शासकों की विषमता मूलक प्रवृति के पीछे

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लगता है अच्छे दिन का सपना दिखाकर प्रचंड बहुमत में आई मोदी सरकार के बुरे दिन शुरू हो चुके हैं. जहां कई संगठन व बुद्धिजीवी मोदी-राज से त्रस्त होकर उससे मुक्ति की परिकल्पना में निमग्न हो गए हैं, वहीँ खुद सरकार समर्थक बुद्धिजीवी तक भी उसके विकास की पोल खोलने पर आमादा हो गए हैं. ऐसे ही एक बुद्धिजीवी ने कुछ दिन पहले एक अख़बार में बड़ी निष्ठुरता से मोदी के विकास मॉडल को की पोल खोलकर रख दिया था. उन्होंने लिखा था,’ आम आदमी के आर्थिक स्तर को ऊपर उठाने के हमारे आजाद भारत के संकल्प को मंजिल तक पहुंचाने में अब तक की सभी सरकारें नाकाम रहीं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बहुत अपेक्षाएं , लेकिन आर्थिक संतुलन स्थापित करने एवं अमीर –गरीब की खाई को पाटने की दृष्टि से उनकी एवं उनकी सरकार की नीतियां भी संदेहास्पद ही कही जाएँगी. क्योंकि उन्होंने जो दिशा पकड़ी है वह भी ऐसे विकास का प्रारूप है जिसमें अमीर अधिक अमीर ही होता जाएगा? मोदी सरकार भी अपनी जिम्मेदारी पर गरीब व्यक्ति को आर्थिक स्तर पर ऊपर उठाने की कोई योजना प्रस्तुत नहीं कर पायी है. किसी गरीब को गैस सिलेंडर दे देने से या उनके घर तक सड़क या बिजली पहुंचा देने से एक संतुलित आदर्श समाज की रचना नहीं होगी.

..आजादी के शुरुआती तीन चार दशक तक देश के शीर्ष नेतृत्त्व एवं नीति निर्माताओं में राष्ट्र के प्रति समर्पण था और भारत की संस्कृति एवं भारतीयता के प्रति निष्ठां थी, परन्तु नब्बे के दशक तक पहुँचते-पहुंचते हमने जिस बाजारमूलक अर्थव्यवस्था को अपनाना शुरू किया , उसने विकास की परिभाषा को ही बदल कर रख दिया है. विदेशी निवेश के लुभावने एवं चकाचौंध भरे आह्वान में लगा कि रोजगार बढ़ेगा, गरीबी दूर होगी,और सार्वजनिक क्षेत्र की जो कम्पनियाँ घाटे में चल रही हैं वे निजी भागीदारी से मुनाफ कमाने वाली मशीनों में तब्दील हो जायेंगी. लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. घाटे के नाम पर सरकारों ने उन सरकारी मशीनों को बंद ही कर दिया , जो आम जनता की सेवा के लिए गठित की गईं थीं. सरकारों ने विकास के नाम पर जनता पर अनचाहा भार ही नहीं लादा बल्कि अपनी लोभ की मानसिकता को भी थोपा. विकास के नाम पर पनप रहा नया नजरिया न केवल घातक है बल्कि मानव अस्तित्व पर खतरे का संकेत भी है. देश के शासक जिस रास्ते पर हमें ले जा रहे हैं वह आगे चलकर अंधी खाई की ओर मुड़ने वाली है.’ इस स्थिति पर लेखक ने सवाल पूछा है,’ आखिर ऐसा क्यों हुआ? क्या इस प्रवृति के बीज हमारी आजादी के लक्ष्य से जुड़े संकल्पों में रहे या यह विश्व बाजार के दबाव में हुआ?

बहरहाल लेखक ने शासकों की विषमतावादी प्रवृति के बीज जानने के क्रम में जो एकाधिक कारण गिनाएं हैं, उसमें एक बात तो तय है कि इसका सम्बन्ध आजादी के लक्ष्यों से जुड़े संकल्पों से तो बिलकुल ही नहीं रहें: आजादी के संकल्प तो बहुत उत्तम रहे. इस बात का खुलासा करते हुए विपिन चन्द्र-मृदुला मुखर्जी –आदित्य मुखर्जी ने ‘आजादी के बाद का भारत’ जैसे महत्वपूर्ण ग्रन्थ में लिखा है- ‘भारत की आजादी इसकी जनता के लिए एक ऐसे युग की शुरुआत थी, जो एक नए दर्शन से अनुप्राणित था.1947 में देश ने अपने आर्थिक पिछड़ापन , भयंकर गरीबी , करीब-करीब निरक्षरता , व्यापक तौर पर फैली महामारी, भीषण सामाजिक विषमता और अन्याय के उपनिवेशवादी विरासत से उबरने के लिए लम्बी यात्रा की शुरुआत थी. 15 अगस्त पहला पड़ाव था , यह औपनिवेशिक राजनीतिक नियंत्रण में पहला विराम था: शताब्दियों के पिछड़ेपन को अब समाप्त किया जाना था, स्वतंत्रता संघर्ष के वादों को पूरा किया जाना था और जनता की आशाओं पर खरा उतरना था. भारतीय राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना तथा राष्ट्रीय राजसत्ता को विकास एवं सामाजिक रूपांतरण के रूप में विकसित एवं सुरक्षित रखना सबसे महत्वपूर्ण काम था. यह महसूस किया जा रहा था की भारतीय एकता को आँख मूंदकर मान नहीं लेना चाहिए. इसे मजबूत करने के लिए यह स्वीकार करना चाहिए कि भारत में अत्यधिक क्षेत्रीय, भाषाई, जातीय एवं धार्मिक विभिन्नताएं मौजूद हैं. भारत की बहुतेरी अस्मिताओं को स्वीकार करते एवं जगह देते हुए तथा देश के विभिन्न भागों और लोगों के विभिन्न तबको को भारतीय संघ में पर्याप्त स्थान देकर भारतीयता को और मजबूत किया जाना था.’

दुःख के साथ कहना पड़ता है आजाद भारत के शुरुआती तीन चार दशक तक देश के शीर्ष नेतृत्त्व एवं नीति निर्माताओं में राष्ट्र के प्रति समर्पण दिखाया: आधारभूत उद्योग-धंधे खड़ा कर देश को विकसित करने का बढ़िया प्रयास किया, किन्तु उस विकास को विविधतामय भारत के विविध समूहों के मध्य वितरित कर भारतीयता को मजबूत करने का प्रयास नहीं किया. ऐसा इसलिए कि चूँकि जाति समाज में व्यक्ति सोच स्व-जाति/ वर्ण के चेतना के मध्य घूर्णित होती रहती है और यह चेतना बड़े से बड़े साधु-संत, लेखक –कलाकार में समग्र- वर्ग की चेतना विकसित ही नहीं होने दिया ,इसलिए आजाद भारत के शासक, जो मुख्यतया सवर्ण समाज से रहे, अपनी स्व-जातीय/वर्णीय स्वार्थ के चलते ऐसी योजना न बना सके जिससे थोड़ा बहुत जो भी विकास हुआ , उसका तमाम सामाजिक समूहों के मध्य वाजिब बंटवारे का मार्ग प्रशस्त हो सके. इस स्व-जातीय/वर्णीय सोच के कारण ही वे 25 नवम्बर, 1949 को डॉ. आंबेडकर द्वारा आर्थिक और सामाजिक विषमता के खात्मे से जुड़ी दी गयी चेतावनी की अनदेखी कर गए. हाँ, उन्होंने एक काम जरुर किया कि वे एससी/एसटी को संविधान द्वारा प्रदान किये आरक्षण को, अनिच्छापूर्वक ही सही, किसी तरह झेलने की मानसिकता विकसित कर लिया . किन्तु जब 7 अगस्त, 1990 को मंडल की रिपोर्ट प्रकाशित हुई, भारत के परम्परागत विशेषाधिकारयुक्त व सुविधाभोगी वर्ग की वर्णवादी चेतना नाटकीय रूप से तुंग पर पहुँच गयी.

मंडल के खिलाफ जहां विशेषाधिकारयुक्त के युवा आत्म-दाह और राष्ट्र की संपदा दाह में प्रवृत हुए, वहीँ इस तबके की हिमायती एक पार्टी ने राम मंदिर का मुद्दा उठाकर राष्ट्र की हजारों करोड़ की संपदा और असंख्य लोगों की प्राण हानि कराने के साथ भ्रातृत्व के कंगाल भारत की थोड़ी-बहुत दिख रही एकता को भी छिन्न –भिन्न कर दिया, जो विशुद्ध रूप से देश-विरोधी कार्य था. लेकिन सबसे खतरनाक काम किया नरसिंह राव ने, जिन्होंने आरक्षण को कागजों तक सिमटने के कुत्सित इरादे से 24 जुलाई,1991 को भूमंडलीकरण की अर्थनीति अडॉप्ट कर निजीकरण, उदारीकरण, विनिवेशीकरण का सैलाब बहा दिया गया. नरसिंह राव द्वारा शुरू किये गए इस काम को आगे बढ़ाने में अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह ने एक दूसरे होड़ लगाया. 24 जुलाई,1991 को गृहित अर्थनीति के फलस्वरूप ही लाभजनक सरकारी उपक्रमों के औने-पौने दामों में निजी क्षेत्र के हाथों में जाने, सुरक्षा से जुड़े उपक्रमों में विदेशी निवेश ,अमीर-गरीब की खाई आश्चर्यजनक रूप से बढ़ने का सिलसिला शुरू हुआ जो आज डरावना रूप अख्तियार कर चुका है. और यह सब किया गया सिर्फ और सिर्फ आरक्षण के खात्मे को ध्यान में रखकर. बहरहाल नरसिंह राव, अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह ने आरक्षण के खात्मे को ध्यान में रखकर देश का बुनियादी आर्थिक ढांचा ध्वस्त करने और अर्थतंत्र निजीक्षेत्र के मालिकों और विदेशियों के हाथों में देने का जितना काम बीस सालों में किया, उतना नरेंद्र मोदी ने तीन सालों में कर दिखाया है. बहरहाल आज भारत नामक देश आर्थिक और सामाजिक विषमता , जो कि मानव जाति की सबसे बड़ी समस्या है, के मामले में विश्व चैम्पियन बन चुका और संघ के प्राख्यात मजदूर नेता रहे दत्तो पन्त ठेंगड़ी की भाषा में, ‘जो आर्थिक स्थितियां और परिस्थितयां बन या बनायी जा रही हैं, उसके फलस्वरूप देश का नए सिरे से विदेशियों का गुलाम बनना तय सा दिख रहा है’.नवउदारवादी नीतियों के जरिये देश को विषमता के दलदल में धकेलने और विदेशियों का गुलाम बनाने लायक शासकों की प्रवृति के खिलाफ दलित-आदिवासी –पिछड़ों के संगठन गत दो दशकों से लगातार चीत्कार किये जा रहे हैं, पर शासकों की ओर से आरक्षण के खात्मे के जूनून में निरंतर इसकी अनदेखी होती रही. उनकी इस सुनियोजित चाल की ओर संकेत करते हुए चर्चित समाज विज्ञानी रजनी कोठारी ने अपनी पुस्तक’भारत में राजनीति : कल और आज ‘ में डेढ़ दशक पहले लिख डाला था-‘ जनता अपनी तरफ से राज्य पर दबाव डाल रही है कि वह ऐसा न करे. यह दबाव जातीय और क्षेत्रीय आन्दोलनों के साथ-साथ लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए चलाये जा रहे वर्ग और जाति आधारित संघर्षों के रूप में देखा जा रहा है. पर, समस्या यह है कि ठीक इसी समय राज्य की बागडोर सँभालने वालों ने तक़रीबन नियोजित रूप में अपनी पकड़ ढीली कर दी है. सामाजिक और क्षेत्रीय दायरों के प्रति उनका सरोकार कम पद गया है. एक तरफ राज्य की पुनर्संरचना होने की कोशिश हो रही है, दूसरी तरफ राज्य अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों से मुंह चुरा रहा है. ‘

लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं.

संपर्क:9654816191

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