उत्तराखंड के शिक्षा विभाग में इन दिनों सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है। प्रदेश के दो हजार से ज्यादा प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों को बंद करने का फरमान जारी कर दिया गया है। साथ ही बंद किए विद्यालयों को विद्या भारती को देने का आदेश दे दिया गया है। महानिदेशक विद्यालयी शिक्षा उत्तराखंड के. आलोक शेखर तिवारी ने अपने अधीनस्थ अधिकारियों की पिछले दिनों बैठक के बाद 12 सितम्बर 2018 को एक पत्र जारी किया है।
पत्र के 17वें प्वाइंट में ऐसे विद्यालय जो कि शून्य या 10 से कम छात्र संख्या वाले हैं, उनको बंद करने के पश्चात् उसके भवनों को विद्या भारती के विद्यालयों को देने का प्रस्ताव शासन को दिया गया है। अगर ऐसे विद्यालयों की संख्या की बात करें तो कैबिनेट में ऐसे 2715 प्राथमिक से लेकर माध्यमिक तक के विद्यालयों को बंद करने का निर्णय लिया जा चुका है। महानिदेशक के इस फैसले के बाद वह कठघरे में हैं।
सवाल है कि जब उन क्षेत्रों में बच्चे ही नहीं हैं तो विद्या भारती के विद्यालयों के लिए बच्चे कहाँ से आयेंगे? आरोप लगाया जा रहा है कि कहीं आरएसएस के विद्यालयों को स्थापित करने के लिए दो हजार से ज्यादा स्कूलों को तो बंद नहीं किया गया है?
दरअसल ये नियमों की अनदेखी का भी मामला है। शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 साफ़ कहता है कि 1 किमी में प्राथमिक विद्यालय हो तो 10 से कम छात्र संख्या वाले विद्यालयों को बंद कैसे किया जा सकता है? इसी पत्र के 15 वे बिंदु में विद्या भारती के मान्यता प्राप्त विद्यालयों को भौतिक संसाधन उपलब्ध कराने हेतु समग्र शिक्षा अभियान से अनुदान उपलब्ध कराने का निर्देश दिया गया है। इस फैसले से भी शिक्षा विभाग के भीतर बड़ी साजिश की बू आ रही है। एक तरफ जहां सैकड़ों की संख्या में राज्य के सरकारी विद्यालय जर्जर बने हुए हैं और उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं है तो वहीं दूसरी ओर विद्या भारती के विद्यालयों के लिए बजट कहां से आ गया? प्रदेश में चर्चा है कि बीजेपी की सरकार सरकारी विद्यालयों को बंद कर उसी के जरिए आरएसएस का एजेंडा चलाने की पृष्ठभूमि तैयार करने में जुटी है.
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