HomeTop Newsजयपाल सिंह मुंडाः वह महानायक जिन्हें आदिवासी होने पर गर्व था

जयपाल सिंह मुंडाः वह महानायक जिन्हें आदिवासी होने पर गर्व था

 जयपाल सिंह मुंडा बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। इंग्लैंड में ऊंच शिक्षा के साथ-साथ उनकी हॉकी में भी दिलचस्पी हो गई। वर्ष 1928 के एम्सटर्डम ओलम्पिक खेलों में उन्होंने ब्रिटिश भारतीय हॉकी टीम की कप्तानी की। उनकी कप्तानी में टीम ने सवर्ण पदक जीता। साल 1928 में ही उन्होंने भारतीय सिविल सेवा की परीक्षा पास कर ऐसा करने वाले वह पहले भारतीय आदिवासी बने। राजनीति में भी वह काफी सफल हुए। उन्होंने झारखंड पार्टी बनाई, जिसके पहले ही चुनाव में बिहार में 4 सांसद व 32 विधायक चुने गए।

 दलित समाज में जो कद बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर का है, अगर विवाद की बजाय खुले मन से स्वीकार किया जाए तो आदिवासी समाज में वही कद जयपाल सिंह मुंडा का है। जिस तरह बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर ने दुनिया की बेहतरीन युनिवर्सिटी से पढ़ाई की और वंचितों के हक के लिए सामने आए। कमोबेश जयपाल सिंह मुंडा का जीवन भी इसी तरह का उदाहरण है। आदिवासी समाज को आज जो भी सुविधाएं देश में मिली हैं, उनमें एक बड़ा योगदान आदिवासी नेता जयपाल सिंह मुंडा का है। यही वजह है कि कृतज्ञ आदिवासी उन्हें पूरे सम्मान के साथ ‘मारंग गोमके’ की उपाधि देते हैं।

जयपाल सिंह मुंडा का जन्म 3 जनवरी 1903 को झारखंड (सन् 2000 के पूर्व बिहार) की राजधानी रांची से करीब 18 किलोमीटर दक्षिण, खूंटी जिले के टकरा पाहनटोली में हुआ था। उनके पिता का नाम अमरु पाहन व माता का नाम राधामणी था। हालांकि जयपाल सिंह मुंडा का प्रारम्भिक नाम प्रमोद पाहन था। जयपाल सिंह ने खुद अपनी जीवनी में लिखा है– “मेरा नाम किसने और कब बदला, मुझे नहीं मालूम। वह 1911 की 3 जनवरी थी, जिस दिन मेरा नाम बदल गया होगा। तब मैं 8-10 साल का रहा होउंगा। घर के लोग मुझे प्रमोद कहते थे और 3 जनवरी के पहले तक यही नाम था। लेकिन, 3 जनवरी, 1911 को जब मैं अपने बाबा (पिता) अमरू पाहन की उंगली थामे, सकुचाते हुए रांची के संत पॉल स्कूल पहुंचा तो न सिर्फ मेरी पैदाइश की तारीख बलद गयी, बल्कि मेरा नाम ही बदल गया।”

रांची के इसी संत पॉल स्कूल से उनकी शुरुआती शिक्षा हुई। वहां के प्रधानाचार्य का जयपाल मुंडा पर विशेष स्नेह था। वजह थी उनका तेज-तर्रार होना। यही वजह थी कि प्रधानाचार्य ने  जयपाल मुंडा को आगे की शिक्षा के लिए इंग्लैंड भेजा। यहां उन्होंने ऑक्सफोर्ड के सेंट जॉन्स कॉलेज से स्नातक की और वहीं से अर्थशास्त्र में एम.ए.किया। वह अर्थशास्त्र में गोल्डमेडलिस्ट भी बने।

 जयपाल सिंह मुंडा बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। इंग्लैंड में ऊंच शिक्षा के साथ-साथ उनकी हॉकी में भी दिलचस्पी हो गई। इसमें उन्हें बड़ी सफलता भी मिली। वर्ष 1928 के एम्सटर्डम ओलम्पिक खेलों में उन्होंने ब्रिटिश भारतीय हॉकी टीम की कप्तानी की। उनकी कप्तानी में टीम ने सवर्ण पदक जीता। साल 1928 में ही उन्होंने भारतीय सिविल सेवा की परीक्षा पास कर ऐसा करने वाले वह पहले भारतीय आदिवासी बने। लेकिन इसी दौरान उन्हें ओलंपिक में जाना पड़ा, जिसकी वजह से वे अपना प्रशिक्षण पूरा नहीं कर पाए और उन्हें बीच में ही भारतीय सिविल सेवा को छोड़ना पड़ा। 1934 में वो घाना के गोल्ड कोस्ट (अफ्रीका) के कॉलेज में प्रिंसिंपल रहे। साल 1936 में वह बीकानेर रियासत में विदेश मंत्री भी रहे। इसके बाद 1937 में रामकुमार कॉलेज, रायपुर में  प्रिंसिंपल रहे।

 इस दौरान वह अपने आदिवासी समाज को पिछड़ेपन से निकालने के बारे में सोचने लगे। तमाम उधेड़बुन के बीच उनके जीवन में बड़ा परिवर्तन आया और सबकुछ छोड़कर उन्होंने आदिवासी समाज के उत्थान के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया। इसके लिए साल 1938 में उन्होंने बिहार (तब झारखंड नहीं बना था) में आदिवासी महासभा का गठन किया। इसका मुख्य उद्देश्य आदिवासियों को मुख्य धारा में शामिल कराना था। इसके लिए जयपाल सिंह मुंडा ने सबसे पहले अलग राज्य की माँग ब्रिटिश सरकार के सामने उठाई, जिसमें बिहार, बंगाल व मध्य प्रांत के कुछ हिस्सों को मिलाकर झारखंड राज्य बनाने की मांग की गई। इस मांग को लेकर वे लगातार संघर्ष करते रहे। उनका मानना था कि आदिवासी समाज के लिए अलग राज्य बनाकर उनके जीवन को जल्द बेहतर बनाया जा सकता है।

 1946 में संविधान सभा के लिए हुए चुनाव में जयपाल सिंह मुंडा भी सदस्य चुने गए। जो काम दलितों के लिए डॉ. आंबेडकर ने संविधान में अधिकार दिलाकर किया, वही काम जयपाल सिंह मुंडा ने आदिवासियों के लिए किया। संविधान सभा के सदस्य के रूप में अपने पहले ही भाषण में उन्होंने साफ कहा कि- “मैं उन लाखों लोगों की ओर से बोलने के लिए खड़ा हुआ हूं, जो सबसे महत्वपूर्ण लोग हैं, जो आजादी के अनजान लड़ाके हैं, जो भारत के मूल निवासी हैं, और जिनको बैकवर्ड ट्राईब्स, प्रीमिटव ट्राईब्स, क्रिमिनल ट्राईब्स और न जाने क्या-क्या कहा जाता है। परन्तु मुझे अपने जंगली (आदिवासी) होने पर गर्व है।”

 उन्होंने संविधान समिति द्वारा अनुसूचित जनजाति शब्द का इस्तेमाल करने का बार-बार विरोध किया। वे चाहते थे कि संविधान मे ‘आदिवासी’ शब्द का इस्तेमाल हो।

आदिवासियों के हितों का ध्यान रखते हुए डॉ. आंबेडकर ने भारत के संविधान में पांचवीं अनुसूची डाल दी, जिसमें आदिवासियों के हक-अधिकार शामिल थे। इस तरह डॉ. आंबेडकर और जयपाल सिंह मुंडा के सयुंक्त प्रयासों से भारतीय संविधान में आदिवासियों के लिए शिक्षा, नौकरी के साथ ही लोकसभा एवं विधानसभाओं मे 7.5 प्रतिशत सीटें आरक्षित कर दी गयीं। इस तरह आदिवासियों को संविधान में विशेष अधिकार प्राप्त हुए।बहुजन नायकों की कहानियां बताती इस महत्वपूर्ण दस्तावेज को मंगवाने के लिए हमसे संपर्क कर सकते हैं। संपर्क- 9013942612

 जयपाल सिंह मुंडा ने वर्ष 1948 में आदिवासी लेबर फेडरेशन की स्थापना की। लेकिन आदिवासियों को राजनैतिक भागेदारी दिलाने के लिए 1 जनवरी 1950 को अखिल भारतीय आदिवासी सभा को उन्होंने ‘झारखंड पार्टी’ में परिवर्तित कर दिया। अपने पहले चुनाव में ही झारखंड पार्टी ने बड़ी सफलता प्राप्त कर तहलका मचा दिया। झारखंड पार्टी के टिकट पर बिहार में 4 सांसद व 32 विधायक चुने गए। इसी तरह का प्रदर्शन 1957 के चुनाव में देखने को मिला। इस चुनाव में 34 विधायक व 5 सांसद चुने गए। लेकिन 1962 के चुनाव में गिरावट देखने को मिली। इस बार 22 विधायक व 5 सांसद चुने गए। परन्तु चुनाव के बाद पार्टी में भगदड़ मच गई जिसके कारण जयपाल मुंडा ने 1963 में इस शर्त के साथ कांग्रेस पार्टी में विलय कर दिया गया कि विलय के बाद कांग्रेस पार्टी अलग झारखंड राज्य का निर्माण करेगी। इसके बाद जयपाल सिंह मुंडा बिहार के पहले आदिवासी उप मुख्यमंत्री बने और सामुदायिक विकास मंत्री बने।

लेकिन कांग्रेस पार्टी ने जिस तरह बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर को धोखा दिया था, उसी तरह जयपाल मुंडा को भी धोखा दिया और अलग झारखंड बनाने का अपना वादा पूरा नहीं किया। कांग्रेस की वादाखिलाफी से नाराज जयपाल मुंडा ने एक महीने के बाद ही अपने पद से इस्तीफा दे दिया। 1967 में जयपाल सिंह मुंडा फिर से सांसद चुने गऐ। इसके बाद कांग्रेस से उनका मनमुटाव बढ़ता ही चला गया।

 13 मार्च, 1970 को जयपाल सिंह मुंडा ने माना कि “कांग्रेस ने धोखा दिया और झारखण्ड पार्टी का विलय सबसे बड़ी भूल थी। मैं झारखण्ड पार्टी में लौटूंगा और अलग झारखण्ड राज्य के लिए आंदोलन करूंगा।” लेकिन इस घोषणा के एक सप्ताह बाद ही 20 मार्च 1970 को जयपाल सिंह मुंडा का दिल्ली में परिनिर्वाण (देहांत) हो गया।

आज तमाम लोग जयपाल मुंडा के कांग्रेस के साथ जाने को लेकर उनकी आलोचना करते हैं। कहा जाता है कि उन्होंने कांग्रेस के साथ पार्टी का विलय कर बहुत बड़ी भूल की। लेकिन उन्होंने ऐसा किस मजबूरी वश  किया, यह समझना जरूरी है। सन् 1957 के चुनाव में जयपाल सिंह की झारखंड पार्टी को 34 सीटें मिली थी, जो किसी भी झारखंडी पार्टी के लिए आज भी कल्पनातीत है। लेकिन सन् 1962 के चुनाव में उनकी संख्या घट कर 22 हो गई और सांसदों की संख्या भी पांच से घट कर चार हो गई। इन 22 में से भी 12 विधायकों को कांग्रेस ने खरीद लिया। यानी, मनुवादी दल जो खेल आज खेलते हैं, वह नया नहीं है। निराशा के इन्हीं क्षणों में उन्होंने नेहरू के वादों पर भरोसा कर कांग्रेस के साथ अपनी पार्टी का विलय कर दिया। हालांकि, नेहरू के जीवन काल में ही उन वादों को सिरे से नकारा जाने लगा। 1952 और 1957 के चुनावों में बुरी तरह शिकस्त खाने के बाद कांग्रेस अपनी शातिर चालें चलने लगी और वह सब किया जो आज भाजपा करती हुई दिखती है। जिन 12 विधायकों को कांग्रेस ने तोड़ा उनमें से अधिकतर झारखंड के ही गैर आदिवासी थे।  यानी यह नेहरू की वादाखिलाफी थी, ऐसे में जयपाल मुंडा को दोष देना कहां तक उचित है।

 जयपाल मुंडा एक महान शिक्षाविद्, हॉकी के शानदार खिलाड़ी, सामाजिक क्रांति के योद्धा और सफल राजनीतिज्ञ थे। वह ऐसे शख्स थे जो हॉकी के महानतम खिलाड़ियों में शामिल हैं। वह एक छोटे से आदिवासी गांव से निकल कर ऑक्सफोर्ड से अर्थशास्त्र के गोल्डमेडलिस्ट बनें। जो कांग्रेस की लोकप्रियता को चुनौती दे 1952 और 1957 के विधानसभा चुनाव में 34 सीटें जीत कर कांग्रेस का सफाया कर देता है, जो संविधान सभा के सदस्य के रूप में अपने समानांतर अंबेडकर सहित किसी अन्य नेता से कम प्रखर नहीं, उस पर आदिवासी समाज सहित पूरे देश को गौरवान्वित होना चाहिए।

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