कोरोना महामारी में लोगों को एक दिक्कत इसकी जांच प्रक्रिया में भी सामने आ रही है। यह काफी तकलीफदेह और महंगी है। इसकी रिपोर्ट आने में भी देरी होती है। लेकिन अब ये तमाम प्रक्रिया जल्दी ही आसान हो सकती है और तकलीफ से भी मुक्ति मिल सकती है। नागपुर स्थित नेशनल एनवायरमेंटल इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टिट्यूट जिसे NEERI भी कहा जाता है, उसके वैज्ञानिकों ने एक ऐसा तरीका ढूंढ़ निकाला है, जिससे जांच आसान हो जाएगी। खबर के मुताबिक अब कोरोना जांच के लिए नेरो फैरिंजयल और ओरो फैरिंजयल यानी नाक या गले में स्टिक डाल स्वैब (कोरोना जांच के लिए सेंपल) नहीं लिया जाएगा, बल्कि अब सलाइन गार्गल के जरिए टेस्ट कराया जा सकेगा। यानी कि अब किसी भी प्रकार की बाहरी चीज को अपने शरीर में प्रवेश दिए बगैर आप कोरोना जांच के लिए अपना स्वैब दे सकेंगे।
नागपुर के नेशनल एनवायरमेंटल इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों ने कोरोना सैंपल देने के लिए सलाइन गार्गल तकनीक का इजाद किया है जो कि बेहद आसान और सटीक है। इस तकनीक को आईसीएमआर की मान्यता भी प्राप्त हो गई है और जल्द ही इसी तकनीक से कई केंद्रों में कोरोना की जांच सैंपल भी कलेक्ट किए जाएंगे। नई सलाइन गार्गल की तकनीक बहुत ही आसान है। इसमें जांच करने वाले को इस तरह का एक कंटेनर दिया जाएगा और महज कुछ सेकंड तक गार्गल करने के बाद इसी कंटेनर में उस गार्गल को एकत्र करना है और जांच के लिए प्रयोगशाला तक ये आसानी से पहुंच जाएगा।
इस तकनीक से कोरोना जांच के लिए सैंपल एकत्र करने के लिए किसी प्रशिक्षक की जरूरत नहीं होगी। कोई भी आसानी से इस कंटेनर में अपना स्वैब का सैंपल जमा कर सकता है। इस तकनीक से जांच करने का खर्च भी मात्र 60 रुपये तक होगा तो वहीं अभी मौजूदा तकनीक RT-PCR के लिए 500 से अधिक रुपये खर्च किए जा रहे हैं। साथ ही इस तकनीक से एक ओर समय की भी बचत होगी तो वहीं नतीजे भी जल्द मिलेंगे। गौरतलब है कि भारत में आने वाली कोरोना की तीसरी लहर में सबसे ज्यादा खतरा बच्चों को बताया जा रहा है, ऐसे में बच्चों का स्वैब (कोरोना जांच के लिए सेंपल) आसानी से बिना उन्हे तकलीफ दिए लिया जा सकेगा।

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