अपने आपको धर्म और संस्कृति के रखवाले बताने वाले लोगों का दल वैलेंटाइन के दिन ज्ञान बांटेगा की यह हमारे देश की संस्कृति नहीं है. ऐसे त्यौहार भारत देश में नहीं मनाने के लिए दबाब डालेंगे और कोई नहीं मांगी तो उसको लाठी – डंडों से मारेंगे. देश के कानून और संविधान की सरेआम धज्जियाँ उड़ाते हुए प्रेमी – प्रेमिकाओं को लज्जित और बदनाम करें की कोशिश करेंगे. चाहे अपने आप परदे के पीछे कितने भी काण्ड किये हों.
वैलेंटाइन हमारी संस्कृति नहीं है मगर हम अंग्रेजों के बने हवाई जहाज में सफर करेंगे.
अंग्रेज हमे पसंद नहीं हैं मगर उनकी बनी हुई रेलवे, इमारते ,जहाज ,गाड़ियां, घड़ियाँ, जूते, कपडे, साबुन, टीवी इस्तेमाल करेंगे.
अंग्रेज हमें पसंद नहीं मगर उनकी कंपनी , देश में जाकर काम करेंगे.
वैलेंटाइन हमारी संस्कृति नहीं मगर हम उनके बनाये कंप्यूटर, लैपटॉप, नई नई तकनीक इस्तेमाल करेंगे.
वैलेंटाइन हमारी संस्कृति नहीं है मगर हम उनके बनाये फेसबुक, व्हाट्सप्प, इंस्टाग्राम, ट्विटर सब इस्तेमाल करेंगे और अपने आपको आधुनिक भी बताएँगे.
आखिर कौन सी संस्कृति है भाई तुम्हारी, किस संस्कृति की बात करते हो ?
क्या वही संस्कृति जिसके जरिए भिक्षा के नाम पे भीख मांगते थे ?
क्या वही संस्कृति जब घोडा तांगा, पैदल, कच्चे रास्ते, कीचड भरे रस्ते, गु से भरी नालियां होती थी.
क्या वही संस्कृति जिसमें देश के लोगो को जातियों एवं वर्णों में बांटकर अपने आपको ऊँचा और दुसरो को नीचा बताना था ?
क्या वही संस्कृति जिसमें देश के तीन चौथाई लोगों को शूद्र और नीच बताकर उनके सामाजिक अधिकारों को छीनकर अपने घरों में रखा.
क्या वही संस्कृति जिसमें कुछ जाती विशेष को इसलिए नीच बोला गया क्यूंकि वह एक जाती या वर्ग विशेष में पैदा हुआ हो ?
क्या वही संस्कृति जिसमें अगर किसी अन्य जाती के व्यक्ति ने आपको छू भर लिया, आपके नलके से पानी ले लिए तो आप को अछूतपन की बीमारी हो जाती थी. क्या यही पिछड़ापन, भेदभाव और तिरस्कार ही है तुम्हारी संस्कृति में …दोगले कहीं के.
भारत देश का यह सौभाग्य रह अहइ की यहां पर अंग्रेज आये और उन्होंने इस देश के लोगो को मानवता भी सिखाई. सबके लिए बराबर कानून व्यवस्था और समान शिक्षा के लिए आधुनिक स्कूल, कॉलेज, विश्विद्यालय बनवाये.
लेखक – नवीन कुमार बौद्ध
सॉफ्टवेयर इंजीनियर एवं मानव अधिकार कार्यकर्ता
ह्यूमन राइट एंड सोशल जस्टिस विंग, गुडगाँव.

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