाबला करना है. वे दो शत्रु हैं, ‘ब्राह्मणवाद और पूंजीवाद.’ भारत के वामपंथी पूंजीवाद को तो भारतीय श्रमिकों का शत्रु मानते रहे, लेकिन उन्होंने ब्राह्मणवाद को भारतीय श्रमिकों का शत्रु नहीं माना. भारतीय श्रमिक आंदोलन की पराजय का यह एक महत्वपूर्ण कारण रहा.

 आंबेडकर ने भारतीय कामगारों को इन दो शत्रुओं को आज के करीब 100 वर्ष पहले चिन्हित कर लिया था. 12-13 फरवरी 1938 को उन्होंने मुम्बई में ‘क्या हमारी ट्रेड यूनियन होनी चाहिए?’ इस विषय पर श्रमिकों को संबोधित करते हुए यह बात कही थी. इस भाषण में उन्होंने कामगारों का आह्वान किया था कि “अगर हमें संपू्र्ण कामगार आंदोलन को एकता के सूत्र में बांधना है, तो असमानता के जनक, ब्राह्मणवाद को हमें जड़ से उखाड फेंकना होगा.” इसी भाषण में उन्होंने यह भी कहा कि ‘ब्राह्मणवाद कामगार आंदोलन को ध्वस्त करने का मूल कारण है, उसे खत्म करने के प्रामाणिक प्रयत्न कामगारों को करना चाहिए. उसे अनदेखा करने से या चुप बैठने से यह संक्रामक रोग जानेवाला नहीं है. उसका निश्चित पीछा करना होगा और उसे खोदकर, जड़ से मिटाना होगा. उसके बाद ही कामगारों की एकता का मार्ग सुरक्षित होगा.’

अपनी प्रसिद्ध किताब ‘जाति का विनाश’ में इसका कारण बताते हुए उन्होंने कहा कि ‘जाति केवल श्रम विभाजन की व्यवस्था नहीं है, यह श्रमिकों का भी विभाजन है.” भारतीय वामपंथ ब्राह्मणवाद से संघर्ष से मुंह चुराता रहा है, अब कुछ वामपंथी संगठन यह स्वीकार करने लगे हैं कि पूंजीवाद के साथ ही ब्राह्मणवाद भी कामगारों का उतना ही बड़ा शत्रु है. इस नई पहलकदमी का स्वागत करना चाहिए, लेकिन ऐसा करने में 100 साल लग गए. श्रमिकों के बीच जातीय विभाजन को खत्म किए बिना और ब्राह्मणवाद एवं पूंजीवाद को कामगारों का दो बराबर का शत्रु माने बिना भारतीय श्रमिक आंदोलन को सफलता नहीं मिल सकती.

  • लेखक- सिद्धार्थ रामू

सौरभ गांगुली ने लांच की ऑटोबायोग्राफी, मौके पर मौजूद सहवाग, युवराज और गांगुली ने सुनाए कई किस्से

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नई दिल्ली। भारतीय क्रिकेट टीम के सफल कप्तानों में से एक सौरव गांगुली की ऑटोबायोग्राफी ‘ए सेंचुरी इज नॉट इनफ’ का विमोचन कार्यक्रम दिल्ली में 30 अप्रैल को हुआ. इस दौरान गांगुली के साथ क्रिकेट धुरंधर वीरेन्द्र सहवाग और युवराज सिंह भी मौजूद थी. इस मौके पर तीनों ने एक-दूसरे के बारे में कई कहानियां साझा की. इस मौके पर जब पत्रकारों ने सहवाग से सौरभ गांगुली के बीसीसीआई के अध्यक्ष बनने की संभावनाओं पर सवाल किया गया तो सहवाग ने कहा,” दादा (सौरभ गांगुली) 100 फीसदी एक दिन पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बनेंगे. लेकिन वह दिन आने से पहले दादा बीसीसीआई के प्रेसिडेंट बनेंगे.” तीनों क्रिकेट खिलाड़ियों ने अपने बीते दौर की मैदान और निजी जिन्दगी की मनोरंजक यादों को साझा किया. सहवाग ने बताया, दादा मैच के बाद अक्सर हमारी तरफ आते और हमसे अपनी किट बैग को पैक करने के लिए कहते थे. उन्हें मैच के बाद तुरंत ही प्रेस कॉन्फ्रेंस के लिए भागना होता था, इसलिए वह हमसे ये काम करवाया करते थे. इस बात पर युवराज ने भी स​हमति जताई. लेकिन गांगुली ने इस कहानी में थोड़ा सुधार करते हुए अलग ही बात बताई. गांगुली ने कहा, ये कहानी पूरी तरह से सही नहीं है. दरअसल मुझे प्रेस कॉन्फ्रेंस के लिए भागना होता था और युवराज को नाइट आउट के लिए भागना होता था. वह उसमें जरा भी लेट नहीं होना चाहता था. इसलिए युवराज खेल खत्म होने के बाद बाकी किसी भी खिलाड़ी से पहले मेरी किट को पैक कर देता था. जैसे ही गांगुली ने ये बात कही, पूरा हॉल ठहाकों से भर गया. इस दौरान वीरू और युवराज ने उन दिनों को भी याद किया, जब वह टीम में नए थे और गांगुली ने उन दिनों में उनका समर्थन किया था. युवराज ने कहा कि, जब मैं टीम में शामिल हुआ तो दादा ने कहा कि बड़े दिनों के बाद इंडियन टीम में कोई अच्छा फील्डर आया है. दो-तीन मैच के बाद मैं अगली इनिंग्स में अच्छा नहीं खेल पाया और स्पिन गेंदबाजी से जूझने लगा, लेकिन दादा ने मुझे सहारा दिया क्योंकि वो जानते थे कि मैं मैच जिताने वाला खिलाड़ी हूं. गांगुली ने कहा, कि मैं हरभजन, युवराज और वीरू जैसे खिलाड़ियों को सिर्फ इसीलिए सहारा देता था क्योंकि ये बेहद प्रतिभाशाली खिलाड़ी थे और मैं ये बात जानता था. सबसे पहले मैंने उनके दिमाग से टीम से निकाले जाने का डर हटा दिया.

अलीगढ़ मुस्लिम विवि में जिन्ना की तस्वीर को लेकर बवाल

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अलीगढ़। मुस्लिम समाज के लिए देश की सबसे बड़ी यूनिवर्सिटी अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) में पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना की तस्वीर को लेकर हंगामा मच गया है. अलीगढ़ से भाजपा सांसद सतीश गौतम ने एएमयू में पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना की तस्वीर लगाए जाने को लेकर वाइस चांसलर (वीसी) तारिक मंसूर से सफाई मांगी है. भाजपा सांसद द्वारा लिखे गए खत में पूछा गया है कि ऐसी क्या मजबूरी हो गई थी कि जिन्ना की तस्वीर लगानी पड़ गई. गौतम का कहना है कि भारत के विभाजन के बाद पाकिस्तान के संस्थापक की तस्वीर लगाए जाने का कोई औचित्य नहीं है. उन्होंने कहा, ‘अगर वह सच में किसी की तस्वीर लगाना चाहते हैं तो उन्हें महान इंसान महेंद्र प्रताप सिंह की तस्वीर लगाना चाहिए, जिन्होंने इस यूनिवर्सिटी के लिए जमीन दान की थी.’ गौतम के खत पर यूनिवर्सिटी के छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष फैजल हसन ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में जिन्ना के बारे में न तो आज तक पढ़ाया गया है और न ही उनसे संबंधित कोई चैप्टर है.

उन्होंने कहा कि अगर तस्वीर की बात है तो जिन्ना की फोटो यूनिवर्सिटी में साल 1938 से यानी विभाजन से पहले से ही लगी हुई है. इसके अलावा उन्होंने सांसद से ही उलटा सवाल कर दिया कि अभी तक पार्लियामेंट में से जिन्ना की तस्वीर क्यों नहीं हटाई गई है? वहीं छात्रसंघ के वर्तमान अध्यक्ष मशकूर अहमद उस्मानी ने जिन्ना को अविभाजित भारत का हीरो बताया. उन्होंने कहा कि साल 1947 से पहले ही जिन्ना को आजीवन सदस्यता दे दी गई थी, इसलिए उनकी तस्वीर अभी तक यूनिवर्सिटी में लगी हुई है. उस्मानी ने कहा कि इस मामले में विश्वविद्यालय के वीसी को खत न लिखते हुए गौतम को छात्रसंघ को तलब करना चाहिए था, क्योंकि जिन्ना की तस्वीर एएमयू के स्टूडेंट हॉल में लगी हुई है.

 

रांची जा रहे लालू की ट्रेन में हालत बिगड़ी, पढ़िए फिर क्या हुआ

नई दिल्ली। बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और राजद अध्यक्ष लालू यादव की दिल्ली से रांची जाने के दौरान रास्ते में ही तबियत खराब हो गई. पूर्व रेल मंत्री का तबियत बिगड़ने के बाद हंगामा मच गया. ट्रेन के कानपुर पहुंचने पर लालू दो डॉक्टरों ने लालू को इंजेक्शन लगाया, तब जाकर उनकी हालत में सुधार हुआ. इस दौरान ट्रेन 15 मिनट तक कानपुर स्टेशन पर रुकी रही. लालू 30 अप्रैल को दिल्ली के एम्स से डिस्चार्ज होने के बाद राजधानी एक्सप्रेस से रांची के रिम्स जा रहे थे. ताजा सूचना के मुताबिक लालू यादव 1 मई को रांची पहुंच गए हैं.

राजधानी के कानपुर पहुंचने पर आनन-फानन में दो डॉक्टरों ने उनकी जांच की तो पता चला कि उनका शूगर लेवेल बढ़कर 200 हो गया है. इसके बाद उन्हें इन्सूलिन का इंजेक्शन लगाया गया, तब जाकर उनकी हालत सुधरी. लालू यादव फर्स्ट क्लास कोच एच-1 में सफर कर रहे थे.

इससे पहले ट्रेन जैसे ही कानपुर स्टेशन पहुंची, ट्रेन को पुलिस ने चारों ओर से घेर लिया. कानपुर पहुंचने पर मीडिया का भी जमावड़ा लग गया लेकिन किसी को भी ट्रेन में घुसने की इजाजत नहीं दी गई. बता दें कि डिस्चार्ज की खबर सुनते ही लालू ने एम्स प्रशासन को चिट्ठी लिखकर कहा था कि उनकी तबीयत ठीक नहीं है. उन्हें अभी चक्कर आता है, बाथरूम में भी गिर चुके हैं लेकिन एम्स में डॉक्टरों के पैनल ने उन्हें दुरुस्त बताते हुए रिम्स रेफर कर दिया. लालू ने इसे साजिश बताया है. उन्होंने अपने पत्र में ये भी लिखा था कि अगर उन्हें कुछ होता है तो इसकी जिम्मेदारी एम्स की होगी.

 

सवर्ण लड़की और दलित युवक के प्रेम प्रसंग पर दलितों के घरों पर हमला

प्रतीकात्मक चित्र

यमुनानगर। एक सवर्ण लड़की के एक दलित युवक के साथ चले जाने के बाद हरियाणा के यमुनानगर स्थित करहरा गांव में बवाल मच गया है. घटना से गुस्साए राजपूत समाज के लोगों ने दलितों के घरों में शनिवार को जमकर तोड़-फोड़ की, जिसके बाद पुलिस ने उनके खिलाफ मामला दर्ज कर लिया है.

मामला यह है कि 19 साल की एक सवर्ण लड़की को 21 साल के एक दलित युवक से प्यार हो गया. चर्चा है कि दोनों के बीच प्रेम प्रसंग था और वो अपनी मर्जी शादी करना चाहते थे. पिछले दिनों दोनों साथ ही गायब हो गए. इससे खार खाए राजपूत समाज के लोगों ने रात को नौ बजे अचानक दलित बस्ती पर हमला कर दिया.

इस मामले में 30 लोगों को आरोपी बनाया गया है. रविवार को हरियाणा पुलिस ने इस मामले में 18 युवकों को गिरफ्तार किया. इनमें से अधिकतर राजपूत समुदाय से हैं. गांव के दलित परिवारों का कहना है कि “यह महज एक लड़का-लड़की का मसला था. इसमें हमारी क्या गलती थी? हमारे घर क्यों तोड़ दिए गए?”

वहीं, गांव वालों ने इस मसले को हल करने के लिए दोनों समुदाय के लोगों को बुलाकर पंचायत की गई, लेकिन कोई हल नहीं निकला. शनिवार की घटना पर डीएसपी राणा ने कहा, “गांव के दलितों को डराने के लिए यह किया गया. आरोपी दलितों के घर गए और उनकी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया.” घटना के प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि रात 9 बजे अपने घर के सामने बैठे हुए थे कि वे अचानक हाथों में डंडे लेकर आए और हम पर हमला कर दिया. हम बचने के लिए भागे. यह अचानक किया हमला हमला था, वर्ना जरूर संघर्ष करते.”

 

राजनीति में भाषाई हिंसा का दौर

आज मुझे राजनीति का पुराना चलन याद आ रहा है, जब सत्ता पक्ष और विपक्ष के सदस्य सदन में एक दूसरे का वैचारिक आधार पार जमकर विरोध करते थे किंतु उनमें पारस्परिक वैमनस्य दूर-दूर तक नहीं पनप पाता था. आपसी सदभाव देखने को मिलता था. चुनावी मैदान में भी एक दूसरे के प्रति अपशब्दों का प्रयोग नहीं किया जाता था. पक्ष-विपक्ष सार्वजनिक जीवन में अपरिपक्वता का परिचय कतई नहीं देते थे. एक दूसरे के सामाजिक व पारस्परिक उत्सवों में विना किसी दुराव के सामिल हुआ करते थे. बेशक उनके राजनीतिक हित आपस में टकराते थे किंतु सामाजिक समंव्यता बनी रहती थी.

किंतु आज का राजनीतिक अपरिपक्वता के इस दौर में अपशब्दों का प्रयोग राजनीति का अभिन्न अंग बन गया है. आज राजनीति की परिभाषा ही बदल गई है. अशिष्ट शब्दों का प्रयोग, झूठ बोलना, धोखा देना, पीठ में चाकू मारना, एक दूसरे की टांग खीचना जैसे राजनीति का मुख्य आचरण हो गया है. भाजपा का सत्ता में आने के बाद से विरोधियों से गालियों के साथ बात करने का चलन बढ़ा है. भाजपा के छोटे से बड़े नेता तक भाषाई और सामाजिक स्तर पर बेलगाम देखे जा रहे हैं. इस नैतिकता और जीवनमूल्य विहीन राजनीति से देश को जो दिशा मिल रही है, वह हमें सभ्य और कर्तव्य पारायण नहीं बना पा रही. भाजपा के नेताओं के इस रवैये के चलते कांग्रेस के स्वर भी कड़वाहट की चाशनी में पगने को मजबूर हो गए. इस प्रकार हमारे राजनेताओं ने सभी सामाजिक मापदंडों को जैसे कूड़े में फेंक दिया है. राजनीति की भाषा निरंतर हिंसक होती जा रही है. राजनेताओं की लगातार जहरीली होती भाषा देश के लिए चिंता का विषय है.

असोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) की रिपोर्ट में यह जानकारी दी गई है. (https://www.indiatoday.in/fyi/story/bjp-has-most-number-of-lawmakers-booked-for-hate-speeches-adr-report-1220013-2018-04-25) कि 58 सांसदों और विधायकों ने बतौर उम्मीदवार की जाने वाली अपनी घोषणा में यह बताया है कि उनके खिलाफ नफरत फैलाने वाले भाषण देने के लिए मुकदमे दर्ज हैं. बीजेपी नेताओं की संख्या इनमें सबसे अधिक है. रिपोर्ट के अनुसार केंद्रीय पेयजल और स्वच्छता मंत्री उमा भारती ने भी अपने खिलाफ ऐसा मामला दर्ज होने का जिक्र किया है. इसके अलावा आठ राज्य मंत्रियों के खिलाफ हेट स्पीच को लेकर केस दर्ज है. पिछले कुछ वर्षों में अपने विरोधियों के खिलाफ आपत्तिजनक बयान देना, उनका मजाक उड़ाना, जाति और समुदाय को लेकर अनाप-शनाप बातें करना राजनीतिक संस्कृति का हिस्सा बनता गया है. कहना अतिशयोक्ति न होगा कि प्रधान सेवक न केवल चुनावी भाषणों में अपितु प्रधान सेवक बनने के बाद भी अशिष्ट भाषा का प्रयोग करने में अन्य नेताओं के अगुआ रहे हैं.

यह चलन न्यूज चैनलों के प्रचार-प्रसार के साथ भी बढ़ा है लेकिन सोशल मीडिया के आने के बाद इसमें जबर्दस्त तेजी आई है. भाजपा और कांग्रेस के अपने – अपने आई टी सेल हैं जो फेक न्यूज के जरिए बिना सिर-पैर की खबरें फैंककर हिन्दू और मुसलमान का खेल खेल रहे हैं. धार्मिक शतरंज पर अपने-अपने मोहरे बैठाने में तत्पर हैं. एक अध्ययन के मुताबिक मई 2014 से लेकर अब तक 44 अति विशिष्ठ नेताओं ने 124 बार हेट स्पीच दी, जबकि यूपीए-2 के दौरान ऐसी बातें सिर्फ 21 बार हुई थीं. इस तरह मोदी सरकार के दौरान वीआईपी हेट स्पीच में 490 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है. वर्तमान सरकार के दौरान हेट स्पीच देने वालों में 90 प्रतिशत बीजेपी नेता हैं. यहां यह याद दिलाना जरूरी है कि नेताओं के बयानों का लोगों पर सीधा असर होता है. कई जगहों पर इनके आक्रामक बयानों से हिंसा भड़क उठती है और जानमाल का नुकसान होता है, लेकिन नेताओं का कभी बाल भी बांका नहीं होता. लीडर किसी भी पार्टी के हों, गाली देकर या अभद्र टिप्पणी करके प्राय: माफी मांग लेते हैं. पार्टी आलाकमान अपने नेता की बात को उसका निजी बयान बताकर मामले से पल्ला झाड़ लेता है. जब तक चुनाव में नुकसान की आशंका न हो, तब तक शायद ही किसी नेता पर कार्रवाई होती हो. कभी ऐसी कोई नौबत आ भी जाए तो थोड़े समय बाद सब कुछ भुला दिया जाता है. पार्टियां अपने ऐसे बदजुबान नेताओं को टिकट देने में कोई कोताही नहीं बरततीं. इधर कुछ समय से चुनाव आयोग इस मामले में सचेत हुआ है पर उसकी अपनी सीमा है. इस बारे में सख्त नियम बनाने का काम जन प्रतिनिधियों का है, पर वे अपने ही खिलाफ नियम क्यों बनाने लगे! सबसे बड़ी बात है कि अब लोग ऐसे भाषणों को नियति की तरह स्वीकार करने लगे हैं और इन्हें पॉलिटिक्स का एक जरूरी अंग मानने लगे हैं. नेताओं को समझना चाहिए कि उनकी देखादेखी सामान्य लोगों की बोलचाल में भी आक्रामकता चली आती है, जिससे कटुता फैलती है. इससे विरोध और असहमति की जगह कम होती है और लोकतंत्र की बुनियाद कमजोर पड़ती है. ऐसी भाषा के प्रति सभी दलों को सख्ती बरतनी चाहिए.

यह अजीब विडंबना है कि एक चपरासी पद पर तैनात सरकारी कर्मचारी के लिए आचरण संहिता बनी हुई है. यह नियमावली ब्रिटिश सत्ता के हितों की हिफाजत के लिए बनी थी, जो आज तक कायम है. अगर चपरासी कारण-अकारण भी गैर-कानूनी काम करता है या चौबीस घंटे से अधिक जेल में डाल दिया जाता है, तो उसे तुरंत निलंबित कर दिया जाता है. उसकी सी आर खराब कर दी जाती है. सरकारी कर्मचारियों के लिए प्रतिबंधों की लंबी सूची है. उनकी सेवा निवृत्ति की उम्र भी निर्धारित है. मगर खेद है कि देश चलानेवाले राजनेताओं के लिए आचरण की ऐसी कोई भी नियमावली तय नहीं है. वे स्वतंत्र और बेलगाम हैं. नेताओं के लिए सौ खून माफ हैं. दर्जनों आपराधिक मुकदमे दर्ज होने या वर्षों जेल में बिताने के बाद भी वे माननीय हैं. केवल राजनीतिक नफा-नुकसान का ध्यान रख कर ही, कभी-कभार पार्टियां कुछ नेताओं के विरुद्ध कड़े कदम उठाने को बाध्य होती हैं, अन्यथा नहीं. अमानवीय आचरण के कारण कभी किसी नेता को चुनाव लड़ने से रोक दिया गया हो, देखने को नहीं मिलता. आजकल तो राजनीतिज्ञों द्वारा महिलाओं के प्रति अत्याचार की जितनी घटनाएं घट रही हैं, उतनी पहले शायद ही कभी घटी हों. हर कदम पर बेटियों को भी अपमानित होना पड़ रहा है. वे क्या खायें, क्या पहनें, क्या बोलें, सब पर हमारे राजनेताओं सवाल खड़े करते ही रहते है. इस प्रकार की गाली गलोज करना राजनीति की मुख्यधारा का अंग बन चुका है. अब तो राजनीतिक साधु-साध्वियों के मुंह से भी अशोभनीय शब्द निकलने लगे हैं. हाशिये के समाज के प्रति अपशब्दों की तो परंपरा ही रही है. अल्पसंख्यक, महिलाएं, दलित और आदिवासी तो हमेशा से ही सबसे ज्यादा निशाने पर रहे हैं. अब जूता या स्याही फेंकना, पोस्टरों पर कालिख पोतना, हाथापाई पर उतर आना, सदन में कपड़े फाड़ देना, महापुरुषों की मूर्तियों को नुकसान पहुँचाना जैसी घटनाएं आम हो गई हैं. विगत कुछ सालों में राजनेताओं ने अपने विरोधियों के लिए बहुत ही घिनौने और स्त्रीजनित अपशब्दों का इस्तेमाल किया है. इसे राजनीति में भाषाई स्खलन अथवा हिंसा भी कहा जा सकता है.

अब सवाल यह है कि क्या इस भाषायी अराजकता और असभ्यता को रोकने के लिए कोई आचरण नियमावली बनायी जानी चाहिए या इसे यूं ही छोड़ दिया जाना चाहिए? यूँ आज समय की मांग है कि राजनीति की भाषा और आचरण को नियंत्रित करने के लिए आचरण नियमावली का निर्माण किया जाये और उसके उल्लंघन पर राजनीतिज्ञों को राजनीति से निलंबित करने की प्रक्रिया निर्धारित हो. आज जब राजनीति में अपराधी और गुंडे किस्म के नेताओं का दबदबा लगातार बढ़ता जा रहा है, तब इसे बेलगाम छोड़ने का मतलब मेरे ख्याल में लोकतंत्र को खत्म करना होगा. किंतु भाषायी अराजकता और असभ्यता को रोकने के लिए कोई आचरण नियमावली आखिर बनाएगा कौन?

बुद्ध के कितना करीब हैं मायावती

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नई दिल्ली। बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर सभी देशवासियों को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं दी हैं. मायावती ने सोमवार को जारी संदेश में कहा कि गौतम बुद्ध का शांति, इंसानियत और भाईचारे का संदेश आज की परिस्थितियों में और भी ज्यादा प्रासंगिक है. देश में इसकी जरूरत महसूस की जा रही है.

उन्होंने कहा कि बुद्ध के संदेश के संबंध में प्रवचनों और राजनीतिक बयानबाजियों से कहीं ज्यादा उन्हें राष्ट्रजीवन में उतारने की सख्त जरूरत है. दरअसल बुद्ध पूर्णिमा की बधाई देना बसपा प्रमुख के लिए महज औपचारिकता भर नहीं है, बल्कि वह बुद्ध के संदेश को अपने जीवन में भी उतारती हैं.

गौतम बुद्ध के विचारों के प्रचार-प्रसार में बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम जी और मायावती का काफी योगदान रहा है. खासतौर पर उत्तर प्रदेश में बुद्ध के विचारों को चिरस्थायी बनाने के लिए बसपा की सरकार ने कई ऐतिहासिक काम किए. उनके नाम से भव्य पार्कों, संग्रहालयों, स्थलों, विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों के निर्माण कराए गए. साथ ही जनहित की कई योजनाओं व नए जिले स्थापित किए गए.

मायावती के शासनकाल में ही तथागत बुद्ध की माता के नाम पर महामाया नगर जिले की स्थापना हुई. तो वहीं पंचशील नगर और प्रबुद्ध नगर जैसे नाम भी बुद्ध के विचारों को ही बढ़ाने वाले थे. नोएडा और ग्रेटर नोएडा जो गौतम बुद्ध नगर के तहत आते हैं, उसकी चर्चा तो देश के तमाम हिस्सों में है. गौतम बुद्ध नगर में घूमने पर एकबारगी बुद्धकालीन समय में होने का अहसास होता है.

इसी तरह मायावती के शासनकाल में गौतम बुद्ध नगर में गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय की स्थापना एक बड़ा ऐतिहासिक कदम था. इसी जिले में स्थित बुद्धा सर्किट की ख्याति तो देश की सीमा पार कर चुकी है. भारत में यह इकलौता बड़ा केंद्र है, जहां फार्मूला वन रेसिंग का आयोजन होता है. बौद्ध धर्म के हृदयस्थल उत्तर प्रदेश में बौद्ध परिपथ का विकास भी एक बड़ा काम था, जो बसपा के शासनकाल में हुआ. लखनऊ में बौद्ध विहार शांति उपवन, बौद्ध स्थल का निर्माण भी उल्लेखनीय है.

अगर यह कहा जाए कि अशोक के शासनकाल के बाद भारत में बौद्ध धम्म के प्रचार-प्रसार के लिए सबसे ज्यादा काम बसपा प्रमुख मायावती ने किया तो गलत नहीं होगा.

मध्यप्रदेश में जातिवाद की इंतहा, परीक्षार्थियों के सीने पर SC-ST लिखा

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ध्य प्रदेश के धार जिले से एक चौंकाने वाली खबर आई है. इस खबर से पता चलता है कि जातिवादियों की सोच कितनी घटिया है. जिले में पिछले दिनों पुलिस कॉन्सटेबल की भर्ती का अभियान चलाया गया और इन दिनों उनका स्वास्थ्य परीक्षण चल रहा है. जिसमें सामान्य और अन्य पिछड़ा वर्ग के लिये 168 सेमी. और एससी-एसटी के लिये 165 सेमी. लंबाई तय है.

यहां आए उम्मीदवारों की पहचान के लिए जिला अस्पताल ने एक अनोखा तरीका अपनाया. उम्मीदवारों के मेडिकल टेस्ट के दौरान उनके सीने पर एससी-एसटी लिख दिया गया. इस मामले के तूल पकड़ने के बाद अब गृहमंत्री भूपेंद्र सिंह ने जांच के आदेश दिये हैं.

मामले सामने आने के बाद पुलिस महानिदेशक ऋषि कुमार शुक्ला लीपापोती में लग गए हैं. उनका कहना है कि हर वर्ग के लिए शारीरिक माप के मापदंड अलग-अलग होते हैं, इसलिए ऐसी पहचान करना होती है. पन्ना जिले में एक आरक्षित वर्ग की महिला प्रत्याशी की माप में गड़बड़ी हो गई थी इसलिए एहतियात के तौर पर यह कदम उठाया गया था. हालांकि उन्होंने मामले की जांच के आदेश देकर इसे शांत करने की कोशिश शुरू कर दी है.

दूसरी ओर मामले के तूल पकड़ने के बाद अब इससे जुड़े लोगों ने एक-दूसरे पर आरोप मढ़ने शुरू कर दिए हैं. टेस्ट के दौरान मौजूद टीआइ नानूराम वर्मा ने कहा कि मेडिकल बोर्ड के सदस्य डॉ. जितेंद्र चौधरी के कहने पर इस तरह का कदम उठाया गया, जबकि जितेन्द्र चौधरी इससे इंकार कर रहे हैं.

इस मुद्दे को लेकर कुछ सामाजिक संगठनों ने भी मोर्चा खोल दिया है. कुल मिलाकर इस घटना ने यह साफ कर दिया है कि समाज में हर स्तर पर लोगों के मन में जाति व्यवस्था किस कदर कायम है.

BBAU में बाबासाहेब की प्रतिमा के लिए संघर्ष करने वाले छात्र पर हमला

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लखनऊ। ​बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर केंद्रीय विश्वविद्यालय, लखनऊ की यह घटना वास्तव में झकझोर देने वाली है क्योंकि विश्वविद्यालय में लगातार अनुसूचित जाति के छात्रों को टारगेट किया जा रहा है. या तो उनको एडमिशन नही होने देते, या तो उनके खिलाफ FIR करवा देते .

28 अप्रैल 2018 की रात्रि 10:30 के लगभग कुछ लोगों ने इतिहास के शोधार्थी बसंत कनौजिया पर हमला किया. जिससे साफ़ जाहिर हो जाता है कि विरोधी लगातार बौखलाए हुए हैं. बसंत के एडमिशन को रोकने के लिए विवि प्रशासन ने पूरा जोर लगा दिया था. जिससे बसन्त कनौजिया ने उच्च न्यायालय में शरण ली थी और विवि प्रशासन ने उच्च न्यायालय की सेकंड बैंच तक मामला लेकर गए थे और विवि प्रशासन ने उ प्र सरकार का सबसे महंगा वकील उक्त छात्र के एडमिशन को रोकने के लिए किया था.

​​बसन्त कुमार कनौजिया विरोधियों के निशाने पर ​इसलिए हैं क्योंकि बंसन्त कनौजिया विवि के अंदर हो रही कई सारी अनियमितताएं, भ्रष्टाचार, sc/st छात्रों के शोषण के खिलाफ लगातार आवाज उठा​ते​​​ र​हे​​​ ​हैं,​ जिसमें अभी हाल में विवि प्रशासन ने बाबासाहेब अम्बेडकर जी की प्रतिमा को ग्रिल या जेल में कैद कर दिया था. 14 अप्रैल को प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी जी का प्रोग्राम था. तब 13 अप्रैल को बंसत ने विवि प्रशासन के सामने छात्रों सहित धरने पर बैठ गया था.

विवि प्रशासन ने मुख्यमंत्री के कार्यक्रम को देखते हुए. रातोंरात उस ग्रिल को हटवा दिया था. लेकिन इस धरना धरना प्रदर्शन में विवि प्रशासन ने अपनी नाक का सवाल समझा और आशियाना थाना के एक सब इंस्पेक्टर के माध्यम से बंसन्त को लगातार धमकाया जा रहा था.

अभी कुछ दिन पहले ही छात्रों का आपसी विवाद हो गया था तो उक्त सब इंस्पेक्टर ने पूरे मामले की छानबीन किये बिना बंसन्त कनौजिया को मुख्य आरोपी मानते हुए बंसन्त सहित 8 छात्रों के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया. जबकि बंसन्त से उन्होंने कोई जाँच पड़ताल नही की. आग में घी डालने का कार्य विवि प्रशासन ने तुरन्त ही बंसन्त के खिलाफ FiR कर दी.

विवाद करने वाले छात्र आपस के ही थे, लेकिन शक की संभावना से नाकारा नही जा सकता है. क्योंकि एक साल पहले भी विवि के सक्रिय छात्र श्रेयात बौद्ध के ऊपर भी ऐसे कातिलाना हमला हुआ था. जिसमें अपने ही कुछ छात्रों ने मुखबिरी की थी. ​छात्रों का यह भी दर्द है कि ​लेकिन हमारे जितने भी सामाजिक संगठन है वह सिर्फ छात्रों के दिमाग को क्रांति के लिए जगायेंगे लेकिन जब उनके साथ कुछ घटित होता है तो कोई उनका साथ नही देता है.

अपने लोगों पर शक करना जायज है ​क्योंकि​​​ खतरा बाहर के लोगों से नही जितना हमारे खुद के लोगों से है. क्योंकि किसी की प्रसिद्धि और पावर का नियंत्रण अपने लोगों के बीच ही स्वार्थी लोगों को मनमुटाव पैदा कर देता है. जब समाज के लिए दिल से काम करने वाले लोग स्वार्थी इंसानो की पोल खोलता है और उन्हें डाँटता है तो वह फिर अपने लोगों से दुश्मनी मोल ले लेता है.

 बसन्त कुमार कनौजिया, शोधार्थी,                                                                                इतिहास विभाग, बीबीएयू, लखनऊ  

ऊना कांड के पीड़ितों सहित गुजरात में 450 ने अपनाया बौद्ध धर्म

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अहमदाबाद। गुजरात के उना में रविवार 29 अप्रैल को करीब 450 दलितों ने धर्म परिवर्तन कर लिया. बौद्ध धम्म की शरण में जाने वालों में मोटा समाधियाला गांव के करीब 50 दलित परिवारों के अलावा गुजरात के अन्य क्षेत्रों के लोग शामिल है. समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व का उपदेश देने वाले बौद्ध धर्म अपनानेव ले उना कांड के वो पीड़ित भी शामिल थे, जिनको गाड़ी से बांधकर पीटने का वीडियो वायरल हुआ था. पीड़ितों बालू भाई सरवैया और उनके बेटों रमेश और वश्राम के अलावा उनकी पत्नी कंवर सरवैया ने भी बौद्ध धर्म की दीक्षा ली.

बालू भाई के भतीजे अशोक सरवैया और उनके एक अन्य रिश्तेदार बेचर सरवैया भी हिन्दु धर्म छोड़ चुके हैं. ये दोनों भी उन सात लोगों में शामिल थे, जिनकी खुद को गोरक्षक बताने वालों ने कथित तौर पर पिटाई की थी. बौद्ध धर्म अपनाने वालों ने आरोप लगाया कि उन्हें हिंदू नहीं माना जाता, मंदिरों में नहीं घुसने दिया जाता, इसलिए उन्होंने बौद्ध धर्म अपना लिया.

रमेश ने कहा कि हिन्दुओं द्वारा उनकी जाति को लेकर किये गए भेदभाव के कारण उन्होंने बौद्ध धर्म स्वीकार किया. उसने कहा, ‘‘हिन्दू गोरक्षकों ने हमें मुस्लिम कहा था. हिन्दुओं के भेदभाव से हमें पीड़ा होती है और इस वजह से हमने धर्म परिवर्तन का फैसला किया. यहां तक कि राज्य सरकार ने भी हमारे खिलाफ भेदभाव किया क्योंकि उत्पीड़न की घटना के बाद जो वादे हमसे किये गए थे, वे पूरे नहीं हुए.’’

खबर यह भी है कि इस धर्म परिवर्तन कार्यक्रम से पहले बीती 25 अप्रैल की शाम को रमेश सरवैया और अशोक सरवैया पर दोबारा हमला हुआ. हमला करने वाला उन्हीं आरोपियों में से एक है, जिन्होंने 2016 में परिवार के चार सदस्यों की सरेआम पिटाई की थी. आरोपी अभी ज़मानत पर बाहर है.

बालुभाई सरवैया अपने परिवार के साथ ऊना से अपने गांव मोटा समढियाला लौट रहे थे, तभी किरनसिंह दरबार ने रमेश और अशोक पर हमला किया और धमकाया गया. धर्म परिवर्तन के लिए जरूरी अनुष्ठान सामग्री खरीदने के लिए परिवार ऊना शहर गया था. जिनमें बालू भाई , अशोक भाई, रमेश भाई, वश्राम और परिवार के अन्य सदस्य शामिल थे.

रमेश और वासराम के चचेरे भाई जीतूभाई सरवैया ने बताया कि परिवार एक गाड़ी में गांव लौट रहा था और अशोक और रमेश बाइक पर आगे चल रहे थे, तभी किरणसिंह दरबार ने देख लिया और दोनों पर हमला कर दिया. ऊना पुलिस स्टेशन के इंस्पेक्टर वीएम खुमान ने घटना की पुष्टि की है.

पीड़ित परिवार के सदस्य पीयूष सरवैया ने बताया, ‘हमने 20 अप्रैल को जिला कलेक्टर को सूचित किया था कि हम 29अप्रैल को बौद्ध धर्म अपनाएंगे और हमने कार्यक्रम के लिए अपने समुदाय और अन्य लोगों से समर्थन मांगा था.’

बुद्ध पूर्णिमा के दिन क्या करते थे बाबासाहब

नई दिल्ली। डॉ. आम्बेडकर ने स्वयं बुद्ध पूर्णिमा के दिन अपने आवास को सजाना आरंभ किया और उत्सव मनाने की परंपरा आरंभ की. विवाह के लिए विवाह विधि का प्रतिपादन किया और बौद्ध चर्या पद्धति तैयार की. बौद्धों में शील और सदाचार का जीवन विकसित करने के लिए ‘बुद्धिस्ट सोसायटी ऑफ इंडिया’ की स्थापना की जिसकी शाखाएं हर प्रदेश में स्थापित की गई. डॉ. आम्बेडकर ने 25 नवंबर, 1956 को सारनाथ के मृगदाय वन में 150 भिक्खुओं के समक्ष भाषण दिया था कि प्रत्येक बौद्ध के लिए अनिवार्य है कि वह हर रविवार को बौद्ध विहार में जाए और वहां उपदेश सुने. यदि ऐसा नहीं होगा तो नव दीक्षित बौद्ध को धम्म की जानकारी नहीं हो सकेगी. प्रत्येक क्षेत्र में ऐसे बौद्ध विहारों का निर्माण किया जाए जिसमें सभा करने के लिए काफी स्थान रहे. बौद्ध विहारों को सभामंदिर होना चाहिए.

उनका मानना था कि जैसे हर सिक्ख रविवार को अनिवार्य रूप से गुरूद्वारा जाता है, ईसाई चर्च जाते है. हर मुसलमान शुक्रवार की नमाज मस्जिद जाकर अता करता है. बौद्ध समाज के लोगों को भी ऐसी परंपरा डालनी होगी. प्रत्येक रविवार को अपने नजदीकी बौद्ध विहार में जाएं. जहां बौद्ध विहार नहीं है, वहां किसी के घर में और यदि वो भी संभव नहीं है तो किसी पार्क या सार्वजनिक स्थल पर कोई संगोष्ठी करें. ऐसी कोशिश भी की जा सकती है कि जीवन के उत्सव चाहे जन्मदिन का कार्यक्रम हो या सालगिरह, उसे बौद्ध विहार में मनाए. इसके साथ ही अपना जीवन पंचशीलों के अनुसार जीने की कोशिश करें.

बाबासाहब का मानना था कि खास तौर पर बुद्ध पूर्णिमा को पूरे हर्ष उल्लास के साथ मनाना चाहिए. अपने घरों पर रोशनी करनी चाहिए और पड़ोसियों को भी आमंत्रित करना चाहिए. इस पर्व को उत्सव जैसा मनाना चाहिए.

बुद्ध पूर्णिमा का महत्व

बुद्ध पूर्णिमा बौद्धों के लिए सबसे पावन व सबसे महत्वपूर्ण पर्व है. बुद्ध पूर्णिमा अथवा वैशाख पूर्णिमा को त्रिविध पावन माना जाता है, क्योंकि भगवान बुद्ध के जीवन की तीन महत्वपूर्ण घटनाएं जन्म , संबोधी प्राप्ति और महापरिनिर्वाण वैशाख पूर्णिमा के दिन हुई थीं. वैशाख पूर्णिमा, जिसे बुद्ध पूर्णिमा या बुद्ध जयंती भी कहा जाता है, इसी दिन भगवान बुद्ध का लुम्बिनी में जन्म हुआ, बोध गया में उन्हें सम्यक संबोधि प्राप्ति हुई व कुशीनारा में उनका महापरिनिर्वाण हुआ. इन तीनों घटनाओं में सम्यक संबोधि प्राप्ति का सबसे अधिक महत्व है.

जन्म व महापरिनिर्वाण तो मानव मात्र के जन्म व मृत्यु का प्रतीक है, लेकिन सम्य्क संबोधि तो लाखों वर्षों में कहीं एकाध बार ही होती है. कोई आश्चर्य नहीं, वैशाखी पूर्णिमा पर देश-विदेश के लाखों बौद्ध बोधगया मेंभगवान बुद्ध की वज्रासन प्रतिमा की पूजा करते हैं. इस पावन दिन बौद्ध उपासक-उपासिकाएं गरीबों को भोजन कराकर, रोगियों को दवा देकर और चिडि़यों व मछलियों को आजाद करके प्रसन्नता का अनुभव करते हैं, क्योंकि बौद्ध धर्म में प्रेम व करूणा को ही सर्वोच्च स्थान दिया गया है.

सिद्धार्थ गौतम का जन्म 563 ई. पूर्व वैशाख पूर्णिमा के दिन लुम्बिनी में हुआ था. 16 वर्ष की उम्र में राजकुमारी यशोधरा के संग उनका विवाह हुआ था. 13 वर्ष तक दाम्पत्य जीवन बिताने के बाद और एक पुत्र के पिता बनने के बाद 29 वर्ष की आयु में सत्य की खोज में सिद्धार्थ गौतम ने गृह त्याग कर महाभिनिष्क्रमण किया और 6 वर्षों तक तरह-तरह की कठिन तपस्या करने के बाद अनुभव किया कि शरीर को अत्यधिक कष्ट देने से या विलासिता पूर्ण जीवन से संबोधि प्राप्त नहीं हो सकती इसलिए उन्होंने विपस्सना का मार्ग चुना.

बुद्ध ने विपस्सना साधना करते-करते अणुओं-परमाणुओं का विच्छेंदन, विश्लेाषण-विभाजन करते-करते देखा कि लोग बाहरी कारणों जैसे गरीबी, भुखमरी, असमानता, ऊंच-नीच, बीमारी, बुढ़ापा, मृत्यु , प्राकृतिक आपदाओं से तो दु:खी हैं ही, मनचाहा न होने पर, अनचाहा होने पर, प्रिय लोगों से बिछुड़ने, अप्रिय लोगों से मिलाप जैसी स्थितियों से भी दु:खी होते हैं. बुद्ध ने ध्यान करते-करते खोज निकाला कि हमारे दु:ख का मूल कारण यह है कि हम घटने वाली घटनाओं और स्थितियों के सही स्वभाव से अनजान हैं. दूर से भासमान या प्रत्येक्ष दिखने वाली बस्तुस्थिति को ही हम असली और वास्तविक मान बैठते हैं और उनके प्रति राग-द्वेष-मोह के गहरे-गहरे संखार बनाते जाते हैं. उन्होंने देखा कि जब हमें कुछ अच्छा लगता है तब हमारे शरीर पर सुखद संवेदनाएं प्रकट होती हैं और जब कुछ बुरा लगता है या अच्छा नहीं लगता है तो शरीर पर दु:खद संवेदनाएं पैदा होती हैं.

बुद्ध ने विपस्सना करते-करते शरीर को सूक्म् से सूक्ष्मतर स्तर पर विभाजन-विश्लेषण करते हुए, अणुओं-परमाणुओं का निरीक्षण-परीक्षण करते हुए स्वंयं के प्रत्य क्ष अनुभव से जाना कि संसार में कुछ भी स्थिर नहीं है, सब कुछ परिवर्तनशील है जो हर पल बदल रहा है इसलिए सब कुछ अनित्य है. ऊपर से ठोस दिखने वाले इस शरीर में और इसके साथ जुड़े चित्त में और इन दोनों के मिलने से चलने वाली जीवनधारा में कहीं पर कुछ भी ‘मैं’ नामक चीज नहीं है और न ही इसमें ‘मेरा’ या आत्मा का कोई अस्तित्व है, पूरे अस्तित्व में किसी का भी पृथक और स्वतंत्र अस्तित्वह नहीं है.

सब कुछ, प्रत्येक प्राणी-वस्तु, घटना बहुत सी बातों पर, चीजों पर निर्भर है और सभी कुछ किसी न किसी कारण से उत्पन्न, होता है, विकसित होता है और देखते-देखते किसी नए रूप में परिवर्तित हो जाता है, कुछ भी (बिना किसी अपवाद के), किसी एक मूल स्रोत से उत्पन्न नहीं हुआ है, एक बीज जब जमीन में बोया जाता है तो वह जल, मिट्टी हवा की मिली-जुली मदद से ही अंकुरित हो पाता है और सूर्यप्रकाश की मदद से बड़ा होता है. इस तरह पेड़ की एक पत्ती में पूरे ब्रह्मांड का प्रतिनिधित्व होता है जिसमें जल, वायु, पृथ्वीे, अग्नि सभी कुछ समाया हुआ है.

किसी व्यक्ति का अपना अकेले का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है. वह जीने के लिए पर्यावरण पर, पेड़-पौधों पर, जीव-जंतुओं पर और समाज पर निर्भर है. वह किसी का पुत्र, किसी का भाई, किसी का दोस्तौ और किसी का रिश्तेदार है. अगर वह शील-सदाचार का जीवन जीता है तो अपनी सुख और शान्ति से समाज के अन्य‍ प्राणियों की सुख-शांति में मदद करता है. प्रज्ञा जगाता है, दान-शील और करूणावान बनता है तो दूसरे लोगों के प्रति मंगल मैत्री जगाता है, करूणा जगाता है जिससे समाज में जो भी लोग जिस किसी कारण से दु:खी हैं, उनका दु:ख दूर करने की कोशिश करता है.

बातों से और शब्दों से, सत्य को जो नित्य है, शाश्वत है, अमृत है, बयान नहीं किया जा सकता है. इसे केवल स्वयं के प्रत्यक्ष अनुभव से ही जाना जा सकता है. इससे लोगों को जीवन, घटनाओं, वस्तुओं के सही और वास्तविक स्वभाव से परिवर्तनशील है, हर पल बदलता जा रहा है, को समझने में मदद मिलती है.

इस तरह विपस्सना करते-करते 35 वर्ष की आयु में सन् 528 ई. पूर्व की वैशाख पूर्णिमा को बुद्धत्व‍ प्राप्त कर सिद्धार्थ गौतम सम्यक संबुद्ध बन गए और भगवान बुद्ध तथागत जैसे नामों से जाने गए. 45 वर्षों तक करूण चित्त से गॉंव कस्बों में पैदल जाकर मानव कल्याण के लिए लोगों को धम्म सिखाते रहे.

वैशाख पूर्णिमा के दिन भगवान बुद्ध भिक्खु संघ के साथ कुशीनगर के नजदीक मल्लों के सालवन में पहुंचे. आनंद ने दो सालवृक्षों के बीच बिस्तर बिछा दिया और भगवान उत्तर दिशा की ओर मुंह किए लेट गए. आनंद ने नगर में खबर कर दी कि रात के तीसरे पहर में तथागत महापरिनिर्वाण को प्राप्त होंगे. दर्शनार्थियों का तांता लग गया. उसी समय सुभद्र नाम का परिव्राजक आनंद के पास आया और बुद्ध से धम्म्दीक्षा की जिद करने लगा. आनंद ने उसको कहा कि तथागत थके हैं, विश्राम कर रहे हैं. बुद्ध ने उनका वार्तालाप सुन लिया और सुभद्र को अपने पास बुलाकर धम्म दीक्षा दी.

आनंद के पूछने पर कि महापरिनिर्वाण के लिए उन्होंने कुशीनगर ही क्यों चुना, भगवान बुद्ध ने बताया कि किसी समय वहां महासुदर्शन राजा की राजधानी थी और उस नगरी का नाम केशवती था. भिक्खुओं को अंतिम बार संबोधित करते हुए भगवान बुद्ध ने कहा: ‘’वयधम्मां संखारा, अप्पमादेन सम्पादेथ’’ (भिक्खुओं सुनो, सारे संखार व्ययधर्मा हैं, मरणधर्मा हैं, नष्टधर्मा हैं. जितनी भी संस्कृत अर्थात निर्मित वस्तुएं हैं, व्यक्ति हैं, घटनाएं हैं, स्थितियां हैं, वे सब नश्वर हैं, भंगुर हैं, मरणशील हैं, परिवर्तनशील हैं. यही प्रकृति का कठोर सत्य है. प्रमाद से बचते हुए, आलस्य से दूर रहते हुए, सतत सचेत और जागरूक रहते हुए, प्रकृति के इस सत्य का संपादन करते रहो! इस सत्य से स्थित रहकर अपना कल्याण साधते रहो!)

यह अंतिम उपदेश देकर वैशाख पूर्णिमा की रात के तीसरे पहर में 483 ई.पू. को तथागत महापरिनिर्वाण को प्राप्त हुए. निर्वाण वह अवस्थाा है जहां न तो पृथ्वी है, न पानी, न प्रकाश है, न हवा, न तो अंतरिक्ष है, न ही आकाश, न तो शून्य है, न ही अशून्य है, न तो यह लोक है, न ही अन्ये लोक, ये सूर्य और चंद्र दोनों हैं, यह इन्द्रियातीत अवस्था है. जैसे दीपक की लौ उठकर बुझ जाने के बाद चली जाती है, वैसे ही महापरिनिर्वाण प्राप्ति कर बुद्ध चले जाते हैं.

बौद्ध नगरी भी है मथुरा, जानिए मथुरा में बौद्ध धम्म का इतिहास

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मथुरा संग्रहालय में बुद्ध की प्रतिमा – फोटो- दलित दस्तक

माना जाता है कि किसी शहर का इतिहास जानना हो तो वहां के संग्रहालय को घूम आइए. अगर उस शहर ने ईमानदारी से अपना इतिहास संजोया होगा तो वह वहां के संग्रहालय में जरूर मौजूद होगा. मथुरा के डैंम्पियर नगर में मौजूद राजकीय संग्रहालय बिल्कुल वैसा ही है. यह संग्रहालय विश्व भर में कृष्ण के जन्मस्थान के रूप में मशहूर मथुरा का एक और इतिहास भी बताता है. यह दूसरा इतिहास आपको बुद्ध और बौद्ध धर्म के करीब ले जाता है.

मथुरा संग्रहालय में बुद्ध की प्रतिमा – फोटो- दलित दस्तक

राजकीय संग्रहालय में बुद्ध ही बुद्ध

मथुरा के इस संग्रहालय में आपको तथागत बुद्ध की तमाम मूर्तियां मिल जाएंगी. कह सकते हैं कि सैकड़ों की संख्या में मौजूद प्रतिमाओं में सबसे ज्यादा बौद्ध प्रतिमाएं हैं. संग्रहालय में मौजूद तमाम बौद्ध प्रतिमाओं की बात करें तो पांचवी शती की आदमकद बौद्ध प्रतिमा, कुषाण काल में सिंहासन आरुढ बैठे बुद्ध का अधोभाग और इसी काल में मिला बुद्ध का विशाल मस्तक आपका ध्यान खिंचती है. यहां बुद्ध की मूर्तियां तमाम मुद्राओं में मौजूद है.

मथुरा संग्रहालय में बुद्ध की प्रतिमा – फोटो- दलित दस्तक

तथागत बुद्ध का मथुरा भ्रमण

असल में बौद्ध धर्म को मानने वालों के लिए मथुरा कितना महत्वपूर्ण है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि भगवान बुद्ध दो बार मथुरा आए थे. इसी तरह एक वक्त में मथुरा में 16 विहार हुआ करते थे. इस वजह से मथुरा बौद्ध धर्मावलंबियों के लिए काफी महत्वपूर्ण केंद्र था. मथुरा के स्थानीय लोगों को बुद्ध के इतिहास के बारे में भले ही पता न हो, मथुरा पहुंचने वाले तमाम विदेशी सैलानी यहां बुद्ध को ढूंढ़ते हुए जरूर आते हैं. सन् 1860 में मथुरा में ही जमालपुर टीले से बुद्ध की दो आदमकद प्रतिमा मिली है, उसमें से एक संग्रहालय में है, जबकि दूसरा राष्ट्रपति भवन में.

मथुरा संग्रहालय में बुद्ध के बारे में लिखा विवरण – फोटो- दलित दस्तक

मथुरा का बौद्ध इतिहास

कृष्ण और राधा के आभामंडल से निकलकर अगर मथुरा के इतिहास की बात करें तो यहां नन्द, मौर्य, शुंग, क्षत्रप और कुषाण वंशों का शासन रहा. इस दौरान विभिन्न धर्मों से संबंधित सैकड़ों मूर्तियां यहां बनीं. बाद के दिनों में ये उपासना स्थल टीलों में परिवर्तित हो गए. आज मथुरा इन्हीं टीलों पर बसा है. 1874 में तत्कालीन कलेक्टर एफ. एस. ग्राउज ने इन्हीं मूर्तियों को सहेजने के लिए संग्रहालय की नींव रखी थी.