लखनऊ में मारे गए युवक का सच पढ़िए

लखनऊ में जिस लड़के को ATS ने ISIS समर्थक कह कर मार गिराया है, मैं उसकी दिनचर्या पढ़ रहा था जो उसने डायरी के दो पन्नो पर लिख कर अपने कमरे की दीवार पर चिपका रखी थी.. सुबह चार बजे उठकर पहले वो ताज्जुद पढता था, फिर फ़ज्र कि नमाज़, फिर व्यायाम.. फिर नौ बजे कुरान की तिलावत के बाद खाना बनाता था.. 12:30 बजे ज़ुहर की नमाज़ के बाद खाना खा के कैलूला (दोपहर में सोना).. चार बजे उठ कर अस्र कि नमाज़.. उसके बाद कुरान की तफसीर और हदीस पढना.. फिर छः बजे मगरिब की नमाज़ और फिर 8:30 पर इशा की नमाज़ के बाद धर्मशास्त्र पढना.. फिर खाना खा के सो जाना ये दिनचर्या है एक पचीस साल के लड़के की.. कोई आम धार्मिक जब इस तरह की दिनचर्या देखता है किसी इंसान की तो उसे लगता है कि वाह.. क्या इंसान है.. कितना इबादतगुज़ार.. और इस तरह की दिनचर्या में उसको कुछ ग़लत नज़र नहीं आता है.. मगर ये दिनचर्या “प्राकृतिक” नहीं है.. मुझे इसमें बीमारी दिखती है.. जब भी आपका लड़का या आपके आस पास कोई भी इतनी बुरी तरह से धार्मिक बने तो उससे बात कीजिये.. कुछ गड़बड़ मिलेगा आपको उसके भीतर.. टूटा हुआ दिल, दबी हुई कामवासना, सामाजिक बहिष्कार, कोई न कोई छुपी हुई मानसिक या शारीरिक बीमारी.. या इन सब जैसा कुछ.. वो व्यक्ति कभी भी स्वस्थ नहीं होगा जो इस उम्र में इस हद तक धार्मिक हो और वो भी पागलपन की हद तक.. और ऐसे बच्चे को जितना हो सके अपने मौलानाओं से दूर रखिये.. क्योंकि मनोविज्ञान की उन्हें रत्ती भर समझ नहीं होती है.. उनके हिसाब से अल्लाह के लिए जो जितना पागल हो जाए उतना अच्छा क्योंकि उन्होंने ये कभी जाना ही नहीं है कि मनोविज्ञान में “रिलीजियस मेनिया” नाम की बिमारी होती है। सोचिये ज़रा कि उसकी दिनचर्या में अगर रात की “इशा” नमाज़ के बाद एक घंटा “संगीत के रियाज़” का होता और दोपहर की नमाज़ के बाद “कुछ घंटे लैपटॉप” में मूवी देखने के होते तो हालात क्या से क्या होते.. ये स्वस्थ मस्तिष्क के लक्षण होते.. मगर वो नहीं हो सका.. क्योंकि आप मौलाना साहब से बच भी जाएँ तो यहाँ इन्टरनेट पर लाखों बैठे हैं जो आपको टार्चर करने की हद तक धार्मिक बनाने पर लगे रहते हैं.. मैं जब भी गाने या अपने बच्चे के गाने का विडियो डालता हूँ तो मुझे इनबॉक्स में पूछने आ जाते हैं कि आपने नमाज़ पढ़ी या आपके बच्चे ने पढ़ी या बस आप लोग गाते ही हैं? ये जब मुझे समझाने आ जाते हैं तो सोचिये अपने आसपास रहने वालों को ये कैसे जीने देते होंगे। सैफ़ुल्ला जिस भी तरह का इंसान बना वो हमारे कुंठित समाज की वजह से बना.. मुझे क्यूँ नहीं ISIS आकर्षित करता है? मेरे जैसे लाखों करोड़ों को क्यूँ नहीं करता है? क्योंकि मुझे उनकी बीमारी दिखती है.. वो बीमार लोग हैं.. और बीमार ही सिर्फ बीमारी की तरफ आकर्षित हो सकता है.. इस पागलपन की हद तक धार्मिक होना बीमारी है.. मगर हर समाज उसे बढ़ावा देता है.. और फिर सोचता है कि कैसे मेरा बच्चा ऐसा पागल हो गया आखिर? जिस उम्र में उसे भरपूर नींद लेनी चाहिए थी.. लड़की/लड़के/प्रकृति से प्यार करना चाहिए उस वक़्त आप उसे “अल्लाह” से प्यार करना सिखा रहे थे.. जो कि इस समझ और इस उम्र के लिए पूरी तरह अप्राकृतिक है.. मगर आप इसे समझ ही नहीं पाते हैं। मुझ से जब कोई 18/20 साल का लड़का पूछता है कि “ताबिश भाई मुझे थोडा सुफ़िस्म के बारे में बताईये.. ये बताईये कि अल्लाह कैसे मिलेगा? कैसी इबादत करूँ मैं”.. तो मैं उस से पूछता हूँ कि “कोई लड़की मिली आज तक तुम्हे? प्यार किया किसी से कभी? कभी किसी से धोखा खाया?”.. तो ज़्यादातर लड़के जवाब देते हैं कि “क्या ताबिश भाई.. कैसी बात करते हैं आप.. ये सब तो गुनाह है”.. मैं उन्हें समझाता हूँ कि “पहले दुनिया से प्यार करो.. यहाँ प्यार करना सीखो.. पहले आकर से प्यार करो.. प्रकृति से प्यार करो.. स्थूल से प्यार किया नहीं और निराकार के पीछे पड़े हो इस उम्र में.. जाओ मूवी देखो.. संगीत सुनो.. संगीत सीखो.. नाचना सीखो” कुछ को मेरी बात समझ आती है.. मगर कुछ फेसबुक और मौलानाओं के आकर्षण में फँस जाते हैं और फिर वही सैफुल्ला वाली इबादत की रूटीन अपना लेते हैं.. उन्हें यहाँ कि लड़कियां और लड़के “मांस का लोथड़ा” लगने लगते हैं.. और जन्नत में पारदर्शी हूरों की पिंडलियाँ उनकी नींदे हराम करने लगती हैं ~ताबिश ।

महिला दिवस विशेषः महिला सशक्तिकरण के नायक थे मान्यवर कांशीराम

हर साल मार्च महीने की 8 तारीख को महिला सशक्तिकरण की चर्चा हर साल होने वाली एक कवायद भर बनकर रह गई है. तमाम संगठनों द्वारा की जाने वाली यह सारी कवायद ‘महिला सशक्तिकरण’ का ढोल पीटती नजर आती है. लेकिन जब वास्तव में ही इनके सामने किसी महिला के विकास का मामला आता है तो स्वभाविक है ये फिर ‘सशक्तिकरण’ जैसी चीजों को भूल जाते हैं. महिला सशक्तिकरण के संदर्भ में यह कहा जा सकता है कि जब तक बीमारी के कारणों का ज्ञान ना हो तो फिर सही इलाज भी नहीं होता. ठीक इसी प्रकार से भारतीय महिलाओं की समस्याओं के इतिहास व उसके विभिन्न स्तरों को जाने बिना ही कुछ महिला संगठन, चिंतक, कार्यकर्ता, एन०जी०ओ० और तमाम नेता ‘महिला सशक्तिकरण’ की मिसाल बन जाते हैं. वो कुछ सुविधाएं दिलवाकर, किसी ऊंची जाति के घर से किसी महिला का उदाहरण देकर यह मान लेते हैं कि महिलाओं का सशक्तिकरण हो रहा है. इतिहास के सल्तनत काल में एक महिला (रजिया बेगम) दिल्ली की सुल्तान बनी तो क्या हम मान सकते हैं कि उस समय ही महिलाओं का सशक्तिकरण हुआ?. ठीक उसी तरह इंदिरा गाँधी के प्रधानमंत्री बनने को ही उपरोक्त लोग ‘महिला सशक्तिकरण’ का बड़ा उदाहरण मानते है, लेकिन ये भूल जाते है कि रजिया बेगम जहां एक सुल्तान की बेटी थी तो वहीं इंदिरा गांधी भी देश के प्रधानमंत्री की बेटी. ऐसे में ये दोनों महिलाएं पद पर आने के पहले से ही सशक्त थीं. महिला सशक्तिकरण के इन दोनों ऐतिहासिक उदाहरणों के अतिरिक्त एक और उदाहरण भी मिलता है. वह है 3 जून 1995 को देश के सबसे बड़े प्रदेश उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री के रूप में मायावती का मुख्यमंत्री बनना. यही वह वास्तविक उदाहरण है जिसे ‘महिला सशक्तिकरण’ के लिए दिया जा सकता है. अन्य महिलाएं भी इससे प्रेरणा ले सकती हैं. क्योंकि कुमारी मायावती अन्य महिलाओं की तरह संपन्न वर्ग से नहीं थी और ना ही किसी सुल्तान या प्रधानमंत्री की औलाद हैं. दूसरा सबसे बड़ा कारण वो दोनों उदाहरण तो केवल इतिहास भर है जबकि सुश्री मायावती का उदाहरण इतिहास और वर्तमान दोनों है. जिस अनुसूचित जाति से पूर्व मुख्यमंत्री मायावती का सम्बन्ध है, वह ब्राह्मणी धर्मशास्त्रों में हर तरह से गुलाम बनायी गई है. इतनी तरह की गुलामी भरे समुदाय से उठकर एक महिला को मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाने वाले महान योद्धा ‘बहुजन नायक मान्यवर कांशीराम जी’ थे. अगर सही मायनों में देखा जाए तो मान्यवर कांशीराम जी महिला सशक्तिकरण के वास्तविक नायक नजर आते हैं इस महिला उत्थान से सम्बन्धित इतने मजबूत उदहारण को मेनस्ट्रीम की मनुवादी मीडिया और सब लोग बायकाट करते है; और साथ में दलित/बहुजन चिन्तक भी. इस संदर्भ में एक तथ्य यह भी है कि एक महिला (सुश्री मायावती) को यू० पी० के मुख्यमंत्री की गद्दी पर बैठाना कांशीराम जी की मजबूरी नहीं थी और ना ही उनपर किसी प्रकार का दबाव था. उनके पास पुरुष नेताओं की भी बड़ी संख्या थी जो मायावती से भी वरिष्ठ थे. लेकिन मान्यवर कांशीराम ने उन सब नेताओं में एक महिला नेता को यू० पी० की मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बिठाया. हालांकि भारतीय इतिहास इस प्रकार के अद्भुत उदाहरणों से सुना पडा है; लेकिन फिर भी इस उदाहरण को मुख्यधारा के विद्वान, साहित्यकार, बुद्धिजीवी, सामाजिक कार्यकर्ता, मानवाधिकार कार्यकर्ता, महिलाओं के संगठन तथा बहुजन समाज के बुद्धिजीवी चिंतक व कुछ कार्यकर्ता भी नहीं देख रहे हैं. इस महिला सशक्तिकरण के सबसे बड़े ऐतिहासिक उदाहरण को कोई नहीं बताता है. अगर देश के बहुजनों की महिलाओं के सशक्तिकरण का इतिहास लिखा जाएगा तो इसकी शुरुआत बाबा साहेब अम्बेडकर से शुरू होगी और कांशीराम जी से गुजरती हुई ही आगे जाएगी. साधारण परिवार की एक दलित महिला को देश के सबसे बड़े सूबे का मुख्यमंत्री बनाने का मान्यवर कांशीराम जी द्वारा किया गया महान ऐतिहासिक कार्य क्या वास्तव में ही महिला सशक्तिकरण का महान कार्य नहीं है? ‘पायोनियर’ अंग्रेजी अखबार के सम्पादक ‘अजय बोस’ जी ने मायावती जी की जीवनी लिखी है. जो वाणी प्रकाशन से प्रकाशित की गई, मेरा उन सभी लोगों से, महिलाओं से आग्रह है जो ‘महिला सशक्तिकरण’ जैसी किसी चीज के बारे में सोचते हैं, उनको यह जीवनी जरुर पढ़नी चाहिए. उसमें मायावती जी के बचपन के कुछ जानकारियाँ दी गई है. जब मायावती जी 9-10 साल की थी और सम्भवतः पाचवीं कक्षा में पढ़ती थी तो उसके चौथे नम्बर के छोटे भाई सुभाष कुमार का जन्म हुआ था और जब वह मात्र दो ही दिन का था तो उसे सख्त निमोनिया हो गया था. पिता जी भी ड्यूटी करने के लिये दूर गए हुए थे और माँ इस हालत में नहीं थी कि उठ सके. भाई बीमारी से तड़प रहा था और डिस्पेंसरी लगभग 7 किलोमीटर दूर थी. मासूम बच्ची मायावती ने अपने दो दिन के भाई को गोद में उठाया, डिस्पेंसरी का कार्ड लिया, साथ में पानी की बोतल ली और पैदल ही निकल पड़ी. जब भाई रोता-चिल्लाता तो चलते-चलते ही उसे बोतल से पानी पिला देती. उम्र कम होने के कारण बहुत थक जाती तो भाई को कभी बाई तरफ कंधे से लगाती तो कभी दायीं तरफ. दो घंटे पैदल चलकर डिस्पेंसरी पहुंच गई और कार्ड दिखाकर भाई को इंजेक्शन और दवाई दिलवाई जिससे उसकी हालत में सुधार आया. फिर वापिस पैदल चलकर उसी तरह भाई को गोद में उठाकर रात के लगभग साढ़े नौ बजे अकेली घर पहुंची. जब माताजी ने मुझे और भाई को देखा तो उसकी जान में जान आयी. एक अन्य उदाहरण भी दिल्ली का है. दिल्ली की इंद्रपुरी इलाके में हमारे  पड़ोस में घनश्याम सिंह बिरला नामक व्यक्ति की पत्नी को शादी के कई वर्षों बाद भी संतान नहीं हुई थी, लेकिन बाद में उनकी पत्नी गर्भवती हुई तो जिस दिन बच्चा पैदा होने वाला था तो इत्तेफाक से उस दिन उनके घर पर कोई नहीं था. और आस- पड़ोस की महिलाएं उनकी सहायता करना तो दूर उनके पास जाने से भी कतरा रही थी. यह सब सुनकर जब मैं उनकी सहायता करने के लिए जाने लगी तो मेरी माँ ने मुझे कहा की ‘तुम्हारी तो अभी शादी भी नहीं हुई है और उस औरत की बीमारी तुझे लग जाएगी और अन्य महिलाओं ने भी मुझे रोका. लेकिन जब मैं अपनी माँ व अन्य पड़ोसियों की परवाह ना करते हुए और उस औरत को ऑटो में बिठाकर करोलबाग दिल्ली में स्थापित कपूर हॉस्पिटल ले गई, जहां उन्होंने एक पुत्र को जन्म दिया उसके बाद घनश्याम सिंह बिरला जी भी आए तो नर्स जब बच्चे को बिरला जी की गोद में देने लगी तो उन्होंने कहा की “मुझसे पहले इस बच्चे को ‘मायावती’ की गोद में दे दो क्योंकि अगर ये ना होती तो आज ना तो मेरी पत्नी होती और ना ही मेरा बच्चा जिन्दा होता.” उपरोक्त दो उदाहरण तो मजह एक झलक हैं. उनकी पुरे जीवन की एक-एक घटना का वर्णन बहुत ही हैरानी भरा है. आज शिखर पर पहुंची हुई तमाम महिलाओं के जीवन को देखने से मालूम पड़ता है कि वे सब मायावती जी के संघर्ष के सामने बहुत बौनी हैं. उन्हें तो उनकी धन-दौलत व मनुवादी समाज व्यवस्था तथा उनकी सांस्कृतिक पूंजी के लाभ मिले हैं तो ही वो आगे बढ़ी हैं, जबकि मायावती जी तो मनुवादी समाज व्यवस्था में बिना धन-दौलत और बिना सांस्कृतिक पूंजी के ही इन मुख्यधारा की सभी महिलाओं और पुरुषों का अकेले ही सामना कर रही हैं. इसमें हैरत नहीं कि सुश्री मायवती को दुखों और संघर्ष ने पत्थर-समान मजबूत बना दिया है और इसे मजबूती देने वाले महान योद्धा मान्यवर कांशीराम जी थे. उन्होंने मायावती जी की क्षमता को सही रूप से पहचाना और उन्हें अवसर दिया. अवसर मिलने पर मायावती जी ने भी अपने गुरु को दिखा दिया कि अगर हमारी महिलाओं को सही अवसर दिया जाए तो वो भी अपना दम-खम हर क्षेत्र में दिखा सकती हैं. – लेखक भावनगर युनिवर्सिटी भावनगर, गुजरात में शोधार्थी हैं।

इस चुनाव की असली और अकेली विजेता हैं मायावती

यह धारणा पुरानी और रद्दी हो चुकी है कि भारत में चुनाव चुनाव आयोग कराता है। नई धारणा और तथ्य यह है कि भारत में चुनाव न्यूज़ चैनल कराते हैं। चैनल के लोग रिटर्निंग अफसर की भूमिका में हर कार्यक्रम में किसी एक दल की जीत का एलान करते रहते हैं। चुनाव के वक्त नए नए चैनल खुल जाते हैं। नई वेबसाइट बन जाती है। इन्हें लेकर आयोग की कोई रणनीति नज़र नहीं आती है। इसलिए पारंपरिक रूप से अति महिमामंडन की शिकार इस संस्था का तरीके से मूल्यांकन होना चाहिए। चुनाव आयोग समय से पीछे चलने वाली एक पुरातन संस्था है। आयोग के पास राजनीतिक निष्ठा और भय के कारण किसी एक दल की ओर झुके मीडिया को पकड़ने का कोई तरीका नहीं है। पेड न्यूज़ की उसकी समझ सीमित है। आयोग अभी तक एग्ज़िट पोल के खेल को ही समझ पाया है। उसके पास किसी सर्वे के सैंपल जांचने या देखने की कोई समझ नहीं है। अधिकार तो तब मांगेगा जब समझ होगी। न्यूज़ एंकर पार्टी महासचिव की भूमिका में पार्टी का काम कर रहे हैं। एक दल की दिन भर पांच पांच रैली दिखाई जाती है। एक दल की एक भी रैली नहीं दिखाई जाती है। सत्ताधारी दल ने बड़ी आसानी से प्रचार के ख़र्चे और तरीके को बदल कर मीडिया को मिला लिया है। एंकर और पत्रकार अब राजनीतिक दलों के महासचिव हैं और इसमें एक दल की प्रमुखता कायम हो गई है। आयोग के पास ऐसी कोई समझ नहीं है कि वो रैलियों के प्रसारण को लेकर संतुलन कायम करने का कोई नियम बनाए। अख़बार तो आयोग से बिल्कुल ही नहीं डरते हैं। एफ आई आर के बाद भी कुछ फर्क नहीं पड़ा है। राजनीतिक दलों ने अपने ख़र्चे और रणनीति मीडिया को आउटसोर्स कर दिया है। बार्टर(वस्तु विनिमय) सिस्टम आ गया है। विज्ञापन दीजिए और उसके बदले रैली का सीधा प्रसारण घंटों दिखाइये। वो नहीं तो मीडिया घराने के खनन व्यवसाय को लाइसेंस दे दीजिए या सड़क निर्माण में ठेके। सात चरण में चुनाव कराने की उसकी समझ का कायल हो गया हूं। मुझे दुख हो रहा है कि चुनाव जल्दी ख़त्म हो गए। इन्हें कम से कम भादो तक चलने चाहिए थे। उससे भी आगे दुर्गा पूजा तक चुनाव हो सकते थे। 403 चरणों में भी यूपी के चुनाव हो सकते थे। मैंने यह लेख चुनाव आयोग पर नहीं लिखा है। मैंने यह लेख मायावती के लिए लिखा है। इस चुनाव में वे अकेली मीडिया के बनाए एक पक्षीय माहौल के राजनीतिक दबाव से लड़ती रही हैं। पूरी दुनिया के चुनाव में मीडिया के अश्लील इस्तमाल के इस दौर में मायावती ने अपना एक और चुनाव मीडिया के बिना ही पूरा किया। यह बताता है कि उस नेता की बनावट अख़बारी पन्नों से नहीं बल्कि इस्पात के किसी प्रकार से होगी। ज़रूर बसपा ने इस बार सोशल मीडिया का इस्तमाल किया। व्हाट्स अप के लिए नए नए बैनर, वीडियो सामग्री बनाए हैं लेकिन मुख्य तौर पर बसपा ने मीडिया का बेहद संक्षिप्त और पारंपरिक इस्तमाल किया है। मायावती लखनऊ लौटकर एक प्रेस कांफ्रेंस करती थीं और बाकी समय मीडिया को दूर ही रखा। चुनाव से पहले कुछ अखबारों को इंटरव्यू तो दिया मगर टीवी को नहीं दिया। ट्वीटर को तो डूब मरना चाहिए कि वे भारत की अकेली ऐसी नेता हैं जो ट्वीट नहीं करती थीं। अपनी रैली का फोटो अपलोड नहीं कर रही थीं। इस युग में किसी चुनावी रणनीति की कल्पना बग़ैर मीडिया के नहीं हो सकती है। मायावती ने अपने जीवन के सबसे महत्वपूर्ण चुनाव को बग़ैर मीडिया के लड़ा है। उनके लिए ऐसा करना आसान नहीं रहा होगा। कायदे से उन्हें मीडिया के लिए उपलब्ध होना चाहिए था मगर क्या यह सच नहीं है कि मीडिया बसपा को पार्टी ही नहीं मानता है। मायावती को घेरन वाले विरोधी दल टीवी के इस्तमाल से समानांतर माहौल रच रहे थे। कोई भी देखने वाला चकरा जाए कि शायद चुनाव का यही माहौल है। मायावती मीडिया की लगातार बनाई जा रही घारणाओं को नज़रअंदाज़ करती रहीं हैं। सीना फुलाने वाले अच्छे अच्छे नेता टीवी के बनाए इस माहौल में फंस जाते हैं। उनकी धुकधुकी बढ़ जाती है। कई बार माहौल बनवाकर भी वे अंत अंत तक डरे रहते हैं। अजीब अजीब हरकतें करते हैं। दो महीने के चुनाव में मायावती सामान्य बनी रही हैं। इस बात के लिए उनपर रिसर्च होनी चाहिए। इस बात के लिए भी रिसर्च होनी चाहिए कि बग़ैर घनघोर मीडिया के एक नेता आज भी अपने वोटर से और वोटर अपने नेता से कैसे संबंध बनाए रखता है। मायावती भले न दबाव में आती हों मगर वोटर तो उसी मीडिया समाज में रहता है। उस मतदाता के लिए अपने नेता के साथ खड़े रहना कम आसान नहीं रहा होगा। बसपा का कार्यकर्ता तो दस जगह उठता बैठता होगा,वो कैसे उस पार्टी के लिए काम करता होगा जो मीडिया में नज़र नहीं आती है मगर उसकी नेता चार बार मुख्यमंत्री बन चुकी हैं। ऐसा हो नहीं सकता कि हार का डर मायावती को नहीं सताता होगा। बीच चुनाव में उन्हें नहीं लगा होगा कि सबकुछ हाथ से गया। हारने के बाद उन पर तीखे सवालों के हमले होंगे। चिंता तो होती ही होगी कि मीडिया के कारण उनकी पार्टी कमज़ोर पड़ सकती है। इस तरह की ज़रा सी ऐसी स्थिति में आप प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का बर्ताव देखिये और मायावती का देखिये। हार का मामूली डर प्रधानमंत्री को किस तरह से भरभरा सकता है ये बनारस ने देखा होगा और ये भी बनारस की दिखा सकता है कि वो जिस नेता को हिन्दू ह्रदय सम्राट समझता है उसे सभासद की तरह देखने की ख़्वाहिश भी रखता है। अंतिम नतीजा जो भी निकले, तीन दिन तक प्रधानमंत्री बनारस में ऐसे अटके रहे जैसे सातवें चरण का चुनाव 40 सीटों पर नहीं, बल्कि 5 सीटों के लिए हुआ है। एक पक्ष यह हो सकता है कि प्रधानमंत्री युद्ध को युद्ध की तरह लेते हैं। हार रहे हैं तो जीतने के लिए हाथी से उतर सकते हैं। जिस दादा का टिकट काटते हैं उसी का हाथ पकड़ कर पूजा करते हैं। बीच चुनाव में भाषा और रणनीति बदल सकते हैं। बनारस इतना डरा दिया कि वे अकेले नहीं आए, बल्कि बीसों मंत्रियों को बुलाया, सांसदों को बुलाया और संपादकों को भी। अगर आपको अब भी लगता है कि प्रधानमंत्री घबराते नहीं हैं तो आपको सही लगता होगा। इसके ठीक उलट मायावती स्थितप्रज्ञ बनी रहीं। उन्होंने समभाव को नहीं छोड़ा। चीखी चिल्लाई नहीं कि वे डूब रही हैं। बचाओ बचाओ। बसपा के सारे नेता बनारस आओ। सारे कार्यकर्ता बनारस आओ। बनारस हार गए तो सरकार नहीं बनेगी। ऐसा नहीं किया। चुनौतीपूर्ण परिस्थिति में भी वो घबराई नहीं। इसके ठीक उलट चुनाव प्रचार समाप्त होने से एक दिन प्रचार समाप्त कर लखनऊ पहुंच गईं। जो लोग नेतृत्व में साहस और धैर्य के तत्व खोजते रहते हैं उन्हें मायावती फिर भी नहीं दिखेंगी। मोदी ही दिखेंगे जो पांच सीटों की हार से घबराकर गली गली घूमने लगे। मोदी की मदद के लिए पूरा मीडिया था। घंटों सीधा प्रसारण होता रहा। कैमरों के लिए तरह तरह की छवियां बनाई गईं। पहली बार बाबा विश्वनाथ मंदिर की बनी पंरपराओं को तोड़कर पूजा के राजनीतिक स्वांग का सीधा प्रसारण किया गया। गढ़वा आश्रम जाकर गाय को फल खिलाने लगे ताकि ओबीसी मतदात झुक जाएं। ये तब हाल है जब काशी को क्योटो बनाया जा रहा है। वहां के लोग जापान का वीज़ा लेकर बनारस में टहल रहे हैं। लाल बहादुर शास्त्री मेमोरिलय तक चले गए जिसके बारे में इकोनोमिक टाइम्स के सीएल मनोज ने लिखा है कि कायस्थ मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए गए। शास्त्री जी की जाति तक खोज ली गई। बनारस में चैनलों ने जिस तरह से रतजगा किया है उसे देखकर एक सामान्य मतदाता की जान ही निकल जाए। ऐसे में क्या मायावती बिल्कुल नहीं घबराई होगीं? क्या उन्हें बनारस की पांच सीटें चाहिए ही नहीं? आप बनारस में किसी से बात कीजिए। हर सीट पर बसपा लड़ाई में है और कुछ सीटों पर जीतने की स्थिति में है। ये इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि बसपा वहां बग़ैर मायावती के रोड शो और मीडिया के चुनाव लड़ रही है। हो सकता है कि मायावती चुनाव हार जायें। चुनाव हारने के बाद मायावती की निर्मम आलोचना में यही सब न करने के तत्व शामिल होंगे लेकिन सोचिये कि इस चुनाव में कोई ज़िद की तरह अपनी बुनावट को बचाए रखने के लिए अपने तरीके से जीता रहा है। मेरे हिसाब से मीडिया के बनाए चुनावी माहौल की अकेली विजेता मायावती हैं। उन्होंने मीडिया के अश्लील दबावों के सामने घुटने नहीं टेके। मीडिया को न महत्व दिया और न मीडिया ने उन्हें। क्या ऐसा भारत के सबसे लोकप्रिय नेता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कर सकते हैं? क्या हारने की हद तक ख़ुक को किसी चुनाव में टीवी के पर्दे से दूर रहकर प्रचार कर सकते हैं, चुनाव लड़ सकते हैं। मैं इसका जवाब जानता हूं। आप भी जानते हैं। इसलिए इस सवाल पर ठहाके लगाइये। मायावती ने मीडिया को हरा दिया है। चुनाव हारने की कीमत पर वो इस लड़ाई को लड़ती रहीं और जीत गईं हैं। उन्हें जीतनी भी सीटें आएंगी, हर सीट मीडिया के ख़िलाफ़ आएगी।

अंबेडकरवादी आन्दोलन और ओशो का मायाजाल

अंबेडकरवादी आन्दोलन को सबसे बड़ा ख़तरा किस बात से है? यह प्रश्न जितना जटिल है उतना ही जटिल इसका उत्तर भी है. अक्सर हम सोचते हैं कि आजकल काम कर रही राजनीतिक विचारधारों या राजनीतिक सांस्कृतिक संगठनों से ये खतरा है। यह बात कुछ दूर तक सही भी है लेकिन अंबेडकरवादी आन्दोलन को सबसे ज्यादा खतरा वेदांती अध्यात्म के सम्मोहन से है। भारत के गरीब और शोषित लोगों पर जो गुलामियाँ थोपी गईं हैं वे धर्म और अध्यात्म की चाशनी में लपेटकर थोपी गयी हैं ये जहर दार्शनिक सिद्धांतों में लपेटकर पिलाया गया है। और दुर्भाग्य से हमारे दलित और शोषित लोग ही खुद इस अध्यात्म के गुलाम हो रहे हैं. इस बात को मैं लंबे समय से नोट करता रहा हूँ कि किस तरह अंबेडकर और बुद्ध को मानने वालों में भी वेदान्त का जहर भरा हुआ है। कई मित्र हैं जो अंबेडकर और बुद्ध को प्रेम करते हैं लेकिन इसके बावजूद वे ओशो, जग्गी वासुदेव, श्री श्री, विवेकानन्द या अन्य वेदांती बाबाओं की गुलामी में लगे हुए हैं। ऐसे बाबाओं ने ही बुद्ध और अंबेडकर को और उनकी कौम को खत्म करने के षड्यंत्र रचे हैं. हमें इन बाबाओं से मुक्त होना होगा। इस सिलसिले में एक अनुभव आपसे साझा करना चाहूँगा। अभी ओशो के एक सन्यासी ने फोन किया। बुद्ध के विषय में बात कर रहे थे। चूँकि वे अंबेडकरवादी और बुद्ध के प्रेमी भी हैं इसलिए उन्होंने बुद्ध के विषय में मेरे विचार विस्तार से जानने चाहे। मैं हालाकि काफी कुछ लिख चुका हूँ फिर भी चूँकि वे अंबेडकरवादी हैं इसलिए मैं उनसे विस्तार से चर्चा करने को राजी हुआ। बात ले देकर इस मुद्दे पर आती है कि बुध्द ने ईश्वर को आत्मा को और पुनर्जन्म को क्यों नकारा। उन मित्र ने कहा कि ओशो के अनुसार बुद्ध ईश्वर आत्मा और पुनर्जन्म को जानते हुए भी ईश्वर को नकार रहे हैं। मैंने पूछा कि यह बात बुद्ध ने खुद कही है कि वे इन तीनों को जानकर भी नकार रहे हैं? इसपर वे कहने लगे कि पता नहीं लेकिन ओशो तो यही कहते हैं। अब ध्यान दीजिए, ओशो बुद्ध के बारे में बुद्ध से ज्यादा जानते हैं। यही वेदांती मायाजाल है। जैसे बाबा लोग वैज्ञानिकों से ज्यादा विज्ञान और क्वांटम फिजिक्स जानते हैं उसी तरह ओशो जैसे बाजीगर बुद्ध, महावीर कृष्ण मुहम्मद आदि के बारे में खुद उनसे ज्यादा जानते हैं। इन वेदान्तियों में इतनी हिम्मत नहीं कि अपनी बात अपने बूते पर रखें, वे कृष्णमूर्ति या नीत्शे या रसेल या विट्गिस्टीन की तरह अपने दर्शन की जिम्मेदारी खुद नहीं लेते बल्कि विवेकानन्द, अरबिंदो, दयानन्द आदि की तरह सब कुछ वेद उपनिषद या बुद्ध महावीर कृष्ण आदि के मुंह से कहलवाते हैं। यही वेदांती बीमारी है। नया करने में इन्हें डर लगता है। इसीलिये भारत कुछ भी नया नहीं करता। कोई विज्ञानं, तकनीक, चिकित्सा प्रणाली, दर्शन, साहित्य, जीवन शैली, कपड़ा लत्ता, सिनेमा, मनोरंजन या कुछ भी खोजकर दिखा दीजिये जो आधुनिक जगत में भारत ने दुनिया को दी है। ये सिर्फ नकल करते हैं। ओशो इस देश के दुर्भाग्य को समझने की चाबी हैं। मौलिक करने का साहस इन्होंने दिखाया था लेकिन साठ के दशक के अंत में ही स्वयं को पुजवाने की और मठाधीश बनने की हवस ने इन्हें पक्का वेदांती बना दिया। बाद में इन्हें जो कुछ कहना था वो दूसरों के कंधे पर बंदूक रखकर कहा। और इसे वे स्वीकार भी करते हैं। उनके शिष्य इस बात के लिए उनकी तारीफ भी करते जाते हैं। उनमें इतनी भी चेतना नहीं कि इस बात के लिए वे ओशो की भर्त्सना करें कि अगर कहना ही था तो हिम्मत करके अपने नाम से कहते, दूसरों के मुंह में शब्द डालने की क्या जरूरत है? लेकिन वे ऐसा सोचेंगे ही नहीं। क्योंकि ये सब वेदांती लोग हैं, एक ही षड्यंत्र के हिस्से हैं। कृष्णमूर्ति इस संबन्ध में एकदम मौलिक हैं। बचपन से ही उन्हें बुद्ध का अवतार बनाकर खड़ा किया गया लेकिन उनकी ईमानदारी देखिये कि न सिर्फ उन्होंने अवतार होने से इंकार कर दिया बल्कि अपनी शिक्षाओं को भी किसी शास्त्र, परम्परा या आप्त पुरुष से नहीं जोड़ा। उनका जोर रहा कि मेरी बातों की जिम्मेदारी मेरी अपनी है किसी बुद्ध, कृष्ण, जीसस आदि की नहीं। इसीलिये अंतिम सांस तक ओशो कृष्णमूर्ति के खिलाफ बोलते रहे। कल्पना कीजिये अगर कृष्णमूर्ति की जगह ओशो को अवतार घोषित किया जाता तो वे कैसी बाजीगरी का जाल न फैला देते? उन्हें किसी ने बुद्ध अवतार घोषित नहीं किया तो खुद ही उन्होंने प्रचार किया कि बुद्ध मेरे शरीर में आने के लिए लालायित हो रहे हैं। अब ये मजेदार खेल है। उनके कुछ शिष्य अब इसी खेल को आगे बढ़ाते हुए अपने शरीर में शिव, नारद, नानक, कबीर गोरख, ओशो और न जाने किन किन को किराए से कमरा दे चुके हैं। इनमे इतनी हिम्मत नहीं कि अपनी बात अपने नाम से कहे। ये भी गोरख कबीर और नानक के मुंह से वेदांत बुलवा रहे हैं। खैर, उन मित्र को मैंने कहा कि आप अंबेडकरवादी हैं और बुद्ध को प्रेम करते हैं तो ये ओशो के मायाजाल में क्यों फस रहे हैं? अंबेडकर और बुद्ध दोनों ही आत्मा परमात्मा और पुनर्जन्म को नकारते हैं, तब आप क्यों कन्फ्यूज हैं? या तो बुद्ध और अंबेडकर को सीधे समझ लीजिए या ओशो के जाल में फसे रहिये। डेढ़ घण्टे की चर्चा के बाद भी उनके दिमाग से पुनर्जन्म, आत्मा और मोक्ष का भूत नहीं निकला। ये मैं इसलिए लिख रहा हूँ कि आप सब जान सकें कि बुद्ध या अंबेडकरी आंदोलन के खिलाफ सबसे बड़ा कोई हथियार है तो वो वेदांती अध्यात्म ही है। भारत में अब इन वेदान्तियों ने विपस्सना के नाम से भी इस वेदांती अध्यात्म को ही बुद्ध के नाम की आड़ में फैलाना शुरू कर दिया है। किसी भी बाबा योगी या गुरु के आश्रम में चले जाइए सब बुद्ध की व्याख्या कर रहे हैं और विपस्सना में तोड़ फोड़ करके उसमें अपनी बकवास मिला रहे हैं। ये गजब खेल है। इन्हें कृष्ण और राम या विष्णु या तुलसी की नई व्याख्या की फ़िक्र नहीं है। लेकिन बुद्ध और कबीर की बडी फ़िक्र रहती है। कारण साफ़ है। बुद्ध और कबीर से इन्हें डर लगता है अगर बुध्द, कबीर की आग पर इनकी व्याख्याओं का पानी बार बार न डाला गया तो ये आग पूरे वेदान्तिक भूसे को जला डालेगी। इसीलिये ये अपने वेदांती, वैष्णव चैम्पियन्स को सुरक्षित रखते हैं और दंगे में बुद्ध, कबीर को आगे कर देते हैं। ओशो इस खेल को बहुत होशियारी से करते रहे हैं। हम किसी और से उम्मीद न करें लेकिन अंबेडकरवादियों और बुद्ध के प्रेमियों से उम्मीद कर सकते हैं कि वे ओशो की बाजीगरी को समझें और उनसे सावधान रहें। बुद्ध को अंबेडकर की दृष्टि से समझें या सीधा समझने का प्रयास करे।

अम्बेडकरी विचारक किरवले की हत्या और विजयन के सर पर एक करोड़ का इनाम!

यूपी में आखिरी चरण के लिए मतदान बाकी है। दलित शोध छात्र रोहित वेमुला के बाद कोल्हापुर में प्रखर अम्बेडकरी विचारक किरवले की हत्या हो गयी। इससे ज्यादा खतरनाक बात यह है कि उज्जैन में आरएसएस ने गुजरात में हजारों मुसलमानों के कत्लेआम का इकबालिया बयान जारी करते हुए केरल के मुख्यमंत्री के सर पर एक करोड़ के इनाम का ऐलान कर दिया है। कलबुर्गी, पानेसर, दाभोलकर के बाद रोहित वेमुला की हत्या और नजीब की गुमशुदगी के साथ किरवले की हत्या को जोड़कर देखें तो साफ तौर पर आरएसएस ने गुजरात नरसंहार दोहराने का अल्टीमेटम जारी कर दिया है और बहुजनों को भी चेतावनी दे दी है कि अब हिंदूराष्ट्र में अम्बेडकर विमर्श के लिए कोई जगह नहीं है। जाहिर है कि केंद्र या राज्य में सत्ता हासिल करने या विशुध राजनीति या राजकाज से गांधी के हत्यारे कतई खुश नहीं हैं। वे राम राज्य से कम कुछ नहीं चाहते। रोहित के बाद किरवले की हत्या मनुस्मृति लागू करने के लिए भारतीय जनता के खिलाफ संघ परिवार की खुली युद्ध घोषणा है। चंद्रावत ने जिस तरह आम सभा में गुजरात में हजारों मुसलमानों को मौत के घाट उतारने का ऐलान किया है, यह गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे के महिमामंडन का असल एजंडा है। चुनाव जीतने वाली स्थिर सरकार जिसे इशारे पर चल रही हो, वह अचानक इतना ज्यादा आक्रामक तेवर में आ जाये तो समझिये बहुत घनघोर संकट है। जिस तरह विद्यार्थी परिषद ने दिल्ली में उधम मचाया और उसके बाद कोलकाता में भी वह सड़क पर बवाल खड़ा करने के मूड में है, जिस तरह केरल के मुख्यमंत्री के सर पर इनाम एक करोड़ का ऐलान करते हुए आरएसएस के सिपाहसालार ने अमेरिका और भारतीय न्याय प्रणाली की क्लीन चिट को हाशिये पर रखकर सीना ठोंककर कह दिया कि संघ ने गुजरात में हजारों मुसलमानों को कब्रिस्तान में भेज दिया। इस ऐलान के बाद केरल के पलक्कड़ में तीन वाम कार्यकर्ताओं पर हमले भी हो गये। संघ परिवार इस इकबालिया बयान से पल्ला झाड़ने के लिए चंद्रावत को उनकी जिम्मेदारी से मुक्त कर दिया है, लेकिन अभी तक मध्यप्रदेश सरकार ने उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की है। इसी के मध्य कोल्हापुर से खबर आयी है कि कामरेड गोविन्द पानसरे के बाद अज्ञात हत्यारों ने आज सुबह कोल्हापुर विवि में मराठी विभाग के पूर्व अध्यक्ष डॉ कृष्णा किरवले की उन्हीं के घर में घुस कर हत्या कर दी। डॉ किरवले अपने प्रखर अम्बेडकरवादी विचारों के लिए जाने जाते थे। खबरों के मुताबिक इस नृशंस हत्या का पैटर्न वही है जो हत्यारों ने क्रमशः डॉ नरेंद्र दाभोलकर, कॉ गोविन्द पानसरे और प्रो एम एम कलबुर्गी की हत्या के समय अपनाया था। गौरतलब है कि इन तीनों प्रकरणों में हत्यारे अभी तक पकडे नही गये हैं और समाज के प्रगतिशील बौद्धिक नेतृत्व को हत्या जैसे हिंसक तरीकों से खामोश किये जाने की कोशिशें एक लंबे अरसे से जारी है।

‘मैं अछूत हूं: मैं रोहित वेमुला हूं’

केरल के अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त नाटकार और अभिनेता रामचन्द्रन माकरी उर्फ डागटर माकरी के हालिया के मलयालम भाषा के नाटक का शीर्षक है- ‘मैं अछूत हूं: मैं रोहित वेमुला हूं’। कौन कितनी उम्र तक जीया, यह कोई मायने नहीं रखता, कैसे जीया, किस उद्देश्य के लिए जीया और मरा, इतिहास इसी का लेखा-जोखा रखता है। इतिहास में कुछ लोग चन्द वर्षों की उम्र में ऐसा कुछ कर जाते है कि वे नायक और महानायक की श्रेणी में शामिल हो जाते हैं और आने वाली पीढ़ियों के आदर्श और प्रेरणा के स्रोत बन जाते हैं। ऐसा ही एक नायक रोहित वेमुला है। 26 वर्ष का यह नौजवान आज पूरे देश के भीतर उर्जा और प्रेरणा का स्रोत बन गया है, क्योंकि वह अन्याय के खिलाफ संघर्ष का प्रतीक बन चुका है। उसकी मौत और जिंदगी, न केवल राजनीति और समाज को आंदोलित किए हुए है, बल्कि सांस्कृतिक जगत का भी प्रेरणा स्रोत बन गई है। उस पर एक डाक्यूमेंट्री फिल्म बन चुकी है और दूसरी बन रही है। हाल ही में प्रसिद्ध मलयालम नाटकार का यह नाटक केरल में लोगों के सामने आया। इसके नाटककार अभिनेता रामचन्द्रन माकरी हैं, जिनहोंने स्वयं छुआछूत का दंश झेला है। उनका यह नाटक केरल में दलित-आदिवासियों की स्थिति और संघर्ष को भी सामने लाता है। माकरी शूद्र समुदाय के पहले पहले व्यक्ति हैं, जिन्हें कोलकात्ता विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ ड्रामा में नियुक्ति मिली। 28 फरवरी को केरल में संपन्न हुए अंतरराष्ट्रीय थियेटर महोत्सव में उन्होंने रोहित वेमुला द्वारा झेले गए आंतक और उसकी आत्महत्या से लगे धक्के को विषय- वस्तु बनाकर ‘मै अछूत हूं: मैं रोहित वेमुला हूं’ नाटक प्रस्तुत किया। इस पूरे संदर्भ में उनका साक्षात्कार ‘दी इंडियन एक्सप्रेस’  अखबार में एक मार्च को प्रकाशित हुआ, जिसे साभार अनुवादित कर “दलित दस्तक” में प्रकाशित किया जा रहा है। किस चीज ने आपको इस नाटक की रचना के लिए प्रेरित किया? मैं रोहित की आत्महत्या से आवाक् हो गया था। इसने देश के नौजवानों को स्तब्ध कर दिया था। एक नए भारत निर्माण की चेतना दलितों के भीतर की आग से उभर रही है। रोहित वेमुला एक भावुक नौजवान था। उसने कहा था कि “ मैं हमेशा लेखक बनना चाहता था। विज्ञान का एक लेखक, कार्ल सगन की तरह का।” दलितों का अस्तित्व मायने रखता है और यह नई राजनीति, सौंदर्यशास्त्र और इतिहास के पुर्नपाठ का प्रभावी हिस्सा हो गया है। एक अभिनेता के तौर पर रोहित ने मेरे शरीर, आत्मा, मांसपेशियों, खून और नस-नस को उत्तेजित कर दिया। यह नाटक मेरी भीतरी जरूरत से पैदा हुआ। आपने इस प्रस्तुति के लिए सोशल मीडिया, मुख्य रूप से फेसबुक का इस्तेमाल किया? मैंने सोशल नेटवर्क का इस्तेमाल रोहित वेमुला पर बात-चीत करने के लिए किया। मैंने केरल और केरल के बाहर के अन्य नाटकारों से संपर्क किया। उनसे कहा कि वे अपने तरीके से रोहित वेमुला पर प्रस्तुति करने से लिए मेरे साथ शामिल हों। मुझे उम्मीद थी कि अभिनेताओं को निर्देशकों के चंगुल से मुक्त होकर रोहित पर नाटक प्रस्तुत करना चाहिए। लगभग 26 अभिनेताओं ने इसका जवाब दिया। इसमें से ज्यादातर कार्यकर्ता थे, जो राजनीतिक नाटकों की प्रस्तुति में मशगूल हैं। आपके नाटक की प्रस्तुति का स्वरूप क्या है? इस नाटक में मैं एक ठेला खींच रहा हूं, जिसका परंपरागत तौर पर इस्तेमाल सब्जियों को ले जाने के लिए किया जाता है। इसमें एक अभिनेता चटाई में लिपटे मृत शरीर को खींच कर ले जा रहा है। मैं ठेले के सामने हूं और एक महिला पीछे है। हम लोग दलितों के संघर्ष के इतिहास का गीत गा रहे हैं। प्रस्तुति रोहित वेमुला की कविताओं के माध्यम से टुकड़ों-टुकड़ों में बंटी है, साथ ही साथ पूरे इतिहास में दलितों की निर्मम हत्याओं से इसे संयोजित किया गया है। नाटक सीधी रेखा में नहीं चलता है, इतिहास के एक समय से दूसरे समय में छलांग लगाता रहता है। आखिरकार मैं शव को अपनी बांहों में ले लेता हूं और दर्शको की ओर ले जाता हूं। नाटक का अन्त तब होता है, जब मैं शव को अपनी बाहों में लेकर लेट जाता हूं और शव के मुंह से ‘जय’ और ‘भीम’  जैसे शब्द निकलते हैं। क्या आप भी पिछड़ी जाति के हैं?  जब मैं बच्चा था, तो भेदभाव का अनुभव किया। यदि मैं अपने घर के पास के उंची जाति के हिन्दू के घर जाता था, तो यदि मैं चाय पीता था, तो मुझे कप धुल कर रखना पड़ता था। हमारे जैसे लोगों के पीने के कप अलग रखे रहते थे। इस चीज ने मेरे ऊपर गहरा असर डाला, खास कर उस स्थिति में जब ऊंची जाति का लड़का मेरे साथ पढ़ता था और मेरे साथ ही स्कूल जाता था।

क्यों भाजपा के खिलाफ खड़े हो रहे हैं दलित

हाल ही में सहज रूप से शुरू हुए दलित आंदोलनों की लहर में एक खास भाजपा-विरोधी रंग है। चाहे वह रोहित वेमुला की सांस्थानिक हत्या पर देश भर के छात्रों का विरोध हो या फिर गुजरात में सबकी आंखों के सामने चार दलित नौजवानों को सरेआम पीटे जाने की शर्मनाक घटना पर राज्य में चल रहा विरोध हो, या फिर मुंबई में ऐतिहासिक आंबेडकर भवन को गिराए जाने पर 19 जुलाई को होने वाला विरोध प्रदर्शन हो, या राजस्थान में एक नाबालिग स्कूली छात्रा के कथित बलात्कार और हत्या पर उभरा गुस्सा हो या फिर उत्तर प्रदेश में मायावती के लिए भाजपा के उपाध्यक्ष द्वारा की “वेश्या वाली टिप्पणी” पर राज्य में होने वाला भारी विरोध हो, भाजपा के खिलाफ दलितों के गुस्से को साफ-साफ महसूस किया जा सकता है। भाजपा के दलित हनुमान चाहे इस आग को जितना भी बुझाने की कोशिश करें, यह नामुमकिन है कि अगले साल राज्यों में होने वाले चुनावों तक यह बुझ पाएगी। इससे भी बढ़ कर, इन प्रदर्शनों में उठ खड़े होने का एक जज्बा भी है, एक ऐसा जज्बा जिसमें इसका अहसास भरा हुआ है कि उनके साथ धोखा हुआ है। अगर यह बात सही है तो फिर यह संघ परिवार के हिंदू राष्ट्र की परियोजना की जड़ों में मट्ठा डाल सकती है। रोहित की बार-बार हत्या
रोहित की संस्थागत हत्या के बारे में अब सब इतना जानते हैं कि उस पर यहां अलग से चर्चा करना जरूरी नहीं है। लेकिन जिस तरीके से उसको दबाने की कोशिश हो रही है वो हत्या से कम आपराधिक नहीं है। गाचीबावड़ी पुलिस ने हैदराबाद केंद्रीय विवि के विवादास्पद वाइस चांसलर अप्पा राव पोडिले, भाजपा सांसद और मोदी के मंत्रिमंडल के मंत्री बंडारू दत्तात्रेय और एचसीयू में एबीवीपी के अध्यक्ष एन. सुशील कुमार के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने के लिए उत्पीड़न अधिनियम के तहत एक मामला दर्ज किया है। लेकिन पुलिस ने कभी इस पर कार्रवाई नहीं की। रोहित की मौत ने छात्रों में आंदोलन की चिन्गारी सुलगा दी थी, जिन्होंने देश भर में ज्वाइंट एक्शन कमेटियां गठित की थीं। इसने अप्पा राव को कैंपस से भाग जाने पर मजबूर किया था।
लेकिन 22 मार्च को, मामला थोड़ा ठंडा पड़ता दिखने पर वो एकाएक वापस लौटे। स्वाभाविक रूप से आंदोलनकारी छात्रों ने वाइस-चांसलर के आवास के बाहर, जहां वे एक मीटिंग कर रहे थे, एक विरोध प्रदर्शन का आयोजन किया। उन्हें पुलिस की एक बड़ी सी टुकड़ी ने घेर रखा था। जब आंदोलनकारी छात्रों ने एबीवीपी के सदस्यों को इमारत के भीतर देखा तो उन्हें बड़ा धक्का लगा। उन्होंने भीतर जाना चाहा। दरवाजे पर होने वाली इस धक्का-मुक्की की ओट में पुलिस ने गंभीर लाठी चार्ज किया। पुलिस से बातें करने गए दो फैकल्टी सदस्यों को भी नहीं छोड़ा गया। उन्होंने छात्रों को कई किलोमीटर तक झाड़ियों में खदेड़ते हुए पीटा। उन्होंने लड़कियों के साथ छेड़-छाड़ भी की। सभी 27 छात्र और दो फैकल्टी सदस्य प्रो. के.वाई. रत्नम और तथागत सेनगुप्ता को दो पुलिस वैनों में भर दिया गया और फिर हैदराबाद की सड़कों पर घंटों तक चक्कर लगाती उन वैनों में उन पर बेरहम हमलों का एक नया दौर शुरू हुआ। देर शाम तक उनके ठिकाने की कोई खबर नहीं थी। आखिर वे सात दिनों तक कैद रहने के बाद जमानत पर ही बाहर आ सके। रोहित को इंसाफ देने का तो सवाल ही नहीं था, जो लोग इसकी मांग कर रहे थे उन्हें ही सजाएं दी जा रही थीं। मानो इतना ही काफी न हो, गिरफ्तार किए गए प्रोफेसरों को बाद में निलंबित कर दिया गया। जब विवि के प्रवेश द्वार के बाहर उन्होंने अनिश्चित कालीन भूख हड़ताल करते हुए इसका विरोध किया तो जनता और अनेक प्रगतिशील संगठनों की ओर से समर्थन की बाढ़ आ गई। नतीजों से डरे हुए अप्पा राव के होश ठिकाने आए और उन्होंने निलंबन के आदेश वापस लिए। विवादास्पद मंत्री और सबसे अहम मानव संसाधन मंत्रालय का नेतृत्व करने के लिहाज से सबसे नाकाबिल स्मृति ईरानी ने अपने और अपने चापलूसों की करतूतों को जायज ठहराने के लिए संसद में झूठ का पुलिंदा पेश करने में अपना सारा का सारा नाटकीय कौशल लगा दिया। जो कुछ हुआ था, उस पर पछताने के बजाए उन्होंने रोहित के इंसाफ का आंदोलन करने वालों पर आक्रामक हमला किया। रोहित की जाति पर सवाल उठा कर इस मामले को भटकाने की घिनौनी कौशिशें की गईं मानो उनका दलितपन उन्हें हाथोहाथ इंसाफ दिला देगा और उनका दलित न होना अपराधियों के अपराध को हल्का कर देगा। तेलंगाना राज्य की पूरी ताकत – जिसके लिए करीब 600 लोगों ने अपनी जान दे दी थी और उनमें से अनेक दलित थे – मातम में डूबी हुई मां पर टूट पड़ी कि वो अपनी जाति साबित करें। रोहित के पास दलित होने का जाति प्रमाणपत्र होने के बावजूद, एक दलित की जिंदगी जीने और मरने के बावजूद, तेलंगाना प्रशासन ने यह अफवाह फैलाई कि वो दलित नहीं, एक वड्डेरा थे। यह साबित करने के लिए परिवार को जगह-जगह दौड़ाया गया कि रोहित असल में एक दलित थे। उन्हें अपने बेटे को खो देने के दर्द को परे कर देना पड़ा। किस्मत से सरकार की सारी तरकीबें नाकाम रहीं और रोहित का दलित होना साबित हुआ। जैसी कि उम्मीद थी, अपराधियों पर इसका कोई भी फर्क नहीं पड़ा। वे सभी ताकत के अपने पदों पर जमे हुए हैं, जबकि इंसाफ के लिए संघर्ष कर रहे छात्रों को आखिरी हदों तक धकेला जा रहा है। अप्पा राव ने उस दलित वीथि को हटा दिया है, जो रोहित और उनके चार निष्कासित साथियों की आखिरी शरण स्थली थी, जिसे उन्होंने शॉपकॉम पर खड़ा किया था। यह जगह मौजूदा आंदोलन का एक प्रतीकात्मक केंद्र थी। वहां लगाई गई आंबेडकर की प्रतिमा भी चुरा ली गई और रोहित के अस्थायी स्मारक पर लगाए गए रोहित के पोर्ट्रेट को बिगाड़ दिया गया। गुजरात में गुंडागर्दी 11 जुलाई को गुजरात के गिर सोमनाथ जिले में उना तालुका के मोटा समाधियाला गांव में एक दलित परिवार, जाति द्वारा नियत अपने पेशे के मुताबिक एक मरी हुई गाय का चमड़ा उतार रहा था, कि गौ रक्षा समिति का भेस धरे शिव सेना का एक समूह उनके पास पहुंचा। उन्होंने गाय की हत्या करने का आरोप लगाते हुए पूरे परिवार को पीटा और फिर चार नौजवानों को उठा लिया। उन्होंने उनकी कमर में जंजीर बांध कर उन्हें एक एसयूवी से बाध दिया और फिर उन्हें घसीटते हुए उना कस्बे तब ले आए, जहां एक पुलिस थाने के करीब उनको कई घंटों तक सबकी नजरों के सामने पीटा गया। हमलावरों को इस बात को लेकर यकीन था कि उन्हें इसपर कभी भी किसी कार्रवाई का सामना नहीं करना पड़ेगा, इसलिए उन्होंने अपनी इस खौफनाक हरकत का वीडियो बनाया और उसे सार्वजनिक भी किया। लेकिन उनका यह दांव उल्टा पड़ गया। इससे भड़क उठे दलित खुद ब खुद सड़कों पर उतर पड़े। हालांकि गुजरात कभी भी दलितों की स्थिति के लिहाज से आदर्श राज्य नहीं रहा था, लेकिन यह दलितों पर ऐसे दिन-दहाड़े अत्याचार का कभी गवाह नहीं रहा था। राज्य भर में दलितों के भारी विरोध प्रदर्शनों की एक स्वाभाविक लहर दौड़ गई। करीब 30 दलितों ने अपने समुदाय के साथ होने वाली नाइंसाफियों को उजागर करने के लिए खुदकुशी करने की कोशिश की। लेकिन सबसे समझदारी भरी कार्रवाई मवेशियों की लाशों को अनेक जगहों पर कलेक्टर कार्यालयों के सामने डाल देना था। दलितों ने एकजुटता जाहिर करने की एक गैरमामूली कदम उठाते हुए लाशें उठाने और उनका चमड़ा उतारने का अपना परंपरागत काम रोक दिया और इस तरह इनसे होने वाली आमदनी की भी कुर्बानी दी। 28 जुलाई के द टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक गुजरात में हर जगह सड़ती हुई लाशें एक महामारी का खतरा बन गई हैं। पशुपालन विभाग के आंकड़ों के मुताबिक गुजरात में करीब एक करोड़ गाएं और भैंसें हैं जिनके मरने की दर 10 फीसदी है। इसका मतलब ये है कि हर रोज राज्य भर में 2,740 मवेशी मरते हैं। किसी जगह पर ऐसी ही पड़ी एक लाश की बदबू जनता की बर्दाश्त से बाहर हो जाती है, और ऐसे में ऊपर दी गई तादाद तो एक तबाही ही ला सकती है। गौ रक्षा संस्थाओं को होश आ गया है और वे यह कबूल करने को मजबूर हुई हैं कि वो इस समस्या के बारे में नहीं जानती थीं और अब वे लाशों का निबटारा करने के तरीके खोजेंगी। अगर देश भर के नहीं तो पूरे राज्य में मैला ढोने के काम में लगे दलितों (सरकारों द्वारा कसम खा कर उनके वजूद को नकारने के बावजूद उनकी तादाद हजारों में है) और इसी तरह पूरे राज्य के सफाई कर्मियों को भी इस विरोध का हिस्सा बन जाना चाहिए। आंबेडकर की विरासत चकनाचूर 25 जून की रात में आंबेडकरियों का भेस धरे सैकड़ों गुंडे दो बुलडोजर लेकर आए और उन्होंने मुंबई में दादर में स्थित ऐतिहासिक आंबेडकर भवन और आंबेडकर प्रेस को गिरा दिया। ऐसा उन्होंने रत्नाकर गायकवाड़ के कहने पर किया, जो एक रिटायर्ड नौकरशाह हैं और मुख्य सूचना आयुक्त के रूप में अपनी नियुक्ति करवाने में कामयाब रहे हैं। प्रेस का एक ऐतिहासिक मूल्य था, क्योंकि उसका संबंध बाबासाहेब आंबेडकर से था। उनके अहम अखबारों में से दो जनता और प्रबुद्ध भारत यहीं से छपते और प्रकाशित होते थे और यह 1940 के दशक में आंबेडकरी आंदोलन का एक केंद्र भी था। उनके निधन के बाद भी यह एक केंद्र बना रहा; भूमि संघर्ष पर आंदोलन, ‘रिडल्स’ विवाद पर आंदोलन और नामांतर संघर्षों की योजना यहीं बनी और उन अमल हुआ। दूसरी इमारत आंबेडकर भवन एक एकमंजिला, अंग्रेजी के ‘यू’ अक्षर के उल्टे शक्ल की थी जिसे 1990 के दशक में बनाया गया था। इन दोनों इमारतों को गिराने के लिए जिस बहाने की ओट ली गई, कि वे ढांचागत रूप से खतरनाक थे, वे जाहिर तौर पर गायकवाड़ द्वारा ‘गढ़े’ गए थे। इस दुस्साहस भरी कार्रवाई से और इससे भी ज्यादा जिस शर्मनाक और उद्दंड तरीके से उसको जायज ठहराया जा रहा था, उससे लोग भौंचक रह गए। जैसा कि इसके पहले और इसके बाद होने वाली घटनाओं ने उजागर किया, गायकवाड़ राज्य में भाजपा के दिग्गजों के हाथों का मोहरा भर थे। ट्रस्ट की विवादास्पद स्थिति से वाकिफ मुख्यमंत्री ने प्रस्तावित 17 मंजिला आंबेडकर भवन के लिए चोरी-छिपे भूमिपूजन किया (और मजे की बात है कि यह पूजा कहीं और की गई) और इसके लिए 60 करोड़ के अनुदान का ऐलान भी किया। 25 जून को जो कुछ हुआ था, वह खुल्लम-खुल्ला एक आपराधिक करतूत थी, जिसको मजबूरन गायकवाड़ को कबूल करना पड़ा। उन्हें गिरफ्तार किया जाना चाहिए था, लेकिन ऐसा करने से बचने के लिए उनकी संवैधानिक हैसियत का एक झूठा बहाने को सामने कर दिया गया। गायकवाड़ और भाजपा सरकार के अपराधों से नाराजगी के साथ 19 जुलाई को मुंबई में एक भारी मोर्चा निकाला गया। घटनाओं के इस पूरे सिलसिले ने दलितों के भीतर वर्गीय बंटवारे को सबसे बदसूरत तरीके से उजागर किया। जहां उच्च मध्य वर्ग के दलितों ने गायकवाड़ का समर्थन किया, जिसमें प्रवासी दलित (डायस्पोरा) तबका और दलित नौकरशाहों से मिले हराम के पैसों पर आरामतलबी की जिंदगी जीते बौद्ध भिक्षु भी शामिल हैं। दूसरी तरफ दलितों की व्यापक बहुसंख्या ने उनकी गिरफ्तारी की मांग की और आंबेडकर परिवार का समर्थन किया जो गायकवाड़ के खिलाफ खड़े थे। बाबासाहेब आंबेडकर के तीनों पोते आमतौर पर स्वतंत्र रहे हैं और कांग्रेस या भाजपा के साथ सहयोग करने से इन्कार किया है। राजनीतिक रूप से उनका नजरिया अवाम के हक में रहा है और उन्होंने जनसंघर्षों का समर्थन किया है। चाहे जितना भी कमजोर हो, आज वे अकेले आंबेडकरी प्रतिष्ठान है जो पूरी मजबूती से हिंदुत्व ताकतों के खिलाफ हैं। इसलिए भाजपा के लिए उनकी छवि को बदनाम करना जरूरी है। इस काम को पूरा करने के लिए मध्यवर्ग के दलितों के एक हिस्से को चुपचाप उकसाया जा रहा है। धीरे-धीरे उन्होंने यह प्रचार खड़ा किया है कि बाबासाहेब आंबेडकर के वारिस आंबेडकरी नहीं बल्कि माओवाद के समर्थक हैं। कम से कम एक दलित अखबार महानायक पिछले पांच बरसों से इस झूठ को पूरे उन्माद के साथ फैलाता आ रहा है। इमारतों को तोड़े जाने के इस पूरे नाटक के जरिए भाजपा का इरादा इसी मकसद को हासिल करने का था। गायकवाड़ ने तीनों पोतों और उनके पिता यशवंतराव आंबेडकर को गैर कानूनी कब्जा करने वाले नालायक और गुंडा बताया। आंबेडकर भवन को गिराना और आंबेडकर के परिवार की छवि को मिट्टी में मिलाना, गायकवाड़ के ये वो दो जुड़वां काम थे जिनके लिए उन्हें देश भर में भड़कते जनता के गुस्से की अनदेखी करते हुए भाजपा सरकार से समर्थन मिल रहा है। इस खुलेआम आपराधिक मामले में पुलिस और राज्य मशीनरी जिस तरह पेश आती रही है और आ रही है उसी से सरकार का तौर-तरीका साफ हो जाता है। दलित ‘हनुमानों’ की बेशर्मी भाजपा अपने तीनों दलित रामों को अपना ‘हनुमान’ बना देने में कामयाब रही है। उन्होंने कुछ तथाकथित दलित बुद्धिजीवियों को भी लालच देते हुए अपनी हां में हां मिलाने के लिए अपनी तरफ खींचा है। गुजरात में दलित नौजवानों को पीटे जाने पर देश भर में भड़क उठे गुस्से के ताप में भी, एक दलित ‘हनुमान’ ऐसा था जो बेशर्मी से यह कहता फिर रहा था कि दलितों पर अत्याचारों से गुजरात का नाम नहीं जोड़ा जाए। जिस तरह उन्होंने राष्ट्रीय अपराध शोध ब्यूरो (एनसीआरबी) के अपराध के आंकड़ों को गलत और संदर्भ से हटा कर पेश किया, उसी से उनकी गुलामी और बौद्धिक बेईमानी जाहिर होती है। एक तरफ जब गैर-दलित पैनलिस्ट गुजरात में भड़के गुस्से को जायज ठहरा रहे थे, यह पिट्ठू बड़े भद्दे तरीके से यह बहस कर रहा था कि जातीय अत्याचारों के मामले में गुजरात अनेक राज्यों से बेहतर है। तथ्य ये है कि दलितों पर अत्याचारों की घटनाओं के मामले में गुजरात के सिर पर, ऊपर के पांच राज्यों में लगातार बने रहने का एक खास ताज रखा हुआ है। 2013 में जब आने वाले आम चुनावों और प्रधान मंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में ताजपोशी के मद्देनजर मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का ‘वाइब्रेट गुजरात’ का जाप चरम पर पहुंचा, अनुसूचित जातियों (एससी) की प्रति लाख आबादी पर अत्याचारों की तादाद उसके पहले वाले साल के 25.23 से बढ़ कर 29.21 हो गई। इसके नतीजे में राज्य देश का चौथा सबसे बदतर राज्य बन गया। पहले गलत तरीका अपनाते हुए एनसीआरबी अत्याचारों की गिनती प्रति लाख आबादी पर करता आ रहा था; सिर्फ 2012 से यह प्रति लाख एससी आबादी के संदर्भ में घटनाओं को जुटा रहा है। इसलिए एनसीआरबी तालिकाओं में दी गई एससी के खिलाफ अपराध की घटनाओं की दरों को सही आंकड़ों में बदलने की जरूरत होगी, लेकिन उनसे भी राज्यों के बीच में गुजरात की तुलनात्मक स्थिति के बदलने की संभावना कम ही है। हत्या और बलात्कार जैसे बड़े अत्याचारों के मामले में भी गुजरात बदतरीन राज्यों में से है। तालिका एक भारत के बड़े राज्यों में 2012 और 2013 के लिए इन अत्याचारों की दरें मुहैया कराती है, ताकि दिखाया जा सके कि कैसे दलितों के खिलाफ अपराधों के लिए गुजरात का नाम ऊपर के राज्यों में आता है। तालिका साफ-साफ दिखाती है कि हत्याओं की दरों के मामले में 2012 में सिर्फ दो ही राज्य, उत्तर प्रदेश (0.57) और मध्य प्रदेश (0.78) गुजरात से आगे थे और 2013 में गुजरात साफ तौर पर उनका सिरमौर बन गया। असल में यह 2012 में भी करीब-करीब उत्तर प्रदेश के बराबर ठहरता है, जो अनुसूचित जातियों के खिलाफ अपराधों के लिए इतना बदनाम राज्य रहा है। बलात्कारों की दर के मामले में 2012 में पांच राज्य छत्तीसगढ़ (3.86), हरियाणा (2.79), केरल (6.34), मध्य प्रदेश (6.75) और राजस्थान (3.44) गुजरात से आगे रहे हैं। 2013 में गुजरात खुद को ऊपर ले गया और छत्तीसगढ़ को पीछे छोड़ते हुए पांचवें स्थान पर पहुंच गया। यह बस हरियाणा (5.45), केरल (7.36), मध्य प्रदेश (7.31) और राजस्थान (5.01) से ही पीछे था। मोदी के घड़ियाली आंसू कहा गया कि नरेन्द्र मोदी इस हादसे के बारे में जानकर विचलित थे, मानो उनके ‘आदर्श’ गुजरात में पहली बार दलितों पर जुल्म हो रहा हो। सितंबर 2012 में गुजरात के सुरेंद्रनगर जिले के एक छोटे से कस्बे थानगढ़ में मोदी की पुलिस ने लगातार दो दिनों (22 और 23 सितंबर) में तीन दलित नौजवानों को गोली मार कर हत्या कर दी, लेकिन मोदी एक शब्द भी नहीं बोले जबकि वे उस जगह से महज 17 किमी दूर विवेकानंद यूथ विकास यात्रा का नेतृत्व कर रहे थे। पहले दिन एक छोटे से झगड़े में एक दलित नौजवान को पीटने वाले भारवाड़ों के खिलाफ विरोध कर रहे दलितों पर पुलिस ने गोलियां चलाईं। पुलिस फायरिंग में एक सात साल का लड़का पंकज सुमरा गंभीर रूप से घायल हो गया, जिसकी मौत बाद में राजकोट अस्पताल में हो गई। मौत की खबर ने दलितों में नाराजगी भड़का दी जो इस मौत के लिए जिम्मेदार पुलिस अधिकारियों के खिलाफ शिकायत दर्ज करने की मांग के साथ सड़कों पर उतर पड़े। अगले दिन, पुलिस ने आंदोलनकारी दलितों पर फिर से गोलियां चलाईं और तीन दलित नौजवानों को घायल कर दिया, जिनमें से दो मेहुल राठौड़ (17) और प्रकाश परमार (26) राजकोट सिविल अस्पताल में मर गए। 2012 के राज्य विधानसभा चुनावों के ऐन पहले हुई इन हत्याओं से राज्य भर में सदमे की लहर दौड़ गई और चार पुलिस अधिकारियों के खिलाफ शिकायतें दर्ज कराई गईं। जांच सीआईडी (अपराध) को सौंप दी गई। लेकिन पुलिसकर्मियों के खिलाफ दर्ज तीन एफआईआरों के बावजूद सिर्फ एक मामले में ही आरोपपत्र (चार्ज शीट) दायर की गई और एक आरोपित बीसी सोलंकी को तो गिरफ्तार तक नहीं किया गया। गुजरात में अपने दलित समुदाय के सामंती दमन का लंबा इतिहास रहा है। राज्य का दलित समुदाय राष्ट्रीय औसत 16.6 की तुलना में छोटा और आबादी का महज 7।1 फीसदी है और यह मुख्यत: राजनीतिक रूप से निष्क्रिय रहा है। हालिया इतिहास में, 1970 के दशक में दलित पैंथर्स की झलक के बाद, उन्हें 1981 के आरक्षण विरोधी दंगों ने गांधीवादी नींद से झटके से जगाया। पहली बार राज्य भर में आंबेडकर जयंतियों के उत्सव का दौर शुरू हुआ। लेकिन यह जागना बहुत थोड़ी देर का ही साबित हुआ। जब भाजपा ने दलितों की चुनावी अहमियत को महसूस किया और उन्हें लुभाना शुरू किया, वे आसानी से उनकी बातों में आ गए और 1986 में इसके जगन्नाथ रथ जुलूसों में बढ़-चढ़ कर भागीदारी करने लगे। आगे चल कर खास कर 2002 में गोधरा के बाद मुसलमानों के कत्लेआम के दौरान वे राजी-खुशी से इसके लठैत बन गए। लेकिन जमीन पर उनके लिए कुछ भी नहीं बदला। दलित-विरोधी सिविल सोसायटी की हिमायत से राज्य की खुली या छुपी मिलीभगत के साथ भेदभाव, अपमान, शोषण और अत्याचार बेलगाम तरीके से बढ़ते रहे। हाल के ही एक अध्ययन ने दिखाया है कि गुजरात में चार जिलों में होने वाले अत्याचार के सभी मामलों में से 36.6 फीसदी को अत्याचार निवारण अधिनियम (एट्रॉसिटी एक्ट) के तहत दर्ज नहीं किया गया था और जहां इस एक्ट को लागू भी किया गया था, वहां भी 84.4 फीसदी मामलों में इसको गलत प्रावधानों के साथ दर्ज किया गया था, जिससे मामलों में हिंसा की गहनता छुप गई थी।[1] इसके पहले अहमदाबाद स्थित काउंसिल फॉर सोशल जस्टिस ने 1 अप्रैल 1995 से एक दशक के भीतर इस एक्ट के तहत राज्य के 16 जिलों में स्थापित स्पेशल एट्रॉसिटी कोर्ट्स में दिए गए 400 फैसलों का अध्ययन किया और पाया कि पुलिस द्वारा नियमों के निरंकुश उल्लंघन ने मुकदमे को कमजोर किया। फिर न्यायपालिका ने अपने पूर्वाग्रहों से भी इस एक्ट को नकारा बनाने में योगदान किया।[2] कोई हैरानी नहीं है कि गुजरात में अत्याचार के मामलों में कसूर साबित होने की दर 10 बरसों में अनुसूचित जातियों-जनजातियों के मामले में भारतीय औसत से छह गुना कम है। 2014 में (जो सबसे ताजा उपलब्ध आंकड़े हैं) अनुसूचित जातियों के खिलाफ अपराधों में से सिर्फ 3.4 फीसदी में ही आखिर में कसूर साबित हो पाया। जबकि इन्हीं अपराधों में कसूर साबित होने की राष्ट्रीय दर 28.8 फीसदी है यानी देश भर में हरेक आठ अत्याचार में एक में कसूर साबित होता है। हैरानी की बात नहीं है कि राज्य में छुआछूत का चलन धड़ल्ले से जारी है। 2007 से 2010 के दौरान गुजरात के दलितों के बीच काम करने वाले एक संगठन नवसर्जन ट्रस्ट द्वारा रॉबर्ट ई। केनेडी सेंर फॉर जस्टिस एंड ह्यूमन राइट्स के साथ मिल कर किए गए “अंडरस्टैंडिंग अनटचेबिलिटी: अ कॉम्प्रीहेन्सिव स्टडी ऑफ प्रैक्टिसेज़ एंड कन्डीशंस इन 1,589 विलेजेज़” नाम के एक अध्ययन ने ग्रामीण गुजरात में छुआछूत के चलन की व्यापक घटनाओं को उजागर किया।[3] अपने आस पास समृद्धि के समंदर में अपने अंधेरे भविष्य को देखते हुए दलितों की नई पीढ़ी इसको कबूल नहीं करेगी। यह भाजपा की मीठी-मीठी बातों के नीचे छुपाई हुई दलित-विरोधी नीतियों की वजह से जमा होता आया गुस्सा था जो राज्य में दलितों के सहज रूप से भड़क उठने की शक्ल में सामने आया। अभागों की आह हालिया आंदोलन दलितों के नए सिरे से उठ खड़े होने के संकेत हैं। कांग्रेस के बरअक्स भाजपा के दोमुंहेपन और निरंकुशता, आंबेडकर के लिए स्मारक बनवाने और खुद को सबसे बड़े आंबेडकर भक्त के रूप दिखाने का पाखंड एक के बाद एक इन दलित विरोधी गतिविधियों से बखूबी तार-तार हो गया है। जब अक्तूबर 2002 में विश्व हिंदू परिषद (विहिप) के गौ रक्षा गिरोहों ने हरियाणा के झज्झर के दुलीना में पांच बेगुनाह दलित नौजवानों को पीट-पीट कर मार दिया था और फिर पुलिस की ठीक नाक के नीचे उन्हें जला दिया था तो विहिप के उपाध्यक्ष गिरिराज किशोर ने उन हत्याओं को यह कह कर जायज ठहराया था: “हमारे धार्मिक ग्रंथों (पुराणों) में गाय की जान इंसानों की जान से ज्यादा महत्वपूर्ण है।” तब हरियाणा के भाजपा अध्यक्ष राम बिलास शर्मा ने गाय की हत्या को इंसान के कत्ल जितने जघन्य अपराध के रूप में लेने का वादा किया था। शायद दलितों ने उस घटना को इक्की-दुक्की घटना के रूप में लेते हुए भाजपा को माफ कर दिया था। लेकिन इस बार एक के बाद एक जल्दी जल्दी होने वाली इन घटनाओं ने ऐसा दिखता है कि भाजपा के असली दलित-विरोधी चरित्र को उन पर उजागर कर दिया है। हालांकि इधर भाजपा ने हिंदू राष्ट्र के अपने एजेंडे को पूरा करने के लिए दलित वोटों की बड़ी अहमियत को इधर महसूस किया है, लेकिन उन दोनों के बीच के ऐतिहासिक और विचारधारात्मक विरोधाभासों को आसानी से नहीं सुलझाया जा सकता है। दलित विरोधी भावनाएं किसी न किसी स्वामी या साध्वी की शेखी के जरिए या फिर हिंदुत्व के गुंडे-मवालियों द्वारा किए गए अत्याचारों के जरिए सामने आती रहेंगी। चाहे इसको जैसी भी शक्ल दी जाए, हिंदुत्व का मतलब हिंदू रिवाजों, प्रथाओं और संस्कृति पर गर्व करना ही है, और ये जाति व्यवस्था का ही एक दूसरा नाम हैं और इस तरह यह दलितों की मुक्ति के एजेंडे का विरोधी है। गाय के लिए हिंदुत्व की सनक ने – जो अब गाय के पूरे परिवार तक फैल गई है – अब मुसलमानों के बाद दलितों को चोट पहुंचाई है। यह उन्हें उनके पसंदीदा बीफ (गोमांस) से वंचित करती है जो प्रोटीन का बहुत सस्ता स्रोत है और इसने उनके लाखों लोगों को बेरोजगार बना दिया है। छोटे किसानों के रूप में दलित मवेशी पालते हैं। ‘गाय नीति’ उनकी माली हालत पर गंभीर चोट करती है। सबसे हैरान करने वाली बात इसके पीछे की अतार्किकता और दोमुंहापन है। आर्थिक अतार्किकता को कई अर्थशास्त्रियों ने उजागर किया है और अगर यह बनी रही तो कुछ बरसों में यह देश के लिए अकेली सबसे बड़ी तबाही बन सकती है। और दोमुंहापन ये है कि जबकि हजारों छोटे कत्लखानों में मवेशियों के कत्ल पर पाबंदी है और जिसने लाखों मुसलमान और दलित बेरोजगार बना दिया है, निर्यात के लिए छह बड़े कत्लखाने इसी समय फल-फूल रहे हैं, जिनमें से चार के मालिक हिंदू हैं और उनमें से भी दो ब्राह्मण हैं। चाहे यह गाय के कत्ल का मामला हो या इसका सांस्कृतिक राष्ट्रवादी पहलू हो, ये सीधे-सीधे दलितों के हितों और उनकी उम्मीदों का विरोधी है। लेखक के अपने विचार नोट्स [1] http://navsarjan.org/navsarjan/status-of-dalits-in-gujarat/ [2] https://www.sabrangindia.in/tags/council-social-justice. [3] http://navsarjan.org/Documents/Untouchability_Report_FINAL_Complete.pdf.

यूपी की जनता बनाम जनतंत्र

हमारे लिए भी यह अहम सवाल है कि आखिर देश के सबसे बड़े प्रदेश उत्तर प्रदेश में किसकी सरकार बनेगी. यह तय है कि सरकार उसी की बनती है जिसे जनता अपना वोट, अपना समर्थन देती है और आप ही लोग जनता जनार्दन हो, बनने वाली सरकार के माई-बाप हो. वक्त कम है सो इस बार घुमा फिरा कर बात नहीं करते हैं. संवाद सीधा होता है तो सीधा पाठकों तक पहुंचता भी है। तो मैं ये कह रहा था कि किसी भी प्रदेश में उसी की सरकार बनती है जिसे वहां की जनता चुनती है, वोट करती है. अब सवाल यह है कि उत्तर प्रदेश की जनता अपने प्रदेश में किसकी सरकार चाहती है. और सरकार चुनने और किसी पार्टी को वोट देने का आपका आधार क्या है? प्रदेश में फिलहाल बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी और भाजपा तीन राजनीतिक दल चुनावी मैदान में हैं। पिछले पांच साल से उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार है. यह एक ऐसी सरकार रही है जो सिर्फ एक बड़े परिवार के दो दर्जन भर लोगों और उनके 50-100 हितैषियों की बात करती है, उनका ख्याल रखती है. इससे ज्यादा वह एक समुदाय विशेष तक सीमित होकर काम करती है और यह बात अब किसी से छुपी हुई नहीं है। इस एक कुनबे की सरकार ने पिछले पांच साल में उत्तर प्रदेश के कल्याण के लिए क्या किया है यह तो प्रदेश की जनता को पता होगा ही, लेकिन एक बार फिर प्रदेश की जनता को चुनाव के पहले के वादों और वर्तमान हालात का जायजा ले लेना चाहिए कि यह पार्टी अपने वायदे पर कहां ठहरती है। भाजपा का जिक्र करना भी जरूरी है. यह पार्टी भले ही तमाम वर्गों को साथ लेकर चलने का दावा करती हो लेकिन उसका यह दावा खोखला है. इसने केंद्र के अपने अब तक के ढाई साल के शासन से यह साबित कर दिया है कि वह बड़ा मौका मिलने के बावजूद अपने सांप्रदायिक सोच से आगे नहीं निकल सकी है। इसके नेताओं के बयान उठाकर देख लिजिए, जो पार्टी और जो लोग अपने बयानों में ऐसी कड़वाहट घोले हैं, सत्ता में आने के बाद क्या वह सभी समाज के लोगों को साथ लेकर चल पाएंगे? उत्तर प्रदेश में कई बार सत्ता में रहने वाली बहुजन समाज पार्टी का जिक्र किए बिना यूपी के मतदाताओं से संवाद पूरा नहीं होता है। इसके जनक कांशीराम जी के शुरुआती दौर में एक नारा बहुत चला था। आइए एक बार फिर उसे याद करते हैं. नारा था- “वोट से लेंगे सीएम-पीएम, आरक्षण से लेंगे एसपी-डीएम”. नारे के दूसरे हिस्से यानि ‘आरक्षण से लेंगे एसपी-डीएम’ को देखें तो एसपी और डीएम तो तमाम लोग बन चुके लेकिन इस नारे का पहला पक्ष ‘वोट से लेंगे सीएम-पीएम’ पर बात होनी जरूरी है क्योंकि पांच साल के लंबे इंतजार के बाद बसपा के समर्थकों और सर्वजन के हित की बात करने वाली बहुजन समाज पार्टी प्रमुखता से यूपी के चुनाव मैदान में है। 2014 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की जनता ने बसपा को क्यों खारिज कर दिया, इस पर बहुजन समाज पार्टी ने आत्ममंथन कर लिया होगा. तो साथ ही इसके बाद न्यायप्रिय और शांति प्रिय लोगों ने भी आत्मविवेचन किया होगा कि संसद में बसपा का प्रतिनिधित्व नहीं होने से वह कौन से जरूरी मुद्दे थे जिनपर बात नहीं हो पाई. बहुजन समाज पार्टी ने अपने शासनकाल में यह साबित किया कि हर वर्ग को साथ लेकर एक न्यायप्रिय और भयमुक्त माहौल में सरकार चलाया जा सकता है। आज भी बसपा की मुखिया और बसपा की सरकार में मुख्यमंत्री का पद संभालने वाली मायावती की न्यायप्रियता और हर वर्ग को साथ लेकर चलने की प्रतिबद्धता के सभी कायल हैं। एक बार फिर वक्त आ गया है जब न्याय पसंद लोगों को 2017 में उत्तर प्रदेश में सरकार बनाने के लिए संविधान पर विश्वास रखने वाले राजनैतिक दल के समर्थन में खड़ा होना होगा. खासतौर पर बहुजन समाज को अपनी ताकत को पहचानना होगा. बहुजनों को बाबासाहेब के संविधान और आरक्षण की पक्षधर राजनैतिक दल के समर्थन में चट्टान की तरह खड़ा होना होगा तो सर्वजन की परिधि में आने वाले अन्य लोगों को भी भारत के संविधान में विश्वास रखने वाले कुशल एवं न्यायप्रिय प्रशासक के हाथ में यूपी की सत्ता सौंपनी होगी. 2012 और 2014 की गलतियों से सीख लेते हुए तथागत बुद्ध के समता, स्वतंत्रता एवं बंधुत्व के सिद्धांत में विश्वास करने वाले दल को वोट देना होगा. यह जनतंत्र की लड़ाई है और यूपी और पंजाब सहित तमाम चुनावी राज्यों की जनता को जनतंत्र को मजबूत करने के लिए वोट करना होगा।

बुद्ध की अनत्ता के सिद्धांत की चोरी और आत्मा का वेदांती भवन

वेदान्त या किसी भी अन्य आस्तिक दर्शन के अंधभक्तों से बात करते हुए बड़ा मजा आता है। कहते हैं ध्यान एक अनुभव है, इन्द्रियातीत अनुभव है। इसकी चर्चा नहीं की जा सकती इसे अनिर्वचनीय और अगम्य अनकहा ही रहने दो। अभी कल से एक प्रौढ़ और सुशिक्षित बुजुर्ग सज्जन से चर्चा चल रही थी। अंत में वे अपने सारे कमेंट्स डिलीट करके विदा हो गये और कह गये कि मैं कहता आंखन देखि, तुम शब्दों को संभालते रहो। कितनी ऊँची लगती है न उनकी बात ? लेकिन कितनी षड्यंत्रपूर्ण और बचकानी है असल में इसे देखिये। पहली बात तो वे कहते हैं कि इन्द्रियातीत अनुभव की चर्चा हो ही नहीं सकती, अब यहाँ गौर से देखिये अनुभव का मतलब ही इन्द्रियों से प्राप्त ज्ञान है, इन्द्रियातीत अनुभव नाम का वेदांती शब्द स्वयं वेदान्त की तरह असंभव शब्द है। वेदांत का अर्थ होता है ज्ञान का अंत – यह अर्थ है तो अनर्थ कि क्या परिभाषा हो सकती है? विज्ञान सिद्ध कर चुका है कि ज्ञान या इन्फोर्मेशन या अनुभव या समझ (इस अर्थ में इन्फोर्मेशन) का कोई नाश नहीं होता। वेदान्त का अर्थ ही वेद (ज्ञान) का अंत है, इस तरह ज्ञान को नष्ट करने वाले दर्शन के रूप में वेदान्त का पूरे भारत पर क्या असर हुआ है वह समझ में आता है। हजारों साल तक अज्ञानी अन्धविश्वासी और गुलाम भारत तभी संभव है जब ज्ञान का सच ही में अंत कर दिया गया हो। तो, वे सज्जन कह गए कि इन्द्रियातीत अनुभव या ज्ञान की चर्चा असंभव है। यह रसगुला चखने जैसा है कोई व्याख्या नहीं हो सकती। कुछ हद तक ये ठीक है लेकिन रसगुल्ले और मिठास के अनुभव को आधार बनाकर बहुत ठोस तर्क और तर्कपूर्ण अनुमान से बहुत कुछ जाना जा सकता है। इसी पर कोमन सेन्स और विवेक सहित कल्पनाशीलता टिकी हुई है जो कि किसी भी तथाकथित अध्यात्मिक ज्ञान से कहीं अधिक महत्वपूर्ण होती है। कोई भी आध्यात्मिक ज्ञान या अनुभव कामन सेन्स से बड़ा नहीं होता। हो ही नहीं सकता। कामन सेन्स ने ही वह विज्ञान तकनीक, सभ्यता, नैतिकता और सौन्दर्यबोध दिया है जिसने हमें इंसान बनाया है। अब इन इंसानों को गुलाम और अन्धविश्वासी बनाकर उलझाए रखने के लिए सबसे जरुरी काम क्या होगा? निश्चित ही तब सबसे जरुरी काम होगा कि ज्ञान के आधार और उसकी संभावना पर ही प्रश्नचिन्ह लगा दिया जाए। सभी आस्तिक दर्शन और खासकर हिन्दू वेदान्त यही करता है। आजकल के बाबाओं को ओशो रजनीश, जग्गी वासुदेव, श्री श्री या मोरारी बापू जी या आसाराम बापूजी को देखिये। वे इन्द्रियों से हासिल ज्ञान को नाकाफी बताते हुए किसी अदृश्य अश्रव्य और अगम्य को अत्यधिक महत्व देते हैं और इस एक मास्टर स्ट्रोक से वे उस तथा कथित अध्यात्मिक ज्ञान, ध्यान, समाधी और निर्विचार सहित आनंद और अनुभव मात्र की व्याख्या का अधिकार अपने पास सुरक्षित रख लेते हैं। इस तरह ज्ञान अनुभव और इनपर खडी सभी संभावनाओं की चाबी वे अपने पास रख लेते हैं और न सिर्फ अपना रोजगार बल्कि इस देश की जड़ता को भी सदियों सदियों तक बनाये रखते हैं। क्या आपको ताज्जुब नहीं होता कि भारत में षड्दर्शन के बाद सातवाँ दर्शन क्यों पैदा नहीं हुआ? क्या दिक्कत है? यूरोप में तो हर दार्शनिक अपना नया स्कूल आफ थॉट आरंभ कर सकता है लेकिन यहाँ अरबिंदो, विवेकानन्द, शिवानन्द, योगानन्द सहित ओशो जैसे बाजीगरों को भी इन छः डब्बों में से कोई एक डब्बा पकड़ना होता है वरना वे भारतीय ज्ञान और दर्शन की छोटी सी और उधार ट्रेन से बाहर निकाल दिए जायेंगे। लेकिन यूरोप में यह ट्रेन बहुत लंबी है। जितना चाहे उतना डब्बे जोड़ते जाइए। इसी से वहां नये ज्ञान विज्ञान तकनीक और सौंदर्यशास्त्र जन्म लेते ही रहते हैं। भारत की पूरी कहानी चार वर्ण और छः दर्शनों पर खत्म हो जाती है। यहाँ हाथ के पंजों की दस उँगलियों के परे कोई गिनती जाती ही नहीं। दस पर बस आ जाता है। यह अगम्य और अनुभवातीत क्या है? अगर यह है तो आप या मैं या कोई और इसकी चर्चा कैसे कर रहा है? अगर यह इतना ही दूर और अगम्य है तो इसकी चर्चा क्यों करते हैं? ये आत्मा परमात्मा और समाधि की रात दिन की बकवास क्यों पिलाई जाती है? फिर जब कोई इनके बारे में सच में ही जिज्ञासा करे तो घबराकर कहेंगे कि ये सब अगम्य अगोचर है। अरे भाई जब ये अगम्य अगोचर अनिर्वचनीय है तो उसकी रात दिन मार्केटिंग और बकवास करते ही क्यों हो? और ध्यान रखियेगा उसकी मार्केटिंग इस तरह की जाती है जैसे अभी ये बाबाजी आपके हाथ में निकालकर रख देंगे “अभी और यहीं”की भाषा में बात करेंगे और हजारों जन्म की साधना की बात भी करेंगे, गुरु की महिमा, शरणागती और गुरु शिष्य परम्परा की बात भी करेंगे। ये ओशो रजनीश का सबसे मजेदार खेल रहा है। अमन और अनात्मा की संभावना पर जो ध्यान का अनुभव खड़ा है उसे आत्मा की बकवास के साथ सिखाते हैं। जब व्यक्ति सनातन आत्मा की चर्चा सुनकर “मैं” को मजबूत बना लेता है तब कहते हैं कि मैं से मुक्त होना ही सच्ची मुक्ति है। अब यहाँ खेल देखिये एक तरफ आत्मा की सनातनता का सिद्धांत देकर आत्मा (मैं, मेरे होने के भाव) को मजबूत कर रहे हैं। फिर साधना सिखा रहे हैं कि इस मैं को विलीन कर दो, ये वेदान्त की जलेबी है। दूसरी तरफ बुद्ध को देखिये वे कहते हैं कि यह मैं होता ही नहीं इसे जान लो। तब इस मैं से मोह और आत्मभाव पैदा ही नहीं होगा। तब ध्यान समाधि या तादात्म्य हीनता एकदम आसान हो जाती है। लेकिन वेदान्त यह नहीं होने देता। वह सनातन आत्मा या मैं के भाव को ठोस खूंटे की तरफ गाड़ देता है फिर इसे विलीन करने का इलाज भी बता है। मतलब पहले कीचड में पाँव डलवाता है फिर स्नान भी करवाता है। इस प्रकार वेदांती हमाम और इसके ठेकेदारों का रोजगार बना रहता है। अब ध्यान दीजिये मैं को विलीन करने की टेक्नोलोजी असल में बुद्ध की अनत्ता की या अनात्मा की टेक्नोलोजी हैं जिसे ये चुराकर आत्मा की टेक्नोलोजी के नाम से मार्केटिंग कर रहे हैं। ऊपर से तुर्रा ये कि अनत्ता या मैं के विलीन होने पर जो शून्य बच रहता है उसे ये “आत्मज्ञान” कहते हैं। हद्द है मूढ़ता की। मतलब समझे आप? आत्मा को मिटाने पर जो ज्ञान हुआ उसे बुद्ध की तरह अनात्मा का ज्ञान कहने में ये डरते हैं कि कहीं चोरी न पकड़ी जाए। उसे ये अनात्मा न कहके आत्मा का ज्ञान कहते हैं। हालाँकि ये भली भाँती जानते हैं कि आत्मा या स्व के विलीन होने पर ही इनका मोक्ष या बुद्ध का निर्वाण घटित होता है और इसीलिये तथा कथित अध्यात्म या धर्म की सारी सफलताएं असल में अनात्मा की सफलता हैं। फिर भी इनका षड्यंत्र देखिये कि इसके बावजूद भी आत्मा और उसकी सनातनता का ढोल बजाना बंद नहीं करते। यह कितना शातिर और गहरा खेल है आप अनुमान लगाइए। इतना स्पष्ट सा विरोधाभास क्या इन्हें नजर नहीं आता? बिलकुल नजर आता है। लेकिन दिक्कत ये है कि अगर ये समाधि या ध्यान के अनुभव को अनात्मा के अनुभव या स्व (मैं/मेरा) के निलंबित हो जाने के अनुभव की तरह प्रचारित करने लगें तो इनमे और बुद्ध में कोई अंतर नहीं रह जाएगा। तब पूरे हिन्दू धर्म और वेदान्त को चोरी पकड़ी जायेगी। इस खेल को गौर से देखिये और समझिये मित्रों। इस देश के शोषक धर्म पर इस स्तर से हमला करेंगे तो यह कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रह जाएगा और बहुत प्रकार से हम शोषण और अंधविश्वासों को चुनौती दे सकेंगे। तब भारत में नैतिकता, विज्ञान, न्यायबोध और धम्म का मार्ग आसान हो सकेगा।

श्मशान और मंदिर इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

अक्सर ही ग्रामीण विकास के मुद्दों पर काम करते हुए गाँवों में लोगों से बात करता हूँ या ग्रामीणों के साथ कोई प्रोजेक्ट की प्लानिंग करता हूँ तो दो बातें हमेशा चौंकाती हैं। पहली बात ये कि ग्रामीण सवर्ण लोग मूलभूत सुविधाओं जैसे सड़क, बिजली, तालाब, स्कूल आदि बनवाने की बजाय मंदिर, श्मशान, कथा, यज्ञ हवन भंडारे आदि में ज्यादा पैसा खर्च करते हैं। दुसरी बात ये कि जहाँ भी सार्वजनिक या सामाजिक संसाधन निर्मित करने की बात आती है वहां स्वर्ण हिन्दू एकदम से धर्मप्राण होकर विकास के खिलाफ हो जाते हैं और भूमिहीन दलित आदिवासी ओबीसी गरीब समुदाय चाहकर भी कुछ कर नहीं पाते।
सीधे तौर पर आप देख सकते हैं कि ग्रामीण भारत के सवर्ण द्विज हिन्दू समुदाय में सामाजिक सहयोग से सड़क बिजली पानी और रोजगार आदि को लेकर कोई बड़ा काम करने की इच्छा नहीं होती। हाँ व्यक्तिगत रूप से वे अपने परिवार जाति समूह आदि में इन मुद्दों पर खूब काम करते हैं और किसी दूसरे समुदाय को घुसने नहीं देते। लेकिन पूरे गाँव के लिए मूलभूत सुविधा की प्लानिंग के लिए उनमे एकदम से वर्णाश्रम धर्मबुद्धि जाग जाती है। ये सवर्ण लोग गांवों में विकास की प्लानिंग में मंदिर और श्मशान पर बहुत जोर देते हैं। हालाँकि गांव में मंदिरों की कोई कमी नहीं होती है। और श्मशान भी एक ही बार जाना है – वो भी मरकर। तो फिर मंदिर और श्मशान पर इतना जोर देने की जरूरत क्या है?
जरूरत है, बहुत गहरी जरूरत है। असल में अगर गांव में सड़क, बिजली, शिक्षा, रोजगार या जीवन की अन्य सुविधाएं बढ़ती हैं तो इसका फायदा सवर्ण द्विज हिंदुओं को नहीं मिलेगा। वो इसलिए कि इनके पास तो ये सब सुविधाएं पहले से ही है। लेकिन इन सब सुविधाओं के बिना जीते आये भूमिहीन गरीब दलित ओबीसी आदिवासियों को इससे तुरन्त फायदा होगा। उनके बच्चे जल्दी ही शिक्षित, स्वस्थ और जागरूक हो सकेंगे। एक या दो पीढ़ी में ही ग्रामीण दबंगों को चुनौती मिलने लगेगी। बेगार, बलात्कार, शोषण बन्द हो जाएगा। राजनितिक समीकरण बदल जायेगा। और समझदार ग्रामीण सवर्ण ये कभी नहीं होने देंगे। इसलिए वे हर योजना हर प्लानिंग में घुसकर पूरे गाँव को मंदिर, श्मशान,धर्मशाला, भंडारा, कथा, प्रवचन, ध्यान, समाधी आदि में उलझाये रखते हैं।
लेकिन मंदिर या श्मशान या अध्यात्म करते क्या हैं?
असल में जाति को बनाये रखने का एक ही तरीका है। जीवन के लिए जो भी जरूरी है उसकी निंदा करो और मृत्यु और मृत्यु के बाद की बकवास की प्रशंसा करो। यही रहस्यवाद, ध्यान समाधी, धर्म, वेदांत, सूफी, भक्ति आदि का कुल जमा काम रहा है। वे परलोक जन्नत मोक्ष पुनर्जन्म, साल्वेशन, ईश्वर आदि की फफूंद उड़ाते रहेंगे और इस जिंदगी के मुद्दों पर, सड़क शिक्षा रोजगार तालाब आदि पर कोई काम नहीं होने देंगे। अब जैसे ही आप मंदिर, मस्जिद, चर्च या श्मशान जाते हैं वैसे ही इस जीवन से ज्यादा चिंता परलोक की होने लगती है। बस इसी मौके की तलाश में सारे पोंगा पंडित और मुल्ला पादरी आदि रहते हैं। आपमें ये परलोक का भय पैदा होते ही वे अपने शास्त्र, मिथक, कर्मकांड, रहस्यवाद और अध्यात्म लेकर घुस जाते हैं और आपको सड़क, शिक्षा रोजगार से हटाकर ध्यान, समाधी, श्राद्ध, रोज़ा, ज़कात, साल्वेशन, मोक्ष आदि में उलझा लेते हैं।
भारत में इसी ढंग से जिंदगी की मूलभूत सुविधाओं को नकारकर परलोक की सुविधाओं पर फोकस बनाये रखा जाता है। फिर इस लोक में भूमिहीन गरीब दलित ओबीसी आदिवासी के बच्चे कुपोषित, अशिक्षित, बेरोजगार बने रहते हैं और वर्णाश्रम (असल में जाति) व्यवस्था बनी रहती है। इसलिए जाति व्यवस्था और इसके शोषण को बनाये रखने के लिए मंदिर और श्मशान बहुत बड़ी भूमिका निभाते आये हैं। ये ही भारत के दुर्भाग्य के स्त्रोत हैं। इसलिए जब कोई मंदिर या श्मशान की बात करे तो सावधान हो जाइये कि वे सज्जन असल में समाज को किस दिशा में ले जाना चाहते हैं।
                                                                                                                                                                                                                                                                                     लेखक के अपने विचार

जुमलेबाजी के जरिए नोटबंदी, बिग डाटा के बड़े झूठ

यह बात पूरी तरह से शायद कभी भी उजागर न हो कि 86.4 फीसदी करेंसी को वापस लेने के इतिहास में अभूतपूर्व रूप से बेवकूफी भरे फैसले के पीछे का राज क्या था, लेकिन अब तक यह पर्याप्त रूप से साफ हो गया है कि यह फैसला और किसी ने नहीं बल्कि भारतीय राईख के डेर फ्यूहरर नरेंद्र मोदी ने लिया था। जब इस फैसले की बेवकूफी उजागर होने लगी तो अपनी मातृसंस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के खास अंदाज में वे जब भी मुंह खोलते हैं, तब नोटबंदी का एक अलग ही मकसद बताने लगे हैं। जब लोगों तक नकदी पहुंचाने की बंदोबस्त चरमरा गई तो उन्होंने लोगों से डिजिटल हो जाने के लिए कहा; ताकि भारत को एक कैशलेस अर्थव्यवस्था बनाया जाए, जिसे बाद में बदल कर लेस-कैश इकोनॉमी (कम नकदी वाली अर्थव्यवस्था) कहा गया। जब 30 दिसंबर को आधार आधारित ई-लेनदेन की बायोमेट्रिक ऐप को ‘भीम’ (बीएचआईएम: भारत इंटरफेस मनी) को नाम दिया गया तो यह कहते हुए वे इससे भी राजनीतिक रोटी सेंकना नहीं भूले कि इसका नाम बाबासाहेब आंबेडकर के नाम पर रखा गया है। लेकिन फिर भी लोगों की नाराजगी इससे दूर न हो सकी, जिनमें से अनगिनत लोग भुखमरी की कगार पर धकेल दिए गए और कइयों की अब तक मौत हो चुकी है। यह बेवकूफी भरी उम्मीद कि पुराने नोटों में जमा किए गए गैरकानूनी धन की भारी मात्रा कभी नहीं लौटेगी नाकाम हो गई है, जब 15 लाख करोड़ रुपए लौट आए हैं। यह रकम वापस लिए गए नोटों का 97 फीसदी है। मोदी ने फौरन अपना लक्ष्य बदलते हुए कहा कि अपराधियों को गिरफ्त में लेने के लिए नोटबंदी की प्रक्रिया में पैदा हुए डाटा का विश्लेषणात्मक उपकरणों के जरिए छानबीन की जाएगी। अपने नेता को सही साबित करने के लिए अनगिनत मोदीभक्त आनन-फानन में यह प्रवचन देने लगे कि कैसे बिग डाटा एनालिटिक्स (बीडीए) गैरकानूनी धन से छुटकारा दिलाने में मदद कर सकते हैं। उन्हें इसका अहसास नहीं था कि इस डाटा में एक बहुत अहम चीज की कमी थी। विश्लेषण का वितंडा बिग डाटा को आम तौर पर अंग्रेजी के वी अक्षर से शुरू होने वाले तीन शब्दों के जरिए परिभाषित किया जाता है: वॉल्युम (यानी आंकड़े का आकार), वेरायटी (यानी डाटा का बहुमुखी स्वरूप: ऑडियो, वीडियो, टेक्स्ट, सिग्नल),  और वेलॉसिटी (यानी डाटा के जमा होने की तेजी). एनालिटिक्स यानी विश्लेषण की व्यवस्था, सांख्यिकीय मॉडलिंग और मशीन लर्निंग को मिला कर बनती है। बिग डाटा के विश्लेषण के दौरान भारी मात्रा में जटिल डाटासमूहों की छानबीन की जाती है, ताकि ऊपर से नजर न आने वाली परिपाटी, अनजान अंदरूनी संबंध, रुझान और अनेक तरह के दूसरे उपयोगी सूचनाएं उजागर हों। लेकिन यह सब सच होने के बावजूद, यह कोई जादू की छड़ी नहीं है जो हवा में से नतीजे पैदा कर सकती है। सही है कि जाली नोटों की रोकथाम के लिए करेंसी नोटों में देश की पहचान करने के संकेत, उनका मूल्य, अनोखे सीरियल नंबर जैसी विशेषताएं तथा इसके अलाव एक पूरा तंत्र मौजूद है। इस डाटा तक नकदी गिनने वाली मशीनों के जरिए आसानी से और हाथोहाथ पहुंचा जा सकता है, बशर्ते उनसे होकर गुजरने वाले करेंसी नोटों के सीरियल नंबरों का पता लगाने और उन्हें स्टोर करने के लिए जरूरी सेंसर मशीनों में लगे हुए हों। इसके जरिए उन आखिरी व्यक्तियों या खाता धारकों तक का पता लगाया जा सकता है, जिनके पास से आखिरी बार ये नोट आए हों या जिन्होंने उनका आखिरी बार उपयोग किया हो। ऐसे अलगोरिद्म बनाए जा सकते हैं कि उन पर डाटा चलाने के बाद वे उन इलाकों का एक अनुमान लगा सकें, जिन इलाकों में रकम की जमाखोरी की गई थी। लेकिन जहां तक नोटबंदी की प्रक्रिया के डाटा की बात है, यह तथ्य बरकरार है कि बैंकों में लगी हुई नोट गिनने की मशीनों में करेंसी नोटों के सीरियल नंबर जमा करने के लिए सेंसर नहीं लगे हैं। इस अहम डाटा की गैरमौजूदगी को देखते हुए इस नतीजे पर पहुंचना नामुमकिन है कि जमा की गई रकम गैरकानूनी थी। किसी व्यक्ति का सुराग लगा पाना तो और भी मुश्किल है। पुराने करेंसी नोटों को नए करेंसी नोटों से बदलने के तरीके ये थे: (1) आम लोगों ने कतारों में लग कर अपनी पसीने की कमाई को बदला, (2) एजेंटों के जरिए नोट बदले गए जिसके लिए 20 से 40 फीसदी कमीशन अदा की गई और (3) 50 फीसदी का जुर्माना कर भर कर नोट जमा किए गए. इनमें से सिर्फ दूसरा तरीका ही गैरकानूनी है, क्योंकि इसके जरिए गैरकानूनी धन को कानूनी धन में तब्दील किया गया। ऐसा दो तरीकों से हुआ: एक, जिसमें बैंक अधिकारियों की मिलीभगत थी, और दो, जिसमें गरीब लोगों को 10 फीसदी के कमीशन पर पुराने नोट बदलने के काम पर लगाया गया। इन तरीकों से करोड़ों रुपए बदले गए। विश्लेषण की प्रक्रिया में इस डाटा से आखिर क्या मतलब निकाला जा सकेगा? उम्मीद के मुताबिक, बस बैंकों के पास जमा रकमों में भारी इजाफा होगा, लेकिन क्या इसे गैरकानूनी धन कहा जा सकता है? नोटबंदी ने सिर्फ एक ही काम किया है और वो यह है कि इसने अपराधियों के गैरकानूनी धन को कानूनी बना दिया है और इस तरह उन्हें फायदा पहुंचाया है। बेवकूफ बनी जनता जैसा कि मैंने अपने पहले के एक स्तंभ (समयांतर, दिसंबर 2016) में लिखा था कि कुल गैरकानूनी धन का सिर्फ 5 फीसदी ही नकदी में है (जिसमें जेवरात भी शामिल हैं)। इसलिए अगर गैरकानूनी धन का सुराग लगाना ही मकसद था, तो नकदी के पीछे पड़ना फायदेमंद नहीं था। गैरकानूनी धन का मुहाना तो कॉरपोरेट दुनिया से निकलता है जिसकी पीठ पर राजनेताओं और नौकरशाहों का हाथ है। दिलचस्प यह है कि इस मुहाने को मोदी की निजी सुरक्षा हासिल है। उन्होंने राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे पर, 20 हजार रुपए प्रति दानदाता तक करों में छूट दे रखी है। इस तरह राजनीतिक दल वो घाट बन गए हैं, जहां अपराधियों के गैरकानूनी धन को धो-पोंछ कर कानूनी बनाया जाता है। खुद मुख्य चुनाव आयुक्त नसीम ज़ैदी ने इन राजनीतिक दलों को, जिनकी संख्या आज 1900 से ज्यादा है, ‘काले धन को ठिकाने लगाने वाला परनाला’ कहा है। बेशक, इसका सबसे बड़ा फायदा भाजपा को मिला है। करेंसी जमा करने के बिद डाटा की छानबीन करके संदिग्धों को पकड़ने का दिखावा करना ऐसा ही है जैसा जाल के बड़े छेद से तो मछलियों के झुंड को निकलने दिया जाए, और फिर मछली पकड़ने का दिखावा किया जाए। क्या मोदी, नोटबंदी का ऐलान करने से पहले जमा की गई भारी रकम की छानबीन करने वाले हैं? आखिरकार, मीडिया रिपोर्टों ने गोपनीयता के उनके दावे की पोल पहले ही खोल दी है कि पिछली तिमाहियों में भारी लेन-देन हुए हैं। यह जानने के लिए बहुत बुद्धि लगाने की भी जरूरत नहीं है कि वे सभी भाजपा के अंदरूनी हलके से जुड़े हुए थे। जब डाका डालने वालों के गिरोह खुलेआम घूम रहे हों तो जेबकतरों की पहचान करने के लिए क्या आपको सचमुच में बिग डाटा एनालिटिक्स उपकरणों की जरूरत है? और ये गिरोह ठीक-ठीक मोदी के अपने राजनीतिक वर्ग से ताल्लुक रखते हैं। असोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) द्वारा उम्मीदवारों के चुनावी हलफनामों के आधार पर तैयार की गई रिपोर्ट के मुताबिक, 16वीं लोकसभा में दोबारा चुने गए 165 सासंदों की परिसंपत्तियों में 2009 से 2014 के दौरान 137 फीसदी का भारी इजाफा हुआ था (एफडीआर के मुताबिक कुल 168 सांसदों में से तीन के हलफनामे भारत के चुनाव आयोग की वेबसाइट पर साफ-साफ उपलब्ध नहीं हैं)। मोदी की अपनी पार्टी परिसंपत्तियों और आपराधिक मुकदमों, दोनों ही मामलों में सबसे ऊपर है। उत्तर प्रदेश में, जहां भाजपा ने 80 में से 71 सीटें जीतीं, वरुण गांधी की परिसंपत्तियां 625 फीसदी की दर से बढ़ीं। 2009 में वरुण गांधी के हलफनामे के मुताबिक उनके पास कुल 4.93 करोड़ की परिसंपत्तियां थीं। 2014 में यह सीधे 30.81 करोड़ बढ़ते हुए, 35.73 करोड़ हो गईं उनकी मां मेनका गांधी की परिसंपत्तियों में 105 फीसदी का इजाफा हुआ। अगर परिसंपत्तियों में इजाफे को भ्रष्टाचार के संकेत के रूप में लिया जाए, तो भाजपा साफ तौर पर कांग्रेस से आगे है। जहां भाजपा के दोबारा चुने गए सांसदों की परिसंपत्तियां तेजी से बढ़ते हुए 2014 में 5.11 करोड़ से 12.6 करोड़ हो गईं, जिसकी वृद्धि दर 146 फीसदी है, वहीं कांग्रेस में 104 फीसदी की वृद्धि दर देखी गई, जो 2009 के 5.66 करोड़ से बढ़ कर 2014 में 5.90 करोड़ हो गई। जनता के सेवक कहे जाने वाले ये राजनेता आखिर कैसे पैसे जुटाने की जादुई छड़ी में तब्दील हो गए हैं, इस सवाल का जवाब मोदी को देना होगा। कभी कॉलेज का मुंह तक न देखने वाले वरुण गांधी एमबीए किए हुए लोगों को मात दे सकते हैं। इसी तरह का जादू नौकरशाहों के मामलों में भी देखा जा सकता है, जिनके बगैर राजनेताओं की जादुई छड़ी कारगर नहीं हो सकती। यह एक आम जानकारी है कि नौकरशाह, खास कर प्रशासन, पुलिस का नियंत्रण करने वाले और नियामक पदों पर तैनात तमाम नौकरशाहों के पास भारी परिसंपत्तियां हैं जो उनकी आमदनी के स्रोत के अनुपात के बाहर हैं उनमें से कितनों की कभी जांच-पड़ताल हुई है, और कितनों को कसूरवार साबित किया गया है? जो फूहड़ गैरबराबरी भारत को दुनिया के सबसे गैरबराबरी वाले देशों में खास तौर से बदनाम करती है, जिसके तहत 57 अरबपतियों के पास इसकी कुल संपत्ति[1] का 58 फीसदी है, वह आखिरकार ईमानदारी की कमाई नहीं है। विश्लेषण की मुश्किलें बीडीए के डाटा आधारित फैसलों के नए मॉडल के नतीजे बड़े हैं, जो सकारात्मक और नकारात्मक दोनों ही हैं। दार्शनिक रूप से कहें तो यह ‘सिद्धांतों का अंत’ कर देता है। [2] बिग डाटा अंदरूनी संबंधों की तलाश करता है, यह वजहों की तलाश नहीं करता. इसकी दिलचस्पी ‘क्यों’के बजाए ‘क्या’में है। इस नए मॉडल पर मुग्ध लोगों के लिए व्हाइट हाउस की एक हालिया रिपोर्ट “बिग डाटा: अ रिपोर्ट ऑन अलगोरिद्मिक सिस्टम्स, अपॉर्च्युनिटी, एंड सिविल राइट्स”इसके खतरों से आगाह करने के काम आ सकती है। यह कहती है, “डाटा को सूचनाओं में बदलने वाला अलगोरिद्म अचूक नहीं है, वह अशुद्ध इनपुट, तर्क, संभाव्यता और अपने बनाने वाले लोगों पर निर्भर करता है।” इसके पहले की एक व्हाइट हाउस रिपोर्ट ने भी स्वचालित और खुफिया फैसलों में एनकोडिंग भेदभाव की संभावनाओं के प्रति आगाह किया था, जो एनालिटिक्स के जटिल अलगोरिद्म का हिस्सा होते हैं। बिग डाटा के फायदे उतने नहीं हैं, जितना गंभीर चिंता निजता और डाटा सुरक्षा के बारे में है। डाटा पारिस्थितिकी के फायदे, सरकार, कारोबार और व्यक्तियों के बीच के शक्ति संबंधों को उलट देते हैं और नस्ली या दूसरी तरह की बदनाम करने वाली छवियों के निर्माण, भेदभाव, समुदायों या समूहों को गैरवाजिब तरीके से अपराधी बताने और आजादियों को सीमित करने की तरफ ले जा सकते हैं। जहां एक तरफ पूरी दुनिया इन मुद्दों को लेकर चिंतित है, भारत सरकार अपने डिजिटल रथ को आगे धकेल रही है और इसके नुकसान की ओर से आंखें मूंदे हुए है। यह आधार डाटा को लेकर बहुत उम्मीद पाले हुए है, जिसका इस्तेमाल करते हुए यह हरेक लेन-देन को डिजिटाइज करना चाहती है, जिसमें बायोमेट्रिक्स पहचान करने का आधार होगा। विशेषज्ञों द्वारा यह दिखाया गया है कि बायोमेट्रिक्स वित्तीय लेनदेन के लिए भरोसेमंद नहीं है, इसके बावजूद मोदी ने बीएचआईएम को “आपका अंगूठा आपका बैंक” के रूप में प्रचारित किया. एक अनोखी पहचान तैयार करने के अपने घोषित उद्देश्य के उलट, 2009 में अपनी शुरुआत के फौरन बाद आधार-ऑथेन्टिकेशन एप्लीकेशन प्रोग्रामिंग इंटरफेस (एपीआई) बनाया गया, जिसने इसको कारोबारों के लिए उपलब्ध करा दिया। जैसाकि इसके निर्माता नंदन निलेकणी ने हाल ही में दावा किया है कि महज एक “आधार-सक्षम बायोमेट्रिक स्मार्टफोन”से 600 अरब डॉलर के अवसर पैदा होने का अंदाजा है। [3] इसमें इस बात की रत्ती भर भी चिंता नहीं है कि भारतीयों की निजता और उनके महत्वपूर्ण डाटा की सुरक्षा का क्या होगा। जब अगस्त 2015 में यह मामला सर्वोच्च न्यायालय में आया तो महाधिवक्ता ने यह कह कर इसे रफा-दफा कर दिया कि इस देश के लोगों को पास निजता का अधिकार नहीं है। दिलचस्प बात यह है कि लगभग ठीक उन्हीं दिनों मानहानि को अपराधों की सूची से हटाने के लिए सरकार ने ठीक इसकी उलटी बात कही कि उन्हें जनता के निजता के अधिकारों की सुरक्षा करनी है। सर्वोच्च न्यायालय ने उचित ही आधार कार्ड के उपयोग को सिर्फ छह क्षेत्रों तक सीमित कर दिया – सार्वजनिक वितरण प्रणाली में राशन, एलपीजी, जन धन योजना, राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम और पेंशन और इसमें भी कार्ड का इस्तेमाल स्वैच्छिक है। लेकिन इसकी पूरी तरह अवमानना करते हुए, सरकार हर जगह इसको अनिवार्य बनाते हुए इसे जबरन लागू कर रही है। जाहिर है कि यह संवैधानिक गारंटियों का उल्लंघन करते हुए हम सबकी जिंदगियों पर पूरा नियंत्रण करना चाहती है और बिग डाटा एनालिटिक्स के इस्तेमाल के साथ हमें प्रयोगशालाओं के जानवर और फरमाबरदार मशीनों के रूप में ढाल देना चाहती है। अगर लोग नोटबंदी से होने वाली तबाहियों को चुपचाप बर्दाश्त कर सकते हैं, तो यह अपराध तो शायद एक जरा सी परेशानी ही मानी जाएगी! नोट्स [1] ऑक्सफेम स्टडी, देखें द हिंदू, 16 जनवरी, 2017. [2] सी एंडरसन, “द एंड ऑफ थ्योरी: द डाटा डेल्युज मेक्स द साइंटिफिक मेथड ऑब्सोलीट,” वायर्ड, 23 जून 2008, ऑनलाइन उपलब्ध www.wired.com/2008/06/pb-theory. [3] https://www.credit-suisse.com/media/cc/docs/cn/india-digital-banking.pdf

प्रजातंत्र को मजबूत करती बसपा

26 जनवरी 2017 को भारत ने अपना 67वां गणतंत्र दिवस मनाया। इन 67 वर्षों में सामाजिक, आर्थिक, न्यायिक, उच्च, तकनीकी एवं प्रबंधन शिक्षा आदि में बहुजनों (अनु. जाति/जजा/अन्य पिछड़ा वर्ग एवं धार्मिक अल्पसंख्यकों) की भागेदारी उनकी जनसंख्या के अनुपात में कत्तई सुनिश्चित नहीं हो पाई है। राजनैतिक धरातल पर भी अनेक राष्ट्रीय राजनैतिक दलों ने उनके साथ न्याय नहीं किया है। यद्यपि जनसंख्या के आधार पर यह समाज बहुसंख्यक हैं, पर इन दलों में नेतृत्व के स्तर पर इनका प्रतिनिधित्व न के बराबर है। इन सभी बहुजन समुदायों को राष्ट्रीय दल प्रकोष्ठों या सेल में बंद कर के रखने की परंपरा रही है। जैसे अनु. जाति, जजा, पिछड़ा वर्ग प्रकोष्ठ। अपवाद को छोड़ दिया जाए तो वो कभी मुख्यधारा नहीं बन पाते हैं। इसी तरह जब इस सवर्ण वर्चस्व वाले राष्ट्रीय दलों की सरकारें बनती हैं तो उनमें भी इक्का-दुक्का बहुजन (अनु. जाति/जजा/अन्य पिछड़ा वर्ग एवं धार्मिक अल्पसंख्यकों) समाजों के कमजोर नेताओं को सरकार में इनकी अस्मिता का मंत्रालय देकर इन्हें पुनः सीमित कर दिया जाता है। उदाहरण के लिए अनु.जाति के मंत्री के लिए सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय आरक्षित रहता है। इसी तरह अल्पसंख्यक समाज के नेता के लिए अल्पसंख्यक मंत्रालय ऐसी स्थिति में समाजों का राष्ट्र की राजनीति में कोई प्रभावशाली योगदान नहीं होता। राष्ट्र में अगर कोई नीति एवं कार्यक्रम बनता है तो इन बहुजन समाज के नेताओं को निर्णयों में शामिल नहीं किया जाता। ऐसी स्थिति में विगत 67 वर्षों में यह देखने में आया है कि एक ओर देश की बहुसंख्यक जनता को सामाजिक, आर्थिक, न्यायिक, शैक्षणिक एवं राजनैतिक सत्ता से दूर रखने का प्रयास किया गया। उनको विशेष कर सरकार के निर्णयों एवं कार्यक्रमों में भागेदारी के अवसर नहीं दिए गए और दूसरी ओर राजनीति, अर्थव्यवस्था, न्यायिक एवं शैक्षणिक व्यवस्था पर सवर्ण समाजों का एकाधिपत्य होता चला गया। उदाहरण के लिए अमरिकी मैगजीन फोर्ब्स के अनुसार भारत के 100 लोग अरबपति हैं और दूसरी ओर अर्जुन सेन गुप्ता कमेटी की रिपोर्ट कहती है कि भारत का 70 प्रतिशत व्यक्ति 20 रुपये प्रतिदिन पर अपना जीवन गुजरता है। इसी कड़ी में वर्तमान केंद्र सरकार को ही ले लें तो हमें पता चलेगा कि लोकसभा स्पीकर से लेकर भारत के दस से बारह कैबिनेट मंत्री ब्राह्मण समाज से आते हैं। शिक्षा में आईआईटी, आईआईएम तथा 43 केंद्रीय विश्वविद्यालयों के शीर्ष नेतृत्व डायरेक्टर या वाइस चांसलर में एक भी अनुसूचित जाति का व्यक्ति नहीं मिलेगा। सामाजिक धरातल पर एक आंकड़े के अनुसार वर्ष 2013-2014 में हर दिन अनुसूचित जातियों पर सवर्ण समाज द्वारा 125 अपराध की घटनाएं दर्ज की गई। हैदराबाद में दलित छात्र रोहित वेमुला जिनकी शहादत को एक साल हो गए हैं और राजस्थान में दलित छात्रा डेल्टा मेघवाल की हत्या के दोषी आज भी खुलेआम घूम रहे हैं। उना में गाय के नाम पर दलितों की पिटाई, दादरी में गाय के मांस को लेकर अखलाक की हत्या, मेवात में गाय के मीट की बिरयानी के नाम पर अल्पसंख्यकों के व्यवसाय पर अत्याचार, लव जेहाद एवं घरवापसी के नाम पर हिंसा आदि अनेक मामले हैं जो सवर्ण बाहुल्य वाले दलों जैसे भाजपा एवं कांग्रेस की राजनीति पर सवाल खड़ा करते हैं। वे बहुजनों को प्रतिनिधित्व देने में नाकामयाब हुए हैं। ऐसा अनजाने में हुआ होता तो बात और थी। ऐसा सोची-समझी रणनीति के तहत हुआ है। एक ओर बहुजनों को सत्ता, संसाधन एवं शिक्षा से वंचित किया गया है और दूसरी ओर इन्हीं चीजों पर सवर्ण समाज विशेष कर ब्राह्मण समाज का एकाधिपत्य एवं वर्चस्व स्थापित किया गया है और आज भी यह प्रक्रिया जोरों से जारी है। ऐसे में भारत के 67वें गणतंत्र दिवस पर यह प्रश्न उठता है कि क्या इन प्रक्रियाओं से देश सशक्त होगा? बहुजनों के प्रतिनिधित्व के अभाव में यह प्रजातंत्र कैसे मजबूत होगा? इन विषम परिस्थितियों के विपरीत ऐतिहासिक दृष्टिकोण से करीब 88 वर्ष पहले बाबासाहेब ने राष्ट्रनिर्माण एवं भारत को प्रजातंत्र बनाने हेतु बहुजनों के प्रतिनिधित्व का प्रश्न उठाया था। इस फलसफे को क्रियान्वित करने हेतु उन्होंने पहले अनुसूचित जाति के लिए पृथक निर्वाचन की मांग की और फिर 1936 में इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी बनाकर इलेक्शन लड़ा। देखते ही देखते उन्होंने अनुसूचित जाति को एक बड़े राजनैतिक समूह के रूप में खड़ा कर दिया। शिड्यूल कास्ट फेडरेशन के माध्यम से उन्होंने इस राजनैतिक जमात को और मजबूत किया। बहुजनों के राजनैतिक प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने के लिए ही उन्होंने आरपीआई की नींव डाली थी। बाबासाहेब का मानना था कि इस राजनैतिक मुहिम से प्रजातंत्र प्रतिनिधित्वकारी बनेगा जिससे राष्ट्र और मजबूत होगा। वे तो बहुजनों की राजनैतिक भागेदारी सुनिश्चित करने के लिए कैबिनेट में भी आरक्षण चाहते थे परंतु 6 दिसंबर 1956 में उनके अकास्मिक परिनिर्वाण से बहुजन राजनीति में अकाल पर गया। इसके पश्चात सन् 1972 में दलित पैंथर्स में उदय के साथ बहुजन राजनीति आगे बढ़ी। परंतु लीडरों के वैचारिक संघर्ष के कारण अल्प आयु में ही वह बंटकर क्षीण हो गई। बहुजनों को भारतीय प्रजातांत्रिक राजनीति में उनकी भागेदारी दिलाने के लिए मान्यवर कांशीराम ने 1984 में बहुजन समाज पार्टी का गठन किया। देखते ही देखते बहुजन समाज पार्टी यानि बसपा बहुजनों की राजनैतिक अकांक्षाओं का केंद्र बन गई। विशेष कर उत्तर प्रदेश में ‘वोट हमारा राज तुम्हारा नहीं चलेगा- नहीं चलेगा’, ‘वोट से लेंगे पीएम-सीएम आरक्षण से लेंगे एसपी-डीएम’, जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी आदि नारों के साथ नवीन राजनीति को आगे बढ़ाया, जिसमें संवैधानिक प्रतिबद्धता एवं प्रतिनिधित्वकारी प्रजातंत्र की साफ झलक दिखाई देती है। बहुजन समाज पार्टी की विशेषता यह है कि उसने प्रजातंत्र की आत्मा और उसके सिद्धांत को जमीनी स्तर पर व्यवहारिकता में अंगीकार किया। संवैधानिक प्रजातंत्र की मूल भावना यह है कि समाज के सबसे नीचले क्रम के सामाजिक समूहों को प्रजातांत्रिक व्यवस्था में अधिकारों के साथ जोड़कर न्याय दिलाया जाए। अपनी फुले-अम्बेडकरी विचारधारा के आधार पर बसपा ने गरीबी रेखा के नीचे असाक्षर ग्रामीण अंचल में रहने वाले भूमिहीन किसान जिसमें सौ फीसदी अनुसूचित जाति के ही लोग आते थे, को सबसे पहले अपनी राजनीति में जोड़ा। फिर उन्होंने बहुजनवाद के नारे के तहत पिछड़ी जातियों जैसे- कुर्मी, मौर्य, राजभर, कुशवाहा, गड़ेरिया, नाई, मल्लाह, बिंद आदि जातियों को जोड़कर राजनैतिक प्रतिनिधित्व देना आरंभ किया। जिन पिछड़ी जातियों की संख्या बहुत कम थी, उनके नेताओं को बसपा नेतृत्व ने एमएलसी बनवाया। इसी प्रकार बहुजनवाद के नारे के तहत 1990 तक आते-आते अल्पसंख्यक समाज के अनेक नेताओं का एक पुंज खड़ा कर दिया है। डॉ। मसूद अहमद, इलियास आजमी, नसिमुद्दीन सिद्दीकी, शेख सुलेमान, अब्दुल मन्नान, दाऊद अहमद, मुनकाद अली, हाजी कुरैशी, अतहर अली, इरशाद खान आदि अनेक नेताओं को खड़ा कर दिया। इतना ही नहीं, बहुजनवाद की विचारधारा के तहत अल्पसंख्यक मंत्रालय की भी स्थापना की गई। अपनी प्रतिनिधित्वकारी प्रजातांत्रिक नीति के तहत बहुजन समाज पार्टी ने सवर्ण समाज के कुछ लीडरों को भी आगे बढ़ाया। परंतु यह उनकी जनसंख्या के अनुपात में था और वे लीडर जो मनुवादी मानसिकता छोड़कर बहुजन समाज को अपनाना चाहते थे। बसपा ने बहुजन समाज के नेतृत्व के माध्यम से ही नहीं बल्कि अपनी नीतियों एवं कार्यक्रमों के माध्यम से भी भारतीय प्रजातंत्र में निम्नतम पायदान में खड़े समाजों का सशक्तिकरण किया। अम्बेडकर ग्राम योजना, प्रोमोशन में रिजर्वेशन, कांशीराम शहरी गरीबी उन्मूलन योजना, माननीय कांशीराम अरबी-फारसी विश्वविद्यालय, शकुंतला मिश्रा विकलांग विश्वविद्यालय, कांशीराम सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल या बहुजन समाज के संतों एवं गुरुओं के सम्मान में पार्कों एवं स्थलों का निर्माण आदि सभी में बहुजन समाजों को सामाजिक न्याय देते हुए कल्याणकारी राज्य की स्थापना करने का प्रयास किया। कड़ी न्याय एवं प्रशासन एवं सांप्रदायिक ताकतों पर कड़ी लगाम लगाकर उन्होंने दलितों, महिलाओं एवं अल्पसंख्यकों आदि समूहों का मनोबल ही नहीं बढ़ाया, पर उनका सशक्तिकरण कर सामाजिक न्याय देने की मुहिम चलाई। उपरोक्त सामाजिक न्याय के साथ विकास एवं प्रतिनिधित्वकारी प्रजातंत्र की पहल का परिणाम यह हुआ कि 2007 में उत्तर प्रदेश की जनता ने बहुजन समाज पार्टी की आत्मनिर्भर पूर्ण बहुमत की सरकार बनवा दी। एक बार फिर बहुजन समाजों के प्रतिनिधित्व के माध्यम से बसपा ने प्रतिनिधित्वकारी प्रजातंत्र को आगे बढ़ाया। दलित, पिछड़े, अतिपिछड़े, अल्पसंख्यक, सवर्ण समाज, सभी के सदस्यों को प्रशासन में जनसंख्या के अनुपात में भागेदारी करने का मौका दिया। पिछड़े समाजों के अनेक लीडर- स्वामी प्रसाद मौर्य, बाबू सिंह कुशवाहा, रामअचल राजभर, सुखदेव राजभर, लालजी वर्मा जैसे कद्दावर लीडर सामने आएं। जिन्हें अभिशासन के लिए एक नहीं बल्कि कई-कई मंत्रालय दिए गए। इसी कड़ी में अल्पसंख्यक समाज के नसीमुद्दीन सिद्दीकी को भी एक से ज्यादा मंत्रालय अभिशासन के लिए दिए गए। सवर्ण समाज के कई मंत्री भी महत्वपूर्ण मंत्रालयों में देखे गए यद्यपि बहुजन समाज ने उन्हें बहुत भारी मन से स्वीकार किया। प्रजातंत्र की इस मुहिम मे विकास की गति को भी तेज किया। इस दौरान उत्तर प्रदेश राज्य की जीडीपी 6.8 रही जो राष्ट्रीय औसत के समान थी। बसपा सुप्रीमो ने राजनीति को सामाजिक न्याय के साथ-साथ विकास के रास्ते पर मोड़ दिया। अपने पांच वर्षों के कार्यकाल में 165 किलोमीटर लंबा एक्सप्रेस-वे का निर्माण कराया जो इतना मजबूत है कि आज वह लड़ाई के समय मिलिट्री एय़रपोर्ट का काम करने में भी सक्षम है। इस एक्सप्रेस-वे पर भारतीय वायु सेना के लड़ाकू विमान उतारे गए, जो इस एक्सप्रेस-वे की मजबूती को प्रमाणित करता है। इसी दौरान दो विश्वविद्यालय और पांच मेडिकल कालेज बनें। बुद्धा फार्मूला वन रेस का सर्किट पी.पी मॉडल के आधार पर बना। बहन जी ने इस दौरान बुद्ध धम्म के कारवां को भी आगे बढ़ाया (देखें दलित दस्तक जनवरी, 2017 अंक)। इतने साकारात्मक कार्य करने के पश्चात भी मीडिया विशेष कर टीवी मीडिया ने सरकार के आखिरी चंद महीनों में नाकारात्मक छवि बना दी और लोग बसपा सरकार और इसकी मुखइया मायावती द्वारा किए गए अनेक साकारात्मक कार्यों को भूल गए। बसपा सुप्रीमो द्वारा कड़ाई से कानून व्यवस्था की स्थापना को वे लोग भूल गए। बसपा शासनकाल के दौरान अखिलेश यादव जैसी कानून व्यवस्था नहीं थी, जिसमें गुंडों द्वारा जमीन को दखल कर लिया जाता था और उसे छुड़ाने में एसपी और इंस्पेक्टर जैसे बड़े पुलिस अधिकारी मारे जाए। बसपा मुखिया के समय सांप्रदायिक संघर्षों पर कड़ी लगाम थी। समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव के शासनकाल में जहां 400 से अधिक सांप्रदायिक संघर्ष हुए। बसपा की सरकार के वक्त व्यपारी वर्ग अपने आप को सुरक्षित महसूस करता था लेकिन मीडिया ने बसपा के इमेज को इतना खंडित किया कि लोग सब भूल गए। एक वरिष्ठ पत्रकार ने मुझसे कहा कि- ‘जितना पैसा बीएसपी ने विकास पर खर्च किया है अगर उसका एक प्रतिशत भी मीडिया के प्रचार पर खर्च करती तो वह चुनाव में कभी नहीं हारती।’ कहने का तात्पर्य यह हुआ कि 2012 के विधानसभा चुनाव में बसपा हारी नहीं परंतु मीडिया ने उसकी छवि धूमिल कर दी थी। बसपा के 2012 में चुनावी हार के बाद बहुजनों का क्या हाल हुआ, यह सभी को पता है। दलितों पर अत्याचार, आरक्षण पर कुठाराधात, अल्पसंख्यकों पर हिंसा, मुजफ्फरनगर, दादरी, पंचकोशी परिक्रमा, लव जेहाद, घरवापसी आदि की वजह से उत्तर प्रदेश में हिन्दू और मुस्लिम समाज में ध्रुवीकरण हुआ और अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी की ढुलमुल राजनीति की वजह से आरएसएस एवं हिन्दुत्वा की राजनीति को बढ़ावा मिला। कई राजनीतिक विश्लेषक तो यह भी इल्जाम लगाते हैं कि 2014 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को अप्रत्याशित सफलता मिलने का मुख्य कारण यूपी में अखिलेश सरकार द्वारा सांप्रदायिक ताकतों को खुली छूट देना था। इसका परिणाम 2017 में देखने के लिए मिल रहा है। लोकतंत्र त्राही-त्राही कर रहा है। सामाजिक न्याय, धर्मनिरपेक्षता एवं प्रतिनिधित्वकारी राजनीति का क्षय हुआ है। अतः 2017 में बसपा एक बार फिर अपनी भागेदारी की राजनीति से भारतीय प्रजातंत्र को मजबूत करने के कड़े प्रयास कर रही है। इसका प्रमाण उसने 2017 के विधानसभा के अपने उम्मीदवारों को टिकट बंटवारे के माध्यम से दिया है। उसने यह टिकट सभी समाजों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व देकर लिया है। यथा सबसे ज्यादा टिकट उसने अपनी बहुजन विचारधारा के तहत पिछड़ी जातियों को एकमुश्त 106 टिकट दिया है। परंतु मनुवादी मीडिया को ये पिछड़ी जातियों को दिए गए टिकट दिखाई ही नहीं देते। वह अपनी वैचारिक बेईमानी की वजह से उस पर कोई टिप्पणी नहीं कर रहे हैं। यद्यपि बसपा सुप्रीमों ने भाईचारा कमेटियों को यह विशेष निर्देश दिया है कि पिछड़ी जातियों की गोलबंदी में कोई भी कमी नहीं आनी चाहिए। इसलिए 2017 के चुनाव में बहुजन समाज पार्टी का एक मजबूत आधार पिछड़ी जातियां ही हैं, इसको नहीं भुलाया जाना चाहिए। यद्यपि भारतीय जनता पार्टी ने बहुजन समाज पार्टी के एक नेता स्वामी प्रसाद मौर्य को अपनी पार्टी में शामिल कर बहुजन समाज पार्टी को नुकसान पहुंचाने का असफल प्रयास किया। जब स्वामी प्रसाद मौर्य बसपा से निकाले गए तो भाजपा ने मीडिया के माध्यम से स्वामी प्रसाद मौर्य का ऐसा आभामंडल तैयार किया कि उनके पीछे मौर्या समाज का एक बड़ा जनाधार है, लेकिन बसपा को यह बात पता थी कि स्वामी प्रसाद मौर्या को बसपा ने जर्रे से आफताब बनाया था, वरना उनके पास कोई जनाधार नहीं है। यहां तक की अपने चुनाव को जीतने के लिए भी वे बसपा से सुरक्षित चुनाव क्षेत्र की गुहार लगाते थे। 2017 के विधानसभा चुनाव आते-आते यह बात भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को भी समझ में आ गई है कि मौर्य का कोई भी जनाधार नहीं है और इसीलिए उन्होंने स्वामी प्रसाद मौर्य को चुनावी रणनीति में कोई भी तरजीह नहीं दी है। यहां तक की उनको यह भी भरोसा नहीं है कि भाजपा उन्हें टिकट देगी या नहीं। इसलिए वो दूसरे राजनैतिक दलों में जाने की जुगत लगा रहे हैं। चर्चा यह भी है कि वो बहुजन समाज पार्टी में दुबारा वापसी के लिए आतुर हैं। स्वामी प्रसाद मौर्य का राजनैतिक पतन इस बात को प्रमाणित करता है कि मौर्य एवं कुशवाहा समाज बहुजन समाज पार्टी में दूसरे पिछड़े समाजों की तरह ही मजबूती से खड़ा है। जिससे बहुजन समाज पार्टी की बहुजन विचारधारा को मजबूती मिल रही है। बहुजन विचारधारा के तहत दूसरा सबसे बड़ा समूह अल्पसंख्यकों का है। इसको बसपा ने 97 टिकट गए हैं। और यह कहा जा रहा है कि अगर अल्पसंख्यक और दलित एक साथ आ जाए तो बसपा को उत्तर प्रदेश में कोई भी नहीं हरा सकता। वैसे धरातल पर पिछड़े समाज के साथ-साथ मुस्लिम समाज भी अबकी बसपा की ओर उन्मुख दिख रहा है। अल्पसंख्यक समाज के पढ़े-लिखे नौजवान अबकी बार 2017 के विधानसभा चुनाव में बसपा की ओर आकर्षित होते दिखाई पर रहे हैं। विशेषकर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय एवं नदवा-तूल-उलूम छात्रों एवं पूर्व छात्रों के संगठन में खासा जोश दिखाई दे रहा है। ये छात्र सोशल मीडिया पर बसपा के लिए तो नहीं बल्कि सपा के खिलाफ अखिलेश एवं मुलायम की राजनीति का पोल खोलने में लगे हुए हैं। उनका मानना है कि सपा और भाजपा फिक्स मैच खेल रहे हैं। और सपा, कांग्रेस की ही तरह डराकर अल्पसंख्यकों का वोट लेती रहती है। बहुत सारे अल्पसंख्यक वकीलों, डाक्टरों एवं शिक्षाविदों ने इस तथ्य को कबूल किया है कि बसपा और अल्पसंख्यक समाज का गठबंधन ही प्राकृतिक गठबंधन है। कुल मिलाकर उत्तर प्रदेश के 2017 के विधानसभा चुनाव के परिपेक्ष्य में बसपा की राजनैतिक हैसियत का आंकलन किया जाए तो हम पाएंगे कि सामाजिक समीकरण, सांगठनिक तैयारी एवं बसपा सुप्रीमों का व्यक्तित्व सपा, कांग्रेस, आरएलडी और भाजपा पर भारी है। सामाजिक एवं राजनैतिक व्यवस्था के आधार पर यह कहा जा सकता है कि अबकी बार उत्तर प्रदेश की जनता सामाजिक न्याय के साथ विकास एवं धर्मनिरपेक्षता की स्थापना के लिए वोट करेगी। सामाजिक न्याय के साथ विकास, धर्मनिरपेक्षता, कड़ी न्याय व्यवस्था के साथ-साथ प्रतिनिधित्व देने में उत्तर प्रदेश में केवल बीएसपी ही दिखाई पड़ती है इसलिए समाज का जो भी तबका सामाजिक न्याय, धर्मनिरपेक्षता, प्रतिनिधित्व की स्थापना के माध्यम से प्रजातंत्र को मजबूत करना चाहता है वो बसपा को ही वोट करेगा। क्या उत्तर प्रदेश की जनता इसको समझेगी?

””चुप रहता है पर चौंकाता है मायावती का वोटर””

बहुजन समाज पार्टी प्रमुख मायावती ने शनिवार को पार्टी उम्मीदवारों की तीसरी लिस्ट जारी की और दावा किया कि वो प्रदेश में ””अकेले दम पर सरकार”” बनाएंगी. विरोधियों ने उनके दावे पर प्रश्नचिन्ह लगाने में देर नहीं की लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों को उनके बयानों में ””गंभीरता”” नज़र आती है। अख़बार जदीद ख़बर के संपादक मासूम मुरादाबादी कहते हैं, “मायावती की पार्टी चुनाव के लिए तैयार है। बाक़ी दलों में टिकट बंटवारों का मुहुर्त नहीं आया है समाजवादी पार्टी में सिर फुटव्वल हो रहा है। इसका समाजवादी पार्टी को नुक़सान पहुंचने का अंदेशा है।” हालांकि, भारतीय जनता पार्टी अध्यक्ष अमित शाह और बाकी नेता लगातार कह रहे हैं कि उत्तर प्रदेश में मुख्य मुक़ाबला भारतीय जनता पार्टी और समाजवादी पार्टी के बीच है। सपा का अखिलेश यादव धड़ा भी दावा कर रहा है कि मुख्यमंत्री अखिलेश के विकास कार्यों के दम पर पार्टी दोबारा सत्ता में आएगी। ये दोनों दल विभिन्न चुनाव सर्वेक्षणों का भी हवाला देते हैं तो मायावती बीजेपी और सपा के बीच ””गठजोड़”” का आरोप लगाती हैं। इस पर वरिष्ठ पत्रकार रामकृपाल सिंह कहते हैं, “आज़ादी के बाद ये उत्तर प्रदेश का पहला चुनाव है जिसे त्रिकोणीय कहा जा सकता है। फ़िलहाल ये कहना जोखिम भरा होगा कि सपा, बीएसपी और बीजेपी में से कौन जीत सकता है?” रामकृपाल सिंह की राय है कि मायावती की पार्टी के पास तैयारी के लिहाज़ से बढ़त है. और, उनका वोट बैंक भी स्थिर है। वो कहते हैं, “कई बार मायावती का वोट बैंक बहुत चौंकाता है। वजह ये है कि वो चुप रहता है। यही हाल अल्पसंख्यकों का भी है अगर सपा पुराने स्वरुप में लड़ती तो भी एडवांटेज मायावती के पास था। वो ये भी कहते हैं कि जो मिडिल क्लास का जो तबक़ा क़ानून-व्यवस्था को अहमियत देता है, वो भी मायावती का समर्थन कर सकता है।” समाजशास्त्री प्रोफेसर बद्री नारायण भी बीएसपी की चुनाव पूर्व तैयारी को उसके लिए बढ़त की वजह बताते हैं वो कहते हैं, “मायावती की प्लानिंग बहुत सॉलिड है मीडिया उसे देख नहीं पाती है। मायावती अनौपचारिक तौर पर बहुत पहले से अपने उम्मीदवार घोषित कर चुकी थीं। उनके उम्मीदवारों को काफ़ी समय मिला है। “बीएसपी के उम्मीदवारों के चयन में जातिगत के साथ-साथ सामाजिक समीकरण को साधने की कोशिश साफ़ नज़र आती है। मायावती के मुताबिक़ उनकी पार्टी ने अनुसूचित जाति के 87, मुस्लिम समुदाय के 97, अन्य पिछड़ा वर्ग के 106 और 113 स्वर्ण उम्मीदवारों को टिकट दिए हैं। मायावती का ख़ास ज़ोर मुस्लिम-दलित समीकरण को साधने पर है। वो कहती हैं, “मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्रों में अकेले मुस्लिम और दलित वोट के साथ आने से बीएसपी उम्मीदवार चुनाव जीत जाएंगे.” सुप्रीम कोर्ट के हालिया आदेश को लेकर विरोधी मायावती के ऐसे बयानों पर सवालिया निशान लगाते हैं लेकिन वो इस आपत्ति को नज़रअंदाज़ करती हैं, और वोटरों को आगाह करती हैं, “अल्पसंख्यक वोटर सपा के दोनों धड़ों और कांग्रेस को देकर बांटे नहीं।” लेकिन क्या अल्पसंख्यक वोटर मायावती का साथ देंगे, इस सवाल पर रामकृपाल सिंह कहते हैं, “वर्तमान में ऐसा लगता है कि अल्पसंख्यक बीजेपी को हराने के लिए वोट देते हैं। उसके सामने जब ये तस्वीर साफ़ होती है कि बीजेपी को कौन हरा सकता है, वो उसकी तरफ़ चला जाता है, चाहे वो बीएसपी हो या फिर सपा।” वो कहते हैं कि सपा में जारी तकरार का फ़ायदा बीएसपी को मिल सकता है. रामकृपाल सिंह की राय है, “मायावती के यहां परिवार में कोई झगड़ा नहीं है। मायावती को ये देखना नहीं है कि बीजेपी की लिस्ट आ जाए तब हम जारी करें। लगातार वो ये संदेश देने की कोशिश कर रही हैं कि मैं ही हूं जो बीजेपी को हरा सकती हूं।”हालांकि मासूम मुरादाबादी की राय अलग है उनका आंकलन है कि उत्तर प्रदेश के मुसलमानों ने अभी तक अपना मन नहीं बनाया है। वो कहते हैं, “अगर सपा बंटी तो मुसलमानों का बड़ा हिस्सा अखिलेश के साथ जा सकता है लेकिन फ़ायदा मायावती को भी मिलेगा।” मासूम मुरादाबादी ये भी कहते हैं, “मायावती ने मुसलमानों को बड़ी संख्या में टिकट दिए हैं लेकिन इससे वोट मिलने की गारंटी नहीं मिलती क्योंकि वो मुसलमानों के साथ सत्ता बांटने की बात नहीं करती हैं।” रामकृपाल सिंह की राय है, “क़ानून व्यवस्था के मामले में मध्यवर्ग का बड़ा तबक़ा मायावती को मानता है। लेकिन उनके शासन में भ्रष्टाचार बढ़ना मायवती का माइनस प्वाइंट है। “वहीं बद्री नारायण की राय में मायावती के ख़िलाफ़ जो बात जाती है, वो ये है कि वो अखिलेश यादव या फिर बीजेपी की तरह मध्य वर्ग तक अपनी ख़ास छवि नहीं गढ़ पाती हैं. उन्हें किसी पार्टी से गठबंधन नहीं कर पाने का नुक़सान भी हो सकता है। वहीं, मायावती के विरोधी ये भी याद दिलाते हैं कि उनकी पार्टी लोकसभा चुनाव में कोई सीट नहीं जीत सकी थी। इसे लेकर मासूम मुरादाबादी कहते हैं, “लोकसभा और विधानसभा चुनाव के बीच बहुत अंतर होता है. मुद्दे अलग होते हैं और नतीजे भी अलग होते हैं।” वो कहते हैं कि मायावती को भले ही कमतर करके आंका जा रहा हो लेकिन वो बढ़त बना सकती हैं। – बीबीसी हिन्दी से साभार

पंजाब के दलितों के सवालों को दबा रहा है मीडिया

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पंजाब के चुनाव में सिद्धू के कांग्रेस में जाने की चर्चा जोरो पर है जो भाजपा-अकाली और आम आदमी के चुनावी मुद्दे का भी मीडिया में खूब जोर-शोर से प्रचार चल रहा है. लेकिन पंजाब की जिस दलित आबादी के भरोसे वहां की सत्ता का सारा समीकरण टिका हुआ है, मीडिया उसी मुद्दे को नजरअंदाज कर रही है. पंजाब चुनाव को लेकर मीडिया दलितों के मुद्दों की ओर से आंखे मूंदे हैं तो वहीं उस आंदोलन का भी जिक्र नहीं कर रही है, जो 29 जनवरी को हुआ. बीते रविवार यानि 29 जनवरी को संगरूर की अनाज मंडी में हजारों भूमिहीन दलितों ने प्रदर्शन कर अपनी मांगें रखी, लेकिन यह मुद्दा तमाम चैनलों और अखबारों की सुर्खियों से गायब रहा. ये लोग पंजाब में 33 फीसदी पंचायत जमीन में अपनी हिस्सेदारी की मांग कर रहे थे. अपने हक के लिए पंजाब के दलित काफी दिनों से संघर्ष कर रहे हैं. अपने हक़ की ज़मीन पर कब्ज़ाा लेने की कोशिश करने वाले दलितों को संगरूर जिले के झलूर गांव में अक्टूबर की पांच तारीख को जाट सिक्खों  और उनके समर्थित एक अन्यस समूह द्वारा बुरी तरह से पीटा गया, औरतों पर हमला किया गया, बड़ी संख्या में लोगों को चोटें आईं और बड़ी संख्या में लोगों को जेल भेजा गया. यहां भी झलूर कांड के खिलाफ़ 21 अक्टूनबर को एक लंबी प्रतिरोध यात्रा दलितों ने निकाली. इस संघर्ष में दलित गुरदेव कौर की मौत हो गई. उनके समर्थक लाश को लाल झंडे में लपेट कर दो हफ्ते तक चक्का जाम किए रहे पर नतीजा सिफर रहा. लिहाजा आज चुनाव के मौसम में इनके गांव के गांव नोटा का बटन दबाने का फैसला कर चुके हैं. हालांकि पंजाब का दलित भी दो हिस्सों में बंटा हुआ है जिससे उसकी ताकत भी बंट जाती है. एक हिस्साि वह है जिसके पास राजनीतिक नुमाइंदगी के रूप में मायावती हैं या फिर जिसे अकाली या अन्यस दलों की सरपरस्तीत हासिल है. दूसरा तबका वह है जो इनमें से किसी को अपना तारणहार नहीं मानता. वह हक़ की बात करता है. हक़ उस 33 फीसदी पंचायती ज़मीन पर, जो 1961 के पंजाब जमीन नियमन कानून में उसे मिला था, लेकिन आज तक असलियत में नहीं मिला. ऐसा नहीं है कि मायावती ज़मीन के प्रश्न  को नज़रंदाज करती हैं. 30 जनवरी को फगवाड़ा की अनाज मंडी में उन्होंाने ज़मीन का सवाल तो उठाया, हालांकि इतना ही कहा कि दलितों को उनका वाजिब हक तभी मिल पाएगा जब \””पंजाब में मेरी सरकार आएगी.\”” इस बात की संभावना है कि 11 मार्च को चुनावी नतीजों के बाद पंजाब में आई नई सरकार को सबसे पहले इसी सवाल से जूझना पड़ेगा, क्योंंकि अप्रैल से 33 फीसदी पंचायती ज़मीन की नई बोली लगने वाली है.

आदिवासी संगठनों ने किया आरएसएस के हिन्दू सम्मेलन का बहिष्कार

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मध्यप्रदेश। प्रदेश में आदिवासी संगठन आरएसएस के विरोध में खड़े हो गए हैं. आदिवासी संगठनों ने आरएसएस द्वारा आयोजित हिन्दू सम्मेलन के विरोध पर उतर गए हैं. साथ ही प्रदेश के आदिवासियों से अपील कर उन्हें इस हिन्दू सम्मेलन में शामिल नहीं होने की अपील की है. राजधानी भोपाल में यह सम्मेलन आठ फरवरी को आयोजित होना है. प्रदेश के बैतूल जिले के आदिवासी संगठनों ने विरोध कर जिले के आदिवासियों से हिन्दू सम्मलेन में शामिल नहीं होने की अपील की है. इस अपील के बाद से संगठनों ने आदिवासी समाज में अपील जारी की है कि कोई भी हिन्दू सम्मेलन में न जाए. इस सम्मेलन में आरएसएस के सर संघ संचालक मोहन भागवत को बैतूल पहुंचना है. जिसके लिए भीड़ जुटाने में सत्ता और संगठन को एड़ी-चोटी का जोर लगाना पड़ रहा है. लेकिन आदिवासियों के ताजा फैसले से आरएसएस को बड़ा झटका लग सकता है. यही नहीं संगठनों ने आदिवासियों की घर वापसी अभियान भी चलाने का फैसला किया है. आदिवासी संगठनों का कहना है कि आदिवासी हिन्दू नहीं हैं इसलिए उन्हें सम्मेलन में न जाने के लिए समझाया जा रहा है. बैतूल में आयोजित आदिवासी संगठन की एक बैठक में साफ एलान किया गया है कि आदिवासी हिन्दू नहीं हैं, इसलिए वे आठ फरवरी को आयोजित हिन्दू सम्मेलन का हिस्सा न बनें. इसके लिए गांव-गांव फरमान भी जारी कर दिया है. समाज के युवा भी मानते हैं कि उनके रीति-रिवाज और संस्कृति हिन्दू समाज से भिन्न है. उनका दावा है कि सुप्रीम कोर्ट भी कह चुका है कि आदिवासी हिन्दू नही हैं. इसलिए वे सम्मेलन में नही जायेंगे. आदिवासी समाज के इस फैसले से हिन्दू सम्मलेन को लेकर आरएसएस की योजना खटाई में पड़ सकती है. बताते चलें कि बैतूल जिला आदिवासी बाहुल्य जिला है.

नोटबंदी से बदहाल किसान को बजट से आश

भारत एक कृषि प्रधान देश है. इसके चलते यहां की अर्थव्यवस्था का आधार भी खेती-किसानी है. आज भी गांव व शहर की आबादी को मिला कर अस्सी फीसदी तक लोग खेती-किसानी के काम में जुटे है. इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि केन्द्र सरकार जो भी काम करेगी या निर्णय लेगी इतनी बड़ी आबादी को ध्यान में रख कर ही लेगी, लेकिन मोदी सरकार ने नोटबंदी के समय इस पूरी आबादी को नजर अंदाज कर दिया. हालात ये बने कि देश का तमाम किसान दो वक्त की रोटी के लिए मोहताज हो गया. नोटबंदी को लेकर जैसे-जैसे वक्त बीतता जा रहा है, वैसे-वैसे इसकी सच्चाई सामने आती जा रही है. नोटबंदी के चलते आम नागरिकों ने जो नरक भोगा है उसका जिक्र करना तो यहां लाजिमी नहीं लगता है लेकिन किसानों ने जो भोगा है उस पर काफी कम चर्चा हुई है. फिलहाल हम नोटबंदी से किसान को होने वाले नुकसान और परेशानी पर बात करते है. नोटबंदी को लेकर हाल ही में देश के किसान नेताओं का एक आंकलन सामने आया है. यह आंकलन बताता है कि इसके चलते हर किसान को एक एकड़ के पीछे करीब पचास हजार रूपये का नुकसान हुआ है. कृषि संगठनों से जुड़े नेताओं का ये भी मानना है कि फल और सब्जी उपजाने वाले किसानों को तगड़ा नुकसान झेलना पड़ा है. भारत कृषक समाज के चेयरमैन अजय वीर जाखड़ ने हाल ही में अपने बयान में ये कहा है कि ज्यादातर किसान फल और सब्जियां बोते हैं नोटबंदी के कारण उन्हें औसतन 20 से 50 हजार रुपये प्रति एकड़ का नुकसान झेलना पड़ा है. यह नुकसान बहुत ज्यादा है. किसान जागृति मंच के अध्यक्ष सुधीर पंवार की माने तो नोटबंदी ने तो किसानों की कमर ही तोडकर रख दी है. किसानों की हालत बहुत खराब है. किसानों को उम्मीद है कि एक फरवरी को आम बजट में उनके नुकसान की भरपाई की जाएगी. इसमें कोई दो राय नहीं है कि नोटबंदी के चलते कृषि क्षेत्र पर तगड़ी मार पड़ी है और वह अभी तक इससे उबर नहीं पाया है. इस परेशानी के चलते ही अब किसानों से जुड़े संगठन और उनके नेता नुकसान की भरपाई बजट में विशेष योजना बना कर करने की मांग कर रहे. सभी किसान नेता एक सुर में ये बात दोहरा रहे है कि मोदी सरकार को किसानों की परेशानियों को ध्यान में रखते हुए किसी विशेष योजना का ऐलान करना चाहिए ताकि किसानों को थोड़ी राहत मिल सके. काबिलेगौर हो कि नोटबंदी के समय देश के अनेक राज्यों से ये खबरें भी आ रही थी कि किसानों को उसकी उपज का सही भाव नहीं मिलने के कारण फसल को ओने-पौने दाम में बेचना पड़ रहा है. खबरें तो ये भी सामने आई थी कि किसानों ने सब्जियों को फ्री में बांट दी या फिर सडक़ों पर फेक दी. जब किसान अपनी उपज को बाजार में ले जाता है और वह नहीं बिकती है या कीमत कम मिलती है तो वह उसे फेंकने के सिवाय क्या कर पाएगा. उसके पास दो ही रास्ते हैं या तो मामूली कीमत पर उपज बेचे या फेंके. नोटबंदी के दौरान आलम यह था कि मध्यप्रदेश के इंदौर शहर में किसानों को आलू सडक़ों पर फैकने पड़े. किसानों को छत्तीसगढ़ के अनेक शहरों में टमाटर और मटर सहित दूसरी सब्जियों को सडक़ों पर फेंकना पड़ा. हालाकि इस स्थिति के निर्मित होने का खास कारण कृषकों की फसल खरीदने वाले व्यापारियों के पास नगदी का अभाव रहा है. व्यापारियों की भी एक ही पीड़ा थी कि उनके पास उपज को खरीदने के लिए पैसे ही नहीं थे. चेक भी काम नहीं आ रहे थे, बैंकों में भी नगदी का खासा अभाव जो था. सच पूछो तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जो नया आर्थिक तंत्र (कैशलेस) का प्रस्ताव रखा उसे किसान अपना ही नहीं पा रहे हैं. नतीजा सामने है. फसल की कीमतें जमीन पर आ रही है और किसान मौत को गले लगाने के लिए मजबूर हो रहे हैं. अब तो सवाल यह भी खड़ा हो रहा है कि जब किसान को बुवाई की लागत के बराबर भी पैसा नहीं मिलेगा तो वह खेती कैसे करेगा. गौरतलब हो कि 500 और 1000 रुपये के पुराने नोटों को बंद करने के फैसले से रबी की बुवाई पर भी गहरा असर पड़ा है. हालांकि सरकार का कहना है कि इस साल रबी की बुवाई बढ़ी है. सरकार ये मानने को तैयार नहीं है कि किसानों पर इसका विपरित प्रभाव पड़ा है. बहरहाल इस साल रबी की बुवाई बढऩे का जो दावा सरकार कर रही है वह पिछले साल से तुलना के चलते ही कर रही है, जबकि पिछले साल सूखा पड़ा था और इसके चलते बुवाई कम हुई थी. असल में सरकार रबी की बुवाई बढऩे का आंकड़ा बताकर अप्रत्यक्ष रूप से यह जताना चाहती है कि बुवाई के लिए पैसों की जरुरत नहीं है. खैर नोटबंदी ने सहकारी बैंकों के माध्यम से भी किसानों की कमर तोडऩे का काम किया है. नोटबंदी ने सहकारी बैंकों को अपने मकडज़ाल में फंसा कर किसानों की परेशानी बढ़ाई. यह सर्वविदित है कि किसानों का अधिकतर लेन -देन सहकारी बैंकों से होता है. किसानों के पचास फीसद से ज्यादा खाते इन्हीं बैंकों में होते है. इन बैंकों से वे एक ओर कृषि-कार्य के लिए कर्ज लेते हैं तो दूसरी तरफ अपनी बचत भी जमा कराते हैं. हजारों किसानों का मानना है कि मोदी सरकार ने हजार और पांच सौ के नोटबंद करके न केवल सहकारी बैंकों को तबाह किया बल्कि किसान को भी मरने के लिए मजबूर कर दिया. यह एक सच है कि किसानों को बैंकिंग सुविधा से जोड़ने के मकसद से शुरू किए गए सहकारी बैंकों की देश के ग्रामीण इलाकों में दूर-दूर तक पहुंच है. दूरदराज तक जहां सरकारी और व्यावसायिक बैंकों की मौजूदगी नहीं होती है वहां सहकारी बैंकों ने लोगों को वित्तीय सहारा देने में अहम भूमिका निभाई है, लेकिन सरकार ने इन बैंकों को ही लेनदेन से दूर कर दिया. दरअसल, सहकारी बैंकों को भी हजार और पांच सौ के पुराने नोट बदलने की प्रक्रिया में शामिल किया गया होता तो हालात शायद इतने बुरे नहीं होते. हालाकि सरकार ने सहकारी बैंकों को नोटों की अदलाबदली से अलग रखा तो कोई हर्ज नहीं, पर किसानों को संकट से बचाने की उसके पास क्या योजना थी? नोटबंदी के फैसले के बाद ग्रामीण इलाकों में बहुत बुरा हाल रहा. ग्रामीण इलाकों में कई किलोमीटर जाने पर किसी बैंक शाखा या एटीएम के दर्शन होते हैं, पर नोटबंदी के समय वहां नगदी के दर्शन नहीं हो रहे थे. रबी की बुआई के समय किसानों ने पुराने नोट बदलने की गुहार सहाकरी बैंकों में  लगाई लेकिन उनको वहां निराशा का ही सामना करना पड़ा. किसान जिन सहकारी बैंकों से फरियाद कर रहे थे उनसे मोदी सरकार ने फरियाद सुनने तक का हक ही छीन लिया था. इस तरह के माहौल में किसान ने कैसे खुद को संभाला, परेशानी होने पर उसका कैसे सामना किया ये सवाल आज भी प्रासंगिक है. उस समय किसान पर क्या बीती होगी?संकट में काम न आने पर क्या अब सहकारी बैंक अपने ग्राहकों का भरोसा कायम रख पाएंगे? क्या इस नोटबंदी से सरकार ने सहकारी बैंकों को अनुपयोगी मान कर उनकी विदाई का फैसला भी कर लिया था. असल में नोटबंदी से न केवल खेती-किसानी बल्कि दूसरे कामों जैसे कारीगर, मकान निर्माण मजूदर पर भी विपरीत असर पड़ा है. यह जीडीपी का 45 प्रतिशत है और 80 प्रतिशत रोजगार इसी से आता है. यह सही बात है कि इस सेक्टर से टैक्स नहीं जाता लेकिन यहां से रोजगार मिलता है. नोटबंदी के चलते यह लगभग रूक गया है. हालांकि नकदी की स्थिति सुधर रही है लेकिन युवाओं की नौकरियों और किसान की बदहाली पर समस्या और सवाल बरकरार है. अब किसान को नोटबंदी से होने वाले नुकसान की भरपाई की बजट से है. – लेखक मीडिय़ा रिलेशन पत्रिका के संपादक हैं. सम-सामयिक विषयों पर भी लिखते रहते हैं. संपर्क 9827277518

26 जनवरी को डा. अम्बेडकर को सम्मान क्यों नहीं?

तकरीबन ढाई दशक पहले आरपीआई के एक नेता ने संसद में यह प्रश्न उठाया था कि जिस तरह 15 अगस्त से पहले लाल किले पर झंडोत्तोलन के लिए जाते वक्त प्रधानमंत्री राजघाट पर महात्मा गांधी को श्रद्धांजलि देते हैं, उसी तरह गणतंत्र दिवस 26 जनवरी के दिन राष्ट्रपति इंडिया गेट पर जाने से पहले संसद भवन स्थित संविधान निर्माता डा. भीमराव अम्बेडकर को याद क्यों नहीं करती?  सवाल सीधा और सपाट था सो सरकार ने भी इसका सीधा सा जवाब दे दिया. सरकार का कहना था कि इस मौके पर किसी भी राष्ट्रीय नेता को श्रद्धांजलि नहीं दी जाती, इसलिए डा. अम्बेडकर को भी सम्मानित नहीं किया जाता है. जवाब आने के बाद सब कुछ पहले जैसा हो गया. इस बीच रतनलाल केन नाम के एक व्यक्ति इसके लिए लड़ते रहे, हर साल राष्ट्रपति को चिठ्ठी लिखते रहे. आरटीआई ने अब इन्हें नया हथियार दे दिया था और उनकी लड़ाई भी धारदार हो गई. लेकिन जब जवाब सरकार से मांगना हो और वह ना देना चाहे तो कोई सूचना का अधिकार भी कुछ नहीं कर सकता. खासतौर पर भारत जैसे देश में. सवाल है कि प्रधानमंत्री द्वारा गणतंत्र दिवस परेड में शामिल होने के पहले जब इंडिया गेट अमर जवान ज्योति पर सैनिकों को श्रद्धांजलि दी जा सकती है तो अपने कर्मवीरों और राष्ट्रनेताओं को जिन्होंने देश को संविधान दिया उनको क्यों भूल जाते हैं? हालांकि आरटीआई के माध्यम से केन ने कई नई चीजें निकाली हैं, जो चौंकाने वाली है. रतनलाल के अपने तर्क हैं. अपनी मुहिम को जारी रखते हुए केन ने 13 दिसंबर 2011 को महामहिम राष्ट्रपति को पत्र लिख कर उनसे इस मामले में एनओसी की मांग की है. केन का कहना है कि हमें एनओसी दिया जाए कि सरकार हमारे इस मामले को सुलझाने में असफल रही है, ताकि हम इसे यूएनओ में उठा सके. हालांकि 13 दिसंबर के इस पत्र के इंतजार में वह अब तक हैं. जाहिर है उन्हें इसका जवाब नहीं मिला है. संविधान निर्माता बाबा साहेब डा. अम्बेडकर के बारे में सरकार के दृष्टिकोण का एक चौंकाने वाला यह पहलू भी सामने आया है कि सरकार डा. अम्बेडकर को जहां स्वतंत्रता सेनानी नहीं मानती, वहीं उनके संविधान निर्माता होने के सवाल पर चुप्पी साध लेती है. आरटीआई के माध्यम से केन ने गृह मंत्रालय से यह सवाल किया कि क्या डा. अम्बेडकर स्वतंत्रता सेनानी हैं? या फिर क्या वह संविधान निर्माता हैं? तो गृह मंत्रालय के डीओपीटी से जवाब आया कि डा. अम्बेडकर स्वतंत्रता सेनानियों के वर्ग में नहीं आतें, तो वहीं संविधान निर्माता मानने के बारे में उसने चुप्पी साध ली. गांधी और अम्बेडकर के बीच आजादी के समय से ही उभरे मतभेद यहां भी साफ दिखाई देते हैं. यहीं से एक सवाल यह भी उठता है कि फिर महात्मा गांधी जी को किस नीति और नियम के तहत राष्ट्रपिता की उपाधि दी गई. गड़बड़झाला की सूचना यहां भी है. केन द्वारा गृह मंत्रालय से महात्मा गांधी के राष्ट्रपिता होने के संबंध में जानकारी मांगने पर 2002 में तात्कालिन गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने जवाब दिया कि जैसे दूसरे लोग महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता कहते हैं, वैसे मैं भी कहता हूं लेकिन गृह मंत्रालय के रिकार्ड के मुताबिक आज तक महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता घोषित करने का कोई रिजोल्यूशन पास नहीं हुआ है. ना ही संविधान में ऐसा कोई अलंकरण देने की व्यवस्था है. सरकार किसी को ऐसा अलंकरण नहीं दे सकती. महात्मा गांधी के राष्ट्रपिता न होने के बावजूद सरकार उन्हें विशेष अलंकरण और स्वतंत्रता दिवस के पहले सम्मान देती है जबकि देश को संविधान देने वाले डा. भीमराव अम्बेडकर का नाम संविधान की संक्षिप्त रुपरेखा तक में नहीं है. इसके विपरीत्त महात्मा गांधी का वास्ता न तो संविधान निर्माण से था और न संविधान सभा से था, फिर भी उनका नाम और उनके फोटो संविधान के अंदर है. केन की मांग है कि संविधान निर्माता होने के कारण डा. अम्बेडकर को भी वाजिब सम्मान मिले. क्या इस गणतंत्र दिवस के मौके पर अपने संविधान का गुणगान करने वाली सरकार और राजनीतिक दल इस बारे में सोचेंगे?

आज का राष्ट्रवाद : एक राजनीतिक प्रपंच

समय के परिवर्तन के साथ-साथ बहुत कुछ बदल जाता है. यहाँ तक कि शब्द भी और शब्दों के अर्थ भी. इसे यूँ समझ सकते हैं कि बहुत पुराने समय में ‘वेदना’ शब्द को दो तरह से जाना जाता था, यथा… सुखद वेदना और दुखद वेदना. लेकिन वर्तमान में ‘वेदना’ शब्द को केवल और केवल एक ही अर्थ में जाना जाने लगा है…वह है ‘पीड़ा’. इसी संदर्भ में यदि ‘राष्ट्रवाद’ शब्द को समझना है तो हमें विगत से होकर गुजरने की जरूरत है. वीकिपीडिया के अनुसार 19वीं शताब्दी में राज्य और समाज के आपसी सम्बन्ध पर वाद-विवाद शुरू हुआ बताया जाता है तथा 20वीं शताब्दी में द्वितिय विश्वयुद्ध के बाद सामाजिक विज्ञानों में विभिन्नीकरण और विशिष्टीकरण की उदित प्रवृत्ति तथा राजनीति विज्ञान में व्यवहारवादी क्रान्ति और अन्तः अनुशासनात्मक उपागम के बढ़े हुए महत्व के परिणामस्वरूप जर्मन और अमरीकी विद्वानों में राजनीतिक विज्ञान के समाजोन्मुख अध्ययन की एक नूतन प्रवृत्ति शुरू हुई. इस प्रवृत्ति के परिणामस्वरूप राजनीतिक समस्याओं की समाजशास्त्रीय खोज एवं जांच की जाने लगी. ये खोजें एवं जांच न तो पूर्ण रूप से समाजशास्त्रीय ही थीं और न ही पूर्णतः राजनीतिक. अतः ऐसे अध्ययनों को  ‘राजनीतिक समाजशास्त्र’ के नाम से पुकारा जाने लगा. एक नया विषय होने के कारण ‘राजनीतिक समाजशास्त्र’ की परिभाषा करना थोड़ा कठिन है. राजनीतिक समाजशास्त्र के अन्तर्गत हम सामाजिक जीवन के राजनीतिक एवं सामाजिक पहलुओं के बीच होने वाली अन्तःक्रियाओं का विश्लेषण करते हैं अर्थात राजनीतिक कारकों तथा सामाजिक कारकों के पारस्परिक सम्बन्धों तथा इनके एक-दूसरे पर प्रभाव एवं प्रतिच्छेदन का अध्ययन करते हैं. इतना ही नहीं समय के साथ-साथ ‘राजनीतिक समाजशास्त्र’ की भी भिन्न-भिन्न प्रकार से परिभाषा की जाने लगी. इस विषय को यही छोड़ना  ज्यादा महत्त्वपूर्ण महसूस इस लिए हो रहा है क्योंकि हमें यथोक्त के आलोक में मूलत: ‘राष्ट्रवाद’ की परिभाषा को समझना है. इस बात को तो केवल संदर्भ के रूप में लिया गया है ताकि यहाँ यह समझा जा सके कि समय के साथ-साथ ‘राष्ट्रवाद’ की परिभाषा ने भी कई रूप धारण किए हैं. आज के समय में ‘राष्ट्रवाद’ की भावना के साथ आज की राजनीति जैसे बलात्कार कर रही है, ऐसा लगता है. यह समझने की जरूरत है कि संघ का राष्ट्रवाद क्या रहा है और आज क्या है?  इसे सावरकर के अनुसार  ”हिंदुत्व” कहा जाता है…उनके इस ‘हिंदुत्व का अर्थ  ‘हिन्दू धर्म’ से नहीं है. उनके अनुसार ‘हिन्दू धर्म’ धार्मिक आस्था पर आधारित एक जीवन-चर्या है, जबकि ”हिंदुत्व ” की अवधारणा ”हिन्दुओं” को एक राजनीतिक श्रेणी या समुदाय में समेटने के लिए की गयी है. यहाँ यह कहा जा सकता है संघ का ‘हिन्दुत्व’ ही उनका आज का ‘राष्ट्रवाद’ है जिसमें सामाजिक सद्भावना की जगह राजनीतिक भावना ज्यादा परिलक्षित होती है. असल में धर्म ‘राष्ट्रवाद’ के बदले ‘धार्मिक अवधारणा’ का ज्यादा समर्थन करता है. और ‘हिन्दुत्व’ के  ‘राष्ट्रवाद’ का सीधा अर्थ तो ये है कि जन्म के आधार पर खुद को हिन्दू कहने वाले या कहलाने वाले लोग ही भारतीय राष्ट्र के प्रथम नागरिक हो सकते हैं. इस तर्क के आधार पर सभी गैर-हिन्दूओं को भारत के दूसरे दर्जे का नागरिक बना दिया गया है. संघ की दृष्टि में गैर-हिन्दुओं की भारतीयता और देशभक्ति स्वतः संदिग्ध हो जाती है. इनको अपनी देशभक्ति साबित करके दिखाने की  जरूरत है. संघ की राजनीतिक इकाई बीजेपी के पूर्व प्रधान मंत्री माननीय अटल बिहारी वाजपेयी ने तो खुलेआम ये स्वीकार किया था कि उन्होंने स्वतंत्रता आन्दोलन भाग लेने का कभी कोई गुनाह नहीं किया. इसका अर्थ ये हुआ कि वो और उनकी पैत्रिक संस्था आर एस एस ने अंग्रेजों का खुलकर समर्थन किया था. यहाँ तक कि ??? आज ये भी कहा जा सकता है कि संघ का राष्ट्रवाद यानी  ”हिंदुत्व ” पर आधारित ‘राष्ट्रवाद’  मोदी का राष्ट्रवाद है. कोई इसे मंजूर करे या ना करे, लेकिन कम से कम  इसे ठीक- ठीक समझ लेना चाहिए. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी पार्टी के वरिष्ठर नेताओं से कहा कि राष्ट्रवाद हमारी पहचान है और उनको राष्ट्रीवाद के संदेश और एजेंडे पर फोकस करना चाहिए क्योंेकि दो साल पहले उनकी रिकॉर्ड जीत में यह प्रमुख कारण रहा है. हैरत अंगेज बात तो ये रही कि उन्होंलने अपने नेताओं से कहा कि बी जे पी का चुनाव जीतना ही उनका राष्ट्रीय कर्तव्य है. अब आप संघ परिवार के राष्ट्रवाद की परिभाषा सहज ही समझ सकते हैं. उल्लेखनीय है कि अंग्रेजों की गुलामी से छुटकारा पाने के लिए किए गए स्वतंत्रता आन्दोलन से जुड़े लोगों को राष्ट्र-भक्त की श्रेणी में रखा जाता था. अर्थात राष्ट्र से प्रेम ही राष्ट्रवाद कहलाता है. उस समय भी आर एस एस ने स्वतंत्रता आन्दोलन में भाग नहीं लिया… इसके विपरीत अंग्रेजों की गुलामी को इस हद तक स्वीकार किया कि उनके लिए मुखबरी का काम भी किया. अंग्रेजी न्यायालयों में स्वतंत्रता-सेनानियों खिलाफ गवाहियां भी दी. फलत: बहुत से राष्ट्रप्रेमियों को फांसी के फन्दे तक को चूमना पड़ा. किंतु उस समय गांधी और कांग्रेस ने कभी भी आर एस एस को देशद्रोही नहीं कहा. इतना जरूर था कि जो-जो स्वतंत्रता आन्दोलन में शरीक हो रहे थे…. उन्हें देशभक्त जरूर कहा गया था. अंग्रेजों के समय में उनका विरोध करने वाले राष्ट्रद्रोही थे और अंग्रेजों के समर्थक ….. जाहिर है देशभक्त. यानी सत्ता के विरोध में मत रखने वाले देशद्रोही और सत्ता की हाँ में हाँ मिलाने वाले राष्ट्रवादी. यहाँ राष्ट्रवाद को विस्तार से समझने की आवश्कता महसूस हो रही है. दरअसल राष्ट्रवाद को अगर आसान शब्दों में राष्ट्र से प्रेम ही राष्ट्रवाद कहलाता है.   लेकिन सत्ता की मारामारे में भारत में राष्ट्रवाद की परिभाषाएं भी बदल गयी हैंI आज का राष्ट्रवाद सत्ताशीन पार्टी विशेष के लोगो के लिए ही है.  अगर आप उस पार्टी के समर्थक नहीं है तो आप राष्ट्रवादी नहीं हो सकते. राष्ट्रवाद के नए-नए मायने भी निकल आये हैंI  एक सच्चे राष्ट्रवादी बनने के लिए पहले तो आपको आँखें मूंदना सीखना पड़ेगा . सरकार के किसी भी कार्यक्रम में किंतु-परंतु लगाने की हिमाकत नहीं करनी  जो  सही हुआ वो भी सही और जो गलत हुआ या हो रहा है वो भी सही… बस आज के राष्ट्रवाद की यही परिभाषा शेष रह गई है. यूँ भी कहा जा सकता है कि  आज के राष्ट्रवादियों ने बुर देखने, बुरा सुनने, बुरा बोलने, बुरा करने जैसी तमाम बुराइयों को दिल से लगा लिया हैI  राष्ट्रवादी बनने के लिए अगला रूल ये है कि आपको हर उस इंसान की आलोचना करनी है जो समाज की बुराइयों पर बात करना चाहता है. उन्हें देशद्रोही बोलकर खुद को राष्ट्रवादी सिद्ध करना है. इतना ही नहीं एक सच्चे राष्ट्रवादी को दलितों पर सदियों से हो रहे  अत्याचार और औरतों के साथ हो रहे अमानुषिक व्यवहार /शोषण पर भी आँखें मूंद लेनी हैI आज के राष्ट्रवादियों का ध्येय समाज के उन लोगों से लड़ना है जो समाज को सुधारने की दिशा में कुछ न कुछ काम कर रहे हैं… और उनसे जो लोग हमें हिन्दू-धर्म में फैली बुराइयों का खुलासा करते हैं … आज के दौर में आप समाज और देश के हित में बात करने वाले लोगों का  सामाजिक तिरस्कार करने पर ही आप सच्चे राष्ट्रवादी कहलायेंगेI असल में राष्ट्रवाद आज के युग में ‘राजनीतिक राष्ट्रवाद’ हो गया है. दुनिया भर में सरकारों के कामकाज़ का तरीका बदल रहा है. सरकारें बदल रही हैं. राजनीतिक और सामाजिक अवधरणा बदल रही है. फलत: राष्ट्रवाद का नया मोडल हमारे सामने है. राष्ट्रवाद आज की राजनीति का अभिन्न अंग हो गया है. दुनिया भर की सरकारें मीडिया को कबजाने का प्रयास कर रही हैं. हर जगह मीडिया का राजनीतिकरण हो गया है. यह केवल भारत की ही बात नहीं है अपितु फ्रांस लंदन, पोलैंड, रूस, अमेरिका, ऑस्ट्रिया के नेता राजनीतिक मुद्दों पर ही सत्ता पर अपनी पकड़ बनाए हुए हैं. ये सरकारें विपक्ष को खत्म कर देने के मूड में ही देखी जाती हैं. थोड़ा-बहुत पुराने राष्ट्रवाद को बचाकर रखती हैं, बयानों या कागज़ों में ही सही, ताकि जनता में लोकतंत्र का भ्रम बना रहे. लगातार विज्ञापनों और भाषणों के जरिए यह दिखाने की प्रक्रिया कि कुछ तो हो रहा है, बेशक जमीन पर कुछ भी न हो रहा हो…जोर पकड़ती जा रही है.    कहना अतिशयोक्ति नहीं कि आज का राष्ट्रवाद की परिभाषा अपने-अपने हिसाब से की जाने लगी है….. यानी सबका अपना-अपना राष्ट्रवाद…     इस बात को गहनता से समझने के लिए मैं फेसबुक पर आई ईश कुमार गंगानिया की एक पोस्ट का उल्लेख करना चाहूँगा. वो लिखते हैं, ‘आजकल देश-भक्ति व संस्कृति की नई-नई परिभाषाएं गढ़ी जा रही हैं. कोई तेल-साबुन, दंत-मंजन, मैगी, बिस्किट व चाकलेट आदि की दुकान सजाकर अपनी देश-भक्ति का प्रदर्शन करता है. कोई तीन-चार बच्चे पैदा करने का आह्वान कर अपनी देश-भक्ति का ढोल पीटता है. कोई महिलाओं को कैसे कपड़े पहनने चाहिएं, कब घर से निकलना चाहिए और कब नहीं आदि पर फतवे जारी कर देश-भक्ति व संस्कृति की अपनी नई मिसाल कायम करने पर तुला है. फहरिस्त बड़ी लम्बी है,  किस-किस की देश-भक्ति और संस्कृति के किस्से गिनाऊं और किसके नहीं, समझ में नहीं आ रहा है. मुझे लगता है कि इन महानुभावों ने देश-भक्ति और संस्कृति को महाभारत की द्रोपदी बना दिया है. जहां कोई स्त्री उसे अपने पांच-पांच पुत्रों की बीवी बनाकर अपनी देश-भक्ति व संस्कृति की स्थापना करती है. कोई धर्मराज उसे जुएं में दांव पर लगाकर अपनी देश-भक्ति और संस्कृति का परिचय देता है. कोई राजा अपने दरबार में उसके चीरहरण को देश-भक्ति व संस्कृति की नई मिसाल मानता है. आज इक्कीसवीं सदी में देश का राजा धर्मराज भी है और वह चक्रवर्ती भी. उसके दरबार में मंत्री भी हैं और संत्री भी. उसके पास सेना भी है, अस्त्र भी है और शस्त्र भी. लेकिन नहीं बच पा रही है द्रोपदी की अस्मिता… निरंतर लहुलुहान होने से. कोई शम्बूक इसके जख्मों पर निरंतर मरहम लगाने का जोखिम उठाए जा रहा है. क्या रोक पाएगा वह इक्कीसवीं सदी के कुरुक्षेत्र को? आप क्या कहते हो मित्रों…..’ है किसी के पास इसका जवाब? क्या आप गंगानिया जी के इस मत से सहमत नहीं? यदि नहीं तो आपके राष्ट्रवाद की भी अपनी अलग ही परिभाषा होगी. ठीक वैसे ही जैसे योग गुरू बाबा रामदेव के राष्ट्रवाद की परिभाषा. अन्ना के राष्ट्रवाद को कोई समझ ही पाता…उनके राष्ट्रवाद की परिभाषा तो समय के साथ-साथ बदलती ही रहती है. पुन: उल्लिखित है कि अंग्रजों के शासनकाल में जो अंग्रेजों के खिलाफ जन-आन्दोलन करते थे …वो राष्ट्रद्रोही और जो उनकी गुलामी को चाहे जैसे स्वीकार कर रहे थे या उनके लिए मुखबरी कर रहे थे …. वो राष्ट्रप्रेमी. ठीक वही हालत आज की है… जो लोग सरकार के कामों पर किंतु-परंतु करते हैं या किसी भी प्रकार का प्रश्नचिन्द लगाते दिखते हैं …वो राष्ट्रद्रोही और वो जो सरकार के उल्टे-सीधे कामों पर आँख मून्दकर सरकार के पक्षधर बने रहते हैं…वो राष्ट्रप्रेमी. कहा जा सकता है कि देश के साथ जो भी अच्छा-बुरा हो रहा है, उसकी राजनीतिक दलों को कोई भी चिंता नहीं रह गई है.  राजनीतिक दलों का तो येनकेन-प्रकारेण सत्ता में बने रहना मात्र ही ध्येय रह गया है. वास्तव में आज का राष्ट्रवाद एक राजनीतिक प्रपंच बनकर रह गया है.  क्या ऐसा राष्ट्रवाद भारत के विनाश की गारंटी नहीं है?  क्या 21वीं सदी में ऐसे राष्ट्रवाद के साथ भारत आगे बढ़ सकता है?
– लेखक तेजपाल सिंह तेज स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त होकर इन दिनों स्वतंत्र लेखन में रत हैं. आपको  हिन्दी अकादमी (दिल्ली) द्वारा बाल साहित्य पुरस्कार ( 1995-96) तथा साहित्यकार सम्मान (2006-2007) से सम्मानित किया जा चुका है.

यूपी चुनावः ग्लैमर बनाम संघर्ष

उत्तर प्रदेश चुनाव में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच समझौता होने के बाद एक चर्चा आम है. चर्चा है कि यहां चुनाव प्रचार में अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल यादव और सोनिया गांधी की बेटी प्रियंका गांधी वाड्रा चुनाव प्रचार के लिए उतरेंगी. खबरों में यह भी कहा जा रहा है कि दोनों साथ उतर सकती हैं और ऐसे में वे दोनों बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती के लिए चुनौती बन सकती हैं. तर्क यह दिया जा रहा है कि लोगों के बीच इन दोनों का ग्लैमर ज्यादा काम करेगा और ये युवाओं को जोर पाएंगी. असल में यह तमाम अखबारों और वेबसाइटों पर चल रहा यह तर्क बेहद बेकार है. क्योंकि अगर लोग किसी नेता की सुंदर छवि को देख कर वोट देते तो फिर इस देश की सत्ता पर मॉडल और फिल्मी हस्तियों का राज होता. इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि जनता जिन चेहरों को रुपहले पर्दे पर देखती है, सामने आने पर उनसे प्रभावित हो जाती है. लेकिन यह लंबे वक्त के लिए नहीं होता. वैसे भी अगर साउथ को छोड़ दिया जाए तो उत्तर भारत की चुनावी राजनीति में आए फिल्मी हस्तियों ने जनता को निराश ही किया है. ऐसे में किसी भी राजनीतिक परिवार से जुड़े किसी व्यक्ति के ग्लैमर के जरिए चुनाव को प्रभावित करने की बात बेमानी है. प्रभावित हो भी जाए तो इससे चुनावी जीत संभव नहीं है. एक तथ्य यह भी है कि चुनाव में किसी व्यक्ति विशेष का चेहरा नहीं बल्कि विचारधारा मायने रखती है. और उत्तर प्रदेश चुनाव में भी विचारधारा की ही लड़ाई है. एक तरफ अम्बेडकरवादी विचारधारा है जो समाज के हर नागरिक को साथ लेकर चलने और संविधान के अनुरूप काम करने को तव्वजो देती है तो दूसरी ओर कांग्रेस और समाजवादी विचारधारा का हाल आज क्या है, यह जगजाहिर है. इन दोनों विचारधाराओं की बात करें तो समाजवाद माने मुलायम परिवार और कांग्रेस माने गांधी परिवार होता है. अगर डिंपल यादव और प्रियंका गांधी चुनाव प्रचार के लिए मैदान में उतरती भी हैं तो सिवाय भीड़ जुटाने के वह कुछ और कर पाएं इसमें संदेह है. और अगर प्रियंका गांधी में उत्तर प्रदेश की राजनीति को प्रभावित करने की उतनी ही क्षमता होती तो कांग्रेस का यह हाल नहीं होता. इन दोनों के पास जो भी है वह इनके परिवार की मेहनत से उपजा है, न कि इन दोनों का इसमें अपना कोई व्यक्तिगत योगदान है. जबकि बसपा प्रमुख मायावती ने जो कुछ भी अर्जित किया है उसमें उनकी मेहनत, संघर्ष और त्याग की भूमिका है. और बसपा और मायावती जितना जनसमर्थन जुटाने में जब भाजपा जैसी बड़ी पार्टी औऱ देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तक का पसीना छूट गया और इसके बाद भी वो सफल नहीं हो सके तो फिर अन्य नाम कहां ठहरते हैं. फिर भी अगर उत्तर प्रदेश चुनाव में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस यह भ्रम पाले हैं कि बसपा प्रमुख मायावती के सामने वह डिंपल यादव और प्रियंका गांधी को उतार कर बसपा को रोक सकते हैं तो यह संभव नहीं दिखता. क्योंकि जीत हमेशा संघर्ष की होती है.

जन्मदिन विशेषः बहनजी का धम्म कारवां

भगवान बुद्ध के महापरिनिर्वाण उपरान्त लगभग 218 वर्षों के बाद विश्व के तमाम देशों को अपने धम्म-विजय अभियान द्वारा विजित करने वाले महान सम्राट अशोक ने इसी भारत-भूमि पर राज्य करना प्रारम्भ किया. न्यग्रोध नामक सात वर्षीय श्रामणेर के ‘अप्पमाद’ (अप्रमाद) से संबंधित धर्मोपदेश को सुनकर सम्राट अशोक के मन में बुद्ध, धम्म व संघ के प्रति श्रद्धा व भक्ति उत्पन्न हुई. जब सम्राट अशोक को बौद्ध धर्म में आस्था उत्पन्न हुई तो सम्राट ने युद्ध-विजय को त्यागकर अहिंसा व धम्म-विजय का अभियान शुरू किया. सम्पूर्ण जम्बुद्वीप में बहुजनों के सुख व हित के लिए बहुत सा धम्म-कार्य करने के तद्नन्तर अपने आचार्य मोग्गलिपुत्ततिस्स से पूछा,‘‘भगवान बुद्ध के कितने उपदेश हैं?’’ तब मोग्गलीपुत्ततिस्स ने बताया-‘‘राजन् भगवान बुद्ध के 84000 उपदेश हैं.’’ सम्राट अशोक ने 84000 धर्म-स्कन्धों की पूजा करने व श्रद्धा व्यक्त करने के लिए सम्पूर्ण जम्बुद्वीप के 84000 नगरों में विहार, स्तूप व चैत्य बनवाकर एक ही दिन सबकी पूजा की और सम्पूर्ण जम्बुद्वीप में दीप प्रज्जवलित करवाया गया. तमाम विद्वानों का ऐसा मनाना है कि इसी घटना के बाद इसी दिन हमारे देश में दीपावली का त्यौहार मनाया जाता है. जो राजा पहले ‘चण्डासोक’ था इसी घटना के बाद से अब ‘धम्मासोक’ नाम से प्रसिद्ध हो गया. प्रव्रज्या को राज्याभिषेक से ऊंचा जानकर सम्राट ने अपने पुत्र महेन्द्र और पुत्री संघमित्रा को बहुत बड़े समारोह के साथ प्रव्रजित करवाया. इतना ही नहीं बल्कि सम्राट अशोक के ही संरक्षण में सुप्रसिद्ध तृतीय बौद्ध संगीति का आयोजन देश की राजधानी पाटलिपुत्र में हुई इसी तृतीय बौद्ध संगीति के परिणामस्वरूप ही मोग्गलिपुत्ततिस्स की अध्यक्षता एवं महान सम्राट अशोक के संरक्षण में विदेशों में भगवान बुद्ध के धम्म के प्रचार व प्रसार की योजना बनायी गयी. बाह्य देशों में धम्म के प्रचार व प्रसार के लिए नौ समूह बनाकर भेजे गये. इस प्रकार सम्राट अशोक का धम्म-दायित्व पूर्ण हुआ. 15 मार्च 1934 को पंजाब प्रान्त के रोपण जिले में ख्वासपुर गांव में जन्में मान्यवर कांशीराम बाबा साहेब के ऐसे श्रेष्ठ अनुयायी हुए कि उन्हें डॉ. अम्बेडकर के आन्दोलन का उत्तराधिकारी कह सकते हैं. बाबा साहेब अम्बेडकर के परिनिर्वाण उपरान्त एक वर्ष के बाद ही सन् 1957 में अपनी 23 वर्ष की उम्र में ही कांशीराम जी ने बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर के आन्दोलन को बड़ी तीव्रता के साथ समझने का प्रयास किया. उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन भारत के बहुसंख्यक समाज को राजनीति करने के तौर-तरीके सिखाने एवं निष्कर्ष के रूप में बौद्ध धम्म की तरफ प्रेरित करने में लगाया. भगवान तथागत गौतम बुद्ध के धम्म-सिद्धान्त ‘बहुजन हिताय- बहुजन सुखाय’ से प्रभावित होकर और इसे ही आदर्श मानते हुए मान्यवर कांशीराम साहब ने 14 अप्रैल 1984 को ‘बहुजन समाज पार्टी’ की स्थापना की. मान्यवर कांशीराम जी ने सम्पूर्ण भारत देश को ही अपना कार्य क्षेत्र बनाया परन्तु उत्तर प्रदेश को अपने आन्दोलन के लिए अधिक उर्वरा प्रदेश मानते हुए उत्तर प्रदेश को अपनी प्रयोगशाला के रूप में स्वीकार किया और अपने अनुयायियों को कहा- ‘‘मेरे सपनों का भारत सम्राट अशोक के भारत जैसा होगा, यदि मानवतावाद को इस देश में लाना है तो मानवता लाने के लिए भारत को बौद्धमय बनाना जरूरी है.’’ अपने लक्ष्य की तरफ आगे बढ़ते हुए इसी प्रकार अपने संघर्षों के निचोड़ के रूप में उन्होंने 30 मार्च 2002 को नागपुर के उॅटखाना में एक विशाल सभा को सम्बोधित करते हुए कहा था- ‘‘मैंने फैसला किया है कि 2006 में जब बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर के धर्म परिवर्तन के 50 साल पूरे होंगे, तो हम लोग उत्तर प्रदेश में चमार समाज के लोगों को ‘सलाह देंगे’ कि आप लोग ‘बौद्ध धर्म अपनाएँ’ और मुझे पूरा भरोसा है कि मेरी सलाह को मानकर सिर्फ उत्तर प्रदेश में 2 करोड़ से ज्यादा चमार समाज के लोग बौद्ध धर्म अपनायेंगे इसलिए बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर का जो दूसरा काम आज तक भी अधूरा रहा है, उसको भी हम लोग आगे बढ़ायेंगे.’’ वर्तमान समय में मान्यवर कांशीराम जी के भी करोड़ों अनुयायी हैं. मान्यवर कांशीराम जी ने अपने उन करोड़ों अनुयायियों में से अपनी परम शिष्या कुमारी मायावती जी को 15 दिसम्बर 2001 को अपने आन्दोलन की जिम्मेवारी देते हुए अपने आन्दोलन का उत्तराधिकारी घोषित किया. अपने आन्दोलन की जिम्मेवारी कुमारी मायावती के कन्धें पर डालते हुए उन्हें भारत में बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार व संरक्षण के लिए प्रतिबद्ध किया. अपने परिनिर्वाण से पूर्व मान्यवर कांशीराम जी ने अपनी वसीयत लिखी- ‘‘मेरी मृत्यु के बाद मेरा अन्तिम संस्कार बौद्ध रीति से ही होना चाहिए.’’ मान्यवर कांशीराम जी ने नागपुर, महाराष्ट्र में यह उद्घोषणा की थी कि 14 अक्टूबर 2006 को जब बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर के दीक्षा दिवस 14 अक्टूबर 1956 कि स्वर्ण जयंती मनायी जायेगी तो उस अवसर पर वे उत्तर प्रदेश के लगभग 2 करोड़ चमारों के साथ बौद्ध धर्म की दीक्षा लेंगे. परन्तु 2003 ई. में ही उन्हें ब्रेन अटैक जैसी खतरनाक बीमारी हो गयी और वे अस्वस्थ हो गये. लगातार 3 वर्षों के इलाज के बाद 14 अक्टूबर 2006 से पाँच दिन पहले ही 9 अक्टूबर 2006 को उनका परिनिर्वाण हो गया. इस प्रकार मान्यवर कांशीराम बौद्ध धर्मान्तरण की अपनी की हुई भविष्यवाणी पूर्ण नहीं कर सके. डॉ. अम्बेडकर प्रणीत नवबौद्धों के आन्दोलन के मुखिया मान्यवर कांशीराम की शिष्या कुमारी मायावती वर्ष 1995, 1997, 2002 और 2007 में जब उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं तो उन्होंने मान्यवर कांशीराम के उत्तराधिकार को आगे बढ़ाते हुए वर्ष 1997 ई. में सुप्रसिद्ध इन बौद्ध तीर्थ-स्थलों के नाम पर नवीन जिलों का गठन किया. तीर्थ-स्थलों के नाम पर नवनिर्मित जनपदों की ही प्राथमिक प्रेरणा से तत्कालीन मुख्यमंत्री बहन कुमारी मायावती ने भगवान बुद्ध और उनकी माँ के नाम पर भी नये जिलों का गठन किया. इतना ही नहीं बल्कि आधुनिक भारत में बौद्ध धर्म के पुर्नरुद्धारक बोधिसत्व बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर व उनकी पत्नी रमाबाई और उनके बौद्धमय भारत बनाने के सपने को साकार करने वाले मान्यवर कांशीराम के नाम पर भी नये जनपदों का निर्माण किया. बहन कुमारी मायावती ने भगवान बुद्ध के मानवतावादी श्रमण संस्कृति को अपना आदर्श बनाने वाले सन्तों, गुरुओं एवं महापुरुषों के नाम पर भी नये जनपदों का गठन कर उत्तर प्रदेश में बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार किया. इस प्रकार बहन कुमारी मायावती ने 20 सितम्बर सन् 1995 को सिद्धार्थ नगर की स्थापना, बुद्ध पूर्णिमा के दिन 25 मई सन् 1997 को जिला श्रावस्ती की स्थापना, 4 अप्रैल सन् 1997 को जिला कौशाम्बी और 22 मई सन् 1997 को पडरौना का नाम बदल कर कुशीनगर कर दिया. इतना ही नहीं बल्कि भगवान गौतम बुद्ध के नाम पर दिनांक 6 मई सन् 1997 को जिला गौतम बुद्ध नगर की स्थापना एवं दिनांक 6 मई सन् 1997 को भगवान गौतम बुद्ध की माँ महामाया के नाम पर जिला महामाया नगर की स्थापना किया. बुद्धकाल में कण्णकुज्ज नगर के रूप में विख्यात बौद्ध तीर्थ-स्थल के परिक्षेत्र में 18 सितम्बर सन् 1997 को जिला कन्नौज की स्थापना किया. भारत में बौद्ध धर्म का पुर्नरुत्थान करने वाले डॉ. बी.आर. अम्बेडकर और उनकी पत्नी के नाम पर नवनिर्मित जनपद डॉ. अम्बेडकर नगर (20 सितम्बर सन् 1995), भीम नगर (28 सितम्बर सन् 2011) एवं रमाबाई नगर (18 सितम्बर सन् 1997) का गठन किया. मान्यवर कांशीराम के नाम पर नवनिर्मित जनपद कांशीराम नगर (सन् 2009) और बौद्ध सिद्धान्तों एवं बौद्ध शब्दावली के नाम पर नवनिर्मित जनपद पंचशील नगर (28 सितम्बर सन् 2011) एवं प्रबुद्ध नगर (28 सितम्बर सन् 2011) का ऐतिहासिक गठन किया. इतना ही नहीं बल्कि श्रमण-संस्कृति को मानने वाले संतों-गुरूओं व महापुरुषों के नाम पर भी नवीन जिलों का गठन किया गया है जिसमें संत रविदास नगर, संत कबीर नगर, ज्योतिबाराव फूले नगर एवं छत्रपति शाहू जी महाराज नगर इत्यादि प्रमुख हैं. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण एवं राष्ट्रीय संग्रहालय के निर्देशन में बौद्ध तीर्थ-स्थलों से प्राप्त पुरातात्विक सामग्री के संरक्षण हेतु उत्तर प्रदेश में पहला संग्रहालय 1910 ई. में बौद्ध तीर्थ-स्थल सारनाथ (षिपत्तन मृगदाववन) में स्थापित हुआ था, जिसमें बुद्धकाल से लेकर 12वीं शताब्दी तक के पुरावशेष संग्रहित हैं. सन् 1910 के बाद इस दिशा में किसी भी सरकार ने कोई भी महत्वपूर्ण कार्य नहीं किया. पहली बार बहन कुमारी मायावती ने संग्रहालयों के विकास के क्रम में उत्तर प्रदेश में अभूतपूर्व कार्य किया. 31 अगस्त 2002 को संग्रहालय निदेशालय के रूप में उत्तर प्रदेश में स्वतंत्र निदेशालय की स्थापना किया. राज्य संग्रहालय, बनारसी बाग, लखनउ के परिसर के पुराने भवन में इस निदेशालय को स्थापित किया गया. इस निदेशालय की स्थापना के पूर्व ही कुमारी मायावती जी ने पूर्वी उत्तर प्रदेश के क्षेत्र में यत्र-तत्र बिखरी पुरातात्विक सम्पदा के संग्रह, संरक्षण, अभिलेखीकरण व प्रदर्शन के लिए एवं शोध के साथ ही इस क्षेत्र के गरिमामय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व की जानकारी जनसामान्य को उपलब्ध कराने के उद्देश्य से संस्कृति विभाग, उत्तर प्रदेश शासन द्वारा दिनाँक 04 मई, 1997 को ‘राजकीय बौद्ध संग्रहालय, गोरखपुर’ की स्थापना किया. पूर्वी उत्तर प्रदेश बौद्ध धर्म के उद्भव और विकास का हृदय स्थल रहा है. बुद्ध के जीवन की घटनाओं से संबंधित स्थल लुम्बिनी, देवदह, कोलियों का रामग्राम एवं तथागत की महापरिनिर्वाण स्थली कुशीनगर इत्यादि इसी क्षेत्र से संबंधित हैं. भारत के बौद्ध स्थलों में कुशीनगर (कुशीनारा) का प्रमुख स्थान है. भगवान बुद्ध ने लगभग 80 वर्ष की अवस्था में अपनी चारिका पूर्ण करने के पश्चात कुशीनारा के उपवत्तन नामक शालवन में महापरिनिर्वाण को प्राप्त किया था, जिसे आज कुशीनगर कहा जाता है. इस पवित्र स्थल पर असंख्य पर्यटक एवं बौद्ध धर्मानुयायी प्रति वर्ष भगवान बुद्ध को श्रद्धाजंलि अर्पित करने आते हैं. कुशीनगर की धार्मिक महत्ता एवं समृद्ध ऐतिहासिक तथा सांस्कृतिक धरोहर ने कई देशों एवं विभागों को इस क्षेत्र में अपने धार्मिक एवं सांस्कृतिक संगठन स्थापित करने की प्रेरणा दी और परिणामस्वरूप यह स्थल सम्पूर्ण विश्व में आकर्षण का केन्द्र बन गया. कुशीनगर की पुरातात्विक सम्पदा सहित भारतीय संस्कृति को संकलित तथा सुरक्षित करने के उद्देश्य से कुमारी मायावती ने शासन द्वारा 04 मई, 1997 को कुशीनगर में ‘राजकीय बौद्ध संग्रहालय, कुशीनगर’ की स्थापना किया. भगवान बुद्ध की क्रीड़ास्थली एवं युवावस्था तक कर्मस्थली होने के कारण कपिलवस्तु भी बौद्ध तीर्थ-स्थल के रूप में प्रसिद्ध है. जिसकी पहचान सिद्धार्थ नगर जिले में स्थित पिपरहवाँ नामक स्थान से की गयी है. जहाँ पर देश-विदेश से लाखों की संख्या में पर्यटक पर्यटन हेतु आते हैं. पिपरहवाँ में ही बुद्ध के अस्थि-अवशेषों से भरा हुआ कलश प्राप्त हुआ. जिस पर ब्राह्मी एवं खरोष्ठी, दोनों लिपियों में लेख लिपिबद्ध हैं. बौद्ध तीर्थ-स्थल कपिलवस्तु की महत्ता को दृष्टिगत रखते हुए बौद्ध हैरिटेज सेन्टर, पिपरहवाँ की योजनान्तर्गत तत्कालीन मुख्यमंत्री कुमारी मायावती जी ने ‘राजकीय बौद्ध संग्रहालय पिपरहवाँ, सिद्धार्थनगर’ की स्थापना करवाया. इसी श्रृंखला में कुमारी मायावती ने रामपुर जनपद में ‘भीमराव अम्बेडकर संग्रहालय एवं पुस्तकालय’ का भी निर्माण करवाया. इस संग्रहालय के मुख्य द्वार पर डॉ. अम्बेडकर के जीवन की महत्वपूर्ण घटनाओं को कालाक्रमानुसार लिपिबद्ध कर प्रदर्शित किया गया है. शैक्षणिक विकास के क्रम में तत्कालीन मुख्यमंत्री कुमारी मायावती जी ने उत्तर प्रदेश में उच्च शिक्षा की दृष्टि से तकनीकी एवं प्रबंधन में डिग्री एवं डिप्लोमा देने वाले समस्त महाविद्यालयों को दो भागों में विभाजित कर उन्हें ‘गौतम बुद्ध प्राविधिक विश्वविद्यालय (Goutam Buddh Technical University)  एवं ‘महामाया प्राविधिक विश्वविद्यालय (Mahamaya Technical University) से सम्बद्ध कर दिया. शिक्षा की दृष्टि से ‘महामाया गरीब बालिका आशीर्वाद योजना’ का निर्माण किया गया जिसके तहत प्रत्येक वर्ष लगभग पांच लाख बालिकाओं को लाभान्वित किया. इसके अलावा ‘महामाया गरीब आर्थिक मदद योजना’ के तहत बालिकाओं को शिक्षित करने के लिए विशेष रूप से कार्य किया गया है. डॉ. अम्बेडकर के नाम पर भी और इतना ही नहीं बल्कि भगवान बुद्ध की विचारधारा से प्रभावित और मानवता के लिए काम करने वाले और कई सन्तों, गुरुओं व महापुरुषों के नाम पर सैकड़ों शैक्षणिक संस्थान खोले गये. कुमारी मायावती के शासनकाल में उत्तर प्रदेश सरकार की तरफ से उन्हें संचालित किया गया, जिनके माध्यम से डॉ. अम्बेडकर और बुद्ध की विचारधारा को बढ़ाने के लिए बल प्रदान किया गया. बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए अभिप्रेत गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय का भगवान बुद्ध के नाम पर मात्र नामकरण ही नहीं किया बल्कि शिक्षकों एवं कर्मचारियों के रहने के लिये पंचशील आवासीय परिसर का निर्माण, परिसर में निर्मित महामाया शांति सरोवर के नाम से दर्शनीय स्थल का निर्माण, विश्वविद्यालय के मुख्य मार्ग का नामकरण सिद्धार्थ गौतम मार्ग, बाह्य परिधि मार्ग को बौद्ध परिपथ तथा आन्तरिक परिधि मार्ग को महामाया परिपथ का नाम दिया जाना, विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार का नामकरण महामाया द्वार और गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय में विपस्सना विद्या के अभ्यास हेतु महात्मा ज्योतिबाराव फूले विपस्सना ध्यान भावना केन्द्र की स्थापना इत्यादि का कार्य बहन कुमारी मायावती जी के बौद्ध धर्म के पुर्नरुत्थान की दिशा में ऐतिहासिक कार्य है. सामाजिक कल्याण के विकास के क्रम में बहन जी ने उत्तर प्रदेश में सामाजिक कल्याण की कई योजनाओं में भगवान बुद्ध द्वारा उपदेशित ‘बहुजन हिताय-बहुजन सुखाय’ की नीति का अनुसरण किया है. भगवान बुद्ध और बौद्ध धर्म के पुर्नरुद्धारक डॉ. अम्बेडकर के ‘समता मूलक समाज की स्थापना’ के सिद्धान्तों के आधार पर कुमारी मायावती जी ने अपनी योजनाएं निर्मित की और उन योजनाओं का नामकरण भगवान बुद्ध की मां महामाया व डॉ. अम्बेडकर के नाम पर किया. सामाजिक कल्याण के क्षेत्र में निर्मित योजनाओं का नामकरण भी बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार में बहन जी के योगदान को परिभाषित करता है. आवासीय व्यवस्था के विकास के क्रम में देश की राजधानी दिल्ली से सटे हुए नवनिर्मित जनपद गौतम बुद्ध नगर (नोएडा) में अन्तर्राष्ट्रीय स्तर का विकास कार्य किया गया. उत्तर प्रदेश में गरीबी रेखा से नीचे जीवन-यापन करने वाले नागारिकों को आवास उपलब्ध करवाने के लिए ‘डॉ. अम्बेडकर ग्राम सभा विकास योजना’ का कार्यान्वयन भी बहन जी की सरकारों के द्वारा बहुत बड़े पैमाने पर किया गया और इतना ही नहीं बल्कि भगवान बुद्ध की मां महामाया के नाम पर ‘महामाया सर्वजन आवास योजना’ का निर्माण किया गया और इस योजना के तहत समाज के सभी वर्गों को जो आवास विहीन थे, उन्हें आवास उपलब्ध करवाने के लिए बहुत बड़े पैमाने पर कार्य किया गया. इन योजनाओं के अलावा बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार में अग्रणी भूमिका निभाने वाले श्री कांशीराम जी के नाम पर निर्मित ‘मान्यवर श्री कांशीराम जी शहरी समग्र विकास योजना’ एवं ‘मान्यवर कांशीराम शहरी गरीब आवास योजना’ के तहत तत्कालीन मुख्यमंत्री बहन कुमारी मायावती जी के द्वारा आवासीय व्यवस्था के क्षेत्र में विशेष रूप से कार्य किया गया. पर्यटन की दृष्टि से बहुआयामी आकर्षणों से परिपूर्ण उत्तर प्रदेश भारत का ऐसा राज्य है जहाँ हर आयु, वर्ग, सम्प्रदाय तथा क्षेत्र के पर्यटक प्रतिवर्ष बड़ी संख्या में भ्रमणार्थ आते हैं. उत्तर प्रदेश में अधिकांश विदेशी पर्यटकों का आवागमन बौद्ध तीर्थ-स्थलों के कारण ही होता है. बौद्ध तीर्थ-स्थलों की दृष्टि से पर्यटन का विकास करने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने ‘बौद्ध परिपथ से मथुरा और संकिसा को जोड़ने के क्रम में ब्रज परिपथ, सारनाथ के लिए वाराणसी-विन्ध्य परिपथ, श्रावस्ती के लिए लखनउ-अवध परिपथ का चिन्हांकन किया. पर्यटन के विकास के क्रम में इन परिपथों के विकास के लिए बहन जी ने विभिन्न योजनाएँ निर्मित की हैं. सन् 1995 में उत्तर प्रदेश सरकार ने ‘बौद्ध परिपथ’ के महत्व को स्वीकारते हुए इसकी अवस्थापना सुविधाओं में सुधार लाने की प्राथमिकता दी गई और भगवान गौतम बुद्ध एवं बौद्ध परिपथ से जुड़े स्थानों के विकास के क्रम में गोरखपुर परिक्षेत्र में बौद्ध परिपथ का विकास विशेष रूप से किया गया. गोरखपुर परिक्षेत्र में भगवान बुद्ध से संबंधित राजमार्गों का सुदृढ़ीकरण/चौड़ीकरण/ब्रिजवर्क कराया गया. इसके अलावा कुशीनगर में पर्यटक आवास गृह का विस्तारीकरण/उच्चीकरण, कपिलवस्तु में लैण्डस्केपिंग एवं सौन्दर्यीकरण, कपिलवस्तु में भारतीय बौद्ध महाविहार में यात्री निवास का निर्माण, बौद्ध हेरिटेज सेंटर/वाणिज्यिक परिसर का निर्माण, कपिलवस्तु में बौद्ध संग्रहालय का निर्माण, हेरिटेज पार्क एवं विपश्यना केन्द्र की स्थापना, बौद्ध कला वीथिका की स्थापना एवं कुशीनगर में हवाई पट्टी का निर्माण इत्यादि के कार्य अत्यन्त उल्लेखनीय हैं. फैज़ाबाद परिक्षेत्र में बौद्ध पर्यटन के विकास के क्रम में जनपद श्रावस्ती में स्थित बौद्ध तीर्थ-स्थल का विकास बड़े पैमाने पर किया गया. वाराणसी परिक्षेत्र में बौद्ध पर्यटन के विकास हेतु बौद्ध तीर्थ-स्थल सारनाथ में तत्कालीन मुख्यमंत्री कुमारी मायावती जी के निर्देश पर तमाम उल्लेखनीय कार्य किए गए. इस प्रकार हम देखते हैं कि वाराणसी एवं फैजाबाद परिक्षेत्र में बौद्ध परिपथ का विकास विशेष रूप से किया गया. पर्यटन-व्यवसाय एवं रोजगार हेतु इच्छुक व्यक्तियों को पर्यटन संबंधी शिक्षण एवं प्रशिक्षण प्रदान करने के उद्देश्य से लखनउ में मान्यवर कांशीराम पर्यटन प्रबन्ध संस्थान, चिनहट की स्थापना की गई. लखनउ में बौद्ध पर्यटन को बढ़ावा देने एवं बौद्ध धर्म के पुर्नरुत्थान के लिए प्रतिबद्ध बहन कुमारी मायावती के शासनकाल में उत्तर प्रदेश की राजधनी लखनउ में बौद्ध स्थापत्य के आधार पर कई बौद्ध विहारों एवं बौद्ध स्मारकों के निर्माण करवाये गये. उनमें बौद्ध विहार शान्ति उपवन, डॉ. भीमराव अम्बेडकर सामाजिक परिवर्तन स्थल, सामाजिक परिवर्तन प्रतीक स्थल, डॉ. भीमराव अम्बेडकर सामाजिक परिवर्तन संग्रहालय, मान्यवर श्री कांशीराम जी बहुजन नायक पार्क, रमाबाई मूलक चौक, रमाबाई अम्बेडकर मैदान एवं बाबा साहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर की चौमुखी प्रतिमा, गोमती विहार खण्ड-1 इत्यादि प्रमुख स्थल ऐतिहासिक रूप से बहन जी योगदान को व्याख्यायित कर रहे हैं. बौद्ध तीर्थ-स्थलों को जोड़ने के क्रम में ग्रेटर नोएडा से बलिया तक आठ लेन वाली ‘गंगा एक्सप्रेस-वे परियोजना’ का निर्माण किया गया. इस मार्ग के निर्माण हो जाने पर बौद्ध तीर्थ-स्थल संकिसा, सारनाथ एवं कुशीनगर की यात्रा आसान व सुलभ हो जाएगी. सड़क परिवहन के साथ ही साथ रेल परिवहन, जल परिवहन एवं उड्डयन परिवहन का विकास भी बौद्ध तीर्थ-स्थलों की दृष्टि से किया गया. नागारिक उड्डयन सेवा की दृष्टि से हवाई पट्टी श्रावस्ती, हवाई पट्टी गौतम बुद्ध नगर एवं अर्न्तराष्ट्रीय एयर पोर्ट कुशीनगर का निर्माण उल्लेखनीय है. ब्रिटिश-भारत के कुछ महान अन्वेषकों ने और भारतीय पुरातत्व विभाग ने जिन पुरातात्विक स्थलों का उत्खनन कर, उन्हें बौद्ध तीर्थ-स्थल के रूप में घोषित किया उनमें से कुछ पर भारतीय सरकारों ने ध्यान दिया और उनका विकास भी किया परन्तु अपने मुख्यमन्त्रित्व काल में बहन कुमारी मायावती जी ने उन तीर्थ-स्थलों के परिक्षेत्र में बौद्ध तीर्थ-स्थलों के नाम पर नवीन जिलों का निमार्ण एवं भगवान बुद्ध व उनके महान अनुयायियों के नाम पर भी नवनिर्मित जिलों की स्थापना करके और भगवान बुद्ध की विचारधारा के आधार पर कई योजनाएँ निर्मित कर बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार का ऐतिहासिक कार्य किया है. उत्तर प्रदेश के नागरिकों के रहन-सहन, आचार-व्यवहार इत्यादि का अध्ययन करने के उपरान्त यह स्पष्ट हुआ कि यहाँ के लोग शताब्दियों से चली आ रही वर्णवाद, जातिवाद एवं छुआछूत इत्यादि की परम्परा से ग्रसित रहते थे परन्तु आधुनिक समय में जब नवबौद्धों द्वारा बुद्ध की शिक्षा-दीक्षा का प्रचार-प्रसार बड़े पैमाने पर किया जा रहा है तो इसके कारण अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति एवं पिछड़े वर्ग के ऐसे कई समुदाय हैं जो वर्णवाद, जातिवाद एवं छुआछूत इत्यादि जैसी कुरीतियों से उपर उठकर भगवान बुद्ध के आदर्शों पर आधारित अपनी संस्कृति के विकास में उन्नति कर रहे हैं. अंधविश्वास तथा ढोंग-ढकोसला एवं पाखण्डों के जाल से मुक्त होने के लिए उत्तर प्रदेश के बहुत से लोग अथक प्रयास कर रहे हैं. कुछ समुदायों के लोगों की पूजा-पाठ, रीति-रिवाज में बदलाव आया है. इन लोगों के शादी-विवाह एवं मृतक इत्यादि संस्कारों में भगवान बुद्ध के आदर्शों का परिपालन किया जा रहा है. उत्तर प्रदेश के कई समुदायों के लोगों ने भगवान बुद्ध के सिद्धांतों को समाहित कर अपनी संस्कृति और संस्कारों में सुधार किया है. सामाजिक-राजनैतिक विकास की दृष्टि से भी उत्तर प्रदेश के विभिन्न समाजों और उनके द्वारा निर्मित राजनैतिक दलों के सिद्धांतों पर बौद्ध धर्म का प्रभाव पड़ा है. भौतिक विकास ही नहीं बल्कि धर्मिक, सांस्कृतिक विकास के साथ-साथ सामाजिक व राजनैतिक विकास में सामन्जस्य स्थापित हुआ है. – लेखक बौद्ध विद्वान हैं. एम.एससी/ एम.ए./ एम.फिल/पी.एचडी हैं. राजनीति में भी सक्रिय हैं. नोट- यह आलेख दलित दस्तक के जनवरी, 2017 अंक की कवर स्टोरी का अंश है। बिना मैगजीन की अनुमति के इसे प्रकाशित नहीं किया जा सकता।