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महान सम्राट असोक की जयंती पर राष्ट्रीय अवकाश की आवश्यकता

कुछ साल पहले बिहार में नीतीश कुमार की सरकार ने सम्राट अशोक जयंती पर बिहार में अवकाश घोषित किया था। इसके अलावा आज तक सम्राट असोक की जयंती पर राष्ट्रीय सार्वजनिक अवकाश घोषित नहीं किया गया है। यह कई विद्वानों और सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा विडंबना और ऐतिहासिक उपेक्षा के रूप में देखा जाता है।

ashokमहान सम्राट असोक (लगभग 304–232 ईसा पूर्व) मौर्य वंश के महान शासक थे। वे पितामह चन्द्रगुप्त मौर्य के पौत्र और सम्राट बिन्दुसार के पुत्र थे। लगभग 268 ईसा पूर्व उन्होंने गद्दी संभाली और भारत के सबसे विशाल साम्राज्यों में से एक का संचालन किया। उनके शासनकाल में राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक क्षेत्र में अभूतपूर्व सुधार हुए। महान सम्राट असोक का नाम केवल भारत तक सीमित नहीं है। उनका योगदान विश्व इतिहास में शांति, न्याय और धर्मनिरपेक्षता के आदर्श स्थापित करने के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।

कलिंग युद्ध और अहिंसा की नीति

महान सम्राट असोक के शासनकाल का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ कलिंग युद्ध (लगभग 262–261 ई.पू.) था। इस युद्ध में हुई भयंकर हिंसा और जनहानि ने सम्राट असोक को गहरा आघात पहुँचाया। युद्ध के बाद उन्होंने जीवन और शासन में अहिंसा और धर्म (धम्म) की नीति अपनाने का निर्णय किया। उनकी धम्म नीति के मुख्य सिद्धांत थे-
• अहिंसा और करुणा- सभी जीवों के प्रति मानवीय दृष्टिकोण
• धार्मिक सहिष्णुता- विभिन्न धर्मों का आदर और सम्मान
• जनकल्याणकारी शासन- स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक न्याय पर बल
• नैतिक और ईमानदार प्रशासन- भ्रष्टाचार और अन्याय से दूर शासन
इन सिद्धांतों ने महान सम्राट असोक को न केवल भारतीय इतिहास में, बल्कि विश्व के महान शासकों में भी एक अद्वितीय स्थान दिलाया।

आधुनिक भारत में असोक के प्रतीक

1. राष्ट्रीय प्रतीक और राजमुद्रा
भारत की राजमुद्रा सीधे सम्राट असोक के सारनाथ स्तंभ से ली गई है। चार शेर चारों दिशाओं की ओर देख रहे हैं, जो साहस, शक्ति, सतर्कता और एकता का प्रतीक हैं। राजमुद्रा आज सरकारी कागजात, कानून, अधिनियम और संवैधानिक दस्तावेजों पर अंकित होती है। यह भारत की राजनीतिक और ऐतिहासिक पहचान को दर्शाती है।

  1. असोक चक्र और राष्ट्रीय ध्वज
    भारतीय राष्ट्रीय ध्वज के बीच में स्थित असोक चक्र में 24 किरणें हैं। यह न्याय, सत्य, कर्म और समय की निरंतर गति का प्रतीक है। यह चक्र भारत के संविधान की विचारधारा और राष्ट्र की आधुनिक पहचान से जुड़ा हुआ है।
  1. अशोका हॉल और अन्य प्रतीक
    भारत के राष्ट्रपति भवन, नई दिल्ली में एक विशेष हॉल का नाम अशोका हॉल रखा गया है। यह हॉल उच्च स्तरीय समारोहों और शपथ ग्रहण कार्यक्रमों के लिए उपयोग किया जाता है। इसके अलावा, सरकारी और संवैधानिक प्रतीकों में असोक का योगदान लगातार दिखाई देता है।
  1. सेना में अशोक चक्र
    भारत में सेना और नागरिक क्षेत्र में उच्चतम सम्मान के रूप में “अशोक चक्र” दिया जाता है। यह सम्मान साहस, पराक्रम और सर्वोच्च देशभक्ति के लिए प्रदान किया जाता है। परमवीर चक्र के उपरांत अशोक चक्र सेना का सर्वोच्च युद्ध और वीरता पुरस्कार है। यह सम्मान उन सैनिकों को दिया जाता है जिन्होंने देश की रक्षा में अद्वितीय बहादुरी और त्याग का परिचय दिया। इस प्रकार, असोक का नाम न केवल शासन और धर्म के क्षेत्र में, बल्कि देश की रक्षा और वीरता के क्षेत्र में भी सर्वोच्च प्रतीक बन चुका है।

सम्राट असोक की जयंती और अवकाश की बहस

1. वर्तमान स्थिति
कुछ साल पहले बिहार में नीतीश कुमार की सरकार ने सम्राट अशोक जयंती पर बिहार में अवकाश घोषित किया था। इसके अलावा आज तक सम्राट असोक की जयंती पर राष्ट्रीय सार्वजनिक अवकाश घोषित नहीं किया गया है। यह कई विद्वानों और सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा विडंबना और ऐतिहासिक उपेक्षा के रूप में देखा जाता है।
हालांकि, उनकी जयंती “धम्म दिवस” के रूप में मनाई जाती है, लेकिन यह केवल स्मरण और समारोह तक सीमित रहता है। इस अवसर का उपयोग राष्ट्रीय स्तर पर उनके योगदान को समझाने और उनके आदर्शों को फैलाने के लिए किया जा सकता है।

  1. सम्राट असोक की जयंती पर अवकाश का औचित्य
    सम्राट असोक की जयंती पर राष्ट्रीय अवकाश घोषित करना एक सकारात्मक कदम होगा। इससे न केवल उनके योगदान और आदर्शों को व्यापक स्तर पर सम्मान मिलेगा, बल्कि जनता और युवाओं में धर्मनिरपेक्षता, अहिंसा, न्याय और सामाजिक सहिष्णुता जैसे मूल्यों की जागरूकता भी बढ़ेगी।

अवकाश के माध्यम से सरकारी और शैक्षणिक संस्थान विशेष कार्यक्रम आयोजित कर सकते हैं, जैसे:
•असोक चक्र और धम्म नीति पर संगोष्ठी
• छात्र सत्र और शैक्षणिक प्रदर्शनी
• सांस्कृतिक कार्यक्रम और प्रेरक भाषण

यह देशभर में उनके जीवन और विचारों को सम्मानित करने का अवसर प्रदान करेगा और युवा पीढ़ी को नेतृत्व और नैतिक शासन के मूल्य सिखाने में सहायक होगा।

इसके अतिरिक्त, यह अवकाश भारत की विश्वगौरव और ऐतिहासिक विरासत को भी उजागर करेगा। सम्राट असोक के प्रतीक जैसे अशोक चक्र, राजमुद्रा, अशोका हॉल और सेना में अशोक चक्र पुरस्कार के महत्व को जनता के बीच समझाने का अवसर मिलेगा। इस प्रकार अवकाश केवल छुट्टी नहीं, बल्कि ज्ञान, शिक्षा और सामाजिक प्रेरणा का दिन बन सकता है।

विश्व के प्रति योगदान
सम्राट अशोक का योगदान केवल भारत तक सीमित नहीं रहा। उनके कार्यों और विचारों ने विश्व स्तर पर शांति, अहिंसा और धर्मनिरपेक्ष शासन के आदर्श स्थापित किए।

(1) वैश्विक दृष्टि
• सम्राट असोक का शासन धर्मनिरपेक्षता और मानवता के प्रति प्रतिबद्ध था।
• उनके विचार आज भी संयुक्त राष्ट्र और वैश्विक शिक्षा संस्थानों में अध्ययन का विषय हैं।
• विश्व इतिहास में अशोक को एक नैतिक, न्यायप्रिय और अहिंसावादी शासक के रूप में स्मरण किया जाता है।

(2) राष्ट्रीय अवकाश का वैश्विक महत्व

सम्राट अशोक की जयंती पर अवकाश देने से भारत विश्व स्तर पर शांति, न्याय और धर्मनिरपेक्षता का प्रेरक देश के रूप में अपनी पहचान मजबूत करेगा। यह कदम न केवल इतिहास का सम्मान है, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों के लिए सीख और प्रेरणा भी प्रदान करेगा।

(3) समाज और सरकार के लिए संदेश

सम्राट असोक की जयंती पर सार्वजनिक अवकाश की घोषणा करने से इतिहास और संस्कृति का सम्मान बढ़ेगा। समाज में धर्मनिरपेक्षता, न्याय और अहिंसा का संदेश फैलाएगा। युवाओं में नेतृत्व, नैतिकता और जनकल्याण के मूल्य विकसित होंगे। इसके अलावा सेना में अशोक चक्र सम्मान जैसी वीरता और साहस के प्रतीकों का महत्व भी जनसामान्य तक पहुंचेगा। सरकार और समाज दोनों की जिम्मेदारी है कि वे अशोक के योगदान को भुलाए नहीं, बल्कि इसे राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर मान्यता दिलाएं।

सम्राट असोक का मूल्यांकन करने से साफ पता चलता है कि उन्होंने अहिंसा और शांति को स्थायी रूप से स्थापित किया, धर्मनिरपेक्ष शासन और न्याय की नींव डाली। भारत और विश्व इतिहास में अमूल्य योगदान दिया। देशभक्ति और वीरता के प्रतीक के रूप में अशोक चक्र सम्मान स्थापित किया। फिर भी, उनकी जयंती पर राष्ट्रीय अवकाश न होना उनके महत्व और योगदान के अनुरूप नहीं है। यह समय की मांग है कि भारत सरकार और राज्य सरकारें सम्राट अशोक की जयंती को सार्वजनिक अवकाश घोषित करें, ताकि उनके आदर्शों और प्रतीकों का सम्मान पूरे समाज में दृढ़ता से बना रहे।


इस आलेख के लेखक संजय गजभिये हैं।

 

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