पटना। बिहार में एससी-एसटी के लिए अवासीय स्कूल चलते हैं। हाल ही में आई रिपोर्ट के मुताबिक इन स्कूलों में शिक्षकों के 60 प्रतिशत पद खाली हैं। इसकी वजह से पंद्रह हजार से ज्यादा बच्चों की पढ़ाई छूट गई है। दरअसल एससी-एसटी कल्याण विभाग द्वारा बिहार में 91 रेजिडेंशियल स्कूल चलाए जाते हैं। इसमें लड़कों के लिए 50, लड़कियों के लिए 37 और 4 अवासीय स्कूल में लड़के-लड़की दोनों पढ़ते हैं। इन स्कूलों में 44, 240 स्टूडेंट्स पढ़ सकते हैं। लेकिन वर्तमान में सिर्फ 29,202 स्टूडेंट ही पढ़ रहे हैं। यानी 30 प्रतिशत यानी 15,038 स्टूडेंट कम।
बता दें कि इन स्कूलों में क्लास-1, 6 और क्लास 11 में ही एडमिशन होता है। जो आंकड़ें आए हैं, वो निश्चित तौर पर चौंकाने वाले हैं। बिहार विधानसभा से पहले दलित अधिकारों के लिए काम करने वाले संगठन नैक्डोर ने एक रिपोर्ट जारी किया था। इस रिपोर्ट में बताया गया था कि-
नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री कार्यकाल में बिहार में 62% दलित निरक्षर हैं।
रिपोर्ट में बताया गया था कि बिहार में दलितों की साक्षरता दर राष्ट्रीय औसत 66.1% के मुकाबले केवल 55.9% है।
दलित महिलाओं में साक्षरता दर मात्र 43.4% है, जबकि पुरुषों में यह 66.5% है।
दलितों के सबसे पिछड़े समूह मुसहर समुदाय में साक्षरता दर 20% से भी कम है, जो देश के किसी भी जातीय समूह में सबसे निम्न स्तरों में से एक है।
उच्च शिक्षा में दलितों की भागीदारी बेहाल है। ऑल इंडिया सर्वे ऑफ हायर एजुकेशन (2021-22) के अनुसार, विश्वविद्यालयों में दलित छात्रों और शिक्षकों का हिस्सा क्रमशः 5.7% है, जबकि उनकी जनसंख्या 19.65% है। बिहार में अनुसूचित जाति, जनजाति कल्याण विभाग के मंत्री लखेन्द्र रौशन हैं। बिहार में फिलहाल बजट सत्र चल रहा है, इस दौरान सरकार फिर बजट लाएगी और तमाम वादे और दावे करेगी। लेकिन क्या इस ओर किसी का ध्यान जाएगा।

मानवाधिकार और एंटी कॉस्ट आंदोलन से जुड़े गुड्डू कश्यप साल 2023 से ‘दलित दस्तक’ से जुड़े हैं। वर्तमान में वह सब एडिटर के पद पर हैं। बिहार और झारखंड की सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों पर नजर रखते हैं।

